Tuesday, November 30, 2021

पुस्तक समीक्षा | संवाद के विविध स्वर रचता काव्य संग्रह | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 30.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी के काव्य संग्रह "संवाद शीर्षक से" समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
संवाद के विविध स्वर रचता काव्य संग्रह  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - संवाद शीर्षक से
कवि        - ईश्वर दयाल गोस्वामी
प्रकाशक     - उत्कर्ष प्रकाशन, 142, शाक्यपुरी, कंकर खेड़ा, मेरठ कैण्ट (उप्र)
मूल्य        - 150/-
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कोरोना काल साहित्य जगत के समक्ष भी एक अवरोध बन कर सामने आया लेकिन साहित्य तो जल की धारा के समान है जो अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है। एक राह पर अवरोध उत्पन्न हो जाए तो दूसरी राह निकल ही आती है। यदि इतिहास के पन्नों को पलटें तो अंग्रेजों के जमाने में देशभक्ति के पक्ष में साहित्य लिखना प्रतिबंधित था। लेखक की पहचान हो जाने पर उसे कठोर दंड दिया जाता। अतः उस दौर में लेखकों, कवियों ने छद्म नाम से रचनाएं लिखीं। ताकि जब तक अंग्रेज सरकार असली सृजनकर्ता को ढूंढ पाए तब तक रचना में निहित संदेश जन-जन तक पहुंच जाए। कोरोना काल में जब रचनाकार परस्पर प्रत्यक्ष नहीं मिल पा रहे थे तब आॅनलाईन गोष्ठियों, संगोष्ठियों एवं कविसम्मेलनों का रास्ता निकाला गया। लेकिन साहित्य सृजन का एक पक्ष और भी है जिसे तात्कालिक क्षति पहुंची। वह पक्ष उन पुस्तकों का है जो कोरोना काल के ठीक पहले अथवा थोड़े पहले प्रकाशित हुई थीं। उनमें से कई पुस्तकें पर्याप्त चर्चा का विषय नहीं बन सकीं और कोरोना काल की गत्र्त में समा गईं। साहित्य जगत में अनेक साहित्यकार अभी भी ऐसे हैं जो इंटरनेट और आधुनिक तकनीक से भली-भांति परिचित नहीं हैं। ऐसे साहित्यकार भी अपनी कृतियों को सब के सामने नहीं ला सके। कुछ पुस्तकों की चर्चा हुई लेकिन उतनी नहीं जितनी कि उन पर चर्चा होनी चाहिए थी। ऐसी ही एक पुस्तक है ‘‘संवाद शीर्षक से’’। यह एक काव्य संग्रह है जिसमें कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने अपनी समकालीन कविताएं, नवगीत, गीत तथा गीतिकाओं को संग्रहीत किया है। यह सन् 2017 में प्रकाशित हुई। सागर जिले की रहली तहसील के छिरारी गांव में निवासरत ईश्वर दयाल गोस्वामी के इस काव्य संग्रह की सन् 2018-19 में तनिक चर्चा हुई लेकिन 2020 आते-आते कोरोना काल ने परिदृश्य ही बदल दिया। साहित्य के सतत् संवाद में एक ठहराव-सा आ गया। परिदृश्य बदलते-बदलते नवीन कृतियों की बाढ़ में तनिक पुरानी कृतियां पीछे छूटने लगीं। किन्तु सच यही है कि साहित्य कभी पुराना नहीं होता है, उसकी समसामयिकता सदा बनी रहती है। ‘‘संवाद शीर्षक से’’ की समसामयिकता भी अक्षुण्ण है।
‘‘संवाद शीर्षक से’’ काव्य संग्रह में रचनाओं को शैलीगत विभाजन करते हुए कुल पांच खण्डों में प्रस्तुत किया गया है। पहला खण्ड है समकालीन कविताओं का। जिसमें कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने अपनी समकालीन कविताओं को प्रस्तुत किया है। ये कविताएं समाज, परिवार, परिवेश और प्रेम से सीधा संवाद करती हैं। ‘‘प्रेम’’ शीर्षक की ही कविता देखें जिसमें प्रेम का एक नितांत व्यवहारिक स्वरूप कवि ने शब्दबद्ध किया है-
तुम्हें पाना ही
सब कुछ नहीं है
जीवन सार्थक
भी नहीं होता
केवल तुम्हें /पा लेने से!
बल्कि बहुत 
कुछ त्यागना
सहना और 
खोना पड़ता है
तुम्हें पाने के बाद/तुम्हारे लिए।

समकालीन कविता अथवा अतुकांत कविता लिखना जितना सहज लगता है, वस्तुतः उतना होता नहीं है। गद्य की पंक्तियों को तोड़-तोड़ कर लिख देना मात्र नहीं है समकालीन कविता। इस प्रकार की कविताओं की अपनी एक अलग संवाद क्षमता होती है। एक अलग लयबद्ध शिल्प होता है और होती है शब्दों की मज़बूत पकड़। दृश्यात्मकता भी इस तरह की कविताओं की खूबी होती है। इसी संदर्भ में उदाहरण के लिए ‘‘भय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां पढ़ कर महसूस कीजिए इसमें निहित मर्म को-
ये केवल किवाड़ नहीं
ये जब बोलते हैं
तो सहम जाती है मां
ये जब हिलते हैं 
तो ठिठक से जाते हैं पिता
इनका बंद रहना अखरता है
हर किसी को / मित्रों को
रिश्तेदारों को।
ये हिलें या हिलाए जाएं
ये खुलें या खोले जाएं
तो एक अनचाहा-सा
अनजाना-सा
भय आ कर सिमट जाता है
सांकल और कुंदे के दरमियान।

संग्रह में दूसरा खंड है नवगीत का। नवगीत के संस्थापक कवियों में राजेन्द्र प्रसाद सिंह और शंभुनाथ सिंह का नाम लिया जाता है। राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ‘‘नई कविता’’ के समानांतर रचे जा रहे गीतों की भिन्न प्रकृति एवं रचना विधान को रेखांकित करने वाले नए गीतों के प्रथम संकलन ‘‘गीतांगिनी’’ (1958) का संपादन किया और उसकी भूमिका में ‘‘नवगीत’’ के रूप में नए गीतों का नामकरण एवं लक्षण निरूपित किया। इसके बाद डॉ. शंभुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित तीन खंडों में ‘‘नवगीत दशक’ शीर्षक पूरे भारत से चुने हुए तीस प्रमुख नवगीतकारों की दस-दस नवगीत रचनाओं के ऐतिहासिक समवेत संकलन का प्रकाशन हुआ। जिससे नवगीत को सुदृढ़ स्थापना मिली। नवगीत के पुरोधा कवियों में से एक देवेन्द्र शर्मा ‘‘इन्द्र’’ ने नवगीत का सटीक परिचय दिया है कि - ‘‘प्रत्येक नवगीत पहले गीत है, किन्तु प्रत्येक गीत नवगीत नहीं है।’’ नवगीत के मूल चरित्र को आत्मसात करते हुए कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने नवगीत को साधने का प्रयास किया। फिर संभवतः उनका स्वयं ही मोहभंग हो गया नवगीत से। उनके तीन नवगीत ही इस संग्रह में हैं। ‘‘आदमी’’ शीर्षक नवगीत की ये कुछ पंक्तियां बानगी स्वरूप प्रस्तुत हैं-
श्यामपट पर/ अक्षरों-सा
नहीं चमकता आदमी।
अक्षरों पर श्यामपट-सा
काला दिखता
ज़हर जमाने का 
है काग़ज़ पर लिखता
अंधकार में /जुगनू जैसा
नहीं चमकता आदमी।

संग्रह के तीसरे खंड में गीत रखे गए हैं। ईश्वर दयाल गोस्वामी के गीत नवगीत की अपेक्षा सशक्त हैं फिर भी उनके कुछ गीतों में नवगीत का द्वंद्व दिखाई देता है। वे गीत में नवगीत के शिल्प को आरुढ़ कर बैठते हैं। किन्तु उनके कुछ गीत बेहद सशक्त और मर्मस्पर्शी हैं। इन्हीं में से एक है ‘‘फिर से बचपन आ जाता’’ गीत। पंक्तियां देखिए-
जाने क्यों लगता है मुझको
फिर से बचपन आ जाता
खोई हुई खुशी जीवन की
और प्यार मैं पा जाता।

रोज बनाना नए घरौंदे
और मिटाना फिर उनको
बचपन की वो भोली सूरत
अच्छी लगती थी सबको
उसे याद कर अब भी मेरा
मन गुलाब-सा खिल जाता।

अरबी-फ़ारसी से उर्दू में और उर्दू से हिन्दी में ग़ज़ल कब और कैसे आई यह एक लम्बी चर्चा का विषय है। चूंकि समीक्ष्य संग्रह में कवि ईश्वर दयाल गोस्वामी ने अपनी ग़ज़लों को ‘‘गीतिका’’ नामक चौथे खंड में सहेजा है इसलिए यहां उल्लेख करना समीचीन होगा कि सबसे पहले कवि गोपाल दास ‘‘नीरज’’ ने हिन्दी गजल को ‘‘गीतिका’’ नाम दिया था। ‘‘फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन’’ - यह है उर्दू में बहरे-‘रमल’ अथवा हिन्दी में ‘गीतिका’ छंद। हिन्दी के गणों के अनुसार इस छन्द के गण होंगे- रगण, तगण, मगण, यगण और रगण। यानीकि उर्दू में इस छन्द या बहर को ‘रमल’ और हिन्दी में ‘गीतिका’ कहेंगे। यह विवाद भी हमेशा रहा है कि हिन्दी ग़ज़ल को गीतिका कहना उचित है या नहीं। बहरहाल, यदि ‘‘संवाद शीर्षक से’’ की गीतिकाओं को देखें तो वे निःसंदेह अपने शीर्षक से ही नहीं वरन् समूचे समाज से संवाद करती दिखाई पड़ती हैं। जैसे एक गीतिका है ‘‘बेटियां’’। इसके कुछ बंद देखें-
दो नदियों का मेल कराती हैं बेटियां
प्यार  की  धारा  बहाती  हैं बेटियां 
संजीदगी से करती हैं कठिनाइयों को पार
सहयोग का दस्तूर चलाती हैं बेटियां

इसी छंद में आबद्ध एक और गीतिका है ‘‘लेखनी’’। इसकी भी चंद पंक्तियां देखें-
कर्त्तव्य का  ही  बोध  कराती है लेखनी
इस देह  को  मनुष्य  बनाती है लेखनी
अंतर की वेदना न कवि क्यों मुखर करे
पथ-पथ पे नेह पुष्प  बिछाती है लेखनी 

संग्रह के पांचवे खंड में ‘‘विविध’’ के रूप में कुछ और रचनाएं हैं जिनके बारे में संभवतः स्वयं कवि गोस्वामी सुनिश्चित नहीं हो सके उन्हें वे किस विधा खंड में रखें। ईश्वर दयाल गोस्वामी में काव्यात्मक सृजन की विपुल संभावनाएं हैं। बस, उन्हें आवश्यकता है ठहर का विचार करने की कि वे काव्य के किस शिल्प को पूरी तरह पहले साधना चाहते हैं। वैसे, विविधता पूर्ण काव्यात्मक संवाद करता यह काव्य संग्रह पठनीय है, स्वागत योग्य है और कवि की भावी सृजनधर्मिता के प्रति विश्वास जगाता है।     
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Wednesday, November 24, 2021

चर्चा प्लस | एक गंभीर चूक बनाम पाक्सो एक्ट | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
एक गंभीर चूक बनाम पाक्सो एक्ट
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
     कई बार एक कानूनी चूक एक ग़लत नज़ीर बन कर अनेक अपराधियों के बच निकलने का रास्ता जरूर बना देती है। यह तो गनीमत कि महाराष्ट्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और अटॉर्नी जनरल ने अपील दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने बाॅम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को ख़ारिज कर के पीड़ित को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। बच्चों को नृशंस अपराधों से बचाने के लिए तथा उन्हें न्याय दिलाने के लिए आम जनता को भी पाक्सो एक्ट की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि कानून की जानकारी अपराध का विरोध करने की शक्ति देती है।
सन् 2012 में बच्चों को यौनहिंसा से बचाने के लिए और अपराधियों को दंड देने के लिए एक कानून बनाया गया। जिसे ‘‘पाक्सो एक्ट’’ ( प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट) के नाम से जाना जाता है। इसका आशय ही है कि बच्चों को हर तरह की यौन हिंसा से बचाना। लेकिन यह कानून कमजोर पड़ गया जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने ‘‘स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट’’ न होने के आधार पर अपराधी को दोषमुक्त करार दे दिया। लेकिन जो मामले निचली अदालतों में या हाईकोर्ट में लड़खडा जाते हैं उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में ही पहुंच कर न्याय मिलता है। इस मामले में भी यही हुआ। कानून बॉम्बे हाई कोर्ट की ओर से रेप केस को लेकर दिए स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट वाले फैसले को 2021,नवम्बर के दूसरे सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय के इस फैसले को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि पॉक्सो एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न का अपराध तभी माना जा सकता है, जब आरोपी और पीड़िता के बीच स्किन कॉन्टेक्ट हुआ हो। अदालत के इस फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और अटॉर्नी जनरल ने अपील दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए ही जस्टिस उदय उमेश ललित, जस्टिस एस. रविंद्र भट और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की बेंच ने फैसले को खारिज कर दिया है। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने हाई कोर्ट के फैसले को बेतुका बताते हुए साफ़ शब्दों में कहा कि ‘‘पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध मानने के लिए फिजिकल या स्किन कॉन्टेक्ट की शर्त रखना हास्यास्पद है और इससे कानून का मकसद ही पूरी तरह से खत्म हो जाएगा, जिसे बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया है।’’ कोर्ट ने कहा कि इस परिभाषा को माना गया तो फिर दस्ताने पहनकर रेप करने वाले लोग अपराध से बच जाएंगे। यह बेहद अजीब स्थिति होगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि नियम ऐसे होने चाहिए कि वे कानून को मजबूत करें न कि उनके मकसद को ही खत्म कर दें। इस तरह कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया कि यौन उत्पीड़न के मामले में स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट के बिना भी पॉक्सो एक्ट लागू होता है।
दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने यौन उत्पीड़न के एक आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया गया था कि नाबालिग के निजी अंगों को स्किन टू स्किन संपर्क के बिना टटोलना पॉक्सो एक्ट के तहत नहीं आता। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इस मुद्देे को सुप्रीम कोर्ट में उठाया था। सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को बदलते हुए ये फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि सेक्सुअल मंशा से शरीर के सेक्सुअल हिस्से का स्पर्श पॉक्सो एक्ट का मामला है। यह नहीं कहा जा सकता कि कपड़े के ऊपर से बच्चे का स्पर्श यौन शोषण नहीं है। ऐसी परिभाषा बच्चों को शोषण से बचाने के लिए बने पॉक्सो एक्ट के मकसद ही खत्म कर देगी।
महिला और बाल विकास मंत्रालय ने पॉक्सो एक्ट-2012 को बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए बनाया गया था। वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है। जिसका कड़ाई से पालन किया जाना भी सुनिश्चित किया गया है। इस अधिनियम की धारा 4 के तहत वो मामले शामिल किए जाते हैं जिनमें बच्चे के साथ दुष्कर्म या कुकर्म किया गया हो। इसमें सात साल सजा से लेकर उम्रकैद और अर्थदंड भी लगाया जा सकता है।
पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अधीन वे मामले लाए जाते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म या कुकर्म के बाद गम्भीर चोट पहुंचाई गई हो। इसमें दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के प्राईवेटपार्ट से छेडछाड़ की गई हो। इस धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर पांच से सात साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को भी परिभाषित किया गया है। जिसमें बच्चे के शरीर के साथ किसी भी तरह की हरकत करने वाले शख्स को कड़ी सजा का प्रावधान है। दरअसल, 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का यौन व्यवहार इस कानून के दायरे में आ जाता है। यह कानून लड़के और लड़की को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करता है। इस कानून के तहत पंजीकृत होने वाले मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है। पॉक्सो एक्ट लागू किए जाने के बाद बारह वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म में फांसी की सजा का प्रावधान रखा गया था, किन्तु बाद में अनुभव किया गया कि बालकों को भी इस एक्ट के तहत न्याय दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसीलिए एक्ट में संशोधन किया गया और बालकों को भी यौन शोषण से बचाने और उनके साथ दुराचार करने वालों को फांसी की सजा का प्रावधान तय किया गया। इसके अंतर्गत केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने लड़की-लड़कों दोनों यानी बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉस्को) 2012 में संशोधन को मंजूरी दे दी। संशोधित कानून में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने पर मौत की सजा तक का प्रावधान है। इसके अलावा बाल यौन उत्पीड़न के अन्य अपराधों की भी सजा कड़ी करने का प्रस्ताव है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने लड़की-लड़कों दोनों यानी बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के बाल यौन अपराध संरक्षण कानून (पॉक्सो) 2012 में संशोधन को मंजूरी दी है। इस संशोधित कानून में 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म करने पर मौत की सजा तक का प्रावधान है। इसके अलावा बाल यौन उत्पीड़न के अन्य अपराधों की भी सजा कड़ी करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
पाक्सो एक्ट के अन्तर्गत मीडिया के लिए विशेष दिशा निर्देश (प्रावधान) हैं-
1. धारा 20 के अनुसार मीडिया किसी बालक के लैंगिक शोषण संबंधी किसी भी प्रकार की सामग्री जो उसके पास उपलब्ध हो, वह स्थानीय पुलिस को उपलब्ध करायएगा। ऐसा ना करने पर यह कृत्य अपराध की श्रेणी में माना जाएगा।
2. कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार के मीडिया या स्टूडियों या फोटोग्राफी सुविधाओं से पूर्ण और अधिप्रमाणित सूचना के बिना किसी बालक के सम्बन्ध में कोई रिपोर्ट या उस पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा, जिससे उसकी प्रतिष्ठा हनन या उसकी गोपनीयता का उल्लंघन होता हों।
3. किसी मीडिया से कोई रिपोर्ट बालक की पहचान जिसके अन्तर्गत उसका नाम, पता, फोटोचित्र परिवार के विवरणों, विधालय, पङौसी या किन्हीं अन्य विवरण को प्रकट नहीं किया जायेगा।
4. परन्तु ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किये जाने के पश्चात सक्षम विशेष न्यायालय की अनुमति प्राप्त कर किया जा सकेगा यदि उसकी राय में ऐसा प्रकरण बालक के हित में है।
5. मीडिया स्टूडियों का प्रकाशक या मालिक संयुक्त रूप से और व्यक्तिगत रूप से अपने कर्मचारी के कार्यों के किसी कार्य के लिए उत्तरदायी होगा। इन प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 6 माह से 1 वर्ष के कारावास या जुर्माने या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
पॉक्सो एक्ट में मेडिकल जांच के लिए निर्देश है कि पीड़ित का मामला 24 घंटो के अन्दर बाल कल्याण समिति के सामने लाया जाए। जिससे पीड़ित की सुरक्षा के लिए जरुरी कदम उठाये जा सके। इसके साथ ही बच्चे की मेडिकल जाँच करवाना भी अनिवार्य हैं । ये मेडिकल परीक्षण बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जायेगा जिस पर बच्चे का विश्वास हो और पीड़ित अगर लड़की है तो उसकी मेडिकल जांच महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए।
पाक्सो अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं हैं कि इस अधिनियम में बच्चों को 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों के रूप में परिभाषित किया गया है।यह अधिनियम लिंग तटस्थ है, इसका अर्थ यह है कि अपराध और अपराधियों के शिकार पुरुष, महिला या तीसरे लिंग हो सकते हैं। यह एक नाबालिग के साथ सभी यौन गतिविधि को अपराध बनाकर यौन सहमति की उम्र को 16 साल से 18 साल तक बढ़ा देता है। अधिनियम में यह भी बताया गया है कि यौन शोषण में शारीरिक संपर्क शामिल हो सकता है या शामिल नहीं भी हो सकता है। अधिनियम बच्चे के बयान को दर्ज करते समय और विशेष अदालत द्वारा बच्चे के बयान के दौरान जांच एजेंसी द्वारा विशेष प्रक्रियाओं का पालन करता है। सभी के लिए अधिनियम के तहत यौन अपराध के बारे में पुलिस को रिपोर्ट करना अनिवार्य है, और कानून में गैर-रिपोर्टिंग के लिए दंड का प्रावधान शामिल किया गया है। इस अधिनियम में यह सुनिश्चित करने के प्रावधान हैं कि एक बच्चे की पहचान जिसके खिलाफ यौन अपराध किया जाता है, मीडिया द्वारा खुलासा नहीं किया जायेगा। बच्चों को पूर्व-परीक्षण चरण और परीक्षण चरण के दौरान अनुवादकों, दुभाषियों, विशेष शिक्षकों, विशेषज्ञों, समर्थन व्यक्तियों और गैर-सरकारी संगठनों के रूप में अन्य विशेष सहायता प्रदान की जाए। बच्चे अपनी पसंद या मुफ्त कानूनी सहायता के वकील द्वारा कानूनी प्रतिनिधित्व के हकदार हैं। इस अधिनियम में पुनर्वास उपाय भी शामिल हैं, जैसे कि बच्चे के लिए मुआवजे और बाल कल्याण समिति की भागीदारी शामिल है।
कई बार एक कानूनी चूक एक ग़लत नज़ीर बन कर अनेक अपराधियों के बच निकलने का रास्ता जरूर बना देती है। यह तो गनीमत कि महाराष्ट्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग और अटॉर्नी जनरल ने अपील दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने बाॅम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को ख़ारिज कर के पीड़ित को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। बच्चों को नृशंस अपराधों से बचाने के लिए तथा उन्हें न्याय दिलाने के लिए आम जनता को भी पाक्सो एक्ट की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि कानून की जानकारी अपराध का विरोध करने की शक्ति देती है।
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Tuesday, November 23, 2021

पुस्तक समीक्षा | भावनाओं के कैनवास पर शब्दचित्र रचती कविताएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 23.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि नवीन कानगो के काव्य संग्रह "बादलों में उड़ती धूप" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
भावनाओं के कैनवास पर शब्दचित्र रचती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - बादलों में उड़ती धूप
कवि        - नवीन कानगो
प्रकाशक     - सतलुज प्रकाशन, एस.सी.एफ.267 (द्वितीय तल), सेक्टर-16, पंचकूला (हरियाणा)
मूल्य        - 350/-
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कविता एक ऐसी नदी है जो व्यथित मन की शिला पर कभी काई नहीं जमने देती है। व्यथा व्यक्तिगत हो या चाहे लोक की, कविता उससे स्वतः सरोकारित हो उठती है, बशर्ते कवि सजग हो, अपने परिवेश के प्रति चैतन्य हो और घटित-अघटित सबका सूक्ष्मता से अवलोकन कर रहा हो। जब हर व्यक्ति अपने-आप में सिमटा रहना चाहता हो, वह भी ग्लोबल होने का छद्म रचता हुआ, ऐसे दुरुह समय में कविकर्म की चुनौतियां बढ़ जाती हैं। एक साथ कई मोर्चे खुल जाते हैं। वह अपने मन की कहना चाहता है और जन के मन की भी, वह प्रकृति को शब्दों की छेनी (चीसेल) से उकेरना चाहता और बदरंग अव्यवस्था को भी कविता के कैनवास पर संवेदनाओं की कूची (ब्रश) से उतारना चाहता है। नवीन कानगो एक ऐसे युवा कवि हैं जो अपनी कविताओं में रंग, लोक, संवेदना, वेदना और चेतना सभी की एक साथ चर्चा करते हैं ठीक वैसे ही जैसे नारियल की रस्सी में अनेक रेशे एक साथ गुंथे होते हैं और एक मज़बूत रस्सी गढ़ते हैं। नवीन कानगो भी सशक्त कविताओं को रचते हैं और अपनी कविताओं के माध्यम से वे प्रकृति और जनजीवन को एक साथ सहेजते हैं। ‘‘बादलों में उड़ती धूप’’ नवीन कानगो का प्रथम काव्य संग्रह है। इसमें उनकी अतुकांत कविताएं और ग़ज़लें दोनों ही उपस्थित हैं। दो भिन्न शैलियों के काव्य को एक ही संग्रह में सहेजना कई बार जोखिम भरा होता है क्योंकि दो भिन्न शैलियां एक ऐसा कंट्रास्ट पैदा करती हैं जिससे पाठक के लिए तय करना कठिन हो जाता है कि कवि की किस शैली को वह तरज़ीह दे। लेकिन नवीन कानगो के साथ यह स्थिति निर्मित नहीं हुई है। उनकी दोनों शैलियां अर्थात् अतुकांत कविताएं और ग़ज़लें दोनों ही समान रूप से सधी हुई हैं, परिपक्व हैं।
नवीन कानगो की कविताओं में एक सुंदर, मनोहरी दृश्यात्मकता है जो पढ़ते ही उन रंगों से साक्षात्कार कराने लगती है जिन्हें इन्द्रधनुष ने उपेक्षा से अपने पीछे छुपा लिया है, क्योंकि ये चटख नहीं वरन जीवन के सच्चाई के धूसर रंग हैं। संग्रह की पहली कविता ‘‘चितेरा’’ में इस प्रभाव को बखूबी अनुभव किया जा सकता है-
कैनवास की परिधि और
रंगों के नामों से जूझते
रुके कांपते हाथ
बेमौसम बारिश का मोहताज़ चितेरा
खुरदुरे बंजर खेत में लोटता है
उसे अपनी देह से जोतता है
फिर बादलों की बाट जोहता है
स्वयं देह से खेत हो जाता है
गेंहूं की एक बाली के लिए
उसे चुगने वाली एक चिड़िया के लिए।

नवीन की इस कविता को पढ़ते हुए सहसा स्पेनिश कवि रेफाएल अल्बेर्ती की यह छोटी-सा कविता याद आ जाती है-‘‘ जब गेंहूं मेरे लिये नक्षत्रों की रहने की जगह था/और देवता तथा तुषार चिंकारा के जमे आंसू/किसी ने मेरे हृदय तथा छाया पर पलस्तर किया था/मुझे धोखा देने के लिए’’। अल्बेर्ती की यह लोकधर्मिता नवीन कानगो की कविताओं में स्पष्ट देखी जा सकती है। इसी तारतम्य की एक और कविता है-‘‘आज’’। इस कविता में कवि व्यक्ति को तोड़ देने में सक्षम वर्तमान जीवनदशा की कठिनाइयों का सांकेतिक आख्यान सामने रखता है-
अख़बार छोड़ कर
खुद को पलट कर देखा तो
वक़्त की मार से ज़र्द पड़े सफ़्हे
बिफर पड़े
सर्द आहों और आंसुओं की लम्बी फ़ेहरिस्त में   
कहीं-कहीं तुम मुस्कुराए भी थे
यह भी ठीक ही है कि
हरदम रहती घबराहट कहीं दर्ज़ न थी
ज़रा ठहर कर चौंकाती है
पियाले के साथ रंग बदलती
रोज़ एक एहसान उतारती
एक और दिए काम को ख़त्म करती
ज़िन्दगी।

‘‘रहगुज़र’’ शीर्षक की दो कविताएं हैं, एक तनिक लम्बी और दूसरी मात्र पांच पंक्तियों की। ‘‘रहगुज़र-1’’ की प्रथम पांच पंक्तियां देखिए-
कपड़ा मारना
समय-समय पर
समय की आलमारी में पड़े
स्मृतिचिन्हों, तस्वीरों और
औंधी पड़ी यादों पर

इसके बाद दृष्टिपात करिए ‘‘रहगुज़र-2’’ कविता पर -
इस तरह याद आते हो तुम कभी-कभी
जैसे एक राह
जिससे बस यों ही गुज़रे थे
मगर फिर भी वह
शहर की पहचान हो गई

दोनों कविताएं स्मिृतियों की थाती की बात करती हैं। प्रथम कविता अतीत पर से धूल झाड़ कर स्मृतियों को ताज़ा करने के प्रयास पर तो दूसरी कविता लोक स्मृति में समाहित हो जाने की अप्रयास घटित घटना पर है। दोनों कविताओं के बिम्ब एक सुंदर कोलाज़ बनाते हैं जिसमें किसी भी व्यक्ति की स्मृतियों का आकार उभर सकता है। यही खूबी इन दोनों कविताओं को सशक्त बनाती है।
सीख़चें सीमाओं का प्रतीक होते हैं। यह बंधनकारी स्थिति को जन्म देते हैं अतः यदि बंधन हो तो उसका अनुपस्थित होना ही श्रेयस्कर होता है। इसलिए कवि का कहना है कि ‘‘अनुपस्थिति’’ भी सुखकर हो सकती है। कविता देखिए-
मेरे झरोखे से
बहुत ख़ूबसूरत दिखते हैं
गुलों से लबरेज़ दरख़्त
बादलों में डूबता-उतराता चांद
मैं शुक्रगुज़ार हूं
उस हवा के झोंके का
जो अनायास ही इसे खोल
चला गया
मैं शुक्रगुज़ार हूं
उस सीख़चें का
जो नहीं है।

कविताओं के बाद नवीन कानगो की उन ग़ज़लों को पढ़ना जो इस संग्रह में संग्रहीत हैं, एक अलग ही ज़मीन पर ले जाता है किन्तु भावनात्मक संवाद यथावत बना मिलता है। जीवन की सच्चाइयों को कुरेदते शेर मन को आंदोलित कर देते हैं। ‘‘उम्र चेहरे पे’’ शीर्षक ग़ज़ल के चंद शेर देखें-
उम्र चेहरे पे दबे पांव इस तरह आई
थम  गया  वक़्त,  जम  गई  काई
वक़्त भी एक वक़्त तक गुज़रता था
अब न  मौसम है  और  न अंगड़ाई

‘‘जब उसका अक्स’’ भी एक खूबसूरत ग़ज़ल है जिसमें रूमानीयत की छटा देखी जा सकती है और संयमित भावनाओं के ज्वार को अनुभव किया जा सकता है-
जब उसका अक्स नज़र आता है
गुज़रता  वक़्त   ठहर  जाता है
वो  मुझसे  कभी बिछड़ा ही नहीं
रोज़  ख़्वाबों  में  नज़र आता है
उसकी  सोहबत की  रहनुमाई है
टूटा, उजड़ा भी  संवर  जाता है

ग़ज़ल और रूमानीयत का तो वैसे भी घनिष्ठ संबंध रहा है। बहुत ही कोमल-सी ग़ज़ल है ‘‘ईद का माहताब’’। इस ग़ज़ल में नफ़ासत भी है और नज़ाकत भी-
ईद  का  माहताब  हो  जैसे
उसका दिखना सवाब हो जैसे
इतनी  ख़मोशियां   समेटे है
उसका पैकर क़िताब हो जैसे
उसको देखा, मगर नहीं देखा
उसका चेहरा नक़ाब हो जैसे

सूक्ष्म जीवविज्ञान (माइक्रो बाॅयोलाॅजी) में पी.एच.डी., नवीन कानगो ने दक्षिण आफ्रिका और फिनलैंड में पोस्ट डाॅक्टोरल अध्ययन किया है तथा वर्तमान में डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में माइक्रो बाॅयोलाॅजी के विभागाध्यक्ष हैं। नवीन कानगो का सर्जनात्मक वैविध्य पाठक के मन को प्रभावित करने में सक्षम है। उनकी  कविताओं में युवादृष्टि के साथ वैचारिक प्रौढ़ता है। उनकी कई कविताएं साबित करती हैं कि उनमें कवि ने गहरे और असाधारण आत्ममंथन का निचोड़ प्रस्तुत किया है। ‘‘बादलों में उड़ती धूप’’ संग्रह की कविताओं में विसंगतियों, जड़ताओं, विवेकहीनता और कुव्यवस्था के प्रति रोष है तो प्रेम की ध्वनि तरंगे भी हैं। विश्वास है कि यह काव्य संग्रह हर पाठक वर्ग को रुचिकर लगेगा।
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Sunday, November 21, 2021

रचनाकार के सामने आज 'लाईक' 'कमेंट' का जोख़िम है - डॉ (सुश्री) शरद सिंह | ऑनलाईन पुस्तक लोकार्पण | गूगल मीट

"जब मैंने लिखना शुरू किया था तब रचना  छपने के लिए भेजते समय अपना पता लिखा और डाक टिकट लगा हुआ लिफाफा साथ में रख कर भेजना पड़ता था। कई बार रचना की "सखेद वापसी" भी झेलनी पड़ती थी। उस समय रचना वापस पाकर गुस्सा तो बहुत आता था लेकिन धीरे-धीरे समझ में आया की यही तो सृजन को मांजने की प्रक्रिया है। लेकिन आजकल सोशल मीडिया के जमाने में रचनाकार अपनी रचनाओं की श्रेष्ठता  'लाइक' 'कमेंट' की संख्या के आधार पर मान बैठता है जो कि सबसे बड़ा जोखिम है, रचना और रचनाकार के लिए।" 
- जी हां, यह अपने विचार व्यक्त. किए मैंने आज एक ऑनलाइन पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में। पुस्तक का नाम है "तिड़क कर टूटना"। यह टीकमगढ़ मध्य प्रदेश की युवा प्रतिभाशाली कवयित्री व लेखिका डॉ अनीता श्रीवास्तव का प्रथम कहानी संग्रह है। इस आयोजन में कई विद्वतजन शामिल हुए जिनमें प्रमुख थे डॉ नमिता सिंह, श्री गिरीश पंकज , डॉ पुनीत बिसारिया, श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव, श्री अखिलेश श्रीवास्तवजी, श्री रामस्वरूप दीक्षित एवं सुश्री शशि खरे। कार्यक्रम का बेहतरीन संचालन किया सुश्री सुषमा व्यास राजनिधि ने।

कुछ स्क्रीन शॉट्स जो आयोजक तथा मेरे मित्रो ने मुझे भेजे, शेयर कर रही हूं...

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Friday, November 19, 2021

आंचलिक स्त्री का ज़मीनी यथार्थ और स्त्री विमर्श | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | व्याख्यान | राष्ट्रीय वेबिनार

सर्दी-खांसी के अंतिम चरण में जब गला बैठा जा रहा हो तब एक घंटे का व्याख्यान देना ... पर, आयोजकों के आत्मीयतापूर्ण विश्वास को तोड़ नहीं सकती थी...दम साध कर बोलती गई, ग़नीमत की बीच में खांसी का दौरा नहीं पड़ा। विषय मेरी पसंद का था-"आंचलिक स्त्री का ज़मीनी यथार्थ और स्त्री विमर्श"। आप भी देख-सुन सकते हैं Youtube की नीचे दी लिंक पर।👇
https://youtu.be/sGJOlsbteGkLecture of Dr (Miss) Sharad Singh
       जी हां मित्रो, आज, 19-11-2021 को शाम 5 बजे जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, बाराबंकी (उप्र) के हिन्दी विभाग एवं शारीरिक शिक्षा विभाग द्वारा डॉ. राम अँजोर सिंह स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत Zoom एवं Youtube पर "आंचलिक स्त्री का ज़मीनी यथार्थ और स्त्री विमर्श"  विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में मैंने व्याख्यान दिया। 
🚩हार्दिक धन्यवाद आयोजन-सचिव
डॉ. रीना सिंह, एसोसिएट प्रोफ़ेसर
हिन्दी विभाग 💐
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Wednesday, November 17, 2021

चर्चा प्लस | छात्र, छात्र जीवन और बदलता दौर | अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
छात्र, छात्र जीवन और बदलता दौर
(17 नवम्बर, अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस)
 - डाॅ. शरद सिंह                                                            
हर व्यक्ति के लिए उसका छात्रजीवन बहुत महत्वपूर्ण होता है। पढ़ाई के लाख दबाव के बावज़ूद उसे अपने लिए सपने देखने और उन सपनों के लिए प्रयास करने का अवसर मिलता है। नई-नई संगत उन्हें जीवन के नए अनुभव देती है। एक अनुभव छात्रसंघ के चुनाव का भी हुआ करता था। जिसे मेरी जैसी पूर्व छात्रा का इस ‘‘विश्व छात्र दिवस’’ पर स्मरण किया जाना स्वाभाविक है। वस्तुतः ये चुनाव राजनीति, नेतृत्व, सहयोग और संघर्ष की पाठशाला हुआ करते थे। ‘‘विश्व छात्र दिवस’’ भी तो छात्रों के एक संघर्ष का समरण दिवस ही है।
प्रति वर्ष 17 नवम्बर को मनाया जाता है ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय छात्र दिवस’‘। एक ऐसा दिवस जो छात्रशक्ति और छात्रों के साहस को याद करने का दिवस है। इस वर्ष के लिए अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस की थीम है-‘‘लोगों, ग्रह, समृद्धि और शांति के लिए सीखना’’।

दरअसल, ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय छात्र दिवस’‘ मनाए जाने के पीछे एक हृदयविदारक फासीवादी घटना का हाथ है। हुआ यह था कि 28 अक्टूबर, 1939 को नाजी कब्जे वाले चेकोस्लोवाकिया की राजधानी ‘‘प्राग’’ में वहां के छात्रों और शिक्षकों ने अपने देश की स्थापना की वर्षगांठ के अवसर पर एक प्रदर्शन का आयोजन किया था। नाज़ियों ने इस प्रदर्शन पर गोलियां चलाईं, जिसके परिणामस्वरूप मेडिकल फेकल्टी का एक छात्र, जिसका नाम जॉन ओपलेटल था, मारा गया। उस छात्र के अंतिम संस्कार के समय भी एक विरोध प्रदर्शन किया गया। तब दर्जनों प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राओं को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में 17 नवम्बर की सुबह नाजियों ने छात्रों के होस्टल को घेरकर 1200 से अधिक छात्रों को गिरफ्तार किया और एक यातना शिविर में बंद कर दिया। नाजियों द्वारा यातनाएं देने के बाद नौ छात्रों को फांसी पर लटका दिया गया। जिसके बाद उन्हें फांसी दी गई। नाजियों के सैनिकों की इस घटना ने चेकोस्लोवाकिया के सभी छात्रों को उद्वेलित कर दिया परिणामस्वरूप सभी कॉलेज, यूनिवर्सिटीज़ को छात्रों ने बंद करा दिया। इस घटना के 2 साल बाद यानी 1941 में लंदन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया गया। यह सम्मेलन फाॅसीवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले छात्रों का था। सम्मेलन में नाज़ियों द्वारा शहीद किए गए छात्रों को याद करने के लिए हर साल 17 नवंबर को अंतर्राष्ट्रीय छात्र एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। पूरी दुनिया में यह दिन छात्रों की शक्ति, एकता और बलिदान के स्मरण के रूप में मनाया जाता है।
 छात्र जीवन बड़ा ही लुभावना होता है। उत्साह से भरा हुआ। बहुत कुछ कर गुज़रने के मंसूबों वाला। विशेषरूप से महाविद्यालयीन अथवा विश्वविद्यालयीन छात्र जीवन। स्कूली स्तर पर तो बंधा-बंधाया जीवन होता है जिसमें तराजू के एक पलड़े पर होमवर्क होता है तो दूसरे पलड़े पर परिजन, अभिभावक और शिक्षकों की ढेर सारी नसीहतें। उच्चशिक्षा के परिसर में पांव रखते ही युवाओं को एक खूबसूरत आज़ादी का अनुभव होने लगता है। मानो सारे बंधन स्कूल यूनीफार्म के साथ स्कूली दिनों में पीछे छूट गए हों। एक नई दुनिया। उस पर यदि को-एजुकेशन काॅलेज हो तो सोने पे सुहागा। ग्यारहवीं कक्षा से मैं को-एजुकेशन में ही पढ़ी, इसलिए यह कह सकती हूं कि को-एजुकेशन में छात्र-छात्राओं के बीच एक अच्छी समझ पैदा होती है जो जीवन-पर्यन्त उनके काम आती है।

‘‘कोरोना काल’’ और उससे उत्पन्न समसामयिक कारणों को छोड़ दें तो विगत कुछ दशकों में छात्रजीवन भी बड़ी तेजी से बदला है। इसका मूल कारण यह नहीं है कि हम ग्लोबल हो गए हैं या सूचनाओं के विस्फोट में जी रहे हैं। क्योंकि ग्लोबल तो मेरी पीढ़ी के छात्र भी थे। बेशक़ वह दौरा समाजवाद और पूंजीवाद पर बहसों का दौर था। लगभग अस्सी प्रतिशत छात्र समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हुआ करते थे। खुद को काॅमरेड कहलाना अच्छा लगता था। क्योंकि हम सभी छात्र उसमें आर्थिक स्तर पर सामाजिक समता देखते थे। ‘‘पेरेस्त्रोइका’’ के पहले विश्व का राजनीतिक परिदृश्य भी आज से भिन्न था। लेकिन भारतीय छात्र जीवन में इससे भी कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है। एक चीज है जो आज के छात्र जीवन से ‘‘मिसिंग’’ यानी कहीं खो गई लगती है, वह है छात्रसंघों का गर्माहट भरा चुनाव। महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के चुनावों ने न जाने कितने प्रखर राजनीतिक चेहरे दिए भारतीय राजनीति को। ग़ज़ब का उत्साह होता था छात्रसंघ चुनावों के दौरान। मुझे याद आता है अपने काॅलेज का प्रथम वर्ष। मैं पन्ना के छत्रसाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय की बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी। इससे पहले का मेरा छात्र जीवन बड़ा बंधा-बंधाया रहा था। दसवीं कक्षा तक उस स्कूल की छात्रा रही जहां मेरी मां डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ हिन्दी की व्याख्याता थीं, यानी मनहर उच्चतर माध्यमिक शासकीय कन्या विद्यालय। फिर ग्यारहवीं कक्षा में (उस समय 10+2 नहीं था) मुझे कमल सिंह मामाजी के पास बिजुरी (जिला शहडोल) जाना पड़ा। वहीं आदिवासी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में मामाजी व्याख्याता थे और मैं उसी स्कूल की छात्रा। यानी मेरी शिक़ायत किए जाने की जो तलवार पन्ना में मेरे सिर पर लटकती रहती थी, उससे बिजुरी आ कर भी पीछा नहीं छूटा। उसी स्कूल की एक व्याख्याता की बेटी या भांजी होना कितना बंधनकारी होता है, यह मेरी जैसी छात्रा (या छात्र) ही समझ सकती है। अतः बिजुरी से वापस पन्ना पहुंचने पर छत्रसाल महाविद्यालय में दाखिला और वह भी कला संकाय में, मेरे लिए आजादी का एक बड़ा प्रतिशत ले कर आया। पूरी आजादी तो नहीं थी क्योंकि अवचेतन में सदा यह बात रही कि कोई भी काम ऐसा न करूं कि जिससे मां को लज्जित होना पड़े। यूं भी मैं खिलंदड़े स्वभाव की थी। ‘दादागिरी’ में विश्वास रखने वाली। काॅलेज के अपने प्रथम वर्ष में ही मैंने छात्रसंघ के चुनावों को समझने का प्रयास करना शुरू कर दिया। चुनाव में मुझे खुद खड़ा होने में कतई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन कोई ‘‘अपना केंडिडेट’’ चुनाव जीते, इसका महत्व समझ में जल्दी ही आ गया। मेरी वर्षा दीदी भी उसी काॅलेज की छात्रा रहीं लेकिन एक तो वे विज्ञान संकाय की थीं और दूसरे कि मेरी तुलना में बिलकुल भी उत्पाती नहीं थीं। उन्हें तो काॅलेज में पढ़ाई और बेडमिंटन खेलने के अलावा और कोई लेना-देना नहीं रहता था। बहरहाल, उस वर्ष मेरे सीनियर छात्र (जो बी.ए. फाईनल में थे शायद) चतुर सिंह परिहार उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव में खड़े हुए। मैंने भी ज़ोरदार केनवासिंग कीे। परिणाम ज़बर्दस्त रहा। परिहार चुनाव जीत गए। उस दौर में मुझे पहली बार छात्रसंघ के चुनाव की गर्मजोशी का अहसास हुआ। इसके बाद बी.ए. तृतीय वर्ष के दौरान एक बार फिर छात्रसंघ चुनाव का अनुभव हुआ। एक वर्ष मुझे मुझे दमोह में रहना पड़ा। जहां शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में मैं बी.ए. तृतीय वर्ष की छात्रा रही। उन दिनों मुकेश नायक वहां सीनियर छात्र थे। अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार थे। बहुत उत्साही। वे एक-एक छात्र-छात्रा से व्यक्तिगत संपर्क कर के अपने लिए वोट मांगा करते थे। एक अलग ही जुनून था जो वहां उम्मीदवार छात्र-छात्राओं में देखने को मिलता था। लेकिन दुर्भाग्यवश काॅलेज की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली जिसके कारण उस वर्ष छात्रसंघ का चुनाव स्थगित कर दिया गया। सभी उम्मींदवारों की मेहनत पर पानी फिर गया किन्तु अपनी साथी के जाने के दुख के चलते सभी ने प्रशासन के निर्णय को स्वीकार कर लिया।            

इन दोनों अनुभवों ने आगे चल कर मुझे राजनीति के अनेक दांव-पेंच समझने में मदद की। वस्तुतः छात्रसंघ के चुनाव छात्रों में राजनीतिक समझ के साथ ही दायित्वबोध और नेतृत्व की क्षमता भी जगाते थे। इसके बाद परिपाटी बदलती गई और परीक्षा में आए उच्च प्राप्तांकों के आधार पर छात्रसंघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष बनाए जाने लगे। यही से ‘‘चुने जाने’’ और ‘‘बनाए जाने’’ का अन्तर आरम्भ हो गया। आज स्थितियां और भी बदल गई हैं। आज छात्रसंघ के वैसे चुनावों की कहीं झलक भी दिखाई नहीं पड़ती है। आज छात्र जीवन को सबसे अधिक यदि किसी ने प्रभावित किया है तो वह है अर्थतंत्र। हर छात्र की बुनियाद में उसके कैरियर का खूंटा गाड़ दिया जाता है। बहुत कम ही छात्र ऐसे हैं जो स्वयं को इस खूंटे से अलग कर के देख पाते हैं। मल्टीनेशनल कंपनी और उनके भरी-भरकम पैकेज़ के सपनों में लिपटा छात्र ‘‘कोचिंग’’ और ‘‘पढ़ाई की सोचिंग’’ के अलावा और कुछ कर ही नहीं पाता है। वैसे छात्रों के जीवन से छात्रसंघ के चुनाव जैसी गतिविधियां ‘इरेज़’ होने का एक कारण यह भी है कि इन चुनावों में धीरे-धीरे बाहुबलियों का वर्चस्व बढ़ने लगा था और कई विश्वविद्यालयों के चुनाव खूनी खेल में ढलने लगे। जिससे इन पर अंकुश लगाया जाना ज़रूरी हो गया था। लेकिन अफ़सोस की बात है कि छात्रसंघ चुनावों में बहुबलियों की घुसपैंठ को रोकने के बजाए चुनावों पर ही बंदिशें लगा दी गईं। अब आज वह सारी गतिविधियां बहुत पीछे छूट चुकी हैं, बिलकुल किसी कपोलकल्पित परिकथा जैसी। लेकिन 17 नवंबर का ‘‘विश्व छात्र दिवस’’ आज भी ज़ारी है, यह अच्छी बात है।
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Tuesday, November 16, 2021

पुस्तक समीक्षा | एक शायर को बेमिसाल श्रद्धांजलि है ‘‘यारां’' | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 16.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई शायर स्व. यार मुहम्मद "यार" के ग़ज़ल संग्रह "यारां" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
एक शायर को बेमिसाल श्रद्धांजलि है ‘‘यारां’'
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह  - यारां
कवि        - यार मुहम्मद ‘‘यार’’
प्रकाशक     - श्यामलम, सागर (म.प्र.)
मूल्य         - निःशुल्क
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काम  ऐसा  जहां  में  कर जायें
ख़ुश्बू-सी बन के हम बिखर जायें

यह शेर है सागर के लोकप्रिय शायर यार मोहम्मद ‘‘यार’’ का। बेशक़ यार साहब ने अपनी शायरी से सभी के दिलों में जगह बनाई और इस दुनिया को छोड़ने के बाद भी यादों में बसे हुए हैं लेकिन इस उपभोक्तावादी दुनिया में जहां स्वार्थपरता सिरचढ़ कर बोलती है, वहां एक मरहूम शायर के प्रति किए गए अपने वादे को पूरा करना अपने आप में एक ऐसा काम है जो हर दृष्टि से प्रशंसनीय है। 28 फरवरी 1938 को जन्मे शायर यार मोहम्मद ‘‘यार’’ ने सन् 2016 की 03 फरवरी को इस दुनिया से विदा ले ली। उनके जाने के बाद 06 फरवरी 2016 को सागर नगर की साहित्य, संस्कृति और कला के लिए समर्पित अग्रणी संस्था श्यामलम द्वारा ‘‘यार’’ साहब के सम्मान में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस आयोजन के दौरान ही ‘‘यार’’ साहब की ग़ज़लों को संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने का निर्णय लिया गया और संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने इस संबंध में विधिवत घोषणा की। इस संबंध में उन्होंने ‘‘यारां’’ का आमुख लिखते हुए चर्चा की है कि -‘‘06 तारीख को हमने उन्हें श्रद्धांजलि दी, उन्हें याद किया। बात आई उनकी रचनाओं के प्रकाशन की। इमरान भाई (सार साहब के पुत्र) ने बताया कि एक संग्रह ज़रूर छापा गया था किन्तु उसमें बेशुमार शाब्दिक त्रुटियां होने की वज़ह से अब्बा ने उनका वितरण रोक दिया था। मैंने उसे दुरुस्त करा कर नए सिरे से प्रकाशित करने का निर्णय लिया। तत्संबंधी घोषणा भी श्रद्धांजलि सभा में की। श्रद्धापूर्वक स्मरण करना चाहूंगा, सभा में मौजूद मंचासीन अतिथि शिवशंकर केशरी और निर्मलचंद ‘निर्मल’ का जिन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया, लेकिन उसको फलीभूत होते देखने वे आज हमारे बीच नहीं हैं।सोचा था छोटा सा काम है, अगले वर्ष इसी तारीख़ में उसका प्रकाशन कर कवमोचन करा लिया जाएगा। लेकिन भाषाई दुरुस्तीकरण की प्रक्रिया को पूरा करते-करते आज पांच साल बीत गए। हांलाकि इस अवधि में जो किया जाना संभव था, मैंने किया।’’
अपने वादे को पांच दिन में भूल जाने वाले आज के माहौल में पांच साल तक वादे के अमल में जुटे रहना बड़ा जीवट वाला काम है। अंततः श्यामलम संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने अपने वादे को पूरा किया और यार मुहम्मद ‘‘यार’’ साहब की चालीस ग़ज़लों का एक खूबसूरत संग्रह प्रकाशित कर कर दम लिया। इस संग्रह के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्य जुड़े हुए हैं। पहला तथ्य तो यह कि यह श्यामलम संस्था का पुस्तक प्रकाशन की दिशा में प्रथम सोपान है। दूसरा तथ्य यह कि ‘‘यारां’’ पर कोई शुल्क अंकित नहीं किया गया है। यह निःशुल्क है। इस संबंध में उमाकांत मिश्र का कहना है कि मैं ‘‘श्रद्धा कभी बेची नहीं जाती है। यह श्यामलम की ओर से यार साहब को श्रद्धांजलि है।’’ यह भावना स्तुत्य है। क्योंकि लेखन एवं प्रकाशन की दुनिया से जुड़े सभी लोग जानते हैं कि पुस्तक प्रकाशन में अच्छा-खासा खर्च आता है। यह सारा व्यय मूल रूप से श्यामलम संस्था और संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र द्वारा उठाया गया है। साहित्य और साहित्यकार की उनकी प्रतिबद्धता की राह में ‘‘यारां’’ मील का पत्थर है।
समीक्ष्य ग़ज़ल संग्रह के नामकरण के संबंध में उमाकांत मिश्र आमुख में ने जानकारी दी है कि डाॅ. सुरेश आचार्य ने संग्रह का नाम ‘‘यारां’’ रखा। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी, उर्दू और संस्कृत के गहनज्ञाता हैं। उनके द्वारा यार साहब के ग़ज़ल संग्रह को ‘‘यारां’’ नाम दिया जाना उनकी शायरी को तो प्रतिबिम्बित करता ही है, साथ ही जो ‘‘यार’’ साहब के स्वभाव से परिचित हैं वे समझ सकते हैं कि यह नाम ‘‘यार’’ साहब के याराना स्वभाव को भी रेखांकित करता है। इस ग़ज़ल संग्रह से जुड़ा तीसरा तथ्य यह है कि इसमें कठिन प्रतीत होने वाले उर्दू शब्दों का प्रत्येक पृष्ठ के फुटनोट में अर्थ दिया गया है ताकि इन ग़ज़लों को पढ़ने वालों को इनके मर्म को समझने में तनिक भी असुविधा न हो। शाब्दिक त्रुटिहीनता का हरसंभव प्रयास किया गया है। क्योंकि यही वह संवेदनशील पक्ष था जिसके कारण ‘‘यार’’ साहब ने अपनी प्रकाशित पुस्तक को वितरित करने से रोक दिया था जबकि उसके प्रकाशन में वे धन व्यय कर चुके थे। अतः उनकी इस भावना का संग्रह में सावधानीपूर्वक ध्यान रखा गया है। संग्रह में एक संक्षिप्त भूमिका साहित्यकार पी. आर. मलैया द्वारा लिखी गई है जिसमें उन्होंने ‘‘यार’’ साहब की शायरी की खूबियों पर प्रकाश डाला है।
यार मुहम्मद ‘‘यार’’ सागर के मदार चिल्ला, लाजपतपुरा वार्ड में जन्मे थे। अलीगढ़ यूनीवर्सिटी से सम्बद्ध उर्दू अदब से उन्होंने मेट्रिक किया। उन्हें पहलवानी का शौक था। सागर नगर के प्रमुख पहलवानों में उनकी गिनती होती थी। पहलवानी के साथ ही उन्हें शायरी का भी शौक रहा। वे उस्ताद मियां मेहर (नवाब साहब) के शागिर्द रहे। उन्होंने हिन्दी, उर्दू और बुंदेली में शायरी की। वे सामाजिक समरसता एवं कौमी एकता में विश्वास रखते थे। ‘‘यार’’ साहब ने नातिया मुशायरों में भी अनेक बार भाग लिया। कई सम्मानों से उन्हें सम्मानित भी किया गया।
शायरी अपने शायर की भावनाओं की प्रतिनिधि होती है और साथ ही उसका सकल जग से भी सरोकार होता है। यार मुहम्मद ‘‘यार’’ की शायरी में दीन-दुखियों के प्रति उनकी संवेदनाएं स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। उनके ये चंद शेर देखें-
धूप से इस जहां  को  बचा लीजिये
अपने दामन का साया अता कीजिये 
आपके नाम  की  माला जपता रहूं
रंग अपना यूं  मुझ  पे चढ़ा दीजिये
आप ही आप मुझको नज़ा आएं बस
आंखों में खाके-पा को लगा दीजिए 

‘‘यार’’ साहब जब ग़ज़ल के अस्ल इश्क़िया मिजाज़ को थामते हैं तो उनकी इश्क़िया ग़ज़ल भी एक गरिमा के साथ सामने आती है। उदाहरण देखें-
उसका फ़साना दिल को जलाने के लिए है
हर बात मेरी  दिल को  लुभाने के लिए है
हर सांस  यूं  तो  मेरी  ज़माने के लिए है
ये  जान  मगर  उनपे  लुटाने  के लिए है
मैं जानता हूं, दिल से  तुझे  चाहता है  वो
नाराज़गी  तो  मुझको  सताने  के लिए है

इश्क़ की बात करते हुए ‘‘यार’’ साहब लौकिक और अलौकिक प्रेम को एकसार करते हुए सूफ़ियाना अंदाज़ में जा पहुंचते हैं। वे इश्क़ को दुनिया की सबसे बड़ी नेमत करार देते हैं और प्रेम के व्यक्तिगत अनुभव को पीढ़ियों के प्रेम तक ले जाते हैं। उनकी यह ग़ज़ल देखिए-
इश्क़ में राज़े-मुहब्बत है  समझता क्या है
इश्क़ गर हो न तो इंसान में रक्खा क्या है
इक तक़ाज़ा ही तो इंसानियत का है बाक़ी
वर्ना  इंसान से इंसान  का  रिश्ता क्या है
तेरे जल्वों का करिश्मा है ये  रौशन आंखें
नूर आंखों में अगर हो न तो जंचता क्या है
साये-दामन में  शाम  आपके गुज़र जाए
और बस इसके सिवा मेरी तमन्ना क्या है
‘‘यार’’ अज्दाद की इस घर में ख़ुश्बुएं बसतीं
वर्ना  अपना  दरो-दीवार से  रिश्ता क्या है

‘अज्दाद’ अर्थात् पुरखों की ख़ुश्बूओं वाले घर को ही अपना घर मानना ‘‘यार’’ साहब का संयुक्त परिवार और पीढ़ियों में विश्वास रखने को दर्शाता है। उनकी वतनपरस्ती भी इन्हीं शेरों में बखूबी झलकती है।
यार मुहम्मद ‘‘यार’’ के कई शेर ऐसे हैं जिनमें उनकी कलम दुख-सुख, मिलन-विरह, के बीच अपने बाहर-भीतर के सफर की कश्मकश को बड़ी सुंदरता और गहराई से शब्दांकित करती है। वे आत्मीयजन के व्यवहार में होने वाले क्रमिक परिवर्तन को भी बखूबी सामने रखते हैं -
पहले थे  मेहरबां, बदगुमां हो गये
अब वो  मेरे लिए आस्मां  हो गये
बिन मेरे वो जो रहते नहीं थे ज़रा
कितने अब फ़ासले दरम्यां हो गये
हमने उनके लिए जान भी दी मगर
आज वो  ग़ैर के  राज़दां हो गये
साथ ले-ले के अपने चले जो मुझे
दूर वो सबके सब  कारवां हो गये

‘‘यार’’ साहब के शेरों में दुनियावी चलन की सच्ची तस्वीर पूरे तल्ख़ रौ में उभर कर सामने आती है। लेकिन खूबी यह है कि वे आज के असंवेदी माहौल के प्रति मात्र उलाहना ही नहीं देते हैं, वरन सकारात्मक सुझाव भी देते हैं-
क्या नहीं बिक रहा  आज संसार में
दिल का सौदा भी होता है बाज़ार में
क्या मिलेगा  हमें  बोलो  तकारर में
बात  बन  जाएगी,  दोस्तो  प्यार में
लालो-गौहर से भी बेशक़ीमत  है ये
वक़्त को  हम  गंवाएं  न  बेकार में

सागर नगर के ही नहीं वरन् उर्दू अदब के एक नामचीन शायर यार मुहम्मद ‘‘यार’’ ने शायरी को समृद्ध किया। साथ ही उनके इस योगदान को संग्रह के रूप में दस्तावेज़ बनाने में श्यामलम संस्था ने जो महती कार्य किया वह साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। ‘‘यार’’ साहब की शायरी को निश्चित रूप से पढ़ा जाना चाहिए जो कि अब ‘‘यारां’’ के प्रकाशन से आसान हो गया है। ‘‘यारां’’ के अगले संस्करण को समूल्य किया जा सकता है, बढ़ती मंहगाई एवं संस्था के सीमित साधनों को देखते हुए श्यामलम संस्था को इस पर विचार करना चाहिए। इससे उनके श्रद्धांजलि के पवित्र उद्देश्य पर कोई आंच नहीं आएगी। बहरहाल, इस ग़ज़ल संग्रह का श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित होना तथा निःशुल्क रखा जाना अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। बारम्बार प्रशंसनीय है। 
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Friday, November 12, 2021

चर्चा प्लस | भारत को कितनी राहत देगी पीएम मोदी और स्कूली छात्रा विनीशा की ललकार | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
भारत को कितनी राहत देगी
पीएम मोदी और स्कूली छात्रा विनीशा की ललकार
 - डाॅ. शरद सिंह                                                                           
 ‘‘बातें बहुत हो चुकीं, अब काम करना आरम्भ करें!’’ यही तो कहा दुनिया भर के देशों से भारतीय छात्रा विनीशा उमाशंकर ने। यह सिर्फ़ उसकी आवाज़ नहीं बल्कि हर युवा की आवाज़ है जो खुली हवा में सांस लेना चाहता है और स्वस्थ तथा लम्बा जीवन जीना चाहता है। कार्बन के बेतहाशा उत्सर्जन ने हवा का दम घोंट रखा है। इसी चिंता को ले कर ग्लास्गो में कोप 26 सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में पीएम मोदी ने भी इसके लिए सभी देशों से आह्वान किया। आशा की जानी चाहिए कि सम्मेलन में लिए गए निर्णय भारत की जलवायु-दशा में भी सुधार लाएंगे। 
15 साल की तमिलनाडु में पढ़ने वाली भारतीय स्कूली छात्रा विनीशा उमाशंकर ने कोप-26 सम्मेलन में अपने भाषण में कहा कि ‘‘मैं केवल भारत की लड़की नहीं हूं बल्कि मैं इस धरती की बेटी हूं। मैं और मेरी पीढ़ी आज आपके कार्यों के परिणामों को देखने के लिए जीवित रहेंगे। फिर भी आज हम जो चर्चा करते हैं, उनमें से कोई भी मेरे लिए व्यावहारिक नहीं है। आप तय कर रहे हैं कि हमारे पास रहने योग्य दुनिया में रहने का मौका है या नहीं। हम लड़ने लायक हैं या नहीं? अब वक्त आ गया है कि हम बातें करना बंद करें और काम करना शुरू करें।’’
विनीशा के भाषण पर टिप्पणी करते हुए प्रिंस चाल्र्स ने कहा कि विनीशा ने जो कुछ कहा उससे हम युवापीढ़ी के आगे लज्जित हैं। हमें अपने पृथ्वी को बचाने की दिशा में प्रयासों पर ध्यान देना होगा। ग्लासगो में आयोजित ‘‘वल्र्ड लीडर समिट ऑफ कोप-26’’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखा. क्लाइमेट चेंज पर इस वैश्विक मंथन के बीच पीएम ने पंचामृत की सौगात दी।
ग्लासगो में पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि आज मैं आपके बीच उस भूमि का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं जिस भूमि ने हजारों वर्षों पहले ये मंत्र दिया था ‘‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम’’ आज 21वीं सदी में ये मंत्र और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। ये सच्चाई हम सभी जानते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर आज तक किए गए वादे, खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी क्लाइमेट एक्शन पर अपने एम्बीशन बढ़ा रहे हैं, तब क्लाइमेट फाइनेंस पर विश्व के एम्बीशन वहीं नहीं रह सकते जो पेरिस अग्रीमेंट के समय थे। क्लाइमेट चेंज पर इस वैश्विक मंथन के बीच मैं भारत की ओर से इस चुनौती से निपटने के लिए पांच अमृत तत्व रखना चाहता हूं, पंचामृत की सौगात देना चाहता हूं।
पहला- भारत, 2030 तक अपनी नाॅन फाॅसिल इनर्जी केपीसिटी को 500 गीगावाट तक पहुंचाएगा। 
दूसरा- भारत, 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत इनर्जी की जरूरत को ‘‘गैर-जीवाश्म ऊर्जा’’ रिनीवल इनर्जी से पूरी करेगा।
तीसरा- भारत अब से लेकर 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा। 
चौथा- 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिटी को 45 प्रतिशत से भी कम करेगा।
पांचवा- वर्ष 2070 तक भारत, नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।
         ये सच्चाई हम सभी जानते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर आज तक किए गए वादे, खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी क्लाइमेट एक्शन पर अपनी महत्वकांक्षा बढ़ा रहे हैं, तब क्लाइमेट फाइनेंस पर विश्व की महत्वकांक्षा वही नहीं रह सकते जो पेरिस अग्रीमेंट के समय थे। मेरे लिए पेरिस में हुआ आयोजन, एक समिट नहीं, सेंटीमेंट था, एक कमिटमेंट था। भारत वो वादे विश्व से नहीं कर रहा था, बल्कि वो वादे सवा सौ करोड़ भारतवासी अपने आप से कर रहे थे। पीएम ने कहा कि दुनिया को एडप्टेशन पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन एडप्टेशन पर ध्यान नहीं दिया गया। जलवायु पर वैश्विक बहस में एडप्टेशन को उतना महत्व नहीं मिला है। ये उन विकासशील देशों के साथ अन्याय है जो जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित हैं। एडप्टेशन के तरीके चाहे लोकल हों पर पिछड़े देशों को इसके लिए ग्लोबल सहयोग मिलना चाहिए। लोकल एडप्टेशन के लिए ग्लोबल सहयोग के लिए भारत ने कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिस्टेंस इंफ्रास्ट्रक्चर पहल की शुरूआत की थी। मैं सभी देशों को इस पहल से जुड़ने का अनुरोध करता हूं। पीएम मोदी ने कहा कि भारत में नल से जल, स्वच्छ भारत मिशन और उज्जवला जैसी परियोजनाओं से हमारे जरूरतमंद नागरिकों को अनुकूलन लाभ तो मिले ही हैं उनके जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है। कई पारंपरिक समुदाय में प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने का ज्ञान है। हमारी अनुकूलन नीतियों में इन्हें उचित महत्व मिलना चाहिए। स्कूल के पाठ्यक्रम में भी इसे जोड़ा जाना चाहिए।
भारत की अर्थव्यवस्था वर्ष 2070 तक कार्बन न्यूट्रल हो जाएगी, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ग्लासगो में कोप 26 जलवायु शिखर सम्मेलन में घोषणा की।  मोदी ने यह भी कहा कि भारत ‘‘गैर-जीवाश्म ऊर्जा’’ की स्थापित क्षमता के लिए अपने 2030 के लक्ष्य को 450 से बढ़ाकर 500 गीगावाट करेगा।
ग्लासगो में पीएम मोदी के अपने संबोधन में कहा कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जो पेरिस समझौते के तहत जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रतिबद्धताओं को अक्षरशः पूरा कर रहा है।  मेरे लिए, पेरिस का कार्यक्रम एक शिखर सम्मेलन नहीं बल्कि एक भावना, एक प्रतिबद्धता थी और भारत दुनिया से वादे नहीं कर रहा था, बल्कि 125 करोड़ भारतीय खुद से वादे कर रहे थे।  मुझे खुशी है कि भारत जैसा विकासशील देश करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का काम कर रहा है।  जब मैं पहली बार क्लाइमेट समिट के लिए पेरिस आया था, तो दुनिया भर के अन्य वादों में अपना खुद का वादा जोड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं था।  ‘‘सर्वे सुखिनः भवन्तु’’ का संदेश देने वाली संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में मैं मानवता की चिंता के साथ आया था।  कई विकासशील देशों के अस्तित्व के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ा खतरा है।  हमें दुनिया को बचाने के लिए बड़े कदम उठाने चाहिए।  यह समय की मांग है और यह इस मंच की प्रासंगिकता को साबित करेगा।  मुझे उम्मीद है कि ग्लासगो में लिए गए फैसले हमारी अगली पीढ़ियों के भविष्य को बचाएंगे। भारत को उम्मीद है कि विकसित देश जल्द से जल्द 1 ट्रिलियन डॉलर का जलवायु वित्त उपलब्ध कराएंगे।  आज जलवायु वित्त को ट्रैक करना महत्वपूर्ण है जैसे हम जलवायु शमन की प्रगति को ट्रैक करते हैं।  उन देशों पर दबाव बनाना उचित न्याय होगा जो जलवायु वित्त के अपने वादों को पूरा नहीं करते हैं। दुनिया आज स्वीकार करती है कि जलवायु परिवर्तन में जीवनशैली की प्रमुख भूमिका है।  मैं आप सभी के सामने एक शब्द आंदोलन का प्रस्ताव करता हूं।  यह शब्द ‘‘जीवन’’ है जिसका अर्थ है पर्यावरण के लिए जीवन शैली।  आज जरूरत है कि हम सब एक साथ आएं और जीवन को एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाएं।’’
उल्लेखनीय है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सितंबर में कहा था कि उनका देश 2060 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट जीरो करने के लक्ष्य को हासिल कर लेगा। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी 2060 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन हासिल करने का वादा किया है। भारत ने 2070 तक का लक्ष्य रखा है।
नेट जीरो का अर्थ है कार्बन डाइऑक्साइड के घातक उत्सर्जन को पूरी तरह से ख़त्म कर देना जिससे धरती के वायुमंडल को गर्म करनेवाली ग्रीनहाउस गैसों में इसकी वजह से और वृद्धि न हो। भारत, इंडोनेशिया, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका कोयले से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 15 फीसदी के लिए जिम्मेदार हैं। इस योजना का मकसद उत्सर्जन में कटौती की गति तेज करना है ताकि 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य के और करीब पहुंचा जा सके।
इंडोनेशिया के ऊर्जा मंत्री अरिफिन तसरीफ ने कहा कि उनका देश कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद कर उनकी जगह नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध है। एक बयान जारी कर उन्होंने कहा, जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है जिससे निपटने के लिए सभी पक्षों उदाहरण पेश करने होंगे। सीआईएफ ने कहा कि एक्सलरेटिंग कोल ट्रांजीशन (एसीटी) योजना के तहत सबसे पहले ऐसे विकासशील देशों को लक्ष्य किया जा रहा है जिनके पास कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए समुचित साधन नहीं हैं। दक्षिण अफ्रीका ने मंगलवार को कहा था कि वह एसीटी से लाभान्वित पहला देश होगा। सीआईएफ के अनुसार इस नई योजना को सात सबसे विकसित समर्थन दे रहे हैं और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और डेनमार्क ने इसके लिए वित्तीय समर्थन दिया है। डेनमार्क ने कहा है कि वह इस योजना के लिए 1.55 करोड़ डॉलर यानी लगभग एक अरब 15 करोड़ रुपये का अनुदान देगा ताकि ष्कोयला बिजली संयंत्रों को खरीदकर बंद किया जा सके और नए ऊर्जा स्रोतों में निवेश किया जा सके। डेनमार्क के विदेश मंत्री येप्पे कोफोड ने कहा, कोल ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने के लिए हमें एक स्थायी और स्थिर योजना की जरूरत होगी। मिसाल के तौर पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा स्थानीय आबादी के लिए वैकल्पिक रोजगार और उन्हें दोबारा ट्रेनिंग उपबल्ध हो।
वैसे प्रधानमंत्री मोदी कार्बन उत्सर्जन पर काबू पाने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे ही पर हमें याद रखना चाहिए कि पृथ्वी को बचाने का विनीशा का आह्वान हर देश, हर नागरिक के लिए है। भारतवासी और पृथ्वीवासी होने के नाते विनीशा का समर्थन करना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
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Tuesday, November 9, 2021

पुस्तक समीक्षा | प्रेम को व्याख्यायित करते बेजोड़ साॅनेट्स | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 09.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि विनीत मोहन औदिच्य द्वारा अनूदित काव्य संग्रह "ओ प्रिया" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
प्रेम को व्याख्यायित करते बेजोड़ साॅनेट्स 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह  - ओ प्रिया
अनुवादक     - विनीत मोहन औदिच्य
प्रकाशक      - ब्लैक ईगल बुक्स, 7464, विस्डम लेन, डब्लिन, ओहायो (यूएसए)
मूल्य         - 180/-
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इस बार समीक्षा के लिए जो काव्य संग्रह मैंने चुना है उसका नाम है ‘‘ओ प्रिया’’। यह नोबल पुरस्कार विजेता पाब्लो नेरुदा के एक सौ प्रेम साॅनेट का हिन्दी में काव्यात्मक अनुवाद है। इसके अनुवाद हैं सागर निवासी विनीत मोहन औदिच्य। यह पुस्तक अमरीकी प्रकाशक ब्लैक ईगल बुक्स का इंटरनेशनल एडीशन है। यूं तो ब्लैक ईगल बुक्स का मुख्यालय ओहायो स्टेट के डब्लिन शहर में स्थित है किन्तु भारत में ओडीशा के कलिंग नगर, भुवनेश्वर में भी इसका कार्यालय है। अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन मानक के अनुरुप यह पुस्तक आकर्षक मुद्रण में पेपरबैक है। जहां तक इस पुस्तक के कलेवर का प्रश्न है तो इसका मैंने दो तथ्यों के साथ आकलन करना उचित समझा है- पहला पाब्लो नेरुदा से जुड़े तथ्य और दूसरा हिन्दी साहित्य में साॅनेट की स्थिति। इन दो तथ्यों से गुज़र कर ही इस समीक्ष्य पुसतक की उपादेयता को परखा जा सकता है।
पाब्लो नेरुदा मात्र एक कवि ही नहीं बल्कि राजनेता और कूटनीतिज्ञ भी थे। 1970 में चिली में सल्वाडोर अलेंदे ने साम्यवादी सरकार बनाई जो विश्व की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई साम्यवादी सरकार थी। अलेंदे ने 1971 में नेरूदा को फ्रांस में चिली का राजदूत नियुक्त किया। और इसी वर्ष उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला। 1973 में चिली के सैनिक जनरल ऑगस्टो पिनोचे ने अलेंदे सरकार का तख्ता पलट दिया। इसी कार्रवाई में राष्ट्रपति अलेंदे की मौत हो गई और आने वाले दिनों में अलेंदे समर्थक हजारों आम लोगों को सेना ने मौत के घाट उतार दिया। कैंसर से बीमार नेरूदा चिली में अपने घर में बंद इस जनसंहार के समाप्त होने की प्रार्थना करते रहे। लेकिन अलेंदे की मौत के 12 दिन बाद ही नेरूदा ने दम तोड़ दिया। 23 सितंबर, 1973 को चिली के सैंटियागो में नोबेल पुरस्कार पाने के दो साल बाद नेरुदा का निधन हो गया। हालाँकि उनकी मौत को प्रोस्टेट कैंसर के लिए आधिकारिक रूप से जिम्मेदार ठहराया गया था, लेकिन आरोप लगाए गए हैं कि कवि को जहर दिया गया था, क्योंकि तानाशाह ऑगस्टो पिनोशे के सत्ता में आने के ठीक बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। पाब्लो ने अपने जीवन में दो भावनाओं को प्रबल रूप से जिया जिसमें एक थी देश के प्रति प्रेम जिसके लिए वे राजनीति के क्षेत्र में संघर्ष करते रहे और दूसरी भावना थी प्रेम की। जो उन्हें जब सच्चे प्रेम के रूप में अनुभव हुई तो उन्होंने प्रेम पर वे साॅनेट लिख डाले जिन्होंने उन्हें विश्व में एक रोमांटिक कवि की ख्याति दिला दी।
पाबलो नेरुदा ने तीन विवाह किए। आरम्भ के दो विवाह सफल नहीं रहे किन्तु तीसरा विवाह उन्होंने अपनी प्रेमिका मेडिल्टा उर्रुटिया सेर्डा से किया। मेडिल्टा फिजियो थेरेपिस्ट थीं और उनसे लगभग आठ वर्ष छोटी थीं। वे लैटिन अमेरिका की पहली पेड्रियाटिक थेरेपिस्ट थीं। मेडिल्टा के प्रेम में डूब कर पाब्लो नेरुदा ने ‘‘सिएन साॅनेटोज़ डी अमोर’’  अर्थात् ‘‘प्रेम के सौ साॅनेट्स’’ लिखे। इसी पुस्तक का अंग्रेजी से अनुवाद किया गया है ‘‘ओ प्रिया’’ के नाम से। इस पुस्तक के अनुवादक विनीत मोहन औदिच्य स्वयं भी एक साॅनेटकार हैं और उनके द्वारा अनूदित अंग्रेजी साॅनेट्स की एक और पुस्तक ‘‘प्रतीची से प्राची पर्यांत’’ की समीक्षा भी मैं इसी स्तम्भ में कर चुकी हूं। हिन्दी साहित्य में साॅनेट विधा को मौलिक सृजन के रूप में गंभीरता से परिचित कराने का श्रेय है कवि त्रिलोचन शास्त्री को। प्रारम्भ में हिंदी में सॉनेट को विदेशी विधा होने के कारण स्वीकार नहीं किया गया किन्तु त्रिलोचन शास्त्री ने इसका भारतीयकरण किया। इसके लिए उन्होंने रोला छंद को आधार बनाया तथा बोलचाल की भाषा और लय का प्रयोग करते हुए चतुष्पदी को लोकरंग में रंगने का काम किया. इस छंद में उन्होंने जितनी रचनाएं कीं, संभवतः स्पेंसर, मिल्टन और शेक्सपीयर जैसे कवियों ने भी नहीं कीं। सॉनेट के जितने भी रूप-भेद साहित्य में किए गए हैं, उन सभी को त्रिलोचन ने आजमाया।
विनीत मोहन औदिच्य के अनुवाद की यह विशेषता है कि वे विदेशी भाषा के साॅनेट के अनुवाद को हिन्दी में साॅनेट के रूप में ही करते हैं। जबकि काव्यानुवाद अपने आप में चुनौती भरा कार्य होता है। क्योंकि जब किसी विदेशी काव्य को अनुवाद के लिए चुना जाता है तो उसमें वर्णित दृश्य, देशज स्थितियां और तत्संबंधी कालावधि की समुचित जानकारी अनुवादक के लिए आवश्यक होती है। जैसे पाब्लो के साॅनेट्स में चिली के समुद्रतट, समुद्र और मछुवारों का वर्णन मिलता है जो भारतीय समुद्रतटों और मछुवारों की जीवन दशाओं से सर्वथा भिन्न है। इसी तरह की अनेक छोटी-बड़ी विशेषताओं का ज्ञान होना अनुवाद के लिए आवश्यक हो जाता है। इसके साथ ही जरूरी हो जाता है अनुवाद के लिए चुनी गई कृति और उसके कवि की भावनाओं से तादात्म्य स्थापित करना। इस सबके बाद ही काव्यानुवादक अनुवाद के लिए सटीक शब्दों का चयन कर पाता है। विनीत मोहन औदिच्य ने जिस आत्मीयता के साथ पाब्लो के साॅनेट्स को हिन्दी में पिरोया है, वह प्रभावित करने वाला है। संग्रह की अनूदित कविताओं को पढ़ कर स्पष्ट हो जाता है कि अनुवादक ने पाब्लो की भावनाओं को भली-भांति समझा है और साथ ही उनके परिवेश को भी अनुवादकार्य के दौरान आत्मसात किया है। उनके शब्दों का चयन प्रभावित करता है क्यों वे शब्द मूल कविता की आत्मा को साथ ले कर चलते हैं। उदाहरण के लिए 18 वां साॅनेट की ये पंक्तियां देखें-
तुम बहती हो पर्वत श्रृंखलाओं में पवन जैसी
बर्फ़ के नीचे गिरते हुए तीव्र झरने सी
तुम्हारे सघन केश धड़कते हैं सूर्य के
उच्च अलंकरणों से, दोहराते हुए उन्हें मेरे लिए।

काकेशस का सम्पूर्ण प्रकाश गिरता है तुम्हारी काया पर
एक गुलदस्ता जैसा, असीम रूप से अपवर्तक 
कजसमें जल बदलता है वस्त्र और गाता है
दूरस्थ नदी की हर गति के साथ।

प्रिय की अनुपस्थिति किस तरह किसी व्यक्ति को आलोड़ित करती है, विशेष रूप से जब वह उसकी उपस्थिति चाहता हो, 69 वें साॅनेट की इन चार पंक्तियों में अनुभव किया जा सकता है-
संभवतः तुम्हारी अनुपस्थिति ही होना है शून्यता का
तुम्हारे बिना हिले, दोपहर को काटना
एक नीले पुष्प-सा, बिना तुम्हारे टहले
धुंध और पत्थरों से हो कर बाद में

संग्रह का 89 वां साॅनेट भावनाओं के उच्चतम शिखर को छूता हुआ प्रतीत होता है। यह वह अतिसंवेदनशील भावाभिव्यक्ति है जो असाध्य रोग के कारण मृत्यु के सुनिश्चित हो जाने पर अंतिम इच्छा की तरह प्रकट होती है। पंक्तियां देखिए-
जब मैं करूं मृत्यु का वरण, मैं चाहता हूं तुम्हारे हाथों को मेरी ओखों पर
मैं चाहता हूं रोशनी और तुम्हारे प्यारे हाथों का गोरापन
मैं चाहता हूं उन हाथों की स्फूर्ति मुझसे हो कर गुजत्ररे एक बार
मैं करना चाहता हूं उस कोमलता की अनुभूति जिसने परिवर्तित किया मेरा भाग्य।

इसी तारतम्य में 94 वें साॅनेट को भी उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जिसमें एक प्रेमी मृत्यु, प्रेम और परिवेश के समीकरण को अमरत्व प्रदान कर देना चाहता है-
यदि मैं मरूं, तुम इतनी शुद्ध शक्ति के साथ उत्तरजीवी रहो
कि तुम करो विवर्णता और शीतलता को क्रोधित
चमकाओ अपनी अमिट आंखों को दक्षिण से दक्षिण तक
सूर्य से सूर्य तक, जब तक कि गाने न लगे तुम्हारा मुख गिटार-सा

मैं नहीं चाहता तुम्हारी हंसी या पदचाप लगे डगमगाने
मैं नहीं चाहता मेरी प्रसन्नता की विरासत की हो मुत्यु
मत पुकारो मेरे हृदय को, मैं नहीं हूं वहां
मेरी अनुपस्थिति में रहो जैसे रहती हो एक घर में।

‘‘ओ प्रिया’’ अनूदित होते हुए भी पाब्लो के मौलिक साॅनेट्स का आनन्द दे पाने में सक्षम है। यूं भी अनुवाद कार्य दो भाषाओं, दो साहित्यों और दो भिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का कार्य करता है। इतना श्रेष्ठ अनुवाद करके विनीत मोहन औदिच्य ने हिन्दी साहित्य और लैटिन अमरीकी साहित्य के बीच एक सृदृढ़ सेतु तैयार किया है। यह काव्य संग्रह न केवल पठनीय अपितु संग्रहणीय भी है।                    
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Thursday, November 4, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेली दीपावली से जुड़ी रोचक परंपराएं | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
बुंदेली दीपावली से जुड़ी रोचक परंपराएं
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
कुछ परंपराएं भले ही छूट रही हों, कुछ मान्यताएं भले ही बदल रही हों किन्तु बुंदेलखंड का विस्तृत भू-भाग आज भी दीपावली के लुप्त हो चले अनेक रिवाजों को अपने सीने से लगाए हुए है और उन्हें संरक्षित करने के लिए सतत् प्रयत्नशील है। ये परंपराएं अत्यंत रोचक हैं। यह याद रखने की बात है कि प्रकृति, समाज और प्रसन्नता से जुड़ी परंपराएं न तो कभी हानिकारक होती हैं और न कभी पुरानी पड़ती हैं, अपितु ये परंपराएं हमारे जातीय स्वाभिमान को बचाए रखती हैं। जब तक दीपावली के दीपक जगमगाते रहेंगे, हमारी परंपराएं भी हमारे साथ चलती रहेंगी।
        भारत का सबसे जगमगाता त्योहार है दीपावली। इस एक त्योहार के मनाए जाने के कारणों की बात करें से इससे जुड़ी अनेक कथाएं सुनने को मिल जाती हैं। मान्यता अनुसार इसी दिन भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था इसलिए दक्षिण भारत के लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन के ठीक एक दिन पहले श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस खुशी के मौके पर दूसरे दिन दीप जलाए गए थे। कहते हैं कि दीपावली का पर्व सबसे पहले राजा महाबली के काल से प्रारंभ हुआ था। विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बली की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे। तभी से दीपोत्सव का पर्व प्रारंभ हुआ। यह भी माना जाता हैं कि दीपावली यक्ष नाम की जाति के लोगों का ही उत्सव था। उनके साथ गंधर्व भी यह उत्सव मनाते थे। मान्यता है कि दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे। सभ्यता के विकास के साथ यह त्योहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मीजी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है।
दीपावली दीपों का त्योहार है। यह ‘‘अन्धकार पर प्रकाश की विजय’’ को दर्शाता है। दीपावली का उत्सव 5 दिनों तक चलता है। पहले दिन को धनतेरस कहते हैं। दीपावली महोत्सव की शुरुआत धनतेरस से होती है। इसे धन त्रयोदशी भी कहते हैं। धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज, धन के देवता कुबेर और आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरि की पूजा का महत्व है। इसी दिन समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे और उनके साथ आभूषण व बहुमूल्य रत्न भी समुद्र मंथन से प्राप्त हुए थे। दूसरे दिन को नरक चतुर्दशी, रूप चैदस और काली चैदस कहते हैं। इसी दिन नरकासुर का वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजाई जाती है। तीसरे दिन दीपावली होती हैं। दीपावली का पर्व विशेष रूप से मां लक्ष्मी के पूजन का पर्व होता है। कार्तिक माह की अमावस्या को ही समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं जिन्हें धन, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। इसी दिन श्रीराम, सीता और  लक्ष्मण 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर घर लौटे थे। चैथे दिन अन्नकूट या गोवर्धन पूजा होती है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट उत्सव मनाना जाता है। इसे पड़वा या प्रतिपदा भी कहते हैं। पांचवां दिन इस दिन को भाई दूज और यम द्वितीया कहते हैं। भाई दूज, पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का अंतिम दिन होता है। भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने और भाई की लंबी उम्र के लिए मनाया जाता है।
दीपावली के कई दिन पहले से ही घर की दीवारों की रंगाई-पुताई, आंगन की गोबर से लिपाई और लिपे हुए आंगन के किनारों को ‘‘ढिग’’ धर का सजाना यानी चूने या छुई मिट्टी से किनारे रंगना। चैक और सुराती पूरना। गुझिया, पपड़ियां, सेव-नमकीन, गुड़पारे, शकरपारे के साथ ही एरसे, अद्रैनी आदि व्यंजन बनाया जाना। एरसे त्यौहारों विशेषकर होली और दीपावली पर बनाये जाते हैं। ये मूसल से कूटे गए चावलों के आटे से बनते हैं। आटे में गुड़ मिला कर, माढ़ कर इन्हें पूड़ियों की तरह घी में पकाते हैं। घी के एरसे ही अधिक स्वादिष्ट होते है। इसी तरह अद्रैनी प्रायः त्यौहारों पर बनाई जाती है। आधा गेहूं का आटा एवं आधा बेसन मिलाकर बनाई गई पूड़ी अद्रैनी कहलाती है। इसमें अजवायन का जीरा डाला जाता है। इन सारी तैयारियों के साथ आगमन होता है बुंदेली-दिवाली का।
बुंदेलखंड में दीपावली का त्यौहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। यह त्यौहार धनतेरस से शुरु होकर भाई दूज पर समाप्त होता है। बुंदेलखंड में दीपावली के त्यौहार की कई लोक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो अब सिमट-सिकुड़ कर ग्रामीण अंचलों में ही रह गई हैं। जीवन पर शहरी छाप ने अनेक परंपराओं को विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया है। इन्हीं में से एक परंपरा है- घर की चैखट पर कील ठुकवाने की। दीपावली के दिन घर की देहरी अथवा चैखट पर लोहे की कील ठुकवाई जाती थी। मुझे भली-भांति याद है कि पन्ना में हमारे घर भोजन बनाने का काम करने वाली जिन्हें हम ‘बऊ’ कह कर पुकारते थे, उनका बेटा लोहे की कील ले कर हमारे घर आया करता था। वह हमारे घर की देहरी पर जमीन में कील ठोंकता और बदले में मेरी मां उसे खाने का सामान और कुछ रुपए दिया करतीं। एक बार मैं उसकी नकल में कील ठोंकने बैठ गई तो मां ने डांटते हुए कहा था-‘‘यह साधारण कील नहीं है, इसे हर कोई नहीं ठोंकता है। इसे मंत्र पढ़ कर ठोंका जाता है।’’ मेरी मां दकियानूसी कभी नहीं रहीं और न ही उन्होंने कभी मंत्र-तंत्र पर विश्वास किया लेकिन परंपराओं का सम्मान उन्होंने हमेशा किया। आज भी वे दीपावली पर पूछती हैं कि कील ठोंकने वाला कोई आया क्या? लेकिन शहरीकरण की दौड़ में शामिल काॅलोनियों में ऐसी परंपराएं छूट-सी गई हैं। दीपावली के दिन गोधूलि बेला में घर के दरवाजे पर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठुकवाने के पीछे मान्यता थी कि ऐसा करने से साल भर बलाएं या मुसीबतें घर में प्रवेश नहीं कर पातीं हैं। बलाएं होती हों या न होती हों किन्तु घर की गृहणी द्वारा अपने घर-परिवार की रक्षा-सुरक्षा की आकांक्षा की प्रतीक रही है यह परंपरा।
        दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की परंपरा रही है। आज पारंपरिक रीत-रिवाजों को मानने वाले घरों अथवा गांवों में ही दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती (सुरैती) बनाई जाती है। सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती हैं, जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति होती है, जो महिला के सोलह श्रृंगार दर्शाती है। नौ घर की भगवान विष्णु की आकृति नवग्रह का प्रतीक होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, बछड़ा व धन के प्रतीक सात घड़ों के चित्र भी बनाये जाते हैं। दीपावली पर हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के चित्र की पूजा का भी विशेष महत्व है। जिन्हें बुंदेली लोक भाषा में ‘पना’ कहा जाता है। कई घरों में आज भी परंपरागत रूप से इन चित्रों के माध्यम से लक्ष्मी पूजा की जाती है।
बुंदेलखंड में दशहरा-दीपावली पर मछली के दर्शन को भी शुभ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते चांदी की मछली दीपावली पर खरीदने और घर में सजाने की मान्यता भी बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में है। बुंदेलखंड के हमीरपुर जिला से लगभग 40 किमी. दूर उपरौस, ब्लॉक मौदहा की चांदी की विशेष मछलियां बनाई जाती हैं। कहा जाता है कि चांदी की मछली बनाने का काम देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुआ था। उपरौस कस्बे में बनने वाली इन मछलियों को मुगलकाल के बादशाह भी पसंद करते थे। अंग्रेजों के समय रानी विक्टोरिया भी इसकी कारीगरी देखकर चकित हो गयी थीं। जागेश्वर प्रसाद सोनी उसे नयी ऊंचाई पर ले गये। मछली बनाने वाले जागेश्वर प्रसाद सोनी की 14वीं पीढ़ी की संतान राजेन्द्र सोनी के अनुसार इस कला का उल्लेख इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी किताब ‘‘आइने अकबरी’’ में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि यहां के लोगों के पास बढ़िया जीवन व्यतीत करने का बेहतर साधन है, इसके बाद उन्होंने चांदी की मछली का उल्लेख किया और इसकी कारीगरी की प्रशंसा भी की है। इसके बाद सन् 1810 में रानी विक्टोरिया भी इस कला को देखकर आश्चर्यचकित हो गयी थीं। उन्होंने सोनी परिवार के पूर्वज स्वर्णकार तुलसी दास को इसके लिए सम्मानित भी किया था। राजेंद्र सोनी के अनुसार दीपावली के समय चांदी की मछलियों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। क्योंकि मछली को लोग शुभ मानते हैं और चांदी को भी। उनके अनुसार धीरे-धीरे ये व्यापार सिमटता जा रहा है। कभी लाखों रुपए में होने वाला ये कारोबार अब संकट में है और चांदी की मछलियों की परंपरा समापन की सीमा पर खड़ी है।
कुछ परंपराएं भले ही छूट रही हों, कुछ मान्यताएं भले ही बदल रही हों किन्तु बुंदेलखंड का विस्तृत भू-भाग आज भी दीपावली के लुप्त हो चले अनेक रिवाजों को अपने सीने से लगाए हुए है और उन्हें संरक्षित करने के लिए सतत् प्रयत्नशील है। ये रोचक परंपराएं हमें हमारे सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़े रखती हैं और हमारी सांस्कृतिक विशिष्टता को संजोए रखती हैं। यह याद रखने की बात है कि प्रकृति, समाज और प्रसन्नता से जुड़ी परंपराएं न तो कभी हानिकारक होती हैं और न कभी पुरानी पड़ती हैं, अपितु ये परंपराएं हमारे जातीय स्वाभिमान को बचाए रखती हैं। दीपावली पर खुले आंगन में गोबर की लिपावट की सोंधी गंध भले ही सिमट रही हो किन्तु उस पर पूरे जाने वाले चैक, सातियां, मांडने आज भी आधुनिक बुंदेली घरों के चिकने टाईल्स वाले फर्श पर राज कर रहे हैं। जब तक दीपावली के दीपक जगमगाते रहेंगे, हमारी परंपराएं भी हमारे साथ चलती रहेंगी।
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Tuesday, November 2, 2021

पुस्तक समीक्षा | मन की गहराई के हर स्तर को छूती कविताएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 02.11. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि अमरजीत कौंके के काव्य संग्रह "बन रही है नई दुनिया" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
मन की गहराई के हर स्तर को छूती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह  - बन रही है नई दुनिया
कवि         - अमरजीत कौंके
प्रकाशक     - बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर-9, रोड नं.11, बाईसा गोदाम, जयपुर-302006
मूल्य         - 100/-
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अमरजीत कौंके पंजाबी और हिन्दी के एक सुपरिचित कवि एवं अनुवादक हैं। इनके अब तक पंजाबी में सात काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जो हैं-दरिया दी कब्र चों, निर्वाण दी तलाश विच, द्वंद्व कथा, यक़ीन, शब्द रहणगे कोल, स्मृतियां दी लालटेन तथा प्यास। हिन्दी में तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं-मुट्ठी भर रोशनी, अंधेरे में आवाज़ एवं अंतहीन दौड़। ‘‘बन रही है नई दुनिया’’ उनका हिन्दी में चौथा काव्य संग्रह है। हिन्दी और पंजाबी के प्रतिष्ठित कवियो एवं लेखकों की कृतियों का अनुवाद कर चुके हैं जिनमें हिन्दी के केदारनाथ सिंह की ‘अकाल में सारस’, नरेश मेहता की ‘अरण्या’, कुंवर नारायण की ‘कोई दूसरा नहीं’, विपिन चंद्रा की ‘साम्प्रदायिकता’, अरुण कमल की ‘नए इलाके में’, मिथिलेश्वर की ‘उस रात की बात’, मधुरेश की ‘देवकीनंदन खत्री’, हिमांशु जोशी का ‘छाया मत छूना मन’ बलभद्र ठाकुर का ‘राधा और राजन’, उषा यादव की ‘मेरी संकलित कहानियां’, जसवीर चावला की ‘धूप निकलेगी’ तथा पवन करण की ‘औरत मेरे भीतर’ का पंजाबी में अनुवाद किया है। इसके साथ ही पंजाबी कवि रविंदर रवि, परमिंदर सोढी, डाॅ रविंदर, सुखविंदर कम्बोज, दर्शन बुलंदवी, बी.एस. रतन, सुरिंदर सोहल तथा बीबा बलवंत की कृतियों का हिन्दी में अनुवाद कर चुके हैं। शिक्षा जगत में कार्यरत अमरजीत कौंके का अपना एक मौलिक दृष्टिकोण तथा अपना एक अलग रचना संसार है। वे दुनियावी समस्याओं को अपने अनुभव के तराजू से तौलते हैं, जांचते, परखते हैं फिर उन्हें अपनी कविताओं में ढाल देते हैं।
हिन्दी के कश्मीरी मूल के कवि अग्निशेखर जब अपने जलते अनुभवों को सहेजते हुए कहते हैं कि ‘‘मैं कविता लिखता हूं, इसीलिए जी पा रहा हूं।’’ वहीं पंजाबी मूल के अमरजीत कौंके कविता के महत्व को इन शब्दों में बयान करते हैं कि -
मैं कविता लिखता हूं
क्योंकि मैं जीवन को
उसकी सार्थकता में
जीना चाहता हूं
कविता न लिखूं
तो मैं निर्जीव पुतला
बन जाता मिट्टी का
खता, पीता, सोता
मुफ़्त में डकारता

अमरजीत कौंके कविता को मनुष्य की जीवन्तता और सजगता का प्रमाण मानते हैं। उनका ऐसा मानना सही है क्योंकि कविता संवेदनाओं के सक्रिय रहने पर ही उपजती है। जब संवेदना जाग्रत रहेगी तभी व्यक्ति अपने और दूसरे के दुखों का आकलन कर सकेगा, उनके कारणों का पता लगा सकेगा और समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार कर सकेगा। संवेदना जब द्रवित अवस्था में होती है तो वह साहित्य का रास्ता चुनती है। संवेदना की सांद्रता साहित्य में दुनिया का एक ऐसा प्रतिबिम्ब प्रस्तुत कर देती है जो देखने, समझने वाले की अंतश्चेतना को आलोड़ित कर देती है। साहित्य में भी काव्य की संक्षिप्तता गद्य की अपेक्षा त्वरित संवाद करती है। संग्रह की एक कविता है ‘‘कोसों तक अंधेरा’’। इस कविता में कवि ने अपने भीतर मौजूद व्याकुलता के अंधेरे का गहनता से वर्णन किया है-
मैं जिस रौशनी में बैठा हूं
मुझे वह रौशनी
मेरी नहीं लगती
इस मस्नूई सी रौशनी की
कोई भी किरण
न जाने क्यों
मेरी रूह में
नहीं जगती
जगमग करता
आंखें चैंधियाता
यह जो रौशन चुफेरा है
भीतर झांक कर देखूं
तो कोसों तक अंधेरा है

अमरजीत कौंके अपनी हिन्दी कविताओं में पंजाबी शब्दों का प्रयोग भी बड़ी सहजता से करते हैं जिससे यदि किसी हिन्दी पाठक को उस शब्द का अर्थ पता न हो तब भी वह उस शब्द का भावार्थ समझ सकता है। जैसे ऊपर उद्धृत कविता में ‘‘चुफेरा’’ शब्द आया है-‘‘यह जो रौशन चुफेरा है’’। ‘‘चुफेरा’’ का हिन्दी में अर्थ होता है- चारो ओर, चहुंओर। ‘‘यह जो रौशन चुफेरा है’’ अर्थात् ‘‘यह जो प्रकाश चारो और व्याप्त है’’। इस प्रकार आए हुए पंजाबी के शब्द कौंके की हिन्दी कविताओं में कहीं बाधा नहीं बनते हैं वरन् शाब्दिक भाषाई सेतु का काम करते हैं, कविता की सुंदरता बढ़ाते हैं।
काव्य और जीवन दर्शन का सदा ही प्रगाढ़ संबंध रहा है। संत कवि कबीर ने जाति, धर्म, रूढ़ि आदि का मुखर विरोध किया किन्तु वहीं मानव को अपने अस्तित्व की सत्ता को पहचानने का भी आग्रह किया। कबीर देह और प्रज्ञा के निर्माण को एक चदरिया बुनने की प्रक्रिया में ढाल कर देखते हैं और कहते हैं-
झीनी झीनी बीनी चदरिया....
काहे कै ताना काहे कै भरनी
कौन तार से बीनी चदरिया।।
इडा पिङ्गला ताना भरनी
सुखमन तार से बीनी चदरिया।।

आत्मावलोकन तथा आत्ममंथन की इसी प्रक्रिया से गुज़रते हुए कवि अमरजीत कौंके ‘‘मान की चादर’’ कविता लिखते हैं। कवि मन की चादर पर लगी मैल को धो डालने का आह्वान करते हैं। यह एक निर्गुणिया आग्रह है जो आज के बाज़ारवादी उत्तर आधुनिकता के समय में बहुत ज़रूरी-सा लगता है। आज हम भौतिक वस्तुओं को पा लेने की अंधी दौड़ में शामिल होने को ही सुख मान बैठते हैं और अपने मन की चादर पर पड़ते दागों की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है। ऐसे भ्रमित कर देने वाले कठिन समय में कवि ने आत्मचिंतन को रेखांकित करते हुए लिखा है-
निचोड़ दो मुझे
गीले कपड़े की तरह
निचुड़ जाए सारी मैल
जो मन की चादर पर लगी
द्वेष, निर्मोह, झूठ, कपट,
फ़रेब की मैल
जो मन की चादर पर जमी
जन्म बीत गए धुलते इसे
धुली बार-बार / हज़ार बार
लेकिन उतरती नहीं मैल
अच्छी तरह धो डालो
मन मेरे की मैली चादर
निचोड़ दो /अच्छी तरह इसको
और दे दो नील

‘‘मां के लिए सात कविताएं’’ उस मां को समर्पित हैं जो अपनी मृत्यु से जूझ रही है और जिसने जीवन भर अपने परिवार की सुख-सुविधा के लिए नाना प्रकार की समस्याओं से जूझा है। मां के चिरविदा होने पर कवि अकुला कर कह उठता है-
जब से तू गई है मां
घर घास के तिनकों की तरह
बिखर गया है

अमरजीत कौंके प्रेम को जब लिपिबद्ध करते हैं तो वह प्रेम अथाह भावनाओं का प्रस्फुटन बन कर सामने आता है। उदाहरण देखिए ‘‘तुमने तो’’ शीर्षक कविता से-
तुमने तो हंसते-हंसते
पानी में
एक कंकर ही उछाला
लेकिन पानी की
लहरों के बीच का
अक़्स पकड़ने के लिए
मैंने सारा का सारा पानी खंगाल डाला

अमरजीत कौंके की कविताएं मन की गहराई के हर स्तर को छूती हैं। ये कविताएं सहज एवं संप्रेषणीय तो हैं ही, इनमें एक ऐसा अनुभव-संसार है जो किसी भी व्यक्ति का हो सकता है। इन कविताओं में मौजूद प्रेम, करुणा, उलाहना, विक्षोभ, अकुलाहट, वैराग्य और विश्वास ही वे तत्व हैं जिनसे एक नई दुनिया के निर्माण की सतत् प्रक्रिया चल रही है। वस्तुतः अनुभव के कैनवास पर भावों से चित्रित कविताओं का यह काव्य संग्रह ‘‘बन रही है नई दुनिया’’ निश्चित रूप से पठनीय है।
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