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Tuesday, July 10, 2018

चर्चा प्लस ... और वे निकल पड़ीं सड़कों पर आधी रात को - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस  
... और वे निकल पड़ीं सड़कों पर आधी रात को
           - डॉ. शरद सिंह
सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार देने का ऐतिहासिक फैसला रविवार को लागू कर दिया गया। वे आधी रात को सड़कों पर निकल पड़ीं अपनी खुशी को प्रकट करनेके लिए। स्पष्ट है कि उस देश में महिलाएं अधिकार पाती जा रही हैं जहां सदियों से औरतों के अधिकारों के बारे में ठीक से सोचा भी नहीं गया। लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली साउदी अरब की महिलाओं ने गोया दुनिया भर के देशों को समझा दिया है कि यदि देश का अर्थतंत्र सुदृढ़ करना है तो महिलाओं की क्षमता पर विश्वास करना सीखना होगा और उन्हें सड़ी-गली रूढ़ियां से आजाद करना होगा। 
Charcha Plus -Aur Ve Nikal Padi Sadakon Pr Adhi Raat Ko - Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
               
सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार देने का ऐतिहासिक फैसला 24 जून 2018 को लागू कर दिया गया। स्मरण रहे कि यह ऐतिहासिक फैसला कोई सरकारी रियायत या सामाजिक उपकार नहीं है। इसके लिए साउदी महिलाओं ने अट्ठाईस वर्ष लम्बा संघर्ष किया। इसकी शुरुआत तब हुई थी जब सऊदी की 40 महिलाओं ने नवंबर 1990 में रियाद में एक साथ गाड़ी चलाई। यह प्रतिबंध के खिलाफ पहली बार सार्वजनिक तौर पर विरोध था। इन महिलाओं को एक दिन के लिए जेल हुई और साथ ही पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया था।
सितंबर 2007 में महिला ऐक्टिविस्ट्स ने तत्कालीन किंग अब्दुल्लाह को ड्राइविंग से बैन हटाने के लिए 1000 हस्ताक्षरों के साथ एक याचिका दी। इसके बाद मार्च 2008 में वजेहा-अल हुवैदर नाम की एक ऐक्टिविस्ट ने यू-ट्यूब पर गाड़ी चलाते हुए एक विडियो पोस्ट किया। जून 2011 को फेसबुक पर ‘वूमेन टू ड्राईव’ नाम का कैंपेन लॉन्च किया गया। इससे भड़क कर सरकार की ओर से कठोर कदम उठाए गए और महिलाओं की ड्राइविंग से जुड़े 70 केस दर्ज किए गए। कुछ को गिरफ्तार भी किया गया। इस भी महिलाएं न डरीं और न रुकीं। अक्टूबर 2013 को दर्जनों महिलाओं ने ड्राइविंग करते हुए अपनी फोटो और विडियोज ऑनलाइन शेयर किए। संघर्ष जारी रहा। नवंबर 2014 में ऐक्टिविस्ट लूजा इन हथलाउल और मायसा अल अमूदी को 73 दिनों तक हिरासत में रखा गया। यूएई से सऊदी अरब तक ड्राइव करने की कोशिश के बाद इन पर आतंकवाद से जुड़े अपराध दर्ज किए गए। महिलाओं द्वारा अपना सांर्ष जारी रखने और लगातार मांग किए जाते रहने पर किंग सलमान ने मामले को अपने संज्ञान में लिया और सितंबर 2017 को महिलाओं के ड्राइविंग को मंजूरी का आदेश दिया। फिर भी इसे लागू होने में लगभग नौ माह लग गए। अंततः 24 जून 2018 को महिलाओं को ड्राइविंग सीट मिल ही गई।
साउदी महिलाओं ने इस फैसले को सही ठहराने वाला एक धमाकेदार उदाहरण भी दुनिया के सामने रख दिया। सऊदी अरब में महिलाओं के ड्राइविंग करने पर लगा प्रतिबंध हटने के बाद साउदी महिला असील अल हमद फॉर्मूला वन कार चलाने वाली पहली महिला बन गईं। उन्होंने यह उपलब्धि फ्रांस में हासिल की। असील ने फ्रेंच ग्रां प्री से पहले ‘ले कास्टेलेट सर्किट’ पर यह कार चलाई। एफ वन टीम रैनो ने उन्हें यह अवसर दिया। असील रैनो टीम की ’पैशन परेड’ का हिस्सा हैं। सऊदी अरब की मोटर स्पोर्ट्स की पहली महिला सदस्य असील वही कार चलाती दिखीं जिससे 2012 में अबू धाबी में किमी राइकोनेन ने जीत दर्ज की थी।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का यह फैसला देश के सबसे बड़े सामाजिक सुधारों में से एक है। यह उनके तेल पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता खत्म करने की योजना का भी मुख्य हिस्सा है। दाऊद बताते हैं कि अगर हर साल देश में महिलाओं के रोजगार से जुड़ने का आंकड़ा एक प्रतिशत भी रहता है तो यह श्रमिक बाज़ार में हर साल 70,000 और महिलाओं को जोड़ेगा। महिलाओं की भागीदारी आर्थिक विकास दर में 0.9 प्रतिशत का योगदान देगी। अकेले इस फैसले से तेल पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश सऊदी को अरबों डॉलर की कमाई होगी। बताया जा रहा है कि साल 2030 तक अकेले इतनी कमाई होने की उम्मीद है जितनी सरकारी कंपनी अरमाको के 5 प्रतिशत शेयर को बेचने से होने वाली है। विगत वर्ष सितंबर में किंग सलमान ने अपने बेटे मोहम्मद बिन सलमान द्वारा सुधारों को लागू किए जाने के बाद महिलाओं के ड्राइविंग पर लगे बैन को हटाने का आदेश दिया था।
सरकार के इस फैसले के बाद रविवार को महिलाएं व्यस्त सड़क पर वाहन चलाती नजर आईं। रियाद में गाड़ियों के काफिले के साथ भी महिलाएं देखी गईं। इस फैसले के साथ ही दुनिया में अब ऐसा कोई देश नहीं बचा है, जहां महिलाओं की ड्राइविंग पर रोक हो। दुनिया भर की महिलाओं ने सऊदी अरब के इस फैसले का खुल कर स्वागत किया। सऊदी अरब के इस फैसले को वहां के आर्थिक जगत में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के रूप में देखा जा रहा है। दुबई में रहने वाले और ब्लूमबर्ग में मध्य पूर्व के चीफ अर्थशास्त्री के रूप में काम करने वाले जियाद दाऊद ने इस पर बताया, ’ड्राइविंग से बैन हटाने पर नौकरी करने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि के आसार हैं, इससे पेशेवरों की संख्या बढ़ेंगी और यह कुल आय में वृद्धि करेगा।’ ब्लूमबर्ग इकनॉमिक्स के मुताबिक, इस फैसले से 2030 तक सऊदी 90 अरब डॉलर से ज्यादा कमा सकता है। साउदी अरब के ऊर्जा मंत्री खालिद अल-फालिह ने भी माना है कि बैन हटाने का मतलब है कि महिलाएं और अधिक सशक्त होंगी। नौकरी के क्षेत्र में उनकी भागीदारी और बढ़ेगी, ऐसे में मुझे लगता है कि यह फैसला देश में महिलाओं के रोजगार को बढ़ाने में योगदान देगा।
लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली साउदी अरब की महिलाओं ने गोया दुनिया भर के देशों को समझा दिया है कि यदि देश का अर्थतंत्र सुदृढ़ करना है तो महिलाओं की क्षमता पर विश्वास करना सीखना होगा और उन्हें सड़ीगली रूढ़ियां से आजाद करना होगा।
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(दैनिक सागर दिनकर, 28.06.2018 )          ---------------------------
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Thursday, April 19, 2018

चर्चा प्लस ... नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता
- डॉ. शरद सिंह
नोटबंदी का जख़्म अभी पूरी तरह से भरा नहीं था कि अब 2000 के नोटों का संकट आमजनता को सांसत में डाल रहा है। एक ओर आसन्न चुनाव का शुरू हो चुका घमासान और दूसरी ओर खाली पड़े एटीएम मुंह चिढ़ा रहे हैं। यानी नोट और वोट के बीच फंसे लोग जाएं तो कहां जाएं ? कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आमजनता के धैर्य की परीक्षा का अंतहीन सिलसिला जारी है। 
 
 नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता ... डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लसArticle for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
वह भी विवाहों के मुहूर्त्त के पूर्व का समय था और लोगों को नोटबंदी का सामना करना पड़ा था। भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में छोटे रूप में नोटबंदी कहा गया, की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किये गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया। इस घोषणा में 8 नवम्बर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया। इसका उद्देश्य केवल काले धन पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था। इससे पहले भी इसी तरह के उपायों को भारत की स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था ताकि जालसाजी और काले धन पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन यह अदला-बदली की प्रक्रिया थी जिसमें जनता को पर्याप्त समय दिया गया था नोट बदलने के लिए। बल्कि देखा जाए तो इन पूर्व के तमाम विमुद्रीकरण ने सिर्फ़ जमाखोरों को सबक सिखाया था और आमजनता को तो इसका प्रभाव भी महसूस नहीं हुआ था। लेकिन 8 नवम्बर 2016 को बंद किए गए 500 और 1000 रुपए के नोटों ने दिहाड़ी मजदूरों तक की कमर तोड़ दी।
अब अप्रैल 2018 के मध्य में उत्पन्न 2000 रुपयों के नोटों की कमी और एमटीएम में रुपयों की र्प्याप्त उपलब्धता नहीं होने से एक बार फिर अमजनता सशंकित हो उठी है। विवाहों का सबसे बड़ा मुहूर्त्त सिर पर है और लोगों को नोटों की कमी से जूझना पड़ रहा है। हर जगह स्वाईप या डिज़िटल तरीका काम नहीं कर पाता है। छोटे व्यापारियों, मजदूरों और रोजमर्रा की छोटी खरीददारी के लिए फुटकर नोटों से ले कर 2000 तक के नोट की जरूरत पड़ती ही है। बहरहाल, 2000 के नोटों के संकट पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के हाल ही में दिए गए बयान से पहले मीनाक्षी लेखी के उस वक्तव्य का उल्लेख करना जरूरी लग रहा है जो उन्होंने नोटबंदी का विरोध करते हुए दिया था- ‘’आम औरत और आदमी, जो लोग अनपढ़ हैं और बैंकिंग सुविधाओं तक जिनकी पहुंच नहीं है ऐसे लोग इस तरह के उपायों से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। मुख्य रूप से कुछ समय के अंतराल में स्वयं जनता 2000 के नोट को चलन से बाहर कर देगी, क्योंकि जहां कम मूल्य की वस्तु खरीदनी हो तब दुकानदार आपसे 2000 के नोट नहीं लेगा। परिणाम स्वरूप 2000 के नोट की या तो जमाखोरी होगी अथवा काले धन का ही सृजन करेंगें। सरकार को इस विषय पर प्रारंभिक समय से सचेत रहने की आवश्यकता है।’’
लगता है जैसे मीनाक्षी लेखी का अनुमान सच साबित हो रहा है। इसकी पुष्टि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य से भी होती है। मध्य प्रदेश के शाजापुर में 16 अप्रैल 2018 को किसानों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था, “नोटबंदी से पहले 15 लाख करोड़ रुपए की नकदी चलन में थी। इस प्रक्रिया (नोटबंदी) के बाद यह बढ़कर 16 लाख 50 हजार करोड़ रुपए हो गई, लेकिन बाजार से 2000 का नोट गायब हो रहा है। लेकिन दो-दो हजार के नोट कहां जा रहे हैं, कौन दबाकर रख रहा है, कौन नकदी की कमी पैदा कर रहा है। यह षड्यंत्र है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि दिक्कतें पैदा हों। सरकार इससे सख्ती से निपटेगी।“ उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने यह मुद्दा केंद्र सरकार के सामने भी उठाया है। उन्होंने इसके पीछे साजिश होने का आरोप लगाया है।
यद्यपि एसबीआई के चेयरमैन का कहना है कि नोटबंदी जैसे हालात नहीं है। उस वक्त पैसा सिस्टम से निकाला गया था, इसलिए परेशानी हुई थी। अभी ऐसी स्थिति नहीं है। एसबीआई के पास पर्याप्त कैश है। यह बात जरूर है कि 2000 के नोट का सर्कुलेशन कम हुआ है। एक वजह यह है कि फसलें आई हैं, किसानों को तेजी से पेमेंट बढ़ा है। जल्दी ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। वैसे पिछले कुछ हफ्ते से गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कैश में कमी बनी हुई थी। 16 अप्रैल 2018 को पूर्वी महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश से नकदी की कमी की शिकायतें मिलीं। उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, झारखंड और महाराष्ट्र में नकदी का संकट पैदा हो गया। उधर गुजरात में भी बैंकों में नकदी की किल्लत शुरू हो चुकी है। लगभग 10 दिन पहले यह परेशानी उत्तर गुजरात से शुरू हुई, लेकिन अब पूरे राज्य में इसका असर है। यहां तक कि बैंकों ने नकदी निकालने की सीमा तय कर दी है। ज्यादातर एटीएम में पैसा नहीं है। शादी और किसानों को फसल के भुगतान का वक्त होने की वजह से लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली, एनसीआर, भोपाल, पटना, लखनऊ, हैदराबाद और अहमदाबाद समेत देश के कई इलाकों के एटीएम में पैसा नहीं होने की शिकायतें मिलीं। इस बीच, केंद्र सरकार ने स्वीकार किया कि कुछ जगह कैश की कमी है। इसके बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, “देश में नकदी के हालात की समीक्षा की जा चुकी है। कुल मिलाकर पर्याप्त नकदी चलन में है। बैंकों में पर्याप्त कैश है। कुछ जगहों पर कमी इसलिए हुई, क्योंकि कुछ जगहों पर मांग अचानक बढ़ी। इस पर जल्द ही नियंत्रण पाया जाएगा।“
न्यूज़ ऐजेंसियों के अनुसार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2000 रुपए के नोटों की छपाई तीन महीने के लिए बंद कर रखी है। जिससे 500 और 200 से छोटे नोटों को ही प्रचलन में लाया जाए और सभी बैंक अपने ग्राहकों को यही नोट उपलब्ध कराए। सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड कंपंनी ने भी इस चीज की पुष्टि करते हुए बताया कि आरबीआई ने 2000 नोट को छापने की कोई भी डिमांड नहीं की इसलिए नए 500, 200 और इससे छोटे नोटों को ही छापा जा रहा है। इसका उद्देश्य यह हैं की देशभर में छोटे नोटों का प्रचलन ज्यादा से ज्यादा हो और कालेधन पर लगाम भी लग सके। इस संबंध में यह चर्चा भी जोरो रही है कि रिजर्व बैंक एक बार फिर 2000 रुपये की करेंसी के संचार को धीरे-धीरे कम कर देगी। दूसरी चर्चा यह रही कि 2000 की करेंसी की सुविधा के चलते देश में कालेधन का संचय आसान हो गया है और इसी के चलते बाजार में 2000 की करेंसी का ज्यादा संचार नहीं है।
कारण जो भी हो लेकिन फिलहाल आमजनमा को नोटों की कमी के संकट से एकबार फिर जूझना पड़ रहा है। एक ओर आसन्न चुनावों के लोक-लुभावने वादे हैं तो दूसरी ओर नोटों की कमी का कठोर यथार्थ। ऐसे में आमजनता का अपने भविष्य को ले कर चिंतित होना स्वाभाविक है कि कहीं एक बार फिर किसी प्रकार की बंदी का सामना तो नहीं करना पड़ेगा? यह समय सिर्फ़ विवाह महूर्तों का नहीं है, इस समय किसान अपनी उपज को मंडियों में पहुंचा रहे हैं और उनके खातों में धन पहुंच रहा है लेकिन यदि समय रहते यह धन उनके हाथों में रुपयों के रूप में नहीं आ पाया तो उनके लिए भी संकट खड़ा हो सकता है। स्थानीय छोटे-मोटे कर्जे या मजदूरों को चुकता करने के लिए किसानों को भी नकद राशि की दरकार होती है। एटीएम और बैंक काउंटरों पर नकद की कमी होने की स्थिति में धन होते हुए भी धन की कमी से उनहें जूझना पड़ेगा। यही स्थिति लगभग हर तबके के लोगों की रहेगी।
नोटबंदी का जख़्म अभी पूरी तरह से भरा नहीं है कि अब 2000 के नोटों का संकट आमजनता को उलझन में डाल रहा है। एक ओर आसन्न चुनाव का शुरू हो चुका घमासान और दूसरी ओर खाली पड़े एटीएम यानी नोट और वोट के बीच फंसे लोग जाएं तो कहां जाएं? कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आमजनता के धैर्य की परीक्षा का अंतहीन सिलसिला जारी है। लिहाजा इस परीक्षा का अंत अब सरकार को ही पूरी तत्परता से करना होगा क्योंकि यह उसी के अधिकार क्षेत्र का मामला है। आमजनता सीधे आरबीआई से संवाद नहीं कर सकती है लेकिन सरकार आरबीआई को निर्देश दे सकती है। जहां तक जमाखोरी और कालाबाजारी का प्रश्न है तो इसके लिए भी सरकारी स्तर पर ही कोई ठोस कदम उठाने होंगे, वह भी ऐसे कदम जो जमाखोरों ओर कालाबाजारी करने वालों पर तो अंकुश लगाए किन्तु आमजनता को परेशानी न उठानी पड़े। आखिर कब तक बड़े-बड़े घोटालेबाज अरबों रुपयों का घोटाला कर के देश से बाहर भागते रहेंगे और आमजनता बलि का बकरा बनती रहेगी? इस प्रश्न को ध्यान में रख कर कोई तो ऐसी योजना बनानी ही होगी जिससे बार-बार आमजनता को मुद्रा की कमी और उससे उत्पन्न घबराहट न झेलनी पड़े। यह एक ऐसा मुद्दा है जो चुनावों की दिशा का निर्धारण करने की ताकत रखता है।
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Note Aur Vote Ke Beech Fansi Aamjanta - Charcha Plus by Dr Sharad Singh
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(दैनिक सागर दिनकर, 18.04.2018 )
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