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Wednesday, February 9, 2022

चर्चा प्लस | ‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ भारत क्यों नहीं ? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

चर्चा प्लस  
‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ भारत क्यों नहीं ?
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      दुनिया में क्या कोई और देश है जिसके तीन नाम हों? मेरी जानकारी में तो नहीं हैं। एक हमारा देश ही है जो जिसके तीन नाम हैं- भारत, इंडिया और हिन्दुस्तान। इनमें ‘इंडिया’ सबसे अधिक प्रचलित। तीन नामों पर हम गर्व कर सकते थे यदि ‘इंडिया’ अंग्रेजों की देन न होता। वस्तुतः यह तो गुलामी की निशानी है। तो फिर ‘इंडिया’ सिर्फ़ भारत क्यों नहीं हो सकता है। एक देश, एक नाम, एक पहचान - यह जरूरी है देश के वैश्विक गौरव के लिए और भावी पीढ़ी के लिए।
मेरी सहेली की बेटी हैदराबाद से छुट्टियों में सागर आई हुई थी इसलिए उसने मुझे दोपहर के खाने पर आमंत्रित किया था। ताकि मैं उसकी बेटी से भी मिल लूं क्योंकि उसकी बेटी मुझसे भारतीय इतिहास के बारे में कुछ चर्चा करना चाहती थी। दोपहर के खाने में मेरी सहेली ने दाल-बाटी बनवाई थी। खाते समय मैंने उससे कहा कि पिज्जा, बर्गर चाहे जितना भी खा लो लेकिन अपने भारतीय व्यंजन, विशेषकर बुंदेली व्यंजन की तो बात ही अलग है। जो स्वाद दाल-बाटी में है वह पिज्जा बर्गर में नहीं। यह सुनकर उसकी बेटी बोल उठी, ‘‘यू मीन इंडियन डिशेज?’’ मैंने कहा, ‘‘हां, इंडियन डिशेज यानी भारतीय व्यंजन।’’ वह बोली, ‘‘तो आप इंडिया क्यों नहीं कहतीं, भारत क्यों कहती है? दुनिया में सभी जगह इस देश का नाम इंडिया जाना जाता है, तो आप लोग भारत क्यों बोलते हैं?’’ मुझे उसकी बात सुनकर बड़ा अटपटा लगा। ऐसा लगा कि वह भारतीय बेटी नहीं है बल्कि  किसी और देश की बेटी है जो भारत के बारे में इस अजीब ढंग से बात कर रही है। फिर मैंने गहराई से सोचा तो मुझे लगा कि इसमें दोष उसका नहीं है। वह तो खुद तय नहीं कर पाती होगी कि वह खुद को भारत की बेटी कहे या इंडियन डॉटर? स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 21वीं सदी के दूसरे दशक तक आ गए फिर भी हम अपने देश का एक नाम तय नहीं कर पाए - भारत, इंडिया या हिन्दुस्तान? तो नई पीढ़ी हमें उलाहना देगी ही।
भारत या इंडिया, क्या नाम है इस देश का? हिन्दुस्तान सिर्फ बोलचाल में है अथवा पुराने अभिलेखों में, किन्तु ‘इंडिया’ और ‘भारत’ आज भी समान रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है। सन् 2012 में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केंद्र सरकार से यह प्रश्न किया था। सूचना के अधिकार के अंतर्गत उर्वशी शर्मा ने पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उन्होंने अपने प्रश्न पूछे जाने का कारण बताते हुए उल्लेख किया था कि “इस बारे में हमारे बीच काफी असमंजस है। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं।“ इसीलिए वे यह जानना चाहती हैं कि वे बच्चों को सही-सही उत्तर दे सकें और आने वाली पीढ़ी के बीच इस बारे में कोई संदेह न रहे। उर्वशी ने कहा कि  “हमें सुबूत चाहिए कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? कब ये फैसला लिया गया?“
उर्वशी का तर्क था कि यह एक भ्रम की स्थिति है जो सरकारी स्तर पर भी देश के दो नामों का प्रयोग किया जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ‘‘मैं केवल ये जानना चाहती हूं कि भारत का सरकारी नाम भारत है या इंडिया क्योंकि सरकारी तौर पर भी दोनों नाम इस्तेमाल किए जाते हैं।“ उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ’इंडिया दैट इज भारत’। अर्थात् देश के दो नाम हैं। सरकारी कामकाज में ’गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ और ’भारत सरकार’ दोनों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में भारत और इंडिया दोनों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हिंदी में भी इंडिया कहा जाता है। उर्वशी ने कहा था कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं क्योंकि ये देश की पहचान का सवाल है। उर्वशी को प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब मिला जिसमें कहा गया कि उनके आवेदन को गृह मंत्रालय के पास भेजा गया हैं। किन्तु गृह मंत्रालय में इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। इसलिए इसे संस्कृति विभाग और फिर वहां से राष्ट्रीय अभिलेखागार भेजा गया, जहां जानकारी की ढूंढ-खोज शुरू हुई। राष्ट्रीय अभिलेखागार 300 वर्षों के सरकारी दस्तावेजों का खजाना है। आज भी उर्वशी को अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा है।
देश के नामों को ले कर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके मांग की जा चुकी हैै कि ‘इंडिया’ का नाम बदल कर भारत किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया था कि महाराजा परीक्षित, कुरु वंश के अंतिम दुर्जेय सम्राट की मृत्यु तक, पूरी दुनिया भारतवर्ष के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा दुनिया के एक महान सम्राट का शासन था । भारत ऋग्वेद में उल्लेख किया है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा। यह याचिका को महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू और न्यायाधीश अरूण मिश्रा की पीठ ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस जनहित याचिका पर नोटिस भी जारी किया। इस याचिका में केंद्र को किसी सरकारी उद्देश्य के लिए और आधिकारिक पत्रों में इंडिया नाम का उपयोग करने से रोकने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता निरंजन भटवाल ने आग्रह किया कि न केवल सरकारी अपितु गैर सरकारी संगठनों और कॉरपोरेट्स को भी सभी आधिकारिक और अनाधिकारिक उद्देश्यों के लिए देश का नाम ‘भारत’ का उपयोग करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।  दुर्भाग्यवश लगभग छह माह बाद भी याचिकाकर्ता को कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।
भारत का इतिहास सदियों से काफी गौरवशाली रहा है। भारत का नाम प्राचीन वर्षों में ‘भारतवर्ष’ था। इसके पूर्व भारत नाम जम्बूदीप था। देश का नाम भारत होने के संबंध में एक सर्वमान्यकथा प्रचलित है कि कुरूवंशीय राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यद्यपि कई आधुनिक विद्वान इस इस कथा को प्रमाण के अभाव में खारिज करते हैं किन्तु पुराणों में ‘भारतवर्ष’ नाम का उल्लेख नकारा नहीं जा सकता है। ‘वायु पुराण’ में इस बात की पुष्टि होती है कि देश का नाम भारतवर्ष क्यों पड़ा। इस संदर्भ में ‘वायु पुराण’ का यह श्लोक ध्यान देने योग्य है जिसमें कहा गया है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है-
 हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत।
 तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधाः।

इंडिया नाम तो अंग्रेजों की गुलामी के साथ आया जबकि पुराणों में भारत के प्राचीन नाम जम्बूद्वीप का भी उल्लेख मिलता है। जम्बूदीप का अर्थ है समग्र द्वीप। भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथों में हर जगह जम्बूदीप का उल्लेख आता है। उस समय भू-भाग एक विस्तृत द्वीप था जिसे आगे चल कर भारतीय उपमहाद्वीप कहा गया। ‘वायु पुराण’ में ही दी गई एक अन्य कथा के अनुसार त्रेता युग में देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। ‘वायु पुराण’ के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में स्वंयभू मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने भरत खंड को बसाया था। लेकिन राजा प्रियव्रत के कोई भी पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नींध्र को गोद ले लिया था जिसका पुत्र नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था और ऋषभ के पुत्र का नाम भरत था और भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था।
विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दर्जा रखने वाला देश - भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया। एक देश जिसके तीन नाम। आधिकारिक तौर पर दो नाम हैं-इंडिया और भारत। बार-बार इस बात की मांग उठती रही है कि देश का एक नाम रहे-‘भारत’। लगभग साल भर पहले जैन संत आचार्य विद्यासागर जी ने ‘इंडिया’ शब्द की व्याख्या करते हुए देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने पर तार्किक पक्ष रखे थे और ‘भारत बोलो’ मुहिम का आह्वान किया था। विचारणीय है कि जब कम्बोडिया अपना नाम बदल कर मौलिक नाम कम्पूचिया कर सकता है, सिलोन अपने मौलिक नाम श्रीलंका को अपना सकता है तो इंडिया सिर्फ भारत क्यों नहीं हो सकता है। एक देश, एक नाम, एक पहचान - यह जरूरी है देश के वैश्विक गौरव के लिए।              
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Friday, November 12, 2021

चर्चा प्लस | भारत को कितनी राहत देगी पीएम मोदी और स्कूली छात्रा विनीशा की ललकार | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
भारत को कितनी राहत देगी
पीएम मोदी और स्कूली छात्रा विनीशा की ललकार
 - डाॅ. शरद सिंह                                                                           
 ‘‘बातें बहुत हो चुकीं, अब काम करना आरम्भ करें!’’ यही तो कहा दुनिया भर के देशों से भारतीय छात्रा विनीशा उमाशंकर ने। यह सिर्फ़ उसकी आवाज़ नहीं बल्कि हर युवा की आवाज़ है जो खुली हवा में सांस लेना चाहता है और स्वस्थ तथा लम्बा जीवन जीना चाहता है। कार्बन के बेतहाशा उत्सर्जन ने हवा का दम घोंट रखा है। इसी चिंता को ले कर ग्लास्गो में कोप 26 सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में पीएम मोदी ने भी इसके लिए सभी देशों से आह्वान किया। आशा की जानी चाहिए कि सम्मेलन में लिए गए निर्णय भारत की जलवायु-दशा में भी सुधार लाएंगे। 
15 साल की तमिलनाडु में पढ़ने वाली भारतीय स्कूली छात्रा विनीशा उमाशंकर ने कोप-26 सम्मेलन में अपने भाषण में कहा कि ‘‘मैं केवल भारत की लड़की नहीं हूं बल्कि मैं इस धरती की बेटी हूं। मैं और मेरी पीढ़ी आज आपके कार्यों के परिणामों को देखने के लिए जीवित रहेंगे। फिर भी आज हम जो चर्चा करते हैं, उनमें से कोई भी मेरे लिए व्यावहारिक नहीं है। आप तय कर रहे हैं कि हमारे पास रहने योग्य दुनिया में रहने का मौका है या नहीं। हम लड़ने लायक हैं या नहीं? अब वक्त आ गया है कि हम बातें करना बंद करें और काम करना शुरू करें।’’
विनीशा के भाषण पर टिप्पणी करते हुए प्रिंस चाल्र्स ने कहा कि विनीशा ने जो कुछ कहा उससे हम युवापीढ़ी के आगे लज्जित हैं। हमें अपने पृथ्वी को बचाने की दिशा में प्रयासों पर ध्यान देना होगा। ग्लासगो में आयोजित ‘‘वल्र्ड लीडर समिट ऑफ कोप-26’’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखा. क्लाइमेट चेंज पर इस वैश्विक मंथन के बीच पीएम ने पंचामृत की सौगात दी।
ग्लासगो में पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि आज मैं आपके बीच उस भूमि का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं जिस भूमि ने हजारों वर्षों पहले ये मंत्र दिया था ‘‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम’’ आज 21वीं सदी में ये मंत्र और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। ये सच्चाई हम सभी जानते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर आज तक किए गए वादे, खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी क्लाइमेट एक्शन पर अपने एम्बीशन बढ़ा रहे हैं, तब क्लाइमेट फाइनेंस पर विश्व के एम्बीशन वहीं नहीं रह सकते जो पेरिस अग्रीमेंट के समय थे। क्लाइमेट चेंज पर इस वैश्विक मंथन के बीच मैं भारत की ओर से इस चुनौती से निपटने के लिए पांच अमृत तत्व रखना चाहता हूं, पंचामृत की सौगात देना चाहता हूं।
पहला- भारत, 2030 तक अपनी नाॅन फाॅसिल इनर्जी केपीसिटी को 500 गीगावाट तक पहुंचाएगा। 
दूसरा- भारत, 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत इनर्जी की जरूरत को ‘‘गैर-जीवाश्म ऊर्जा’’ रिनीवल इनर्जी से पूरी करेगा।
तीसरा- भारत अब से लेकर 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा। 
चौथा- 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिटी को 45 प्रतिशत से भी कम करेगा।
पांचवा- वर्ष 2070 तक भारत, नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।
         ये सच्चाई हम सभी जानते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर आज तक किए गए वादे, खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी क्लाइमेट एक्शन पर अपनी महत्वकांक्षा बढ़ा रहे हैं, तब क्लाइमेट फाइनेंस पर विश्व की महत्वकांक्षा वही नहीं रह सकते जो पेरिस अग्रीमेंट के समय थे। मेरे लिए पेरिस में हुआ आयोजन, एक समिट नहीं, सेंटीमेंट था, एक कमिटमेंट था। भारत वो वादे विश्व से नहीं कर रहा था, बल्कि वो वादे सवा सौ करोड़ भारतवासी अपने आप से कर रहे थे। पीएम ने कहा कि दुनिया को एडप्टेशन पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन एडप्टेशन पर ध्यान नहीं दिया गया। जलवायु पर वैश्विक बहस में एडप्टेशन को उतना महत्व नहीं मिला है। ये उन विकासशील देशों के साथ अन्याय है जो जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित हैं। एडप्टेशन के तरीके चाहे लोकल हों पर पिछड़े देशों को इसके लिए ग्लोबल सहयोग मिलना चाहिए। लोकल एडप्टेशन के लिए ग्लोबल सहयोग के लिए भारत ने कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिस्टेंस इंफ्रास्ट्रक्चर पहल की शुरूआत की थी। मैं सभी देशों को इस पहल से जुड़ने का अनुरोध करता हूं। पीएम मोदी ने कहा कि भारत में नल से जल, स्वच्छ भारत मिशन और उज्जवला जैसी परियोजनाओं से हमारे जरूरतमंद नागरिकों को अनुकूलन लाभ तो मिले ही हैं उनके जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है। कई पारंपरिक समुदाय में प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने का ज्ञान है। हमारी अनुकूलन नीतियों में इन्हें उचित महत्व मिलना चाहिए। स्कूल के पाठ्यक्रम में भी इसे जोड़ा जाना चाहिए।
भारत की अर्थव्यवस्था वर्ष 2070 तक कार्बन न्यूट्रल हो जाएगी, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ग्लासगो में कोप 26 जलवायु शिखर सम्मेलन में घोषणा की।  मोदी ने यह भी कहा कि भारत ‘‘गैर-जीवाश्म ऊर्जा’’ की स्थापित क्षमता के लिए अपने 2030 के लक्ष्य को 450 से बढ़ाकर 500 गीगावाट करेगा।
ग्लासगो में पीएम मोदी के अपने संबोधन में कहा कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जो पेरिस समझौते के तहत जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रतिबद्धताओं को अक्षरशः पूरा कर रहा है।  मेरे लिए, पेरिस का कार्यक्रम एक शिखर सम्मेलन नहीं बल्कि एक भावना, एक प्रतिबद्धता थी और भारत दुनिया से वादे नहीं कर रहा था, बल्कि 125 करोड़ भारतीय खुद से वादे कर रहे थे।  मुझे खुशी है कि भारत जैसा विकासशील देश करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का काम कर रहा है।  जब मैं पहली बार क्लाइमेट समिट के लिए पेरिस आया था, तो दुनिया भर के अन्य वादों में अपना खुद का वादा जोड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं था।  ‘‘सर्वे सुखिनः भवन्तु’’ का संदेश देने वाली संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में मैं मानवता की चिंता के साथ आया था।  कई विकासशील देशों के अस्तित्व के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ा खतरा है।  हमें दुनिया को बचाने के लिए बड़े कदम उठाने चाहिए।  यह समय की मांग है और यह इस मंच की प्रासंगिकता को साबित करेगा।  मुझे उम्मीद है कि ग्लासगो में लिए गए फैसले हमारी अगली पीढ़ियों के भविष्य को बचाएंगे। भारत को उम्मीद है कि विकसित देश जल्द से जल्द 1 ट्रिलियन डॉलर का जलवायु वित्त उपलब्ध कराएंगे।  आज जलवायु वित्त को ट्रैक करना महत्वपूर्ण है जैसे हम जलवायु शमन की प्रगति को ट्रैक करते हैं।  उन देशों पर दबाव बनाना उचित न्याय होगा जो जलवायु वित्त के अपने वादों को पूरा नहीं करते हैं। दुनिया आज स्वीकार करती है कि जलवायु परिवर्तन में जीवनशैली की प्रमुख भूमिका है।  मैं आप सभी के सामने एक शब्द आंदोलन का प्रस्ताव करता हूं।  यह शब्द ‘‘जीवन’’ है जिसका अर्थ है पर्यावरण के लिए जीवन शैली।  आज जरूरत है कि हम सब एक साथ आएं और जीवन को एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाएं।’’
उल्लेखनीय है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सितंबर में कहा था कि उनका देश 2060 तक कार्बन उत्सर्जन को नेट जीरो करने के लक्ष्य को हासिल कर लेगा। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी 2060 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन हासिल करने का वादा किया है। भारत ने 2070 तक का लक्ष्य रखा है।
नेट जीरो का अर्थ है कार्बन डाइऑक्साइड के घातक उत्सर्जन को पूरी तरह से ख़त्म कर देना जिससे धरती के वायुमंडल को गर्म करनेवाली ग्रीनहाउस गैसों में इसकी वजह से और वृद्धि न हो। भारत, इंडोनेशिया, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका कोयले से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 15 फीसदी के लिए जिम्मेदार हैं। इस योजना का मकसद उत्सर्जन में कटौती की गति तेज करना है ताकि 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य के और करीब पहुंचा जा सके।
इंडोनेशिया के ऊर्जा मंत्री अरिफिन तसरीफ ने कहा कि उनका देश कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद कर उनकी जगह नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध है। एक बयान जारी कर उन्होंने कहा, जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है जिससे निपटने के लिए सभी पक्षों उदाहरण पेश करने होंगे। सीआईएफ ने कहा कि एक्सलरेटिंग कोल ट्रांजीशन (एसीटी) योजना के तहत सबसे पहले ऐसे विकासशील देशों को लक्ष्य किया जा रहा है जिनके पास कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए समुचित साधन नहीं हैं। दक्षिण अफ्रीका ने मंगलवार को कहा था कि वह एसीटी से लाभान्वित पहला देश होगा। सीआईएफ के अनुसार इस नई योजना को सात सबसे विकसित समर्थन दे रहे हैं और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा और डेनमार्क ने इसके लिए वित्तीय समर्थन दिया है। डेनमार्क ने कहा है कि वह इस योजना के लिए 1.55 करोड़ डॉलर यानी लगभग एक अरब 15 करोड़ रुपये का अनुदान देगा ताकि ष्कोयला बिजली संयंत्रों को खरीदकर बंद किया जा सके और नए ऊर्जा स्रोतों में निवेश किया जा सके। डेनमार्क के विदेश मंत्री येप्पे कोफोड ने कहा, कोल ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने के लिए हमें एक स्थायी और स्थिर योजना की जरूरत होगी। मिसाल के तौर पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा स्थानीय आबादी के लिए वैकल्पिक रोजगार और उन्हें दोबारा ट्रेनिंग उपबल्ध हो।
वैसे प्रधानमंत्री मोदी कार्बन उत्सर्जन पर काबू पाने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे ही पर हमें याद रखना चाहिए कि पृथ्वी को बचाने का विनीशा का आह्वान हर देश, हर नागरिक के लिए है। भारतवासी और पृथ्वीवासी होने के नाते विनीशा का समर्थन करना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
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Monday, February 3, 2020

शून्यकाल...गुम हो रहे बुंदेलखंड से बच्चे और बेख़बर हम- डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल...गुम हो रहे बुंदेलखंड से बच्चे और बेख़बर हम
- डॉ. शरद सिंह 
      देश में प्रतिदिन औसतन चार सौ महिलाएं और बच्चे लापता हो जाते हैं और इनमें से अधिकांश का कभी पता नहीं चलता। हर साल घर से गायब होने वाले बच्चों में से 30 फीसदी वापस लौटकर नहीं आते। नाबालिगों की गुमशुदगी का आंकड़ा साल दर साल बढ़ रहा है। बुंदेलखंड इससे अछूता नहीं है। बच्चों के गुम होने के आंकड़े बुंदेलखंड में भी बढ़ते ही जा रहे हैं। सागर के अलावा टीकमगढ़, दमोह और छतरपुर जिलों से भी कई बच्चे गुम हो चुके हैं। चंद माह पहले सागर जिले की खुरई तहसील में एक किशोरी को उसके रिश्तेदार द्वारा उसे उत्तर प्रदेश में बेचे जाने का प्रयास किया गया। वहीं बण्डा, सुरखी, देवरी, बीना क्षेत्र से लापता किशोरियों का महीनों बाद भी अब तक कोई पता नहीं है। इन मामलों में ह्यूमेन ट्रेफिकिंग की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
सागर, टीकमगढ़, दमोह और छतरपुर जिलों से जनवरी 2018 से अगस्त 2018 के बीच 513 किशोर-किशोरी लापता हुए हैं। इनमें से करीब 362 बच्चे या तो स्वयं लौट आए या पुलिस द्वारा उन्हें विभिन्न स्थानों से दस्तयाब किया गया। लेकिन अब भी 151 से ज्यादा बच्चों को कोई पता ही नहीं चला है। वर्ष 2018 में जिले में किशोर-किशोरियों की गुमशुदगी के आंकड़ों में पहले की अपेक्षा बहुत अधिक है। कुल 178 गुमशुदगी दर्ज हुए मामलों में किशोरों की संख्या लगभग 55 थी और किशोरियों 123 थी।  वर्ष 2015 में गुमशुदगी का आंकड़ा 136 था जो 2016 में 167 और पिछले साल 2017 में 215 तक पहुंच गया था। इन आंकड़ों को देखते हुए इस वर्ष 2018 के दिसम्बर तक यह संख्या ढाई सौ के आसपास पहुंच गई थी। लापता होने वालों में सबसे ज्यादा 14 से 17 आयु वर्ग के किशोर-किशोरी होते हैं। इनमें भी अधिकांश कक्षा 9 से 12 की कक्षाओं में पढ़ने वाले स्कूली बच्चे हैं।
शून्यकाल...गुम हो रहे बुंदेलखंड से बच्चे और बेख़बर हम- डॉ. शरद सिंह 

आखिर महानगरों के चैराहों पर ट्रैफिक रेड लाइट होने के दौरान सामान बेचने या भीख मांगने वाले बच्चे कहां से आते हैं? इन बच्चों की पहचान क्या है? अलायंस फॉर पीपुल्स राइट्स (एपीआर) और गैर सरकारी संगठन चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राइ) द्वारा जब पड़ताल की गई तो पाया गया कि उनमें से अनेक बच्चे ऐसे थे जो भीख मंगवाने वाले गिरोह के सदस्य थे। माता-पिता विहीन उन बच्चों को यह भी याद नहीं था कि वे किस राज्य या किस शहर से महानगर पहुंचे हैं। जिन्हें माता-पिता की याद थी, वे भी अपने शहर के बारे में नहीं बता सके। पता नहीं उनमें से कितने बचचे बुंदेलखंड के हों। बचपन में यही कह कर डराया जाता है कि कहना नहीं मानोगे तो बाबा पकड़ ले जाएगा। बच्चे अगवा करने वाले कथित बाबाओं ने अब मानो अपने रूप बदल लिए हैं और वे हमारी लापरवाही, मजबूरी और लाचारी का फायदा उठाने के लिए नाना रूपों में आते हैं और हमारे समाज, परिवार के बच्चे को उठा ले जाते हैं और हम ठंडे भाव से अख़बार के पन्ने पर एक गुमशुदा की तस्वीर को उचटती नज़र से देख कर पन्ने पलट देते हैं। यही कारण है कि बच्चों की गुमशुदगी की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। बच्चों के प्रति हमारी चिन्ता सिर्फ अपने बच्चों तक केन्द्रित हो कर रह गई है। 
बच्चों के लापता होने के कई मामले जब पुलिस ने सुलझाए तो पता चला कि इनके गायब होने के पीछे सूनी गोद रह जाना भी एक बड़ा कारण है। अस्पतालों से नवजात शिशुओं से ले कर चार-पांच साल तक की आयु के बच्चे संतान विहीन दंपत्ति की सूनी गोद भरने के लिए अपहृत कर लिए जाते हैं। कई बार गोद लेने वाले दंपत्ति को भी इसकी जानकारी नहीं रहती है कि वह बच्चा चुराया गया है। मध्यप्रदेश राज्य सीआईडी के किशोर सहायता ब्यूरो से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार हाल ही के वर्षों में बच्चों के लापता होने के जो आंकड़ें सामने आए हैं वे दिल दहला देने वाले हैं।  2010 के बाद से राज्य में अब तक कुल 50 हजार से ज़्यादा बच्चे गायब हो चुकेे हैं। यानी मध्यप्रदेश हर दिन औसतन 22 बच्चे लापता हुए हैं। एक जनहित याचिका के उत्तर में यह खुलासा सामने आया। 2010-2014 के बीच गायब होने वाले कुल 45 हजार 391 बच्चों में से 11 हजार 847 बच्चों की खोज अब तक नहीं की जा सकी है, जिनमें से अधिकांश लड़कियां थीं। सन् 2014 में ग्वालियर, बालाघाट और अनूपुर ज़िलों में 90 फीसदी से ज़्यादा गुमशुदा लड़कियों को खोजा ही नहीं जा सका। ध्यान देने वाली बात ये है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के लापता होने की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है जो विशेषरूप से 12 से 18 आयु वर्ग की हैं। निजी सर्वेक्षकों के अनुसार लापता होने वाली अधिकांश लड़कियों को ज़बरन घरेलू कामों और देह व्यापार में धकेल दिया जाता है। पिछले कुछ सालों में एक कारण ये भी सामने आया है कि उत्तर भारत की लड़कियों को अगवा कर उन्हें खाड़ी देशों में बेच दिया जाता है। इन लड़कियों के लिए खाड़ी देशों के अमीर लोग खासे दाम चुकाते हैं। बदलते वक्त में अरबों रुपए के टर्नओवर वाली ऑनलाइन पोर्न इंडस्ट्री में भी गायब लड़कियों-लड़कों का उपयोग किया जाता है। इतने भयावह मामलों के बीच भिक्षावृत्ति तो वह अपराध है जो ऊपरी तौर पर दिखाई देता है, मगर ये सारे अपराध भी बच्चों से करवाए जाते हैं।
बच्चों के लापता होने के पीछे सबसे बड़ा हाथ होता है मानव तस्करों का जो अपहरण के द्वारा, बहला-फुसला कर अथवा आर्थिक विपन्ना का लाभ उठा कर बच्चों को ले जाते हैं और फिर उन बच्चों का कभी पता नहीं चल पाता है। इन बच्चों के साथ गम्भीर और जघन्य अपराध किए जाते हैं जैसे- बलात्कार, वेश्यावृत्ति, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, बंधुआ मजदूरी, भीख मांगना, देह या अंग व्यापार आदि। इसके अलावा, बच्चों को गैर-कानूनी तौर पर गोद लेने के लिए भी बच्चों की चोरी के मामले सामने आए हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे मानव तस्करों के आसान निशाना होते हैं। वे ऐसे परिवारों के बच्चों को अच्छी नौकरी देने के बहाने आसानी से अपने साथ ले जाते हैं। ये तस्कर या तो एक मुश्त पैसे दे कर बच्चे को अपने साथ ले जाते हैं अथवा किश्तों में पैसे देने का आश्वासन दे कर बाद में स्वयं भी संपर्क तोड़ लेते हैं। पीड़ित परिवार अपने बच्चे की तलाश में भटकता रह जाता है। सच तो यह है कि बच्चे सिर्फ़ पुलिस, कानून या शासन के ही नहीं प्रत्येक नागरिक का दायित्व हैं और उन्हें सुरक्षित रखना भी हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, चाहे वह बच्चा किसी भी धर्म, किसी भी जाति अथवा किसी भी तबके का हो। 
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(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 03.02.2020)
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Sunday, February 2, 2020

शून्यकाल ... इंडिया क्यों? सिर्फ़ भारत क्यों नहीं ? - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल ... इंडिया क्यों? सिर्फ़ भारत क्यों नहीं ?
   - डाॅ. शरद सिंह
    विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दर्ज़ा रखने वाला देश - भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया। एक देश जिसके तीन नाम। आधिकारिक तौर पर दो नाम हैं-इंडिया और भारत। बार-बार इस बात की मांग उठती रही है कि देश का एक नाम रहे-‘भारत’। अभी कुछ अरसा पहले विश्वविख्यात जैन संत आचार्य विद्यासागर ने ‘इंडिया’ शब्द की व्याख्या करते हुए देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने पर तार्किक पक्ष रखे हैं और ‘भारत बोलो’ मुहिम का आह्वान किया है। 

भारत या इंडिया, क्या नाम है इस देश का? हिन्दुस्तान सिर्फ़ बोलचाल में है अथवा पुराने अभिलेखों में किन्तु ‘इंडिया’ और ‘भारत’ आज भी समान रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है। सन् 2012 में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केंद्र सरकार से यह प्रश्न किया था। सूचना के अधिकार के अंतर्गत उर्वशी शर्मा ने पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उन्होंने अपने प्रश्न पूछे जाने का कारण बताते हुए उल्लेख किया ािा कि “इस बारे में हमारे बीच काफी असमंजस है। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं।“ इसीलिए वे यह जानना चाहती हैं कि वे बच्चों को सही-सही उत्तर दे सकें और आने वाली पीढ़ी के बीच इस बारे में कोई संदेह न रहे। उर्वशी ने कहा कि  “हमें सुबूत चाहिए कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? कब ये फैसला लिया गया?“ 

उर्वशी का तर्क था कि यह एक भ्रम की स्थिति है जो सरकारी स्तर पर भी देश के दो नामों का प्रयोग किया जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ‘‘मैं केवल ये जानना चाहती हूं कि भारत का सरकारी नाम भारत है या इंडिया क्योंकि सरकारी तौर पर भी दोनों नाम इस्तेमाल किए जाते हैं।“ उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ’इंडिया दैट इज़ भारत’। अर्थात् देश के दो नाम हैं। सरकारी कामकाज में ’गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया’ और ’भारत सरकार’ दोनों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में भारत और इंडिया दोनों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हिंदी में भी इंडिया कहा जाता है. उर्वशी ने कहा था कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं क्योंकि ये देश की पहचान का सवाल है। 
Dainik Bundeli Manch -  Shoonyakaal, शून्यकाल ... इंडिया क्यों? सिर्फ़ भारत क्यों नहीं ?  - Dr Sharad Singh, 01-02-2020

उर्वशी को प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब मिला जिसमें कहा गया कि उनके आवेदन को गृह मंत्रालय के पास भेजा गया हैं। किन्तु गृह मंत्रालय में इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। इसलिए इसे संस्कृति विभाग और फिर वहां से राष्ट्रीय अभिलेखागार भेजा गया, जहां जानकारी की ढूंढ-खोज शुरू हुई। राष्ट्रीय अभिलेखागार 300 वर्षों के सरकारी दस्तावेज़ों का खज़ाना है। आज भी उर्वशी को अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा है।

देश के नामों को ले कर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके मांग की जा चुकी हैै कि ‘इंडिया’ का नाम बदल कर भारत किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया था कि महाराजा परीक्षित, कुरु वंश के अंतिम दुर्जेय सम्राट की मृत्यु तक, पूरी दुनिया भारतवर्ष के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा दुनिया के एक महान सम्राट का शासन था । भारत ऋग्वेद में उल्लेख किया है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा। यह याचिका को महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू और न्यायाधीश अरूण मिश्रा की पीठ ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस जनहित याचिका पर नोटिस भी जारी किया। इस याचिका में केंद्र को किसी सरकारी उद्देश्य के लिए और आधिकारिक पत्रों में इंडिया नाम का उपयोग करने से रोकने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता निरंजन भटवाल ने आग्रह किया कि न केवल सरकारी अपितु गैर सरकारी संगठनों और कॉरपोरेट्स को भी सभी आधिकारिक और अनाधिकारिक उद्देश्यों के लिए देश का नाम ‘भारत’ का उपयोग करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।  दुर्भाग्यवश लगभग छह माह बाद भी याचिकाकर्ता को कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।

भारत का इतिहास सदियों से काफी गौरवशाली रहा है। भारत का नाम प्राचीन वर्षों में ‘भारतवर्ष’ था। इसके पूर्व भारत नाम जम्बूदीप था। देश का नाम भारत होने के संबंध में एक सर्वमान्यकथा प्रचलित है कि कुरूवंशीय राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यद्यपि कई आधुनिक विद्वान इस कथा को प्रमाण के अभाव में खारिज़ करते हैं किन्तु पुराणों में ‘भारतवर्ष’ नाम का उल्लेख नकारा नहीं जा सकता है। ‘वायु पुराण’ में इस बात की पुष्टि होती है कि देश का नाम भारतवर्ष क्यों पड़ा। इस संदर्भ में ‘वायु पुराण’ का यह श्लोक ध्यान देने योग्य है जिसमें कहा गया है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है-
 हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्। 
तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधाः। 
इंडिया नाम तो अंग्रेजों की गुलामी के साथ आयाजबकि पुराणों में भारत के प्राचीन नाम जम्बूद्वीप का भी उल्लेख मिलता है। जम्बूदीप का अर्थ है समग्र द्वीप। भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथों में हर जगह जम्बूदीप का उल्लेख आता है। उस समय भू-भाग एक विस्तृत द्वीप था जिसे आगे चल कर भारतीय उपमहाद्वीप कहा गया। ‘वायु पुराण’ में ही दी गई एक अन्य कथा के अनुसार त्रेता युग में देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। ‘वायु पुराण’ के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में स्वंयभू मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने भरत खंड को बसाया था। लेकिन राजा प्रियव्रत के कोई भी पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नींध्र को गोद ले लिया था जिसका पुत्र नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था और ऋषभ के पुत्र का नाम भरत था और भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। 

विचारणीय है कि जब कम्बोडिया अपना नाम बदल कर मौलिक नाम कम्पूचिया कर सकता है, सिलोन अपने मौलिक नाम श्रीलंका को अपना सकता है तो इंडिया सिर्फ़ भारत क्यों नहीं हो सकता है। एक देश, एक नाम, एक पहचान - यह जरूरी है देश के वैश्विक गौरव के लिए।        -----------------------------------------
छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 01.02.2020)
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