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Thursday, January 15, 2026

चर्चा प्लस | दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस | दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 

चर्चा प्लस

दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         मकर संक्रांति तिल-गुड़, स्नान और पतंग का त्यौहार है। यूं तो सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है और सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश के संक्रांतिकाल को मकर संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह मात्र धार्मिक पर्व नहीं वरन् एक सामाजिक पर्व है और इसमें निहित है संदेश दो पीढ़ियों के बीच निकटता लाने का। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथा भी मौजूद है जिसे जानना और समझना जरूरी है।

        सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। वर्ष को दो भागों में बांटा गया है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर बढ़ता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं। सूर्य है तो जीवन है। इसीलिए, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना वैदिक ज्योतिष के अनुसार काफी महत्वपूर्ण घटना है। सूर्यदेव जिस दिन धनु से मकर राशि में पहुंचते हैं उसे मकर संक्रांति का दिन कहते हैं। सूर्य के मकर राशि में आते ही मलमास समाप्त हो जाता है। इसी दिन से ही देवताओं का दिन शुरू होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है।  दक्षियायन देवताओं के लिए रात्रि का समय होता है। ठीक इसी समय से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन से सूर्यदेव उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर देते हैं। इस दिशा परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं।
       मकर संक्रांति समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है। मकर संक्रांति को गुजरात में उत्तरायण, पंजाब में लोहड़ी पर्व, गढ़वाल में खिचड़ी संक्रांति और केरल में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। वहीं सिंधी लोग इस त्योहार को तिरमौरी कहते हैं। इस अवसर पर गुजरात समेत कई राज्यों में पतंगें भी उड़ाई जाती है। इस समय से दिन बड़े और रात छोटी होने के साथ ही मौसम ठंडी से गर्मी की तरफ बढ़ने लगता है। मकर संक्रांति की विभिन्न परंपराओं में स्नान, दान का विशेष महत्व है, किन्तु इसके अलावा इसदिन पारंपरिक खिचड़ी और तिल के उपयोग से पकवान बनाने की भी मान्यता है। देश के हर कोने में अलग अलग तरीके से खिचड़ी और तिल के व्यंजन पकाए जाते हैं। इन्हें मकर संक्रांति के दिन बनाया जाता है और भगवान को भोग लगाने के बाद अगले दिन सूर्य उदय के पश्चात ही ग्रहण किया जाता है।                                                   
      किन्तु मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी क्यों बनाई जाती है? इसदिन तिल के प्रयोग से तरह तरह के पकवान क्यों तैयार किए जाते हैं? इसके पीछे का कारण क्या है? आइए इनके पीछे छिपी पौराणिक कहानियों के बारे में जानते हैं।
कथा एक - श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण में दर्ज एक कथा के अनुसार शनि देव का हमेशा से ही अपने पिता सूर्य देव से वैर था। एक दिन सूर्य देव ने शनि और उसकी माता छाया को अपनी पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद भाव करते हुए देख लिया। इससे नाराज होकर उन्होंने अपने जीवन से छाया और शनि को निकालने का कठोर फैसला लिया। इससे नाराज होकर शनि और छाया ने सूर्य को कुष्ठ रोग हो जाने का शाप दिया और वहां से चले गए। पिता को कुष्ठ रोग से परेशान होते देख यमराज ने तपस्या की। आखिरकार सूर्य देव कुष्ठ रोग से मुक्त हुए। किन्तु उनके मन में अभी भी शनी देव को लेकर क्रोध था। क्रोधित अवस्था में ही वे शनि देव के घर (कुंभ राशि में) गए और उसे जलाकर काला कर दिया। इसके बाद शनि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ा।
    अपनी सौतेली मां और शनिदेव को दुख में देखकर यमराज ने उनकी मदद की। सूर्य देव को दोबारा उनसे मिलने भेजा। इस बार जब सूर्य देव वहां पहुंचे तो शनि देव ने काले तिल से उनकी पूजा की। चूंकि घर में सब कुछ जल चुका था, इसलिए शनि देव के पास केवल तिल ही थे। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनिदेव को वरदान दिया और कहा कि तुम्हारे दूसरे घर ‘मकर’ में आने पर तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। इसी कारण से मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की तिल से पूजा की जाती है और अगले दिन तिल का सेवन किया जाता है।
कथा दो - एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की इतनी कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ में पल रहे शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रुक गई। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी और शिव ने उनको उनकी गलती का अहसास कराया। सूर्यदेव ने अपनी गलती के लिये क्षमा याचना की जिसके बाद उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला।
तीसरी कथा - यह कथा प्रायः कथावाचकों द्वारा सुनाई जाती है। एक समय जब पृथ्वीलोक पर बब्रुवाहन नामक एक राजा हुआ करता था। उसके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं थी। इसी राज्य में एक हरिदास नामक ब्राह्मण भी निवास करता था। जिसका विवाह गुणवती से हुआ था जो कि बहुत ही धर्मवती एवं पतिव्रता महिला थी। गुणवती ने अपना पूरा जीवन सभी देवी देवताओं की उपासना में लगा दिया और वह सभी प्रकार के व्रत करती थी और दान धर्म भी किया करती थी। इसके अलावा अतिथि सेवा को वह अपना धर्म मानती थी। ऐसे ही ईश्वर की उपासना करते हुए वह वृद्ध हो गयी। जब उसकी मृत्यु हुई तो धर्मराज के दूत उसे अपने साथ धर्मराजपुर ले गए। यमलोक में एक सुन्दर सिंहासन पर यम धर्मराज विराजमान थे और उनके पास ही चित्रगुप्त भी बैठे थे। चित्रगुप्त जब धर्मराज को प्राणियों का लेखा जोखा सुना रहे थे तभी यमदूत गुणवती को लेकर पहुंचे। गुणवती ने यमराज से पूछा कि प्रभु मुझसे क्या भूल हुई है? धर्मराज ने कहा कि हे गुणवती, तुमने सभी देवी-देवताओं के व्रत किए हैं, उपासना की है लेकिन कभी भी तुमने मेरे नाम से कुछ पूजा या पाठ या दान नहीं किया। तुमसे ही तो तुम्हारी संताने यह सब सीखेंगी अतः इन अच्छे संस्कारों स्वयं भी पालना था तथा अपने बच्चों को भी सिखाना था।
       धर्मराज ने बताया कि जिस दिन सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश करते हैं यानि मकर संक्रांति के दिन मेरी पूजा शुरू करनी चाहिए साथ ही मेरी पूजा करने वाले व्यक्ति को धर्म के इन दस नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए- धैर्य रखना, अपने मन को वश में रखना और सभी को क्षमा करना, किसी प्रकार का दुष्कर्म नहीं करना, मानसिक और शारीरिक शुद्धि का ध्यान रखना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, बुरे विचारों को अपने मन में न लाना, पूजा, पाठ और दान पुण्य करना, व्रत करना और व्रत की कहानी सुनना, सच बोलना और सभी से अच्छा व सच्चा व्यवहार करना, क्रोध न करना। इसके बाद मेरी एक मूर्ति बनाकर विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा करवाकर हवन पूजन करें और साथ ही चित्रगुप्त की भी पूजा करें। और काले तिल के लड्डू का भोग लगाना। मकर संक्रांति आते ही गुणवती और उसके पति ने ये व्रत शुरू कर दिया। इसी व्रत के प्रभाव से उनपर धर्मराज की कृपा हुई और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। गुणवती की संतानों ने भी उसका अनुकरण किया।
      चौथी कथा - इस कथा का एक रूप और कथावाचकों द्वारा सुनाया जाता है जिसमें पुत्रों द्वारा माता गुणवती एवं पिता की अवहेलना का प्रकरण है। इस कथा के अनुसार अपने पांच पुत्रों द्वारा घर से निकाल दिए जाने के बाद गुणवती और उसके पति ने व्यथित हो कर अपनी इहलीला समाप्त करने का कदम उठाया। दोनों ने पहाड़ की चोटी से खाई में गिर कर अपने प्राण दे दिए। यमदूत उनके प्राणों को अर्थात आत्मा को यमराज के पास ले कर पहुंचे। यमराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इन दोनों के कर्मों का लेखाजोखा बताओ। तब चित्रगुप्त ने अपना बहीखाता देखा और कहा कि इन्हें से अभी मरना ही नहीं चाहिए था। ये सदकर्मी हैं किन्तु अपने पुत्रों की अवहेलना और प्रताड़ना से त्रस्त हो कर आत्महत्या कर बैठे हैं। इस पर यमराज ने यमदूतों से कहा कि जाओ इन आत्माओं को इनके शरीर में वापस छोड़ आओ और बदले में इनके पांचों पुत्रों के प्राण ले आओ। यह सुन कर गुणवती और उसके पति की आत्मा त्राहि-त्राहि कर उठी। उन्होंने कहा कि ऐसा मत करिए। वे जैसे भी हैं हमारे पुत्र हैं। उनके बदले हमारे जीवित रहने का भी क्या अर्थ है? उन्हें जीने दीजिए। तब यमराज ने कहा कि ठीक है तुम दोनों के कहने पर मैं उन्हें छोड़ दूंगा लेकिन पहले उनको सबक सिखा दूं। फिर यमराज ने गुणवती के पांचों पुत्रों के प्राणों को अपने पास मंगा लिया। पांचों की आत्माएं यमराज के सामने रोने लगीं। उनसे कहने लगीं कि आप अभी हमें मत मारिए क्योंकि अभी हमारे बच्चे बहुत छोटे हैं, उन्हें हमारी जरूरत है। तब यमराज ने कहा कि एक शर्त पर मैं तुम पांचों के प्राण वापस कर सकता हूं यदि तुम लोग अपने माता-पिता को सम्मान के साथ अपने पास रखो। पांचों ने यमराज की शर्त मान ली और अपने माता-पिता की आत्माओं के साथ अपने-अपने शरीर में लौट गए। चूंकि तब तक प्राणहीन शरीर मैले हो चुके थे अतः उन्होंने अपने-अपने शरीरों को तिल का उबटन लगा कर साफ किया। फिर ताकत के लिए तिल और गुड़ का सेवन किया। इसके बाद गुणवती अपने पति और पांचों पुत्रों के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगी। चूंकि उसी दिन सूर्य उत्तरायण हुआ था अतः उसी दिन से तिल-गुड़ कि त्योहार की परंपरा पड़ गई।     
        ये कथाएं इस बात का संदेश देती हैं कि माता, पिता और पुत्र में भूल चाहे जिससे भी हुई हो, उन्हें परस्पर मिल कर, एक दूसरे से बातचीत कर के मसले को सुलझा लेना चाहिए। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मिल-बैठ कर परस्पर दुख-सुख जानने का चलन परिवारों से खत्म होता जा रहा है, जिसके लिए मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथाओं को जानना और समझना जरूरी है। बुंदेलखंड में तो यह मान्यता भी है कि मकर संक्रांति पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते है, तो उनके बीच के मतभेद दूर हो जाते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 15.01.2026 को प्रकाशित) 
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