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Wednesday, November 11, 2020

चर्चा प्लस | सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है
   - डाॅ शरद सिंह
  दीपावली वह त्यौहार है जिसका नाम लेते ही दीपकों की जगमग करती कतारों की तस्वीर आंखों के आगे घूम जाती है। लाई, बताशे, पटाखे, फुलझड़ी आदि इसे और अधिक रोचक बना देते हैं। लेकिन इस बार की दीपावली वैसी नहीं होगी जैसी हम हमेशा मनाते आए हैं। कारण कि कोरोना आपदा से अभी छुटकारा नहीं मिला है। इस बार की दीपावली सतर्क दीपावली के रूप में मनाने में ही सुरक्षा और खुशियां दोनों निहित है। साथ ही इसे हम परमार्थ रूप दे कर सार्थक दीपावली यानी एक स्पेशल दीपावली में बदल सकते हैं। 

दीपावली का उत्साह कोरोना के भय पर भारी पड़ रहा है। बाज़ार में दूकानें सज गई हैं और भीड़ उमड़ने लगी है। फिर भी हर व्यक्ति दुविधा की स्थिति से गुज़र रहा है। इतने बड़े त्यौहार को वह फीका भी नहीं जाने देना चाहता है और वहीं उसके भीतर कोरोना संक्रमण कर भय भी समाया हुआ है। कोरोना के भय के प्रति देश में हर स्तर पर प्रशासन भी सतर्क है। इसी लिए दीपावली पर एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सतर्कता नोटिस जारी करते हुए देश के 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना 18 अक्तूबर 2010 को एनजीटी अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों सहित पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन, दुष्प्रभावित व्यक्ति अथवा संपत्ति के लिये क्षतिपूर्ति प्रदान करने एवं इससे जुड़े हुए मामलों के प्रभावशाली और त्वरित निपटारे के लिये की गई थी। दूसरे शब्दों में इसे पर्यावरण अदालत कहा जा सकता है, जिसे हाई कोर्ट के समान शक्तियां प्राप्त हैं। एनजीटी ने 30 नवंबर की रात तक दिल्ली एनसीआर सहित देश के उन शहरों और कस्बों में पटाखों पर पूरी तरह बैन लगा दिया है जहां पिछले साल नवंबर में हवा की गुणवत्ता खराब रही। आतिशबाजी पर भी पाबंदी लगाई गई है। वहीं मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पटाखों पर पाबंदी तो नहीं लगाई है लेकिन चाईनीज़ पटाखे बेचने और चलाने पर रोक लगाई है।

दीपावली मानने को ले कर एनजीटी ने गाईडलाईन भी जारी की है जिसके अनुसार जिन शहरों में वायु प्रदूषण इंडेक्स 200 से ज्यादा है, वहां पर पटाखों की बिक्री और पटाखे जलाने पर रोक लगाई गई है। जिन शहरों में वायु प्रदूषण खतरे के बिन्दु से नीचे होगा, वहां पर पटाखे बेचे जा सकेंगे और उन्हें जलाने के लिए दो घंटे का समय निर्धारित रहेगा। यह पटाखे त्यौहारों यथा - दीपावली, छठ, न्यू ईयर और क्रिसमस जैसे त्यौहारों पर जलाए जा सकेंगे। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्थान और हरयाणा समेत एनजीटी ने 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा, ‘वैसे शहर या कस्बे जहां वायु गणवत्ता ‘मध्यम’ या उसके नीचे दर्ज की गई, वहां सिर्फ हरित पटाखों की बिक्री हो सकती है और दीपावली, छठ, नया साल, क्रिसमस की पूर्व संध्या जैसे अन्य मौकों पर पटाखों के इस्तेमाल और उन्हें फोड़ने की समय सीमा को दो घंटे तक ही सीमित रखी जा सकती है, जैसा कि संबंधित राज्य इसको तय कर सकते हैं।’ इसके साथ ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा कि ‘वहीं अन्य स्थानों पर प्रतिबंधरोक अधिकारियों के लिए वैकल्पिक है और अगर अधिकारियों के आदेश में इस संबंध में कड़े कदम हैं, तो वे लागू होंगे।’ यह गाईडलाईन इसलिए जारी की गई है क्योंकि वायु प्रदूषण से कोविड-19 के मामले बढ़ सकते हैं।  इसके अलावा जिन शहरों में वायु प्रदूषण प्रतिशत अपेक्षाकृत कम है, वहां सिर्फ ग्रीन पटाखे ही छोड़े जा सकते हैं, वह भी मात्र दो घंटे की निर्धारित अवधि में। यह याद रखना जरूरी है कि इस बार तो कोरोना आपदा का दौर है। कोरोना हवा में ही तेजी से फैलता है। अगर पर्यावरण प्रदूषित होगा तो कोरोना भी उतनी तेजी से ही फैलेगा। इसलिए प्रदेश सरकार के द्वारा दी गई छूट रूपी विश्वास का सम्मान करते हुए मध्यप्रदेश में भी पटाखे कम से कम चलाए जाएं तो इससे हवा को प्रदूषित होने से बचाए रख सकेंगे और कोरोना संक्रमण को फैलाने के अपराध के मानवीय अपराध के भागीदार भी नहीं बनेंगे। इस बार अध्योध्या में अभूतपूर्व दीपोत्सव मानाया जाना है। उस दीपोत्सव की संकल्पना का अनुसरण करते हुए हम भी दीपोत्सव मना सकते हैं। दीपक पटाखों की तरह वायु को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, वहीं जगमग रोशनी की सुंदरता से सराबोर कर देते हैं। प्रकाश का त्यौहार है दीपावली तो सही मायने में प्रकाश पर ही आधारित दीपावली हम मनाएं, व्यर्थ ही पटाखें के बारूद से धन और वायु का अपव्यय क्यों करें? कुछ पल की खुशी के लिए ध्वनि और वायु प्रदूषण बढ़ा कर कोरोना को न्योता देने से बेहतर है कि हम पटाखों में व्यय होने वाले पैसों से उन लोगों की मदद करें जो कोरोना आपदा के चलते बेरोजगार हो गए हैं अथवा महानगरों से अपने घर-गांव लौट कर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।

कोरोना के मामलों की गिनती में भले ही आधिकारिक रूप से कमी दिखाई दे रही हो लेकिन इससे चिन्तामुक्त नहीं हुआ जा सकता हैं। चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों का भी मानना है कि बढ़ती सर्दी में कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आ सकता है। इस घातक वायरस का अभी भी कोई टीका विकसित नहीं हुआ है। इसलिए इस दीवाली हमें अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए पहले की तरह सतर्क रहना होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि दीपावली के जोश को कम होने दें। थोड़ी-सी समझदारी और सतर्कता के साथ खुशियों भरी सुरक्षित दीपावली मनाई जा सकती है। सतर्कता सिर्फ़ इतनी रखनी है कि बड़े और भीड़-भाड़ वाले दीपावली के समारोहों में जाने से बचें। कोरोनावायरस के फैलने का जोखिम सबसे ज्यादा उन स्थानों पर है जहां छोटे स्थान में अधिक लोग इकट्ठा होते हैं। विस्तार वाली जगह में जहां सोशल डिस्टेंसिंग संभव है वहां भी कई बार डिस्टेंसिंग बनाए रखना कठिन हो जाता है। आप हर व्यक्ति से सतर्कता भरी बुद्धिमानी की उम्मींद नहीं कर सकते हैं। कई लोग जान की परवाह किए बिना ढिठाई की हद तक बेपरवाह हो जाते हैं और बिना मास्क के लपक कर मिलने के लिए निकट चले आते हैं। ऐसे समय आप सभ्यता एवं संकोचवश ‘‘दूर रहिए-दूर रहिए’’ भी नहीं कह पाते हैं और मन ही मन डरते रहते हैं। इसलिए बेहतर है कि ऐसी कठिनाई वाली स्थिति में ही क्यों फंसा जाए। 

जब बात भीड़ से बचने की हो तो त्यौहारी खरीददारी के लिए बाज़ार जाने से भी परहेज करना जरूरी है। त्यौहार के समय बाज़ार में भीड़ जुटना स्वाभाविक है। ऐसे में कोरोना से खुद का बचाव करना बेहद कठिन है। सभी जानते हैं कि भीड़ में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस कोरोनाकाल में बिना किसी अतिरिक्त खर्च के स्थानीय दूकानदार ‘‘एट डोर सर्विस’’ देने लगे हैं। तो इस घर बैठी सेवा का लाभ उठाते हुए त्यौहारी खरीददारी की जा सकती है। इसलिए कोरोना के डर से मन मारने के बजाए कोरोना काल में ऑनलाइन शॉपिंग सबसे बेहतर विकल्प है।
जहां तक आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों की मदद का प्रश्न है तो कोरोना काल में रोजी रोटी के संकट से जूझ रहे कुम्हारों के लिए स्थानीय प्रशासन ने ‘‘बाज़ार बैठकी’’ से उन्हें मुक्त रख कर उनकी बहुत बड़ी सहायता की है। कोरोना और आर्थिक संकट दोनों से जूझते हुए भी कुम्हारों ने अपनी उम्मींद का दिया जलाए रखा है और वे उत्साहपूर्वक दिए बना रहे हैं। दीपावली के अवसर पर मिट्टी से बने हुए दीपकों के साथ ही लक्ष्मी, गणेश, कुबेर, अन्न का कूडा, ग्वालिन आदि की भी जरूरत पड़ती है। कुम्हार भी कोरोना आपदा की गंभीरता को समझते हैं। उन्हें मजबूरी में बाज़ार की भीड़ के बीच अपनी दूकानें लगानी पड़ रही हैं, फिर भी वे घर-घर घूमते हुए भी दीपक तथा मिट्टी की अन्य वस्तुएं बेचते घूम रहे हैं। यदि घर के दरवाज़े आए कुम्हारों से हम बिना अधिक मोलभाव किए दीपक आदि खरीदेंगे तो इससे हम भीड़ भरे बाज़ार में जाने से भी बचेंगे और उन कुम्हारों से सामग्री खरीद कर उनकी आर्थिक मदद भी कर सकेंगे। आखिर जो वस्तुएं वे हमारे घर के दरवाज़े पर ला रहे हैं वही वस्तुएं तो बाज़ार में मौजूद है।  

ये छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण सतर्कता दीपावली की खुशियों पर कोरोना का ग्रहण लगने से बचाए रखेगी। फिर यह भी संभव है कि इस तरह की संकट वाली यह इकलौती दीपावली हो। दुनिया भर में चल रहे अनुसंधानों को देखते हुए हम आशा कर सकते हैं कि अगली दीपावली के पहले तक हर व्यक्ति के पास वैक्सीन पहुंच जाएगा और अगली दीपावली हम कोरोना आपदा से मुक्त हो कर मनाएंगे। तो इस बार की दीपावली में कुछ अलग हट कर, कुछ सुरक्षित, कुछ सतर्क, कुछ दूरियों के साथ दीपावली का आनंद लें और कोरोना के भय पर विजय पाएं। आखिर पटाखों के बिना भी दीपावली हो सकती है दमदार।
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(दैनिक सागर दिनकर में 11.11.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, October 24, 2019

चर्चा प्लस ... बुंदेली-दिवाली की संकटग्रस्त परंपराएं - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

बुंदेली-दिवाली की संकटग्रस्त परंपराएं
- डाॅ. शरद सिंह 


कुछ परंपराएं भले ही छूट रही हों, कुछ मान्यताएं भले ही बदल रही हों किन्तु बुंदेलखंड का विस्तृत भू-भाग आज भी दीपावली के लुप्त हो चले अनेक रिवाज़ों को अपने सीने से लगाए हुए है और उन्हें संरक्षित करने के लिए सतत् प्रयत्नशील है। यह याद रखने की बात है कि प्रकृति, समाज और प्रसन्नता से जुड़ी परंपराएं न तो कभी हानिकारक होती हैं और न कभी पुरानी पड़ती हैं, अपितु ये परंपराएं हमारे जातीय स्वाभिमान को बचाए रखती हैं। जब तक दीपावली के दीपक जगमगाते रहेंगे, हमारी परंपराएं भी हमारे साथ चलती रहेंगी।

Charcha Plus - Bundeli Diwali Ki Sankatgrast Paramparayen  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
    दीपावली के कई दिन पहले से ही घर की दीवारों की रंगाई-पुताई, आंगन की गोबर से लिपाई और लिपे हुए आंगन के किनारों को ‘‘ढिग’’ धर का सजाना यानी चूने या छुई मिट्टी से किनारे रंगना। चौक और सुराती पूरना। गुझिया, पपड़ियां, सेव-नमकीन, गुड़पारे, शकरपारे के साथ ही एरसे, अद्रैनी आदि व्यंजन बनाया जाना। एरसे त्यौहारों विशेषकर होली और दीपावली पर बनाये जाते हैं। ये मूसल से कूटे गए चावलों के आटे से बनते हैं। आटे में गुड़ मिला कर, माढ़ कर इन्हें पूड़ियों की तरह घी में पकाते हैं। घी के एरसे ही अधिक स्वादिष्ट होते है। इसी तरह अद्रैनी प्रायः त्यौहारों पर बनाई जाती है। आधा गेहूं का आटा एवं आधा बेसन मिलाकर बनाई गई पूड़ी अद्रैनी कहलाती है। इसमें अजवायन का जीरा डाला जाता है। इन सारी तैयारियों के साथ आगमन होता है बुंदेली-दिवाली का।

बुंदेलखंड में दीपावली का त्यौहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। यह त्यौहार धनतेरस से शुरु होकर भाई दूज पर समाप्त होता है। बुंदेलखंड में दीपावली के त्यौहार की कई लोक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो अब सिमट-सिकुड़ कर ग्रामीण अंचलों में ही रह गई हैं। जीवन पर शहरी छाप ने अनेक परंपराओं को विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया है। इन्हीं में से एक परंपरा है- घर की
चौखट पर कील ठुकवाने की। दीपावली के दिन घर की देहरी अथवा चौखट पर लोहे की कील ठुकवाई जाती थी। मुझे भली-भांति याद है कि पन्ना में हमारे घर भोजन बनाने का काम करने वाली जिन्हें हम ‘बऊ’ कह कर पुकारते थे, उनका बेटा लोहे की कील ले कर हमारे घर आया करता था। वह हमारे घर की देहरी पर ज़मीन में कील ठोंकता और बदले में मेरी मां उसे खाने का सामान और कुछ रुपए दिया करतीं। एक बार मैं उसकी नकल में कील ठोंकने बैठ गई तो मां ने डांटते हुए कहा था-‘‘यह साधारण कील नहीं है, इसे हर कोई नहीं ठोंकता है। इसे मंत्र पढ़ कर ठोंका जाता है।’’ मेरी मां दकियानूसी कभी नहीं रहीं और न ही उन्होंने कभी मंत्र-तंत्र पर विश्वास किया लेकिन परंपराओं का सम्मान उन्होंने हमेशा किया। आज भी वे दीपावली पर पूछती हैं कि कील ठोंकने वाला कोई आया क्या? लेकिन शहरीकरण की दौड़ में शामिल काॅलोनियों में ऐसी परंपराएं छूट-सी गई हैं। दीपावली के दिन गोधूलि बेला में घर के दरवाजे पर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठुकवाने के पीछे मान्यता थी कि ऐसा करने से साल भर बलाएं या मुसीबतें घर में प्रवेश नहीं कर पातीं हैं। बलाएं होती हों या न होती हों किन्तु घर की गृहणी द्वारा अपने घर-परिवार की रक्षा-सुरक्षा की आकांक्षा की प्रतीक रही है यह परंपरा।

दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की परंपरा रही है। आज पारंपरिक रीत-रिवाजों को मानने वाले घरों अथवा गांवों में ही दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती (सुरैती) बनाई जाती है। सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती हैं, जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति होती है, जो महिला के सोलह श्रृंगार दर्शाती है। नौ घर की भगवान विष्णु की आकृति नवग्रह का प्रतीक होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, बछड़ा व धन के प्रतीक सात घड़ों के चित्र भी बनाये जाते हैं। दीपावली पर हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के चित्र की पूजा का भी विशेष महत्व है। जिन्हें बुंदेली लोक भाषा में ‘पना’ कहा जाता है। कई घरों में आज भी परंपरागत रूप से इन चित्रों के माध्यम से लक्ष्मी पूजा की जाती है।

बुंदेलखंड में दशहरा-दीपावली पर मछली के दर्शन को भी शुभ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते चांदी की मछली दीपावली पर खरीदने और घर में सजाने की मान्यता भी बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में है। बुंदेलखंड के हमीरपुर जिला से लगभग 40 किमी. दूर उपरौस, ब्लॉक मौदहा की चांदी की विशेष मछलियां बनाई जाती हैं। कहा जाता है कि चांदी की मछली बनाने का काम देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुआ था। उपरौस कस्बे में बनने वाली इन मछलियों को मुगलकाल के बादशाह भी पसंद करते थे। अंग्रेजों के समय रानी विक्टोरिया भी इसकी कारीगरी देखकर चकित हो गयी थीं। जागेश्वर प्रसाद सोनी उसे नयी ऊंचाई पर ले गये। मछली बनाने वाले जागेश्वर प्रसाद सोनी की 14वीं पीढ़ी की संतान राजेन्द्र सोनी के अनुसार इस कला का उल्लेख इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी किताब ‘‘आइने अकबरी’’ में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि यहां के लोगों के पास बढ़िया जीवन व्यतीत करने का बेहतर साधन है, इसके बाद उन्होंने चांदी की मछली का उल्लेख किया और इसकी कारीगरी की प्रशंसा भी की है। इसके बाद सन् 1810 में रानी विक्टोरिया भी इस कला को देखकर आश्चर्यचकित हो गयी थीं। उन्होंने सोनी परिवार के पूर्वज स्वर्णकार तुलसी दास को इसके लिए सम्मानित भी किया था। राजेंद्र सोनी के अनुसार दीपावली के समय चांदी की मछलियों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। क्योंकि मछली को लोग शुभ मानते हैं और चांदी को भी। उनके अनुसार धीरे-धीरे ये व्यापार सिमटता जा रहा है। कभी लाखों रुपए में होने वाला ये कारोबार अब संकट में है और चांदी की मछलियों की परंपरा समापन की सीमा पर खड़ी है।

कुछ परंपराएं भले ही छूट रही हों, कुछ मान्यताएं भले ही बदल रही हों किन्तु बुंदेलखंड का विस्तृत भू-भाग आज भी दीपावली के लुप्त हो चले अनेक रिवाज़ों को अपने सीने से लगाए हुए है और उन्हें संरक्षित करने के लिए सतत् प्रयत्नशील है। यह याद रखने की बात है कि प्रकृति, समाज और प्रसन्नता से जुड़ी परंपराएं न तो कभी हानिकारक होती हैं और न कभी पुरानी पड़ती हैं, अपितु ये परंपराएं हमारे जातीय स्वाभिमान को बचाए रखती हैं। दीपावली पर खुले आंगन में गोबर की लिपावट की सोंधी गंध भले ही सिमट रही हो किन्तु उस पर पूरे जाने वाले चौक, सातियां, मांडने आज भी आधुनिक बुंदेली घरों के चिकने टाईल्स वाले फर्श पर राज कर रहे हैं। जब तक दीपावली के दीपक जगमगाते रहेंगे, हमारी परंपराएं भी हमारे साथ चलती रहेंगी।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 23.10.2019)
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Tuesday, November 6, 2018

चर्चा प्लस … लोकतंत्र की रोशनी के लिए एक दीपक वोट का - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …
लोकतंत्र की रोशनी के लिए एक दीपक वोट का
 - डॉ. शरद सिंह
        दीपावली और जगमगाते दीपकों का परस्पर सीधा संबंध हैं। दीपकों की रोशनी के बिना दीपावली की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। ठीक इसी तरह जनमत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया मतदान के बिना लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं है। जिस प्रकार दीपक की रोशनी अंधेरे को दूर कर के ज्ञात-अज्ञात भय से मुक्ति दिलाती है, ठीक उसी प्रकार एक वोट राजनीतिक विषमताओं एवं नीतिगत समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है। अपने मताधिकार का प्रयोग करके प्रत्येक नागरिक अपनी इच्छानुसार उम्मीदवार को चुन सकता है और देश की राजनीतिक स्वरूप का निर्णायक बन सकता है। यही तो है लोकतंत्र की शक्ति और मतदाता जागरूकता, दीपक की तरह जगमगाती हुई।   
Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
 दी
पावली और राजनीति का का संबंध प्रत्यक्षतरूप में भले ही न हो किन्तु प्रचलित कथा के अनुसार श्रीराम जब लंका विजय कर के अयोध्या लौटे तो अयोध्या की जनता ने विजयी श्रीराम के स्वागत के लिए समूची अयोध्या को दीपकों की रोशनी से जगमगा दिया था। उसी समय से दीपावली मनाए जाने की परम्परा आरम्भ हुई। दीपावली के पर्व को असत पर सत् के विजय यानी बुराई पर अच्छी की विजय पर खुशी मनाने का त्योहार माना जाता है। हम भारतवासियों ने राजनीति में लोकतंत्र को अपनाया और अपने मूल्यों और अधिकारों की रक्षा के लिए डटे रहने का संकल्प लिया। लोकतंत्र का मूल आधार है- चुनाव और मतदान। हम अपनी इच्छानुसार अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चुन सकते हैं और यदि वह सही ढंग से काम न कर रहा हो तो अपने मताधिकार का प्रयोग कर के उसे बदल भी सकते हैं। इतिहास गवाह है कि अपने मताधिकार का प्रयोग कर के हमने इस तरह के बदलाव किए भी हैं। हमारे देश में राजनीति और लोकतंत्र का गठबंधन बहुत पुराना है। रामराज्य में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखा गया था। उस समय भले ही राजतंत्र था किन्तु राजा जनता के विचारों के अनुरूपनिर्णय लेता था। भले ही वह लोकतंत्र का एक आदर्श स्वरूप नहीं था फिर भी आमजनता के विचारों का मान रखा जाना अपने आप में लोकतंत्र का एक विशिष्ट रूप सामने रखता है। दुनिया में आज भी ऐसे अनेक देश हैं जहां आमजनता को खुल कर अपने विचार रखने का भी अधिकार नहीं है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि भारत दुनिया में एकमात्र राष्ट्र हैं जिसने हर वयस्क नागरिक को स्वतंत्रता पहले दिन से ही मतदान का अधिकार दिया है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़े लोकतंत्र है, उसने भी स्वतंत्रता के लगभग 150 से वर्षों बाद इस अधिकार को अपने नागरिकों को दिया था। ‘लोकतंत्र’ बड़ा लुभावना शब्द है। इसकी ललक उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जो तानाशाही की चक्की में पिसते रहते हैं। दुनिया के जिस भी देश में तानाशाही है वहां आमजनता का सबसे पहला स्वप्न होता है लोकतंत्र। भला अपने अधिकार कौन नहीं चाहता है? हर व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपना जीवन अपने ढंग से जीना चाहता है। इसीलिए जब आमजनता को लोकतंत्र नामक अधिकार मिल जाए जो कि उसके सभी अधिकारों का मूल है तो आमजनता का दायित्व बढ़ जाता है। यह एक बहुत संवेदनशील मुद्दा है। अधिकार मिलना और उस अधिकार की रक्षा तभी संभव है जबकि अधिकारों का सदुपयोग किया जाए। सन् 2018 का नवंबर माह में होने वाले चुनाव के जरिए लोकतंत्र अपने अधिकारियों अर्थात् मतदाताओं से यही अपेक्षा कर रहा है कि प्रत्येक मताधिकार प्राप्त व्यक्ति, वह चाहे किसी भी आयुवर्ग का हो, किसी भी धर्म, जाति, लिंग का हो, किसी भी शारीरिक अवस्था का हो, उसे मतदान अवश्य करना चाहिए।   

हम भारतीय सौभाग्यशाली हैं कि हमारे देश के इतिहास के कुछ काले कालखण्ड छोड़ दिए जाएं तो यहां लोकतंत्र की राजनीतिक परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। भारत में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली का आरंभ पूर्व वैदिक काल से ही हो गया था। प्राचीनकाल में भारत में सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था विद्यमान थी। इसके साक्ष्य हमें प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों से प्राप्त होते हैं। विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के वर्णन में भी इस बात के प्रमाण हैं। वर्तमान संसद की तरह ही प्राचीन समय में परिषदों का निर्माण किया गया था, जो वर्तमान संसदीय प्रणाली से मिलती-जुलती थी। गणराज्य या संघ की नीतियों का संचालन इन्हीं परिषदों द्वारा होता था। इसके सदस्यों की संख्या विशाल थी। उस समय के सबसे प्रसिद्ध गणराज्य लिच्छवि की केंद्रीय परिषद में 7,707 सदस्य थे वहीं यौधेय की केंद्रीय परिषद के 5,000 सदस्य थे। वर्तमान संसदीय सत्र की तरह ही परिषदों के अधिवेशन नियमित रूप से होते थे। प्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्था में आजकल की तरह ही शासक एवं शासन के अन्य पदाधिकारियों के लिए निर्वाचन प्रणाली थी। यह एक विशेषता थी कि राजतंत्र और लोकतंत्र एक साथ विद्यमान था। योग्यता एवं गुणों के आधार पर इनके चुनाव की प्रक्रिया आज के दौर से थोड़ी भिन्न जरूर थी। सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। किन्तु आज प्रत्येक भारतीय नागरिक को मताधिकार प्राप्त है। मतदान, वह भी बिना किसी दबाव के। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यह संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है।
देखा जाए तो ’लोकतंत्र’ राजनीति की महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो अपनी बहुआयामी अर्थों के कारण समाज और मनुष्य के जीवन के बहुत से सिद्धांतों को प्रभावित करता है। ’लोकतंत्र’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय ’डेमोक्रेसी’ है जिसकी उत्पत्ति ग्रीक मूल शब्द ’डेमोस’ से हुई है। डेमोस का अर्थ होता है- ’जन साधारण’ और इस शब्द में ’क्रेसी’ शब्द जोड़ा गया है जिसका अर्थ ’शासन’ होता है। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने लोकतंत्र की विशेषताओं की व्याख्या करते हुए उसे शासन से भी आगे जीवनपद्धति ठहराते हुए कहा था कि ’लोकतंत्र का अर्थ है, एक ऐसी जीवन पद्धति जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं।’
जब कोई राजनीतिक विचार जीवनपद्धति की तरह अपना लिया जाए तो उस जीवनपद्धति को दोषमुक्त रखना भी प्रत्येक नागरिक का कर्त्त्ाव्य हो जाता है। सही उम्मीदवार का चयन, उचित विचारधारा का चयन और एक स्वस्थ और जनहित वाली सरकार बनाना भी नागरिक कर्त्तव्य बन जाता है। आज लोकतंत्र को चोट पहुंचाने वाले अपराध बढ़ रहे हैं। लोकतंत्र में जनता के प्रति चाहे वह अपराधी ही क्यों न हो, नरमी बरती जाती है। मृत्युदंड दिए जाने का प्रावधान लगभग समाप्त कर दिया गया था किन्तु अफ़सोस की बात है कि एक बलात्कारमय हत्या के प्रकरण से मृत्युदंड के प्रावधान को पुनजाग्रत करना पड़ा था। सन् 1978 का ‘रंगा-बिल्ला केस’। भारतीय नौ सेना के कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 17 वर्षीया बेटी गीता चोपड़ा जो कॉलेज की सेकेंड ईयर की छात्रा थी और बेटा संजय चोपड़ा जो दसवीं का छात्र था, 26 अगस्त 1978 को रंगा और बिल्ला नामक दो अपराधी युवकों की दरिंदगी के शिकार हो गए। चोरी की कार में सवार इन दोनों अपराधियों ने गीता के साथ बलात्कार किया और उसके नन्हें भाई के द्वारा अपनी बहन को बचाने का प्रयास करने पर भाई-बहन दोनों को मोत के घाट उतार दिया था। अपराधियों के पकड़े जाने पर दिल्ली के एडिशनल सेसन जज ने फांसी की सजा सुनाई। दुखद है कि इस सजा के विरुद्ध अपील की गई। किन्तु दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे 1979 में नामंजूर कर दिया। केस को एक झटका फिर लगा जब ख्यातिप्राप्त वकील आर.के. गर्ग ने रंगा और बिल्ला की वकालत की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये पेशेवर हत्यारे हैं और इनके प्रति दया नहीं दिखाई जा सकती। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय खंडपीठ ने फांसी की सजा को बहाल रखा। कुलदीप सिंह उर्फ रंगा और जसवीर सिंह उर्फ बिल्ला को 1982 में फांसी पर लटका दिया गया था। स्मरण रहे कि सन् 1978 में भारतीय बाल कल्याण परिषद ने 16 से कम आयु के बच्चों के लिए दो वीरता पुरस्कार संजय चोपड़ा पुरस्कार और गीता चोपड़ा पुरस्कार की घोषणा की जिन्हें राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के साथ हर साल दिया जाता है। अपराध और अपराधी लोकतंत्र को कठोर होने को विवश करते हैं अतः लोकतंत्र पर घिरते अपराध के अंधकार को दूर करने के लिए एक वोट रूपी दीपक का प्रयोग करते हुए हमें अपने मज़बूत लोकतांत्रिक इरादों को स्थापित करना ही चाहिए। ताकि अपराधों पर अंकुश लग सके और लोकतंत्र को कठोर बनने के लिए मजबूर न होना पड़े। यूं भी दीपावली और जगमगाते दीपकों का परस्पर सीधा संबंध हैं। दीपकों की रोशनी के बिना दीपावली की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। ठीक इसी तरह जनमत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया मतदान के बिना लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं है। जिस प्रकार दीपक की रोशनी अंधेरे को दूर कर के ज्ञात-अज्ञात भय से मुक्ति दिलाती है, ठीक उसी प्रकार एक वोट राजनीतिक विषमताओं एवं नीतिगत समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है। अपने मताधिकार का प्रयोग करके प्रत्येक नागरिक अपनी इच्छानुसार उम्मीदवार को चुन सकता है और देश की राजनीतिक स्वरूप का निर्णायक बन सकता है। यही तो है लोकतंत्र की शक्ति और मतदाता जागरूकता, दीपक की तरह जगमगाती हुई।
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( सागर दिनकर, 06.11.2018)
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