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My Editorials - Dr Sharad Singh

Wednesday, April 2, 2025

चर्चा प्लस | पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस (सागर दिनकर में प्रकाशित)
    पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का
       - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह  
         नवरात्रि देवी स्तुति के रूप में स्त्री शक्ति के जागरण का त्योहार है। नवरात्रि के दौरान इस बात का स्मरण किया जाता है कि जिस प्रकार देवी दुर्गा ने असुरों का वध किया और जगत के पालन के लिए विविध रूपों में प्रकट हुईं, ठीक उसी प्रकार स्त्री को भी अपनी शक्ति एवं दायित्वों को पहचानना, परखा और अमल में लाना चाहिए। यदि स्त्री स्वयं को शक्ति स्वरूपा मान कर आत्मबल से काम ले तो वह कभी अबला हो ही नहीं सकती है। यही संदेश निहित है इस पूरे नौदिवसीय त्योहार में। इसीलिए कहा गया है- ‘‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!’’    
       जब व्यक्ति दुख से ग्रस्त होता है तो उसे आत्मबल की आवश्यकता होती है और जब प्रत्यक्ष आत्मबल नहीं मिल पाता है तो अप्रत्यक्ष अर्थात दैवीय शक्ति के प्रति उसकी आस्था उसे आत्मबल प्रदान करती है। व्यक्ति यही सोचता है कि उसकी सहायता कोई करे या न करे, पर ईश्वर उसकी मदद करेगा। यही विचार उसे आत्मबल से भर देता है। इसके बाद निराशा से उबरा हुआ व्यक्ति अपने लिए सुगमता से सही मार्ग ढूंढ लेता है। स्त्रियां स्वयं को अबला, असहाय, अशक्त मान कर स्वयं को तुच्छ प्राणी न समझती रहें, इसीलिए नवरात्रि का त्योहार उन्हें विशेष आत्मबल प्रदान करता है। एक स्त्री भी शक्ति स्वरूपा हो सकती है यदि वह असुरों का डट कर मुकाबला करे और उनका दमन करने की ठान ले। वर्तमान समाज में असुर आचरण करने वाले वे सभी हैं जो स्त्रियों का मा सम्मान नहीं करते हैं तथा उन्हें मात्र उपभोग की वस्तु समझते हैं। किन्तु इसके लिए आवश्यकता है देवी दुर्गा के स्वरूपों को समझने की। 

चैत्र नवरात्रि हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। ये नौ दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना के लिए समर्पित हैं। यह चैत्र मास में मनाया जाता है। वैसे दो नवरात्रियों का सर्वाधिक महत्व है- शारदीय नवरात्रि तथा चैत्र नवरात्रि। अन्यथा, वर्ष में अन्य नवरात्रियों भी मनाई जाती हैं। तिथियों के अनुरूप वर्ष में पांच नवरात्रि होती हैं- शरदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, आषाढ़ नवरात्रि, पौष नवरात्रि और माघ नवरात्रि। इनमें से प्रत्येक नवरात्रि का अपना विशिष्ट महत्त्व है।
नवरात्रि में देवी दुर्गा के अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। लेकिन इन नवरात्रि के पीछे की एक पौराणिक कथा भी है। दरअसल पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीनकाल में महिषासुर नाम का एक दानव हुआ करता था। उसने कठोर तपस्या से ब्रम्हा जी को प्रसन्न कर लिया। ब्रम्हा ने प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा। तब महिषासुर ने भगवान ब्रम्हा से अमर होने का वरदान मांगा। ब्रम्हा ने कहा कि अमर होने का वरदान नहीं दिया जा सकता। तब उसने ब्रम्हा से यह वरदान मांगा कि कोई पुरुष या देव अथवा दानव  उसे न मार सके। ब्रम्हा ने उसे वरदान दे दिया कि तीनों लोकों में कोई पुरुष, देव अथवा दानव उसे नहीं मार सकता है। यह वरदान पाने के बाद महिषासुर निद्र्वन्द्व हो गया। उसके अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ने लगे। उसे यह विश्वास हो चला था कि ब्रम्हा के वरदान के बाद अब वह अमर हो चला है। अब उसे कोई नहीं मार सकता है। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अपनी सत्ता स्थापित करने की योजना बनाई और देवलोक पर आक्रमण कर दिया। इस बात से घबराकर सभी देवता ब्रम्हा, विष्णु और महेश की शरण में गए। किन्तु त्रिदेव भी ब्रह्मा द्वारा दिए गए वरदान के समक्ष वे विवश थे। तब त्रिदेवों ने देवी दुर्गा से प्रार्थना की कि वे अपनी शक्ति का प्रयोग करें और महिषासुर का वध कर के ऋषियों एवं देवताओं की रक्षा करें। तब देवी दुर्गा आदिशक्ति के रूप में प्रकट हुई। नौ दिनों तक महिषासुर दानव और देवी दुर्गा के बीच में घमासान युद्ध चला। दसवें दिन मां दुर्गा ने दुष्ट दानव महिषासुर का अंत कर दिया। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। 

   इस त्यौहार की समाप्ति नौवें दिन होती है, ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम का जन्म हुआ था। अतः श्रीरामनवमी भी मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि के साथ ही हिन्दू नववर्ष का आरम्भ भी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि ग्राष्मकाल के आगमन का प्रतीक है। ऋतु परिवर्तन के साथ ही फसल के चक्र में भी परिवर्तन होता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। माता के भक्त सभी नौ दिनों ओर व्रत आदि रखते हैं। ये नौ दिन घरों में व्रत पूजा को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। नवरात्रि में साबूदाना खिचड़ी, कूटू के आटे की पूरी और सिंघाड़े की पूरी आदि बनाई जाती हैं।
प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग रूप की पूजा की जाती है। पहला दिन शैलपुत्री को समर्पित है, दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी को, तीसरा दिन चंद्रघंटा को, चैथा दिन कुष्मांडा को, पांचवां दिन स्कंदमाता को, छठा दिन कात्यायनी को, सातवां दिन कालरात्रि को, आठवां दिन महागौरी को और नौवां दिन सिद्धिदात्री को।

1. शैलपुत्री - देवी दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री या शैलजा के नाम से जाना जाता है। शैल का अर्थ है पर्वत और यह रूप पर्वत की पुत्री या देवी पार्वती को संदर्भित करता है जो राजा हिमवत अर्थात हिमालय पर्वत की पुत्री थीं। देवी पार्वती को देवी सती का पुनर्जन्म माना जाता है और उन्हें दो हाथों और माथे पर अर्धचंद्र के साथ एक स्त्री रूप में दर्शाया जाता है। वे अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं। उन्हें अपने वाहन या नंदी बैल की सवारी के साथ दर्शाया जाता है।
2. ब्रह्मचारिणी - ब्रह्मचारिणी या देवी दुर्गा के महिला तपस्वी रूप की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। उन्हें एक ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में दर्शाया जाता है जो अपने दाहिने हाथ में सूखे रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं।
3. चंद्रघंटा - तीसरे दिन पूजा जाने वाली दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा है। उनके माथे पर घंटी के आकार का एक अर्धचंद्र है जिसके कारण उनका नाम चंद्रघंटा भी पड़ा। देवी को उनकी तीसरी आंख खुली हुई अवस्था में दिखाई जाती हैं और वे सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार रहती हैं। उन्हें रणचंडी के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस योद्धा रूप में उनके 10 हाथ होते हैं जिनमें से दो में त्रिशूल, गदा, धनुष और बाण, खड्ग, कमल, घंटा और कमंडल हैं, उनका एक हाथ हमेशा आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा में रहता है जो भय को दूर करता है। 
4. कुष्मांडा - नवरात्रि के चैथे दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का चैथा रूप कुष्मांडा है। कुष्मांडा नाम को कु, ऊष्मा और अंड में विभाजित किया जा सकता है, जहां ‘‘कु’’ का अर्थ है थोड़ा, ऊष्मा का अर्थ है गर्मी या ऊर्जा और अंड का अर्थ है ब्रह्मांड। देवी दुर्गा के इस रूप को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें आदि शक्ति के नाम से भी जाना जाता है जिन्हें ब्रह्मांड के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। वे अपने वाहन के रूप में सिंह पर सवार दिखाई देती हैं।
5. स्कंदमाता - स्कंदमाता देवी दुर्गा का पांचवां रूप है और नवरात्रि के पांचवें दिन इनकी पूजा की जाती है, देवी के इस रूप को कार्तिकेय को गोद में लिए हुए एक मातृ देवी के रूप में दर्शाया गया है। उल्लेखनीय है कि कार्तिकेय को स्कंद के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं, तीन आँखों और शेर पर सवार एक महिला देवता के रूप में दर्शाया जाता है। देवी की चार भुजाओं में से दो में कमल है जबकि अन्य दो में से एक में कार्तिकेय और दूसरे हाथ में आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा है। 
6. कात्यायनी - कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है और नवरात्रि के छठे दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें देवी महादेवी या दुर्गा के योद्धा रूप के रूप में दर्शाया जाता है। दुर्गा के अन्य दो उग्र रूप भद्रकाली और चंडिका हैं। देवी दुर्गा के इस रूप को अठारह भुजाओं और देवताओं द्वारा उपहार में दिए गए विभिन्न हथियारों के साथ शेर पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उन्हें ऋषि कात्यायन के नाम पर कात्यायनी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने देवी दुर्गा की तपस्या की और उन्हें वरदान के रूप में अपनी बेटी के रूप में जन्म लेने के लिए कहा। अर्थात ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायिनी।
7. कालरात्रि - कालरात्रि सातवां रूप हैं। नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह देवी दुर्गा के सबसे रौद्र रूपों में से एक हैं। वे अंधकार और अज्ञान का नाश करने वाली हैं और उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है, उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो आशीर्वाद और सुरक्षा की मुद्रा में हैं जबकि अन्य दो में तलवार और वज्र रहता है। उन्हें काली के नाम से भी जाना जाता है।
8. महागौरी - महागौरी देवी दुर्गा का आठवां रूप हैं और नवरात्रि के आठवें दिन इस रूप की पूजा की जाती है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जिनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू रहता है। अन्य दो भुजाएँ आशीर्वाद और भय को दूर करने के लिए होते हैं जिन्हें क्रमशः वरद और अभय मुद्रा के रूप में भी जाना जाता है। वे एक बैल या सफेद हाथी पर सवार होती हैं।
9. सिद्धिदात्रि - देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप सिद्धिदात्रि है और नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें सभी सिद्धियों की प्रदाता माना जाता है। देवी के इस रूप को कमल पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने चार हाथों में कमल, शंख, गदा और चक्र धारण किए हुए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे महाशक्ति या सर्वोच्च देवी का अवतार हैं, जिन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया और शिव ने देवी सिद्धिदात्रि की पूजा करके सभी सिद्धियाँ प्राप्त कीं थीं।

  इस प्रकार देवी के नौ रूपों में मौजूद नौ शक्तियों के स्मरण कात्योहार नवरात्रि। देवी दुर्गा की प्रतिमा में चार अथवा आठ या फिर इससे भी अधिक हाथ बनाए जाते हैं। इन सभी हाथों में विविध आयुध होते हैं। यह मां दुर्गा का शक्तिपुंज स्वरूप होता है। इसकी यदि आज के आधुनिक प्रसंग के रूप में व्याख्या की जाए तो दुर्गा के इस श्ीक्ति पुंज रूप का अरशय है कि बुराई के विरुद्ध विभिन्न स्त्रियों एकजुट हो कर शंखनाद करें और बुराई के शमन का प्रयास करें तो वे अपनी शक्तियों से किसी भी अपराधी को पराजित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, एक स्त्री सड़क पर जा रही है। कोई उद्दण्ड व्यक्ति उसका दुपट्टा या साड़ी का पल्लू खींचता है तो उस स्त्री को डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे जोर से चिल्लाना चाहिए। उसकी पुकार को सुन कर अन्य स्त्रियों को उसकी मदद के लिए आगे बढ़ना चाहिए और फिर सब मिल कर उस मनचले को सबक सिखा दें तो फिर कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकेगा। लेकिन एक दृश्य यदाकदा ही दिखता है कि जब महिलाएं अपनी शक्ति को पहचान कर, एक जुट हो कर अपने विरुद्ध उठाए गए हर कदम का विरोध करती हों। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौरूपों का स्मरण करने मात्र से संकट दूर होने की आकांक्षा रखने की बजाए उन नौ रूपों से सीख ले कर अपना आत्मबल बढ़ाना ही इस त्योहार की सार्थकता है।  इस त्योहार को यदि आडंबर की दृष्टि से न देख कर इन शक्तियों को सहज भाव से आत्मसात करने की दृष्टि से देखा जाए तो अनुभव होगा कि ये शक्तियों मनुष्य के भीतर आत्मबल के रूप में उपस्थित रहती हैं। इसी सत्य का स्मरण कराता है यह त्योहार।  
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