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My Editorials - Dr Sharad Singh

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Wednesday, November 4, 2026

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड के लोक साहित्य में मौजूद हैं अनेक महाभारत गाथाएं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
बुंदेलखंड के लोक साहित्य में मौजूद हैं अनेक महाभारत गाथाएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बुन्देली लोक साहित्य  गद्य और पद्य दोनों विधाओं में धनी है। बुन्देली में सामान्य जन जीवन से जुड़े संदर्भों के काव्य के साथ ही लोक गाथाएं भी सदियों से कहीं-सुनी जा रही हैं। इनमें भारतीय इतिहास के महाकाव्य कहे जाने वाले रामायण एवं महाभारत काल की कथाओं को भी गाथाओं के रूप में गाया जाता है। बुन्देलखण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ने लगभग 14 वीं सदी में महाभारत कथा और रामायण कथा लिखी। विष्णुदास की महाभारत कथा 1435 ई. माना गया है। यह गाथा शैली में दोहा, सोरठा, चैपाई तथा छंदों से युक्त है। बुंदेली लोकसाहित्य गाथाओं से समृद्ध है जिसमें महाभारत पर आधारित गाथाओं में ओज का अद्भुत संचार है। यद्यपि आधुनिकता के आज के दौर में इन लोक गाथाओं के मूल स्वरूप के लुप्त होने का भय बढ़ चला है।


बुन्देली की प्रसि़द्ध महाभारत काल संदर्भित लोकगाथाएं हैं- बैरायठा, कृष्ण-सुदामा, द्रौपदी चीरहरण तथा मेघासुर दानव आदि। इनके अतिरिक्त राजा जगदेव की लोकगाथा में भी पाण्डवों की चर्चा का समावेश है। महाभारत कालीन चरित्रों से जुड़ी गाथाओं का इस प्रकार बुन्देलखण्ड में रूचिपूर्वक गाया जाना इस बात का द्योतक है कि बुन्देली जन प्रकृति से जितने वीर होते हें तथा मानवीय संबंधों के आकलन को लेकर उतने ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें व्यक्ति के अच्छे अथवा बुरे होने की परख होती है तथा साहसी, वीर, उदार, दानी और सच्चा व्यक्ति अपना आदर्श प्रतीत होता है। इसीलिए जन-जन में गाए जाने वाली बैरायठा लोकगाथा में ‘महाभारत’ महाकाव्य की लगभग सम्पूर्ण कथा को जन-परिवेश में पस्तुत किया गया है। जैसे, धृतराष्ट्र और गंाधारी के विवाह के प्रसंग को इन शब्दों में ्रप्रस्तुत किया गया है-
जब आ गई है चिठिया महाराज रे कै,
जब गंधार में हो रये हैं ब्याव रे कै
जब गंाधारी को हुइये नौने ब्याव रे कै,
जब खबरंे तो मिल गईं महराज रे कै  
जब सज गए गंगंव महराज रे कै,
जब फौजें कटीली सजवांय रे कै
जब गांधार की पकरी उनने गैल रे कै
जब गांधार तो पौंचे जांय रे कै
जब गांधारी के हो रये नौने ब्याव रे कै
जब देखे समर महराज रे कै
इसी गाथा में द्यूतक्रीड़ा तथा चीर-हरण का अत्यंत दृश्यात्मक वर्णन मिलता है-
जब सकुनी ने डारे दाव रे कै,
जब पर गये अठारा दाव रे कै
फिर हारे धरम और राज रे कै
जब बोले जरजोधन महराज रे कै
..........
जब जबरन तो लैजा रव महराज रे कै
जब जूटो तो पकरो ओने आज रे कै
जब रानी खों लै गव अपने साथ रे कै
जब आ गई सभा के नोने बीच रे कै
जब सबरो से करी है गुहार रे कै
इस विवरण में  जिन तथ्यों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है वे ध्यान देने योग्य हैं कि जब व्यक्ति अनुचित कर्म करने लगता है तो ‘धरम’ और ‘राज’ दोनों गंवा बैठता है। इसी प्रकार जब ‘पांच पती’ अर्थात् सगे-संबंधी भी रक्षा नहीं कर पाते हैं उस समय ‘हरि’ अर्थात् ईश्वर सहायता करता है। यह मानव मन की वह अवस्था है जो राजनीतिक अस्थिरता एवं असुरक्षा के दौर में प्रभावी हो उठती है। यही भाव ‘चीरहरण’ लोग गाथा में मिलते हैं। दुश्शासन द्वारा चीरहरण किए जाने पर द्रौपदी पतियों द्वारा निर्धारित नियति को चुपचाप स्वीकार करने के बदले सहायता के लिए कृष्ण को पुकारती है-
हे श्याम मेरी सुध लइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
शकुनी दुर्योधन ने मिल के, कपट के पांसे डारे
जुआ खेल के पति हमारे, राजपाट सब हारे
मोरी बिगड़ी आज बनइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
इसी गाथा में द्रौपदी की पुकार सुन कर श्री कृष्ण के आने का वर्णन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि श्री कृष्ण द्रौपदी की लाज बचाने पहुंचे तो किन्तु किस साधन अथवा किस वाहन से?
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई, कारज बिगड़ो जाई
नौ सौ कोस हस्तिनापुर बसो है, जल्दी देव पहुंचाई
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई।।
नौ गज चलत हवा से आगंे, दस गज की ऊंचाई
तीन लोक को भार जो लावे, और चाल प्रभु कहंा से आई
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई।।
गरुड़ पर सवार हो कर श्री कृष्ण सभा में पहुंचे जहंा द्रौपदी के पांचों पति मूक दर्शक बने बैठे थे -
पांचई पति मौन हो बैठे, अर्जुन भीम सही
हरि से द्रौपति टेर करी
जब नन्दलाल आये सभा में, बढ़ गओ चीर सही
खेंचत चीर दुसासन हारे, चीर पे भीर भरी
बुन्देली लोकगाथाओं में महाभारत के विविध प्रसंगों के साथ ही विविध पात्रों एवं चरित्रों को भी स्थान दिया गया है। ‘कृष्ण सुदामा’ लोकगाथा में कृष्ण और सुदामा की मित्रता का सुन्दर वर्णन है।
दोई पढ़ें इक गुरुकुल में, नन्द नन्दन और सुदामा।
ईंधन की हुई महा तबाही, घर में से मिसरानी आई
जल्दी लकड़ी दो मंगवाई, अधकचरी है दाल
भोजन खों हो गई शामा, नन्द नन्दन और सुदामा।

वर्षों बाद अपनी पत्नी के कहने पर अपने मित्र से मदद मांगने पहुंचे सकुचाए हुए सुदामा की आवभगत मित्र कृष्ण ने की। अपने हाथों से सुदामा के चरण धोए तथा सिंहासन बैठने को दिया। मित्र कृष्ण की सम्पन्नता देखकर सुदामा भेंट में लाए चावल देने का साहस नहीं कर पा रहे थे जिसे कृष्ण ने ताड़ लिया।
कासी दास श्रीकृष्ण कांख से, तुदुल खेंच चबावे
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें
तंदुल खाय मुट्ठी भर कें, मन में बहुत सराहवें
कंचन महल बनाय मित्रा के, संपति अमित भरवें
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें
‘राजा जगदेव’ लोकगाथा में भी पाण्डवों का उल्लेख आया है। यह उललेख प्रश्नों के रूप में है। किसने पृथ्वी को रचा? किसने संसार को रचा? किसने पाण्डवों को बनाया? पाण्डवों को किस उद्देश्य से बनाया गया? इन प्रश्नों का उत्तर भी इन्हीं के साथ दिया गया है कि देवी ने पाण्डवों को बनाया। पृथ्वी से अन्याय और अधर्म का विनाश करने के लिए पाण्डवों की रचना की गई।
कौना रची पिरथवी रे दुनियां संसार, कौना रचे पंडवां उनई के दरबार
बिरमा रची पिरथवी रे दुनियां संसार, माई रचें पंडवां रे अपने दरबार
रैबे खों रची पिरथवी रे दुनियां संसार, रन खों रचे पंडवा रे अपने दरबार ।।
लोक गाथाएं लोक परम्पराओं के साथ चलती हैं। इनमें जन की आस्था, विश्वास और धारणाएं निहित होती हैं। लोग गाथाएं जन के चरित्रा को समझने में मदद करती हैं। कुल मिला कर ये सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं चारित्रिक परम्पराओं का प्रतिबिम्ब होती हैं। 
भारतीय जनमानस को चरित्रों की विविधता से परिपूर्ण ‘महाभारत’ महाकाव्य ‘रामायण’ के बाद सबसे अधिक प्रभावित करता है। बुन्देली जनमानस इससे अलग नहीं है। अन्याय, दासता के विरुद्ध युद्धघोष करने वाले बुन्देलों के लिए महाभारतकालीन प्रसंगों का विशेष महत्व होना स्वाभाविक है। यदि मुग़लों अथवा अंग्रेजों के विरु़द्ध बुन्देलों के संघर्ष का इतिहास पढ़ा जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि बहुसंख्यक शत्राुओं से अल्पसंख्यक बुन्देलों ने सदैव डट कर संघर्ष किया। ठीक उसी तरह जिस प्रकार पाण्डवों ने कौरवों का सामना किया था। अतः इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि ऐसे संघर्षपूर्ण अवसरों पर ये लोग गाथाएं आमजन में साहस का संचार करती रही होंगी। आज भी सुदूर ग्राम                                                   
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(दैनिक, सागर दिनकर में 04.11.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, November 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | मोबाइल कैमरे से लिखे गए काव्यात्मक चित्रों की सुंदर प्रस्तुति है- ‘‘निसर्ग गाथा’’ | समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
मोबाइल कैमरे से लिखे गए काव्यात्मक चित्रों की सुंदर प्रस्तुति है- ‘‘निसर्ग गाथा’’ 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक    - निसर्ग गाथा
लेखिका एवं छायाकार - संध्या सर्वटे
प्रकाशक   - अमन प्रकाशन, पन्नालाल साहित्याचार्य मार्ग, जवाहर गंज मार्ग, सागर, म.प्र.-470002
मूल्य     - 500/-
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  ‘‘निसर्ग’’ अर्थात प्रकृति। मानव जीवन प्रकृति का एक तत्व है, अभिन्न अंग है। मनुष्य को सौंदर्य की समझ प्रकृति से ही मिली है। प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य प्रकृति के सौंदर्य को गुफा की भित्तियों एवं शिलाओं पर उकेरता था। वह प्रयास करता था कि जो कुछ उसने देखा है, उसे वह यथावत चित्रित कर सके जिससे अन्य लोग भी प्रकृति के उस सौंदर्य एवं भाव से अवगत हो सकें। फिर भी सब कुछ यथावत चित्रित नहीं हो पाता था। सब कुछ ‘जस का तस’ दिखाने की ललक ने फोटोग्राफी की कला का न केवल आविष्कार किया अपितु उसे निरंतर विकसित किया। आज डिजिटल युग में फोटोग्राफी यथार्थ के और अधिक निकट हो गई है। डिजिटल तकनीक ने तस्वीरों की स्पष्टता को और अधिक बढ़ा दिया है। श्वेत-श्याम चित्रों से ले कर डिजिटल चित्रों तक का सफर अपने आप में अनूठा है। उतना ही अनूठा है उस पुस्तक का प्रकाशित होना जो मोबाइल फोटोग्राफी के सुंदर तस्वीरों के संग्रह के रूप में है, वह भी एक महिला फोटोग्राफर द्वारा अपने मोबाइल से खींची गई तस्वीरों के संग्रह के रूप में। सागर निवासी कवयित्री संध्या सर्वटे की नवीनतम पुस्तक हाल ही में प्रकाशित हुई है जिसका नाम है ‘‘निसर्ग गाथा’’। यह उनके द्वारा अपने मोबाइल से खींचे गए चित्रों का सुरुचिपूर्ण संग्रह है।
संध्या सर्वटे काव्य सृजन एवं फोटोग्राफी दोनों में निष्णात हैं। यूं तो वे रांगोली, पेंटिंग, बागवानी आदि में भी माहिर है, इसके साथ ही वे प्रकृति के सुंदर दृश्यों को अपने मोबाइल कैमरे से बढ़ी खूबसूरती से क़ैद करती हैं, बिल्कुल किसी कविता की भांति। मृदुल स्वभाव की संध्या सर्वटे़ का प्रकृति-प्रेम स्वाभाविक है क्योंकि जो भी व्यक्ति संवेदनशील है वह प्रकृति के तत्वों से सहज ही अपना तादात्म्य स्थापित कर सकता है और उन तत्वों को स्थायित्व प्रदान करने का सबसे अच्छा माध्यम है फोटोग्राफी।
वस्तुतः फोटोग्राफी प्रकृति के सौंदर्य, उसके रहस्यों और संरक्षण के प्रति जागरूकता का एक सुंदर दस्तावेज होती है। कैमरे का लेंस प्रकृति के उन अनमोल क्षणों को थाम लेता है जो पलभर में बदल जाते हैं। एक अच्छी तस्वीर सिर्फ दृश्य नहीं दिखाती, बल्कि जंगल, नदी और मौसम की अनकही कहानी कहती है। सुंदर तस्वीरें लोगों के हृदय में प्रकृति के प्रति प्रेम और उसके संरक्षण की भावना जगाती हैं। वर्तमान में नेचर फोटोग्राफी का महत्व और अधिक हो गया है क्यों कि शहरों के विस्तार ने प्रकृति की नैसर्गिकता को निरंतर घटाया है। जहां हरे-भरे जंगल हुआ करते थे, वहां आज कांक्रीट की इमारतें हैं, सीमेंट की चैड़ी सड़के हैं, वहां हरियाली कट चुकी है। भविष्य में यही क्रम जारी रहेगा तो तस्वीरें की साक्ष्य बनेंगी कि उन क्षेत्रों में कितनी अधिक हरियाली हुआ करती थी। दूसरा पक्ष यह भी है कि आज भाग-दौड़ भरी शहरी होती जिन्दगी में प्रकृति का आनन्द लेने का समय मानो समाप्त होता जा रहा है। घरों में न आंगन हैं और न आंगन वाले नीम, अमरूद, नींबू के पेड़। ऐसे में छायाकारों द्वारा प्रकृति की उतारी गई तस्वीरें ही प्रकृति की छटाओं से साक्षात्कार कराती हैं। फिर भी यह कहना होगा कि नेचर फोटोग्राफी उतनी आसान नहीं है जितनी प्रतीत होती है। हमारी आंखों के सामने से ढेर सारे दृश्य गुज़रते हैं, उनमें से किस दृश्य का महत्व है, कौन-सा दृश्य कैप्चर किया जाए और किस ऐंगल से, एपर्चर कितना होना चाहिए, लाइट कितनी और कैसी होनी चाहिए आदि तत्वों का महत्व रहता है। एक नेचर फोटोग्राफर असंख्य दृश्यों के बीच से एक दृश्य बड़ी खूबसूरती से सहेज कर रख लेता है।


पुस्तक की भूमिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह अर्थात मैंने लिखी है। शीर्षक है ‘‘कैमरे से लिखे गए काव्यात्मक चित्रों की नयनाभिराम प्रस्तुति है निसर्ग गाथा’’। पुस्तक के संबंध में सागर के वरिष्ठ साहित्यकार टीकाराम त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘‘संध्याजी, के छायाचित्रों में भोर, प्रभात, रविराज का आगमन, दोपहर का नभ, सूर्यास्त शीर्षकों से सर्वाधिक बृहत् प्रकाश स्रोत सूर्य का स्तवन है वस्तुतः यह सूर्य के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव करते हुए कृतज्ञता ज्ञापन है। रंग बिरंगे फूल खिले, बगिया की बहार आदि से गेंदा, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, रातरानी, पारिजात प्रभृति अनेकानेक फूलों के छायाचित्र हैं जो भारत की विविधता में एकता के द्योतक हैं।’’
सामाजिक एवं कलात्मक कार्यों के कलए विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित संध्या सर्वटे वनस्पति-शास्त्र से एम.एस.सी., बी.एल.आय.एस.सी. तथा डिप्लोमा इन बिजनेस मेनेजमेन्ट, डिप्लोमा इन ड्राइंग-पेंटिंग हैं। वे रंचमंच के निर्देशन एवं नाट्य लेखन से भी जुड़ी हुई हैं। उनके पिता स्व. ना. श्री. सर्वटे अपने समय के सागर के प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं में गिने जाते थे तथा माता स्व. मालिनी ताई सर्वटे प्रतिष्ठित समाज सेविका रहीं। आज भी सर्वटे परिवार सागर के समाज में अपनी प्रतिष्ठा यथावत बनाए हुए है। संध्या सर्वटे मानती हैं कि उनकी प्रतिभा के विकास में उनके परिवार का सदा सहयोग रहा है।
अपनी फोटोग्राफी के संबंध में ‘‘मनोगात’’ शीर्षक से अपने विचारों को प्रकट करते हुए संध्या सर्वटे ने लिखा है कि-‘‘शिक्षा के बाद विधिवत ड्राइंग सीखी। रंगोली, चित्रकला की प्रदर्शनी लगाई। टेक्नोलोजी की प्रगति से मोबाइल फोन आया जिसके कारण फोटोग्राफी आसान हुई। मेरे हाथ में मोबाइल फोन आया तो फोटोग्राफी करने लगी। फोटो को पसंद किया जाता था। प्रोत्साहन मिलता गया। मैंने एकल फोटो प्रदर्शनी लगाई। सागर में व सागर के बाहर। फरवरी-मार्च 2026 में देवास में लगाने का अवसर मिला। सभी को फोटो पसंद आये। इस बात का सभी ने आश्चर्य व्यक्त किया कि मोबाइल से इतने अच्छे फोटो आ सकते हैं? मेरे मन में विचार आया की कुछ फोटो पर एक छोटी-सी पुस्तक निकाली जाए। यह एक प्रयास है। परिणामस्वरुप पुस्तक निकली।’’
संध्या सर्वटे की यह पुस्तक ‘‘निसर्ग गाथा’’ पाठकों को किसी भी सामान्य दृश्य को एक फोटोग्राफर की गहरी नज़र से देखना सिखाती है। जैसे, सुबह, दोपहर, शाम होना प्रतिदिन की प्राकृतिक घटना है किंतु जब इन तीनों समयों का भिन्नता पूर्ण सौंदर्य कैमरे में कैद हो जाता है और तस्वीरों के रूप में सामने आता है तो उस सौंदर्य की छटा प्रकृति की एक अलग ही गाथा व्यक्त करती है। प्रकृति की फोटोग्राफी (नेचर फोटोग्राफी) न केवल एक खूबसूरत कला है और संध्या सर्वटे ़ इस कला में माहिर हैं। यह बात इस पुस्तक में उनके द्वारा खींचे गए छायाचित्रों से स्वतः प्रमाणित होती है।
नेचर फोटोग्राफी पर दुनिया के सबसे प्रसिद्ध वाइल्डलाइफ और नेचर फोटोग्राफर्स में से एक, एन्सेल एडम्स का यह कथन बेहद लोकप्रिय है,‘‘एक बेहतरीन तस्वीर वह होती है जो पूरी तरह से व्यक्त करती है कि कोई व्यक्ति उस चीज के बारे में क्या महसूस करता है जिसे फोटोग्राफ किया जा रहा है, और इस प्रकार, यह जीवन की गहरी समझ को दर्शाती है।’’
एक अन्य नेचर फोटोग्राफर मार्क रिबॉड नेचर फोटोग्राफी के बारे में बहुत सटीक बात कही है कि ‘‘फोटोग्राफी ़वन को तीव्रता से देखने का एक तरीका है, हर सौवें सेकंड में।’’
अपनी इस फोटोग्राफी की पुस्तक ‘‘निसर्ग गाथा’’ की छायाचित्रों को संध्या सर्वटे जी ने विषयवार सात भागों में विभक्त किया है- पहला भाग है ‘भोर’ जिसमें विहंग का कलरव और मंदिर में आरती के सुंदर दृश्य हैं। दूसरा भाग है ‘प्रभात’ (रविराज आगमन) जिसमें प्रभात की सुंदर छटाएं हैं। तीसरे भाग ‘बगिया की बहार’ में रंग-बिरंगे फूलों से सहित सुंदर-सुंदर दृश्य हैं। चतुर्थ भाग ‘मध्यान्ह-नभ’ अपनी एक अलग प्राकृतिक सौंदर्य गाथा सुनता है।
पंचम भाग ‘दर्शनीय स्थल’ में उन प्राकृतिक स्थलों के दृश्य हैं जिन्हें देखकर ही मन प्रफुल्लित हो उठेगा। छठां भाग ‘सूर्यास्त’ का समय घर लौटते परिंदों का समय होता है। सातवां अंतिम भाग दिन के हर पहर को पढ़ता हुआ उसे परिवर्तन कल की ओर बढ़ता है जिसमें संध्या, निशा, चंद्रमा के साथ एक दिवस का पटाक्षेप हो जाता है।
संध्या सर्वटे द्वारा खींचे गए सभी छायाचित्र कैमरे के लेंस से लिखी गई कविताओं के समान भावपूर्ण, रोचक और नयनाभिराम हैं। यूं तो संध्या सर्वटे अपने छायाचित्रों की कई प्रदर्शनियां लगा चुकी हैं बल्कि सच तो ये है कि फोटोग्राफी कैमरे से किसी दृश्य को कैप्चर करना मात्र नहीं होता है।
आमतौर पर यही माना जाता है कि फोटोग्राफी आज कोई बड़ी बात नहीं रह गई, जब से हर हाथ में एंडरॉयड मोबाईल फोन आ गया है, लेकिन सच तो ये है कि फोटोग्राफी कैमरे से किसी दृश्य को कैप्चर करना मात्र नहीं होता है। इसके पीछे एक विशेष दृष्टिकोण होना जरूरी है। जिसे अकसर हम अंग्रेजी शब्द ‘विजन’ के रूप में स्वीकार करते हैं। सागर के फोटोग्राफी के इतिहास में कुछ पुरुष और महिला फोटोग्राफर्स के नाम आते हैं लेकिन पहली महिला फोटोग्राफर के रूप में संध्या सर्वटे के छाया चित्रों की एकल प्रदर्शनी हुई थी जिसने सागर शहर में कला प्रदर्शन का एक नया द्वार खोल दिया था। अब यह पुस्तक उन दर्शकों तक उनके छायाचित्रों को पहुंच सकेंगे जो उनकी प्रदर्शनियों को देखने नहीं पहुंच पाते हैं। यह पुस्तक उन लोगों के लिए भी प्रेरणा स्रोत है जो मोबाइल फोटोग्राफी का शौक तो रखते हैं लेकिन अपने द्वारा खींची गई तस्वीरों को मात्र सोशल मीडिया तक सीमित रखते हैं। जबकि प्रिंट एक स्थाई माध्यम है अतः वे लोग भी अपने चित्रों को पुस्तक के रूप में संग्रहीत कर के स्थायित्व प्रदान कर सकते हैं।                  
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