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My Editorials - Dr Sharad Singh

Wednesday, February 4, 2026

चर्चा प्लस | उम्र कोई बाधा नहीं, यह दिखा दिया ग्रैमी अवार्ड जीत कर नोबेल पुरस्कार विजेता आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस


उम्र कोई बाधा नहीं, यह दिखा दिया ग्रैमी अवार्ड जीत कर नोबेल पुरस्कार विजेता आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने


- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


         संगीत के लिए दिया जाने वाला विश्व का प्रतिष्ठित ग्रैमी अवार्ड तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को दिया गया है, उनके एल्बम ‘‘मेडिटेशंस’’ के लिए। यह ग्रैमी अवार्ड के इतिहास में पहली बार है कि एक आध्यात्मिक गुरु को ग्रैमी अवार्ड दिया गया है। यह दलाईलामा की विलक्षण प्रतिभा है कि उनके संगीत ने प्रोफेशनल्स को पीछे छोड़ दिया और स्थापित कर दिया कि आध्यात्म के लिए संगीत सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है। बेशक़ इससे चीन बौखला गया है किन्तु समूचा विश्व दलाई लामा के मानवीय विचारों पक्ष में खड़ा है। जिसका ताज़ा उदाहरण है उन्हें ग्रैमी अवार्ड दिया जाना। इसी के साथ 90 वर्षीय परम पावन दलाई लामा ने यह दिखा दिया है कि उत्साह के साथ जीने के लिए उम्र कोई बाधा नहीं होती है।


लॉस एंजेलिस में आयोजित 68वें ग्रैमी अवॉर्ड्स में इतिहास रचते हुए 90 वर्ष की आयु में दलाई लामा ने अपना पहला ग्रैमी पुरस्कार जीता। तिब्बती आध्यात्मिक गुरु को उनका यह सम्मान स्पोकन-वर्ड एल्बम ‘‘मेडीटेशंस” के लिए मिला, जिसने वैश्विक लोकप्रिय संस्कृति और आध्यात्मिक दर्शन के बीच एक दुर्लभ संगम प्रस्तुत किया। यह उपलब्धि अपनी अनोखापन के साथ-साथ अपने संदेश के कारण भी दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी है। दलाई लामा ने इस सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि मानने के बजाय मानवता की साझा जिम्मेदारी की स्वीकृति बताया, जिससे यह पुरस्कार केवल एक कला-सम्मान न होकर करुणा, शांति और वैश्विक नैतिक चेतना का प्रतीक बन गया।
तेनजिन ग्यात्सो, चैदहवें दलाई लामा तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले ये ओमान परिवार में हुआ था। दो वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। ‘‘दलाई लामा’’ उपाधि का अर्थ होता है ज्ञान का महासागर। दलाई लामा अर्थात वह व्यक्ति जिसने करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप पाया हो। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से परमपावन भी कहा जाता है।
दलाई लामा की मुख्य आत्मकथा ‘‘फ्रीडम इन एग्जाइल: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ द दलाई लामा’’ है, जो 1991 में प्रकाशित हुई थी। हिंदी में यह पुस्तक ‘‘मेरा देश निकाला’’ के नाम से उपलब्ध है। इसमें उन्होंने अपने शुरुआती जीवन, तिब्बत पर चीनी कब्जे और 1959 में भारत में निर्वासित जीवन की शुरुआत का वर्णन किया है। ये दोनों पुस्तकें दलाई लामा के जीवन संघर्ष एवं उनके जीवन के विविध आयामों से परिचित कराती है। यूंकि ये दोनों पुस्तकें मैंने स्वयं पढ़ी हैं अतः मैं यह दावे के साथ यहां लिख सकती हूं कि एक आध्यात्मिक गुरू का कठिनतम जीवन आध्यात्म के मार्ग से गुज़र कर किस तरह सहज, सरल एवं शांत बन गया, इन दोनों पुस्तकों को पढ़ कर जाना जा सकता है। दलाई लामा का जीवन प्रेरणादाई है। कोई भी व्यक्ति अथाह दुखों एवं पीड़ाओं में भी अपने चित्त को शांत बना कर कैसे बालसुभ्लभ प्रवृत्तियों को अपने भीतर बचाए रख सकता है, यह दलाई लामा के अब तक के जीवन के बारे में जान कर सीखा जा सकता है।  
90 वर्षीय दलाई लामा को यह सम्मान ‘‘मेडिटेशन: द रिफ्लेक्शन्स ऑफ हिस होलीनेस द दलाई लामा’’ के लिए उन्हें मिला। उन्हें बेस्ट ऑडियोबुक, नरेशन और स्टोरीटेलिंग रिकॉर्डिंग की कैटेगरी में यह अवॉर्ड दिया गया। यह अवॉर्ड ग्रैमी के प्री-टेलीकास्ट समारोह के दौरान घोषित किया गया, जिसे यूट्यूब पर लाइव-स्ट्रीम भी किया गया था। इस ऐलान के साथ ही यह पल इतिहास में दर्ज हो गया, क्योंकि यह पहली बार था जब किसी विश्व-प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु को इस श्रेणी में ग्रैमी अवॉर्ड से नवाजा गया। ‘मेडिटेशनरू द रिफ्लेक्शन्स ऑफ हिस होलीनेस द दलाई लामा’ एक अनोखा ऑडियो प्रोजेक्ट है, जिसमें बोले गए मेडिटेशन, दलाई लामा की शिक्षाएं और संगीत का खूबसूरत संयोजन देखने को मिलता है। इस एल्बम का संगीत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रेरित है, जो श्रोता को शांति, आत्मनिरीक्षण और संतुलन की अनुभूति कराता है। यह प्रोजेक्ट न केवल आध्यात्मिक साधना का माध्यम है, बल्कि आधुनिक दुनिया में मानसिक शांति की तलाश कर रहे लोगों के लिए एक सशक्त संदेश भी देता है।
दलाई लामा ने कहा कि ‘‘ग्रैमी अवॉर्ड को व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि साझा सार्वभौमिक जिम्मेदारी की पहचान मानता हूं। मैं इस अवार्ड को सकल मानवता के पक्ष में विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं। मेरा मानना है कि शांति, दया, हमारे पर्यावरण की देखभाल और इंसानियत की एकता की समझ सभी आठ अरब मनुष्यों की सामूहिक भलाई के लिए आवश्यक है। मैं आभारी हूं कि यह ग्रैमी अवार्ड इन संदेशों को और अधिक लोगों तक पहुंचाने में सहायक होगा।’’
दलाई लामा का यह पहला ग्रैमी पुरस्कार है, लेकिन दशकों से उन्हें विश्व स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित जाता रहा है। सन 1989 में उन्हें अहिंसा और शांति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्हें टेम्पलटन प्राइज, लिबर्टी मेडल और दुनिया भर के विश्वविद्यालयों से कई मानद डॉक्टरेट उपाधियां भी मिल चुकी हैं। ये सभी सम्मान दर्शाते हैं कि दलाई लामा का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति, नैतिकता और शिक्षा जैसे व्यापक क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
चीन दलाई लामा को शांति का नोबल पुरस्कार दिए जाने पर भी बौखलाया था और अब ग्रैमी अवार्ड दिए जाने पर भी तिलमिला उठा है। यद्यपि दलाई लामाम यह भली भांति समझते हैं कि चीन के आमजन इसमें शामिल नहीं हैं, वे विवश हैं। दलाई लामा का कहना है कि ‘‘एक शरणार्थी के रूप में हम तिब्बती लोग भारत के लोगों के प्रति हमेशा कृतज्ञता महसूस करते हैं, न केवल इसलिए कि भारत ने तिब्बतियों की इस पीढ़ी को सहायता और शरण दिया है, बल्कि इसलिए भी कई पीढ़ियों से तिब्बती लोगों ने इस देश से पथप्रकाश और बुधमित्ता प्राप्त की है। इसलिए हम हमेशा भारत के प्रति आभारी रहते हैं। यदि सांस्कृतिक नजरिए से देखा जाए तो हम भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं। हम चीनी लोगों या चीनी नेताओं के विरुद्ध नहीं हैं आखिर वे भी एक मनुष्य के रूप में हमारे भाई-बहन हैं। यदि उन्हें खुद निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती तो वे खुद को इस प्रकार की विनाशक गतिविधि में नहीं लगाते या ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे उनकी बदनामी होती हो। मैं उनके लिए करूणा की भावना रखता हूं।’’
परमपावन दलाई लामा ने अपनी मठवासी शिक्षा छह वर्ष की अवस्था में प्रारंभ की। वर्ष 1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें। 1954 में वह माओ जेडांग, डेंग जियोपिंग जैसे कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए। लेकिन आखिरकार वर्ष 1959 में ल्हासा में चीनी सेनाओं द्वारा तिब्बती राष्ट्रीय आंदोलन को बेरहमी से कुचले जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गए। इसके बाद से ही वह उत्तर भारत के शहर धर्मशाला में रह रहे हैं जो केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय है। तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा ने संयुक्त राष्ट्र से तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस संबंध में 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए गए।
सन 1963 में परमपावन दलाई लामा ने तिब्बत के लिए एक लोकतांत्रिक संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया। मई 1990 में तक ही दलाई लामा द्वारा किए गए मूलभूत सुधारों को एक वास्तविक लोकतांत्रिक सरकार के रूप में वास्तविक स्वरूप प्रदान किया जा सका। इस वर्ष अब तक परमपावन द्वारा नियुक्त होने वाले तिब्बती मंत्रिमंडलय काशग और दसवीं संसद को भंग कर दिया गया और नए चुनाव करवाए गए। निर्वासित ग्यारहवीं तिब्बती संसद के सदस्यों का चुनाव भारत व दुनिया के 33 देशों में रहने वाले तिब्बतियों के एक व्यक्ति एक मत के आधार पर हुआ। धर्मशाला में केंद्रीय निर्वासित तिब्बती संसद में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष सहित कुल 46 सदस्य हैं।
सन 1987 में दलाई लामा ने तिब्बत की खराब होती स्थिति का शांतिपूर्ण हल तलाशने की दिशा में पहला कदम उठाते हुए पांच सूत्रीय शांति योजना प्रस्तुत की थी। उन्होंने यह विचार रखा था कि तिब्बत को एक अभयारण्य-एशिया के हृदय स्थल में स्थित एक शांति क्षेत्र में बदला जा सकता है जहां सभी सचेतन प्राणी शांति से रह सकें और जहां पर्यावरण की रक्षा की जाए। लेकिन चीन परमपावन दलाई लामा द्वारा रखे गए विभिन्न शांति प्रस्तावों पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया देने में नाकाम रहा। 21 सितंबर, 1987 को अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों को सम्बोधित करते हुए परमपावन दलाई लामा ने पांच बिन्दुओं की शांति योजना रखी थी। यह पांच सूत्रीय शांति योजना थी कि समूचे तिब्बत को शांति क्षेत्र में परिवर्तित किया जाए। चीन उस जनसंख्या स्थानान्तरण नीति का परित्याग करे जिसके द्वारा तिब्बती लोगों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो रहा है। तिब्बती लोगों के बुनियादी मानवाधिकार और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए। तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण व पुनरूद्धार किया जाए और तिब्बत को नाभिकीय हथियारों के निर्माण व नाभिकीय कचरे के निस्तारण स्थल के रूप में उपयोग करने की चीन की नीति पर रोक लगे। तिब्बत की भविष्य की स्थिति और तिब्बत व चीनी लोगों के सम्बंधो के बारे में गंभीर बातचीत शुरू की जाए।
शांति, अहिंसा और हर सचेतन प्राणी की खुशी के लिए काम करना दलाई लामा के जीवन का बुनियादी सिधांत है। वह वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर भी चिंता प्रकट करते रहते हैं।  दलाई लामा ने 52 से अधिक देशों का दौरा किया है और कई प्रमुख देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और शासकों से मिले हैं। उन्होंने कई धर्म के प्रमुखों और कई प्रमुख वैज्ञानिकों से मुलाकात की है। दलाई लामा के शांति संदेश, अहिंसा, अंतर धार्मिक मेलमिलाप, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व और करूणा के विचारों को मान्यता के रूप में अब तक उनको 60 मानद डॉक्टरेट, पुरस्कार, सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। दलाई लामा ने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं। उनका संदेश है प्यार, करूणा और क्षमाशीलता।
दलाई लामा को ग्रैमी अवार्ड दिया जाना आध्यात्मिक संगीत की वैश्विक मान्यता पर भी मुहर लगाता है। नवीनतम इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स के प्रति रुझान रखने वाले दलाई लामा के भीतर गहन चिंतनशील आध्यात्मिक गुरु के साथ बाल सुलभ जिज्ञासु व्यक्ति भी मौजूद है जो उनके व्यक्तित्व को विलक्षण बनाता है तथा उनका व्यक्तित्व सभी के लिए अनुकरणीय है। जिस आयु को लोग उम्र का अंतिम पड़ाव मानते हैं, उसे एक नई शुरुआत की भांति सार्थक बना देने की उनकी कला को समर्पित है ग्रैमी अवार्ड ।                -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 04.02.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, February 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर" | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर"
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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त्रैमासिक (अव्यवसायिक)- बघेली अंजोर
संपादक - डॉ राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’
प्रकाशक  - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी (म.प्र.) - 486661
मूल्य - 60/- (वार्षिक रु.280/-)
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‘‘बघेली अंजोर’’ बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य-संस्कृति की पूर्णतः अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका जिसके प्रधान सम्पादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकलश्।  उप सम्पादक गीता शुक्ला श्गीतश् तथा सह सम्पादक रामलाल मिश्र, शिवी शुक्ला हैं। बोलियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध या पत्रिका प्रमुख पांच बोलियां को साथ लेकर चल रही है - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीधी जिले के महत्वाकांक्षी विद्वान डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकल’ इस पत्रिका को एक मिशन की तरह आरंभ कर चुके हैं। समीक्ष्य अंक “बघेली अंजोर” का तीसरा अंक है। आज के डिजिटल युग में जब किसी भी प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक चुनौती भरा काम है ऐसे कठिन दौर में बोलियो के लिए समर्पित त्रैमासिक प्रकाशित करने का बीड़ा उठाना अपने आप में प्रशंसनीय कार्य है।

      विभिन्न बोलियां के लिए जो संपादन सहयोग दे रहे हैं वे हैं- बघेली में भृगुनाथ पाण्डेय श्भ्रमरश् (रीवा), अवधी में राम प्रसाद शुक्ल (प्रयागराज), भोजपुरी में प्रकाश उदय (वाराणसी), बुन्देली में डॉ. सरोज गुप्ता (सागर) तथा छत्तीसगढ़ी में डॉ. विनोद कुमार वर्मा (बिलासपुर)।
भारत में भाषाई विविधता पर भारी संकट मंडरा रहा है, एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 780 भाषाओं में से 400 के करीब भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। वैश्वीकरण, शहरीकरण और रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषाओं के दबाव के कारण मातृभाषाएं दम तोड़ रही हैं, जिससे सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर नष्ट हो रही है। भाषा विज्ञानयों के अनुमान के अनुसार अरुणाचल प्रदेश और असम में लगभग 60 जनजातीय भाषाएं 2050 तक खत्म हो सकती हैं। नई पीढ़ी पारंपरिक भाषाओं की जगह प्रमुख भाषाएँ सीख रही है, जिससे भाषा का हस्तांतरण थमता जा रहा है। बोलियों के साथ-साथ मुहावरे, लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान भी लुप्त हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बोलियां को बचाना उन्हें संरक्षित एवं संबंधित करना अत्यंत आवश्यक है इस दिशा में “बघेली अंजोर” अपना दायित्व निभाती दिखाई दे रही है।
यहां प्रश्न यह भी उठना है कि अपनी भाषा या अपनी बोली को प्रमुखता दिलाने के लिए किसी तरह की हठधर्मिता या हिंसा का प्रदर्शन किया जाना क्या उचित है? जैसा कि विगत कुछ ऐसे में महाराष्ट्र में कई बार देखा गया है। ”भाषा परिवार” शब्द इसीलिए प्रयुक्त होता है कि अनेक भाषाएं एक साथ सम्मान पूर्वक उपस्थित रहें, विकास करें जैसे मानव परिवार में सभी सदस्य मिलकर रहते हैं और जब सभी मिलकर रहते हैं तभी परिवार समृद्धि शैली हो पता है और सभी सदस्यों का समुचित विकास हो पता है ठीक यही स्थिति भाषाओं और बोलियों की है ।

        डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ ने अपने संपादकीय में ‘‘कहब जरूरी है - मामकाः पाण्डवाश्चैव’’ शीर्षक से बघेली में बहुत सही लिखा है कि- “बोली-भाखा क लै के, अबै कुछ समय पहिले महारास्ट्र म बहुत बड़ा हंगामा होइ ग रहा। बिल्लाधारी बहुत दिनन से जड़ान बइठ रहें। बाताबरन म गरमी ले आबै के खातिर, उँ मराठी के समरथन म अइसन दहेंचाल मचाइन, के सगले देस म, सगली दुनिया म धू-धू होय लागि। उँ लिनकर विरोध किहिन, जिनका मारिन-पीटिन, जिनका महारास्ट्र से निकारै के एजेंडा चलाइन, इया बिसरि गें, के महारास्ट्र (बम्बई) के विकास के पहिया खींचे म इनहिन के हाँथ है। इहै मेर कुछ अति उत्साही बिल्लाधारी आपन नाव लिखावै, छपावै के खातिर कहीं न कहीं इया मेर के कसरत करत मिलिन जात है। इया देस म बाइस भासा बोली जाती है। उनहुन के सबके अलग-अलग अनेकन बोली-लोकभासा हई। इया बाति पर बहुत गम्भीरता से सोवै के जरूरति है, के हर बोली-भाखा एक दुसरे क साथ ले के जब चलति है, तब उआ भारत देस के भासा बनति है। कुछ खुराफाती बिल्लाधारी अठमीं अनुसूची के छुरघुरी छाँड़ि के आगी लगाबै के कोसिस लगातार करत रहत हैं औ बिल्ला के मोह म, कुछ जने इया घुरछुरी से बिना सोचे-समझे अपनेन घरे म आगी लगाबै खातिर तयार मिलि जात हैं। उनहीं इया बाति के सुधि नहीं रहै, के सब क साथ ले के चलब, हमरे संस्कृति के पहिचान आय। ष्सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।। (वृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषद) हमरे देस के, हमरे संस्कृति केर सूत्र बाक्य आय।”
जनवरी-मार्च 2026 के इस अंक में जो आलेख दिए गए हैं, वे हैं- भाईलाल शर्मा का “बघेली गद्य-साहित्यरू दशा और दिशा”,   डॉ. शंकर लाल शर्मा का “ब्रज की होलीः विविध रूप-रंग”, डॉ. बिहारीलाल साहू “छत्तीसगढ़ की जनभाषा”, प्रिंस कुमार सेन का आलेख “सभ्यता की विकास-यात्राः नदियों से सड़कों तक”।

      विविध बोलियां में कहानी के अंतर्गत शिवपाल तिवारी की बघेली कहानी “अकरथी”, डॉ. रश्मिशील शुक्ला की अवधी कहानी “मन के जीते जीत”, वन्दना अवस्थी दुबे की बुंदेली कहानी “बड़ी हो गयीं ममता जी”, डॉ. विनोद कुमार वर्मा की छत्तीसगढ़ी कहानी “लँगड़ा कोन”, डॉ. दिनेश पाण्डेय की भोजपुरी कहानी “बरगद लोक” है। यह सभी कहानियां अपने-अपने बोली क्षेत्र की संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
लघुकथाओं के अंतर्गत बघेली में कृष्ण मणि मिश्र की “परबचन” अवधी में भारतेन्दु मिश्र की “कनबतिया”, बुंदेली में डॉ. शरद सिंह की “लुगाइयन की आजादी”, छत्तीसगढ़ी में चोवाराम वर्मा ‘बादल’ की “तुलसी चउरा के दिया” तथा बघेली में शंकर सिंह श्दर्शनश् की लघुकथा “गरे के पट्टा” है।
     इस अंक में कहानियों और लघुकथाओं के साथ ही रामप्रसाद शुक्ल का अवधी व्यंग्य “हमार सिच्छा- प्रायमरी” तथा बलभद्र का भोजपुरी संस्मरण “जो सुमिरत सिधि होय” प्रकाशित है।
“पुरिखन के कोठार से” के अंतर्गत डॉ. विष्णुदेव तिवारी छत्तीसगढ़ी कथा “पइयाँ परत ही चन्दा-सुरुज के” दी गई है। इसके अतिरिक्त पुस्तक समीक्षा एवं पांचों बोलियों के विविध गीत भी इस अंक में समाहित हैं, जिससे यह अंक समग्रता समेटे हुए है। गीतों में परदेसी न आये - गीता शुक्ला ‘गीत’ (बघेली), दुइ बूँद आँसु - विनय विक्रम सिंह ‘मनकही’ (अवधी), आज विदा भई मुनियां की - डॉ कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ (बुंदेली), सुरता आथे - धनराज साहू (छत्तीसगढ़ी), माथे अंचरा जोगवलीं - डॉ कमलेश राय (भोजपुरी।
ग़ज़लों में विनय मिश्र ‘प्रांजल’ (बघेली), डॉ. अशोक ‘अज्ञानी’ (अवधी), पूरनचन्द्र गुप्ता (बुन्देली), शिव ‘निश्चिन्त’ (छत्तीसगढ़ी) सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ (भोजपुरी) गजलें हैं।
शिव ‘निश्चिन्त’ की छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के ये कुछ शेर देखिए-

जियत आदमी देख जिन होगे भइया।
सुमत के ये रद्दा कठिन होगे भइया।
कुँवारा हे भिंदोल अब ले बिचारा, ये मेचका के कबछिन लगिन होगे भइया।
जे टूरी के नयना मया बान छोड़िस, त टूरा के मन ह हरिन होगे भइया।

इसी तरह कुछ शेर सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ की भोजपुरी के -
आजु पहिले पहिल, कुछ नफा हो गइल।
नैन मिलते, दरद सब दफा हो गइल।
न सुनाई सुनाई बताईं रहीं मनगुमे, जिंदगी के, इहे फलसफा हो गइल।
जान के जान से, जान जुड़ि के रहे, आशिकी में, इहे तोहफा हो गइल।
प्रीत के आँखि पर, जबसे चश्मा चढ़ल, जे रहे बेवफा, बावफा हो गइल।
    
ये ग़ज़लें अन्य भाषाओं की ग़ज़लों से कहीं भी काम नहीं ठहरती हैं। इनमें वही संवाद और रवानी है जो हिंदी उर्दू की ग़ज़लों में रहती है।

इस प्रकार “बघेली अंजोरा” का यह अंक पांचों बोलियों - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी की प्रतिनिधि रचनाओं का सुंदर पिटारा है, जिसमें पांचों भौगोलिक क्षेत्रों की सोंधी मिट्टी की महक समाई हुई है जिसे उनके शब्दों के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। यूं भी क्षेत्रीय बोलियां किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान, समृद्ध परंपराओं और लोक-संस्कृति की संवाहक होती हैं। ये न केवल आपसी संवाद को सहज और आत्मीय बनाती हैं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, साहित्य, और इतिहास को पीढ़ियों तक संरक्षित रखती हैं। सामाजिक एकता, अस्मिता और भाषाई विविधता के लिए इनका महत्व अत्यंत व्यापक है। इस अंक में संगीत सभी रचनाएं अपनी अपनी बोलियां से न केवल परिचय कराने में सक्षम है बल्कि दूसरी बोली बोलने वाले पाठक के लिए भी एक नई बोली से जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। जब एक ही ज़िल्द में विभिन्न बोलियों की रचनाएं संग्रहित रहेंगी तो स्वाभाविक है कि अपनी बोली की रचना को पढ़ने के उपरांत दूसरी बोली की रचना पर भी ध्यान जाएगा तथा उसे पढ़ने और समझने का मन स्वाभाविक रूप से करेगा। यह कोई बलात प्रयास नहीं है अपितु सहज आग्रह है, जो रचना स्वयं ही करती है।
किसी भी बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है।  प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। इस जातीय पहचान को बनाए रखना साझा दायित्व होता है। बोलियों के हित में  “बघेली अंजोर” का संपादन एवं प्रकाशन करने हेतु इसके प्रधान संपादक डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ बधाई के पात्र हैं। इस पत्रिका को पढ़कर उनके इस प्रयास को समर्थन दिया जाना चाहिए।
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