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Friday, November 21, 2025

शून्यकाल | मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल
मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                                   संस्कृति व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के सतत् विकास का महत्त्व पूर्ण आधार है। मानव मूल्य संस्कृति से ही उत्पन्न होते हैं और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सत्य, शिव और सुन्दर के शाश्वत मूल्यों से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति में पाषाण जैसी जड़ वस्तु भी देवत्व प्राप्त कर सर्वशक्तिमान हो सकती है और नदियां एवं पर्वत माता, पिता, बहन, आदि पारिवारिक संबंधी बन जाते हैं। ऐसी भारतीय संस्कृति की नाभि में मानवमूल्य ठीक उसी तरह अवस्थित है जैसे भगवान विष्णु की नाभि में कमल पुष्प और उस कमल पुष्प पर जिस तरह ब्रह्मा विद्यमान हैं, उसी तरह मानवमूल्य पर ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः’ की लोक कल्याणकारी भावना विराजमान है। वस्तुतः मूल भारतीय संस्कृति में धर्म, जाति, विचार आदि के भेद को ‘भेद’ या अलगाव नहीं वरन् विविधता माना गया है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है।

      संस्कृति, राष्ट्र और समाज ये तीन ईकाइयां हैं, जो मानव संस्कृति को आकार देती हैं। सुसंस्कृति से सुराष्ट्र आकार लेता है और अपसंस्कृति से अपराष्ट्र। शब्द अनसुना सा लग सकता है-‘‘अपराष्ट्र’‘। किन्तु यदि राष्ट्रों की राजनीतिक स्तर पर अपराधों में लिप्तता राजनीतिक कुसंस्कारों को जन्म देती है और यही कुसंस्कार राष्ट्र में अतंकवाद की गतिविधियों को प्रश्रय देते हैं। विश्व में कई देश ऐसे हैं जो राजनीतिक दृष्टि से अपराष्ट्र की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। वहीं भारत की संस्कृति का स्वरूप इस प्रकार का है जिसमें अपसंस्कारों की कोई जगह नहीं है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है। यदि प्रत्येक मनुष्य में देवत्व के गुण जाग्रत हो जाएं तो सांस्कृतिक विकार जागने अथवा किसी विषम पल में जाग भी जाए तो उसके स्थाई रूप से बने रहने का प्रश्न ही नहीं है। संस्कृत में प्रणीत हमारा संपूर्ण वाङ्मय वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भागवत, भगवद्गीता आदि के रूप में विद्यमान है, जिसमें हमारे जीवन को सार्थक बनाने के सभी उपक्रमों का विस्तृत विवरण विद्यमान है। इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है कि संस्कृति एक शाब्दिक ईकाई नहीं वरन् जीवन की समग्रता की द्योतक है। संस्कृति मात्र चेतन तत्वों के लिए ही नहीं अपितु जड़तत्वों के लिए भी प्रतिबद्धता का आग्रह करती है। अब प्रश्न उठता है कि क्या जड़ तत्वों के लिए भी कोई सांस्कृतिक आह्वान होता है जबकि जड़ तो जड़ है, निचेष्ट, निर्जीव। फिर निर्जीव के लिए संसकृति का कैसा स्वरूप, कैसा रूप? ठीक इसी बिन्दु पर भारतीय संस्कृति की महत्ता स्वयंसिद्ध होने लगती है।
      भारतीय संस्कृति समस्त जड़ ओर समस्त चेतन जगत से तादात्म्य स्थापित करने का तीव्र आग्रह करती है। यही आग्रह आज हम पर्यावरण संतुलन के आग्रह के रूप में देखते हैं, सुनते हैं और उसके लिए चिन्तन-मनन करते हैं। जब पा्रणियों का शरीर पंचतत्वों से बना हुआ है और ये पंचतत्व वही हैं जिनसे संसार के जड़ तत्वों की भी पृथक-पृथक रचना हुई है, तो जड़ और चेतन के पारस्परिक संबंध अलग कहां हैं? ये दोनों तो घनिष्ठता से परस्पर जुड़े हुए हैं। 
        संस्कृति की ध्वजा को फहराते रहने का दायित्व मानव का है क्योंकि वही धरती पर उपस्थित शेष प्राणियों में सबसे अधिक विचारवान और निर्मितिपूर्ण है। निर्माणकौशल के सतत् विकास ने मानव को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठतर बना दिया है। मनुष्य के निर्माणकौशल ने ही उसे सामाजिक प्राणी बनाया और मिलजुल कर रहने के लाभ को जानना सिखाया। मानव के निर्माणकौशल के विकास ने आज उसे इलेक्ट्राॅनिकयुग तक पहुंचा दिया है और यह विकासयात्रा अभी जारी है। किन्तु इसी विकास ने मानवजीवन में ‘‘मूल्य’’ शब्द के स्वरूप को अर्थतंत्र का अनुगामी बना दिया है। यूं तो ‘‘मूल्य’’ एक मानक है श्रेष्ठता के आकलन का। जिसके लिए अधिक श्रम, अधिक मुद्रा खर्च करनी पड़े, जिसके लिए मानव मन में अधिक ललक हो किन्तु उपलब्धता सीमित हो, वह मूल्यवान है। इसके विपरीत जो सुगमता से, कम मुद्राओं में मिल जाए, जिसकी उपलब्धता भी प्रचुर हो और जिसके प्रति मानव मन में अधिक ललक न हो वह सस्ता कहलाता है। यही परिभाषा बनाई है अर्थशास्त्रियों ने। किन्तु जब बात संसकृति की हो अर्थात् जीवनशैली की हो तो ‘‘मूल्य’’ शब्द का अर्थ असीमित और अपरिमित हो जाता है। संस्कृति बाज़ार की वस्तु नहीं है, उसे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है। संस्कृति तो आचरण है जिसे अपनाया अथवा छोड़ा जा सकता है। जो संस्कृति को अपनाता है वह संस्कारवान होता है और जो संस्कृति का त्याग कर देता है, त्याग से यहां आशय सांस्कृति मूल्यों के त्याग से है। तो, जो संस्कृति को त्याग देता है वह असंस्कारी हो जाता है। 
                 भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाये गये शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्त्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि हज़ारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है, जबकि मिस्र, असीरिया, यूनान और रोम की संस्कृतियों अपने मूल स्वरूप को लगभग विस्मृत कर चुकी हैं। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्य तथा अन्य प्राकृतिक देवी- देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है। देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतना ही है, जितना हज़ारों वर्ष पूर्व था। गीता और उपनिषदों के सन्देश हज़ारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। समयानुसार परिवर्तनों के बाद भी भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में निरन्तरता रही है।
भारतीय संस्कृति वह मार्ग सुझाती है कि वे सांस्कृतिक मूल्य कहां से सीख सकते हैं जो मनावजीवन को मूल्यवान बना दे -
परोपकाराय फलन्ति वृक्षः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदम् शरीरम्।

अर्थात् - वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियां परोपकार के लिए बहती हैं, गाय परोकार के लिए दूध देती हैं अतः अपने शरीर अर्थात् अपने जीवन को भी परोपकार में लगा देना चाहिए।

भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चौ्रासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ मानती है किन्तु साथ ही अन्य योनियों की महत्ता को भी स्वीकार करती है। जिसका आशय है कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। और यह तभी संभव है जब प्रकृति के प्रति मनुष्य की आत्मीयता ठीक उसी प्रकार हो जैसे अपने माता-पिता, भाई, बहन, गुरु और सखा आदि प्रियजन से होती है। यह आत्मीयता भारतीय संस्कृति में जिस तरह रची-बसी है कि उसकी झलक गुरुगंभीर श्लोकों के साथ ही लोकव्यवहार में देखा जा सकता है। लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मां है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे। भारतीय संस्कृति लोक व्यवहार की संस्कृति है जो हमने प्रकृति से सीखी है, इस बात को हमेशा हमें याद रखना चाहिए।  
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Tuesday, March 19, 2024

पुस्तक समीक्षा | भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 19.03.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ के काव्य संग्रह "सब तेरे सत्कर्मी फल हैं" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा       
भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण करती कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - सब तेरे सत्कर्मी फल हैं
कवि       - संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’
प्रकाशक    - एन.डी. पब्लिकेशन, नई दिल्ली-3
मूल्य       - 150/-
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हमारी भारतीय संस्कृति में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति उसी तरह विकसित होता है जैसे उसे संस्कार मिलते हैं। यह संस्कार देने का दायित्व माता-पिता और गुरुजन का होता है। चूंकि अब गुरुकुल पद्धति नहीं है अतः संतान की बाल्यावस्था सबसे अधिक अपने माता-पिता के साथ व्यतीत होती है। इसीलिए वे ही प्रथमतः निर्णायक होते हैं अपनी संतान के भविष्य निर्माण के। इसीलिए माता-पिता स्तुत्य होते हैं। इस बात को पौराणिक ग्रंथों, उपनिषदों आदि में पद्यात्मक रूप में कहा गया है। यूं भी साहित्य में हर कथन अधिक प्रभावकारी होता है। ‘‘पद्मपुराण’’ के सृष्टिखंड (47/11) में कहा गया है-
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयरू पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत।।
- अर्थात माता सर्वतीर्थ हैं और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप हैं इसलिए सभी प्रकार से यत्नपूर्वक माता-पिता का पूजन करना चाहिए।
विगत कुछ दशकों से यथार्थ के कठोर परिदृश्य को कविता में उतारने के प्रयास ने भावनात्मक संबंधों पर लेखनी को हाशिए में कर दिया है। माता-पिता पर काव्य सृजन करना गोया पिछड़ी हुई बात हो। किन्तु कुछ कवि हैं जो ऐसे भ्रम को तोड़ कर भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण कर रहे हैं। ऐसे कवि अपने माता-पिता के प्रति समर्पित कविताएं लिख रहे हैं। संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ भी ऐसे ही एक कवि हैं जिन्होंने अपने प्रथम काव्य संग्रह को पूरी तरह अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए तथा अपने दिवंगत पिता के प्रति संबोधित होते हुए संग्रह का नाम दिया है- ‘‘सब तेरे सत्कर्मी फल हैं’’।
आज के दौर में जब बच्चे माता-पिता तथा परिवार की वरिष्ठजन से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में कवि विद्यार्थी  की कविताओं का बहुत अधिक महत्व है यह कविताएं बड़ों के प्रति रागात्मक व्यवहार का अनुमोदन करती हैं। यह जननी तथा जनक के महत्व को स्थापित करती हैं। ये कविताएं बड़ी सामयिक हैं क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति में वानप्रस्थ आश्रम की संकल्पना है किन्तु वृद्धाश्रम की नहीं। वानप्रस्थ आश्रम वह होता था जिसमें व्यक्ति अपने समस्त पारिवारिक दायित्वों को पूर्ण कर के प्रकृति के निकट रहने के लिए वन में प्रस्थान कर जाता था। किन्तु उसके जीवनयापन की सम्पूर्ण व्यवस्था उसके परिजन करते थे तथा उससे सदा भेंट कर करते रहते थे। किन्तु वृद्धाश्रम व्यवस्था में उपेक्षापूर्ण ढंग से अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम के हवाले कर के, चंद रुपयों का सहयोग कर के इतिश्री मान लिया जाता है। इसमें माता-पिता के सुख की भावना नहीं वरन् उनसे छुटकारे की भावना प्रबल रहती है। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लगभग पिछली एक पीढ़ी से माता-पिता धन कमाने के चक्कर में बच्चों के उचित लालन-पालन से विरत होते चले गए हैं। यह रवैया और अधिक बढ़ता जा रहा है।
संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ ने बढ़ते जा रहे इस सामाजिक दोष को दूर करने की दिशा में माता-पिता एवं वरिष्ठजन पर कविताएं लिख कर उत्तम कार्य किया है। माता-पिता पर केंद्रित उनकी कविताएं जहां संवेदनशील और भावपूर्ण है वही उनकी सामाजिक अर्थवत्ता बहुत अधिक है। अपने जन्मदाता एवं जन्मदात्री को समर्पित करते हुए वे लिखते हैं - ‘‘सब तेरे सत्कर्मी फल हैं’’। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
मेरे हृदय पटल तुम शाश्वत, मेरे नयन सुमिरनी जल है।
इसमें मेरी कौन बड़ाई, सब तेरे सत्कर्मी फल है।।
सत्कर्मों के बीज परिष्कृत, जो धरती उर्वरा न पाई।
बोलो बीज करे क्या प्रियवर, या ऊसर है या निर्जल है।।
तुमनें ही तो मन-मस्तिष्की, मेरे फसल-क्षेत्र को साधा।
खून-पसीने का जल सींचा, मेरी चिंता, रहे विकल हैं।।
मेरे जनक, परम प्रिय जननी, मेरे आत्मरथी सुख करनी।
तेरे पुण्य, हस्त-पग मेरे, मेरी तरनी है, भुजबल हैं।।

माता-पिता के संस्कार ही संतान को अच्छा या बुरा बनाते हैं मुझे एक कहानी याद आती है जो मुख्य रूप से भीली लोक कथा है। एक गांव में एक युवक था जिसे चोरी करने की आदत थी। वह इतनी कुशलता से चोरी करता कि कभी पकड़ा नहीं जाता और जब भी वह चोरी का सामान लेकर घर पहुंचता तो उसकी मां उससे बहुत शाबाशी देती। वह बेटे की पीठ ठोंक कर कहती कि ‘‘वाह बेटा, तूने बहुत बढ़िया काम किया है।’’ अपनी मां से शाबाशी पा कर उस चोर का साहस बढ़ता गया। एक समय ऐसा आया कि वह राजमहल में चोरी करने घुस गया। उसे लगा कि यदि मैं कोई राजसी सामान चुरा कर ले जाऊंगा तो मेरी मां गर्व से भर उठेगी। दुर्भाग्यवश वह राजमहल में घुसते ही पकड़ा गया। राजा ने उसे सरेआम हजार कोड़े लगाए जाने की सजा सुनाई। जब मां को पता चला तो वह रोती हुई कोड़े मारने वाले के पास पहुंची और पुत्र को छोड़ देने का अनुरोध करने लगी। वह कोड़े मारने वाले से रो-रो कर कहने लगी कि ‘‘मैं अपन पुत्र को दण्डित होते नहीं देख सकूंगी।’’ तब पुत्र ने मां से कहा कि ‘‘मंा यह तो तुम्हें उस समय सोचना था जब मैंने पहली बार चोरी की थी और तुमने मेरी पीठ थपथपा कर मुझे शाबाशी दी थी। यदि तुमने उसी दिन एक थप्पड़ मेरे गाल पर मारा होता तो आज मुझे हजार कोड़े खाने की सज़ा न मिलती। तुम मेरी मां हो लेकिन मुझे दुख है कि तुमने मां का सही दायित्व नहीं निभाया।’’ यह सुन कर मां अपना-सा मुंह ले कर रह गई। उसका बेटा जो कह रहा था, सच कह रहा था। संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ ने अपने पिता और माता दोनों को समान रूप से स्मरण करते हुए कविताएं लिखी हैं। पिता पर लिखी उनकी कविता ‘‘ऐ मेरे जन्मदाता’’ की पंक्तियां देखिए-
ऐ मेरे जन्मदाता, मैं हूँ तेरी निशानी।
कुछ भी नहीं है मेरा, सब तेरी मेहरबानी ।।
जिस दिन मैं बीज बनकर, माँ के गरभ में आया,
उस दिन से ही तुम्हारे मश्तिष्क में समाया।
उस दिन से शुरू कर दी, गढ़ना मेरी कहानी,
कुछ भी नहीं है मेरा, सब तेरी मेहरबानी ।।
 फिर माता के प्रति उन्होंने अपना समर्पण भरा अनुराग एवं श्रद्धा व्यक्त की है। ‘‘पुण्य तेरा हम सबके माथे सूर्य किरण जैसा चमके’’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-
प्रसव वेदना में जिसके, दिखता क्रंदन,
हृदयांचल में सदा, मधुर मुस्कान लिया।
धरा पदार्पण में तेरे, जिस देवी ने,
कर विस्मृत पीड़ा, चुंबन प्रतिदान दिया।।
मेरे जीवन का आधार, चुंबन तेरा,
मेरे चेहरे के आकाश दामिनी दमके।
पुण्य तेरा हम सबके माथे,
सूर्य किरण जैसा चमके ।।
ऐसा नहीं है कि कवि ‘‘विद्यार्थी’’ ने मात्र अपने माता-पिता का स्मरण किया हो, उन्होंने देश के ‘‘बापू’’ महात्मा गंाधी पर भी कविता बापू के ‘‘मधुरिम सपनों का, फैला भारतवर्ष वहां’’ लिखी है-
छोड़ छाड़ वैभव बापू ने, जिस कल का बलिदान किया।
आज वही कल हम जीते हैं, हमको जीवन दान दिया।।
इस कल को गढ़ना अरु बढ़ना, आज हमारा सपना है।
जो देखा बापू ने सपना, स्वर्णिम सपना अपना है।।

लगभग 25 पृष्ठ तक ईश्वर की आराधना, माता-पिता की स्तुति, राष्ट्र शहर तथा विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ हरि सिंह गौर की वंदना की गई है। तदोपरांत निर्वाचन लोकतंत्र का पर्व, दान नहीं मतदान, जैसी कविताओं के द्वारा जन जागरूकता के विषयों को रखा गया है। कवि विद्यार्थी ने हिंदी और बुंदेली पर भी कविताएं लिखी हैं। कवि विद्यार्थी  की कविताओं की विशेषता यह है कि वे विभिन्न छंदों में निबद्ध हैं जिससे उनके छांदासिक ज्ञान का पता चलता है और इससे उनकी रचनाओं की मधुरता भी बढ़ गई है। जब भाव और शिल्प समान रूप से अभिव्यक्ति पाते हैं तो रचना और अधिक लुभावनी हो जाती है तथा स्मृति में देर तक बनी रहती है।
डॉ सुरेश आचार्य जी ने पुस्तक की भूमिका में उचित लिखा है कि ‘‘कवि विद्यार्थी  नाम से भले विद्यार्थी हैं किंतु काम से शिक्षक हैं।’’ इसी तरह गीतऋषि डॉ. श्याममनोहर सीरोठिया ने भूमिका में लिखा है- ‘‘कवि ‘‘विद्यार्थी’’ जी ने लोक जीवन के अनेक आदर्श-पात्रों को अपने काव्य में उतारा है, जिनमें महर्षि बाल्मिकी, संत शिरोमणि तुलसीदास, राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर जी की सृजनशीलता के संस्कारों को काव्य में आत्मसात करने का बड़ा कार्य किया है। इसी क्रम में युग-संत स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, डॉ. हरिसिंह गौर जैसे महापुरूषों के उदात्त चरित्रों को अपनी रचनाओं में सम्मानजनक स्थान दिया है। ये रचनाऐं शुचिता की ऐसी त्रिवेणी हैं जिनमें अवगाहन कर पाठक अपने आपको परिष्कृत करने का अवसर भी पाता है।’’
आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी ने कवि के कला पक्ष को रेखांकित करते हुए लिखा है कि- ‘‘विद्यार्थी जी की रचनाएँ छंदबद्ध हैं जिनमें मनहरण घनाक्षरी, लावनी, दोहे, चैपाई, मत्तगयंद सवैया, ताटंक जैसे छन्द पठनीय होने के साथ गेय हैं। अपने माता-पिता का पुण्य-स्मरण, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, सागर सपूत डॉ. हरिसिंह गौर को समर्पित रचनाएँ मनमोहक हैं, साथ ही राष्ट्र के अमर वीरों का पुण्य-स्मरण भी पाठकों को मातृभूमि के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। ‘‘विद्यार्थी जी’’ का यह काव्य-संग्रह सृजन का सुकृत प्रयास सराहनीय एवं स्तुत्य है।’’
संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ की कविताएं आस्थावान पारंपरिक मूल्यों एवं पारिवारिक संबंधों की उष्मा से परिपूर्ण  हैं। परिवार के प्रति पिता के दायित्वों एवं कर्तव्यों पर लिखी कविताओं के माध्यम से कवि ने सम्पूर्ण पिताओं के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है। भारतीय संस्कृति की परम्पराओं के पोषण की दिशा में संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ का यह प्रथम काव्य संग्रह महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
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Wednesday, February 15, 2023

चर्चा प्लस | भारतीय संस्कृति और मानवमूल्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
भारतीय संस्कृति और मानवमूल्य
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
       संस्कृति, राष्ट्र और समाज ये तीन ईकाइयां हैं, जो मानव संस्कृति को आकार देती हैं। सुसंस्कृति से सुराष्ट्र आकार लेता है और अपसंस्कृति से अपराष्ट्र। शब्द अनसुना सा लग सकता है-‘‘अपराष्ट्र’‘। किन्तु यदि राष्ट्रों की राजनीतिक स्तर पर अपराधों में लिप्तता राजनीतिक कुसंस्कारों को जन्म देती है और यही कुसंस्कार राष्ट्र में अतंकवाद की गतिविधियों को प्रश्रय देते हैं। विश्व में कई देश ऐसे हैं जो राजनीतिक दृष्टि से अपराष्ट्र की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। वहीं भारत की संस्कृति का स्वरूप इस प्रकार का है जिसमें अपसंस्कारों की कोई जगह नहीं है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है।
संस्कृत में प्रणीत हमारा संपूर्ण वाङ्मय वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भागवत, भगवद्गीता आदि के रूप में विद्यमान है, जिसमें हमारे जीवन को सार्थक बनाने के सभी उपक्रमों का विस्तृत विवरण विद्यमान है। इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है कि संस्कृति एक शाब्दिक ईकाई नहीं वरन् जीवन की समग्रता की द्योतक है। संस्कृति मात्र चेतन तत्वों के लिए ही नहीं अपितु जड़तत्वों के लिए भी प्रतिबद्धता का आग्रह करती है। अब प्रश्न उठता है कि क्या जड़ तत्वों के लिए भी कोई सांस्कृतिक आह्वान होता है जबकि जड़ तो जड़ है, निचेष्ट, निर्जीव। फिर निर्जीव के लिए संसकृति का कैसा स्वरूप, कैसा रूप? ठीक इसी बिन्दु पर भारतीय संस्कृति की महत्ता स्वयंसिद्ध होने लगती है। भारतीय संस्कृति समस्त जड़ ओर समस्त चेतन जगत से तादात्म्य स्थापित करने का तीव्र आग्रह करती है। यही आग्रह आज हम पर्यावरण संतुलन के आग्रह के रूप में देखते हैं, सुनते हैं और उसके लिए चिन्तन-मनन करते हैं। जब पा्रणियों का शरीर पंचतत्वों से बना हुआ है और ये पंचतत्व वही हैं जिनसे संसार के जड़ तत्वों की भी पृथक-पृथक रचना हुई है, तो जड़ और चेतन के पारस्परिक संबंध अलग कहां हैं? ये दोनों तो घनिष्ठता से परस्पर जुड़े हुए हैं।
विकास ने मानवजीवन में ‘‘मूल्य’’ शब्द के स्वरूप को अर्थतंत्र का अनुगामी बना दिया है। यूं तो ‘‘मूल्य’’ एक मानक है श्रेष्ठता के आकलन का। जिसके लिए अधिक श्रम, अधिक मुद्रा खर्च करनी पड़े, जिसके लिए मानव मन में अधिक ललक हो किन्तु उपलब्धता सीमित हो, वह मूल्यवान है। इसके विपरीत जो सुगमता से, कम मुद्राओं में मिल जाए, जिसकी उपलब्धता भी प्रचुर हो और जिसके प्रति मानव मन में अधिक ललक न हो वह सस्ता कहलाता है। यही परिभाषा बनाई है अर्थशास्त्रियों ने। किन्तु जब बात संसकृति की हो अर्थात् जीवनशैली की हो तो ‘‘मूल्य’’ शब्द का अर्थ असीमित और अपरिमित हो जाता है। संस्कृति बाज़ार की वस्तु नहीं है, उसे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है। संस्कृति तो आचरण है जिसे अपनाया अथवा छोड़ा जा सकता है। जो संस्कृति को अपनाता है वह संस्कारवान होता है और जो संस्कृति का त्याग कर देता है, त्याग से यहां आशय सांस्कृति मूल्यों के त्याग से है। तो, जो संस्कृति को त्याग देता है वह असंस्कारी हो जाता है।
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि हज़ारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्य तथा अन्य प्राकृतिक देवी - देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है। देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतना ही है, जितना हज़ारों वर्ष पूर्व था। गीता और उपनिषदों के सन्देश हज़ारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। समयानुसार परिवर्तनों के बाद भी भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में निरन्तरता रही है। भारतीय संस्कृति वह मार्ग सुझाती है कि वे सांस्कृतिक मूल्य कहां से सीख सकते हैं जो मनावजीवन को मूल्यवान बना दे -
परोपकाराय फलन्ति वृक्षः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदम् शरीरम्।
अर्थात् - वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियां परोपकार के लिए बहती हैं, गाय परोकार के लिए दूध देती हैं अतः अपने शरीर अर्थात् अपने जीवन को भी परोपकार में लगा देना चाहिए।

भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चैरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ मानती है किन्तु साथ ही अन्य योनियों की महत्ता को भी स्वीकार करती है। जिसका आशय है कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। और यह तभी संभव है जब प्रकृति के प्रति मनुष्य की आत्मीयता ठीक उसी प्रकार हो जैसे अपने माता-पिता, भाई, बहन, गुरु और सखा आदि प्रियजन से होती है। यह आत्मीयता भारतीय संस्कृति में जिस तरह रची-बसी है कि उसकी झलक गुरुगंभीर श्लोकों के साथ ही लोकव्यवहार में देखा जा सकता है। यहां कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मंा है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे।

एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बाम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। बुंदेलखण्ड में नर्मदा को मां का स्थान दिया गया है। नर्मदा स्नान करने नर्मदातट पर पहुंची मनुष्यों की टोली नर्मदा को देखते ही गा उठती है-
नरबदा मैया ऐसे तौ मिलीं रे
अरे, ऐसे तौ मिलीं के जैसे मिले मताई औ बाप रे
नरबदा मैया... हो....
जब नर्मदा माता है तो गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी? क्या उनसे कोई नाता नहीं रह जाता है? लोकमानस त्रिवेणी से भी अपने रिश्तों को व्याख्यायित करता है। बाम्बुलिया गीत का ही एक और अंश उदाहरणार्थ-
नरबदा मोरी माता लगें रे
अरे, माता तौ लगें रे, तिरबेनी लगें मोरी बैन रे
नरबदा मैया... हो...
वहीं भोजपुरी लोकगीतों में गंगा को मां, यमुना को बहन, चांद और सूरज को भाई कहा गया है और साथ ही स्त्री की झिझक को प्रकट करते हुए यह भी कहा गया है कि इनके द्वारा अपने परदेसी पति को संदेश कैसे भिजवाऊं, अब प्रियतम तक तुम्हीं संदेश पहुंचाओ मेरी सखी!
चननिया छिटकी मैं का करूं गुंइया
गंगा मोरी मइया, जमुना मोरी बहिनी,
चान सुरुज दूनो भइया,
पिया को संदेस भेजूं गुंइया।
प्रकृति का मानवीकरण भोजपुरी लोकगीतों में बड़े सुन्दर ढंग से मिलता है। जैसे उपनयन, विवाह आदि संस्कारों में तीर्थस्थल गया को और तीर्थराज प्रयाग को निमंत्रण भेजा जाता है-
गया जी के नेवतिले आजु त
नेवीतीं बेनीमाधव हो
नेवतिलें तीरथ परयाग,
तबहीं जग पूरन हो ...
अर्थात् जब गया और तीर्थराज प्रयाग जैसे पावन स्थलों को आमंत्रित किया जाएगा, तभी यज्ञ तभी पूरा होगा।
भारतीय संस्कृति में मानवमूल्य की महत्ता इतनी सघन है कि प्रकृति को भी रक्तसंबंधियों से अधिक घनिष्ठ माना जाता है। इसके उदाहरण लोकसंस्कारों में देखे जा सकते हैं जो आज भी ग्रामीण अंचलों में निभाए जाते हैं-

कुआ पूजन - 
विवाह के अवसर पर विभिन्न पूजा-संस्कारों के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है। यह जल नदी, तालाब अथवा कुए से लाया जाता है। इस अवसर पर रोचक गीत गाए जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है जिसमें कहा गया है कि विवाह संस्कार के लिए पानी लाने जाते समय एक सांप रास्ता रोक कर बैठ जाता है। स्त्रियां उससे रास्ता छोड़ने का निवेदन करती हैं किन्तु वह नहीं हटता है। ठीक किसी हठी रिश्तेदार की तरह। जब स्त्रियां उसे विवाह में आने का निमंत्रण देती हैं तो वह तत्काल रास्ता छोड़ देता है।

सप्तपदी में जल विधान - 
विवाह में सप्तपदी के समय पर जो पूजन-विधान किया जाता है, उसमें भी जल से भरे मिट्टी के सात कलशों का पूजन किया जाता है। ये सातो कलश सात समुद्रों के प्रतीक होते हैं। इन कलशों के जल को एक-दूसरे में मिला कर दो परिवारों के मिलन को प्रकट किया जाता है।
पूजा-पाठ में जल का प्रयोग - पूजा-पाठ के समय दूर्वा से जल छिड़क कर अग्नि तथा अन्य देवताओं को प्रतीक रूप में जल अर्पित किया जाता है जिससे जल की उपलब्धता सदा बनी रहे।

मातृत्व साझा कराना - 
सद्यःप्रसूता जब पहली बार प्रसूति कक्ष से बाहर निकलती है तो सबसे पहले वह कुएं पर जल भरने जाती है। यह कार्य एक पारिवारिक उत्सव के रूप में होता है। उस स्त्री के साथ चलने वाली स्त्रियां कुएं का पूजन करती हैं फिर प्रसूता स्त्री अपने स्तन से दूध की बूंदें कुएं के जल में निचोड़ती हैं। इस रस्म के बाद ही वह कुएं से जल भरती है। इस तरह पह पेयजल को अपने मातृत्व से साझा कराती है क्योंकि जिस प्रकार नवजात शिशु के लिए मां का दूध जीवनदायी होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों के लिए जल जीवनदायी होता है।
वस्तुतः संस्कृति व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के सतत् विकास का महत्त्व पूर्ण आधार है। मानव मूल्य संस्कृति से ही उत्पन्न होते हैं और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सत्य, शिव और सुन्दर के शाश्वत मूल्यों से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति में पाषाण जैसी जड़ वस्तु भी देवत्व प्राप्त कर सर्वशक्तिमान हो सकती है और नदियां एवं पर्वत माता, पिता, बहन, आदि पारिवारिक संबंधी बन जाते हैं। भारतीय संस्कृति मानव मूल्यों के संरक्षण का पर्याय है।
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Thursday, October 13, 2022

मार्क्सवाद के साथ भारतीय संस्कृति के पक्षधर थे फुसकेले - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"महेन्द्र फुसकेले मार्क्सवादी थे पर संस्कृति एवं भारतीय परंपरा के संरक्षण के पक्षधर थे। उन्होंने अपने साहित्य में दलित, शोषित व स्त्री की समस्या को उठाया है। महेंद्र फुसकेले जी जमीनी सच्चाई से जुड़ा हुआ लेखन ही पसंद करते थे। उनका स्वयं का लेखन वह चाहे उपन्यास हो या कविताएं दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए समर्पित रहा है उन्होंने महिलाओं की दलित शोषित स्थिति पर बहुत बारीकी से कलम चलाई। उनके उपन्यासों में महिलाओं की दुर्दशा ही नहीं वरन उनके सशक्तिकरण का रास्ता भी दिखाई देता है। यही उनके सृजन की विशेषता रही है।"  मुख्य अतिथि के रूप में मैंने यानी आपकी इस मित्र डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने साहित्यकार महेन्द्र फुसकेले के प्रथम पुण्य स्मरण के अवसर पर वर्णी वाचनालय में आयोजित कार्यक्रम में  कही। यह आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई द्वारा आयोजित किया गया। विशेष अतिथि थे व्यंग्य विधा के पुरोधा प्रो. सुरेश आचार्य जी तथा अध्यक्षता की ग़ज़लकार डॉ. गजाधर सागर ने।
    आयोजन में  "ब्रजरज" के रचयिता शायर मायूस सागरी को "महेन्द्र फुसकेले स्मृति साहित्य अलंकरण" से सम्मानित किया गया। साथ ही प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई द्वारा प्रकाशित एवं कवि साहित्यकार श्री मुकेश तिवारी द्वारा संकलित आलेख संकलन का लोकार्पण किया गया।
 कार्यक्रम का कुशल संचालन किया डॉ नलिन जैन "नलिन" ने तथा सूत्रधार थे वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रलेस के अध्यक्ष टीकाराम त्रिपाठी रुद्र जी एवं फुसकेले जी के पुत्र श्री पेट्रिस फुसकेले व श्रीमती नम्रता फुसकेले।
कार्यक्रम में सर्वश्री उमाकांत मिश्र, हरगोविंद विश्व, लक्ष्मी नारायण चौरसिया, डॉ. लक्ष्मी पांडेय, सुनीला सराफ, दीपा भट्ट, वीरेंद्र प्रधान, पूरन सिंह राजपूत, डॉ. सतीश रावत, डॉ नवनीत धगट, आशीष ज्योतिषी आदि बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं परिजन उपस्थित थे।

Wednesday, December 26, 2018

चर्चा प्लस ... प्रकृति पर आधारित है भारतीय संस्कृति - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
प्रकृति पर आधारित है भारतीय संस्कृति
      - डॉ. शरद सिंह
भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है। यदि प्रत्येक मनुष्य में देवत्व के गुण जाग्रत हो जाएं तो सांस्कृतिक विकार जागने अथवा किसी विषम पल में जाग भी जाए तो उसके स्थाई रूप से बने रहने का प्रश्न ही नहीं है। संस्कृत में प्रणीत हमारा संपूर्ण वाङ्मय वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भागवत, भगवद्गीता आदि के रूप में विद्यमान है, जिसमें हमारे जीवन को सार्थक बनाने के सभी उपक्रमों का विस्तृत विवरण विद्यमान है। इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है कि संस्कृति एक शाब्दिक ईकाई नहीं वरन् जीवन की समग्रता की द्योतक है। संस्कृति मात्र चेतन तत्वों के लिए ही नहीं अपितु जड़तत्वों के लिए भी प्रतिबद्धता का आग्रह करती है।
चर्चा प्लस ...  प्रकृति पर आधारित है भारतीय संस्कृति - डॉ. शरद सिंह Charcha Plus .. Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Daily Sagar Dinkar Newspaper
 23 दिसंबर 2018 को आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज, सागर म.प्र. के हिन्दी विभाग में प्राचार्य डॉ. जी.एस.रोहित एवं संगोष्ठी संयोजक डॉ. सरोज गुप्ता के अथक श्रम से “अतुल्य भारतः संस्कृति और राष्ट्र“ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी हुई जिसमें अतिथि विद्वान के रूप में मैंने ’संस्कृति और मानव मूल्य’ पर अपना वक्तव्य दिया। इस अवसर पर संगोष्ठी में लंदन से आई लूसी गेस्ट, अमेरिका से आए भारतीय मूल के डॉ. अनुभव मिश्रा, सांची के बौद्ध भिक्षु लेखराम भंते, हटा (म.प्र.) के डॉ. श्याम सुंदर दुबे, खंडवा (म.प्र.) के डॉ श्रीराम परिहार, वाराणसी (उ.प्र.) के डॉ. संजीव सराफ, सागर (म.प्र.) की डॉ. मीना पिंपलापुरे एवं योगाचार्य विष्णु आर्य आदि विद्वानों ने भी विचार रखे। इसी संगोष्ठी मेरी दीदी डॉ. वर्षा सिंह भारतीय संस्कृति पर काव्यपाठ के लिए आमंत्रित थीं। आज ‘‘चर्चा प्लास’’ में मैं अपने वक्तव्य के कुछ अंश यहां दे रही हूं-
संस्कृति, राष्ट्र और समाज ये तीन ईकाइयां हैं, जो मानव संस्कृति को आकार देती हैं। सुसंस्कृति से सुराष्ट्र आकार लेता है और अपसंस्कृति से अपराष्ट्र। शब्द अनसुना सा लग सकता है-‘‘अपराष्ट्र’‘। किन्तु यदि राष्ट्रों की राजनीतिक स्तर पर अपराधों में लिप्तता राजनीतिक कुसंस्कारों को जन्म देती है और यही कुसंस्कार राष्ट्र में अतंकवाद की गतिविधियों को प्रश्रय देते हैं। विश्व में कई देश ऐसे हैं जो राजनीतिक दृष्टि से अपराष्ट्र की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। वहीं भारत की संस्कृति का स्वरूप इस प्रकार का है जिसमें अपसंस्कारों की कोई जगह नहीं है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है। यदि प्रत्येक मनुष्य में देवत्व के गुण जाग्रत हो जाएं तो सांस्कृतिक विकार जागने अथवा किसी विषम पल में जाग भी जाए तो उसके स्थाई रूप से बने रहने का प्रश्न ही नहीं है। संस्कृत में प्रणीत हमारा संपूर्ण वाङ्मय वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भागवत, भगवद्गीता आदि के रूप में विद्यमान है, जिसमें हमारे जीवन को सार्थक बनाने के सभी उपक्रमों का विस्तृत विवरण विद्यमान है। इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है कि संस्कृति एक शाब्दिक ईकाई नहीं वरन् जीवन की समग्रता की द्योतक है। संस्कृति मात्र चेतन तत्वों के लिए ही नहीं अपितु जड़तत्वों के लिए भी प्रतिबद्धता का आग्रह करती है। अब प्रश्न उठता है कि क्या जड़ तत्वों के लिए भी कोई सांस्कृतिक आह्वान होता है जबकि जड़ तो जड़ है, निचेष्ट, निर्जीव। फिर निर्जीव के लिए संसकृति का कैसा स्वरूप, कैसा रूप? ठीक इसी बिन्दु पर भारतीय संस्कृति की महत्ता स्वयंसिद्ध होने लगती है। भारतीय संस्कृति समस्त जड़ ओर समस्त चेतन जगत से तादात्म्य स्थापित करने का तीव्र आग्रह करती है। यही आग्रह आज हम पर्यावरण संतुलन के आग्रह के रूप में देखते हैं, सुनते हैं और उसके लिए चिन्तन-मनन करते हैं। जब प्र्रणियों का शरीर पंचतत्वों से बना हुआ है और ये पंचतत्व वही हैं जिनसे संसार के जड़ तत्वों की भी पृथक-पृथक रचना हुई है, तो जड़ और चेतन के पारस्परिक संबंध अलग कहां हैं? ये दोनों तो घनिष्ठता से परस्पर जुड़े हुए हैं।
भारतीय संस्कृति वह मार्ग सुझाती है कि वे सांस्कृतिक मूल्य कहां से सीखें जाएं जो मनावजीवन को मूल्यवान बना दे -
परोपकाराय फलन्ति वृक्षः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदम् शरीरम्।
अर्थात् - वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियां परोपकार के लिए बहती हैं, गाय परोकार के लिए दूध देती हैं अतः अपने शरीर अर्थात् अपने जीवन को भी परोपकार में लगा देना चाहिए।
भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ मानती है किन्तु साथ ही अन्य योनियों की महत्ता को भी स्वीकार करती है। जिसका आशय है कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। और यह तभी संभव है जब प्रकृति के प्रति मनुष्य की आत्मीयता ठीक उसी प्रकार हो जैसे अपने माता-पिता, भाई, बहन, गुरु और सखा आदि प्रियजन से होती है। यह आत्मीयता भारतीय संस्कृति में जिस तरह रची-बसी है कि उसकी झलक गुरुगंभीर श्लोकों के साथ ही लोकव्यवहार में देखा जा सकता है। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मां है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे।
एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बाम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। नर्मदा स्नान करने को नर्मदातट पर पहुंची मनुष्यों की टोली नर्मदा को देखते ही गा उगती है-
नरबदा मैया ऐसे तौ मिली रे
अरे, ऐसे तौ मिली के जैसे मिल गए मताई औ बाप रे
नरबदा मैया... हो....
जब नर्मदा माता है तो गंगा, यमुदना और सरस्वती की त्रिवेणी? क्या उनसे कोई नाता नहीं रह जाता है? लोकमानस त्रिवेणी से भी अपने रिश्तों को व्याख्यायित करता है-
नरबदा मोरी माता लगें रे
अरे, माता तौ लगें रे, तिरबेनी लगें मोरी बैन रे
नरबदा मैया... हो...
वहीं भोजपुरी लोकगीतों में गंगा को मां, यमुना को बहन, चांद और सूरज को भाई कहा गया है और साथ ही स्त्री की झिझक को प्रकट करते हुए यह भी कहा गया है कि इनके द्वारा अपने परदेसी पति को संदेश कैसे भिजवाऊं, तुम्हीं संदेश पहुंचाओ मेरी सखी।
चननिया छिटकी मैं का करूं गुंइया
गंगा मोरी मइया, जमुना मोरी बहिनी,
चान सुरुज दूनो भइया,
पिया को संदेस भेजूं गुंइया।
भारतीय संस्कृति में मानवमूल्य की महत्ता इतनी सघन है कि प्रकृति को भी रक्तसंबंधियों से अधिक घनिष्ठ माना जाता है। इसके उदाहरण लोकसंस्कारों में देखे जा सकते हैं जो आज भी ग्रामीण अंचलों में निभाए जाते हैं- जैसे कुआ पूजन संस्कार - विवाह के अवसर पर विभिन्न पूजा-संस्कारों के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है। यह जल नदी, तालाब अथवा कुए से लाया जाता है। इस अवसर पर रोचक गीत गाए जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है जिसमें कहा गया है कि विवाह संस्कार के लिए पानी लाने जाते समय एक सांप रास्ता रोक कर बैठ जाता है। स्त्रियां उससे रास्ता छोड़ने का निवेदन करती हैं किन्तु वह नहीं हटता है। जब स्त्रियां उसे विवाह में आने का निमंत्रण देती हें तो वह तत्काल रास्ता छोड़ देता है।
इसी तरह अनूठा है मातृत्व साझा करने का संस्कार - सद्यःप्रसूता जब पहली बार प्रसूति कक्ष से बाहर निकलती है तो सबसे पहले वह कुएं पर जल भरने जाती है। यह कार्य एक पारिवारिक उत्सव के रूप में होता है। उस स्त्री के साथ चलने वाली स्त्रियां कुएं का पूजन करती हैं फिर प्रसूता स्त्री अपने स्तन से दूध की बूंदें कुएं के जल में निचोड़ती हैं। इस रस्म के बाद ही वह कुएं से जल भरती है। इस तरह पह पेयजल को अपने मातृत्व से साझा कराती है क्योंकि जिस प्रकार नवजात शिशु के लिए मां का दूध जीवनदायी होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों के लिए जल जीवनदायी होता है।
जिस संस्कृति में पृथ्वी की रक्षा से ले कर पारिवारिक संबंधों की गरिमा तक पर समुचित ध्यान दिया जाता हो उस संस्कृति में मानवमूल्यों का पीड़ी दर पीढ़ी प्रवाहमान रहना स्वाभाविक है।    
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 26.12.2018)
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