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My Editorials - Dr Sharad Singh

Thursday, August 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      अपने बुंदेलखंड में भौतई पैले से साहित्त रचो जा रओ। इते की कवित्त किसाओं की सो बातई कछू औ ठैरी। इनें सुन के, पढ़ के बांहें फड़कन लगत आएं। इमें बहादुरी की बात जो होत आए। बुंदेला ऊंसई अपनी बहादुरी के लाने जाने जाऊत रहे। बे न मुगलों से डराने औ ने अंग्रेजन से। दोई खों छठी को दूद याद करा दओ रओ। जे ई कोई 12 मीं सताब्दी से 20 मीं सताब्दी लौं खास-खास तीन तरां के बहादुरी के साहित्त रचे गए। जोन में पैलो हतो रासो, दूसरो, कटक औ तीसरो राछरे। बाकी जे तीनोईं मों जबानी गाए जात्ते। बा तो बाद में कछू बिद्वान जनों ने इनखों इकट्ठो के, छपा के इतिहास घांईं पक्को कर दओ। मने लिखे में ले आए। ने तो पैले जे खाली गाए जात्ते। औ जे सोचो के जोन इनको सुनत्तो, ऊको जे याद रै जात्ते औ फेर बा याद रखे वारे गाऊत्ते। जीको साहित्त की भासा में ‘‘वाचिक परम्परा’’ कओ जात आए। माने मों बोले की परम्परा।  
  
बुंदेली की बहादुरी की कवित्त किसां में सबसे फेमस रई जगनिक को लिखों गओ ‘‘आल्हाखंड’’। आज बी ईको बड़े मन से गाओ जात आए। जोन जगनिक ने ‘‘आल्हाखंड’’ लिखो उनईं ने ‘‘विजयपाल रासो’’ सोई लिखो। ‘‘विजयपाल रासो में राजा विजयपाल राठौर के शिकार पे जाबे की किसां आए। होत का आए के राजा विजयपाल राठौर शिकार पे जात आएं औ उते उनें राजा पृथ्वीराज के सैनिक टकरा जात आएं। दोई में भिड़ परत आएं। पृथ्वीराज जा खबर पा के खोखियां जात आए औ कन्नौज पे हमला बोल देत आए। ऊ टेम पे जगनिक जू दोई राजा में सुलह कराबे की कोसिस करत आएं। रासो तो मानों कई ठों लिखी गईं। एक आए ‘वीर सहदेव चरित’। ईको कवि केशवदास ने लिखो रओ। रासो की जेई परंपरा में जोगीदास भांडेरी को ‘दलपत राव रासो’, लाल कवि को ‘छत्र प्रकाश’, कवि सबसुख को ‘‘भगवंत सिंह रासो’’, गुलाब चतुर्वेदी को ‘करहिया का रासो’, श्रीधर को ‘पारीछत रासो’ औ आनंद सिंह कुड़रा को ‘बाघाट रासो’ गिनाएं जा सकत आएं। 
बहादुरी की कबित्त किसां मने कटक गाथाएं सोई रासो एवं राछरे  घांई आएं। इनमें सोई राजा-महाराजा की बहासदुरी की किसां कही गईं। पन्ना के महाराज छत्रसाल के समै पे एक कवि भए जिनको नांव रओ कवि दान। उन्ने जो छत्रसाल जू की बड़वारी में बहादुरी को जो कवित्त रखे आए ऊको नांव आए ‘‘छत्रसाल जू देव कौ कटक बंध’’। ई कटक में महाराज छत्रसाल औ मोहम्मद खान के बीच भए जुद्ध को पूरो विवरन आए। ईमें महाराजा छत्रसाल औ बुंदेली सैनिकों की बहादुरी को बखान करो गओ आए। दतिया के बिद्वान स्व. बाबूलाल गोस्वामी जू ने ‘छत्रसाल जूदेव कटक बंध’ को संपादन करो औ 1992 में भानु प्रिंटर्स दतिया से इको छपाओ।

भग्गी दाऊजू श्याम ने सोई कटक लिखो। साल 1900 में भग्गी दाऊ ने ‘झांसी कौ कटक’ लिखी। ईको 1969 में डॉ. भगवान दास महौर जू ने ‘लक्ष्मी बाई रासो’ के संगे ईको छपाओ। भग्गी दाऊजू श्याम झांसी के जनकवि कहाऊत्ते। उन्ने 1857 की लड़ाई सोई लड़ी रई। जेई से उन्ने ‘झांसी कौ कटक’ में रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी के गुन गाए। बाकी अपने बुंदेलखंड में 1857 से पैले बी अंग्रेजन को तगड़ो विरोध करो गओ रओ। ईको प्रमान ‘‘पारीछत कौ कटक’’ में मिलत आए। ई कटक में जैतपुर के महाराज पारीछत औ अंग्रेजों के बीच भओ जुद्ध को ब्यौरा दऔ गऔ आए। जा जुद्ध 1841 में भओ रओ। बेरमा नदी के किनारे बिलगांव में महाराज पारीछत ने अंग्रेजन खों से जुद्ध कर के उनको मजा चखा दओ रओ। जे बात औ आए के कछू जनों की गद्दारी के मारे राजा पारीछत जीत ने पाए औ पकर के जेल में डार दए गए। उनें बंदी बना के कानपुर की जेल में रखो गओ जां 1853 में उनें फांसी दे दई गई। जो मानो जात आए के ‘पारीछत कौ कटक’ कवि बृजकिशोर ने लिखो रओ। तनक ईकी कछू लकीरें देखो-
कर कूंच जैतपुर से बगौरा में मेले।
चौगान पकर गये मन्त्र अच्छौ खेले।।
बकसीस भई ज्वानन खाँ पगड़ी सेले।
सब राजा दगा दै गये नृप लड़े अकेले।।
कर कुमुक जैतपुर पै चढ़ आऔ फिरंगी।
हुसयार रहो राजा दुनियाँ है दुरंगी।।
जब आन परी सिर पै कोऊ न भऔ संगी।
अर्जन्ट खात जक्का है राजा जौ जंगी।।
एक कोद अर्जन्ट गऔ, एकवोर जन्डैल।
डांग बगोरा की घनी, भागत मिलै न गैल।।

भैरोंलाल को लिखो ‘भिलसांय कौ कटक’ में बघेल राजा ठाकुर रणमत सिंह औ अंग्रेजों के मध्य पुटरा नांव की जांगा 1857 में भए जुद्ध को हाल लिखो गओ आए। ऊ टेम पे, मने 1857 में ठा. रणमत सिंह की रीवा जागीर पन्ना रियासत में आत्ती। रणमत सिंह बघेल क्षत्रिय हते। मनों कोनऊं के लगाई-बुझाई से पन्ना औ रीवा रियासतन में इन गई। सन् 1850 में दोनों रियासतें लड़बे खों ठाड़ी हो गईं मनो अंगरेजन के कारन लड़ाई टल गई। ईके बाद रणमत सिंह जू जागीर छोड़कर अपने कुछ साथियों के संगे सागर आ गए। जां वे अंग्रेजी सेना में भरती हो के लेफ्टिनेंट हो गए। कछू दिनां बाद उने परमोशन पे नौगांव भेज दओ गओ। जां उने केप्टन के बना दओ गओ। तभईं 1857 की लड़ाई छिड़ गई। अंगरेजन ने उने आदेस दओ के बे बुंदेला क्रांतिकारी बख्तबली औ मर्दन सिंह खों पकड़बे को काम करें। मनों रणमत सिंह जू ने ऐसो कछू ने करो औ उन ओरन खों पकरबे के लाने यां-वां भगत फिरबे को ढोंग करत रए। मगर जे बात कां लौं छिपती, सो रणमत सिंह जू औ उनके सिपाइयों को बर्खास्त कर कर दओ गओ। संगे उनकी गिरफ्तारी को आदेश जारी कर दओ गओ। अंग्रेज फौज में रैते भए रणमत सिंह जू ने जेई कोई 300 लोगों की अपनी एक टुकड़ी बना लई रई। सो जब बे ओरे सेना से निकारे गए सो उन सबई ने खुल के बुंदेलन को साथ दओ। मगर अपने इते तो जित्ती बहादुरी की किसां आएं उत्तई धोखा की किसां मिलत आए। मे राणमत सिंह जू खों सोई धोखे से बंदी बना के बांदा जेल भेज दओ गओ। जां उनें 1 अगस्त 1859 को फांसी दे दी गई। जे पूरी किसां ‘‘भिलसांय कौ कटक’ में मिलत आए। 

बुंदेलखंड की कटक खों नओ मंच देबे के लाने 2013 में बॉलीवुड के हीरो औ नाटकों के निरदेशक गोविंद नामदेव जू ने एनएसडी, अथग औ सागर विश्वविद्यालय के संगे मिल के एक वर्कशाप करो। ऊके बाद गोविंद नामदेव जू के डायरेक्सन में, 30 दिसंबर 2013 को लगातार तीन दिनां को मंचन करो। ई कटक में बुंदेला वीर मधुकर शाह बुंदेला की की बीरता को बखान आए। ललितपुर जिला के नाराहट में पैदा भए बुंदेला वीर मधुकर शाह जू ने अंगरेजन के बिरुद्ध बुन्देला विद्रोह छेड़ दओ रओ। बे खूब लड़े। मनों मधुकर शाह खों सोई सोऊत में धोके से पकरवा दओ गओ। उने सागर की बड़ी जेल में रखो गऔ औ ऊतई फांसी दे दी गई। ऊ टेम बे केवल 21 बरस के रए। 

ऐसे बीरन के बारे में लिखो गओ आए कटक। सो इनखों जरूर पढ़ो जाओ चाइए। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास कित्तो गजब को आए, बो चाए बहादुरी को होए चाए कटक घांईं साहित्त को होए। सो अपनों जै बुंदेलखंड!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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हम सभी को ऐसे तत्वों का सभी मंचों पर सक्रिय विरोध करना चाहिए जो क्षत्रिय समाज व समाज की नारीशक्ति के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भ्रांतियां फैलाने का काम करते हैं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩 "हम सभी को ऐसे तत्वों का सभी मंचों पर सक्रिय विरोध करना चाहिए जो क्षत्रिय समाज व समाज की नारीशक्ति के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भ्रांतियां फैलाने का काम करते हैं।" सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) मैंने कहा। अवसर था क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग द्वारा आयोजित क्षत्रिय महिला सम्मान समारोह का।
      🚩जिस समाज में महिलाओं का सम्मान होता है, वह समाज अधिक संगठित, समृद्ध और सुरक्षित बनता है। क्षत्रिय समाज की प्रगति भी नारीशक्ति के सम्मान और सहभागिता पर निर्भर है। अगले वर्ष 101 बेटियों का सामूहिक निशुल्क कन्यादान समारोह आयोजित किया जाएगा।" यह उद्गार क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग द्वारा आयोजित क्षत्रिय महिला सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ संरक्षक पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने व्यक्त किए। 
    🚩 होटल दीपाली के कोहिनूर हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में क्षत्रिय समाज की उन महिला सदस्यों का सम्मान किया जिन्होंने विगत दिनों क्षत्रिय महासभा सागर द्वारा समाज की 21 बेटियों के सामूहिक कन्या विवाह आयोजन में योगदान किया और सक्रिय भूमिका निभाई। 
     कार्यक्रम का आभार क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग की अध्यक्ष श्रीमती प्रीति सिंह ने किया। मंच संचालन वंदना सिंह ने किया। कार्यक्रम में मंच पर साहित्यकार सुश्री शरद सिंह, श्रीमती प्रमिला सिंह, क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष लखन सिंह, अभिषेक गौर उपस्थित रहे।
🚩इनका हुआ सम्मान 👇

पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने क्षत्रिय समाज की जिन बहिनों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया उनमें डॉ सुश्री शरद सिंह, श्रीमती प्रमिला सिंह, श्रीमती प्रीति सिंह, श्रीमती सीमा ठाकुर बन्नाद, श्रीमती सीता ठाकुर घूघर, श्रीमती नेहा राजपूत बरकोटी, श्रीमती नंदिनी हरिसिंह खुरई, श्रीमती मनीषा सिंह खुरई, श्रीमती रुचि सिंह खुरई, श्रीमती श्रद्धा सिंह सागर, श्रीमती ज्योति चौहान मकरोनिया, श्रीमती अंशु सिंह, श्रीमती ऋतु सिंह ठाकुर, श्रीमती सीमा चौहान, श्रीमती मंजू सिंह महुआखेड़ा, श्रीमती अनीता भरत सिंह केसली, श्रीमती सुमन राजपूत, श्रीमती अर्चना सिंह भैंसा, श्रीमती राजबाला सिंह, श्रीमती रेखा ठाकुर खुरई, श्रीमती अनुपमा राजपूत, श्रीमती साक्षी सिंह भैंसा, श्रीमती रेशु सिंह सागर, श्रीमती रीना बैस सागर, श्रीमती वंदना सिंह, श्रीमती निरुपमा गौर, श्रीमती आरती सिंह बंडा शामिल हैं।
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प्रिय प्रीति सिंह जिस प्रकार तत्परता कर्मठता और उत्साह पूर्वक आयोजन करती हैं तथा समाज की सभी महिलाओं को परस्पर जोड़े रखा है वह प्रशंसा योग्य है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनके नेतृत्व में क्षत्रिय महिला समाज निरंतर प्रगति करेगा तथा समाज की महिलाओं में सक्रियता की भावना जागृत होगी।
     आदरणीय भाई साहब भूपेंद्र सिंह जी के निर्देशन में इस अत्यंत सफल एवं ऊर्जावान आयोजन के लिए मैं प्रीति सिंह जी को हार्दिक बधाई देती हूं तथा उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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Wednesday, August 5, 2026

चर्चा प्लस | समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
          जब लाईट चली जाती है तो हम झुंझला उठते हैं। यदि सरकार के द्वारा विद्युत कटौती की जाने लगती है तो हमारा क्रोध और बढ़ जाता है। डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हम घबरा उठते हैं। लेकिन क्या हम ऊर्जा के इन स्रोतों की बचत के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर कभी गंभीरता से विचार करते हैं? जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां आ गईं लेकिन बिजली उत्पादन के लिए भी तो कोयला जैसा जीवाश्म ईंधन लगता है। यानी आगे चल कर हमें अपनाना होगा बिजली के पारंपरिक स्रोत का विकल्प। तो वह, अभी से क्यों नहीं? इस पर विचार करना जरूरी है।
   सन 2006 में भारत बुक सेंटर, लखनऊ से मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘सस्ता और सुरक्षित ऊर्जा स्रोतरू सौर तापीय ऊर्जा’’। इस पुस्तक के प्राक्कथन में मैंने लिखा था-‘‘वर्तमान समय ऊर्जा और उसके स्रोतों पर चिंतन करने का समय है। हम ऊर्जा संकट के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, वह हमें अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर पुनः दृष्टिपात करने का आग्रह कर रहा है। लकड़ी, कोयला, पनबिजली, गैस, खनिज तेल आदि हमारे परंपरागत ऊर्जा स्रोत मानव के द्वारा उस समय से काम में लाए जा रहे हैं जबसे इन स्रोतों की जानकारी मनुष्य को हुई। हजारों वर्षों से इन ऊर्जा स्रोतों के निरंतर काम में आने, जनसंख्या के दबाव बढ़ने तथा इन ऊर्जा स्रोतों की भावी उपलब्धता की गंभीरता की ओर स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को न तो पुनर्जीवित किया जा सकता है और न पुनर्निर्मित किया जा सकता है। इनका भंडार समाप्त हो जाने पर हम ऊर्जाहीन हो जाएंगे। अतः समय रहते परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के एक ऐसे विकल्प को अपना लेना आवश्यक है जो हमारी भावी आवश्यकताओं को सुचारू रूप से पूरा कर सके। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में जिन परंपरागत स्रोतों को अपनाया जा सकता है, वे हैं- 1.सौर ऊर्जा 2.पवन ऊर्जा 3.ज्वारीय ऊर्जा 4.भू-तापीय ऊर्जा। इन परंपरागत ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा अथवा सौर तापीय ऊर्जा सबसे उत्तम ऊर्जा स्रोत है। यह सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है और इसीलिए इसकी उपलब्धता सतत एवं अक्षुण्ण है। सौर तापीय ऊर्जा सब जगह उपलब्ध हो सकती है। इसको उपयोग में लाना भी आसान है। सौर तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं तथा यह भविष्य की विश्वसनीय ऊर्जा के रूप में स्वीकार की जा चुकी है। सुदूर ग्रामीण अंचलों के लिए भी सौर तापीय ऊर्जा के द्वारा ईंधन एवं विद्युत की आपूर्ति की जा सकती है जो अन्य किसी स्रोत से दीर्घकाल तक संभव नहीं है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, मैंने सौर तापीय उर्जा के बारे में जैसे-जैसे अध्ययन किया, वैसे-वैसे मैंने इसे एक सशक्त विश्वसनीय और उपयोग में आसान ऊर्जा स्रोत के रूप में पाया। मुझे लगता है कि सौर तापीय ऊर्जा भारत जैसे विकासशील देश में समाज के प्रत्येक स्तर के नागरिकों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। इससे देश की राष्ट्रीय आय के एक बड़े भाग की बचत हो सकेगी, जो परंपरागत ऊर्जा को आयात करने में व्यय हो जाती है। सौर तापीय ऊर्जा को अपना कर न केवल ईंधन अपितु विद्युत आपूर्ति से संबंधित संकटों से भी हम उबर सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेंगे।’’

तब से अब तक ऊर्जा के संबंध में स्थितियां बेहतर नहीं हुई हैं बल्कि और अधिक बिगड़ी हैं। आज फिर वही शब्द लिखने पड़ रहे हैं जो मैंने उस समय लिखे थे कि आमजन जीवन में सौर ऊर्जा को अपनाए जाने की जरूरत है।
कोयले की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं और कोयला बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। कोयले की उपलब्धता के भावी संकट को देखते हुए जर्मनी ने अपने देश में कोयला खनन का काम बंद कर चुका है। अन्य देश भी इस दिशा में अपनी योजनाएं बना रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए एकदम से कोयले का उपयोग बंद कर देना संभव नहीं है अतः उसने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में सन् 2030 से 2050 तक का समय मांगा है। लेकिन क्या यह हमारे लिए सन 2030 तक संभव है? हम यदि रेलवे लाईन के पास पहुंच कर देखें तो कुछ ही देर में कोयले से भरी मालगाड़ी सामने से गुज़रती हुई दिखाई दे जाएगी। वह पचासों बोगियों में भरा हुआ कोयला कारखानों और विद्युत तापगृहों में पहुंच कर ऊर्जा उत्पादन का काम करता है। वर्षों से इस प्रकार कोयला खनन किया जा रहा है। हजारों वर्ष में तैयार यह कोयला जिस तेजी से और जिस बड़े पैमाने में हमने उपयोग में लाया है, उससे भूमि के नीचे मौजूद कोयले का भंडार अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। कोयले का पुर्नउत्पादन इतनी तेजी से नहीं हो सकता है कि हम खोदते जाएं, कोयला निकालते जाएं और पृथ्वी हमें कोयला बना-बना कर देती जाए। यह हजारों वर्ष की प्राकृतिक प्रक्रिया से निर्मित होता है। इस बात को जानते हुए भी हमने यह अनदेखी की कि कोयला एक दिन पूरी तरह समाप्त हो सकता है। इसीलिए स्थिति इस गंभीरता तक आ पहुंची है कि कोयले का उपयोग बंद किए जाने का वैश्विक स्तर पर प्रयास आरम्भ करना पड़ रहा है।

हम दैनिक जीवन में विद्युत ऊर्जा का बेहद उपयोग करते हैं। अब तो ई-बाईक, ई-कार आदि के रूप में उपयोग बढ़ता जा रहा है। इस ‘ई’ का मतलब है इलेक्ट्रिक या बिजली। तो जब तक बिजली पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर है और हमारे पारंपरिक स्रोत समाप्त नहीं हुए हैं तब तक हमें बिजली प्राप्त होती रहेगी। लेकिन उसके बाद? क्या हम अंधकारयुग में जीने को तैयार हैं? कदापि नहीं। इसकी कल्पना भी हम नहीं करना चाहते हैं। तो फिर क्यों न समय रहते ऊर्जा के अपने स्रोत को पारंपरिक से बदल कर वैकल्कि पर ‘‘स्विच’’ कर दिया जाए। यानी हम जीवाश्म ईंधन के बदले सौर ऊर्जा को स्रोत के रूप में पूरी तरह से अपना लें।

यूं तो देश में हर वर्ष राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाया भी जाता है। यह ऊर्जा खपत के महत्व और हमारे दैनिक जीवन में इसके उपयोग और वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति पर इसके प्रभाव का आकलन करने के लिए मनाया जाता है। भारत में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाने का उद्देश्य रहता है, लोगों को ऊर्जा के महत्व, ऊर्जा की बचत, और ऊर्जा संरक्षण के बारे में जागरुक किया जा सके। ऊर्जा संरक्षण का सही अर्थ है ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग को कम करके कम ऊर्जा का उपयोग कर ऊर्जा की बचत की जाए। लेकिन यह दिवस भी अन्य दिवसों की भांति एक दिन का समारोह बन कर रह जाता है। 
   कुशलता से ऊर्जा का उपयोग भविष्य में उपयोग के लिए इसे बचाने के लिए बहुत आवश्यक है। यह सच है कि विद्युत जैसी ऊर्जा को बचा कर उसका भंडारण नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसके उत्पादन में लगने वाले कोयला जैसे स्रोत बचाए जा सकते हैं और मंहगी बिजली के विरुद्ध सौर ऊर्जा को अपना कर अपने घरेलू बजट को भी सम्हाला जा सकता है।

यह सच है कि वर्तमान में हमारे देश में सौर उपकरण घर में लगवाने मंहगे पड़ते हैं किन्तु आरंभिक खर्च के बाद न्यूनतम खर्च उसे बैलेंस कर देता है। यदि इस दिशा में सरकार कारगर सब्सिडी लागू कर दे तो सौर ऊर्जा के घरेलू उपकरण हर नागरिक के लिए सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। इस दिशा में चीन ने हमारे देश के बाजार को आकर्षित करने में कसर नहीं छोड़ी है। ऑनलाईन बाजार में कम से कम कीमत में उसने ऐसे उत्पाद उतार दिए हैं जो दिन भर सौर ऊर्जा ग्रहण करते हैं और रात भर घर, लॉन, सड़क आदि को रोशन करते हैं। बेशक ये उपकरण बिना गारंटी के होते हैं किन्तु इनकी कम कीमत इनके ‘‘यूज एंड थ्रो’’ की क्वालिटी के आड़े नहीं आती है। यदि खाना पकाने के सोलर कुकर, चूल्हे और घरेलू बिजली के उपकरणों को सब्सिडी के साथ खुले बाजार में उपलब्ध कराया जाए तो इसे सभी लोग खरीदना पसंद करेंगे। इसका अनुमान बिजली बचाने वाले बल्बों, पंखों आदि की खरीदी के प्रति रुझान को देख कर लगाया जा सकता है। क्योंकि सुविधा पाने के साथ-साथ पैसे की बचत हर कोई करना चाहता है।  

यह भी सच है कि हमें ऊर्जा की बचत की आदत नहीं है। यह आदत हमें अपनानी होगी। कोई भी ऊर्जा की बचत इसकी गंभीरता से देखभाल करके कर सकता है। दैनिक उपयोग के बहुत से विद्युत उपकरणों को जैसे- बिना उपयोग के चलते हुए पंखों, बल्बों, एसी, हीटर आदि को बंद कर के विद्युत की बचत की जा सकती है। इस तरह ऊर्जा की बचत का तरीका ऊर्जा संरक्षण अभियान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जीवाश्म ईंधन, कच्चे तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस आदि दैनिक जीवन में उपयोग के लिए पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न करते हैं लेकिन दिनों-दिन इनकी बढ़ती मांग प्राकृतिक संसाधनों के कम होने का भय पैदा करने लगा है। ऊर्जा संरक्षण ही केवल एक ऐसा रास्ता है जो ऊर्जा के गैर-नवीनीकृत साधनों के स्थान पर नवीनीकृत साधनों को प्रतिस्थापित करता है। ऊर्जा उपयोगकर्ताओं को ऊर्जा की कम खपत करने के साथ ही कुशल ऊर्जा संरक्षण के लिये जागरुक करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की सरकारों ने ऊर्जा और कार्बन के उपयोग पर कर लगा रखा है। उच्च ऊर्जा उपभोग पर कर ऊर्जा के प्रयोग को कम करने के साथ ही उपभोक्ताओं को एक सीमा के अन्दर ही ऊर्जा का प्रयोग करने के लिये प्रोत्साहित करता है। किन्तु इससे अधिक नागरिक हित का तरीका है सौर ऊर्जा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।

भवन निर्माण के समय थर्मल इंसुलेशन का प्रयोग हमारे देश में नहीं किया जाता है किन्तु इस दिशा में ऊर्जा के बचत वाले निर्माण को बढ़ावा दिया जा सकता है जिससे ठंड की ऋतु में ऊर्जा की बचत की जा सके। अन्यथा, ठंड के मौसम में हीटर, ब्लोअर आदि उपकरणों पर बड़े पैमाने पर ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। थर्मल पर्दें, स्मार्ट खिड़कियां इस दिशा में कारगर साबित हो रही हैं। ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा को प्राकृतिक रोशनी और कॉम्पैक्ट फ्लोरोसेंट लैंप या सीएफएल से और अन्य साधनों के द्वारा ऊर्जा खपत कम की जा सकती है। साथ ही फ्लोरोसेंट बल्ब, रैखिक फ्लोरोसेंट, सौर स्मार्ट टॉर्च, स्काई लाइट, खिड़कियों से प्रकाश व्यवस्था और सौर लाइट का प्रयोग करके बचाया जा सकता है। जल संरक्षण भी बेहतर ऊर्जा संरक्षण का कार्य करता है। लोगों के द्वारा हर साल लगभग हजारों गैलन पानी बर्बाद किया जाता है जिसकी विभिन्न संरक्षण के साधनों जैसे- 6 जीपीएम या कम से कम प्रवाह वाले फव्वारों, बहुत कम फ्लश वाले शौचालय, नल जलवाहक, खाद शौचालयों का प्रयोग करके बचत की जा सकती है।

 राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान भारत में ऊर्जा संरक्षण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए विद्युत मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया। भारत में पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान एसोसिएशन वर्ष 1977 में भारत सरकार द्वारा भारतीय लोगों के बीच ऊर्जा संरक्षण और कुशलता को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था। ये ऊर्जा का संरक्षण महान स्तर पर करने के लिये भारत सरकार द्वारा उठाया गया बहुत बड़ा कदम है। बेहतर ऊर्जा कुशलता और संरक्षण के लिए भारत सरकार ने एक अन्य संगठन ऊर्जा दक्षता ब्यूरों को भी 2001 में स्थापित किया गया।

ऊर्जा संरक्षण दिवस वस्तुतः एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान दिवस है। लेकिन जैसा कि हमारी प्रवृत्ति है कि चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या सरकारी स्तर पर, दिवस मनाने के बाद हम अपने सारे संकल्प भूल जाते हैं और सारी योजनाएं ठंडे-बस्ते में बांध देते हैं। लेकिन अब वह समय आ ही गया है कि हमें ऊर्जा की उपलब्धता एवं ऊर्जा स्रोतों के प्रति गंभीर होना होगा। हमें लापरवाही और अनदेखा करने की अपनी प्रवृत्ति को बदला होगा। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को खाली कोयला खदानें और तेल के रिक्त कुए सौंपने के बजाए उन्हें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा के कभी न खाली होने वाले भंडार सौंप कर जाएं। विशेष रूप से सौर ऊर्जा का वह भंडार, जिससे दैनिक जीवन में भी सस्ती और सुगम ऊर्जा मिलती रहे।                                                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 05.08.2026 को प्रकाशित)  
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धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के असीमित अवसर हैं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार  के असीमित अवसर हैं जैसे टूर गाइड, ट्रैवल एजेंट और होटल मैनेजमेंट हैं। विशेष रूप से धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में तो नारियल या पूजा के सामग्री बेचने वाली एक दुकान से लेकर होटल या रिसोर्ट तक के रूप में रोजगार पाया जा सकता है। आजकल तो महिलाएं भी टूर गाइड का काम करती हैं। बस, प्राथमिक जरूरत यही है कि हम अपने पर्यटन क्षेत्र को स्वच्छ, सुविधायुक्त और सुरक्षित बनाएं, ताकि अधिक से अधिक पर्यटक आएं, अधिक दिन तक रुकें और जब लौट कर जाएं तो उसके बारे में अन्य लोगों से सकारात्मक चर्चा करें। परिवहन के पर्याप्त साधन भी पर्यटकों को उपलब्ध कराना आवश्यक है। तभी पर्यटन क्षेत्र का विस्तार होगा और जब पर्यटन क्षेत्र का विस्तार होगा तो रोजगार के अवसर निरंतर बढ़ते जाएंगे।" - बतौर मुख्य वक्ता मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) उपस्थित छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा। अवसर था पंडित दीनदयाल उपाध्याय आर्ट एंड कॉमर्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज सागर द्वारा पीएम उषा परियोजना के सहयोग से आयोजित "बुंदेलखंड - पर्यटन के क्षेत्र में रोज़गार के अवसर" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र का।
    इस प्रथम सत्र का विषय था "बुंदेलखंड में धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के अवसर"। 
🚩महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ सरोज गुप्ता के ऊर्जावान एवं उत्साही प्रयासों से इस प्रकार के आयोजन लगातार महाविद्यालय में आयोजित हो पा रहे हैं जिसके लिए वे तथा उनकी टीम बधाई की पात्र हैं।💐
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Tuesday, August 4, 2026

पुस्तक समीक्षा | पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा

पाठकों से गहन संवाद करती कहानियों का रोचक संग्रह 

समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

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कहानी संग्रह - पिछली घास

लेखिका      - दीपक शर्मा

प्रकाशक     - रश्मि प्रकाशन, महाराज पुरम, कृष्णा नगर, लखनऊ-226023 (उप्र)

मूल्य        - 200/-

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‘‘पिछली घास’’ लेखिका दीपक शर्मा की सोलह कहानियों का संग्रह है। हिन्दी कथाजगत में दीपक शर्मा एक जाना-पहचाना नाम है। 30 नवम्बर 1946 में अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मीं दीपक भुल्लर जो विवाह के बाद दीपक शर्मा के नाम से चर्चित हुईं लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग में लम्बे समय तक अध्यक्ष एवं रीडर के पद पर रहीं। अब तक उनके बीस से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।  दीपक शर्मा ने अपने कहानी लेखन की शुरुआत पंजाबी में की। सन् 1979 में इनकी पहली हिन्दी कहानी ‘‘कोलम्बस अलविदा’’ पत्रिका ‘‘धर्मयुग’’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद दीपक शर्मा ने हिन्दी कहानी का जो दामन पकड़ा आज भी उसे मज़बूती से थामे रहीं।  

इस कहानी संग्रह में गगन गिल की संक्षिप्त तथा मधु बी. जोशी की विस्तृत भूमिका पढ़ने के बाद इसमें संग्रहीत कहानियों के प्रति जिज्ञासा का विस्फोट होना स्वाभाविक है। एक आतुरता जाग उठती है इन सोलह कहानियों की सोलह दुनियाओं से गुज़रने की। संग्रह में मौजूद सोलह कहानियों में पहली कहानी है-‘‘चमड़े का अहाता’’। यह एक मानवीय विमर्श की कहानी है। इसमें एक ऐसा अहाता है जो हमारे आस-पास उपस्थित है एक ‘अंडरवर्ल्ड’ की तरह। लेकिन यह किसी माफिया अंडरवर्ल्ड नहीं है बल्कि हमारे कथित सम्य समाज के राजमार्ग के ठीक बीचो-बीच बने सीवेज़ के मेनहोल के ठीक नीचे है। एक सुगबुगाती, बजबजाती हुई दुनिया। चमड़े के शोधन कार्य की दुर्गन्धयुक्त दुनिया। जहां जानवरों की खालें खरीदी जाती हैं और उन्हें ‘चमड़ा’ बना कर बेचा जाता है। इस दुनिया में चर्मशोधन से भी अधिक दुर्गन्ध उस अपराध की है जो कि घृणित सामाजिक अपराध है, कन्या-वध का। चर्मशोधन की रासायनिक द्रव से भरी टंकियां चमड़ा शोधने के चुनौती भरे काम की गवाही होने के साथ ही उस अपराध की भी गवाह हैं जो कभी नहीं होना चाहिए था। एक चुभता हुआ पारस्परिक संवाद ही इस अपराध को एक झटके में बेनक़ाब कर देता है -

‘‘मैं सब जानता हूं’’ भाई फिर हंसा, ‘‘मैं किसी से नहीं डरता। मैंने एक बाघिनी का दूध पिया है, किसी चमगीदड़ी का नहीं।’’

‘‘तुमने चमगीदड़ी किसे कहा?’’ सौतेली मां फिर भड़कीं।

‘‘चमगीदड़ी को चमगीदड़ी कहा है।’’ भाई ने सौतेली मां की दिशा में थूका,‘‘तुम्हारी एक नहीं दो बेटियां टंकी में फेंकी गईं, पर तुम्हारी रंगत एक बार नहीं बदली। मेरी बाघिनी मां ने जान दे दी, मगर जीते जी किसी को अपनी बेटी का गला घोंटने नहीं दिया।’’ 

दीपक शर्मा की कहानियों को पढ़ते समय हिन्दी कहानी के उस इतिहास पर भी संक्षिप्त दृष्टिपात कर लेना चाहिए जहां से हिन्दी कहानी ने नई कहानी का स्वरूप ग्रहण किया। वह नई कहानी विधा जिसकी छाप दीपक शर्मा की कहानियों में स्पष्ट दिखाई देती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ की कड़ी में हिन्दी भाषा के उन्नयन और गद्य-विधाओं के सूत्रपात ने जिस भाषाई जनतांत्रिक का निर्वाह करते हुए साहित्य रचना की नींव रखी, उसका स्वर आज की रचनाओं में भी सुनाई देता है। 

सन् 1954 के ‘कहानी विशेषांक’ ने नई कहानी की वैचारिक भूमि पहले ही स्थापित कर दी थी। अमरकांत की कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ और कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ लिखी जा चुकी थीं। इसी क्रम में मोहन राकेश का कहानी संग्रह ‘नए बादल’ सन् 1956 में आया। इसी दौर में निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ और भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’ और उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ पर चर्चाएं शुरू हो चुकी थीं। इन्हीं कहानियों को नई कहानी की प्रारंभिक कहानियों में गिना जाता है। इनके अलावा ‘कहानी’ और ‘नई कहानियां’ पत्रिकाओं ने इस आंदोलन की अधिकारिक रूप से घोषित पत्रिका थी। 

नई कहानी के मूल बिन्दुओं को अपने अवचेतन में ग्रहण करते हुए दीपक शर्मा ने अपना कथा संसार रचा उसमें सच के उद्घाटन का तीव्र आग्रह दिखाई देता है। उदाहरण के लिए इसी संग्रह की दूसरी कहानी ‘‘प्रेत छाया’’ अतीत में सन् 1928 में ले जाती है जब देश में साईमन कमीशन का लागू किए जाने का जम कर विरोध हो रहा था। लोग खुली सड़कों पर भीड़ की शक़्ल में निकल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। मगर भीड़ हमेशा अनेक चेहरे लिए होती है। ‘‘गो साईमन गो’’ की नारे लगाती भीड में एक लड़के ने अपनी जाई और बहन को खो दिया था। अब जब वह लड़का चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो कर आईसोलेशन के दिन काट रहा होता है तो उसे महसूस होता है कि उसकी जाई उससे मिलने आई है, एक प्रेतछाया की भांति। अपनों को खोने की पीड़ा और एक उद्देश्यपूर्ण देशव्यापी विरोध के बीच की अंतर्कथा। यह कहानी अपने छोटे से आकार में बड़ी-सी कथा समेटे हुए है, गोया यह कहानी नहीं अपितु एक ‘मेमोरी चिप’ हो। 

संग्रह में एक कहानी है ‘‘मां का दमा’’। यह सूत और सूती कपड़ा डाई करने वाले कारखाने में काम करने वाली स्त्रियों में से एक मंा की कहानी है। अस्वस्थकर वातावरण में काम करती महिलाएं चौतरफा मुसीबतें झेलती हैं। बेटे की ओर से कही गई इस कहानी में बेटा बताता है कि उसकी मां को दमा हो गया था जिस पर उसके पिता मां को ‘‘घोंघी’’ कह कर पुकारते थे। मां की पीड़ा का अपमान करता सम्बोधन। जबकि इसमें भला मां का क्या दोष था? लड़के ने स्वयं अपनी आंखों से कारखाने की दशा देखी थी-‘‘मां के कारखाने में काम चालू है। गेट पर मां का पता पूछने पर मुझे बताया जाता है, वे दूसरे हॉल में मिलेंगी, जहां केवल स्त्रियां काम करती हैं। जिज्ञासावश मैं पहले हॉल में जा टपकता हूं। यह दो भागों में बंटा है। एक भाग में गट्ठों में कस कर लिपटाई गई ओटी हुई कपास मशीनों में चढ़ कर तेजी से सूत में बदल रही है, तो दूसरे भाग में बंधे सूत के गट्ठर करघों में सवार हो कर सूती कपड़ों का रूप धारण कर रहे हैं। यहां सभी कारीगर पुरुष हैं। ...दूसरे हॉल का दरवाज़ा पार करते ही क्लोरीन की तीखी बू मुझसे आन टकराती है। भाप की कई-कई ताप तरंगों के संग मेरी नाक और आंखें बहने लगती हैं। थोड़ा प्रकृतिस्थ हो कर देखता हूं, भाप एक चौकोर हौज से मेरी ओर लपक रही है। हौज में बल्लों के सहारे सूती कपड़े की अट्टियां नीचे भेजी जा रही हैं। हॉल में स्त्रियां ही स्त्रियां हैं। उन्हीं में से कुछ ने अपने चेहरों पर मास्क पहन रखे हैं, ऑपरेशन करते समय डॉक्टरों और नर्सों जैसे।’’

स्वास्थ्य के लिए ऐसे घातक वातावरण में काम करने वाली स्त्रियों की पीड़ा को उनके निकट जा कर महसूस करने के बाद लिखी गई कहानी स्त्रीविमर्श का एक अलग ककहरा रचती है। 

दीपक शर्मा की संवेदनशीलता अपनी हर कहानी की भांति इस कहानी में भी बखूबी उभर की सामने आई है। कहानी ‘‘बापवाली’’ स्त्री के प्रति होने वाले घरेलू अत्याचारों का लेखा-जोखा सामने रखती है तो कहानी ‘‘ऊंट की पीठ’’ दहेज-लोलुपता और इस कुप्रथा को सवीकार करने वाले एक आम से पिता की मन को आलोड़ित करने वाली कहानी है।

कहानी ‘‘पुरानी फांक’’ संबंधों के जटिल समीकरण की अनूठी कहानी है। इस कहानी का एक संवाद देखिए जो अपने-आप में बहुत कुछ उद्घाटित करने में सक्षम है-

‘‘तुम्हें अपने वर्तमान को अनुभवों से भर लेना चाहिए।‘‘ सुहास मेरी ओर देख कर मुस्कुराता है,‘‘चूंकि तुम्हारे पास नए अनुभवों की कमी है, इसलिए तुम आने वाले अनुभवों को मनगढ़ंतपूर्वक धरण करती हो या फिर बीत चुके अनुभवों का पुनर्धारण। तुम्हें केवल अपने वर्तमान को भरना चाहिए।’’

‘‘वर्तमान?’’ घबराकर मैं अपनी आंखें मंजू दीदी के चेहरे पर गड़ा लेती हूं। मेरा वर्तमान? खिड़की के उस तरफ का एक भीषण रणक्षेत्र? और इस तरफ एक तलाक़शुदा छब्बीस वर्षीय रईसज़ादे के साथ एक कच्चा रिश्ता? दोनों तरफ एक ठीठ अंधेरा।’’

लेखिका ने मानवीय संबंधों के ज्यामितीय समीकरणों को ‘‘माना कि’’ की कल्पना से परे हट कर यथार्थ के पैमाने से नापते हुए प्रस्तुत किया है। कहानी ‘‘पिछली घास’’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। पांच संतानों वाला परिवार। जिसमें पिता की देहलोलुपता एक विध्वंस रचती है। पिता एक रिश्तेदार लड़की से बलात संबंध बनाता है जिसके परिणामस्वरूप छठीं संतान का जन्म होता है। उस लड़की और छठी संतान को पिता अपनी पत्नी और बेटी के रूप में अपना लेता है किन्तु बेटे के लिए यह सब सहज नहीं है। वह विद्रोही हो उठता है। पिता की धौंस से त्रस्त हो कर पिता को पुलिस की धमकी देता है, लिहाज़ा पिता अपनी वास्तविक पत्नी और पांचों बच्चों को छोड़ कर अपनी अवैध पत्नी और छठी संतान को ले कर फरार हो जाता है। इसके बाद वह परिवार संकटों के किस मुहाने पर जा खड़ा होता है और कैसे उनके सपनों की पर्तें उधड़ती चली जाती हैं, इसे कहानी को पढ़ कर ही अनुभव किया जा सकता है। 

संग्रह की कहानियों में लेखिका का एक काल्पनिक स्थान है-कस्बापुर। यह स्थान गांव है, कस्बा, है शहर है और यहां तक कि देश का प्रतिबिम्ब भी है। कस्बापुर एक ऐसा गह्वर है जिसमें समाज की सारी समस्याएं और विडम्बनाएं समाई हुई हैं। एक जाना-पहचाना संसार रचता है कस्बापुर, जो संग्रह की कई कहानियों में मौजूद है। दीपक शर्मा भाषाई मायाजाल नहीं रचती हैं, वे सरल, बोलचाल के शब्दों में अपनी कहानियां लिखती हैं। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, अवधी, पंजाबी के शब्द बिना किसी विशेष आग्रह के स्वाभाविक रूप से अपनी जगह लेते जाते हैं। यही उनकी कहानियों का भाषाई सौंदर्य है जो कहानियों को एक प्रवाह में पठनीय बना देता है। कुल मिला कर ‘‘पिछली घास’’ को एक मूल्यावत्तापूर्ण कहानी संग्रह कहा जा सकता है।            

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