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My Editorials - Dr Sharad Singh

Tuesday, May 19, 2026

पुस्तक समीक्षा | नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - एक दीप और जलाना
कवि      - बद्रीलाल ‘दिव्य’
प्रकाशक - साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर
मूल्य - 200/- 
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आज मानव समाज के सामने सबसे बड़ा संकट है बाजारवाद का और बाजारवाद की मूल प्रवृत्ति होती है मनुष्य के भीतर भौतिक वस्तुओं को पाने की अदम्य में लालसा को जगा देना। जब मनुष्य ‘‘और-और-और’’ पाने की लालसा के शिकंजे में फंस जाता है तो फिर उसे गलत और सही में अंतर दिखाई देना बंद हो जाता है। फिर ठीक यहीं से भ्रष्टाचार का आरंभ होता है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति ने व्यवस्थाओं को दीमक की तरह धीरे-धीरे खोखला कर दिया है। यदि एक स्थान से भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास किया जाए तो दूसरे स्थान पर उसकी लकीरें दिखाई देने लगते हैं। आज लगभग हर व्यक्ति अपनी सीमाओं को भूलकर दूसरे के हिस्से का सब कुछ हड़प कर जाना चाहता है। देखा जाए तो यह एक निराशाजनक स्थिति है। घोर निराशा के अंधकार में हर संवेदनशील व्यक्ति आशा की किरण देखना चाहता है। साहित्य की किसी भी विद्या से जुड़ा व्यक्ति संवेदनाओं से सरोकार रखता है और जो संवेदनाओं से सरोकार रखता है वह सदा मानव हित, जनकल्याण और देश की प्रगति के बारे में चिंतन मनन करता है। इसीलिए कवि अटल बिहारी वाजपेई ने तत्कालीन व्यवस्थाओं को चुनौती देते हुए ये पंक्तियां कही थीं-
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, 
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, 
गीत नया गाता हूं।

विपरीत परिस्थितियों में नए गीत गाने का हौसला उस कवि में बखूबी पाया जाता है जो दूसरों की पीड़ा से द्रवित होता है और देश में खुशहाली लाने की प्रबल इच्छा रखता है। कोटा राजस्थान के कवि बद्रीलाल मेहरा ‘दिव्य’ इसी प्रकार के कवि हैं जो अंधकार में आशा का दीप जलाकर प्रकाश बिखरने की अभिलाषा रखते हैं। उनका काव्य संग्रह “एक दीप और जलाना” निराशा से उपजी आशावादी कविताओं का संग्रह है। कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ मूलत: राजस्थानी उपभाषा के कवि हैं। किंतु हिंदी में भी उनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 

“एक दीप और जलाना” काव्य संग्रह में कुल 41 कविताएं हैं। संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. (डॉ.) अनिता वर्मा ने लिखा है कि “कवि बद्री लाल ‘दिव्य’ ने अपनी अनुभूतियों के साथ जीवन के विविध रंग महसूस किए हैं, देखें है। उसकी चेतना का संसार अब व्यक्तिगत न होकर संसार का है। वह अपनी संवेदनाओं, दृष्टि की व्यापकता में सबको समाहित कर लेता है। यही सृजन की सार्थकता और सृजन का उद्देश्य है। प्रस्तुत कविताओं में जीवन के विविध रंग बिखरे पडे हुए हैं। जिनमें प्रेम, आत्ममंथन, द्वन्द्व, प्रकृति, पर्यावरण, आमजन, सभी को केन्द्र में रखकर कवि की चेतना का विस्तार विविध स्वरूपों व मनोभाव के साथ उद्घाटित हुआ है।”

   वहीं कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ ने अपने संग्रह की कविताओं के बारे में लिखा है कि ‘‘एक दीप और जलाना’’ मेरा आठवाँ काव्य संग्रह है। हम दीपावली पर लाखों दीप जलाते है लेकिन कभी-कभी एक छोटा-सा दीप उन दीपों की महत्ता में चार चांद लगा देता है। इस काव्यं संग्रह के लेखन के पीछे मेरा मूल उद्देश्य यही है कि देश में शान्ति और सद्भावना रूपी दीप जले ताकि देश में एकता स्थापित हो सके। भले ही देश में सत्य अहिंसा, भाईचारा, मानवता, आदि के लाखों दीप सजे हो, उनमें शान्ति और सद्भावों का एक दीप भी जरूरी है।” कवि की यह सद्भाव पूर्ण आकांक्षा उनके इस संग्रह का मूल तत्व है। संग्रह की पहली कविता ही इस बात का साक्क्ष्य प्रस्तुत करती है जिसका शीर्षक है “हम दीपक जलाएं”। यह कविता यद्यपि श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता में दीपक जलाने का आह्वान करती है किंतु श्री राम का आगमन भी तो अंधकार में प्रकाश की उज्जवल किरणों के समान है। श्री राम भारतीय संस्कृति में आस्था विश्वास और दृढ़ निश्चय के प्रतीक है अन्याय के विरुद्ध न्याय की स्थापना के संवाहक हैं इसीलिए श्री राम के आगमन को सदा सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के रूप में लिया जाता है। कवि ने लिखा है-
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ।
दीपक जलायें हम, गृह-मंदिर सजाएँ।।
राम जी का स्वागत, दौड़-दौड़ करेगें।
राम जी कृपालु भय, पीर सबकी हरेगें।।
भैया भरत मिलने को, रूदन मचाएँ।
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ ।।

असत्य पर सत्य की विजय को स्थापित करके अयोध्या लौटने वाले श्रीराम, लक्ष्मण और सीता माता के स्वागत में आमजन द्वारा दीप जलने के क्रम में कवि ने कहा है कि “एक दीप और जलाना”। यह दीप उन सभी मूल्यों को स्थायित्व प्रदान करने की भावना का है जिससे मानव जीवन को उच्चता मिलती है। श्रेष्ठ मानव जीवन वही है जिसमें सहजता हो, सरलता हो, जीवन मूल्य हो और असीम संवेदनाएं हों। “एक दीप और जलाना” कविता में कवि दिव्य’ ने लिखा है कि-
सत्य, अहिंसा, मानवता के, 
चाहे लाखों दीप सजाना। 
मगर शान्ति-सद्भावों का, 
एक दीप और जलाना ।।

जिस प्रकार श्रीराम अन्याय के विरुद्ध न्याय की विजय का घोष करते हैं इस प्रकार पक्षियों का जीवन दासता से रहित उन्मुक्त जीवन का प्रतीक है। यदि मनुष्य स्वतंत्रता की अभिलाषा रखता है तो उसे सबसे पहले पक्षी का जीवन ही याद आता है। मनुष्य भी एक स्वतंत्र प्राणी है जिसने स्वयं के लिए अनंत श्रृंखलाओं की संरचना कर डाली। सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक जीन-जैक्स रूसो ने कहा था कि “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा रहता है।’’ यह जंजीरें मनुष्य ने स्वयं गढ़ी हैं और जब इन जंजीरों का कसाव बढ़ जाता है तो उससे मुक्त होने के लिए व्यक्ति छटपटाने लगता है क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्ति भी पक्षियों के सम्मान उन्मुक्तता की प्रवृत्ति है। “हम पंछी उन्मुक्त” शीर्षक कविता में कवि ने लिखा है-
प्राचीरों को तोड़ चले, 
हम पंछी उन्मुक्त है।
पिंजरे में कैद सभी हम, 
क्यों मानवता सुषुप्त है।।

व्यक्ति तभी स्वतंत्र रह सकता है जब वह अनुकूल वातावरण में जीवन जी रहा हो। ऐसा वातावरण जिसमें महंगाई की मार न हो, पूंजीपतियों के द्वारा लूट न हो, राजनीतिक छल कपट न हो और सामाजिक समानता हो तभी व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह पाती है। इसीलिए वर्तमान पर दृश्य को देखते हुए कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘यह कैसी आजादी’ में तर्जनी उठाई है-
नियम कानून सब टांगे खूंटी। 
जनता मंहगाई से रूठी ।।
पूँजीपतियों की हो रही मस्ती।
हत्या लूट कितनी है सस्ती ।।

भारतीय जीवन दर्शन की सनातन संस्कृति के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य जन्म के साथ ही कुछ प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक ऋणों (कर्तव्यों) से बंधा होता है। इन ऋणों से मुक्त होने के लिए जीवन में सदाचार, त्याग और सेवा का मार्ग अपनाना आवश्यक माना गया है। ये तीन ऋण देव, ऋषि तथा पितृ ऋण के नाम से जाने जाते हैं । इसमें पितृ ऋण का आशय मात्र पिता के ऋण से नहीं अपितु माता और पिता दोनों के ऋण से उऋण होना है। जो इन ऋणों का महत्व समझता है, वही देश और समाज के लिए विशेष कार्य कर सकता है। कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘कैसे तेरा ऋण उतारूँ’ मैं मां के ऋण को वर्णित किया है-
सौ-सौ जीवन, मैं तुझ पर वारूँ।
हे माँ! कैसे तेरा ऋण उतारूँ।।
तूने मुझको जन्म दिया है, 
तेरा मैंने दुग्ध पिया है।
तेरा अमृत-सम दुग्ध पीकर, 
कौन नहीं यहाँ जीवन जीया है।।

कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ की कविताओं में जहां व्यवस्थाओं के प्रति उलाहना है, वहीं उनका समाधान भी  सुझाया गया है। यही बात संग्रह की कविताओं को विशिष्ट बनाती है। इन कविताओं में भाव सौंदर्य के साथ भाषाई सौंदर्य भी है जो कविता के प्रवाह को बांधे रखता है। ‘एक दीप और जालना’ कविता संग्रह विपरीत समय में आशा का संचार करने वाली कविताओं का संग्रह है इस दृष्टि से इन कविताओं को कम से कम एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए। 
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