Sunday, December 14, 2014

वेश्यावृत्ति को वैधता का प्रश्न


मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के December 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
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आपका स्नेह मेरा उत्साहवर्द्धन करता है.......
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वामा (प्रकाशित लेख...Article Text....)... 

वेश्यावृत्ति को वैधता का प्रश्न

- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

भारतीय दंडविधान की धारा 1860 से वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक 1956 तक सभी कानून सामान्यतया वेश्यालयों के कार्यव्यापार को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं। जिस्मफरोशी को कानूनी जामा पहनाए जाने की जोरदार वकालत की थी
अखिल भारतीय महिला संगठन - एपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन का इस विषय पर कहना है कि ‘‘भारत के विभिन्न राज्यों में सेक्स वर्कर के बीच कार्यरत संगठनों के साथ विस्तृत सलाह मशविरे के साथ ही वेश्यावृत्ति को वैध करने की दिशा में बढ़ना चाहिए। पुख्ता होमवर्क किए बिना इस गंभीर मसले को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखना ठीक नहीं है। राष्ट्रीय महिला आयोग की मुखिया को बयान देने की बजाय गहन विचार-विमर्श की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। अभी स्थिति यह है कि भारत में सेक्स वर्कर की छवि अपराधी की बनी हुई है। मौजूदा कानून बहुत पेचीदा हैं और उनके खिलाफ हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा वेश्यावृत्ति को वैध करने की वकालत करने से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो उन शोषित महिलाओं को रोजगार का रास्ता प्रदान किया जाने वाला हो। असल में यह शर्म की बात है। क्या सेक्स वर्कर होने से ही बेरोजगारी की भरपाई हो पाएगी? ’’
सन् 2011 में प्रिया दत्त ने कमाठीपुरा का नाम लिए बिना कहा था कि ‘‘जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि यौनकर्मियों की आजीविका पर कोई असर नहीं पड़े। मैं इस बात की वकालत करती हूँ। उन्होंने कहा कि जिस्मफरोशी को दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा जाता है। यौनकर्मियों की समाज में एक पहचान है। हम उनके हकों की अनदेखी नहीं कर सकते। उन्हें समाज, पुलिस और कई बार मीडिया के शोषण का भी सामना करना पड़ता है।’’
प्रिया दत्त की इस मांग पर मैंने अपने ब्लाॅग ‘‘शरदाक्षरा’’ के द्वारा कुछ प्रश्न उठाए थेः-
1-क्या किसी भी सामाजिक बुराई को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए ?
2-क्या वेश्यावृत्ति उन्मूलन के प्रयासों को तिलांजलि दे दी जानी चाहिए ?
3-जो वेश्याएं इस दलदल से निकलना चाहती हैं, उनके मुक्त होने के मनोबल का क्या होगा ?
4-जहां भी जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया गया वहां वेश्याओं का शोषण दूर हो गया
5- क्या वेश्यावृत्ति के कारण फैलने वाले एड्स जैसे जानलेवा रोग वेश्यावृत्ति को संरक्षण दे कर रोके जा सकते हैं ?
6- क्या इस प्रकार का संकेतक हम अपने शहर, गांव या कस्बे में देखना चाहेंगे?
7- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विश्व में लगभग 60 लाख बाल श्रमिक बंधक एवं बेगार प्रथा से जुड़े हुए है, लगभग 20 लाख वेश्यावृत्ति तथा पोर्नोग्राफी में हैं, 10 लाख से अधिक बालश्रमिक नशीले पदार्थों की तस्करी में हैं। सन् 2004-2005 में उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक आदि भारत में सेंटर फॉर एजुकेशन एण्ड कम्युनिकेशन द्वारा कराए गए अध्ययनों में यह तथ्य सामने आए कि आदिवासी क्षेत्रों तथा दलित परिवारों में से विशेष रूप से आर्थिकरूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को बंधक श्रमिक एवं बेगार श्रमिक के लिए चुना जाता है। नगरीय क्षेत्रों में भी आर्थिक रूप से विपन्न घरों के बच्चे बालश्रमिक बनने को विवश रहते हैं।
वेश्यावृत्ति में झोंक दिए जाने वाले इन बच्चों पर इस तरह के कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा? ‘वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न’ प्रबुद्ध ब्लॉगर-समाज ने अपने विभिन्न विचारों के रूप में मेरे प्रश्नों के उत्तर दिए। कुछ ने प्रिया दत्त की इस मांग से असहमति जताई तो कुछ ने व्यंगात्मक सहमति।
जैसे सुरेन्द्र सिंह ‘झंझट’ ने स्पष्ट कहा कि ‘इस धंधे से जुड़े लोगों के जीवनयापन के लिए कोई दूसरी सम्मानजनक व्यवस्था सरकारें करें। इन्हें इस धंधे की भयानकता से अवगत कराकर जागरूक किया जाये।’ अमरेन्द्र ‘अमर’ ने सुरेन्द्र सिंह ‘झंझट’ की बात का समर्थन किया। दिलबाग विर्कने देह व्यापार से जुड़ी स्त्रियों के लिए उस वातावरण को तैयार किए जाने का आह्वान किया जो ऐसी औरतों का जीवन बदल सके। उनके अनुसार, ‘दुर्भाग्यवश इज्जतदार लोगों का बिकना कोई नहीं देखता ..... जो मजबूरी के चलते जिस्म बेचते हैं उनकी मजबूरियां दूर होनी चाहिए ताकि वे मुख्य धारा में लौट सकें।’ लखनऊ के कुंवर कुसुमेश ने देह व्यापार से जुड़ी स्त्रियों की विवशता पर बहुत मार्मिक शेर उद्धृत किया-
उसने तो जिस्म को ही बेचा है, एक फाकें को टालने के लिए।
लोग ईमान बेच देते हैं, अपना मतलब निकलने के लिए।
ब्लाॅगर राज भाटिया ने प्रिया दत्त की इस मांग के प्रति सहमति जताने वालों पर कटाक्ष करते हुए बड़ी खरी बात कही कि -‘सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हूं ,और जो भी इसे कानूनी मान्यता देने के हक में है वो एक बार इन वेश्याओं से तो पूछे कि यह किस नर्क में रह रही है , इन्हें जबर्दस्ती से धकेला जाता है इस दलदल में, हां जो अपनी मर्जी से बिकना चाहे उस के लिये लाईसेंस या कानूनी मान्यता हो, उस में किसी दलाल का काम ना हो, क्योंकि जो जान बूझ कर दल दल में जाना चाहे जाये... वैसे हमारे सांसद कोई अच्छा रास्ता क्यों नही सोचते ? अगर यह सांसद इन लोगों की भलाई के लिये ही काम करना चाहते हैं तो अपने बेटों की शादी इन से कर दें, ये कम से कम इज्जत से तो रह पायेंगी।’
इस सार्थक चर्चा के बाद भी मुझे लग रहा है कि कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी विचारणीय हैं जिन पर विचार करना आवश्यक है -
1.- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक रूप से चलने दिया जाएगा तो वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, उस स्थिति में वेश्यागामी पुरुषों की पत्नियों और बच्चों का जीवन क्या सामान्य रह सकेगा ?
2.- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दे दिया जाए तो जिस्मफरोशी करने वाली औरतों, उनके बच्चों और उनके परिवार की (विशेषरूप से) महिला सदस्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा का क्या होगा ?
3.- क्या स्त्री की देह को सेठों की तिजोरियों से धन निकालने का साधन बनने देना न्यायसंगत और मानवीय होगा ? क्या कोई पुरुष अपने परिवार की महिलाओं को ऐसा साधन बनाने का साहस करेगा ?तब क्या पुरुष की सामाजिक एवं पारिवारिक प्रतिष्ठा कायम रह सकेगी ?
4.- विवशता भरे धंधे जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा देने के मुद्दे को क्या ऐच्छिक प्रवृति वाले सम्बंधों जैसे समलैंगिकों को मान्यता अथवा लिव्इनरिलेशनशिप को मान्यता की भांति देखा जाना उचित होगा ?
5.-भावी पीढ़ी के उन्मुक्तता भरे जीवन को ऐसे कानून से स्वस्थ वातावरण मिलेगा या अस्वस्थ वातारण मिलेगा ?
सचमुच, देहव्यापार को वैधानिकता प्रश्न गंभीर है। यह समूचे भारतीय समाज से जुड़ा हुआ है, यह देश की आधी आबादी से जुड़ा हुआ है, यह उस को प्रभावित कर सकता है जिसके तहत् समाज में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की अपेक्षा दिन-पर-दिन घटती जा रही है। अतः हर कदम फूंक-फूंक कर उठाया जाना आवश्यक है।
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Wednesday, November 19, 2014

बुंदेली व्रत-कथाओं में स्त्रीविमर्श...


प्रिय मित्रो,
अक्षर पर्वका एक बेहतरीन, पठनीय एवं विचारणीय उत्सव अंकलोकसाहित्य एवं लोक संस्कृति पर केन्द्रित....

मेरा भी एक लेख इसमें शामिल है- बुंदेली व्रत-कथाओं में स्त्रीविमर्श’...आप भी इसे पढ़ें...

एक बेहतरीन विशेषांक के कुशल सपादन के लिए संपादक सर्वमित्रा सुरजन को हार्दिक बधाई !!!
Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Akshar Parv, November 2014

Thursday, October 30, 2014

‘साईको’ होते समाज के विरुद्ध

मित्रो, ‘इंडिया इन साइड’ के Oct 2014 अंक में ‘वामा’ स्तम्भ में प्रकाशित मेरा लेख आप सभी के लिए ....
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आपका स्नेह मेरा उत्साहवर्द्धन करता है.......
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वामा (प्रकाशित लेख...Article Text....)

‘साईको’ होते समाज के विरुद्ध

- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

भारतीय रेलवे का बीना जंक्शन प्रशासनिक तौर पर एक छोटा-सा तहसीली इलाका है। इसी बीना शहर में एक नग्न युवती पेड़ों के पीछे छिपी हुई थी। इंसानों की उस पर दृष्टि पड़ी तो उसके इर्द-गिर्द भीड़ लगाने लगे। वह घबरा कर भागी। वह घबराई हुई युवती बदहवासी में बिजली के हाईटेंशन टाॅवर पर चढ़ती चली गई और लगभग 70 फुट की ऊंचाई पर पहुंच कर वह अपना संतुलन खो बैठी और गिर गई। 70 फुट की ऊंचाई से नीचे गिरते ही उसकी मौत हो गई। यह हृदयविदारक घटना घटी उस युवती के साथ जिसने अपना जीवन अभी ठीक से शुरू भी नहीं किया था। मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के एक छोटे से गंाव की आदिवासी लड़की अपने और अपने परिवार के सपने को सच करने के लिए नौकरी का साक्षात्कार देने जबलपुर गई। फिर जबलपुर से इन्दौर गई। इन्दौर में चार युवकों ने उसे सहायता देने का झांसा दे कर उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद एक युवक उसे इन्दौर से बीना पहुंचा कर रेलवे स्टेशन पर छोड़ गया। बीना में भी उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। दिन के उजाले में उस निर्वस्त्र युवती को भीड़ ने घेर लिया। वह आतंकित युवती भीड़ से भयाक्रांत हो कर आत्मघाती कदम उठा बैठी।
क्या यह मामूली-सी घटना है जिसके रोज घटित होने पर भी हम अख़बार का पन्ना पलट कर यह सोचते हुए आगे की ख़बर पर जा टिकते हैं कि यह हमारे परिवार की बेटी के साथ नहीं हुआ है और न ही कभी हो सकता है। कितनी अच्छी खुशफहमी में जीने लगे हैं हम? जो आज दूसरे के साथ घटा है वह हमारे परिजनों के साथ नहीं घट सकता है, इसकी क्या गारंटी? मानवता को लज्जित करने वाली इस घटना से ऐसा प्रतीत होने लगा है गोया समाज साइको हो चला है। बलात्कार का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। दिल्ली, मुंबई, बदायुं, बीना और न जाने कितने शहर। लगभग हर शहर, कस्बे या गंाव से लगभग प्रतिदिन बलात्कार की एक न एक घटना पढ़ने को मिल जाती है।
ऐसा कहा जाता है कि जब अंधेरा बढ़ रहा हो उसी समय आशा की किरण भी फूटती दिखाई देती है। यह किरण दिखाई दी बीना के इस जघन्य बलात्कार कांड के बाद। पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक दम्पति ने पुलिस के हील-हवाले के बावजूद खुलासा किया कि युवती के साथ बलात्कार किया गया था। पोस्टमार्टम करने वाली चिकित्सक डाॅ. मंजू कैथोरिया ने कहा कि ‘मैं भी एक मां हूं, मेरे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। एक लड़की जो मौत के बाद भी मासूम लग रही थी। उसका शव हमारे सामने पड़ा थां शरीर पर जगी-जगी पर घाव थे। एकाएक ऐसा लगने लगा कि हमारे सामने ही उस युवती के सामथ कोई दुष्कर्म कर रहा हो। सारी हृदयविदारक घटना अंाखों के सामने झूलने लगी। जो उस लड़की के साथ हुआ, वह और किसी के साथ नहीं होना चाहिए। ऐसी घटनाएं हमें अन्दर तक हिला देती हैं। ऐसा करने वालों को हर हाल में सजा मिले।‘
जिसने भी इस घटना को सुना वह सचमुच भीतर तक हिल गया। लेकिन प्रतिरोध सामाजिक से अधिक राजनीतिक स्तर पर सामने आया। प्रदेश में भाजपा सरकार होने के कारण कांग्रेस ने हल्लाबोल किया। ऐसा लग रहा था कि मामला राजनीतिक हो कर रह जाएगा लेकिन उसी दौरान बीना शहर के अधिवक्ताओं ने वह कदम उठाया जो दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों के अधिवक्ताओं ने भी नहीं उठाया था। आतंक फैलाने की नीयत से भारत आए कसाब की ओर से लड़ने के लिए वकील उपलब्ध हो गया। निर्भया के बलात्कारियों को बचाने के लिए एक वकील ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया। किन्तु बीना शहर के अधिवक्ताओं ने बलात्कारियों की पैरवी करने से मना कर दिया। उन्होंने एक स्वर से यही कहा कि -‘जो कृत्य इन सभी ने किया, उसके लिए पैरवी करना अपराधी का साथ देने के समान होगा।’
काश! यह जज़्बा, यह मानसिकता सकल समाज की बन जाए। यदि समाज अपराध सिद्ध बलात्कारियों का बहिष्कार करना शुरू कर दे, उन्हें बचाने के लिए आगे न आए तो बलात्कार जैसी अमानवीय घटनाओं पर अंकुश लग सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय का भी कहना है कि बलात्कार से पीडि़त महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया। चिन्ता का विषय यह है कि हर वर्ष बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी होती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। बहुत सारे मामलों की रिपोर्ट ही नहीं हो पाती। कभी पीडि़ता के परिवारवाले बदनामी के डर से पीछे हट जाने हैं, तो कभी रसूखवालों का दबाव उन्हें पीछे हटने को विवश कर देता है और कभी थाने में रिपोर्ट लिखने में कोताही बरती जाती है।
बलात्कार के अपराध को हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता है किन्तु दुख है कि समाज की मानसिक प्रवृत्ति इसे रोजमर्रा की मामूली घटना के रूप में लेने की बनती जा रही है। यदि राजनीतिक विरोध या प्रतिरोध सामने न आए तो शायद सामाजिक प्रतिरोध कहीं दिखाई ही नहीं देगा। यह स्थिति अत्यंत चिन्ताजनक है। इस बिगड़ रही मानसिकता में सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि बलात्कार को घिनौना अपराध मानने की बजाए समाज के प्रतिनिधि इसके बेहूदे विश्लेषण जुट जाते हैं। कोई लड़की के पहनावे को दोषी ठहराता है तो कोई उसके अकेले घर से बाहर निकलने के प्रति उंगली उठाता है। इस पर भी तसल्ली नहीं होती है तो ‘‘लड़कों से भूल हो जाती है’’ जैसा बयान दे दिया जाता है।
निर्भया कांड के अपराधियों की सजा के संबंध में सुझाव देने के लिए गठित की गई जस्टिस जे.एस. वर्मा समिति ने यह महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया था कि बेतुके बयान देने वाले जनप्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल खत्म कर दी जानी चाहिए। समिति के इस सुझाव पर अमल नहीं किया गया। न ही समाज के सोच में भी कोई बदलाव नहीं आया। दुर्भाग्य है कि निर्भया कांड के बाद आई जागरूकता मानो शीत निष्क्रियता में चली गई। बलात्कार की दर थमने की बजाए बढ़ती ही गई है। यदि बलत्कृत होती है तो यह भी लड़की का दोष है या फिर बलात्कारी चूंकि बेटा है इसीलिए उसे हर हाल में दण्ड से बचाना ही है। इस सोच को मानसिक रुग्गणता ही कहा जाएगा। इसी दूषित मानसिकता के चलते बलात्कार की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी तो होगी ही। समाज को अपनी ही साइको (रुग्गण) मानसिकता के विरुद्ध खड़ा होना ही होगा तभी स्त्री के विरुद्ध बढ़ते जा रहे जघन्य अपराध थम सकेंगे।

India Inside, October 2014

Monday, October 20, 2014

कबीर और सहजसमाधि परम्परा .....




रायपुर, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित नारी का संबल पत्रिका में प्रकाशित मेरा लेख....







'Kabir aur Sahajsamadhi Parampara' by Dr Sharad Singh

'Kabir aur Sahajsamadhi Parampara' by Dr Sharad Singh

'Kabir aur Sahajsamadhi Parampara' by Dr Sharad Singh

Monday, August 25, 2014

मेरा साक्षात्कार ....





प्रिय मित्रो,
मैं अपना साक्षात्कार आपसे साझा करना चाहती हैं जो युवा आलोचक और लेखक सुंदरम शांडिल्य ने लिया है तथा संस्कार टीवी समूह की प्रसिद्ध पत्रिका "संस्कार पत्रिका" में प्रकाशित हुआ है। August 2014 के अंक में।

Dear Friends,
I would like to share my Interview which has taken young critic and writer Sundaram Shandilya. Published in renowned magazine "Sanskar Patrika" (For Sanskar TV Group), August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Dr Sharad Singh's interview in "Sanskar Patrika" Magazine in August 2014
Cover of "Sanskar Patrika" ,August 2014.



Wednesday, August 20, 2014

स्वागत इरोम !

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स्वागत इरोम !

मित्रो,
मेरी किताब औरत तीनः तस्वीरेंका पहला लेख इरोम शर्मीला पर है...14 वर्ष बाद आखिर उन्हें न्याय मिला....

इरोम शर्मीला होने का अर्थ


- डॉ. शरद सिंह 

         जब कोई औरत कुछ करने की ठान लेती है तो उसके इरादे किसी चट्टान की भांति अडिग और मजबूत सिद्ध होते हैं। मणिपुर की इरोम चानू शर्मीला इसका एक जीता-जागता उदाहरण हैं। इसी साल चार नवंबर को उनकी भूख हड़ताल के ग्यारह साल पूरे हो गए। इतनी लंबी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। वे अपना जीवन दांव पर लगा कर निरंतर संघर्ष करती रही हैं। इरोम शर्मीला ने मात्र २८ वर्ष की आयु में अपनी भूख हड़ताल आरंभ की थी। उस समय कुछ लोगों को लगा था कि यह एक युवा स्त्री द्वारा भावुकता में उठाया गया कदम है और शीघ्र ही वह अपना हठ छोड़कर सामान्य जिंदगी में लौट जाएगी। वह भूल जाएगी कि मणिपुर में सेना के कुछ लोगों द्वारा स्त्रियों को किस तरह अपमानित किया गया। किंतु २८ वर्षीया इरोम शर्मीला ने न तो अपना संघर्ष छोड़ा और न आम जिंदगी का रास्ता चुना। वे न्याय की मांग को लेकर संघर्ष के रास्ते पर जो एक बार चलीं तो उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। यह स्त्री का वह जुझारूपन है जो उसकी कोमलता के भीतर मौजूद ऊर्जस्विता से परिचित कराता है।

  
                  शर्मीला ने यह रास्ता क्यों चुना इसे जानने के लिए सन्‌ २००० के पन्ने पलटने होंगे। सन्‌ २००० के ०२ नवंबर को मणिपुर की राजधानी इम्फाल के समीप मलोम में शांति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मीला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैंड पर सैनिक बलों द्वारा अंधाधुंध गोलियां बचाई गईं। जिसमें करीब दस लोग मारे गए। इन मारे गए लोगों में ६२ वर्षीया लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि भी शामिल थीं। एक ऐसी महिला जिसे बहादुरी के लिए सम्मानित किया गया और एक ऐसी स्त्री जो "सीनियर सिटिजन" की आयु सीमा में आ चुकी थीइन दोनों महिलाओं पर गोलियां बरसाने वालों को तनिक भी हिचक नहीं हुईइस नृशंसता ने निरपराध और निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाई गई थीं। शर्मीला ने इस घटना की तह में पहुंच कर मनन किया और पाया कि यह सेना को मिले "अफस्पाक" रूपी विशेषाधिकार का दुष्परिणाम है। इस कानून के अंतर्गत सेना को वह विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके तहत वह संदेह के आधार पर बिना वारंट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती हैकिसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। 

इस घटना के बाद इरोम ने निश्चय किया कि वे इस दमनचक्र का विरोध करके रहेंगी चाहे कोई उनका साथ दे अथवा न दे। इरोम शर्मीला ने भूख हड़ताल में बैठने की घोषणा की और मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पाक) को हटाए जाने की मांग रखी। इस एक सूत्री मांग की लेकर उन्होंने अपनी भूख हड़ताल आरंभ कर दी। शर्मीला ने तीन नवम्बर की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और चार नवंबर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार के आदेश पर इरोम शर्मीला को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा ३०९ के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उल्लेखनीय है कि धारा ३०९ के तहत इरोम शर्मीला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता था इसलिए एक साल पूरा होते ही कथित तौर पर उन्हें रिहा कर दिया गया। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहां उन्हें रखा गया हैउसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जाता है।

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अफस्पाक" शासन के ५३ वर्षों में २००४ का वर्ष मणिपुर की महिलाओं द्वारा किए गए एक और संघर्ष के लिए चर्चित रहा।असम राइफल्स के जवानों द्वारा थंगजम मनोरमा के साथ किए बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा थाउसमें लिखा था "भारतीय सेना आओहमारा बलात्कार करो"। इस प्रदर्शन पर बहुत हंगामा हुआ। मीडिया ने इसे भरपूर समर्थन दिया तथा दुनिया के सभी देशों का ध्यान मणिपुर की स्थिति की ओर आकर्षित हुआ। 

         
             इरोम शर्मीला और उन महिलाओं को संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि स्त्रियों को जिस दैहिक लज्जा का वास्ता दिया जाता हैवे न्याय के पक्ष में उस लज्जा की भी सहर्ष तिलांजलि दे सकती हैं। यानी स्त्री न्याय और सत्य के लिए किसी भी सीमा तक जाकर संघर्ष करने की क्षमता रखती है। वस्तुतः यही है इरोम शर्मीला होने का अर्थ कि स्त्री की दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ा नहीं जा सकता है।ह इरोम शर्मीला और उन महिलाओं को संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि स्त्रियों को जिस दैहिक लज्जा का वास्ता दिया जाता हैवे न्याय के पक्ष में उस लज्जा की भी सहर्ष तिलांजलि दे सकती हैं। यानी स्त्री न्याय के लिए किसी भी सीमा तक संघर्ष करने की क्षमता रखती है। वस्तुतः इरोम शर्मीला होने का अर्थ यही है कि स्त्री की दृढ़ इच्छाशक्ति को तोड़ा नहीं जा सकता है।

Tuesday, June 17, 2014

विवाहेत्तर संबंधों का राजनीतिक एपीसोड ....

वामा 
                                                                                         - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

 कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने टीवी पत्रकार अमृता राय के साथ अपने रिश्ते की बात ट्विटर पर स्वीकार की तो लोग भैचक्के रह गए। उनका यह ट्वीट उनकी कुछ निजी तस्वीरों के सार्वजनिक होने के बाद आया। दिग्विजय सिंह के वेरिफाइड अकाउंट से ट्वीट किया गया कि मुझे अमृता राय के साथ अपने रिश्ते को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है। अमृता राय ने अपने पति के साथ तलाक के लिए अर्जी दाखिल कर दी है।साथ ही उन्होंने आगे लिखा कि एक बार ये तय हो जाए तो हम इस रिश्ते को औपचारिक रूप दे देंगे। लेकिन मैं अपनी निजी जिंदगी में ताकझांक की निंदा करता हूं।
वहीं दूसरी ओर अमृता राय ने ट्वीट किया, ‘मैं अपने पति से अलग हो चुकी हूं। हमने तलाक के लिए अर्जी दे दी है। इसके बाद मैंने दिग्विजय सिंह से शादी करने का फैसला किया है।
India Inside, June 2014, Page 19

दिग्विजय सिंह के प्रेम संबंध के इस खुलासे के बाद राजनीतिक समाज में मानो बवाल मच गया। आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने दिग्विजय सिंह के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया कि यह घृणित और खतरनाक है।भारती के इस ट्वीट ने समाजशास्त्रियों के लिए एक ज्वलंत चिन्तन सामने ला पटका कि विवाहेत्तर संबंध क्या सचमुच चरित्रहीनता की निशानी है? यदि आम नागरिक के संदर्भ में यह प्रश्न उठता तो बेझिझक हांमें ही उत्तर होता। किन्तु जिन्हें समाज को दिशा देने वाला माना जाता है यदि वे यानी राजनेता ही विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त हों तो उत्तर ढूंढना जरूरी हो जाता है। इससे पहले शशि थरूर और सुनन्दा पुष्कर का प्रकरण सामने आया था जिसका दुखद अंत हुआ।
अपनी संदेहास्पद मृत्यु से ठीक दो दिन पहले ट्विटर पर अपने पति व केन्द्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर और पाकिस्तानी महिला पत्रकार मेहर तरार के प्रेम प्रसंग को सार्वजनिक करने वाली सुनन्दा पुष्कर होटल लीला के कमरा नंबर 345 में संदिग्ध हालातों में मृत पाई गई। ट्विटर पर सुनन्दा द्वारा की गई टिप्पणियों से स्पष्ट था कि वह थरूर और मेहर तरार के बीच पैदा हुई नजदीकियों से बेहद आहत थी। मृत्यु से दो दिन पूर्व सुनन्दा ने ट्विटर पर लिखा था कि शशि थरूर बेवफा हो गए हैं और उन्हें पाकिस्तानी महिला मेहर तरार से प्यार हो गया है।
वर्ष 2010 में भी केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री होते हुए भी शशि थरूर के प्रेम संबंधों के चर्चे उस समय सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने आईपीएल टीमों की नीलामी के समय केरला टीम में सुनन्दा पुष्कर को मुफ्त में हिस्सेदारी दिलाई थी। उस समय शशि थरूर का नाम खुल कर सुनन्दा पुष्कर से जुड़ा था। विवादों के बीच थरूर को मंत्री पद त्यागना पड़ा था, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने सुनन्दा से विवाह कर उन तमाम खबरों को सच साबित कर दिया जिसमें उनके और सुनन्दा के बीच प्रेम प्रसंग को प्रमुखता दी गई थी। थरूर ने सुनन्दा के साथ विवाह कर तीसरी बार दाम्पत्त्य जीवन की शुरूआत की थी, जबकि इससे पहले वह दो बार इस रिश्ते को निभाने में असफल रहे थे। किन्तु विवाह में परिवर्तित हुए इस प्रेम संबंध का ऐसा अंत हुआ जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।
चूंकि शशि थरूर का नाम प्रेम प्रसंगों के संदर्भ में प्रायः आता रहा था इसलिए सुनंदा और फिर मेहर के साथ उनके नामों को लिए जाने में आश्चर्य कम और चटखारे अधिक थे। किन्तु दिग्विजय सिंह की एक गंभीर किस्म के व्यक्ति की छवि रही अतः लोगो का चैंकना स्वाभाविक था। 67 साल के दिग्विजय सिंह की पत्नी आशा सिंह का पिछले साल कैंसर से निधन हो चुका है। वहीं 43 साल की अमृता राय के पति आनंद प्रधान आईआईएमसी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। दिग्विजय और अमृता के संबंधों का समाचार सामने आते ही सबका ध्यान आनंद प्रधान की ओर गया कि एक पति होते हुए वे अपनी पत्नी के विवाहेत्तर संबंध के बारे में क्या सोचते हैं? जल्दी ही आनंद प्रधान ने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर अपनी बात रखीं. उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में यह लिखा-‘‘एक बड़ी मुश्किल और तकलीफ से गुजर रहा हूं। यह मेरे लिए परीक्षा की घडी है। मैं और अमृता लम्बे समय से अलग रह रहे हैं और परस्पर सहमति से तलाक के लिए आवेदन किया हुआ है। एक कानूनी प्रक्रिया है जो समय लेती है लेकिन हमारे बीच सम्बन्ध बहुत पहले से ही खत्म हो चुके हैं। अलग होने के बाद से अमृता अपने भविष्य के जीवन के बारे में कोई भी फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। उन्हें भविष्य के जीवन के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं।’’
Cover Page India Inside June 2014

क्या यह सामाजिक नैतिकता का प्रश्न होने के साथ अपराध की श्रेणी में आता है? भारतीय दण्ड संहिता में किसी विवाहित गैरतलाशुदा स्त्री से शारीरिक संबंध रखा जाना अपराध की श्रेणी में आता है यदि इस संबंध में वह स्त्री, उसका प्रेमी या उसका पति कानूनी आधार पर आपत्ति करे। इसी तथ्य को आधार बना कर भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि ‘‘गुप्त विवाह संभव नहीं है। एक वकील के नाते मैं कह सकती हूं कि अभी तलाक नहीं हुआ है और मामला यौन संबंधों का है।’’ मीनाक्षी लेखी ने कहा था कि इस मामले में दिग्विजय सिंह को सजा भी हो सकती है और ऐसा करना उक्त महिला पत्रकार के पति के अधिकार क्षेत्र में आता है। पति चाहे तो दग्विजय पर केस कर सकते हैं।
विवाहेत्तर संबंधों के मामले में चाहे इसमें स्त्री की प्रवृत्ति हो या पुरुष की प्रवृत्ति, यदि इस प्रेम त्रिकोण में तीनों की सहमति हो तो क्या इसे कानूनी जामा पहनाए बिना भी वैधानिक माना जा सकता है? यह एक बड़ा प्रश्न है। एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर आमजन और रसूख वालों के लिए एक-सा होना चाहिए। अन्यथा यह भी अन्य अपराधों की तरह क्रीमीलेयरके लिए मान्य और सामान्य तबके के लिए अमान्य समझा जाता रहेगा। यदि पति-पत्नी में परस्पर निर्वाह संभव नहीं रह गया हो तो कानून भी तलाक लेने को गलत नहीं ठहराता है किन्तु तलाक लेने से पूर्व किसी अन्य व्यक्ति को अपना पति या पत्नी मान और उससे दैहिक संबंध बनाना किस हद तक उचित है? क्या समाज को इस खुलेपन को सहज भाव से अपना लेना चाहिए या इसे उच्चवर्गीयअधिकारों के रूप में ही छोड़ देना चाहिए? दिग्विजय सिंह और अमृता राय के परस्पर विवाहेत्तर संबंध के इस राजनीतिक एपीसोड के बाद इस तरह के कई प्रश्न उठ खड़े हुए हैं जिनका उत्तर  समाजशास्त्रियों, कानूनविदों और बुद्धिजीवियों को ढूंढना ही होगा।

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Tuesday, June 3, 2014

घरों में शौचालय न होने के मुद्दे पर लगभग 12 वर्ष पहले लिखी गई मेरी कहानी "मरद"...


हाल ही में घटी घटनाओं के बाद घरों में शौचालय न होने के मुद्दे पर जागरूकता दिखाई जा रही है। इस मुद्दे को मैंने अपनी कहानी "मरद" में लगभग 12 वर्ष पहले उठाया था। मेरी यह कहानी मेरे कहानी संग्रह "तीली-तीली आग" में शामिल है जो सन् 2003 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। कृपया इस कहानी को आप भी पढ़ें और शेयर करें ...

                                                    


                                      मरद 

                                                                - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

सुंदरा शेरनी की तरह दहाड़ रही थी । अपनी साड़ी का छोर कमर पर कसी हुई वह शुद्ध बुंदेली गालियों की बौछार कर रही थी। सुंदरा का पति रमेसर सहमा-सहमा सा एक कोने में बैठा हुआ था। सुंदरा  की छोटी बेटी चमेली ने अपने-आप को एक कमरे में दुबका रखा था। आंसू की धाराएं बह रही थीं उसकी आंखों से। सुंदरा की सास भी विलापना छोड़ दम साधे पड़ी थी अपने टूटे खटोलने में। किसी ने भी आज से पहले सुंदरा का यह रौद्र रूप नहीं देखा था । यूं तो सुंदरा कभी बेजुबान भी नहीं रही, उसकी बड़बड़,उसके उलाहने चलते ही रहतेलेकिन इस प्रकार ज्वालामुखी कभी नहीं बनी थी वह । आज तो सुंदरा को देख कर उसकी सास को ऐसा लग रहा था जैसे सुंदरा पर साक्षात् चंडिका सवार हो गई हो ।
आंगन में बंधी गाय भी चारा-पानी को भूल कर मानो अनुमान लगाने में मशगूल थी कि उसकी चहेती मालकिन सुंदरा  को आज क्या हो गया?कहीं गले में बंधी घंटी न बज उठे इस डर से गाय अपनी गरदन तक नहीं हिला रही थी । उस मूक पशु को भी सुंदरा के मगज खराब होनेका आभास हो गया था । मगर जैसे इंसान का बच्चा वैसे गाय  का बच्चा । भूख के मारे बछड़ा रंभा उठा । बछड़े को इस समय  तक न तो चारा मिला था और न अपनी मां का दूध । गाय लगाने के बाद ही बचा हुआ दूध पीने देने के लिए बछड़े को गाय के पास छोड़ जाता था । आज अभी तक गाय लगाई ही नहीं गई थी इसलिए बछड़े को छाड़े जाने का सवाल ही नहीं था । सुबह की भांति शाम को भी नियमित रूप से दूध दुहा जाता । गाय  भी अपने थनों में दूध का बोझ उठाए दुहे जाने की प्रतीक्षा कर रही थी।
बछड़े के बार-बार रंभाने पर रमेसर उठ बैठा । उसने बाल्टी उठाई और गाय-बछड़े के लिए पानी की हौदी भरने को पांव बढ़ा दिए ।
‘छोड़ो,आज तक किए हो जो आज करोगे। लुगाई-बिटिया तो सम्हाली नहीं जाती, चले हो गाय-बच्छड़ सम्हालने। जाओ, जा के सो रहो अपनी बुढि़या के साथ ...वो पड़ी है तुमाई छिनाल...... ।’ सुंदरा ने झपना मार के बाल्टी छीन ली रमेसर के हाथ से । दीवार से कान सटाए खड़ीं पास-पड़ोस की औरतों ने सुंदरा के आखिरी शब्दों पर ‘राम-राम’ की दुहाई देते हुए अपने दातों से अपनी जीभ काट ली । मगर रमेसर सुंदरा  के द्वारा दी गई मां की गाली भी पी गया । रमेसर की मां यानी सुंदरा की सास ने भी सुनी वह गाली और अपने पल्लू में मुंह दाब कर टेसुंए ढारने लगी ।
शाम तक लगभग सब ठीक-ठाक था। रमेसर ज़रा जल्दी ही लौट आया था खेत से। सदैव की भांति सुंदरा ने चाय बना कर आटे के लड्डू और बेसन की नमकीन पपड़ी के साथ परोस दी थी। उस घर में रमेसर और बच्चे ही चाय  पीते थे। सुंदरा को तो नफ़रत थी चाय से। रमेसर की खातिर मन मार कर दोनों समय  चाय बना देती थी। ये चाय का चस्का सरपंच  के यहां लगा था रमेसर को। सरपंच  का साथ तो छूट गया पर चाय का पल्ला नहीं छूटा। अगर चाय  का शौक़ सरपंच के बजाये कहीं और से लगा होता तो शायद सुंदरा को चाय  से चिढ़ नहीं होती।  उसने तो यही चाहा कि कम से कम बच्चे इस लत से दूर रहें किन्तु बच्चों की चटोरी जीभ को शक्कर घुली मीठी चाय बड़ी रास आती ।
सुंदरा का पूरा नाम है सुंदरबाई । उसके इस नाम से उसे कभी किसी ने नहीं पुकारा, न मायके में, न ससुराल में। ये नाम उसके अब तक के जीवन में बस दो बार लोगों की जुबान पर आया। एक बार तब जब सुंदरा की पैदाइश के बाद जन्मपत्री बनाते समय  पंडित नं ‘सुंदरा बाई’के नाम से नामकरण  किया था और दूसरी बार तब जब सुंदरा  का विवाह होने जा रहा था । उसके ससुराल वालों को उसका पूरा नाम बताया गया था जिसे उसके चचिया देवरों ने दीवार पर गेरू से लिख दिया था – ‘रमेसर संग सुंदरा बाई’। उसके देवर भी उससे उम्र में चार-छः साल बड़े ही थे। वहीं गांव के स्कूल में पढ़ते थे । कुल आठ बरस की थी सुंदरा जब रमेसर के संग उसका ब्याह हुआ था । उसे बहुत खुशी हुई थी अपने ब्याह की । वह जानती थी कि ब्याह होना अच्छी बात है । जिसका ब्याह न हो वह अभागी । सुंदरा अपने भाग्य पर इतराती हुई अपनी ससुराल पहुंची थी । चम्पा के फूल-सा निखरा रंग और भरा-भरा गोल-मटोल चेहरा।
जैसा नाम है सुंदरा, वैसी ही सुंदर भी है। मुंहदिखाई की रस्म के समय लगभग सभी के यही उद्गार थे। वह घूंघट काढ़ कर ही निकलती थी घर से बाहर। नई बहू के लिए यह ज़रूरी था। सुंदरा और उसकी सास की दो दिन में ही अच्छी पटरी बैठ गई। कारण कि सुंदरा  की सास को सात बच्चे हुए थे लेकिन उनमें से जीवित बचा तो सिर्फ रमेसर। फिर ससुर गुज़र गए तो कोई आशा भी नहीं बची। सुंदरा को पा कर उसकी सास बहुत खुश हो गई थी। उसे एक साथिन जो मिल गई थी ।
सुंदरा और उसकी सास सुबह पांच बजे से जो साथ होतीं कि रात ब्यालू (रात्रि भोजन) के बाद उस समय  ही अलग होतीं जब रमेसर अपने कमरे में जा लेटता । बाप के जीवित रहने तक रमेसर अपने बाप के साथ खेत पर जाता रहा । बाप के मरने के बाद चाचा-ताऊ की देख-रेख में खेत सम्हालने लगा । सबके अलग-अलग घर थे। इसीलिए आपस में लगभग राजी-खुशी भी थी।

सुंदरा  को यही कोई पंद्रहवां-सोलहवां वसंत चल रहा था। सात-आठ  साल होने को आ रहे थे ब्याह हुए। अब वह पुरानी बहू हो चली थी । इतना ही समय  हो चला था उसे कड़वा काढ़ा पीते । उसकी सास उसे हर महीने कड़वा काढ़ा जरूर पिलाती । सुंदरा  नाक-भौंह सिकोड़ती तो उसकी सास कहती  कि पहले बच्चा पालने लायक तो हो जा फिर पैदा करना । बच्चा न होने देने का नुस्खा था वह काढ़ा । पहले तो उसे गुस्सा आता था कि यह काढ़ा रमेसर को क्यों नहीं पिलाया जाता?धीरे-धीरे सब समझ में आने लगा । सात-आठ साले में घूंघट भी ठोड़ी से ऊपर सरक कर माथे पर आ टिका था । यूं तो उसे घर से बाहर वट-पूजन,देव-पूजन के अलावा निकलना ही नहीं पड़ता। घर में चैपाल जैसा बड़ा आंगन था जो ईंट और मिट्टी की मोटी दीवार से घिरा था । इसी आंगन में फुदकती रहती थी सुंदरा । बस,सिर्फ सुबह-शाम ही निकलना पड़ता,शौच  की खातिर । वह भी अपनी सास के पल्लू में बंध कर जाती । मुहल्ले की और औरतें और लड़कियां तो खुले में भी बैठ जातीं लेकिन सुंदरा को शर्म आती । उससे तो झाडि़यों की ओट के बिना बैठा ही नहीं जाता ।
कभी-कभी उसकी सास उसकी इस जि़द पर झुंझला उठती । तब सुंदरा तपाक से कहती, ‘हम अपने घर के पिछवाड़े वैसा पखाना क्यों न बनवा लें जैसा सरपंच जी के यहां है।’
‘धत् ! ऐसा कहीं हो सकता है?सरपंच जी ठहरे ज़मींदारी वाले । ज़मींदार के घर ही बन सकता है पखाना,हम जैसों के यहां नहीं।’ सास उसे झिड़क देती ।
‘मगर क्यों?क्यों नहीं बन सकता?’ लाड़ में सिर चढ़ी सुंदरा प्रश्न कर बैठती सास से ।
‘हमारे यहां कौन आएगा सफाई करने?’ सास उसके प्रश्न का उत्तर प्रश्न में ही देती ।
‘क्यों?’ पूछ कर सुंदरा उलझ जाती अपने-आप में । सच तो ये था कि उसने सरपंच  के यहां का शौचालय  अपनी आंख से देखा तक नहीं था । उसके बारे में सिर्फ सुना ही सुना था । सरपंच  को अवश्य  उसने एक नहीं कई-कई बार देखा था । रमेसर से दूनी उमर का होगा ।
‘सरपंच जी खड़े हैं, जल्दी-जल्दी पांव उठा ।’ जब कभी उसकी सास सरपंच  को रास्ते में खड़ा देखती दबे स्वर में सुंदरा को अवश्य  टोंकती ।
जैसे-जैसे सुंदरा का लम्बा घूंघट माथे के पल्लू में बदला वैसे-वैसे सास की नसीहत भी बदल गई ।
‘सरपंच जी खड़े हैं । घूंघट काढ़ ले !’ अब उसकी सास कहती और सुंदरा घूंघट काढ़ लेती ।

उस दिन सास की तबीयत खराब थी । उसे रात से बुखार हो आया था । सुबह अकेली ही जाना पड़ा सुंदरा को । यूं तो मैदान तक औरतों का साथ मिल गया था सुंदरा को किन्तु झाड़ी-झुरमुट के पीछे अकेली ही थी सुंदरा। उस दिन भी लौटते हुए दिखा था सरपंच । शायद अपने खेत की ओर जा रहा था। उस दिन सास साथ में नहीं थी इसलिए सुंदरा को कोई टोंकने वाला भी नहीं था । वह घूंघट काढ़े बिना ही सरपंच के सामने से निकल गई। उसी दिन शाम को रमेसर के साथ सरपंच  घर आया । सुंदरा की सास की तबीयत पूछने । जितनी देर सरपंच आंगन में बैठा रहा,सुंदरा रसोईघर से बाहर नहीं निकली । उसे अचम्भा हुआ था सरपंच के आने पर। सास की तबीयत इतनी खराब भी नहीं थी कि सरपंच  उसे देखने आता । यद्यपि,सरपंच  की आमद के बाद से रमेसर छाती फुलाए घूमता रहा। उसे अपना आपा दूना होता दिखाई दिया। उस रात वह सोना भूल कर सरपंच की घंटों तारीफ के पुल बांधता रहा । सुंदरा ने उसे दबे स्वर में टोंका भी था ‘लोग तो सरपंच जी को भला मरद नहीं कहते हैं।’ ‘झूठ कहते हैं लोग । अरे ज़मींदार आदमी है ।’ रमेसर ने पक्ष लिया था सरपंच  का ।
‘लेकिन लोग कहते हैं कि वो लुगाइयों के पीछे..... ।’सुंदरा ने और खुला संकेत किया ।
‘तू भी कहां लगी है?अरे, दो-चार लुगाइयों पे मुंह मारना तो मर्दानगी की निशानी है।’ रमेसर ने अकड़ कर कहा था ।
‘तो आप सोई मुंह मारना चाहते हो का?’ सुंदरा ने चिकोटी काटी थी ।
‘तू ऐसा करने दे तब तो..... ।’ छेड़ने लगा था रमेसर उसे ।
.....और बात आई-गई हो गई थी ।

दूसरे दिन शौच  से लौटते में सुंदरा  को सरपंच  फिर दिखाई पड़ा । ऐसे अचानक सामने आ खड़ा हुआ कि वह घूंघट काढ़ ही नहीं पाई । वह अपने होंठों पर आजीब मुस्कराहट लिए निकल गया उसके सामने से । उसके बाद से सुंदरा अन्य  औरतों के बीच -बीच  में हो कर चलने लगी । सास की तबीयत अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई थी । वैदजी की दवा बहुत धीरे-धीरे असर कर रही थी । इसीलिए सुंदरा की सास सुबह मुंहअंधेरे या सांझ को अंधेरा घिरने पर घर के नाज़दीक ही निपट लिया करती थी । सुंदरा का वश चलता तो वह अपनी सास के बिना कभी घर से पांव बाहर नहीं निकालती मगर शौच के मामले को टाला नहीं जा सकता था।

सास को बीमार हुए पांच  दिन गुज़र चुके थे । सुंदरा नित्य की भांति मुर्गे की बांग के साथ उठी । लोटे में पानी भरा और दरवाज़ा उढ़का कर निकल पड़ी। सास उनींदी पड़ी थी अपने खटोलने पर। रमेसर की खुर्राटें आंगन तक सुनाई  पड़ रही थीं । घर से बाहर निकलते ही दो पड़ोसनें साथ मिल गईं। उन दोनों ने सुंदरा से उसकी सास की तबीयत का हाल पूछना शुरू कर दिया। तीनों आपस में बोलती-बतियातीं मैदान के दूसरे छोर पर आ पहुंचीं। यहीं से तीनों अलग-अलग हो लीं। सुंदरा झाड़ी-झुरमुट की ओट के लिए आगे बढ़ती चली गई।
वह शौच से निवृत्त हो कर उठी ही थी कि दो मज़बूत हाथों ने उसे दूसरे झुरमुट की ओर खींच लिया। इस अप्रत्याशित घटना ने चींखने का मौक़ा भी नहीं दिया सुंदरा को। एक बारगी सुंदरा के दिमाग़ में आया कि उसे किसी जंगली,आदमखोर जानवर ने पकड़ लिया है किन्तु दूसरे ही क्षण चेतना लौटने पर उसने पाया कि सरपंच ने अपनी मज़बूत बांहों में उसे दबोच रखा है।
‘सुंदरा मेरी प्यारी, मेरी जान, मेरी प्यास बुझा दे मेरी सुंदरा ..... !’ न जाने क्या-क्या अनाप-शनाप बकने लगा था सरपंच। सुंदरा की छठी इंद्रिय ने उसे बता दिया कि उस पर कौन-सी विपत्ति आई है और क्या कुछ घटित होने वाला है उसके साथ।
‘मुझे खुश कर दे तो रानी बना दूंगा ...वरना जान से मार दूंगा,समझीं !’ सरपंच ने अपनी उंगलियों का दबाव उसके गले पर बढ़ाते हुए उसे धमकाया । भयभीत सुंदरा को मानो लकवा मार गया। उसके हलक से चींटी बराबर आवाज़ भी नहीं निकल पा रही थी। वह आंखें फाड़ कर सरपंच के चेहरे की ओर ताके जा रही थी। सरपंचकी आंखों में तैरते लाल डोरे उसके चेहरे को और अधिक भयानक बना रहे थे । अपनी देह पर सरपंच  के शरीर का पाशविक दबाव महसूस कर सुंदरा फड़फड़ा उठी । लेकिन सोलह बरस की सुकुमार सुंदरा न तो सरपंच  को रोक सकती थी और न रोक पाई।
‘रमेसर की सलामती चाहती है तो चुप कर बैठना!’ जाते-जाते धमका गया था सरपंच ।
सुंदरा से उठा भी नहीं जा रहा था । उसकी  कमर, पीठ, कुहनियां सब कुछ कंकड़-पत्थर से बुरी तरह छिल गए थे। समूची देह टीस रही थी। इससे भी कहीं तीखी टीस उठ रही थी उसके मन में। जैसे-तैसे वह हिम्मत कर के उठी और विक्षिप्त-सी लड़खड़ाती हुई अपने घर पहुंची। रमेसर उस समय  भी खुरार्टे भर रहा था। सास कूल्ह-कांख रही थी। सुंदरा सास के खटोलने का पाया पकड़ कर बैठ गई । बिलख-बिलख कर रोने लगी वह। सास ने हड़बड़ा कर सुंदरा की ओर देखा।
‘क्या हुआ?’ सास ने घबराते हुए पूछा ।
‘बाई वो ..... ।’ आगे कुछ न कह सकी सुंदरा । वैसे कुछ कहने की आवश्यकता भी नहीं थी । बताए बिना ही सब कुछ समझ गई सुंदरा की सास ।
‘कौन था?सरपंच?’ सास ने पूछा । उसके पूछने में प्रश्न नहीं बल्कि उत्तर के भाव झलक रहे थे ।
कुछ देर सन्नाटा खिंचा रहा दोनों के बीच। बस, सुंदरा के सुबकने की आवाज़ ही सुनाई पड़ रही थी।
‘अब चुप हो जा! अब रोने-पीटने से क्या फ़ायदा,बिन्ना! मुझ मरी को भी अभी ही बीमार पड़ना था ....चल अब चुप हो जा ! ....बहुत दुख रहा है?’ सास ने सुंदरा को सांत्वना देते हुए पूछा ।
‘बाई! चल,थाने चलेंगे !’ सुंदरा ने अनसुनी करते हुए सास से कहा ।
‘ठीक है,पहले हाथ-मूं धो ले और कपड़े-लत्ते बदल ले।’सास ने कांपते हुए स्वर में कहा।
‘नहीं ऐसे ही चलेंगे।’ सुंदरा बिलखती हुई बोली।
‘ऐसे नहीं। चलमेरी बात मान ।’ सास ने गंभीरतापूवर्क कहा।
सास के कहने पर सुंदरा उठी । उसने जैसे-तैसे हाथ-मुंह धोया । फटा ब्लाउज़ बदला और साड़ी ठीक-ठाक कर के आ खड़ी हुई सास के आगे ।
‘बैठ जा बिन्ना! यहां बैठ और कान धर के सुन !’सास ने अपने खटोलने पर सुंदरा  के लिए जगह बनाते हुए उसका हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा। सुंदरा बैठ गई खटोलने पर ।
‘हम थाने नहीं जाएंगी । कहीं नहीं जाएंगी । तू भी इस बारे में किसी से कुछ मत कहना ।’ सास के ये शब्द सुन कर सुंदरा को झटका लगा । वह आश्चर्य से सास का मुंह ताकने लगी। वह तो घर में घुसते समय यही सोच  कर हलाकान हुई जा रही थी कि जब सास को पता चलेगा कि सुंदरा अपनी अस्मत लुटा आई है तो वह उसे कोसेगी,किसी कुए में डूब मरने को कहेगी । इसीलिए सास की बातें सुन कर भी सुंदरा को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हो रहा था ।
‘मगर क्यों?’ सुंदरा के स्वर में हठ के भाव थे। वह बोली ‘हमारे गांव में तो चोरी-चकाड़ी होती है तो लोग थाने पहुंच जाते हैं।’
‘बिन्ना ! चोरी चकाड़ी और इसमें फरक है....मेरी बात को समझ! ....तू औरतज़ात है, तेरी ही जग हंसाई होगी । वो मुआ सरपंच मरद है,उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह तो न जाने कितनियों पर अपनी मदार्नगी उतार चुका है,भला क्या बिगड़ा उसका?जो होनी बदी थी,सो हो गई । अब भलाई इसी में है कि अब चुप कर के रह ! थाने-कचहरी में जाने से बिरादरी में भी नाक-कटाई होगी । रमेसर के कक्का तो ताकई बैठे हैं कि कुछ उेसई-वेसई हो जाए तो रमेसर को बिरादरी से बाहर कर ज़मीन दबाएं। रमेसर की खातिर गम्म खा।’ सास ने उसे समझाना चाहा।
सास की बातें सुन कर न जाने कौन-सा जुनून सवार हुआ सुंदरा पर कि वह सास के पास से छिटक कर सीधी रमेसर के पास जा पहुंची । गहरी नींद में सोए रमेसर को झकझोर कर जगाने लगी। रमेसर अचकचा कर उठ बैठा।
‘क्या बात है?क्या हुआ?’ रमेसर ने आंखें मिचमिचाते हुए पूछा ।
उत्तर में सुंदरा बिलखने लगी । उससे कुछ भी कहा नहीं गया। तब तक सास भी कूल्हती-कांखती रमेसर के कमरे तक आ पहुंची। उसने दरवाज़े के पल्ले उढ़का दिए ताकि आवाज़ बाहर तक न जा पाए। रमेसर को समझ में नहीं आ रहा था कि ‘ये सब क्या हो रहा है’ सुंदरा बिलख-बिलख कर रोए जा रही थी।
‘क्या हुआ,बाई?अनिष्ट की आशंका से घबराते हुए रमेसर ने अपनी मां से पूछा।
‘बताती हूं,ठैर जा ।’ रमेसर से कहती हुई सास सुंदरा को चुप कराने लगी- ‘अब चुप हो जा, बिन्ना! अब चुप कर!’
‘क्या चुप कर!’ तुम थाने क्यों नहीं चलतीं?’ सुंदरा तड़प कर बोली।
‘थाने?क्या बात हुई, चोरी-डाका पड़ गया क्या?’ थाने का नाम सुनते ही रमेसर और अधिक घबरा गया।
‘नहीं-नहीं, तू घबरा मत....और देख,सुंदरा ! मुझे पहले रमेसर से बात कर लेने दे । ये तेरा मरद है अगर ये कहेगा तो इसी के  साथ चली जाना थाने।’ सास ने सुंदरा से कहा फिर रमेसर को संबोधित करती हुई बोली- ‘रमेसर,तू सयाना है! तू बता कि सरपंच से झगड़ा कर के कोई इस गांव में रह सकता है क्या?’
‘नहीं ! कोई नहीं रह सकता। मगर हुआ क्या?’ रमेसर ने उत्तर देते हुए प्रश्न किया ।
‘पहले तू ये बता कि इज्जत जब तक ढकीं रहती है तभी तक इज्जत रहत है न, उघर गई तो धूल बरोबर हो जात है। है कि नई?’
‘सो तो है लेकिन..तो बेटा ! अब तू ही इस घर का अकेला मरद है, इस घर की इज्जत ढांपना अब तेरे हाथ में है। अगर तू समझदारी से काम लेगा तो हम सारी मुसीबतों से बच जाएंगे। सोच ले बेटा !’ सास ने अनुनय -विनय  के स्वर में कहा ।
‘मगर हुआ क्या?’ झुंझला उठा रमेसर । उसके धीरज का बांध टूट चला था।
‘वो सरपंच  है है न....उसने सुंदरा की इज्जत बिगाड़ दी है....ये चाहती है कि हम थाने जाएं और रपट लिखाएं सरपंच  के खिलाफ ....मगर तू तो जानता हैकि पिछले बसर सरपंच  के भंनेज ने केसरी की बिटिया की इज्जत बिगाड़ दी थी । केसरी तो गया था थाने, पर क्या हाथ लगा उसके?थाने वालों ने केसरी की बिटिया को ही दिन-रात बिठाए रखा थाने में । वहां जो बीती उस पर कि थाने से लौट कर कुए में ही कूद गई थी बेचारी । केसरी की बीवी हलक-हलक के मर गई चार महीने में ही और सरपंच ने ज़मीन हड़प ली उसकी। सात जनों का भूखा पेट लिए अब भी चक्कर काट रह है थाने के। बिरादरी में ही कौन पूछ रहा है उसे?सरपंच  के डर से हुक्का-पानी बंद है उसका।‘ सुंदरा की सास ने एक ही सांस में सुंदरा के साथ घटी घटना और बुरा-भला सब कुछ समझा दिया रमेसर को।
‘मगर बाई वो.... ।’ रमेसर का बीस सालाना जवानी का गरम खून जोर मारने लगा।
‘सोच ले बेटा! केसरी जैसी अपनी मिटानी है या इज्जत ढांपे रहनी है?अरे क्या मेरा कलेजा मूं को नहीं आ रहा है?....कैसा रौंदा है मेरी फूल-सी बिन्ना को ...मगर बेटा, दुनियादारी के कारण कलेजे पर पत्थर रख कर बोल रही हूं ऐसा करने को...।’सास का गला रुंध गया। रमेसर पर अपनी मां के कथन का ऐसा प्रभाव पड़ा कि तत्काल उसके हाथ-पांव ढीले पड़ गए।

क्या कर लेती अकेली सुंदरा?रमेसर और सास दोनों ने मिल कर खूब समझाया सुंदरा को । अंत में उसे भी सास की बात मान लेनी पड़ी । किसी हद तक ठीक ही तो कह रही थी उसकी सास । उसके मन में बस एक फांस चुभी रह गई कि कैसा मरद है रमेसर जो अपनी घरवाली की इज्जत लुटने पर भी गम्म खा गया ।
इस हादसे के बाद सुंदरा और उसकी सास के बीच  पहले जैसा प्रेम-भाव नहीं रहा । सास को भी सुंदरा की आंखों में अपने लिए घृणा तैरती दिखाई देती और सुंदरा भी सास की उपेक्षा करने से नहीं चूकती। रमेसर भी दबा-दबा सा रहता । सुंदरा ने तय  कर लिया था कि अब वह रमेसर को भी अपने साथ संबंध नहीं बनाने देगी । अब वह चारपाई के बजाये अलग ज़मीन पर चटाई बिछा कर सोने लगी । रमेसर के स्पर्श मात्रा से उसके शरीर में कांटें चुभने लगते ।
सयानी सास ने सुंदरा के ये हाव-भाव देख कर नया पैंतरा अपनाया जिसके आगे सुंदरा का रमेसर से अलगाव टिक नहीं पाया । गांव की औरतें बाकी दुनियादारी के मामले में भले ही सीधी और अज्ञानी हों लेकिन घरेलू मामलों में दांव-पेंच करने में शहरी औरतों से कम नहीं रहती हैं। सुंदरा की सास ने सरपंच की दबंगई के आगे भले ही घुटने टेक रखे थे लेकिन अपनी वंश-परम्परा की चिन्ता उसे थी। सुंदरा को पता ही नहीं चला कि उसकी सास उसके रात के भोजन में भांग मिलाने लगी । सास की चतुराई के चलते सुंदरा तीन बच्चों की मां बन गई । दो बेटे हुए और एक बेटी । वह इसके लिए रमेसर को ही दोषी मानती रही । वह यही सोचती कि रमेसर अपनी चाह पूरी करने के लिए रात को सोते में किसी जादू-टोना की मदद लेता है । उसे नशे वाली बात का शायद कभी पता ही नहीं चल पाता लेकिन एक दिन मंदिर से लौटते समय  किराने वाले ने आवाज़ दे कर सुंदरा को रोका और उसे पुडि़या थमाते हुए कहा कि उसकी सास भांग की पुडि़या दुकान पर ही भूल गई है । किराने वाला समझता था कि सुंदरा की सास को भांग की लत है । सुंदरा ने किराने वाले से पूछा कि ‘उसकी सास कब से भांग ले जा रही है?’
किराने वाले का जवाब सुन कर सुंदरा को सारा माज़रा समझ में आ गया । उसे समझ में आ गया कि रात को सोते समय उसका अपने आप पर वश क्यों नहीं रहता?क्यों वह भी रमेसर के बहकावे में आ जाती है?
जिस सास को वह अपनी मां, बहन, सहेली जैसा मानती थी वही उससे धोखा करती रही, यह बात सुंदरा को मन के कोने-कोने तक साल गई । घर आते ही उसने सास को खूब खरी-खोटी सुनाई । सास वंश, परंपरा और खानदान की दुहाई देती रही ।

समय यूं ही व्यतीत होता रहता मगर अभी एक होनी और घटित होनी शेष थी । सुंदरा की बेटी चमेली दस बरस की हो चली थी । सुंदरा ने कई बार रमेसर और सास से झगड़ा  किया कि बेटी जवान हो रही है, शादी-ब्याह में तो कुछ समय  लगेगा । अब जवान बेटी को शौच के लिए बाहर न जाना पड़े इसकी व्यवस्था कर लेनी चाहिए। रमेसर भी सुंदरा की बात से सहमत था मगर इस प्रश्न पर पीछे हट जाता कि उनके यहां सफाई के लिए कौन आएगा?इस पर सुंदरा कहती कि अंग्रेजी वाली बनवा लो । रमेसर तर्क देता कि अंग्रेजी वाला पखाना (फ्लश) तो सरपंच  के यहां भी सिर्फ मेहमानखाने में है । गांव भर में और कहीं नहीं है । अब सरपंच  की बराबरी कैसे की जा सकती है?रमेसर के मुंह से ऐसे तर्क सुन कर कसमसा कर रह जाती सुंदरा और गालियां बकने लगती ।
सुबह हो या शाम,रात हो या दोपहर, चमेली को जब भी शौच के लिए जाना होता सुंदरा उसके साथ जाती। चमेली मना भी करती तब भी वह नहीं मानती । ये बात और है कि सुंदरा हर समय, हर जगह तो बेटी के साथ जा नहीं सकती थी । चमेली स्कूल जाती, सहेलियों के घर जाता,सहेलियों के साथ कभी-कभार बाज़ार-हाट चली जाया करती ।

आज शाम को चमेली जब स्कूल से लौटी उस समय  सुंदरा रात का भोजन बनाने की तैयार कर रही थी। रमेसर चाय-नाश्ता कर के चारपाई पर पड़ा-पड़ा झपकियां ले रहा था। चमेली ने किताब-कापियां एक ओर रखीं और सुंदरा का हाथ बंटाने के लिए सुंदरा के पास जा पहुंची । सुंदरा ने चमेली की कलाइयों में हरी-पीली चूडि़यां देखीं तो वह चिहुंक पड़ी।
‘ये चूडि़यां कहां से आईं?’सुंदरा ने भृकुटी तानते हुए पूछा।
‘वो...स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गई थी तो मैं सहेलियों के साथ बाज़ार चली गई थी । मैं तो मना कर रही थी लेकिन वे लोग ज़बदस्ती लिवा ले गईं।’ चमेली ने तत्काल सफाई दी।
‘तो ये चूडि़यां तेरी सहेली ने खरीदीं?’ सुंदरा ने संदेह भरे स्वर में पूछा ।
‘नहीं, सरपंच  दाऊ  ने...वो वहीं दुकान पर खड़े थे ।’ एक सांस में कह गई चमेली ।
इतना सुनते ही सुंदरा का हाथ उठ ही गया चमेली पर । मारने के साथ ही पछताई सुंदरा। सरपंच का कांइयांपन क्या सुंदरा नहीं जानती?
‘ये क्या करती है, सुंदरा?उसे क्यों मार रही है?’ तभी सुंदरा की सास ने उसे टोका ।
‘चुप कर, बाई ! नशे की औलाद बहकेगी नहीं तो और क्या करेगी?’ सुंदरा ने झिड़क दिया सास को। सास भी समझ गई सुंदरा का संकेत। कुछ बाल न सकी वह। सुंदरा ने रमेसर को भी आड़े हाथों लिया।
रमेसर ने सुझाव दिया कि चमेली का स्कूल जाना छुड़वा देते हैं। यह सुन कर भड़क गई सुंदरा।
‘आहा, हा ! स्कूल जाना छुड़वा दो । स्कूल नहीं जाएगी और शौच के लिए?मैं कोई अमरित खा के आई हूं?इस बुढि़या जैसे मैंने भी किसी दिन खाट पकड़ ली तो कौन जाएगा चमेली साथ सुबह-शाम?फिर तुम्हें क्या, तुम तो चमेली को भी समझा दोगे कि चुप कर के बैठ! नामरद कहीं के!’ यही से शरु हुआ ज्वालामुखी विस्फोट।
‘कित्ती बार कहा तेरे से कि मैं तो देसी-अंग्रेजी सब बनवा दूं मगर वो सरपंच बैर मान गया तो?समझती नहीं है तू !’ रमेसर आहत स्वर में बोला ।
‘खूब समझती हूं, तेरे को भी और तेरे सरपंच को भी । वो भी नामरद, तू भी नामरद । एक को झाडि़यों की ओट चाहिए तो एक को कमरे की ओट ...तभी दिखती है तुम लोगों की मरदानगी। तेरे से कुछ नहीं होगा ...तू तो सो रह अपनी बुढि़या के साथ ...जो बनवाना-करना है, मैं बनवाऊंगी -करुंगी। लुगाई भी मैं ही हूं और मरद भी मैं ही !’ क्रोध से उबलती दहाड़ उठी सुंदरा।
‘सोच ले,वो सरपंच कहीं....।’रमेसर ने दबे स्वर में टोका।
‘तू बैठ के सोच! आ के देखे तो साला सरपंच,गाड़ दूंगी उसे खुड्डी में ...अब मैं वो सुंदरा नहीं कि तेरे कहे से चुप बैठूं,अब मैं मां हूं चमेली की ! समझे !’सुंदरा ने फिर दहाड़ा ।
‘चल, तैयार हो जा ! जब तक मैं यहां इन्तेजाम न करवा लूं तब तक तू अपने मामा के पास रहना!’सुंदरा ने चमेली का हाथ पकड़ कर उसे उठाते हुए कहा ।
सुंदरा की यह बात सुन कर खटोलने पर लेटी सास ने सिर उठा कर सुंदरा की ओर देखा । सुंदरा की आंखों में धधकती हुई ज्वाला देख कर सहम गई वह और उसने फिर से अपना सिर दुबका लिया अपने खटोलन में।
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Tili Tili Aag  -(Story Book) - 3320-21, Jatwara , Netaji Subhash Marg , Daryaganj , New Delhi, India 110002
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