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My Editorials - Dr Sharad Singh

Wednesday, February 24, 2021

चर्चा प्लस | स्त्री-विरोधी होता समय बनाम बलात्कार की बढ़ती दर | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
स्त्री-विरोधी होता समय बनाम बलात्कार की बढ़ती दर
  - डाॅ शरद सिंह
   यदि किसी युवती को बलात्कारी से अपनी जान बचाने के लिए यह कहते हुए गिड़गिड़ाना पड़े कि ‘‘मेरे साथ रेप कर लो लेकिन मुझे पत्थरों से मत मारो!’’ यह स्त्री की असहाय स्थिति और अपराधी की दबंगई की सारी पराकाष्ठा पार हो जाती है और समाज, समय और कानून तब स्त्री-विरोधी कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं। दरअसल, स्त्री-सुरक्षा के कड़े कानून लागू किए जाने के साथ ही राजनीतिक दलों, सरकारों और पुलिस में उसे लागू करने की प्रबल इच्छाशक्ति का होना भी जरूरी है। वरना समय स्त्री-विरोधी ही रहेगा।
         
दरिंदे  घूमते  हैं  टोह  लेते  भेड़ियों से
भला कैसे हों अब आबाद घर की बेटियां
बना वहशी किसी नन्ही परी को देखकर
उसे आई नहीं क्या याद घर की बेटियां

मेरी अपनी ग़ज़ल की यह पंक्तियां मुझसे पूछती हैं कि अब तक हालात क्यों नहीं बदले? जी हां, एक नन्हीं बच्ची से किए गए बलात्कार की जघन्य घटना से विचलित हो कर 20 अप्रैल 2013 को अपने ब्लाॅग पर मैंने यह कविता लिखी थी। जिसे सागर शहर में ही एक स्कूली चपरासी द्वारा नर्सरी की छात्रा से गंदी हरकत करने की घटना पर ‘‘दैनिक भास्कर’’ ने 07 दिसम्बर 2018 को प्रकाशित किया था। यानी लगभग पांच साल बाद भी हालात वही थे। वहीं, आज लगभग प्रतिदिन अख़बारों के पन्ने बलात्कार की नृशंस घटनाओं से भरे रहते हैं। मेरे इन दो शेरों को पंजाबी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार अशोक वशिष्ठ ने अपने नवीनतम पंजाबी उपन्यास ‘‘तंदां’’ में उद्धृत किया है। जो भी व्यक्ति संवेदनशील है वह बलात्कार की बढ़ती दर से विचलित है। बलात्कार के साथ नृशंसतापूर्वक हत्या की विकृत मानसिकता भी तेजी से बढ़ती जा रही है जो चींख-चींख कर आज के समय को स्त्री-विरोधी समय ठहराती है।
             यदि किसी युवती को बलात्कारी से अपनी जान बचाने के लिए यह कहते हुए गिड़गिड़ाना पड़े कि ‘‘मेरे साथ रेप कर लो लेकिन मुझे पत्थरों से मत मारो!’’ यह स्त्री की असहाय स्थिति और अपराधी की दबंगई की सारी पराकाष्ठा पार हो जाती हैं। भोपाल के कोलार इलाके में 16 जनवरी 2021 को यह पराकाष्ठा भी पार हो गई। पीड़िता की शिकायत के अनुसार 16 जनवरी की शाम को जब वह कोलार पुलिस थाना इलाके में अपने घर के पास टहल रही थी तभी एक व्यक्ति ने उस पर हमला किया और उसे खींच कर झाड़ियों में ले गया। शिकायत के अनुसार आरोपी ने उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश की और उसे जमीन पर पटक दिया, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट आई। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा कि विरोध करने पर आरोपी ने उसके सिर पर पत्थरों से हमला भी किया तब उसने जान बचाने के लिए बलात्कारी से दया की भीख मांगते हुए जान बख़्शने के बदले बलात्कार कर लेने की गुहार लगाई। अंततः उसकी मदद की पुकार सुन कर एक दंपति उसे बचाने पहुंच गया और उस युवती की जान बच गई।    
               दुर्भाग्य से हालात बदल ही नहीं रहे हैं। जब मैं अपने ‘‘चर्चा प्लस’’ काॅलम की फाईल उठा कर देखती हूं तो मुझे 12 जुलाई 2017 का अपना लेख याद दिलाता है कि तत्कालीन हालात जब मैंने ‘‘चर्चा प्लस’’ में लिखा था कि -‘‘आए दिन समाचारपत्र भरे रहते हैं बेटियों के प्रताड़ित होने के समाचारों से। कभी हत्या तो कभी बलात्कार तो कभी किसी अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न। उस पर बैलों के स्थान पर जुती हुई दो बेटियों की अखबारों में छपी तस्वीर ने सोचने पर विवश कर दिया है कि प्रत्येक समुदाय में धर्मध्वजा उठाए रखने वाली और संस्कृति को प्रवाहमान बनाए रखने वाली बेटियां कब तक असुरक्षित रहेंगी? आज के सामाजिक एवं सुरक्षा संबंधी समुद्र मंथन में बेटियों का शोषण रूपी विष बढ़ता जा रहा है और मानो शिव का कण्ठ उसे धारण करने के लिए छोटा पड़ता जा रहा है। क्या हम शिव के तांडव की प्रतीक्षा कर रहे हैं?’’
               हम बलात्कार के आंकड़ों का विषपान किए जा रहे हैं लेकिन वारदातें हैं कि थमने का नाम नहीं ले रही हैं। देश में महिलाओं को अपराधों और अपराधियों से बचाने के लिए यूं तो ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं, लेकिन अपराध के आंकड़े शर्म से सिर झुका लेने को विवश करते हैं। आज देश में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि बलात्कार की घटनाओं पर कैसे अंकुश लगाया जाए? महिलाओं को यौन अपराध से कैसे सुरक्षित किया जाए? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार भारत महिलाओं के लिए अब भी सुरक्षित नहीं हो पाया है। सन् 2012 में नई दिल्ली में चलती बस में पैरामेडिकल की छात्रा से जघन्य बलात्कार और हत्या के ‘‘निर्भया कांड’’ के बाद देश में यौन हिंसा के मामले को लेकर सख्त कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए लेकिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा अब भी बेरोकटोक जारी है। एनसीआरबी के मुताबिक 2018 महिलाओं ने करीब 33,356 बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट की। एक साल पहले 2017 में बलात्कार के 32,559 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2016 में यह संख्या 38,947 थी।  एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में हर साल बढ़ोतरी हो रही है। राज्यों की बात करें तो सन् 2018 में बलात्कार के मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 5,433 मामले दर्ज हुए, दूसरे स्थान पर राजस्थान 4,335 तथा तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश 3,946 था।
                 दिल्ली के निर्भया कांड के बाद कानूनों में सुधार के बावजूद रेप की बढ़ती घटनाओं ने सरकार और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आखिर महिलाओं के खिलाफ जघन्य मामलों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? बलात्कार के सरकारी आंकड़े भयावह है। एनसीआरबी के आंकड़ों में बताते हैं कि वर्ष 2019 के दौरान रोजाना औसतन 88 महिलाओं के साथ रेप की घटनाएं हुईं। यहां ध्यान रखना होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक कारणों एवं भय के कारण बलात्कार की हर घटना थाने में दर्ज़ नहीं हो पाती है। जिसका आशय है कि वास्तविक आंकड़े इससे और अधिक हो सकते हैं। यूं भी देश में बलात्कार को महिलाओं के लिए शर्म का मामला माना जाता है और इसकी शिकार महिला को कलंकित जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता है। बलात्कारी इसी मानसिक व सामाजिक सोच का फायदा उठाते हैं। कई मामलों में रेप का वीडियो वायरल करने की धमकी देकर भी पीड़िताओं का मुंह बंद रखा जाता है।
               बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कई कड़े कानून बनाए गए हैं लेकिन जैसाकि आए दिन होने वाली जघन्य घटनाओं से जाहिर होता है कि बलात्कारियों को किसी कानून का ख़ौफ़ नहीं है। किसी जुनूनी हैवान की तरह वे अपराध को अंजाम दे डालते हैं। बलात्कार की निरंतर बढ़ती हुई आपराधिक प्रवृत्ति का कारण सभी अपने-अपने स्तर पर ढूंढते दिखाई देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने हाथरस गैंग रेप घटना की कड़ी निंदा करते हुए बेरोजगारी को इसकी वजह करार दिया था। काटजू ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा था कि ‘‘यौनसंबंध पुरुष की सामान्य इच्छा है। लेकिन भारत जैसे परंपरावादी समाज में शादी के बाद ही कोई यौनसंबंध बना सकता है। दूसरी ओर, बेरोजगारी बढ़ने की वजह से बड़ी तादाद में युवा सही उम्र में शादी नहीं कर सकते। तो क्या रेप की घटनाएं बढ़ेंगी नहीं?’’ पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू का यह तर्क आसानी से गले उतरने वाला नहीं था। बेरोजगारी एक कारण हो सकती है लेकिन मुख्य कारण नहीं। विकृत आपराधिक मानसिकता ही इस तरह के अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराई जा सकती है और इस विकृति के बढ़ने के बुनियादी तौर पर दो कारण दिखाई देते हैं- एक तो बढ़ती हुई नशे की आदत और दूसरी इंटरनेट पर मानसिक विकृत पैदा करने वाली सामग्रियों की सहज उपलब्धता।
                 बलात्कार के साथ जो सबसे खतरनाक और विकृत ट्रेंड जुड़ता जा रहा है वह है बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या किया जाना। एक तो बलात्कार का अपराध ही हमारी सामाजिक व्यवस्था में किसी भी स्त्री, युवती या बच्ची के सामान्य जीवन के अधिकार छीन लेता है, उस पर जीने का अधिकार छीन लिया जाना, वह भी प्रताड़ित कर के, विकृति की घातक स्थिति को दर्शाता है।
             हमारे देश में बलात्कार गैर-जमानती अपराध है। लेकिन एक सर्वे के अनुसार ज्यादातर मामलों में सबूतों के अभाव में अपराधियों को जमानत मिल जाती है। ऐसे अपराधियों को राजनेताओं, पुलिस का संरक्षण भी मिला रहता है। न्यायाधीशों की कमी के चलते मामले सुनवाई तक पहुंच ही नहीं पाते। ज्यादातर मामलों में सबूतों के अभाव में अपराधी बहुत आसानी से छूट जाते हैं। इसके अलावा आज भी ऐसे अपराधों के बाद पीड़िता की तरफ उंगली उठती हैं, इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। दरअसल कड़े कानून लागू किए जाने के साथ ही राजनीतिक दलों, सरकारों और पुलिस में उसे लागू करने की प्रबल इच्छाशक्ति का होना भी जरूरी है। इसके साथ ही सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है यानी बलात्कारी का सामजिक बहिष्कार भी जरूरी है। जब तक बलात्कारी मानसिकता वाले व्यक्ति के मन में कानून और समाज को ले कर भय नहीं होगा तब तक हाथरस से ले कर सीधी तक और कठुआ से ले कर शहडोल तक समय स्त्री-विरोधी ही रहेगा।
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(दैनिक सागर दिनकर 24.02.2021 को प्रकाशित)
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1 comment:

  1. आपके विचारों से सहमत हूं शरद जी । लेकिन इस समस्या के विस्तार में कुछ और बातें भी हैं जिन पर गौर किया जाना ज़रूरी है (अगर हम वाक़ई इसे हल करना चाहते हैं और केवल हंगामा खड़ा करना हमारा मक़सद नहीं है) । मैंने अपने लेख 'दर्द सबका एक-सा' में समस्या के उस अनकहे पहलू पर रोशनी डालने की कोशिश की है जो हमारे ही पाखंडी चेहरे के लिए
    आईना है ।

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