Pages

My Editorials - Dr Sharad Singh

Tuesday, March 24, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
--------------------
काव्य संग्रह - बुंदेली बानी
कवयित्री - डॉ. कुंकुम गुप्ता
प्रकाशक-संदर्भ प्रकाशन,भोपाल
मूल्य -200/- 
---------------------
प्रत्येक बोली कि अपनी विशेषता और अपनी मिठास होती है। बुंदेली बोली भी इसी तरह से अपने क्षेत्रीय मिठास लिए हुए हैं जो सुनने और पढ़ने वाले के मन को सहज ही स्पर्श करती है। बोलियां जहां एक ओर संस्कृति की संवाहक होती हैं वही निज गौरव और आत्मीयता का भी बोध कराती हैं। डॉ कुंकुम गुप्ता ने बुंदेली बोली की मिठास को अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हुए बुंदेली संस्कृति को भी सहेजा है। उनके काव्य संग्रह का नाम है “बुंदेली बानी”। 
“बुंदेली बानी” में कुल 51 कविताएं हैं, जिनमें संस्कृतिस सामाजिकता, प्रकृति, राष्ट्रीयता तथा आध्यात्मिकता के साथ ही हास्य और प्रेम के संवेग भी समाहित हैं। हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं वर्तमान में प्राचार्य, पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर (म.प्र.) प्रो. सरोज गुप्ता ने संग्रह की प्रस्तावना लिखते हुए डॉ. कुंकुम गुप्ता की रचना धर्मिता के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया है। डॉ सरोज गुप्ता के शब्दों में- “डॉ कुंकुम गुप्ता साहित्य जगत में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं कविता, कहानी, निबन्ध, समीक्षा, संस्मरण, बाल साहित्य आदि में लेखनी चलाने के साथ नित नूतन प्रयोग करने की कला में दक्ष हैं। आपकी रचनाओं में बुन्देलखण्ड की माटी की सौंधी महक, सहजता, सरलता, उदारता, भावों में सम्प्रेषणीयता के साथ जन्मभूमि के प्रति समर्पण, बुन्देली और बुन्देली संस्कृति से जुड़ाव दृष्टव्य है। आप राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त परिवार में जन्मीं, बखरी में दद्दा जी, बापू जी के प्यार दुलार के साथ बचपन में अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों से सहज संपर्क से उनके साहित्यिक संस्कारों को आत्मसात करते हुए न सिर्फ अपनी रचनाधर्मिता को जीवन्त बनाये हुए हैं वरन् अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि कर रही हैं। डॉ. कुंकुम गुप्ता समाज की गतिविधियों, लोक व्यवहारों का यथार्थ पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती हैं।”
डॉ. कुंकुम गुप्ता सौभाग्यशाली हैं कि वे राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की वंशज हैं। साहित्य प्रेम उनकी धमनियों में प्रवाहित होना स्वाभाविक है। डाॅ कुंकुम गुप्ता लेखिका संघ मध्यप्रदेश की प्रांतीय अध्यक्ष हैं। वे अन्य महिला रचनाकारों को अपनी संस्था के अंतर्गत निरंतर प्रोत्साहित करती रहती हैं। अपनी रचनाशीलता के बारे में डॉ. कुंकुम गुप्ता ने “आत्मकथ्य” में लिखा है- “मेरा बचपन झाँसी जिले के चिरगाँव में बीता इसलिए बुंदेली परिवेश, पर्वों, लोकगीतों, परम्पराओं आदि से लगाव रहा है। भोपाल आकर जब साहित्यकारों से बुंदेली, निमाड़ी, मालवी आदि में कविताएँ सुनीं तो मेरे मन में भी यह जिज्ञासा जागृत हुई कि मैं भी बुंदेली में रचनाएँ लिखूँ। मध्यप्रदेश लेखक संघ की लोक भाषा गोष्ठी में भी कविता सुनाने का अवसर मिला तो कुछ आत्मविश्वास जागा और हिन्दी लेखिका संघ में भी बुंदेली में कविताओं को पढ़ा जिसको सराहना मिली इससे मेरा उत्साहवर्धन हुआ।”
बोलियों की यह विशेषता होती है कि हर दस कोस में बोली के कुछ शब्द बदल जाते हैं। जैसे बुंदेलखंड में पन्ना की तरफ बेटियों को “बिन्ना” कहा जाता है जबकि ललितपुर, झांसी के तरफ उन्हें “बिन्नू” कहकर पुकारा जाता है इसीलिए कुंकुम गुप्ता जी की प्रथम कविता का शीर्षक है “बिन्नू काए रिसानी”। इस कविता में कवयित्री ने बालिका शिक्षा सहित बालिका के अधिकारों की बात बहुत सहजता से उठाई है। बानगी देखिए-
बिन्नू काय रिसानी हमसें, 
बिन्नू काय रिसानी 
बैठीं हो काय मों लटकायें, 
भर आँखन में पानी।

रोज तो तुम गैया बछियन की 
साफ-सफाई करततीं
फिर कुअलन पै पानी भरवे
सखियन संग निकरततीं
आज कछु न कर रही बिन्नू 
अब लौं करी न सानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।

दादा भौत देख लई हमने 
बातें बड़ी तुम्हाई 
कहत कछु और करत कछु 
फिर पीछें देत सफाई
सबकी बिटियाँ आगें पढ़ रहीं 
तुमने बात न मानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।
     जब बिन्नू अर्थात बेटियों की बात चलेगी तो सखियों की चर्चा भी होना स्वाभाविक है। बेटियों का संसार अपनी सखियों के संग से ही आरम्भ होता है। ‘‘गुइयाँ’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए जिनमें सेहत की बातों के संग सखियों का विमर्श भी मौजूद है- 
ऐसी काय बैठी मोरी गुइयां
बैठी उदास औ लटकी मुंइयां
कछू न पूछौ हाल सखी री 
देर रात कैं खा लई घुइयाँ।
आज परहेज करौ थोड़ो सो 
लौकी बनाओ चाँय तुरइयाँ।
हरी सब्जिन को स्वाद न भावैं 
अबै उमर तो है लड़कैंया।
वादी की चीजें हमें भाउतीं 
सो गुस्सा होंय हमारे सइयाँ।
आज से सेहत कौ ख्याल करलो 
तन को दुख कोउ बाँटत नइया।
      वृद्धावस्था जीवन का एक शाश्वत सत्य है। किन्तु सामाजिक परिवर्तनों के कारण अनेक लोगों के लिए वृद्धावस्था कष्टप्रद साबित होने लगी है। इसका मूल कारण है कि युवा अपने बड़ों से विरत होने लगे हैं और वृद्धाश्रम पनपने लगे हैं। दूसरी ओर वे माता-पिता भी जो धनअर्जन करने की लिप्सा में पहले स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं फिर बच्चों को अपने से दूर भेज देते हैं उन्हें भी कवयित्री ने चेताया है। वस्तुतः डाॅ. कुंकुम गुप्ता की ‘‘बुढ़ापा’’ कविता हर व्यक्ति को जीवन के सत्य का स्मरण कराती है-
बुढ़ापौ सबको आने है 
एक दिना मर जाने है।
जानत तो है जौ सब कोऊ 
फिर भी सीना ताने है।
कैसेउ प्रीत लगा लो सबसें 
बाद में रोने गाने है।
साठ साल के बाद सबई कौ 
जानै कबै बुलउआ आने है।
ताले कुची लगा लो कित्ती 
बनाओ कितेक तहखाने है।
जिनसे छिपा के जोड़ी माया 
उनई खौं सब हथियाने है।
   संग्रह में एक बहुत ही ‘स्वादिष्ट’ कविता भी है क्योंकि इसमें बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का विवरण दिया गया है। कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
बुंदेली व्यंजन की कर लैवें बात 
स्वाद इनकौ सबखौं भौतई सुहात 
बैगन का भर्ता और मौन दई गकइयाँ 
सब मिल कैं खावें पड़ौसी और गुंड्याँ 
आम की चटनी स्वाद है बढ़ात।
चूरमा के लड्डू दाल बाटी को स्वाद 
शुद्ध घी की खुशबू और बढ़िया पुलाव 
ऊपर से मठा पियो जल्दी पचात ।
समूदी रोटी खौं देख जिया डोले 
बरा मगौरा पापड़ मिश्री सी घोलें 
खीचला कचरियां कालोनी में मिलात।
      यह विशेषता है बोलियों में सृजन की कि जब कोई रचनाकार अपनी बोली में रचना करता है तो वह अपनी परंपराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं माटी की सुगंध को उसमें पिरोना नहीं भूलता है। डाॅ कुंकुम गुप्ता ने भी अपनी बुंदेली कविताओं में समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाते हुए बुंदेली मिठास को भरपूर संजोया है। इस तरह के काव्य संग्रह बहुतायत आने चाहिए क्योंकि यही बुंदेलखंड की संस्कृति को भविष्य तक पहुंचाने में सहायक होंगे। डाॅ. कुंकुम गुप्ता का यह बुंदेली काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ इतनी सहज बुंदेली में है कि सुगमता से सभी को समझ में आ सकता है तथा हर क्षेत्र का पाठक इन कविताओं से जुड़ सकता है।      
 ---------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer 
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण  #DrMissSharadSingh

No comments:

Post a Comment