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Tuesday, December 24, 2024

पुस्तक समीक्षा | राष्ट्र के अतीत और वर्तमान का सटीक आकलन करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 24.12.2024 को 'आचरण' में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कर्नल पंकज सिंह जी के काव्य संग्रह "लहू से लिखे वे ग्यारह पन्ने" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा  
राष्ट्र के अतीत और वर्तमान का सटीक आकलन करती कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह   - लहू से लिखे वे ग्यारह पन्ने
कवि         - कर्नल पंकज सिंह
प्रकाशक     - एन.डी. पब्लिकेशन, बाधापुर पूर्व, नई दिल्ली   
मूल्य        - 200/- 
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    वर्तमान समय वैश्विकता का समय है। आज पूरे विश्व को एक ग्लोबल गांव की भांति देखा जाने लगा है। इंटरनेट के संजाल ने दुनिया के प्रत्येक भाग को परस्पर समीप ला दिया है। मनुष्य से मनुष्य का यह संपर्क विकास का एक अच्छा सोपान है। किन्तु इससे एक संकट अवश्य आ खड़ा हुआ है, वह है राष्ट्रीय चेतना का। ऐसा नहीं है कि वर्तमान युवा मानस में अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम नहीं है, प्रेम है किन्तु उस प्रेम के प्रति वह सघन अनुभूति नहीं है जो कि होनी चाहिए। यह राष्ट्रवाद का कट्टर स्वरूप नहीं अपितु वह आंतरिक प्रेरणा है जो राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जगाती है। जो यह याद दिलाती है कि राष्ट्र से ही हमारी पहचान है। यदि राष्ट्र है तो हम हैं अन्यथा हमारी पहचान एक ग्लोबल शरणार्थी से अधिक कुछ भी नहीं बचती है। आज जब देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति अनुराग की भावना धुंधली पड़ती जा रही है, ऐसे दौर में अतीत की गौरव गाथाएं हैं जो धुंधले होते इस अनुराग की पुनस्र्स्थापना कर सकती हैं। जहां तक बात साहित्य की है तो काव्यजगत में वर्तमान के खुरदरे यथार्थ, विसंगतियों, विडंबनाओं एवं कुछ प्रतिशत श्रृंगार रस की कविताएं रची जा रही हैं। देशभक्ति एवं राष्ट्रप्रेम की कविताओं की प्रचुरता दिखाई नहीं पड़ती है। जबकि ऐसी कविताओं की आवश्यकता हर युवा पीढ़ी के लिए होती है ताकि उन्हें सरसता एवं रागात्मकता के साथ अतीत के गौरव और राष्ट्र-सम्मान से जोड़ा जा सके। इस संदर्भ में कर्नल पंकज सिंह का नवीनतम काव्य संग्रह ‘‘लहू से लिखे वे ग्यारह पन्ने"  एक महत्वपूर्ण कृति है। भारतीय सेना में पदस्थ कर्नल पंकज सिंह का यह दूसरा काव्य संग्रह ‘‘श्वास कितनी शेष है’’ की कविताओं में कुछ और भी विशिष्टता है। यह संग्रह जीवन दर्शन, प्राणोत्सर्ग की उच्चता के साथ ही वर्तमान जीवन की विडंबनाओं को लक्षित करने वाली कविताओं से परिपूर्ण है। अतीत से वर्तमान और वर्तमान का आकलन करता समग्र शाब्दिक आरेखन है इन कविताओं में।

कवि पंकज सिंह को पौराणिक ग्रंथों एवं महाकाव्यों का समुचित ज्ञान है जो कि उनकी कविताओं में स्पष्ट मुखरित होता है। महाभारत या इतिहास के किसी भी दौर से जब वे कथा एवं चरित्र उठाते हैं, तो उनको राष्ट्रीयता की दृष्टि से ही देखते और प्रस्तुत करते हैं। वे ‘‘महाभारत’’ के पात्रों में सबसे दृढ़पात्र भीष्म पर कविता लिखते हुए व्याख्यायित करते हैं कि सुख का वास्तविक अभिप्राय क्या है? कवि के अनुसार सत्य एवं आदर्श का पक्ष लेते हुए कष्ट सहना भी सुख का ही एक स्वरूप है -‘‘वहीं वे वृद्ध कंधे जो अचल अवलंब थे/आदर्श व्रत का ले समर में भी उठा/जाने किस बोधि से अभिभूत हों/रहें हैं भोग अब शरशैय्या सहर्ष।’’ 

राष्ट्रीयता के तारतम्य में वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि सबसे परम तीर्थ कौन-सा है। ‘‘परम तीर्थ’’ शीर्षक कविता में कवि ने रणभूमि को वह पुण्यक्षेत्र एवं परम तीर्थ कहा है, जहां हर सैनिक अपने प्रत्येक मोहपाश को तोड़ कर युद्धकर्म करता है - 
जहाँ श्रीकृष्ण उपस्थित हैं प्रतिपल, 
और गूंज रही है गीता भी। 
जहाँ निष्काम कर्म का पथ है, 
बड़ा सरल और सीधा भी।
जो सहज विजय माया पर करके, 
पाश मोह का तोड़ लड़े।
समर स्थली तो परमतीर्थ है, 
यहाँ सैनिक के चरण पड़े।
कवि पंकज सिंह की कविताओं में एक आंतरिक आंच है जो उनकी कई कविताओं में तपन का अहसास कराती है। कवि का अपना आकलन है, अपने सटीक तर्क हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता है। एक गीत तो हम सभी लगभग बाल्यावस्था से सुनते आए हैं- ‘‘दे दी हमें आज़ादी, बिना खड्ग बिना ढाल...’’, इस गीत को ले कर कवि पंकज सिंह ने एक कविता ‘‘सत्य का स्वार्थ’’ में उन साहित्यकारों को ललकारा है जो सत्य को स्वार्थ के अनुरुप ढाल कर प्रस्तुत करते हैं। यह कविता बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल इस बहुचर्चित गीत के मानकों को तोड़ती है वरन साहित्य के सृजनकर्ताओं से भी आत्मावलोकन एवं आत्ममंथन का आग्रह करती है। ‘‘सत्य का स्वार्थ’’ कविता का एक अंश देखिए-
दे दी हमें आजादी 
बिना खड़ग बिना ढाल?
बंद करो
बहुत हुआ यह स्वांग 
ये जो आजादी के दिये
जल रहे हैं ना
ये क्रांतिकारियों के खून से रोशन हैं
तुम्हारी रगों के पानी से नहीं ।

कवि पंकज सिंह को किसी से द्वेष नहीं है, वे मात्र यही चाहते हैं कि सच पर झूठ का लेपन न किया जाए। संग्रह की शीर्षक कविता है ‘‘लहू से लिखे वे 11 पन्ने’’। यह कविता हृदय, मन और विचारों को आलोड़ित कर देने में सक्षम है। इस लम्बी कविता में कवि ने ‘‘प्रपंच के पंन्नों पर पाखंड गान’’ लिखने वालों को एक बार फिर ललकारा है। कवि की हर ललकार तर्क सहित है। हर तर्क में उदाहरण निहित है। ग्यारह पन्नों के विवरण देते हुए लिखी गई इस कविता का आरम्भ हुआ है 1857 के ‘‘कुचा चालान’’ से। फिर नाना साहब का संघर्ष, नील की खेती का शोषणअध्याय, कूका सिखों का बलिदान, अंग्रेजों द्वारा आदिवासियों का अमानवीय दमन, चौरीचौरा कांड, आजाद हिंद फ़ौज़ के युद्धबंदियों की हत्या, नेवी विद्रोह के बाद किया गया कत्लेआम का स्मरण कराया है। प्रस्तुत है बानगी स्वरूप कविता का एक छोटा-सा अंश-‘‘हमें स्वतंत्रता मिली अहिंसा से/रक्त विहीन आंदोलन से?/क्रान्ति का ज्वालामुखी/तब ही फट सकता है/जब उसमें लहू का लावा उबल रहा हो।/सैकड़ों जलियांवाला बागों में/हमारे करोड़ों देशवासियों का/गर्म रक्त बहा है, उनके प्राण चढ़े हैं।’’ 

‘‘राज़, जो दफ़न हो जाएंगे’’, इस कविता में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवन और मृत्यु के रहस्य को कवि ने केन्द्र में रखा है। ‘‘चंद्रशेखर आज़ाद की मां’’, ‘‘तोपें और जौहर’’ और ‘‘क्रांतिकारी पुत्र का पत्र पिता के नाम’’ ऐसी हृदयस्पर्शी कविताएं हैं जो बलिदान की गहनता और पवित्रता से परिचित कराती हैं। पंकज सिंह ने क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर के संदर्भ में कविता लिखते हुए कविता के पूर्वकथन में लिखा है-‘‘महान क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर शरीर से जीतने बलिष्ठ थे, उनका आत्मबल उतना ही दृढ़ था। उन्होंने अपने पिताजी को पत्र लिख कर विवाह न करने और क्रान्ति की राह पर जाने की अनुमति मांगी पिता और पुत्र के ये पत्र भारतीय संस्कारों की महानता को दर्शाते हैं।’’ ‘‘क्रांतिकारी पुत्र का पत्र पिता के नाम’’ कविता में शब्दों का चयन और भावनाओं का संस्कार भावविह्वल कर देने वाला एवं प्रशंसनीय है-
हे तात् आपके चरणों में 
सादर वंदन मैं करता हूँ, 
बनी रहे आशीष आपकी 
मैं यही निवेदन करता हूँ।
कुछ तो है शब्दों की मर्यादा 
कुछ मेरे अंतस के भाव गहन, 
पर समझ सकेंगे सहज मुझे 
हूँ रक्त आपका मैं पावन।

‘‘मां’’ कविता में कवि ने मां के बिछोह तथा वर्तमान परिवेश में मां के प्रति संतानों का उपेक्षापूर्ण व्यवहार शब्दों में पिरोया है। कवि ने लिखा है-‘‘पढ़ लेता था खत तेरे मां,/ बिन खोले ही।/ अब क्यूँ करता हूं इंतजार,/तेरे चेहरे की झुर्रियां कुछ बोलेंगी।/कुछ बोल न दें, /यही सोच कर सहमा जाता हूं। /अपने हृदय के कलुष में /अकुलाता हूँ।/था कच्चा आंगन कच्ची दीवारें, /पर तेरे आंचल की छत थी। /अब अपने घर में ज्यादा लगता है /मां की खातिर एक कोना भी।’’

भावनाओं के विविध रंग इस संग्रह की कविताओं में हैं। गौरवपूर्ण अतीत है तो मुसीबतों से जूझता संकटग्रस्त वर्तमान का चित्रण भी है। जैसे एक कविता है-‘‘जिंदगी लड़ती है’’। यह कविता सिद्ध करती है कि दायित्वबोध, देशप्रेम, गौरवशाली कथाओं के साथ ही वर्तमान जीवन की दारिद्र्य पूर्ण स्थितियां भी कवि कर्नल पंकज सिंह के संज्ञान में हैं। वे यह भली-भांति जानते हैं कि एक आम नागरिक के लिए जीवन भी एक संग्राम है और इस संग्राम में डटे रहना उसका प्रारब्ध है। इस कविता की दृश्यात्मकता को इन कुछ पंक्तियों में अनुभव किया जा सकता है, जो सत्य की कठोरता से गुज़र कर मुखर हुई हैं-
जिंदगी लड़ती है। 
पड़ी अस्पताल में खटिया पर, 
हुई रक्त से गीली तकिया पर, 
रिसते हुए सिलेंडर से, 
हठ सासों का करती है.... 
जिंदगी लड़ती है...

कर्नल पंकज सिंह की कविताओं के मुख्य दो स्वर हैं - पहला राष्ट्रीय गौरव तथा दूसरा सत्यनिष्ठा पूर्ण यथार्थ का आग्रह। भाषा का ओज, कविताओं में समाज और राष्ट्र के लिए आह्वान, विचारों का विस्तार इस संग्रह की कविताओं की अनन्यतम विशेषताएं हैं। उनकी राष्ट्रीयता सर्वकालिक एवं सर्वव्यापी है। वे राष्ट्रीयता के अपने विचार को किसी परिधि में नहीं बांधना चाहते हैं। उनकी कविता में भावनाओं की गूँज और अनुगूँज दोनों मौज़ूद हैं। सबसे बड़ी बात कि कवि पंकज सिंह राष्ट्रीय गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प हैं। इस संग्रह की कविताओं में राष्ट्र के अतीत और वर्तमान का समुचित एवं सटीक आकलन है जो पाठकों को पसंद आएगा।  
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#पुस्तकसमीक्षा  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण  #DrMissSharadSingh

Tuesday, September 3, 2024

पुस्तक समीक्षा | युवा दृष्टि से जीवन का अन्वेषण करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 03.09.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई युवा कवि पवन रजक के काव्य संग्रह "मैं कौन हूं" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
युवा दृष्टि से जीवन का अन्वेषण करती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - मैं कौन हूं?
कवि    - पवन रजक
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, बहादुरपुर, साउथ ईस्ट दिल्ली - 110044
मूल्य    - 150/-  
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पवन रजक काव्य जगत के लिए निःसंदेह एक नया नाम हैं, किन्तु वे नेपथ्य में रह कर एक लम्बे समय से काव्य सृजन कर रहे हैं। यह लम्बा समय बहुत दीर्घ भी नहीं है क्योंकि 05 अक्टूबर 1995 को ग्राम नरयावली में जन्मे पवन रजक अभी बहुत कम आयु के हैं जबकि उनकी कविताओं से उनकी आयु का अनुमान लगाना कठिन है। ‘‘कौन हूं मैं’’ इनका प्रथम काव्य संग्रह है जिसे मैं पवन रजक के काव्यात्मक उद्घोष का मंगलाचरण कहूंगी। इस प्रथम काव्य संग्रह की भूमिका लिखने का फोन पर आग्रह किया। मेरी स्वीकृति मिलने पर उन्होंने मुझे पांडुलिपि उपलब्ध करा दी। मेरी भेंट पवन से नहीं हुई थी। मैंने उनकी कविताएं पढ़ी और कविताओं में निहित गंभीर चिंतन ने मुझे प्रभावित किया। कई महीनों बाद जब उनका संग्रह प्रकाशित हो कर आया और उन्होंने मुझे भेंट किया तब संग्रह में दिए गए पवन के परिचय से मुझे उनकी वास्तविक आयु का पता चला। मैं यह सोच कर चकित रह गई कि ग्रामीण परिवेश में रह कर शिक्षा प्राप्त करने वाले एक युवक का जीवन के प्रति कितना गहरा दृष्टिकोण है।  

पवन रजक ने अपने इस प्रथम काव्य संग्रह में अपनी अतुकांत कविताओं को रखा है। जब पवन की कविताओं को मैंने पढ़ना आरम्भ किया तो मुझे लगा कि इस युवा कवि में अपार संभावनाएं हैं क्योंकि एक कवि के लिए जो सबसे पहला आवश्यक तत्व होता है संवदेनाओ का कोमल किन्तु दृढ़ उद्घोष, वह मुझे इस संग्रह की कविताओं में गुंजित होता सुनाई पड़ा। वस्तुतः कविता मन और आत्मिकता के मेल से उत्पन्न होती है। इसीलिए काव्यशास्त्रों में कवित्व को आत्मा की अनुभूति कहा गया है। जब कोई बात हमारे मन को स्पर्श करती है, हमें आंदोलित एवं आलोड़ित करती है, हमें विचार करने को विवश करती है और हम अपनी भावनाओं के आधार पर उसका आकलन करते हैं, तब जो अभिव्यक्ति बनती है, वही कविता होती है। पवन रजक एक युवा कवि हैं इसलिए उनकी कविताओं में संवेदना की सीमा अनंत है। उनकी जिज्ञासाएं अनंत हैं। सबसे पहले तो गोया वे स्वयं के बारे में जानने को उत्सुक हैं -‘‘कौन हूं मैं?’’ यह एक ऐसा यक्षप्रश्न है जिसका उत्तर मनुष्य के रूप में मनुष्य के लिए पाना कठिन है किन्तु यदि वह दार्शनिक भाव से विचार करे तो इसका उत्तर उसे ‘‘भगवद्गीता’’ के अध्याय (2/12) में मिल जाएगा, जहां श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि -
न त्वेवाहं जातुश्चं न त्वं नेमे जनाधिप।
न चैव न मृष्यामः प्राप्य द्वैतः परम्।।
- अर्थात् कभी ऐसा समय नहीं था जब मैं मौजूद नहीं था, न ही तुम, और न ही ये सभी, न ही भविष्य में हम में से कोई भी संघर्ष नहीं करेगा। सबसे सटीक उत्तर यही है कि मनुष्य भी एक प्रकृति है अथवा प्रकृति का अभिन्न तत्व है। इसीलिए वह पृथ्वी पर सदा उपस्थित है। और जब प्रकृति का होना ही पृथ्वी का होना है तो मनुष्य को स्वयं को प्रकृति के रूप में पहचान कर पृथ्वी की रक्षा करनी चाहिए। यह विस्तृत संदर्भ पवन रजक की उस एक कविता के परिप्रेक्ष्य में है जिसका शीर्षक है ‘‘मैं प्रकृति हूं’’। वे लिखते हैं- 
मैं प्रकृति हूं
मुझसे ही सब उपजे जग में
नील गगन और सुंदर वन
चांद-सितारे, फूल और कलियां
करती हूं सबकुछ अर्पण
मुझको रोज पूजने वाले
हर मानव की मैं संस्कृति हूं 
मैं प्रकृति हूं।

कविता के इस आरंभिक अंश में ही कवि ने मानो अपने प्रश्न ‘‘कौन हूं मैं’’ का उत्तर पा लिया है। फिर भी जीवन की जटिलताएं बार-बार उलझाती हैं। जीवन आसान नहीं है। जटिल परिस्थितियां  अनेक उत्तरों को भी अनुत्तरित कर देती हैं। अपने दुख, पराए दुख, दुख के कारण और दुख के प्रकार ये सभी आंदोलित करते हैं और इस प्रश्न को बार-बार उछालते हैं कि ‘‘कोई जीत कर क्या जीता और कोई हार कर क्या हारा?’’ ठीक यही प्रश्न मौजूद है पवन की कविता में। कवि ने अतीत के उदाहरणों को सामने रख कर वर्तमान को टटोलने का प्रयास किया है और प्रश्न किया है-
किसी ने जीता महाभारत का रण 
कई कईयो बार दिल्ली जीतें, 
हर युग में द्वंद हुए जिनमें 
कई कईयों के जीवन बीते। 
अर्जुन स्वयंवर मे द्रोपदी जीता 
सिकंदर ने जीत लिया भूगोल सारा, 
पर कोई जीत के क्या जीता 
और कोई हार कर क्या हारा।    

कवि पवन ने सामाजिक जीवन के यथार्थ को भी अपनी कविताओं में बड़ी मार्मिकता से पिरोया है। समाज में स्त्रियों की दशा लगभग सदा उपेक्षापूर्ण रही है। फिर भी स्त्रियां अपनी कोमल भावनाओं में जीती हुई डटी रहती हैं। वे हार नहीं मानती हैं। ‘‘फुआ’’ को ले कर लिखी गई उनकी कविता परिवार के उस रिश्ते की विडंबनाओं का आकलन करती है जिसकी ओर प्रायः किसी का ध्यान ही नहीं जाता है। फुआआंे को ले कर लिखी गई इस में बड़ी ही खूबसूरती से जिंदगी के बारीक से बारीक अनुभवों को शब्दों में पिरोया गया है। फुआ भी एक स्त्री होती है जो समाज की अन्य स्त्रियों से अलग नहीं है, उसे भी विसंगतियां झेलनी पड़ती हैं, फिर भी वह अपने कतर््व्यों से विमुख नहीं होती है। कविता का एक अंश देखिए-
भोर हुई ही थी आई खबर 
कि एक और फुआ शांत हुई, 
सालों तक तो आती रही 
पर सालों पहले एकांत हुई।
वह फुआ मुझे सैनिक लगी
जिसने जीवन का मान किया है, 
दो कुलों के मान के खातिर 
प्राणों का बलिदान किया।

अपनी अभिव्यक्ति के दायरे में जीवन की सहज अनुभूतियों और संवेदनाओं को प्रकट करती पवन रजक की कविताएं बहुत-सा अनकहा कह जाती हैं जिसके कारण संग्रह की कविताओं में एकरसता नहीं, वरन विविध रंग समाए हुए हैं। ये सभी जीवट रचनाएं हैं जो जीवन के अनुभवों से गुज़र कर शब्दों तक आई हैं। इन कविताओं में रचनाकार के सरोकारों का दायरा विस्तृत है और वैयक्तिक भावों के अतिरिक्त कवि नेे सामाजिक सरोकार पर बेहद पैनी और सधी हुई पंक्तियां कही हैं। ‘‘गांव की पंगत’’ सामाजिक सरोकारों पर एक सटीक कविता है। कवि पवन की यह विशेषता है कि वे समाज से ही नए बिम्ब चुनते हैं जिससे उनकी कविताएं और अधिक यथार्थवादी बन कर उभरती हैं। जैसे ‘‘गांव की पंगत’’ कविता में उन्होंने ‘‘पंगत’’ अर्थात् सामूहिक-भोज को जीवनधारा में सामाजिक लोकाचार के महत्व को बड़ी बारीकी से रेखांकित किया है। यूं तो संग्रह में कई कविताएं हैं जिन पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है किन्तु बिना किसी चर्चा-परिचर्चा के भी उन्हें पढ़ा जा सकता है। फिर भी संग्रह की एक और कविता है जिसकी चर्चा मैं यहां करना चाहती हूं -‘‘ऐसा क्यों है’’। इस कविता में कवि ने उन परिस्थियों की ओर लक्ष्य किया है जिनके कारण समाज में विसंगतियां उत्पन्न होती हैं। जिनके कारण मनुष्य मनुष्य के बीच भेद-भाव बढ़ता है और जो जीवन में अशांति फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराई जा सकती हैं -‘‘ये भय/ ये झिझक/और ये/डर क्यों है,/वक्त के कोहरे से ढका/गुमनाम सा मेरा घर क्यों हैं।/आंधियों से जूझता दिन का हर/पहर क्यों है,/तूफान टकराकर हवेली से/मेरे झोपड़ पर ढाता कहर क्यों है।’’

कवि पवन अपनी कविताओं में बड़ी सादगी से कटाक्ष करते हैं। उनकी कविताओं की छोटी-छोटी पंक्तियां भी बड़े-बड़े भाव समेटे रहती हैं। कवि के शब्द-विन्यास में सटीकता है। वे अपनी बात पूरे विश्वास के साथ कहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि युवा कवि पवन रजक के पास एक गहरी काव्य दृष्टि है। उनमें अभिव्यक्ति की उत्कट आकांक्षा है। वे समाज से ही नहीं वरन समय से भी संवाद करना चाहते हैं और इसीलिए वे अतीत के पन्ने पलट कर ‘‘रामायण’’, ‘‘महाभारत’’ तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के उद्धरण सामने रखते हैं ताकि उनसे सीख ले कर समाज अपना वर्तमान सुधार सके, संवार सके। यही वे विशेषताएं हैं जो पवन रजक को एक संभावनाशील कवि बनाती हैं। बेशक़ अभी उन्हें अभी स्वयं को विचारों और शिल्प के स्तर पर तराशना है क्योंकि निरंतर तराशे जाने पर ही एक श्रेष्ठतमकला स्थापना पाती है। निरंतरता ही शाश्वत प्रक्रिया है जो एक कवि को भी परिपक्वता की ओर ले जाती है। इस प्रथम संग्रह की कविताओं को पढ़ कर मुझे पूरा विश्वास है कि यदि इसी प्रकार सतत सृजन करते रहें तो पवन रजक काव्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाएंगे। यह भी विश्वास है कि इस संग्रह की कविताएं पाठकों को भी पसंद आएंगी तथा आत्मीय लगेंगी।
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#पुस्तकसमीक्षा  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण  #DrMissSharadSingh 

Tuesday, March 19, 2024

पुस्तक समीक्षा | भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 19.03.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ के काव्य संग्रह "सब तेरे सत्कर्मी फल हैं" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा       
भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण करती कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - सब तेरे सत्कर्मी फल हैं
कवि       - संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’
प्रकाशक    - एन.डी. पब्लिकेशन, नई दिल्ली-3
मूल्य       - 150/-
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हमारी भारतीय संस्कृति में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति उसी तरह विकसित होता है जैसे उसे संस्कार मिलते हैं। यह संस्कार देने का दायित्व माता-पिता और गुरुजन का होता है। चूंकि अब गुरुकुल पद्धति नहीं है अतः संतान की बाल्यावस्था सबसे अधिक अपने माता-पिता के साथ व्यतीत होती है। इसीलिए वे ही प्रथमतः निर्णायक होते हैं अपनी संतान के भविष्य निर्माण के। इसीलिए माता-पिता स्तुत्य होते हैं। इस बात को पौराणिक ग्रंथों, उपनिषदों आदि में पद्यात्मक रूप में कहा गया है। यूं भी साहित्य में हर कथन अधिक प्रभावकारी होता है। ‘‘पद्मपुराण’’ के सृष्टिखंड (47/11) में कहा गया है-
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयरू पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत।।
- अर्थात माता सर्वतीर्थ हैं और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप हैं इसलिए सभी प्रकार से यत्नपूर्वक माता-पिता का पूजन करना चाहिए।
विगत कुछ दशकों से यथार्थ के कठोर परिदृश्य को कविता में उतारने के प्रयास ने भावनात्मक संबंधों पर लेखनी को हाशिए में कर दिया है। माता-पिता पर काव्य सृजन करना गोया पिछड़ी हुई बात हो। किन्तु कुछ कवि हैं जो ऐसे भ्रम को तोड़ कर भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण कर रहे हैं। ऐसे कवि अपने माता-पिता के प्रति समर्पित कविताएं लिख रहे हैं। संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ भी ऐसे ही एक कवि हैं जिन्होंने अपने प्रथम काव्य संग्रह को पूरी तरह अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए तथा अपने दिवंगत पिता के प्रति संबोधित होते हुए संग्रह का नाम दिया है- ‘‘सब तेरे सत्कर्मी फल हैं’’।
आज के दौर में जब बच्चे माता-पिता तथा परिवार की वरिष्ठजन से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में कवि विद्यार्थी  की कविताओं का बहुत अधिक महत्व है यह कविताएं बड़ों के प्रति रागात्मक व्यवहार का अनुमोदन करती हैं। यह जननी तथा जनक के महत्व को स्थापित करती हैं। ये कविताएं बड़ी सामयिक हैं क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति में वानप्रस्थ आश्रम की संकल्पना है किन्तु वृद्धाश्रम की नहीं। वानप्रस्थ आश्रम वह होता था जिसमें व्यक्ति अपने समस्त पारिवारिक दायित्वों को पूर्ण कर के प्रकृति के निकट रहने के लिए वन में प्रस्थान कर जाता था। किन्तु उसके जीवनयापन की सम्पूर्ण व्यवस्था उसके परिजन करते थे तथा उससे सदा भेंट कर करते रहते थे। किन्तु वृद्धाश्रम व्यवस्था में उपेक्षापूर्ण ढंग से अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम के हवाले कर के, चंद रुपयों का सहयोग कर के इतिश्री मान लिया जाता है। इसमें माता-पिता के सुख की भावना नहीं वरन् उनसे छुटकारे की भावना प्रबल रहती है। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लगभग पिछली एक पीढ़ी से माता-पिता धन कमाने के चक्कर में बच्चों के उचित लालन-पालन से विरत होते चले गए हैं। यह रवैया और अधिक बढ़ता जा रहा है।
संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ ने बढ़ते जा रहे इस सामाजिक दोष को दूर करने की दिशा में माता-पिता एवं वरिष्ठजन पर कविताएं लिख कर उत्तम कार्य किया है। माता-पिता पर केंद्रित उनकी कविताएं जहां संवेदनशील और भावपूर्ण है वही उनकी सामाजिक अर्थवत्ता बहुत अधिक है। अपने जन्मदाता एवं जन्मदात्री को समर्पित करते हुए वे लिखते हैं - ‘‘सब तेरे सत्कर्मी फल हैं’’। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
मेरे हृदय पटल तुम शाश्वत, मेरे नयन सुमिरनी जल है।
इसमें मेरी कौन बड़ाई, सब तेरे सत्कर्मी फल है।।
सत्कर्मों के बीज परिष्कृत, जो धरती उर्वरा न पाई।
बोलो बीज करे क्या प्रियवर, या ऊसर है या निर्जल है।।
तुमनें ही तो मन-मस्तिष्की, मेरे फसल-क्षेत्र को साधा।
खून-पसीने का जल सींचा, मेरी चिंता, रहे विकल हैं।।
मेरे जनक, परम प्रिय जननी, मेरे आत्मरथी सुख करनी।
तेरे पुण्य, हस्त-पग मेरे, मेरी तरनी है, भुजबल हैं।।

माता-पिता के संस्कार ही संतान को अच्छा या बुरा बनाते हैं मुझे एक कहानी याद आती है जो मुख्य रूप से भीली लोक कथा है। एक गांव में एक युवक था जिसे चोरी करने की आदत थी। वह इतनी कुशलता से चोरी करता कि कभी पकड़ा नहीं जाता और जब भी वह चोरी का सामान लेकर घर पहुंचता तो उसकी मां उससे बहुत शाबाशी देती। वह बेटे की पीठ ठोंक कर कहती कि ‘‘वाह बेटा, तूने बहुत बढ़िया काम किया है।’’ अपनी मां से शाबाशी पा कर उस चोर का साहस बढ़ता गया। एक समय ऐसा आया कि वह राजमहल में चोरी करने घुस गया। उसे लगा कि यदि मैं कोई राजसी सामान चुरा कर ले जाऊंगा तो मेरी मां गर्व से भर उठेगी। दुर्भाग्यवश वह राजमहल में घुसते ही पकड़ा गया। राजा ने उसे सरेआम हजार कोड़े लगाए जाने की सजा सुनाई। जब मां को पता चला तो वह रोती हुई कोड़े मारने वाले के पास पहुंची और पुत्र को छोड़ देने का अनुरोध करने लगी। वह कोड़े मारने वाले से रो-रो कर कहने लगी कि ‘‘मैं अपन पुत्र को दण्डित होते नहीं देख सकूंगी।’’ तब पुत्र ने मां से कहा कि ‘‘मंा यह तो तुम्हें उस समय सोचना था जब मैंने पहली बार चोरी की थी और तुमने मेरी पीठ थपथपा कर मुझे शाबाशी दी थी। यदि तुमने उसी दिन एक थप्पड़ मेरे गाल पर मारा होता तो आज मुझे हजार कोड़े खाने की सज़ा न मिलती। तुम मेरी मां हो लेकिन मुझे दुख है कि तुमने मां का सही दायित्व नहीं निभाया।’’ यह सुन कर मां अपना-सा मुंह ले कर रह गई। उसका बेटा जो कह रहा था, सच कह रहा था। संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ ने अपने पिता और माता दोनों को समान रूप से स्मरण करते हुए कविताएं लिखी हैं। पिता पर लिखी उनकी कविता ‘‘ऐ मेरे जन्मदाता’’ की पंक्तियां देखिए-
ऐ मेरे जन्मदाता, मैं हूँ तेरी निशानी।
कुछ भी नहीं है मेरा, सब तेरी मेहरबानी ।।
जिस दिन मैं बीज बनकर, माँ के गरभ में आया,
उस दिन से ही तुम्हारे मश्तिष्क में समाया।
उस दिन से शुरू कर दी, गढ़ना मेरी कहानी,
कुछ भी नहीं है मेरा, सब तेरी मेहरबानी ।।
 फिर माता के प्रति उन्होंने अपना समर्पण भरा अनुराग एवं श्रद्धा व्यक्त की है। ‘‘पुण्य तेरा हम सबके माथे सूर्य किरण जैसा चमके’’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-
प्रसव वेदना में जिसके, दिखता क्रंदन,
हृदयांचल में सदा, मधुर मुस्कान लिया।
धरा पदार्पण में तेरे, जिस देवी ने,
कर विस्मृत पीड़ा, चुंबन प्रतिदान दिया।।
मेरे जीवन का आधार, चुंबन तेरा,
मेरे चेहरे के आकाश दामिनी दमके।
पुण्य तेरा हम सबके माथे,
सूर्य किरण जैसा चमके ।।
ऐसा नहीं है कि कवि ‘‘विद्यार्थी’’ ने मात्र अपने माता-पिता का स्मरण किया हो, उन्होंने देश के ‘‘बापू’’ महात्मा गंाधी पर भी कविता बापू के ‘‘मधुरिम सपनों का, फैला भारतवर्ष वहां’’ लिखी है-
छोड़ छाड़ वैभव बापू ने, जिस कल का बलिदान किया।
आज वही कल हम जीते हैं, हमको जीवन दान दिया।।
इस कल को गढ़ना अरु बढ़ना, आज हमारा सपना है।
जो देखा बापू ने सपना, स्वर्णिम सपना अपना है।।

लगभग 25 पृष्ठ तक ईश्वर की आराधना, माता-पिता की स्तुति, राष्ट्र शहर तथा विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ हरि सिंह गौर की वंदना की गई है। तदोपरांत निर्वाचन लोकतंत्र का पर्व, दान नहीं मतदान, जैसी कविताओं के द्वारा जन जागरूकता के विषयों को रखा गया है। कवि विद्यार्थी ने हिंदी और बुंदेली पर भी कविताएं लिखी हैं। कवि विद्यार्थी  की कविताओं की विशेषता यह है कि वे विभिन्न छंदों में निबद्ध हैं जिससे उनके छांदासिक ज्ञान का पता चलता है और इससे उनकी रचनाओं की मधुरता भी बढ़ गई है। जब भाव और शिल्प समान रूप से अभिव्यक्ति पाते हैं तो रचना और अधिक लुभावनी हो जाती है तथा स्मृति में देर तक बनी रहती है।
डॉ सुरेश आचार्य जी ने पुस्तक की भूमिका में उचित लिखा है कि ‘‘कवि विद्यार्थी  नाम से भले विद्यार्थी हैं किंतु काम से शिक्षक हैं।’’ इसी तरह गीतऋषि डॉ. श्याममनोहर सीरोठिया ने भूमिका में लिखा है- ‘‘कवि ‘‘विद्यार्थी’’ जी ने लोक जीवन के अनेक आदर्श-पात्रों को अपने काव्य में उतारा है, जिनमें महर्षि बाल्मिकी, संत शिरोमणि तुलसीदास, राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर जी की सृजनशीलता के संस्कारों को काव्य में आत्मसात करने का बड़ा कार्य किया है। इसी क्रम में युग-संत स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, डॉ. हरिसिंह गौर जैसे महापुरूषों के उदात्त चरित्रों को अपनी रचनाओं में सम्मानजनक स्थान दिया है। ये रचनाऐं शुचिता की ऐसी त्रिवेणी हैं जिनमें अवगाहन कर पाठक अपने आपको परिष्कृत करने का अवसर भी पाता है।’’
आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी ने कवि के कला पक्ष को रेखांकित करते हुए लिखा है कि- ‘‘विद्यार्थी जी की रचनाएँ छंदबद्ध हैं जिनमें मनहरण घनाक्षरी, लावनी, दोहे, चैपाई, मत्तगयंद सवैया, ताटंक जैसे छन्द पठनीय होने के साथ गेय हैं। अपने माता-पिता का पुण्य-स्मरण, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, सागर सपूत डॉ. हरिसिंह गौर को समर्पित रचनाएँ मनमोहक हैं, साथ ही राष्ट्र के अमर वीरों का पुण्य-स्मरण भी पाठकों को मातृभूमि के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। ‘‘विद्यार्थी जी’’ का यह काव्य-संग्रह सृजन का सुकृत प्रयास सराहनीय एवं स्तुत्य है।’’
संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ की कविताएं आस्थावान पारंपरिक मूल्यों एवं पारिवारिक संबंधों की उष्मा से परिपूर्ण  हैं। परिवार के प्रति पिता के दायित्वों एवं कर्तव्यों पर लिखी कविताओं के माध्यम से कवि ने सम्पूर्ण पिताओं के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है। भारतीय संस्कृति की परम्पराओं के पोषण की दिशा में संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ का यह प्रथम काव्य संग्रह महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
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#पुस्तकसमीक्षा  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण  #DrMissSharadSingh

Tuesday, September 26, 2023

पुस्तक समीक्षा | कविताएं जिनमें भावनाओं का नादस्वर है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 26.09.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई श्री सिद्धार्थ बाजपेयी के काव्य संग्रह "आसान सी बातें" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
कविताएं जिनमें भावनाओं का नादस्वर है
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - आसान सी बातें
कवि        - सिद्धार्थ बाजपेयी
प्रकाशक    - डब्ल्यू डब्ल्यू नोशन प्रेस डाॅट काम
मूल्य       - 180/-
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महाकवि निराला ने एक बार कहा था कि ‘‘कविता नितान्त निजी भावनाएं होते हुए भी सार्वभौमिक होती हैं। उनमें चाहे तो ब्रह्माण्ड समा सकता है।’’ बात एकदम सही है। कविता चाहे पीड़ा से उपजे या प्रेम से, रणभूमि के तुमुल कोलाहल से उपजे अथवा चिड़ियों के कलरव से, कवि की भावना में सम्पूर्ण जगत की भावना समाई रहती है। भले ही कवि कहे कि ‘‘मैं कवि नहीं हूं’’, किन्तु उसकी कविताओं में यदि काव्यात्मक भावनाओं का नादस्वर है तो उसे निर्विवाद रूप से कवि कहा जा सकता है। सिद्धार्थ बाजपेयी एक ऐसे ही कवि हैं जो स्वयं को कवि कहने से हिचकते हैं किन्तु उनकी कविताएं उनके कवित्व को पूरी तरह मुखर करती हैं।
‘‘आसान सी बातें’’ सिद्धार्थ बाजपेयी का प्रथम काव्य संग्रह है जिसमें उनकी कुल 59 कविताएं संग्रहीत हैं। 1957 में जन्में, भौतिक शास्त्र में स्नात्कोत्तर, भारतीय स्टेट बैंक से उप महाप्रबंधक के पद से सेवा निवृत। अंग्रेजी में भी उनकी एक पुस्तक प्रकाशित है ‘‘पेपर बोट राईड’’। हिन्दी में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। अब हिन्दी में उनका यह प्रथम काव्य संग्रह है। वस्तुतः प्रथम काव्य संग्रह का अर्थ हमेशा यह नहीं होता है कि उसमें आरंभिक अथवा कुछ-कुछ कच्ची कविताएं होंगी। कई बार प्रथम काव्य संग्रह में वे कविताएं होती हैं जिन्होंने अनुभव, आकलन एवं चिंतन-मनन का एक लंबा सफर तय किया हुआ होता है। सिद्धार्थ बाजपेयी के इस प्रथम संग्रह की कविताएं भी इसी श्रेणी की कविताएं हैं। इनमें प्रकृति को आधार बना कर संवेदना के व्यापक संसार की यात्रा की गई है। संग्रह की पहली कविता की पंक्तियां देखिए जिसका शीर्षक है ‘‘बरगद देखता है’’-
बरगद देखता है एकटक
बादलों को
झूलती जटाएं हटाकर
पत्तों की हजार हजार आँखों से
पूरा आकाश देखता है
अपलक अहर्निश
पूरी पूरी पृथ्वी को
अकुला कर/अपने प्राणों में
चिड़या देखती है
घोंसले में चीखती भूख को
घास का हरा तिनका/यकायक
सुधबुध खो देखता है
पूरी देह से/हवा को
मैंने तुमको देखा/ऐसे देखा,/ऐसे देखा।

बरगद की जटाएं चेहरे पर लटकती लटों की कल्पना के साथ पत्तों को बरगद की आंखें मान कर कवि ने भावनाओं का जो ताना-बाना बुना है, वह सहसा आकर्षित करता है तथा एक दृश्य रच देता है पढ़ने वाले की आंखों के सामने। इसी तरह एक कविता है ‘‘शब्दार्थ’’। यह कविता प्रेम का सात्विक एवं आत्मिक स्वरूप प्रस्तृत करती है। इसमें भी आधार है प्रकृति जिसके द्वारा कवि ने प्रेम के स्वरूप को व्याख्यायित किया है।-
प्रेम साफ पानी का झरना है
हरे जंगल की ऊँची एकांत पहाड़ी पर
गिरता हुआ/पत्थरों पर बह कर
बदलता हुआ नए पत्तों और सफेद फूलों में
प्रेम एक उदास रेल लाइन है
जो गुजरती है दूर तक
दोपहर की सांय सांय में
सुरंगों और जंगलों को पार कर/देर रात
नालों और पुलों पर चलती है
प्रेम तेज बारिश से धुंधली हुई शाम में
आल्हा का बिखरता आलाप है
जो कोष्टापारा के थके जुलाहे के
गले से निकल कर /तिर जाता है हवा में
सुनसान आकाश की चांदनी में
झुन्ड से बिछुडे
अकेले पाखी की निशब्द यात्रा,
दिसंबर की सर्द रात खाली से बस स्टैंड पर
ठिठुरते यात्री की हठी प्रतीक्षा,
और बार बार दिखना बंद आँखों को भी
एक खिला खिला अमलतास
अरे, वह भी प्रेम है!

सिद्धार्थ बाजपेयी स्वयं को कवि बनने की दौड़ में नहीं पाते हैं, यही कारण है कि उनकी कविताएं हड़बड़ी में नहीं वरन, तसल्ली से लिखी गई कविताएं हैं जिनमें उनका कहन पूरी तरह स्पष्ट है। सिद्धार्थ बाजपेयी की कविताओं में कथ्य की विविधता है। वे निज के साथ सर्व की बात कहते हैं। वे सांसारिकता के साथ अलौकिक ईश्वरीय बात करते हैं जिससे उनका ‘ईश्वर’ प्रकृति के कण-कण में रूपायित दिखाई देता है। कविता देखिए ‘‘ईश्वर की हंसी’’, कुछ पंक्तियां-
एक छोटी हरी पत्ती में
छुपा होता है आदिम जंगल का अट्टहास
नदी की बूंदों में चमकता है
हिमालय से बहते
पुराने ग्लेशियर का बर्फीला स्पर्श
सड़क पर पड़े पत्थरों में कैद है
पिघलती विशाल चट्टानों का
सदियों पुराना ताप
अनंत आकाश हिलोरें लेता है
तुम्हारी आँख की पुतली में
घास के फूलों में झलक आती है
यकायक ईश्वर की हंसी!

‘‘आसान सी बात’’ कविता संग्रह की कविताओं में एक ऐसा ताज़ापन है जो मन को शीतलता प्रदान करता है। संग्रह में प्रकृति और नैसर्गिक वातावरण को साधारण से शब्दों के माध्यम से संप्रेषित करते हुए भी ऐंद्रजालिक अहसास पिरो दिए गए हैं। साथ ही, रिश्तों के महत्व को दर्शाती हुई कई कविताएं हैं, जो चेतना को आंदोलित करती हैं। फिर भी इन कविताओं में कोई नारेबाजी नहीं, वरन विनम्र आग्रह है अपनी भावनाओं एवं संवेदनाओं को टटोलने का। उदाहरण के लिए ‘‘मेरे देखने से’’ शीर्षक कविता देखिए-
मैंने देखा
तो नीला हो गया आकाश,
झूमने लगे पीपल के चमकते हरे पत्ते
मैंने देखा
तो सफेद बर्फ से ढंका भव्य पहाड़
एकदम से उग आया/क्षितिज पर
मैंने देखा/तो चमकने लगी/तुम्हारी हंसी
मैंने देखा/तो उसी क्षण
दुनिया सुंदर हुई
मैंने देखा/तो उसी क्षण
मैं सुंदर हुआ !
दूसरे को देख कर स्वयं के सुन्दर हो जाने का अहसास कवि ने जिस सुन्दरता से रचा है वह कवि की काव्य-चेतना के प्रति आश्वस्त करता है। किन्तु जैसाकि मैंने पहले ही लिखा है कि सिद्धार्थ बाजपेयी की कविताओं में कहन की विविधता है। वे वर्तमान सांसारिक स्थितियों से भलीभांति परिचित हैं और इसीलिए उस पिता की चिन्ता को रेखांकित करते हैं जिसका बेटा अभी अबोध है, नन्हा है तथा मात्र रोना और हंसना जानता है। ऐसा अबोधपुत्र क्या इस निष्ठुर, छल-कपट से भरे संसार में सुरक्षित रह सकेगा? एक पिता की चिन्ता है कविता ‘‘बेटे के लिए’’ में। एक अंश देखिए -
बहुत डर लगता है मुझे बेटे के लिए
छोटा है/अभी देख नहीं पाता दुनिया
बावजूद खुली आँखों के।
समझता नहीं है फर्क
आग और पानी में
दोस्त और दुश्मन में
सुन कर भी नहीं जान पाता
मीठे शब्दों का जहर।
सिद्धार्थ बाजपेयी ने अपनी कविताओं को सरल, सहज शब्दों में बांधा है। कविता संग्रह ‘‘आसान सी बातें’’ में शाब्दिक सुगमता भले ही हो किन्तु भावार्थ गहन गूढ़ अर्थ समाए हुए है। इस प्रथम संग्रह की कविताओं की परिपक्वता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कवि को अपना सृजन सतत जारी रखना चाहिए।  
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Tuesday, August 8, 2023

पुस्तक समीक्षा | मौलिक स्वच्छंदता के साथ गहन भावबोध की कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 08.08.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि मुकेश तिवारी के काव्य संग्रह "पानी रे पानी" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा       
मौलिक स्वच्छंदता के साथ गहन भावबोध की कविताएं
 - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - पानी रे पानी
कवि       - मुकेश तिवारी
प्रकाशक    - निमिष आर्ट्स एंड पब्लिकेशन, सागर, मोबाईल-165812610
मूल्य       - 185/-
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कवि रहीम ने बहुत गहरी बात कही है अपने इस दोहे में-
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी  गए  न ऊबरे, मोती  मानुष  चून।।

यह दोहा सहसा स्मरण हो आया कवि मुकेश तिवारी जी के संग्रह का नाम पढ़ कर -‘‘पानी रे पानी’’। जीवन के लिए पानी की महत्ता निर्विवाद है। जीवन ही क्यों, जड़ पदार्थों को उपयोगी बनाने के लिए भी पानी की आवश्यकता पड़ती है। यही तो कहा है अपने इस दोहे में रहीम ने कि पानी न हो तो समुद्र नहीं रहेगा और समुद्र नहीं होगा तो सीप नहीं होगी, सीप नहीं होगी तो मोती कहां जन्म लेगा? इसी प्रकार जड़ पदार्थ चूने को भी उपयोगी और अनुकूल बनाने के लिए पानी से बुझाए जाने की आवश्यकता होती है। कवि रहीम ने ‘पानी’ का उपयोग दो अर्थों में लेते हुए उसे सटीक व्याख्या दी है कि मनुष्य की सामाजिकता के लिए उसका पानीदार अर्थात् लज्जायुक्त होना आवश्यक है। यदि मनुष्य में लज्जा नहीं है तो इसका अर्थ है कि उसकी संवेदनाएं भी मर चुकी हैं। लज्जा व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को स्थापित करती है और सामजिक प्रतिष्ठा का ध्यान रखने वाला व्यक्ति कोई भी बुरा कर्म करते समय सौ बार विचार करता है। अंततः उसका मानस उसे बुरा कर्म करने से रोक लेता है। पानी के ये दोनों अर्थ विविध संदर्भों में मुकेश तिवारी जी के इस संग्रह की रचनाओं में भी उपस्थित हैं।
यह आवश्यक नहीं है कि कविता में सदा गूढ़-गंभीर शब्दावली का ही प्रयोग किया जाए। सरल एवं सहज शब्द भी गागर में सागर भरने की क्षमता रखते हैं। अनगढ़-सी दिखने वाली पंक्तियां विचारों की एक पूरी मीनार खड़ी करने का माद्दा रखती हैं। मुकेश तिवारी सागर साहित्यजगत के चिरपरिचित व्यक्ति हैं। भले ही यह उनका प्रथम प्रकाशित काव्य संग्रह है किन्तु उनका सृजनकर्म विगत दीर्घ अवधि से चलता रहा है। अनेक गोष्ठियों में उनकी कविताओं को सुनने का अवसर मिला। वे मधुरकंठ गायक भी हैं, इसलिए उनकी कविताओं में गेयता होना स्वाभाविक है। उनकी छंदमुक्त कविताएं भी वर्षा ऋतु में शिलाओं की दरारों से फूट पड़ने वाली जलधाराओं के समान प्रवाहपूर्ण हैं। एक सरसता है सभी कविताओं में। साथ ही गहन व्यंजना भी है। कवि को जो अनुचित प्रतीत हुआ है, उस पर उंगली उठाने से वे चूके नहीं हैं।
इस संग्रह में माता सरस्वती की वंदना के उपरांत श्री गणेश वंदना़ और फिर गीत ‘‘पानी रे पानी’’ है। इस प्रकार कवि ने ईश्वर की स्तुति के बाद पानी के रूप में प्रकृति का स्मरण किया है जोकि हमारी वैदिक संस्कृति की विशेषता रही है। वैदिक संस्कृति प्रकृति की उपासक रही, इसीलिए वैदिक काल में प्रकृति पर कभी कोई आपदा नहीं आई। हम जिसकी उपासना करते हैं, जिसे अपना पूज्य या आराध्य मानते हैं, उसकी रक्षा करना भी अपना कर्तव्य समझते हैं। हम अपने आदि ग्रंथों और आदि विचारों की मौलिकता से जैसे-जैसे दूर होते गए, वैसे-वैसे प्रकृति के प्रति लापरवाह होते गए। जिसका दुष्परिणाम हम आज जलवायु परिवर्तन, ऋतुओं के चक्र में परिवर्तन, दावानल, बड़वानल, सुनामी आदि के रूप में देख रहे हैं और शनैः शनैः वैश्विक दग्धता (ग्लोबलवार्मिग) से घिरते जा रहे हैं। पानी का संकट पूरी दुनिया में सबसे बड़े संकट के रूप में अपनी जगह बना चुका है। ऐसे समय कवि मुकेश तिवारी अपनी कविता के द्वारा स्मरण कराते हैं कि -
पानी रे पानी, ही है ज़िन्दगानी,
पानी ना फेरो उम्मीदों पे प्रानी।
हर इक बूंद से इसकी, जीवित है ये तन
वरदान  है नीर, इससे  ही जीवन
हम सब बचाएं इक-इक बूंद पानी
पानी रे पानी, ही है ज़िन्दगानी।

रहीम की भांति दोनों अर्थों में पानी की आवश्यकता है। जल के रूप में भी और संवेदना के रूप में भी। वर्तमान समय इतना मशीनीकृति हो गया है कि मानो संवेदनाएं भी निश्चेष्ट होती जा रही हैं। दूसरो के दुख से द्रवित होना इंसान भूलता जा रहा है। इसका कटु उदाहरण हमें दैनिक जीवन में आए दिन देखने को मिलता है। जब कोई दुर्घटना घटती है तो लोग घायलों की सहायता करने के बदले अपने मोबाईल पर उनकी पीड़ा का वीडियो बनाने में लिप्त हो जाते हैं। यह संवेदनाओं के हनन की पराकाष्ठा है। यह पराकाष्ठा उस समय भी देखने को मिलती है जब कोई व्यक्ति अपने वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा करता है अथवा उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ आता है। वस्तुतः आज पारिवारिक संबंधों की महत्ता तब समझ में आती है जब बहुत देर हो चुकी होती है। एकल परिवार का चलन वृद्ध माता-पिता से उनके बच्चों की दूरी बढ़ाता जा रहा है। जिस देश में मातृसेवा और पितृसेवा की परंपरा थी, वहां अब वृद्धाश्रम बनने लगे हैं। माता-पिता की सेवा से विरत होना दुर्भाग्यपूर्ण है। कई बार व्यक्ति अपनी त्रुटियों को पहचान लेता है और उसकी आंखें खुल जाती हैं, किन्तु अफ़सोस कि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए कवि की अभिलाषा है कि रिश्तों को संवारा और सहेजा जाता रहे ताकि कभी कोई पछतावा न रहे। इस तथ्य को कवि मुकेश तिवारी ने अपनी बुंदेली रचना में कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है-
कैसी है जो दुनियां, जो कैसो दाना-पानी।
रिश्तों की बातें, नें जाएं रे बखानी।।
बाप और मतारी तो, बैरी लगत ते
कहां अब चले गए, हमें छोड़ के बे
उनकी सांची कीमत तौ, हमने आज जानी
रिश्तों की बातें, नें जाएं रे बखानी।।

दुख, शोक, संताप के विविध रूप समाज में व्याप्त रहते हैं। कभी दुख अंतर्मन से जन्मता है और कभी मात्र दिखावटी रहता है। इस पर कवि ने बड़ी सूक्ष्म दृष्टि डालते हुए ‘‘अत्यंत दुख’’, ’’शोक व्याप्त मन’’ जैसी रचनाएं सृजित की हैं। इस संग्रह की कविताओं में जागरण का आह्वान है तो दार्शनिकता भी है। ‘‘ भोर भई अब जागो’’ शीर्षक रचना में प्रभाती के स्वर छेड़ते हुए कवि ने ‘‘बिछौना’’ शब्द का विस्तारित भाव ग्रहण किया है। वे सांसारिकता की तुलना बिछौना से करते हुए कहते हें कि -
जागो! भोर भई अब जागो
इस जग में कहीं चैन परे ना
छोड़ बिछौना भागो
जागो! भोर भई अब जागो....  

हिन्दी कविताओं के बीच बुंदेली रचनाओं का समावेश पाठकों को बार-बार खांटी ज़मीन से जोड़ने में सक्षम है। इन बुंदेली रचनाओं में मौलिक सौंदर्य है और चंचलता भी है। जैसे ‘‘आज जुद्दईया छाई है’’ शीर्षक गीत में दार्शनिकता के साथ ही एक नटखट संवाद भी है-
नेन मटक्का करबे वारे
तुमें काय गड़रये हैं प्यारे
बाहर झांक रओ मन तोरो
भीतर झांक ने पाई रे
विरथा वन-वन भटक रओ मन....

तुम दुनिया की चिंता छोड़ो
अपने घर तुम खुद ने फोरो
अपनी-अपनी करनी के फल
भोगत लोग-लुगाई रे
विरथा वन-वन भटक रओ मन....

एक और बुंदेली कविता है जिसमें कथा-कहन का सुंदर प्रयोग कवि द्वारा किया गया है। कुछ पंक्तियां देखिए-
सुन ले मोरे भैया, जा तुम एक कहानी।
एक हते राजा और एक हती रानी।।
राजा गए चना तोड़बे खों
रानी ने खीर बनाईती खाबे खों
जल्ली तुम खा लो खीर, आ ने जाए रानी
एक हते राजा और एक हती रानी।।

मुकेश तिवारी की रचनाओं की यह विशेषता है कि वे एक ही बंद में सहजता से व्यष्टि और समष्टि दोनों की बातें कह जाते हैं। अर्थात्, निज की और जग की, दोनों की बात एक बराबर और एक साथ। यही तो मानव जीवन है जिसमें सामाजिक समूह है तो व्यक्तिगत इकाई भी है। दोनों पक्ष परस्पर पूरक हैं। अतः अनुभूत की हुई, आंखों की देखी हुई बातें ही अर्थवत्ता रखती हैं, मात्र लिखी हुई नहीं। इस प्रसंग पर स्वाभाविक रूप से कबीर की ये पंक्तियां याद आती हैं-
तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी।
मैं  कहता  सुरझावन  हारि,  तू  राख्यौ  उरझाई  रे।।

यदि बात स्पष्टता से कही गई हो तो कहीं कोई उलझन नहीं रहती है। उलझन तभी होती है जब बातों को घुमा-फिरा कर गोल-मोल ढंग से कहा जाए। कवि मुकेश तिवारी के काव्य में स्पष्टता है। वे बातों को घुमाफिरा कर नहीं, वरन सीधे-सीधे कहते हैं। ‘‘पर्दा हूं पर्दा’’ कविता में यह स्पष्टता देखी जा सकी है जिसमें कवि ने अपनी तुलना एक पर्दे से करते हुए पर्दे की स्थिति और परिस्थिति को स्वयं से बेहतर ठहराया है।
‘‘पानी रे पानी’’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जिसकी कविताएं जीवन के हर पक्ष से हो कर गुज़रती हैं। कवि ने सप्रयास कुछ भी नहीं लिखा है, जो कुछ है अनायास है, जैसाकि उनकी रचनाओं में साफ़ दिखाई देता है। एक मौलिक स्वछंदता के दर्शन होते हैं संग्रह की रचनाओं में, जो पाठकों को निश्चित रूप से पसंद आएगा।
         संग्रह की रचनाओं का अपना एक विशिष्ट शिल्प सौंदर्य है। भावनाओं और बिम्ब विधान का एक सहज संतुलन है जो रचनाओं में वैशिष्ट्य जगाता है। पांडित्य से परे इन रचनाओं में एक सरलता है जिससे प्रत्येक पाठक इनका रसास्वादन सुगमता से कर सकता है और उसके कच्चेपन की सौंधी सुगंध भी ग्रहण कर सकता है।   
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Tuesday, June 27, 2023

पुस्तक समीक्षा | मन की उड़ान भरतीं समाज सरोकारित कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 27.06.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ के काव्य संग्रह "मेरी उड़ान" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
मन की उड़ान भरतीं समाज सरोकारित कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - मेरी उड़ान
कवि       - बद्रीलाल ‘दिव्य’
प्रकाशक - चम्बल साहित्य संगम कोटा प्रधान कार्यालय, 12बी-लक्ष्मण विहार (प्रथम) कुन्हाड़ी, कोटा-8 (राज.)
मूल्य       - 250/-
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काव्य में शब्दों की वह शक्ति होती है जो अपने छोटे आकार में एक साथ नौ रस समेटने की क्षमता रखती है। जहां गद्य विस्तार मांगता है, वहीं काव्य संक्षिप्तता को प्रथमिकता देता है। इसीलिए काव्य में अर्थ के साथ-साथ भावार्थ भी निहित होता है। हिन्दी काव्य ने अब तक अपनी एक दीर्घ यात्रा तय कर ली है। छंदबद्धता से छंदमुक्तता तक की दीर्घ यात्रा। छंदमुक्त कविताएं देखने में बहुत सरल और सहज लगती हैं किन्तु वस्तुतः जितना श्रम छंदबद्ध कविताओं को सृजित करने में लगता है, उतना ही श्रम छंदमुक्त कविताएं भी चाहती हैं। अब यह कवि पर निर्भर होता है कि वह छंदमुक्त कविता शैली को कहां तक साध पाता है। छंदमुक्त कविता शैली में प्रकाशित एक ताज़ा काव्य संग्रह ‘‘मेरी उड़ान’’ आज की समीक्ष्य कृति है। यह काव्य संग्रह कोटा (राज.) निवासी कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ का है। इस संग्रह में कुल 53 कविताएं हैं। कविताओं के कथ्य की विविधता इस संग्रह का मूल आकर्षण है, साथ ही शैली की दृष्टि से ये सधी हुई कविताएं हैं।
संग्रह के आरम्भ में कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ की कविताओं पर तीन साहित्यकारों के विचार दिए गए हैं। कवि, समीक्षक एवं साहित्यकार प्रो. कृष्ण बिहारी भारतीय ने संग्रह की कविताओं पर सांगोपांग दृष्टि डालते हुए अनेक विशेषताओं का उल्लेख किया है जिनमें से एक विशेषता है कि-‘‘शब्द संयोजन, गुण, अलंकार, रस, भाव, रीति, प्रकृति वर्णन के साथ छन्द प्रयोग आदि काव्य तत्वों पर दृष्टिपात करने पर प्रस्तुत कविता संग्रह अनायास सहृदय पाठकों को आह्लाहदित करता है। कवि दिव्य ने शब्द संयोजन में बिल्कुल भी बनावटीपन का सहारा नहीं लिया है।’’ वहीं, वरिष्ठ साहित्यकार रामकरण साहू ‘सजल’ ने संग्रह पर अपने विचार इन शब्दों में रखे हैं-‘‘ कविता संग्रह के पूर्ण अध्ययन उपरान्त पाया कि कविता संग्रह ‘मेरी उड़ान’ पूरी तरह से व्यवस्थित एवं दोष रहित है। पुस्तक में कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ का जो अनुपम शब्दकोष देखने को मिला वह अपने आप में अद्वितीय है। कविता संग्रह अपने सभी मानकों में खरा एवं अनोखा है जो समाज को एक दिशा प्रदान करने सक्षम है।’’

हिन्दी के सहायक आचार्य डाॅ. रामावतार सागर ने कवि ‘दिव्य’ के जीवन की विशेषताओं को भी रेखांकित किया है-‘‘राजस्थान के शिक्षा विभाग से सेवानिवृत वरिष्ठ कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ की यह तीसरी कृति है। हिन्दी और राजस्थानी (हाड़ौती) में समानाधिकार से अपनी लेखनी चलाने वाले कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ कोटा ही नहीं वरन राजस्थान की सीमाओं को पार कर देशभर में अपनी पहचान रखते है।’’
तीनों साहित्यकारों के विस्तृत आलेखों के साथ ही उनके विचार टिप्पणियों के रूप में ब्लर्ब पर भी दिए गए हैं। इसके साथ ही कवि ‘दिव्य’ ने प्राक्कथन में काव्य के प्रति अपने रुझान के बारे में चर्चा की है कि -‘‘मुझे विद्यार्थी जीवन से ही कविता लिखने और पढ़ने का शौक था। फिर धीरे-धीरे लिखने की प्रवृति और बढ़ती गई। मुझे विद्यार्थी जीवन से ही कविता संबल प्रदान करती आयी है। काव्य-रस का अतुलित आनन्द ही मानव को काव्य-लेखन की ओर प्रेरित करता है और काव्य-रस ने ही मुझे कविता लिखने की और प्रेरित किया है।’’
‘‘मेरी उड़ान’’ संग्रह की कविताएं कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ की रचनाधर्मिता का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये कविताएं कवि के मन की उड़ान से परिचित कराती हैं किन्तु इसका आशय यह नहीं है कि इनमें कोरी कल्पना या फंतासी मात्र है। इन कविताओं में विषय की विविधता है क्योंकि यह खालिस उड़ान नहीं है वरन इसमें समाज में घटित हो रही उचित-अनुचित घटनाओं एवं परिदृश्यों का आकलन है। यह उल्लेखनीय है कि कवि ने अपने संग्रह की पहली कविता उसे बनाया है जिसमें जीवन के प्रति भरपूर आश्वस्ति है और लौटकर आने की उत्कट अभिलाषा है। यह कविता वर्तमान के निराशा उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों में आशा जगाने वाली कविता है। ‘‘फिर लौटूंगा’’ शीर्षक की इस कविता की पंक्तियां देखिए-
देखो !/मैं फिर लौटूंगा
सिर्फ/तुम्हारे लिए
इस संसार में।
जो स्मृतियां
रह गई है शेष
उन्हें समेटने।
तुम अनछुए
पहलुओं को/छू लेना ।
फिर मत कहना
तुम नहीं लौटे
मैं फिर/लौटूंगा ।

अर्थात् अपने संग्रह की पहली कविता से ही कवि ने यह जता दिया है कि वह किसी भी दशा में पलायनवादी नहीं है। वह सांसारिक उलझनों से घबराया हुआ नहीं है। इस प्रकार सकारात्मक कविता से आरम्भित हो कर संग्रह की रचनात्मक यात्रा आगे बढ़ती है। जैसे-जैसे रचनाओं का क्रम बढ़ता है, वैसे-वैसे कवि के सामाजिक सरोकार मुखरित होते जाते हैं। कवि ‘दिव्य’ को विचलित करता है लड़कियों पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाया जाना। अतिप्रतिबंधों के बीच लड़कियों की ज़िन्दगी किस प्रकार की है, इसे उन्होंने अपनी कविता ‘‘जिन्दगी लड़कियों की’’ में बखूबी व्यक्त किया है-
तवे में झुलसती हुई
रोटियों की तरह
निकल जाती है लड़कियों की जिन्दगी।
वाह रे ! क्या खेल है तेरा भी विधाता।
देखते रहते है घिनौना खेल
उनके ही जन्मदाता।
आज लड़कियां क्यों पाती है
अपने आप को कैद ?
घर में। समाज में। तो कभी प्रवास में ।
कभी-कभी उन्हें अहसास कराती है।
लड़कियों की जिन्दगी
न होने का ।
  कवि ने जितनी गंभीरता से लड़कियों की दशा पर काव्य सृजन किया है, उतनी की पीड़ा और क्षोभ के साथ गायों की दशा पर कलम चलाई है। ‘‘संताप गायों का’’ शीर्षक कविता इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि हम जिस प्राणी को अपनी माता का स्थान देते हैं, उसी के प्रति कितनी अवहेलना बरतते हैं, इस ओर लक्षित है यह कविता। प्रायः कवियों की कलम दुखी मनुष्यों तक चल कर ठहर जाती है किन्तु कवि ‘दिव्य’ ने भारतीय संस्कृति की प्राणीमात्र के प्रति चिंता के भाव को आत्मसात करते हुए यह कविता लिखी है जो कि आज के समय में एक जरूरी कविता कही जा सकती है। कुछ पंक्तियां देखिए इस कविता की-
मैं देख रहा हूं
लड़खड़ाती असहाय गायों को
जिनके मुख पर
भीषण गर्मी से आ रहे/पंसूगड़े।
मुझे देखा नहीं जाता
कामधेनु का संताप ।

ऐसा नहीं है कि कवि जीवन के कठोर पक्ष को ही देख रहा हो, कवि की दृष्टि प्रकृति की सुंदरता और उसके कोमल पक्ष पर भी है। ‘‘लो! आ गया मधुमास’’ कहते हुए कवि ‘दिव्य’ मधुमास के प्रभावों को अपनी कविता में बड़ी सुंदरता से पिरोते हैं-
देखो/लो! आ गया मधुमास ।
जो होता ऋतुओं में सबसे खास।
शनैः शनैः
हर उपवन में छा रहा है।
अब तो भ्रमर भी छन्दों में
गीत गुनगुना रहा है।

कवि ने संग्रह के नाम में ही स्पष्ट कर दिया है कि यह ‘‘मेरी उड़ान’’ है, फिर भी एक-दो प्रयोग तनिक खटकते हैं। जैसे एक कविता है ‘‘सिर्फ दो रोटी के लिए’’। इस कविता में लाचार स्त्री की व्यथाकथा है। मार्मिक भी है। किन्तु कविता का आरम्भ इन पंक्तियों से होता है-
वीरांगना करती है
कुपेशा।
अपनी देह
को नीलाम
सिर्फ दो रोटी के लिए।
- यहां ‘‘वीरांगना’’ शब्द उचित नहीं प्रतीत होता है। पेट की खातिर देह बेचने को विवश स्त्री लाचार हो सकती है, वीरांगना नहीं। यदि वह देह बेचने का समझौता न करके मजदूरी करती तो उसे वीरांगना कहना सटीक होता।
इसी प्रकार एक और कविता है ‘‘हे गांधारी तुम’’। इस कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं- ‘‘हे गांधारी तुम/क्यों पगला गई/आंखों के पट्टी बांधकर।/धृतराष्ट तो नेत्रहीन होकर भी/देख रहे थे सब कुछ/अनहोनी घटानाओं को/संजय तो केवल माध्यम था बिचारा।’’
इसी कविता में कवि ने आगे यह भी लिखा है कि -‘‘यदि तुम न पगलाती तो/सम्पूर्ण भारतवर्ष की लाज बच जाती/और दुर्योधन की/अहंकारी पट्टी हट जाती।’’ इस कविता में सारा दोष गांधारी द्वारा अपनी आंखों पर पट्टी बांध लिए जाने पर मढ़ दिया गया है जबकि स्वयं गांधारी की इच्छा के विरुद्ध नेत्रहीन धृतराष्ट्र से उसका विवाह कराया गया था। इसी पीड़ा भरे प्रतिशोध में गांधारी ने अपनी आंखों में पट्टी बांधी थी। महाभारत काल में भी सामाजिक प्रभुत्व पुरुषों के हाथों में था। तत्कालीन दोषपूर्ण परिपाटियों के कारण ही धृतराष्ट्र को जन्मांधता मिली थी। अतः ऐसे प्रसंगों पर समग्र पक्षों के प्रस्तुतिकरण की आवश्यकता होती है।  

संग्रह की शेष सभी कविताएं उम्दा हैं और चिंतन, मनन तथा अनुभूति को जगाने वाली हैं। कवि की भाषाई पकड़ और शैली प्रभावी है। ‘‘भीख मांगने वाला’’,‘‘पेड़ क्या है’’, मैं आदमी हूं’’, ‘‘हे किसान तू हार नहीं सकता’’ जैसी कविताएं इस संग्रह की महत्वपूर्ण कविताएं हैं जिनका पढ़ा जाना जरूरी है। इनमें समाज के प्रति गहरा सरोकार निहित है।
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Tuesday, June 13, 2023

पुस्तक समीक्षा | प्रेम के संवाद रचती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 13.06.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त के काव्य संग्रह "अन्जानी राहें" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
प्रेम के संवाद रचती कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - अन्जानी राहें
कवि       - लक्ष्मीचन्द्र गुप्त
प्रकाशक    - मंगलम् प्रकाशन सर्किट हाउस मार्ग, छतरपुर (म.प्र.)
मूल्य       - 250/-
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‘‘वक्त की लय को देख न पाई। नियति के क्रम को समझ न पाई। इस पल कुछ, उस पल कुछ जान न पाई। जब आप चल दिए तब सुध आई। आपकी कोई बात नहीं, कोई सौगात नहीं। आपसे अधिक मीठा कुछ लगता नहीं। ममता, प्रेम के कोष को क्या दे सकती हूं? प्रेम, विश्वास, भावना के श्रद्धासुमन अर्पित करती हूं। पूज्य तुम्हें माना है मैंने, नित अर्चना करती हूं। उठ प्रभात नित नव किसलय संग, आपको वंदन करती हूं। प्यार की डोरी विंध जाती, जब भी अभिनंदन. करती हूं। बीते लम्हे संग उन यादों के, हे मेरे प्रिय तुम्हें वंदन करती हूं।’’ - ये काव्यात्मक शब्द हैं श्रीमती तारा गुप्ता के जिन्होंने अपने बिछड़े हुए जीवनसाथी की कविताओं को संग्रह के रूप में प्रकाशित कराते हुए स्मरण के तौर पर व्यक्त किए हैं।
साहित्यकार, चाहे वह गद्यकार हो या पद्यकार, कई बार ऐसा होता है कि उसके जीवनकाल में उसकी रचनाएं एक सीमित दायरे में सिमट कर रह जाती हैं। कभी वह संकोचवश, कभी आर्थिक कारणों से अथवा कभी आवश्यकता का अनुमान न लगा पाने के कारण अपनी रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने से वंचित रह जाता है। साथ ही वंचित रह जाता है उन रचनाओं से पाठकों का एक बड़ा वर्ग। कई रचनाकारों की रचनाएं उनके दिवंगत होने के उपरांत उनके परिजन, उनके हितैषी, उनके इष्टमित्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराते हैं और कई रचनाकार और उनकी रचनाएं विस्मृति की गर्त में समा जाती हैं। जहां तक इष्टमित्रों द्वारा अपने दिवंगत मित्र की रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का संदर्भ है तो मैं यहां एक प्रसंग का उल्लेख कर रही हूं। सागर नगर के चर्चित शायर यार मोहम्मद ‘यार’ का 2016 में निधन हो गया। उनकी अनेक उम्दा शायरी बिखरी पड़ी थी जिन्हें संग्रह के रूप में समेटे जाने की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में उनके मित्र जो कि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘श्यामलम’ के अध्यक्ष भी हैं, उमाकांत मिश्र ने ‘‘यारां’’ के नाम से उनकी शायरी का संग्रह प्रकाशित कराया। उस पर प्रशंसनीय यह कि उसका कोई मूल्य न रखते हुए उसे पाठकों को निःशुल्क उपलब्ध कराया गया। जबकि उमाकांत मिश्र स्वयं कोई पूंजीपति नहीं हैं, मध्यवर्गीय व्यक्ति हैं। इसीलिए तो कहा जाता है कि श्रेष्ठ भावनाएं हर बाधा के बीच से रास्ता निकाल ही लेती हैं। इसी क्रम में यह प्रसन्नता का विषय है कि कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त की अर्द्धांगिनी तारा गुप्ता ने उनकी कविताओं को ‘‘अन्जानी राहें’’ के रूप में प्रकाशित करा कर भावनात्मक एवं साहित्यक दोनों दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कार्य किया है।      
पुस्तक की भूमिका गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने लिखी है। उन्होंने लिखा है कि -‘‘गुप्त जी की अधिकांश कविताएं प्रकृति, समाज और व्यक्तिगत सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। सामाजिक विद्रूपताओं पर बड़े प्यार से चोट की है उन्होंने। अपनों के बीच रहकर व्यक्ति कैसे घुट-घुट कर जीता है इस प्रकार की संवेदनाओं से परिपूर्ण कवितायें पठनीय हैं।’’
संग्रह ‘‘अन्जानी राहें’’ की कविताएं पढ़ने के बाद यह टीस मन में उठती है कि इस कवि को तो अभी और सृजन करना चाहिए था, इसने इतनी जल्दी सबसे विदा क्यों ले ली? लेकिन जीवन और मृत्यु किसी के वश में नहीं। किन्तु यह भी सच है कि एक रचनाकार कभी मरता नहीं है, वह अपने विचारों एवं अपनी भावनाओं को अपनी रचनाओं में इस तरह पिरो जाता है कि उसकी उपस्थिति सदा बनी रहती है और वह सदा सबसे संवाद करता रहता है। कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताएं पाठकों से एक मधुर संवाद करती हैं। इन कविताओं में प्रेम के विविध पक्ष हैं। संयोग, वियोग, अनुनय, उलाहना आदि सभी कुछ। प्रेम की राहें हमेशा अन्जानी ही होती हैं। प्रेम किस सोपान को प्राप्त करेगा, इसका अनुमान पहले से नहीं लगाया जा सकता है। लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताओं में छायावाद और रहस्यवाद दोनों की झलक मिलती है। क्योंकि वे प्रेम की ऐसी काव्यात्मक प्रस्तुति सामने रखते हैं जिसमें खुला निवेदन भी है और गोपन भी है। उदाहरणस्वरूप उनकी कविता ‘‘हर लहर मैंनें किनारों से मिलती देखी’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
हर लहर मैंने किनारों से मिलती देखी।
हर शाम सुबहो में बदलती देखी।।
कब तक रहोगी मौन, बता दो तेरी कविते
हर बात प्यार की तेरे अधरों पर मचलती देखी।।
जीता तो हूं, मगर जी नहीं पाता।
पीता भी हूं, तो पी नहीं पाता ।।
क्या करूं, मजबूर हूं, निगाहों के पहरे यहां
मिलता हूं पर तुम से मिल नहीं पाता ।।

लक्ष्मीचन्द्र गुप्त ने कुछ चुटीली कविताएं भी लिखी हैं जो इस संग्रह में मौजूद हैं। जैसे उनकी एक कविता है ‘‘बाकी वे सब हैं बोर’’। यह अत्यंत रोचक कविता है। इस कविता से कवि की सृजनात्मक तीक्ष्णता का भी पता चलता है। यह कविता इस प्रकार है-
जरूरी नहीं प्यारे
केवल जरूरी है
जैसे
लिखना जरूरी है।
ताकि
पटक सकूं मुट्ठियां
मचा सकूं शोर
कि हमें छोड़कर
बाकी वे सब हैं बोर।

कविता में व्यंजना का प्रयोग करते हुए विसंगतियों पर गहरी चोट की जा सकती है। इसीलिए व्यंजना को अपनाते हुए कवि ने अपनी कविता ‘‘इस कवि में सामर्थ कहां है’’ में साहित्यजगत में व्याप्त दुरावस्था पर कटाक्ष किया है-
समझ गया उद्देश्य आपका,
बाध्य नही, पर बतला सकता।
मेरी कविता का अर्थ, कविता से पूछो,
इस कविता में अर्थ कहां है?
सीधी-साधी कविता का भी अर्थ बताता हूं।
इस कवि में सामर्थ कहां है।
मैं यों ही नहीं बहला सकता  
मैं तो अनर्थ से अर्थ निकालता,
बड़े-बड़े बाजारों में क्या,
छोटा दर्पण बिक सकता है?
बड़ी-बड़ी सरिता धारा में,
नीर कहीं क्या रूक सकता है?
कहते तो है, धरा गगन भी,
सावन भादों मिल जाते हैं।
साहित्य-गगन में रवि-कवियों संग
तुच्छ कवि क्या टिक सकता है?

वैसे लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताओं में प्रेम केन्द्रीय भाव है। प्रेमपत्रों के युग में पत्र के साथ कोई फूल या कोई उपहार भेजने का भी चलन था। उसी परिपाटी के तारतम्य में कवि ने ‘‘अनामिका के नाम एक पत्र’’ कविता में लिखा है कि -
पत्र के मैं साथ बोलो और क्या मैं भेज सकता।
भाव का भन्डार केवल कल्पना मैं भेज सकता ।।
पास मेरे कुछ नहीं अनुकूल कह संतोष करता -
संपदा की देवि को-कंकड़ दिखाना तुच्छ लगता ।।
हो भरा ज्यों सिंधु बोलो, बिन्दु का अस्तित्व क्या है।
सूर्य के सम्मुख कहो तुम इंदु का अस्तित्व क्या है।।
मौन तो अनुगामिनी है साधना की कल्पना -
भक्ति के सम्मुख कहो आस्तिक का अस्तित्व क्या है ।।
तुम स्वयं जब मेघ हो तो मेह की अभिलाष क्या है।

कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त ने प्रकृति का मानवीयकरण करते हुए छायावादी परम्परा का भी अवगाहन किया है। वे अपनी कविता ‘‘पनिहारी प्रीतम’’ में प्रकृति के तत्वों में प्रेम और प्रेयसी के सवरूप को देखते हैं-
पनिहारी प्रीतम
पनघट पर।
पनिहारी की गागर से घट से।
कुछ छलका।
कुछ बिजली सी चमकी,
शीतल कुछ झलका, अलिका मन से।

‘‘अन्जानी राहें’’ एक ऐसी धरोहर कृति है जो हिन्दी काव्य जगत को समृद्ध करने में सक्षम है। इसके प्रकाशन के लिए तारा गुप्त एवं प्रवीण गुप्त साधुवाद के पात्र हैं क्योंकि साहित्य का सृजन जितना महत्वपूर्ण होता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है उसे सहेजना।
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Tuesday, February 21, 2023

पुस्तक समीक्षा | कठोर संदर्भों पर कोमलता भरे आग्रह की कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 21.02.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि श्री वीरेन्द्र प्रधान  की पुस्तक "हम रहेंगे जीवित हवाओं में" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
कठोर संदर्भों पर कोमलता भरे आग्रह की कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - हम रहेंगे जीवित हवाओं में
कवि        - वीरेन्द्र प्रधान
प्रकाशक     - नोशन प्रेस
मूल्य        - 175/-
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कविता भाषा, भाव, ग्राह्य-क्षमता एवं अभिव्यक्ति-क्षमता के परिष्कार का प्रतीक होती है। जो कविता को मात्र मनोरंजन की वस्तु समझते हैं, वे बहुत बड़ी भूल कर रहे होते हैं। कोई भी व्यक्ति कविता तभी लिख पाता है जब उसका हृदय आंदोलित होता है और मस्तिष्क विचारों की ध्वजा फहराने को तत्पर हो उठता है। कहने का आशय कि कविता विचार और भावनाओं का सुंदर एवं संतुलित समन्वय होती है। 
‘‘हम रहेंगे जीवित हवाओं में’’ कवि वीरेन्द्र प्रधान का दूसरा काव्य संग्रह है। इससे पूर्व उनका काव्य संग्रह ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ प्रकाशित हो चुका है। इस दूसरे काव्यसंग्रह में संग्रहीत कविताएं समय से संवाद करने में सक्षम हैं। गोया वे समय को ललकारती हैं और समाज के समक्ष अपने शब्दों का आईना रख देती हैं ताकि समाज अपनी कुरुपता को देख सके और उसे दूर कर सके। इसके साथ यह भी कहना होगा कि वीरेन्द्र प्रधान के भीतर का कवि मात्र आईना रख कर शांत नहीं बैठता है क्योंकि वह चाहता है कि किसी भी कुरुपता को मुखौटे अथवा दिखावे के लेपन से नहीं छिपाया जाए वरन् उसे प्राकृतिक उपचार कर के दूर किया जाए जिससे समाज वास्तविक एवं लोकमंगलकारी रूप ग्रहण कर सके। 
दीर्घ जीवनानुभव एवं जनसामंजस्य कविता में लोकसत्ता की विश्वनीयतापूर्वक स्थापना करता है। वीरेन्द्र प्रधान भारतीय स्टेट बैंक में कार्यरत रहे। उनका गहन जनसंपर्क रहा तथा ग्रामीण क्षेत्रों में भी उन्होंने अपनी सेवाएं देने के दौरान ग्राम्यजीवन की कठिनाइयों को समीप से जाना-समझा। इसीलिए उनकी कविताओं में समसामयिक शहरी समस्याओं के साथ ही ग्रामीण समस्याओं पर भी गंभीर चिंतन देखा जा सकता है। वे अपनी कविताओं में बिना किसी लागलपेट के बड़ी व्यावहारिक बात करते हैं। वे जैसा देखते हैं, अनुभव करते हैं, ठीक वैसा ही लिपिबद्ध कर देते हैं। इसीलिए उनकी कविताएं सहज संवाद से युक्त होती हैं। उदाहरण के लिए इस संग्रह की कविता ‘‘गांव बनाम शहर’’ को देखिए जिसमें शहरों के फैलाव से सिमटते गांवों की वास्तविक स्थिति को कविता के कैनवास पर किसी पेंटिंग की भांति चित्रित कर दिया गया है, प्रभावी दृश्यात्मकता के साथ -
गंाव को अपनाने के नाम पर
जब शहर पसारता है हाथ
गांव अपने पांव सिकोड़
पेट की ओर लेता है मोड़
उस जीह्वा से बचने के लिए
जो शहर के लम्बे हाथों के पीछे छिप
निगल जाना चाहती है गांव।

 अर्थात् कवि उस ओर लक्षित कर रहा है जिसे देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है। शहर इंसान नहीं है लेकिन इंसान शहर की फैलाव के आड़ में अपने भूमिपति बनने की लिप्सा को फैलाता जाता है। यह बारीकी वीरेन्द्र प्रधान की कविताओं की विशेषता है। कवि उन स्थितियों पर भी दृष्टिपात करता है जिसके कारण खेतिहरों को अपनी खेती-किसानी छोड़ कर रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों की ओर पलायन करने को विवश होना पड़ता हैं। ऐसी ही एक कविता हैं-‘‘गंाव को छोड़ आना था’’। गंाव से पलायन का कारण हमेशा सूखा अथवा खेती में नुकसान ही नहीं होता है। अन्य अनेक कारण भी होते हैं, जैसे- गंाव में बच्चों की अच्छी और उच्च शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आदि। एक पीढ़ी पहले तक इन बुनियादी आवश्यकताओं की ख़तिर गांव छोड़ने का विचार त्याग भी दिया जाता था किन्तु वर्तमान पीढ़ी अपने बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए शहरी आवश्यकता को समझती है। बल्कि यह कहा जाए कि शहर आज की पीढ़ी की आवश्यकता का हिस्सा बन चुके हैं। परिवार को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं दे पाने के लिए गंाव से शहर की ओर पलायन नियति बच गया है। कवि इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए कहता है-
गंाव को छोड़ कर आना था
मन से या बेमन से
शहर को अपनाना था।
  
‘‘पांव’’, ‘‘विकास’’ और ‘‘कामना’’ विविध भावभूमि की कविताएं हैं। इसी क्रम में एक सशक्त कविता है ‘‘मूलचंद’’। इस कविता का एक अंश ही पूरी कविता को पढ़ने और समझने के लिए प्रेरित करने में सक्षम है-
अब भी है उसे याद
पिता-शिक्षक संवाद
जिसमें खाल उधेड़ देने
मगर हड्डियां बचा रखने
का विशेषाधिकार सुरक्षित किया गया था
शिक्षक के पास
उसे बदले में जानवर से मनुष्य बनाने के।

संवेदनाओं पर बाज़ार के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है। संपर्क के माध्यम बढ़े हैं किन्तु संवेदनाएं घट गई हैं। सोशल मीडिया पर सूचनाओं की भीड़ मानो एक भगदड़ का माहौल पैदा करती है जिसमें हर कोई ‘लाईक’ ‘कमेंट’ के ताने-बाने में उलझ कर शतरंज के घोड़े की भांति ढाई घर की छलांग लगाता रहता है। इस प्रवृत्ति ने संवेदनाओं का माखौल तो बनाया ही है, साहित्य सृजन की गंभीरता को भी गहरी चोट पहुंचाई है। किन्तु वीरेन्द्र प्रधान अपनी कविताओं के प्रति पूर्णतया सजग हैं। उनके सृजन का गांभीर्य उनकी प्रत्येक कविता में अनुभव किया जा सकता है। उदाहरण के लिए इसी संग्रह की ‘‘आभार’’ शीर्षक कवितांश देखिए-
मरने को तो मरते हैं अब भी
पहले से ज़्यादा लोग
मगर अब नहीं आतीं खूंट पर कटी चिट्ठियां
और सीरियस होने के तार से 
किसी के मरने के समाचार
अब तो अख़बारों में फोटो सहित छपते हैं
मरने वाले की अंत्येष्टि और उठावने के समाचार।
सोशल मीडिया ने भी बहुत क़रीब ला दिया
व्यस्तता और समयाभाव के युग में 
बहुत समय बचा दिया।

कवि वीरेन्द्र प्रधान समाज में रह रहे स्त्री-पुरुष के बारे में ही नहीं सोचते हैं बल्कि वे उन किन्नरों के बारे में भी विचार करते हैं जो हमारे इसी समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। यह एक ऐसा मानवीय समुदाय है जो समाज में रह कर भी समाज से अलग-थलग रखा जाता है। एक सजग एवं समाज के परिष्कार की आकांक्षा रखने वाले कवि के रूप में वीरेन्द्र प्रधान भी र्थडजेंडर अर्थात् किन्नरों के बारे में चिंतन करते हैं। वे अपनी कविता ‘‘ एक किन्नर का कथन’ में लिखते हैं -
कभी किसी गर्भ जल परीक्षण में
नहीं हो पाती हमारी पहचान
इसलिए हम मारे नहीं जाते 
बच जाते हैैं भ्रूण हत्या के पाप से।
जीवित छोड़ दिये जाते हैं पल-पल मरने के लिये।
जन्म से लेकर मृत्यु तक यह पहचान का संकट
कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ता।

लम्बी कविता का यह अंश किन्नरों के प्रति कवि के न्यायोचित आग्रह का उम्दा प्रमाण प्रस्तुत करता है। प्रेम, कोरोना आपदा, मौसम आदि पर भी कवि ने कविताएं लिखी हैं। ये कविताएं इन्हें पढ़ने वाले को ठिठक कर सोचने को विवश करती हैं। अपने काव्यकर्म के प्रति सजग वीरेन्द्र प्रधान सर्वहारा की पीड़ा को मुखर करते हुए भी विषमताओं के प्रति कठोरता के बजाए कोमलता का आग्रह रखते हैं, यह भी एक खूबी है उनकी कविताओं की। कविता संग्रह ‘‘हम रहेंगे जीवित हवाओं में’’ पाठकों को पसंद आएगा, साथ ही विचारों को आंदोलित भी करेगा।                   
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Tuesday, January 31, 2023

पुस्तक समीक्षा | ‘‘महज़ आदमी के लिए’’: तार्किक संवाद करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 31.01.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक अरविंद मिश्र  के काव्य संग्रह "महज़ आदमी के लिए" की समीक्षा...

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पुस्तक समीक्षा
‘‘महज़ आदमी के लिए’’: तार्किक संवाद करती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह   - महज़ आदमी के लिए
कवि         - अरविंद मिश्र
प्रकाशक   - आईसेक्ट पब्लिकेशन, ई-7/22, एस. बी. आई., आरेरा काॅलोनी, भोपाल (मप्र)- 462016
मूल्य      - 200/-
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सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
- प्रखर आंदोलनकारी कवि पाश की कविता ‘‘सबसे ख़तरनाक’’ का अंश है यह। जब कविता एक आंदोलन की तरह मुखर होती है तो उसका रंग कुछ अधिक गहरा होता है। उसमें स्याह और धूसर रंगों की प्रमुखता होती है। जीवन जब विसंगतियों और विडम्बनाओं से घिरा हुआ हो तो यही गहरे रंग कभी अवसाद देते हैं तो कभी विद्रोही बना देते हैं। आंदोलनकारी कविताएं विद्रोह का स्वर लिए हुए होती हैं। विद्रोह हमेशा किसी दूसरे इंसान के प्रति ही नहीं होता वरन यह बिगड़ी हुई व्यवस्था के प्रति, सड़ी-गली परम्पराओं ओर मान्यताओं के प्रति, दुर्गन्ध मारते विचारों के प्रति अथवा स्वयं के प्रति भी हो सकता है। देश में समाजवादी विचारधारा के प्रसार, पहले से चली आ रही जनवादी साहित्य की परंपरा के विकास और वामपंथी आंदोलन के प्रभाव के कारण साहित्य में प्रगतिवादी आंदोलन की शुरुआत हुई। साहित्य के राजनीतिक सरोकार, वर्ग-संघर्ष, सर्वहारा के प्रति प्रतिबद्धता, व्यवस्था परिवर्तन और क्रांति जैसे विषयों पर वैचारिक मंथन आरंभ हुआ। सियाराम शर्मा ने अपने एक लेख ‘‘नक्सलबाड़ी का किसान विद्रोह और हिंदी कविता’’ (पल-प्रतिपल, ंअक 42) में हिंदी कविता के विद्रोही स्वरों को तीन भागों में बांटते हुए बहुत महत्वपूर्ण व्याख्या की है। उन्होंने लिखा कि ‘‘सातवें दशक के उत्तरार्द्ध से ले कर नवें दशक के प्रारंभ तक हिंदी कविता में स्पष्ट रूप से तीन अलग-अलग संसार दिखाई पड़ते हैं।’’ सियाराम शर्मा के अनुसार पहला संसार उन लोगों का हैं जिन्होंने भूखे, नंगे, फटेहाल लोगों को कविता की दुनिया से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया और प्रेम, रति और मृत्यु पर कविताएं लिखते रहे। भले ही इनका काव्य जीवन तथा समाज के सरोकारों से दूर उदरपोषित वर्ग के मनोरंजन की वस्तु बन कर रह जाए। कविता के दूसरे संसार में वे कवि हैं जो मध्यवर्ग के हैं और मध्यवर्ग की विषमताओं को जीते हैं। वे वामपंथी स्वरों से सहानुभूति रखते हैं किन्तु व्यवस्था को आमूलचूल बदलने की सीमा तक सोचने का साहस नहीं रखते। कविता के तीसरे संसार के कवि हुंकार भरते दिखाई देते हैं। उनके लिए बीमार व्यवस्थाएं समर स्थल हैं। वे लड़ने का माद्दा रखते हैं। उन्होंने अतीत में तमाम जनआंदोलनों को अपना काव्यात्मक समर्थन दिया और भविष्य में भी काव्य को मशाल की भांति प्रज्ज्वलित रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस वर्गीकरण की यहां चर्चा करना इसलिए समीचीन है क्योंकि इससे अरविंद मिश्र के कविता संग्रह ‘‘महज़ आदमी के लिए’’ की भावभूमि को समझना आसान हो जाएगा।   

     ‘‘महज़ आदमी के लिए’’ में अरविंद मिश्र की कुल पचासी कविताएं हैं जो चार अध्याय-शीर्षकों में विभक्त की गई है- हमेशा हाशिया ही आया, संसार की सत्ता का उत्सव, आधी दुनिया की हुक्मरान और मित्र लौट आओ। इन चारो में प्रत्येक अध्याय की कविताएं शाब्दिक रूप में भले ही भिन्न हों किन्तु इनका मूल स्वर एक समान है जिसमें आक्रोश है, उलाहना है, चेतावनी है, आग्रह है और प्रतिरोध है। संग्रह की भूमिका नवल शुक्ल ने लिखी है तथा ल्बर्ब पर लीलाधर मंडलोई की लम्बी टिप्पणी है।
जब कविता में प्रतिरोध के स्वर मुखर होते हैं तो वह कविता निजी नहीं रह जाती है, ऐसी कविता जनहित की कविता बन जाती है। अरविंद मिश्र की कविताएं भी जनहित की कविताएं है क्योंकि वे मानवता विरोधी कार्यों के प्रति अपनी चिंता प्रकट करती हैं। कवि की चिंता इस बात को भी लेकर है कि जो सामाजिक और आर्थिक दुनिया के आधार हैं, वे मनुष्य आज भी निचले स्तर पर ही क्यों हैं? जैसे किसी ऊंची इमारत की नींव के पत्थरों को भूमि में दबा कर भुला दिया गया हो। यह भी भुला दिया गया हो कि यदि नींव किसी दिन दरकने लगेगी तो इमारत पर भी दरारें आ जाएंगी और इमारत ध्वस्त भी हो सकती है। अरविंद मिश्र दलितों, शोषितों के प्रति अत्यंत सहानुभूति रखते हुए उनकी स्थिति बदलने का आग्रह करते दिखाई देते हैं। इसीलिए उनके इस कविता संग्रह ‘‘महज़ आदमी के लिए’’ की प्रथम कविता ही एक सुखद कल्पना और सुखद आशा का स्वर लिए हुए है-
एक दिन
तुम्हारे हाथों के स्पर्श से
गरमाएगी दुनिया
तुम्हारे हाथों की बनी रोटियां
संसार का
सबसे स्वादिष्ट व्यंजन होंगी।

एक दिन/ तुम्हारा बेटा भी
समर्थ बनेगा
खुद काटेगा/अपना बोया खेत
खून से मंहगा/बिकेगा तुम्हारा पसीना
तुम्हारी आवाज़ से/खुलेंगे घर-घर के द्वार
देखना/ तुम्हारे सारे सपने
होंगे साकार/एक दिन।

    ‘‘हम होंगे क़ामयाब एक दिन’’ की आकांक्षा को ग़रीब किसानों और खेतिहर मजदूरों से जोड़ते हुए कवि की आकांक्षा सकारात्मक भाव प्रकट करती है। लेकिन जीवन में जो भी नकारात्मक है वह भी कवि से अछूता नहीं है। यहां कवि ने ‘‘आदमी’’ शब्द का अर्थ मानवता के रूप में लेते हुए ‘‘महज़ आदमी के लिए’’ शीर्षक से दो कविताएं लिखी हैं। पहली कविता का मानवीय उलाहना देखिए-
आंख मूंद श्रद्धालु
मंदिरों में कर रहे संकीर्तन
मस्जिदों में हो रही अजानें
नियम से जा रहे हैं लोग
रविवार को गिरजाघर
गुरुद्वारों में
पढ़ी जा रही है गुरुवाणी
सब चल रहा है/हो रहा है
अर्थ के लिए अनर्थ
महज़ आदमी के लिए
आदमी ज़िन्दा नहीं है।
अरविंद मिश्र की कविता में समकालीन समय अपने पूरी त्रासदी के साथ मौजूद है। वस्तुतः संग्रह की कविताएं मनुष्यता को तलाशती हुई कविताएं हैं। ये कविताएं उन पदचापों पर भी कान लगाए हुए हैं जो समय-समय पर सामाजिक भेद-भाव, तानाशाही और आर्थिक खाई के चलते अकर्मण्यता की किसी गुफा में दुबक कर बैठ गई हैं। इसीलिए जब परिवर्तन अथवा प्रतिरोध के ये पदचाप कवि को सुनाई नहीं देते हैं तो वह खिन्न स्वर में कटु शब्दों का सहरा लेता है ताकि सुप्त होती जा रही चेतना को झकझोरा जा सके। ‘‘समझ नहीं पा रहे कुचालें’’ कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
        लाख मुसीबतों के बाद भी
कह रहे हो पायलागूं
ढो रहे हो गू-मूत,
शताब्दी की शताब्दी
गुज़र जाने के बाद भी
समझ नहीं पा रहे कुचालें
यूं तो संग्रह की अधिकांश कविताएं उद्धृत करने योग्य हैं किन्तु अंत में ‘‘डाकिया’’ कविता का एक अंश देखना जरूरी है क्योंकि यह कविता बताती है कि डाकिए की भूमिका को जब से इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों ने विस्थापिता किया है तब से संवेदनाएं भी किस तरह विस्थापित हो गई हैं। यह अंश देखिए-
हार-जीत की सूचनाएं
देश-परदेश का समाचार
भांति-भांति की जातियां
देश, धर्म, रिश्ते-नाते, संस्कृतियां सब कुछ
आज जबकि व्हाट्एप, ई-मेल ने
हथिया ली हैं तुम्हारी कार्रवाइयां
सचमुच! बड़ी बात है डाकिया होना।

कवि अरविंद मिश्र का अनुभव संसार व्यापक है। वे जीवन के प्रति गहरी दृष्टि रखते हैं और उन प्रयासों को सफल होते देखना चाहते हैं जो कुछ विशेषवर्ग के मनुष्यों को मनुष्यता वाले उनके बुनियादी अधिकार दिला सकते हैं। कविताओं में शब्दों की बुनावट सटीक और बेहतरीन है। ‘‘महज़ आदमी के लिए’’ काव्य संग्रह में तार्किक संवाद करती कविताएं है, कोई भी बात थोथेपन से नहीं कही गई है। इसकी यही खूबी इसे पठनीय और विशेष बनाती है।    
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Tuesday, August 2, 2022

पुस्तक समीक्षा | माटी का सोंधापन लिए कविताएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 02.08.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी के काव्य संग्रह  "सोंधी माटी" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏

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पुस्तक समीक्षा

माटी का सोंधापन लिए कविताएं

समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह 

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काव्य संग्रह     -  सोंधी माटी

कवि     -  आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी

प्रकाशक        -  एन. डी. पब्लिकेशन, बाधापुर ईस्ट, नई दिल्ली

मूल्य           -  200/-  

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    ‘‘सोंधी माटी’’ सागर नगर के सुपरिचित कवि आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी का प्रथम काव्य संग्रह है। पं. त्रिपाठी उच्चकोटि के शिक्षक रहे हैं और प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के साथ ही उनका यह प्रथम काव्य संग्रह प्रकाशित होना इस बात का स्पष्ट उद्घोष है कि वे अपने जीवन की दूसरी पारी मुक्तभाव से साहित्यसृजन में व्यतीत करेंगे। संग्रह की कविताओं को तीन भागों में बांटा जा सकता है- जीवनपरक, प्रकृतिपरक और व्यक्तिपरक। जीवन परक कविताओं में पं. महेश दत्त त्रिपाठी ने ‘‘लाॅकडाउन या तालाबंदी’’, ’’मानवता’’, ’’किसान’’, ’’मोबाईल’’, ’’नमस्ते’’, ’’केन्द्राध्यक्ष’’, ’’मत्स्यन्याय’’, ’’गुनगुना पानी’’, ’’आस्तिक-नास्तिक’’ आदि कविताएं लिखी हैं। कोरोना काल का सबसे सुरक्षित दौर था लाॅकडाउन। यह सच है कि उस दौर ने मजदूरों और रेहड़ी वालों को आर्थिक तंगी के शिखर पर पहुंचा दिया जहां से उतर पाने का उनके पास कोई रास्ता नहीं था लेकिन इसी लाॅकडाउन ने लोगों को घरों में एक साथ रहने की महत्ता भी एक बार फिर याद दिला दी। न्युक्लियर परिवारों के बढ़ते चलन के दौरा में लोगों को एक बार फिर अपने रिश्तों की गहराई से पहचान हुई। जो पहले सोशल मीडिया से परहेज करते थे, वे भी उस दौर में सोशल मीडिया के आदी हो गए। घर में रहने के कारण कई ऐसे काम किए गए जो वर्षों से लम्बित थे। इस संबंध में पं. त्रिपाठी की ‘‘लाॅकडाउन या तालाबंदी’’ कविता की ये पंक्तियां बड़ी रोचक हैं-

अपने ही घर को इतने नज़दीक से 

हमने कभी न जाना था

पलंगपेटी में रखी पुस्तकें

कपड़े जो उठा कर नहीं देखे।

बेचारा लोहे का संदूक

जो भीतर से साफ़ ही नहीं हुआ

उस पर पेंट कलर करके चमकाया।


‘‘मानवता’’ वह कविता है जो कवि के मानवीय सरोकारों से साक्षात्कार कराती है और यह स्थापित करती है कि आज के संवेदनहीन होते समय में मानवता कितनी आवश्यक है। आज यदि कोई हादसा होता है तो लोग घायल की मदद करने के बजाय उसके कष्ट की उस दुर्घटना की अपने मोबाइल पर वीडियो बनाना शुरू कर देते हैं। भले ही वह घायल तड़प तड़प कर मर जाए। ऐसे विपरीत समय में मानवता का परिचय देना बहुत आवश्यक है। जबकि आज के समय में किसी की मदद करना और भी आसान हो गया है सिर्फ 100 नंबर डायल करना है और मदद फौरन हाजिर हो जाती है। इसी सत्य को रेखांकित करते हुए कवि ने ‘‘मानवता’’ शीर्षक से यह कविता लिखी है- 


ये क्या /मैं चला 

रात में दलपतपुर (बंडा) से 

कर्रापुर आते-आते 

बजे रात के बारह /सामने देखा तो

बाइक किसी की /टकराई होगी 

कराह रहे थे महिला-पुरुष 

बीच सड़क पर पड़े 

रुका मैं, जगी मानवता 

डायल 100 किया दो-तीन बार 

और भिजवाया अस्पताल उन्हें।


यह संवेदना उसी व्यक्ति के भीतर जागृत अवस्था में पाई जा सकती है जिसे माटी के सोंधेपन का अहसास हो। लेकिन जीवन का एक और पक्ष है राजनीति, जहां अहसास होते हुए भी संवेदना की कमी दिखाई देती है। इस अवस्था पर कवि ने ‘‘मत्स्यन्याय’’ शीर्षक कविता में लिखा है- 

राजनीति का अर्थ है 

अब बदलते परिवेश में 

जंगलराज का होना ।

जब मानव स्वीकार करता है 

जंगलराज को 

तब वहां होने वाले 

मत्स्य न्याय को कहते हैं अधर्म।


कवि त्रिपाठी प्रकृति परक रचनाओं में मानवीय भावना के रूप में प्रेम के अस्तित्व का विस्तृत वर्णन करते हैं। ‘‘प्रेम’’ शीर्षक से लिखी गई उनकी कविता की यह पंक्तियां देखिए-

मनुष्य की भावना ही प्रेम है 

जो असीमित, 

अनंताकाश में विद्यमान है 

यह ऐसा अद्भुत भाव है 

यह सुगंध की तरह है 

अपने अस्तित्व की।


कवि त्रिपाठी ने प्राकृतिक तत्व के मध्य मौजूद सोंधी माटी के वास्तविक स्वरूप को ‘‘सोंधी माटी देश की’’ शीर्षक से रेखांकित किया है-

हमारा प्यारा भारतवर्ष 

शब्द भी कम पड़ेंगे 

इस देवभूमि की माटी पर 

जहां अवतार लिया 

भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, महाप्रभु ने, 

गौतम बुद्ध और महावीर ने ....।


वस्तुतः यही तो माटी का  सोंधापन है जो व्यक्ति को उसकी मातृभूमि से जोड़े रखता है। प्रकृति पर केंद्रित एक और कविता जिसका शीर्षक है ‘‘धरती और बरसात’’ यह बहुत सुंदर कविता है, जो शब्दों के माध्यम से वर्षा ऋतु का अनुभव कराती है-

धरती का अपनापन गहरा है 

इतना कि वह कभी 

बरसाती पहनकर या छाता लगाकर 

बरसात का स्वागत नहीं करती 

पृथ्वी तो बारिश में 

भीग जाने पर ही 

अपनी सार्थकता समझती है 


व्यक्ति पर कविताओं में कवि त्रिपाठी ने ‘‘भाई जी डॉ. सुब्बाराव’’, ‘‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय - मानवतावाद के प्रणेता’’, ‘‘संत विनोबा भावे’’ के साथ ही ‘‘मजदूरनी कोरोनाकाल की’’ जैसी कविताएं लिखी हैं। ‘‘कोरोनाकाल की मजदूरनी’’ में एक संवेदनशील और मार्मिक रचना है। कोरोनाकाल में मजदूरों के शहरों से गांव की ओर प्रस्थान के दौरान आने वाली कठिनाइयों का शब्दशः चित्रण किया गया है इस कविता में, कुछ पंक्तियां देखें-

मैं एक मजदूरन हूं 

कोई मुझे भी कोरोना की 

चाल जरा सी बतला दो 

मैं चली हूं अपने सफर पर 

बस सफर 12 - 13 दिन का 

मेरे पेट में 9 महीने 

और हाथ में छोटा बच्चा है.....

       संग्रह की कविताओं में मानवीय अनुभवों और उनके सूक्ष्मतम निहितार्थों के साथ-साथ मानव और प्राकृतिक दुनिया के अलग-अलग पड़ावों के मार्मिक अनुभवों-प्रसंगों को उभारने वाले बिंब हैं। संग्रह में सहज सरल भाषा में सुंदरता से शब्दों को पिरोया गया है। ‘‘सोंधी माटी’’ कवि के प्रथम काव्य संग्रह के रूप में स्वागतेय है।

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Tuesday, March 29, 2022

पुस्तक समीक्षा | वर्तमान बोध से परिपूर्ण कविताएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 29.03.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि रमेश दुबे के काव्य संग्रह "ऐसा भी होता है" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
वर्तमान बोध से परिपूर्ण कविताएं
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - ऐसा भी होता है
कवि      - रमेश दुबे
प्रकाशक   - स्वयं लेखक (श्रीराम नगर, वृंदावन वार्ड, सागर, म.प्र.) 
मूल्य      - 150 रुपए 
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कविता क्यों लिखी जानी चाहिए? निःसंदेह यह बड़ा विचित्र प्रश्न है। लेकिन यह प्रश्न कई बार उठा है और विद्वानों से उसे अपनी-अपनी तरह से व्याख्यायित किया है। आचार्य कुन्तक ने ‘वक्रोक्ति काव्यजीवितं’ कहकर कविता को परिभाषित किया है, वहीं दूसरी तरफ आचार्य वामन ने ‘रीतिरात्मा काव्यस्य’ अर्थात् रीति के अनुसार रचना ही काव्य है कह कर परिभाषा दी है। आचार्य विश्वनाथ ‘वाक्यम् रसात्मकम् काव्यं’’ अर्थात् रस युक्त वाक्य ही काव्य है, यह कहते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते है।’’ मैथ्यू आर्नोल्ड के अनुसार- “कविता के मूल में जीवन की आलोचना है।’’ वहीं, शैले के मतानुसर “कविता कल्पना की अभिव्यक्ति है।’’
मेरे विचार से जो कविता अभिव्यक्ति के उद्देश्य को पूर्ण करती है, वही सर्वोत्तम कविता है। चाहे कविता स्वानुभूति से उपजी हो या लोकानुभूति से, भावों का संप्रेषण ही उसका मूल उद्देश्य होता है। कई बार कवि वह सब कुछ अपनी कविता में उतार देना चाहता है जो कुछ समाज में घटित हो रहा है। ये कविताएं एक वाक्य को जन्म देती हैं जो कभी उच्छवास के रूप में उभरता है कि ‘उफ! ऐसा भी होता है।’ तो कभी आश्चर्य बन कर सामन आता है कि ‘अरे, ऐसा भी होता है?’ किन्तु उन कविताओं को लिखने वाला कवि सूचनात्मक भाव से कहता है कि ‘‘ऐसा भी होता है’। जी हां, सागर नगर के कवि रमेश दुबे के कविता संग्रह का नाम है-‘‘ऐसा भी होता है’’। 
इस कविता संग्रह की भूमिका डाॅ. वर्षा सिंह द्वारा लिखी गई है। उन्होंने संग्रह की कविताओं के बारे में विस्तार से टिप्पणी करते हुए लिखा है कि - ‘‘जीवन के अनुभवों से उपजी कविताओं का अपना अलग महत्व होता है। ऐसी कविताएं शैली अथवा भाषा पर केंद्रित न होकर भावनाओं पर तथा विचारों पर केंद्रित होती हैं। इस प्रकार की कविताओं की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता है। सागर के साहित्य जगत में कवि रमेश दुबे का नाम ऐसे ही कवियों की पंक्ति में सम्मान से रखा जा सकता है जिन्होंने समाज और परिवेश के अनुभव जताते हुए उन्हें अपने काव्य में पिरोया है और इस प्रकार से सृजन करते हुए उन्होंने अभिव्यक्ति को महत्ता दी है, जबकि शैली की विशेषताएं उनके लिए गौण रही हैं।’’
      डॉ. वर्षा सिंह ने आगे लिखा है कि-‘‘रमेश दुबे की कविताओं का स्वरूप भले ही अनगढ़ प्रतीत हो किंतु उनके भावों और विचारों की गहनता उनकी कविताओं को प्रभावी बना देती है। उनकी कविताओं में मौजूद जीवन के प्रति चिंतन एवं चिंता दोनों ही महत्वपूर्ण ढंग से सामने आती हैं जो युवा कवियों का मार्ग प्रशस्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।’’  
कवि रमेश दुबे की कविताएं समाज की विसंगतियों को पूरी ईमानदारी से उजागर करती हैं। साथ ही व्यक्ति में हो रहे मानवता के क्षरण की ओर भी इशारा करती हैं। ये कविताएं वर्तमान बोध से परिपूर्ण हैं और इनमें आंचलिकता के तत्व भी है जो इन कविताओं को विश्वसनीय बनाते हैं। स्वयं कवि रमेश दुबे अपने इस संग्रह की कविताओं के बारे में लिखते हैं कि ‘‘मैंने तात्कालिक वातावरण में जो देखा उसी पर कोशिश करते हुए लिखने लगा। मेरे काव्य संग्रह का शीर्षक ‘‘ऐसा भी होता है’’ मात्र इसी धारणा से रखा गया है। क्योंकि वास्तव में जो लिखा है ऐसा ही हो रहा है। मेरी रचनाएं पढ़ने में आपको छंद विहीनता अवश्य दिखेगी परंतु कुछ न कुछ कहने में सार्थक अवश्य ही हैं।’’ 
रमेश दुबे की कविताएं बहुत कुछ कहती हैं। वे जीवन के प्रत्येक पक्ष को खंगालती हैं। प्रकृति एवं पर्यावरण की चिन्ता भी उनकी कविताओं में मुखर हुई हैं। ‘‘वृक्ष’’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
वृक्ष रात दिन प्रहरी की भांति खड़े हैं 
बिना पानी बिना खाए जी रहे हैं 
हमें फल छाया और हवा दे रहे हैं 
पक्षियों को घर, हमें घर दे रहे हैं 
पहाड़ों पर खड़े रहकर
बादलों को रोककर 
पानी बरसा रहे हैं 
फिर भी हम उन्हें काट-काट कर 
नष्ट कर रहे हैं 
इतना सब सह कर भी वे 
हमें सुख दे रहे हैं 
फिर भी दया का भाव 
उन पर नहीं 
वह दुख, हम सुख भोग रहे हैं
हम उन्हें उनकी जिंदगी 
जीने नहीं दे रहे हैं।

देश में व्याप्त बेरोजगारी पर कवि कठोर टिप्पणी करते हुए ‘‘नेता कहलाएंगे’’ शीर्षक कविता में लिखते हैं-
नादान बच्चे 
पढ़ेंगे लिखेंगे 
पढ़ लिखकर 
डिग्री ही पाएंगे 
डिग्री लेकर नौकरी के लिए
ऑफिस ऑफिस चक्कर लगाएंगे 
नौकरी बिना अपना सा मुंह लेकर 
घर चले आएंगे 
पढ़े-लिखे कहलाएंगे ।
जो नादान बच्चे 
सिर्फ स्कूल ही जाएंगे 
मौज मस्ती में दिन बिताएंगे 
स्कूल से नाम कटाएंगे 
धीरे-धीरे नेता के गुण पाएंगे।

वर्तमान जीवन में स्वार्थपरता का प्रतिशत बढ़ते हुए देखकर कवि ‘‘सोच दिल की’’ शीर्षक कविता में अपनी व्यथा इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-
लोग दिल से नहीं 
दिमाग से सोचते हैं 
हिसाब पहले लगाते फिर
दिल जोड़ते हैं 
सोच हमारा आज 
क्यों इतना बदल गया
क्या सोचने का दायरा 
इतना सिमट गया 
दायरे पहले देखते उनके 
फिर हम बोलते हैं 
सोच दिल की 
अब तो पुरानी हो गई 
कहने, सुनने की यह 
एक कहानी हो गई 
लोग दिल से नहीं 
अब दिमाग से सोचते हैं।
       निश्चित रूप से कवि रमेश दुबे की कविताओं में संवेदनाओं का गहन समावेश है। इसीलिए उनका यह संग्रह ‘‘ऐसा भी होता है’’ पठनीय एवं विचारणीय कविताएं हैं जो वर्तमान बोध से परिपूर्ण है।                           
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