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Tuesday, September 15, 2026

पुस्तक समीक्षा | इतिहास संबंधी अनेक भ्रम दूर करने में सक्षम है पुस्तक “छत्रसाल वंशावली” | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
इतिहास संबंधी अनेक भ्रम दूर करने में सक्षम है पुस्तक “छत्रसाल वंशावली”
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - छत्रसाल वंशावली
लेखक  - सन्तोष कुमार पटैरिया
प्रकाशक  - शतरंग प्रकाशन एस-43, विकासदीप बिल्डिंग, द्वितीय तल, स्टेशन रोड, लखनऊ-226001
मूल्य       - 200/-
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बुंदेलखंड का अपना एक गौरवशाली इतिहास है जिसमें महाराज छत्रसाल का उल्लेख स्वर्ण अक्षरों में किया जाता है। समूचे बुंदेलखंड में महाराज छत्रसाल का मान सम्मान आज भी बरकरार है। इसीलिए महाराज छत्रसाल के व्यक्तित्व एवं कार्यों को लेकर जब कोई विवाद की स्थिति निर्मित की जाती है तो बुंदेलखंड के जनमानस को गहरी ठेस पहुंचती है। ऐसी स्थिति में महाराज छत्रसाल के संबंध में उत्पन्न किए गए भ्रम का निवारण आवश्यक हो जाता है और इस प्रकार के अनेक भ्रम का निवारण करने वाली पुस्तक है “छत्रसाल वंशावली”। जो इसी वर्ष 2026 में प्रकाशित हुई है।

28 अगस्त 1958 को जन्में उत्तर प्रदेश महोबा के संतोष कुमार पटैरिया संस्कृत विषय में एम.ए. तथा ‘विद्या वाचस्पति’ की उपाधि प्राप्त हैं। उन्हें हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से, हिन्दुस्तानी अकेडमी प्रयागराज उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देली अकादमी सम्मान 2025 से सम्मानित किया जा चुका है। अभी तक ‘जय पीपल देव’, ‘लोक कवि ईसुरी’, उ.प्र. का स्वतंत्रता संग्राम महोबा, ‘आल्हा समर सारावली’ कृति प्रकाशित हो चुकी हैं। “छत्रसाल वंशावली” उनकी नवीनतम कृति है। यह गहन शोधपरक एवं इतिहास को उसके वास्तविक रूप में सामने रखने के उद्देश्य से लिखी गई है।

इस कृति की आधार सामग्री के संबंध में संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में लिखा है कि - “यह पाण्डुलिपि चरखारी के श्री देवनंदन तिवारी के माध्यम से प्राप्त हुई है। इसमें 19 रानियों और अधिकतम सभी सन्तानों का विवरण है। सम्वत् 1962 (सन् 1905) में श्री दरयाव सिंह जैवार द्वारा लिखी इस पाण्डुलिपि की विशेषता है कि इसमें निःसंतान रानियां, गोद लिये बच्चे और छत्रसाल के अतिरिक्त उनके पुत्रों के वैवाहिक संबंधों को भी लिखा गया है। मेरे पुस्तकालय में जो भी ग्रन्थ उपलब्ध थे उनमें निहित रानियों और पुत्रों के नाम ग्रन्थ के संन्दर्भ के साथ दिये गये हैं जिससे इतिहासकारों को तुलना करने में सुविधा रहेगी। तालव्य श का प्रयोग नहीं किया जाता था किन्तु मैंने नामों के शुद्ध अक्षर लिखे हैं जहाँ शब्द पठनीय नहीं हो सका वहां--रेखा खींच दी है। राजा छत्रसाल के पुरातात्विक साक्ष्य बहुत हैं। बुंदेलाकालीन स्मारकों मंदिर आदि की पहचान यह है कि गुम्बद के नीचे उल्टे और सीधे कमल बने हैं ज्ञातव्य है कि बुन्देलखण्ड में नीले कमल होते थे जिन्हें जयपुर राजघरानों में भेजा जाता था। नीलकमल को पुण्डरीक कहते हैं। मैं तपः पुरुष श्री गोविन्द सिंह बुन्देला, दीवान प्रतिपाल सिंह कृत बुन्देलखण्ड का इतिहास के सम्पादक डॉ. बहादुर सिंह परमार, शतरंग प्रकाशन, लखनऊ के प्रति हार्दिक आभारी हूँ। पुस्तक में श्री भगवान दास गुप्त की कृति का पत्र लिया गया है।”

   ‌‌बुंदेली संस्कृति के अध्येयता एवं महाराजा छत्रसाल बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, छतरपुर के प्रो. बहादुर सिंह परमार ने हमेशा बुंदेली संस्कृति एवं इतिहास पर शोध कार्य को बढ़ावा दिया है। वह स्वयं भी उन पांडुलिपियों को ढूंढते रहते हैं जो किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो पाई किंतु उनमें महत्वपूर्ण लेखन किया गया है। ऐसी पांडुलिपियों को ढूंढ कर वे स्वयं प्रकाशित करवाने का कार्य भी करते हैं। प्रो. बहादुर सिंह परमार ने पुस्तक में अपनी सम्मति देते हुए लिखा है कि - “बुन्देलखंड केशरी महाराजा छत्रसाल एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनसे प्रेरणा ग्रहण कर न्याय, संघर्ष, सर्वधर्म समभाव के साथ अपने धर्म के प्रति गहन आस्था सीखी जाती है जिन्होंने आततायी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष कर स्वराज्य की भावना वीर शिवाजी से सीख लेकर अपनायी। इनके बारे में तथाकथित लोग अनेक लोक-श्रुतियाँ बताते हैं। खासतौर पर उनकी संतानों और रानियों के बारे में। उनके समकालीन परिस्थितियों को नजर अंदाज कर आज के परिवेश से सोचते हैं जो न्याय संगत नहीं है। सोशल मीडिया पर महोबा के आदरणीय संतोष पटैरिया ने सूचना दी कि उन्हें एक पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें महाराजा छत्रसाल की सन्तानों तथा रानियों के बारे में विवरण है। मैंने उनसे अनुरोध किया कि इसे प्रकाश में आना चाहिए। उन्होंने इस बात से सहमति व्यक्त की। मैंने उनसे वायदा किया था कि इस कार्य में जो मुझसे सहयोग बनेगा अवश्य करेंगे।”

   बुंदेलखंड के पितृपुरुष महाराज छत्रसाल की वंशावली के वास्तविक एवं विस्तृत स्वरूप को इतिहासकारों एवं जिज्ञासु पाठकों के सामने लाने के लिए संतोष कुमार पटैरिया ने चरखारी उत्तर प्रदेश के देवनंदन तिवारी की पांडुलिपि को आधार सामग्री के रूप में ग्रहण करते हुए इस विषय से संबंधित अन्य पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, विद्वानों के सहयोग से तथ्यों की सत्यता को परखा तथा इसके उपरांत इस पुस्तक का कलेवर तैयार हुआ। पुस्तक की सामग्री को पांच अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। जिसमें प्रथम अध्याय ‘सम्मति’ तथा दूसरा ‘भूमिका’ का है। ‌
तीसरा अध्याय “पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” का है जिसमें दो पाठ हैं - (अ) पुत्रन को ब्याह तथा
(ब) सरीला, जैतपुर, चरखारी, पन्ना आदि सहित विवरण।
   चतुर्थ अध्याय में “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष (हिन्दी)” के अंतर्गत तीन पाठ रखे गए हैं - (अ) पाण्डुलिपि के अनुसार वंशवृक्ष, (ब) बुन्देलों का संक्षिप्त विवरण, तथा (स) विवरण में निहित ग्राम / नगर के नाम।
     पंचम अध्याय में अन्य ग्रन्थों में छत्रसाल की रानियों और पुत्रों के विवरण की जानकारी दी गई है।
     
        लेखक संतोष कुमार पटैरिया ने भूमिका में महाराज छत्रसाल के जन्म से संबंधित संक्षिप्त विवरण दिया है। उन्होंने लिखा है कि “वीर छत्रसाल ने लगभग बारह वर्ष की अवस्था में अपने माता पिता खोये थे। चम्पतराय बुन्देला के सारवाहन, अंगदराय, रतन, छत्रसाल और गोपाल पुत्र थे। सन् 1649 में खेलसर में बाकी खाँ द्वारा सारवाहन मारे गये थे। उनके निधन के बाद छत्रसाल का जन्म हुआ था। व्यक्ति के प्रसिद्ध होने पर उसकी जन्मतिथि और बचपन का विवरण खोजा जाता है और फिर कई मत सामने आते हैं इस प्रकार जन्मतिथि ही निश्चित नहीं हो पाती है। लिखने वाले आसपास के काल की घटनाओं को अनदेखी करते हुये अपना मत लिख देते हैं। इम्पीरियल गजेटियर में तो सन् 1643 ई. में छत्रसाल के जन्म का उल्लेख है। छत्रसाल के राजकवि श्री गोरेलाल 'लाल' थे उन्होंने अपनी कृति छत्रप्रकाश में आठवें अध्याय में छत्रसाल के नामकरण के बारे में लिखा है-
ईस नखत अनुरूप अरू, अरथवंत परिनााम। जनम पत्र तातें लिख्यौ, छत्रसाल यह नाम।।
    ईस नक्षत्र से शिव के नक्षत्र आर्द्रा से आशय है। छत्रप्रकाश में जन्मतिथि तो दृष्टिगत नहीं हुई है किन्तु यह उल्लेख किया है कि सारवाहन के निधन से दुखी माँ को स्वप्न हुआ था कि मैं आपके यहाँ पुनः जन्म लूँगा। श्री भीखराम शर्मा पन्ना के पास छत्रसाल का जन्मांक था जो जन सामान्य तक पहुँच सका। छत्रसाल की जन्मतिथि सम्वत् 1707 का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु लाल कवि ने छत्रसाल की ग्यारहवें वर्ष की अवस्था में चम्पतराय के लालकुंवरि के निधन का उल्लेख किया है।”

      महाराज छत्रसाल के निधन के संबंध में लेखक ने भूमिका में ही यह भी जानकारी दी है कि “वैराग्य की ओर अग्रसर छत्रसाल को कुछ लोगों द्वारा मिले तथ्य के आधार पर छत्रसाल सम्वत् 1788 पौष सुदी तृतीया को धुबेला महल की कुछ दूरी पर बने मंदिर में अपना अंगरखा उतारकर अज्ञात स्थान पर चले गये। एक दिन प्रतीक्षा के बाद मंदिर के समीप ही उनकी सांकेतिक अन्त्येष्टि की गई। उसी स्थान पर बाजीराव पेशवा प्रथम द्वारा स्मारक बनवाना आरंभ किया था जो पूर्ण नहीं हो सका। छत्रसाल के प्रस्थान के सोलह वर्षों बाद सम्वत् 1804 में माघ सुदी एकादशी को लगभग 95 वर्ष की अवस्था में भूषण का निधन हुआ था। कृष्णकवि ने तो प्रयागराज के पंडा द्वारा लिखा गया विवरण उद्धृत किया है जिसमें अस्थियां लाने वालों का उल्लेख है। जगतराज के राजकवि हरिकेश थे इन्होंने जगतराज की दिग्विजय काव्य विविध छंदों में लिखा है। चरखारी रियासत द्वारा इस कृति की लीथो मुद्रण पद्धति से 250 प्रतियां प्रकाशित की गई थी। कृति को हिन्दी साहित्य, इतिहास में छत्रप्रकाश के समान स्थान नहीं मिला। इस कृति में चंपतराय, छत्रसाल जगतराज और उनके पुत्रों का विवरण है। चंदेलवंश बनाफर वंश का भी विवरण देते हुए आल्हा ऊदल विषयक इतिहास भी दिया गया है।”    
   “पाण्डुलिपि का पाठ (बुन्देली)” में बुंदेली बोली में बुंदेलावंश की 19 रानियां का विवरण है। यह अध्याय इस विवरण से आरंभ होता है - “श्री महाराजाधिराज श्रीराजा श्री महाराज छत्रसाल जू देव के बाउन कुंवर कौ हाल वा ब्याहु सादी को हाल लिख्यते ।। महाराज छत्रसाल जू दव की जेठीरानी वेरछा वारे पमार दिमान गुपाल सिंह को बेटी रानी भानकुंवर तिनके महाराजा हिरदेसाह ।।1।।
दूसरी रानी सहरा के धंधरे दिमान हिरदेसाह की बेटी रानी दानकुंवर तिनके महाराजा जगतराज ||2||
तीसरी रानी रामपुरवाले वघेले राजा धनसिंह की बेटी रानी उदेत कुंवर तिनके दिमान नवल सिंह ।।३।।”
       अध्याय "पुत्रन को ब्याह" में  हिरदेसाह के जन्म से विवरण आरंभ किया गया है -
“महाराजा हिरदेसाह को जन्म सम्वत् 1736 में भयौ और महाराजा हिरदेसाह ब्याहे रीमा (रीवा) वाले बघेले लाल राजाराम रानी विचित्रकुंवर तिनके महाराजा मन्नासिंह ||1 ||
वा. महाराजा प्रथीं सिंह साहगढ़ वाले ||2||
वा दूसरी रानी वरेठीवारे पमार दिमान देवी सिंह की बेटी रानी गंजकदवा । ।३ ।।
तीसरी रानी उदगुवा वारे पमार दिमान जैसिंह की बेटो रानी रामकुंवर तिनके दिमान अमरसिंह मलारा (मलहरा) वारे ।।4। |”
        अध्याय “महाराज छत्रसाल वंशवृक्ष” में महाराज छत्रसाल के वंश की रानियों एवं उनकी संतानों का विवरण है। जैसे - “ रानियाँ देवकुँवर, कमलावती के नाम भी मिलते हैं। भानकुँवर पत्नी श्री गोपाल सिंह पमार, बेरछा कृष्णकविकृत बुन्देल भास्कर पृष्ठ 46 के अनुसार भानकुंवर के विवाह की तिथि वैशाख शुक्ल 3 सम्वत् 1621 |
हिरदेशाह जन्म सम्वत् 1736
पहली पत्नी विचित्र कुँवर पुत्री श्री राजाराम बघेल, रीवा के पुत्र मन्ना सिंह और पृथ्वी सिंह शाहगढ़ दूसरी रानी नृपकुँवर पुत्री श्रीदेवी सिंह पमार बरेठी मेदनीमल्ल पहले रूद्रपुर बाद में गंजकदवा तीसरी रानी रामकुँवर पुत्री जौ सिंह पमार, उदगुवाँ अमर सिंह, मलहरा, मनेश कुँवर जाट जाति की, मालम सिंह, लुगासी
छत्रसाल की दूसरी रानी दानकुँवर पुत्री श्री हृदयशाह धंधेरे सहरा के पुत्र जगतराज
तीसरी रानी उदेतकुँवर पुत्री श्री धन सिंह बघेला रामपुरा इनके पुत्र नवल सिंह, भारतीचंद्र
चौथी रानी महाराजकुँवर पुत्री श्री हरि सिंह, धंधेरे, मौहार (निःसंतान)।”
      इसी अध्याय में अन्य जाति की रानियां से उत्पन्न पुत्रों का भी उल्लेख किया गया है। अंत में संख्यात्मक जानकारी देते हुए लेखक ने लिखा है- 19 रानियां से 41 पुत्र तथा 11 अन्य रानिया से अर्थात कुल 52 पुत्र।
     इसके बाद प्राप्त पांडुलिपि के अनुसार महाराज छत्रसाल का वंश वृक्ष दिया गया है। लेखक ने बुंदेली के धार्मिक प्रतीक और देवताओं का भी संक्षिप्त विवरण दिया है साथ ही पांडुलिपि में मिले ग्राम और नगरों के नाम का उल्लेख किया है।
       बुंदेलखंड के इतिहास लेखन में दीवान प्रतिपल से का अभिन्न योगदान है अतः लेखक संतोष कुमार पटेरिया ने दीवान प्रतिपाल सिंह द्वारा लिखित बुंदेलखंड का इतिहास में उद्धृत छत्रसाल की रानियों, रानियां के पिता के नाम, जाति एवं स्थान के नाम की तालिका भी शामिल की है।
     इसी क्रम में कृष्ण कवि द्वारा लिखा गया “बुंदेलखंड का इतिहास (पन्ना खण्ड) से उदित जानकारी भी रखी है।
     इतिहास के संदर्भ में वर्तमान स्थिति शोध की कमी के कारण आए दिन विवादों से घिरी रहती है। कुछ विवाद फिल्म कारों के द्वारा भी जाने-अनजाने खड़े कर दिए जाते हैं। जैसे फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' में महाराज छत्रसाल और मस्तानी के इतिहास को नाटकीय रूप से पेश किया गया है, जिसपर इतिहासकारों और वंशजों द्वारा कई विवाद और आपत्तियां जताई गई। इसमें मस्तानी की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि को लेकर विवाद की स्थिति रही। फिल्म और इतिहास में मस्तानी की माता को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया। कुछ इतिहासकार उन्हें महाराज छत्रसाल और उनकी फारसी-मुस्लिम पत्नी (रोहानी बेगम) की पुत्री मानते हैं, जबकि कुछ इसे लेकर अन्य दावे करते हैं। इसके साथ ही फिल्म में दिखाया गया है कि मस्तानी खुद संदेश लेकर बाजीराव के पास जाती हैं और समय रहते बाजीराव आकर युद्ध का पासा पलट देते हैं। वहीं ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि जैतपुर के युद्ध में बंगश ने छत्रसाल को हरा दिया था और उन्हें नजरबंद कर लिया था, जिसके बाद गुप्त संदेश वाहक (रघुनाथ पंडित) बाजीराव के पास मदद के लिए पहुंचे थे।
     ऐसी भ्रामक स्थितियां उत्पन्न हो चुकने के बाद साथ ही जब शोधात्मक पठन-पाठन का चलन काम होता जा रहा है, यह पुस्तक स्पष्ट करती है की महाराज छत्रसाल के वश में कौन-कौन हुए, उनकी कितनी रानियां थी और कितने पुत्र थे। इस प्रकार यह पुस्तक महाराज छत्रसाल से जुड़े कई भ्रम खंडित करती है। यही कारण है जो इस पुस्तक की इतिहास संबंधी उपादेयता को बढ़ा देता है। यह पुस्तक शोधार्थियों तथा बुंदेलखंड के इतिहास एवं छत्रसाल वंशावली में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुस्तक की पृष्ठ संख्या भले ही मात्र 68 है किंतु यह नवीन शोधों को एक मजबूत प्लेटफॉर्म प्रदान करने में सक्षम है।  
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Tuesday, August 25, 2026

पुस्तक समीक्षा | मनस्वी बुद्धिप्रकाश सारावगी के व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालता स्मृतिग्रंथ | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा      
मनस्वी बुद्धिप्रकाश सारावगी के व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालता स्मृतिग्रंथ
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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स्मृति ग्रंथ - मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा
संपादक   - प्रो. सरोज गुप्ता, सुमति कुमार जैन
प्रकाशक    - प्रलेक प्रकाशन, 702, जे-50, ग्लोबल सिटी, विरार वेस्ट, मुंबई, महाराष्ट्- 401303
मूल्य       - 999/-
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जीवन में संस्कारों का सबसे अधिक महत्व होता है। विशेष रूप से उन संस्कारों का जो हमें अपने माता-पिता से मिलते हैं। यही संस्कार पितृऋण का भी स्मरण कराते हैं। सनातन धर्म और वेदों के अनुसार पितृऋण हमारे माता-पिता और पूर्वजों का वह कर्ज है, जो हमें जीवन, संस्कार और वंश परंपरा देने के कारण हम पर होता है। इस ऋण को मनुष्य का जन्मजात ऋण माना गया है। वेदों में पितृों को इंद्र, दक्ष, मरीचि और सप्तर्षियों के भी मार्गदर्शक कहा गया है-
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।। 
अर्थात, जो पूजनीय हैं, अमूर्त (सूक्ष्म रूप में) हैं, और जिनका तेज प्रदीप्त है, उन ध्यानी और दिव्यदृष्टि संपन्न पितरों को सदा नमस्कार है। जो इंद्र, दक्ष, मरीचि और सप्तर्षियों तथा अन्य महान संतों के भी मार्गदर्शक व प्रणेता हैं, और सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हैं, उन सभी पितृ देवताओं को सादर नमन है।
इसी भावना के साथ विरल व्यक्तित्व के धनी पितृ पुरुष बुद्धिप्रकाश सरावगी पर एक स्मृति ग्रंथ का प्रकाशन किया गया है जिसका संपादन एवं प्रकाशन उनकी पुत्री प्रो. सरोज गुप्ता ने सुमति कुमार जैन के संपादन सहयोग से किया है। इस स्मृतिग्रंथ का नाम है-‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा (विरासत का संवाद: डायरी के पन्नों से)।

‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ - इस स्मृति ग्रंथ में बुद्धि प्रकाश सरावगी जी के जीवन के विभिन्न पक्षों पर समुचित प्रकाश डाला गया है जिससे उनके व्यक्तित्व की विशालता का स्पष्ट दर्शन होता है। इस पुस्तक में डायरी के पन्ने, पत्र, बुद्धि प्रकाश सरावगी जी व्यक्तित्व से संबंधित विभिन्न विद्वानों के विचार संस्मरण तथा उनकी रचनात्मक को साहेजा गया है। 224 पृष्ठ की पुस्तक के कलेवर को 12 अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के ब्लर्ब पर डॉ रजनी गुप्ता एवं डॉ कुमकुम गुप्ता के विचार हैं। इसके साथ ही पुस्तक के संबंध में शुभकामनाओं सहित आचार्य प्रभु दयाल मिश्रा अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थान भोपाल, दीपक पालावत दीपज्योति ग्रुप का पब्लिकेशंस के मनोभाव रखे गए हैं। तदुपरांत संपादक द्वय सुमति कुमार जैन तथा प्रोफेसर सरोज गुप्ता के संपादकीय विचार हैं।

प्रो. सरोज गुप्त ने इस स्मृति ग्रंथ के आकार लेने की पूर्वपीठिका से परिचित कराते हुए अपने संपादकीय में लिखा है कि ‘‘जनवरी 2022 में चिरगाँव से प्रकाशित गहोई गरिमा पत्रिका का जनवरी विशेषांक पिताजी पर केन्द्रित रहा। गहोई गरिमा पत्रिका के विमोचन अवसर पर श्री हरगोविंद कुशवाहा, डॉ. एस आर गुप्ता, डॉ. सुरेन्द्र दुबे, डॉ. प्रदीप तिवारी, श्री रामप्रकाश हथनोरिया सहित गणमान्य विद्वत्जनों, साहित्यकारों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। सभी ने पिताजी से सम्बंधित संस्मरण सुनाये। इन संस्मरणों को सुनकर मुझे लगा कि पिताजी की हस्तलिखित डायरी के पन्नों को देखा जाये शायद कुछ मोती माणिक्य मिलें। गहोई गरिमा पत्रिका के विमोचन के पश्चात् मैंने पिताजी के लेखन पर गहन अध्ययन व चिंतन किया। चूँकि जगमग दीपज्योति पत्रिका के सम्पादक ने मुझे 2020 में पत्रिका के महिला विशेषांक का अतिथि सम्पादक बनाया तभी से आपसे साहित्यिक चर्चा होती रहती है मैंने आपको पिताजी का स्मृति ग्रन्थ भेजकर पिताजी की पुस्तक पर चर्चा की। आपने पुस्तक को न सिर्फ पढ़ा वरन् अपनी विरासत को संजोने की बात कहकर ‘‘उदारचेता मनस्वी श्री बुद्धि प्रकाश सरावगी जिन्हें शब्दों की शिरोरेखा से नहीं बांधा जा सकता’’ लेख लिखकर मुझे भेजा साथ ही जगमग दीपज्योति के मार्च 2024 के अंक में पहले पृष्ठ पर उसका प्रकाशन भी किया।’’

इस प्रकार इस स्मृति ग्रंथ स्वरूप पर मंथन आरंभ हुआ और विभिन्न लोगों के लेखकीय सहयोग से इस ग्रंथ को आकार मिला। ग्रंथ का नाम ‘‘विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ जगमग दीपज्योति के सम्पादक सुमतिकुमार जैन ने दिया। इस ग्रंथ में बुद्धि प्रकाश सरावगी के विविध छायाचित्र भी रखे गए हैं जिनसे उनके व्यक्ति की झलक मिलती है। अपने पिताश्री के संबंध में प्रो. सरोज गुप्ता ने लिखा है कि-‘‘उनको मैंने सदैव पारस्परिकता सामंजस्य और सर्वसामान्य सामूहिक विज्ञानमय जीवन जीते रहे हैं। उन्होंने अपने जीवन में सम्पूर्ण सत्ता का अपनी मानसिक, प्राणिक और भौतिक सत्ता का रुपान्तरण किया। एक सर्वथा नवीन चेतना उनके कार्य व्यापार में लोगों ने देखी। पिताजी जहाँ जाते अप्रतिम छाप छोड़ते। असफलता उनसे कोसों दूर थी। दो दो स्कूलों के संस्थापक प्राचार्य होना, सारी व्यवस्था जादुई तरीके से करना। सबको अपनापन देकर कार्य का महत्व बताना। समाज व राष्ट्र का हित चिंतन करना उनके स्वभाव में रहा। इसीलिए समाज के मन-मस्तिष्क में वह आज भी स्मरणीय हैं। यह बात मैं अपने मन से नहीं वरन् वरिष्ठ जनों के मुख से पिताजी की प्रशंसा में सुनी सुनाई बातों के आधार पर कह रही हूँ। इस ग्रन्थ के संस्मरण लेख इसके गवाह हैं।’’

वैसे वस्तुतः किसी गवाह अथवा साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है क्यों कि माता-पिता के संस्कार उनकी संतानों में परिलक्षित होते हैं। प्रो. सरोज गुप्ता की धर्मनिष्ठा, कर्मठता एवं जीवन संस्कारों को देख कर ही उनके पिताश्री की श्रेष्ठता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह सुसंस्कार ही तो है कि प्रो. सरोज गुप्ता ने पिताश्री के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए उनकी स्मृति ग्रंथ का संपादन एव. प्रकाशन किया। यह एक सुरुचिपूर्ण ग्रंथ है जो वर्तमान को अतीत से जोड़ने में सक्षम है। इस ग्रंथ के माध्यम से हम उन जीवन मूल्यों से भलीभांति परिचित हो सकते हैं जो हमारे पितृ समय में रहे हैं। इस ग्रंथ में वे कविताएं भी हैं जिन्हें बुद्धिप्रकाश सरावगी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए लिखा गया है और जो उनके उस विराट व्यक्तित्व से परिचित कराते हैं जिनकी मन-मस्तिष्क पर आज भी छाप विद्यमान है। 

प्रथम अध्याय प्रांशु प्रसंगिका में ये भावोद्गार हैं-योग क्षेमो नः कल्पन्ताम् आचार्य पं. प्रभुदयाल मिश्र, शब्द शब्द झरता कुमकुम दीपक पालावत, हृदयोदगार सुमति कुमार जैन, सम्पादकीय प्रोफेसर सरोज गुप्ता। द्वितीय अध्याय श्रद्धा के पुष्प में जो लेख हैं वे इस प्रकार हैं- विरासत का संवाद -श्री ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव, निकष - डॉ. आर.डी. मिश्रा, न दैन्यम् न पलायनम् - टीकाराम त्रिपाठी, साधक एक सकल सिधि देनी प्रो. ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव, श्रद्धा के दो शब्द - डॉ. शिरोमणि सिंह पथ, बहुमुखी प्रतिभा के धनी सरावगीजी - श्रीमती शशि शर्मा।
प्रशंसा पत्र में ‘‘उदारचेता मनस्वी श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी जिन्हें शब्दों की शिरो रेखा से नहीं बाँधा जा सकताष्- श्री सुमतिकुमार जैन, गोविन्द दास रिछारिया, उपाध्यक्ष सचिवालय, बम्बई, बेनी बाई, विधायक, बबीना विधानसभा (उ.प्र.), सुदामा प्रसाद गोस्वानी, विधायक तालबेहट, ललितपुर (उ.प्र.), डॉ. भगवत दयाल, विधायक बबीना झाँसी (उ.प्र.) तथा शुभकामना संदेश के अध्याय में प्रो. सुश्री गार्गी, श्री द्वारिका प्रसाद चैतन्य श्रीमती शिवकली रूसिया, श्रीमती पुष्पा कनकने, डॉ. गंगा प्रसाद बरसैया, श्री हरिशंकर सिजरिया के संदेश हैं।
काव्यांजलि अध्याय के अंतर्गत - बड़े गाँव के लाल - डॉ. के.एल. वर्मा बिन्दु, गुरुवर बुद्धि प्रकाश - डॉ. नारायणदास कमलेश, बुद्धि प्रकाश की ज्योर्तिमय स्मृति में - डॉ. सीताराम गुप्त दिनेश, बुद्धि प्रकाश जी सरावगी अमर हैं - डॉ. आनंदकंद गुप्त, परहित साधक स्व. बुद्धि प्रकाश श्री रघुवीर प्रसाद गुप्त, मिले पिता गुरुदेव समान - डॉ. सरोज गुप्ता की कविताएं हैं।
इसके बाद के अध्यायों में जीवन दर्शन, शैक्षणिक कार्य क्षेत्र तथा डायरी के पन्नों से वे महत्वपूर्ण अध्याय हैं जिनके क्षरा बुद्धिप्रकाश सरावगी के विचार एवं मानवीय मूल्यों को बारीकी से जाना और समझा जा सकता है।
परख संग साथी नामक अध्याय में विभिन्न विद्वानों ने बुद्धिप्रकाश सरावगी जी के व्यक्तिव पर प्रकाश डाला है। जैसे - श्री सरावगी जी चलते फिरते विश्वविद्यालय - पं. गुणसागर सत्यार्थी, जैसा मैंने देखा - शिवकली रूसिया, अभिन्न आत्मीय कीर्तिशेषरू श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी - राजाराम तिवारी, श्री गुरु चरण सरोज रज - देवेन्द्र कुमार जैन, स्नेह सागर - श्रद्धेय सरावगी जी डॉ. नारायणदास गुप्त कमलेश, दैदीप्यमान स्मृति - राजाराम वर्मा, स्मृति पुंज: बड़ागाँव के मालवीय श्री सरावगी - कृष्ण बिहारी नायक, स्थित प्रज्ञ मनीषी: श्री बुद्धिप्रकाश सरावगी उदय नारायण कनकने, शिक्षा क्षेत्र के देदीप्यमान प्रकाश पुंज बुद्धिप्रकाश सरावगी लखनलाल कारेखिमऊ, जीवन्त व्यक्तित्व के धनी ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव, बुन्देलखण्ड की माटी के जुझारू व्यक्तित्व श्री सरावगी जी डॉ. रामकृष्ण गुप्त, एक संस्मरण वर्ष सन् 1955 रमेशचन्द्र शर्मा, परम आदरणीय गुरुवर श्रद्धेय सरावगी जी डॉ. जगदीश शरण खर्द, अक्षय प्रेरणा के स्रोत श्री सरावगी जी रामेश्वरी नायक। इसके बाद का अध्याय भावनाओं का सागर समेटे हुए है जिसका शीर्षक है ‘‘उद्गार अपनों के’’। इसमें  बुद्धिप्रकाश सरावगी जी की अर्द्धंगिनी से नवोदित पीढी के नवांकुरों तक के उद्गार हैं। इन लेखों के शीर्षक ही बहुत कुछ कह देते हैं। जैसे- पति की यादें ही पाथेय - रामप्यारी सरावगी, मेरे प्रेरणा स्रोत पिताजी - अनिल सरावगी, डॉ. विचारशील प्रखर अध्येता- हरिमोहन गुप्ता, मेरे आदर्श पिताजी - डॉ. सरोज गुप्ता, स्नेहिल पिताजी - अखिलेश सरावगी, मेरे पिता जैसा कोई नहीं - डॉ. संगीता सुहाने, वात्सल्य की प्रतिमूर्ति मेरे दादा जी - कु. ऋचा सरावगी, जगमगाते नक्षत्रः मेरे दादा जी - कु. तृप्ति सरावगी,  मेरे नानाजी एक दृष्टि - मा. कार्तिकेय गुप्ता, मेरे प्यारे दादाजी - अमित, अनुज सरावगी।
लेखों के अंतिम अध्याय ‘‘स्मृतियों के झरोखे से’’ में श्री लक्ष्मीनारायण पिपरसानियाँ, श्री प्रेमनारायण गुप्त, डॉ. नारायणदास कमलेश, रणजीत सिंह जू देव, श्री रामकिशोर वीणा,श्री जी.एस. बडैरिया. श्री रामगोपाल लहरिया, श्री छक्कीलाल रावत, श्री अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद, श्री बनमाली लाल सादेले, श्री रमेश सेठ, श्री उदयनारायण कनकने, डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त,सुल्तान सिंह चौहान, चैतन्य वाणी, रामनाथ नीखरा,गंगा प्रसाद बरसैंया आदि के संस्मरण हैं।

‘‘मनस्वी बुद्धिप्रकाश सरावगी विरल व्यक्तित्व की अविराम यात्रा’’ स्मृति ग्रंथ एक विशिष्ट व्यक्ति की समग्र विशिष्टताओं को सहेजे हुए है। इस ग्रंथ के माध्यम से एक पुत्री का अपने पिता के प्रति प्रेम और श्रद्धा का अनुभव किया जा सकता है तथा विरासत की उष्मायुक्त गरिमा को आत्मसात किया जा सकता है। प्रो. सरोज गुप्ता प्रशंसा की पात्र हैं कि उन्होंने पितृऋण को समझा और उसके प्रति इस ग्रंथ के रूप में अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है। यह ग्रंथ नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के मूल्यों से जोड़ने में सक्षम है, संस्कारों के प्रवाह का साक्षी है तथा पठनीय है।     


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Wednesday, August 12, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें
 समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- चलो ढूंढें जवाब अपने 
कवि       - कृष्ण बक्षी 
प्रकाशक  - बोधी प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर - 302006
मूल्य      - 150/-  
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हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में कृष्ण बक्षी की एक विशेष पहचान है। जीवन से उनके गहरे सरोकार रहे हैं जो उनकी ग़ज़लों में साफ़ देखे जा सकते हैं। यूं भी ग़ज़ल साहित्य की एक ऐसी काव्य विधा है जिसके प्रत्येक शेर अपनी लयात्मकता के साथ स्वतंत्र संवाद करता है। इसलिए एक ग़ज़ल ही अपने आप में जीवन की पूरी कथा कह सकती है बशर्ते कहने वाले ने ग़ज़ल को पूरी तरह साधा हो। कृष्ण बक्षी वे ग़ज़लकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल को न केवल साधा बल्कि उस पर अपनी छाप भी छोड़ी। ‘‘चलो ढूंढें जवाब अपने’’ कृष्ण बक्षी का एक ऐसा ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी ग़ज़लें जीवन के अनुत्तरित रह जरने वाले सवालों के जवाब ढूंढती दिखाई देती हैं। आधुनिक जीवन में जटिलताओं की कमी नहीं है। रोजी-रोटी की समस्या, सिर पर छत की समस्या, बच्चों के लालन-पालन की समस्या। उस पर भी कुछ समस्याएं इंसान स्वयं पैदा कर लेता है जैसे जाति, धर्म, रंग और समुदाय के भेद की समस्या। ऐसा क्यों होता है? इंसान सुकून पाना चाहता है लेकिन अपनी मुश्क़िलें भी खुद ही बढ़ाता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसे ही ‘क्यों’ का जवाब ढूंढती है कृष्ण बक्षी की यह ग़ज़ल-

न दरिया में  रवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
कहीं ठहरा सा पानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
अलहदा कैसे कर दोगे रगों में सबकी बहता है 
जो खूं हिंदोस्तानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अज़ब हालात में उलझा के रख दी है जवां पीढ़ी 
भटकती-सी जवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
 - ये अशआर हैं शायर कृष्ण बक्षी की गजल ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ से। यह ग़ज़ल उनके जिस ताजा ग़जल संग्रह में संग्रहीत है, उसका नाम भी है ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’।
 वर्तमान परिदृश्य देखते हुए कवि कृष्ण बक्षी महसूस करते हैं कि समाज में हर स्तर पर हर ओर प्रश्नों का अंबार लगा हुआ है, जिनका जवाब ढूंढें बिना हल नहीं निकाला जा सकता है। जो प्रश्न अव्यवस्थाओं को देखकर, असंवेदनाओं को देखकर और विसंगतियों को देखकर मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं, वही व्याकुलता का कारण बनते हैं। इसलिए भी उनका जवाब ढूंढना ज़रूरी है। यूं भी प्रश्नों से घिरा हुआ समाज कभी सही ढंग से विकास नहीं कर पाता है।
ग़म ही रह जाते हैं अक्सर गुनगुनाने के लिए 
छोड़ देता है कोई जब टूट जाने के लिए
छीन कर के चुलबुल आपन ले गए सारी हंसी
तुमने छोड़ी  तक खुशी न मुस्कुराने के लिए

इसी ग़ज़ल में जो कि आरंभ में इश्क़िया गजल होने का एहसास कराती है, वहीं आगे के शेर ज़िंदगी की पथरीली सच्चाइयों से सामना कराते हैं। जैसे ये शेर हैं-
पी गया है चिमनी यों का उनको जहरीला धुआं 
घर से जो  मजदूर  निकले  कारखाने के लिए 
खूब  इस्तेमाल  तुमने  कर लिया  आवाम का
काम आया है  फ़क़त  जो सर झुकाने के लिए

कवि ने सत्ता के खोखले वादों और दावों पर जहां तंज कसा हैं, वहीं सत्ता के इर्द-गिर्द झूठ के मायाजाल को भी उजागर किया है। एक ऐसा मायाजाल जो आमजन को वोटर संख्या अथवा सभाओं की भीड़ से अधिक कुछ नहीं मानती है। कवि कृष्ण बक्षी की गजलों में भाषाई समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। प्रचलन में मौजूद शब्दों और मुहावरों को बड़ी सुंदरता से और सटीकता से अपने शेरों में पिरो देते हैं। जैसे यह गजल है ‘‘सभाओं ने हमें’’ -
हर कसौटी पर कसा है विपदाओं ने हमें
खूब जांचा खूब परखा आपदाओं ने हमें
सिर्फ हम मोहरे रहे जलसे, जुलूसों के 
दांव पर रक्खा हमेशा ही सभाओं ने हमें
साजिशों वाली अंधेरी कोठरी में क्यूं
बांध रक्खा है अभी तक बादशाहों ने हमें

इस संग्रह की ग़ज़लें अपने प्रश्नों के जवाब मांगने के साथ ही हमारे आसपास रच-बस गए झूठ को बखूबी रेखांकित करता है। और हमें आगाह करने का प्रयास करता है कि हमें ज़रूरत है अपने स्वार्थ की गहरी नींद से जागने की। यूं तो शायरी का नाता प्यार-मोहब्बत, ग़म, शिक़ायत, दोस्ती, दुश्मनी आदि इन सब से बहुत क़रीब कर रहा है। लेकिन जब कृष्ण बक्षी अपनी शायरी में दोस्ती दुश्मनी की बात करते हैं तो उनका अंदाज निराला होता है बानगी देखिए -
दर्द अक्सर जब  मुझे पहचान लेता है 
बिन सबूतों के ही दुश्मन मान लेता है
बात उठते ही वो मेरे इन सवालों की 
पांव से सर तक वो चादर तान लेता है
यह व्यवस्था ही बहुत है जान लेने को
जहर का तू किसलिए एहसान लेता है

दर्द पर ही एक ग़ज़ल के कुछ और शेर देखिए जिनमें आंतरिक पीड़ा के साथ ऐतिहासिक उद्धरण का सुंदर सामंजस्य है-
ज़ख्म मेरे आज  मुझसे बात करने पर तुले हैं 
और उस पर दर्द तहक़ीक़ात करने पर तुले हैं
सांझ के सूरज बचा कर रख ज़रा सी रोशनी 
वक्त से  पहले सितारे  रात करने पर तुले हैं
वह  हमारे  दौर का  ही  आम सा इंसान है
आप आखिर क्यों उसे सुकरात करने पर तुले हैं

यह माना जाता है कि बड़े बहर की ग़ज़लें कहने से अधिक कठिन होता है छोटी बहर की ग़ज़लें कहना। सच भी है कि कम से कम शब्दों में सब कुछ कह देना एक साहित्यिक कला ही तो है। जो इस कला में पारंगत हो जाता है, वह आसानी से छोटे बहर की सटीक ग़ज़लें भी कह लेता है। इस संग्रह में बड़े बहर के साथ छोटे बहर की भी कई खूबसूरत गजलें हैं। जैसे यह एक गजल है ‘‘रोज़ मरते हैं’’ -
    हम जिसे  बहुत  प्यार करते हैं 
    उसकी  नाराज़गी  से डरते हैं 
    जिनको होता है खौफ लहरों का 
    सिर्फ  पानी  में  वो उतरते हैं 
    चल मोहब्बत से पूछ कर देखो 
    हम ही करते हैं कि वो भी करते हैं

छोटी बहर की ही एक और ग़ज़ल है जो आजकल के अव्यवस्था भरे माहौल पर तीखा कटाक्ष करती है। शेर देखें -
नए-नए रास्ते निकाल के 
ढूंढ रहे हैं हल सवाल के 
ग्रामसभा से  लौटे हैं वो 
कुछ ताजा मुद्दे उछाल के 
आपके घर के बदलो बंधु 
बूढ़े  कैलेंडर  दीवाल के

कवि कृष्ण बक्षी का गीत गजल की दुनिया में एक लंबा अनुभव रहा है। वे अपनी गजल में जो कुछ कहना चाहा उसे बखूबी कहने की महारत रखी। भाषा भी सरल है, आमबोलचाल की भाषा। इसीलिए कृष्ण बक्षी की गजलें, उसे पढ़ने या सुनने वाले से सीधा संवाद करने की ताकत रखती है। ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ संग्रह की तमाम ग़ज़लें शिल्प के लिहाज़ से मुक़म्मल हैं, विचारों को उद्वेलित करती हैं और पठनीय हैं।
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