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My Editorials - Dr Sharad Singh

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Friday, October 30, 2026

बतकाव बिन्ना की | ने तो पीबे वारे गम्म खा रए औ ने बेंचबे वारे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की      
     
ने तो पीबे वारे गम्म खा रए औ ने बेंचबे वारे                                
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘पीबे वारों खो पीबे को बहानो चाइए!’’ कैबे, सुनबे में तो बड़ो मजे को लगत आए मनो जब जेई पिए-पिलाए में जहरीली दारू पिब जात आए तो का होत आए जा अपन ओरें सबई देख रए। भौत पैले की नईं, अबई की तनक हेर लेओ। जेई साल की सितंबर मईना में सागर जिला में जहरीली दारू को बड़ो कांड भओ। जीमें 30 से 50 लोगन की मौत भई औ मुतके अबे लौं बीमार चल रए। औ अक्टूबर मईना में देवास में बड़ो कांड हो गओ। उते बी बोई भओ के पिबे वारों को उल्अियां होन लगीं। आंखे धुदंरा गईं। दिखबो बंद हो गओ औ कओ जात आए के 13 मजदूर मर गए। कई आंकड़ों तो बाद में पतो परहे। कओ जा रओ के तीन मईना में जा तीसरो बड़ो कांड आए। बाकी ई टाईप के कांड पैले बी मुतके हो चुके। बिहार में, उत्तरप्रदेश में, कर्नाटक में। हर दइयां जेई लगत आए के अब तो पीबे वारे कछू सबक ले लैंहे, मनो उने तो मरबे की कोनऊं फिकर नइयां। अबई संकारे हमने एक मिस्त्री से बतकाव करी के दारू नईं पियो चाइए। जिनगी इत्ती फालतू की नोईं। सो बा बड़ो दरस बघारत भओ बोलो,‘‘मैंडम, दारू पिए से का नुसकान हुइए?’’
‘‘लीवर खराब हो जात आए औ फेर बी ने सम्हरे सो मरबो पक्को कहानो।’’ हमने ऊसे कई।
‘‘सो, जो नईं पियत का बे मरत नइयां? के उनको कभऊं कोनऊं बीमारी ने होत आए?’’ ऊने उल्टे हमसे पूछ लई।
‘‘सुनो भैया! एक दिनां मरने तो सबई खों आए मनो का जरूरी के दारू पी के समै के पैले मर जाओ जाए?’’ हमने सोई ऊको समझाबे को प्रयास करो।
‘‘समै से पैले को का मतलब? कोन खों पतो के कब जमराज को बुलौव्वा आहे? औ जब पतो नईं तो समै को का मतलब?’’ ऊने अच्छे पढ़े-लिखे घांई तर्क दओ।
‘‘फेर तो तुम अबई जहर पी के देख लेओ। जो समै हो गओ हुइए सो अबई निपट जैहो औ जो समै ने भओ हुइए तो जियत रैहो।’’ हमें सोई गुस्सा सी आ गई। हमे लगो के देखो तो दारू के चक्कर में जा कित्तो बड़ो वारो ज्ञानी बनो जा रओ। अबई कछू लिखबे-पढ़बे की बात हुइए तो तुरतईं भोला घांई कहन लगहे के हम तो पढ़े के - ने लिखे के, हमें कछू नईं पतो।
‘‘तुमए इते दार-चाउंर को लातो आए, तुम की तुमाई घरवारी?’’ महने ऊसे पूछीं।
‘‘हमें को टेम धरो? छै बजे तो छूटत आएं, फेर घरे पौंचत-पौंचत आठ-नौ बज जात आएं।’’ बा बड़ी मासूमियत से बोलो।
‘‘सो, कित्ती दूर रैत आओ। इते से 20-25 किलोमीटर हुइए तुमाओ घर?’’ हमने पूछीं। 
‘‘अरे नईं, हम तो इतई रैत आएं। इते से हमाओ घर कछू नईं तो आधा किलोमीटर से कम हुइए।’’ बा बड़े आराम से बोलो।
‘‘तो भइया, हमें जे बताओ के छै बजे छूट के घरे पौंचे में नौं काए बज जात आएं? अहाता जात हुइओ, दारू पीबे के लाने?’’ हमने पूछी।
‘‘अब ऐसो आए बाई, के दिन भर काम करत-करत थक जात आएं सो, संझा को तनक-मनक ले लेत आएं।’’ बा मुस्कयात भओ बोलो।
‘‘सो, घरे जात के समै अपनी लुगाई के लाने सोई ले जात हुइयो।’’ मैंने बी ऊंसई मुस्या के कई।
‘‘अरे, बे काए पीहें? बे तो पियन ने देने के लाने हमसे लर परत आएं।’’ बा मिस्त्री उचकत भओ बोलो।
‘‘काए ऊको काए ने पियो चाइए? बा बी तो दिन भर घर के कुल्ल काम करत-करत थक जात हुइए। ऊको बी लगत हुए के दो-चार घूंट लगा लओ जाए।’’ हमने ऊसें कई।
‘‘आप सोई कां की कै रईं! ऐसो कऊं होत आए?’’ बा हमाओ मजाक सो उड़ात भओ बोलो।
‘‘हऔ दिन भरे काम करत में तुमई लोग थ्सकत आओ, तुमाई लुगाइयां नईं? भइया, जे सब तुम ओरन को कहानो आए। तुमे पीने सो कोनऊं ने कोनऊं बहाने से पीनेई आए। चाए पीबे के चक्कर में जान चली जाए। औ तुम ओरन खों का, पी-पुआ के निपट बी गए तो तुमाए पाछें को रो रओ, कैसे जी पा रओ, तुमें ईसे का?’’ हमने ऊको करौ बोलो।
‘‘सो पीबे से सबई थोड़े मर रए।’’ बा चुप रैबे वारों में ने हतो।
‘‘ईकी का गारंटी के पीके मरबे वारों में तुम ने रैहो?’’ हमने बी खरी-खरी कई।
‘‘सो, आप का चा रईं के हम दारू पी के मर जाएं?’’ बा तुनकत भओ बोलो।
‘‘ऐसो हमने कबे कई? हम तो जू चात आएं के तुम ओरे दारू ने पियो। बा ने सेअत के लाने अच्छी औ ने परिवार के लाने। तुम अच्छे मिस्त्री आओ। दिन भरे में हजार-खांड़ सो कमाई लेत हुइए। ऊमें से जो तुमने छे-सात सौ दारू में मिटा दए तो बचो का? ऊमें तुमाई लुगाई घर कैसे चलात हुइए बा बोई जानत आए। दारू में सब कछू नास हो जात आए।’’ हमने ऊको समझाई।
‘‘अब हमें काम करन देओ।’’ बा बोलो। काए से ऊको हमाई बतकाव बेमतलब की लग रई हती। पीबे वारों के संगे लाख सर पटक लेओ, मनो बे सुदर जाएं ऐसो हो नईं सकत। जैसे बिड़ी पीबे वारे, गुटखा खाबे वारे ऊके ऊपर के कवर पे छपे नुकसान वारी फोटुओं को हेरत लौं नइयां। उन्ने तो बिड़ी निकारी औ जला के लगे सुट्टा करबे। ऊंसई गुटखा वारे तो बड़ी स्टाईल से गुटखा को पाऊच खोलत आएं औ सूधे मों में डार के पन्नी नाएं-माएं मेंक देत आएं। उने कां परी के पन्नी पे छपी फोटू देखें औ मों को कैंसर कैसो बुरौ होत आएं जा समझें। नईं, उने तो गुटखा चबाने, उने तो दारू पीने। घरवारे पइसा के लाने तरसें, सो तरसें। 
सई कैं तो दारू पीबे वारों खों पियो नई चाइए। रई बेचबे वारों की तो बे तो सरकार से लाइसेंस ले के बैठे रैत आएं। मनो उने सोई इत्तो तो सोचो चाइए के बे गलत ढंग से बनी जहरीली दारू ने बेंचे। अखीर चार पइसा के लाने कोऊ की जान लेबे से का फायदा? औ उनकी जान भर की नईं, मरबे वारे को पूरो परिवार रोड पे आ जात आए। मनो का करो जाए ने तो पीबे वारे गम्म खा रए औ ने बेचबे वारे।      
रई बतकाव की तो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के जहरीली दारू के इत्ते बड़े-बड़े कांड होबे के बाद बी पीबे वारों खों कभऊं अकल आहे के ने आहे? संगे जहरीली दारू बनाबे वारों को सोई कभऊं डर लगहे के ने लगहे? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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