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My Editorials - Dr Sharad Singh

Thursday, June 18, 2026

बतकाव बिन्ना की | कओ कोऊ खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर ने पैन्हान लगे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  | कओ कोऊ खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर ने पैन्हान लगे
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    रामधई! जबसे हमने बा खबर पढ़ी तभईं से हमें बेजा टेंसन हो रओ। अब आप कैहो के ईरान औ अमेरिका को मेल भओ जा रओ, ईमें टेंसन की का बात? सो बात ऊ नइयां। अब आप कैहो के अपने परधानमंत्री जू जी-7 शिखर सम्मेलन में गए, ऊको टेंसन आएं? सो हमें ऊको काए खों टेंसन हुइए? बा तो अच्छो काम आए। औ रई मैंगाई के बढ़बे की बात आए, सो ऊको टेंसन के लाने तो अपन टेंसन प्रूफ हो गए आएं। काए से के अपने इते तो मैंगाई जब चाए तब बढ़त रैत आए। बा तो पूरी आवारा लुगाई आए। चाएं जबें मों उठाए निकर परत आए। कोऊ से रोके से नईं रुकत। सो ऊकी तो छोड़ो। हमें टेंसन हो रई ऊ खबर पढ़े से जोन में बताओ गओ के एनसीईआरटी वारन ने मोहनजोदड़ो के टेम की नचनियां की मूरत खों कपड़ा पैन्हा के फोटू छाप दई। अब जो का आए? अरे तुमें नईं पुसा रई तो बिलकुलई ने छापो, ऊको कपड़ा पैन्हाबे की का जरूरत हती? अब आई ओरें सोचो के जोन जमाना की बा मूरत आए, ऊ जमाना में नचनियां ऊंसई रैत रई हुइंए। जा सो देखबे वारे की नजर को दोस कहाओ के बा ऊमें कला औ इतिहास ने देख पा रए, बाकी बा उनको नंगी दिखा रई। औ छापो बी कोन सी किताब में? बा कला वारी किताब में। याने उनें कला तो तनकऊं ने दिखानी। तभई तो कई गई आए के ‘‘जाकी रई भावना जैसी...’’। 

एनसीईआरटी वरान ने जे बी ने सोची के उनकी किताबें पढ़बे वारन खों जा कैसे पतो परहे के ऊ टेम पे कैसो रओ जात्तो? ऊ टेम पे नाचने वारियां कैसो गैहना पैन्हत्तीं? और कैसे हुन्ना-लत्ता ओढ़त्ती? सोचबे की बात सो जे आए के ऊ टेम पे सोच इत्ती छोटी ने हती। ऊ टेम के लोगों के लाने नचनियों की बा सजावट कोनऊं खास बात ने हती, तभईं तो ऊ टेम के मूरत बनानबे वारे ने ऐसी मूर्ती बनाई। अब इनखों सरम आ रई। तनक औ पाछूं चलो तो एक टेम तो बा बी रओ जब अपने पुरखा रहें कपड़ा पहनबों लौं नई जानत्ते। बो का कहाउत आए के होमोसंपियंस वारे जमाना के इंसानों की फोटू छापत समै जे ओरें ऊ टेम के इसानों को सोई कओ धुतिया पैन्हा दें। 

मोहनजोदड़ो की बा मूर्ती 4500 साल पुरानी आए, आज की नोंई। ऊको कपड़ा पैन्हा के का दिखाबो चात आएं? अपन ओरें ऊ संस्कृति के आएं जीमें अजंता की गुफाओं में भगवान बुद्ध के जमाने की किसां के चित्र बनाए में लुगाइयन खों सरीर के ऊपरी भाग में कछू नईं पैन्हाओ गओ आए। काए से के ऊ टेम पे बे ऊंसई रैती रईं हुंइए। बा चित्रन से ऊ टेम के रैबो-खाबो को पता परत आए। अब का जे ओरें बे चित्रन खों बी मिटवा दैहें?
तभई से तो हमें तो अपने खजुराओ की फिकर होन लगी आए। उते तो मुतकी मूर्तियां एसी आएं जोन में पुतरियों ने आर-पार दिखात भए कपड़ा पैन्हें आएं। का बे उने बी कम्पूटर से कपड़ा पैन्हा दैहें? 
ऐ हते मुगल हरें जोन ने इते आ के सुंदर-सुंदर मूर्तियां तोड़ डारीं औ एक हैं जे एनसीआईआरटी वारे जो कला खों कला रैन देबे मे इज्जत जा रई। तनक सोचो के खजुराओ की मूर्तियन खों जो कपड़ा पैन्हा दए जाएं तो कैसो लगहे? जा सोच केई अपने सर के बार पटाबे को जी करओ।  
जे एनसीईआरटी वारे पैले बी ऐसई मुतकी बेर दोंदरा दे चुके आएं। औ हर दार मों की खा के बी नईं मानत आएं। एक तरफी तो मोहनजोदड़ो की ‘डांसगिंगर्ल’ खों कपड़ा पहनाबे को काम कर डारो औ अभई कछू मईना पैले 8 मीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में एक पाठ जोड दओ रओ जोन को टाईटल हतो ‘‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’’। अब आपई सोचो के ऐसो पाठ पढ़ के तो बच्चा हरों को कानून से भरोसोई उठ जाहे। अरे भ्रष्टाचार को पाठ पढ़ानेई हतो तो दबंगई से पाठ जोड़ते के ‘‘एनसीईआरटी में भ्रष्टाचार’’। मनो इत्ती दम कां? जैई पे सुप्रीम कोर्ट ने उने बत्ती दई औ फटकारो सो बा पाठ हटाओ गओ।    
ऐसई तब भओ रओ जबे एनसीईआरटी वारन दने इतिहास के सिलेबस से ‘‘मुगल काल’’ खों हटा दओ। अरे भैया! मुगल हरें अच्छे हते या बुरे हते पर हते तो। उने इतिहास से हटा के  का जोर दैहो? या के जे कैहो के ऊ टेम को इतिहास पढे जाने जोग नइयां। जो घट गओ ऊको बदरो नईं जा सकत। बाकी ऊसे सीख लई जा सकत आए। बाकी ऊ टेम को इतिहास हटाए जाने पे भारी बवाल मचो रओ। अब तुमें नईं पुसा रओ तो ईको मतलब जे तो नईं के तुम कओ के बे ओरें तो हते ई नईं। जो का आए? कऊं ऐसे होत आएं सिलेबस बनाए वारे? 
चलो मुगल की तो छोरो, एक बेर तो एनसीआईआरटी वारन ने डार्विन खों काट-पीट दओ। भओ का के कक्षा 9,10 की डार्विन के विकासवाद औ अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत वारी विज्ञान की किताबन से डार्विन के ‘‘विकासवाद के सिद्धांत’’ खों गायब कर दओ। इत्तोई नईं डार्विन की दई गई ‘‘आवर्त सारणी’’ के कछू हिस्सां हटा दए गए। ईपे बी बड़ी गदर मची रईं सबरे वैज्ञानिक औ शिक्षा के विद्वान हरों ने डंडे बजाए तब कऊं जा के मामला सुदरा। 

ऐंसई कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की किताब में 2002 के गुजरात दंगे, बाबरी मस्जिद वारी घटना औ अयोध्या के झगरे वारे कछू पाठ हटा दए गए तो कछू काट-पीट के छोटे कर दए गए। ईपे बी बड़ो दोंदरा मचो। अरे भैया, जो कछू घट चुको आ तो घट चुको, ऊको छिपाबे से कछू ने बदलहे। 

हमें तो जे समझ में नईं आत आए के एनसीईआरटी में कोन टाईप के बिद्वान हरें बैठे आएं? कोन खों जे सूझो के मोहनजोदड़ो की 4500 साल पुरानी नाचबे वारी मूर्ती की फोटू खों कपड़ा पैन्हा के छाप दओ जाए? का बे जे डर रए हते के बच्चा हरें बा मूर्ती खों असली रूप में उेखहें तो बिगड़ जाहें? मगर का जोन ने मोहनजोदड़ो को पाठ बनाओ औ बा मूर्ती की फोटू छांटी, का उन्ने अपने टेम पे इतिहास नई पढ़ो रआ? हमने सोई छठीं, सामतीं कक्षा में ऊ टेम को इतिहास पढ़ो रओ औ बा मूर्ती की फोटू अपनी किताब में देखी रई, का हम बिगरे? के हमाए टेम के औ मोड़ा-मोड़ी बिगरे? जब कोऊ पढ़त आए तो ऊ टेम पे बा पढ़ाई सोच के पढ़त आए। ऊ टेम में ऊके दिमाग में औ कछू उटपटांग नईं चलत आए। फेर ऐसो सोचो जाए तो डाक्दरी की पढ़ाई में तो औरई मुस्किल दिखाहे। 

वैसे देखो जाए तो एनसीईआरटी को मकसद आए स्कूल की पढाई के स्तर खों ऊचो उठाओ जाए। नई अच्छी किताबे तैयार कराई जाएं। पढ़ाई में नईं चीजें जोड़ी जाएं। मनो नई चीजें जोड़बे को मतलब जो नईं आए के मोहनजोदड़ो की नाचबे वारी खों हुन्ना पैन्हा दए जाएं। 
जेई से तो हमें टेंसन हो रई के कऊं कोनऊं खों सूझ गओ तो बा खजुराओ की मूर्तियन खों जम्फर पैन्हान लगहे। बाकी मोए जा बी समझ नई परत के अपन ओरों में से कछू इत्ती छोटी सोच वारे काए हो गए? जे अपनोई देस आए औ अपनई संस्कृति आए जीमें ‘‘कामसूत्र’’ घांई किताब लिखी गई। अब कछू लोग ऊके बारे में बी सोचत आएं के बा किताब अच्छी नोंई तो जा उनको समझ को फेर आए। सोचो तो जे चाइए के अपने ओरें पैले बड़ी बुद्धि के रए। अपने पुरखा हरों की सोच बड़ी हती। बा तो मुगल हरें आए तो इते उनसे बचाबे के लाने अपनी लुगाइयन खों परदे में बेंड़ दओ गओ। ओई टेम से अपन ओरन की सोच सिकुरन लगी। ऊ टेम पे बी जे नई सोचो गओ के लुगाइन खों हथ्यिार चलाबो ऐसो सिखा दओ जाए के बेई ओरें दुस्मन के मूंड़ काट लें। ऊ टेम पे बी लुगाइयां भौतई बहादुर हतीं। ने तो का कोनऊं मरद की दम हती के बा ‘‘जौहर’’ कर लेतो? जबके जबे लुगाइन खों तलबार उठाबे को मौका मिलो तो उन्ने दिखा दओ के बे लडाई के मैदान में मार बी सकत आएं और मर बी सकत आएं। सो सवाल सोच को आए। आज के जमाना में इत्ती छोटी सोच देख के अपनो मूंड पटकबे को जी करत आए।

हमाई समझ से तो जो एनसीईआरटी वारे अपनो काम सई से नईं करपा रए औ उनकी सोच इत्ती छोटी आए तो एनसीईआरटी खों बंदई कर देओ जाइए। बाकी पंचो की राय। हमें तो बस, अपने खजुराओ की मर्तियन की फिकर हो रई, औ कछू नईं।   

बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के एनसीईआरटी की करतूत बुरई हती के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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