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Sunday, January 25, 2026

शून्यकाल | हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       .हम भारत के लोग...’ हमने अपनी आकांक्षाओं, आशाओं एवं विश्वास के साथ संविधान की संरचना को स्वीकार किया और सच्चे गणतंत्र की राह में आगे बढ़ने की शपथ ली। हमने तो हमेशा अपने गणतंत्र से अनेकानेक आशाएं रखीं लेकिन क्या कभी सोचा कि हमने उन आशाओं का क्या किया जो हमारे गणतंत्र को हमसे रही होंगी? क्या हम गणतंत्र की आशाओं पर खरे उतरे हैं या फिर हमने अपने गणतंत्र को अपना निजीतंत्र बनाते जा रहे हैं। अपनी वैश्विक छवि के साथ-साथ सबसे नीचे की पंक्ति के नागरिकों के जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए इस संदर्भ में कभी-कभी हमे आत्मावलोकन भी करना चाहिए।
    
    एक लम्बी परतंत्रता के बाद स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर मिले स्वीकार्य थी। कीमत भी हमने चुकाई। भारतीय भू-भाग का बंटवारा हुआ। अमानवीयता का तांडव देखना पड़ा। उसके बाद ग़रीबी, बदहाली, शरणार्थियों का सैलाब, बेरोज़गारी और सांप्रदायिक तनाव ने स्वतंत्रता की खुशी को कई-कई बार हताहत किया। फिर भी स्वतंत्रता विजयी रही और हमने अपना संविधान गढ़ा तथा उसे स्वयं पर लागू किया। इसके  पहले संविधान सभा के सामने चुनौती थी कि नए गणतंत्र का निर्माण ऐसे हो कि देश में फैली भाषाई, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात किया जा सके और लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से न्याय सुनिश्चित किया जा सके। एक ऐसा गणतंत्र जिसमें नागरिकों को बराबरी का दजर्र मिले। जिसमें शासन की शक्ति किसी एक राजा अथवा अधिनायक के पास न हो कर जनता और उसके चुने प्रतिनिधियों के हाथ में हो।

      गणतंत्र के साथ सुनहरी आशाएं जागीं। देश तरक्की करेगा तो हम भी तरक्की करेंगे। या फिर इसके उलट कि हम तरक्की करेंगे तो देश भी तरक्की करेगा। लेकिन इस ‘हम भारत के लोग’ में से ‘हम’ पर ‘मैं’ का प्रभाव बढ़ता गया और ‘मैं’ ने ‘हम’ को निर्बल बना दिया। कभी-कभी उन्मादी भी। हमने अपनी परम्पराओं को सहेजा संवारा और उनसे सबक लिया। समयानुसार सड़ी-गली परम्पराओं को काट कर फेंका भी लेकिन उन्माद की अवस्था में पहुंचते ही हम सत्य, अहिंसा और परमार्थ के समीकरण को भुला कर हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। जीव मात्र के प्रति उदार विचार की परम्परा के पोषक हम यदि जलीकट्टू का समर्थन करने लगते हैं तो वहीं हमारा ‘अहिंसा परमोधर्म’ का आह्वान टूटने लगता है। हमने अपने संविधान में अहिंसा को र्प्याप्त जगह दी है। परमोधर्म को भी उच्च स्थान दिया है फिर हिंसा को अपनी गौरवमयी परम्परा कहते हुए संविधान की धाराओं को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं?

    9 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की पहली बैठक में विभिन्न जातियों, धर्मों, आर्थिक, राजनीतिक विचारों के लोग शामिल थे और सामाजिक आधार को फैलाने की कोशिश की गई थी ताकि भारत अपने आप में जिस तरह से अद्वितीय विविधता को समेटे है उसी के अनुरूप नए गणतंत्र का निर्माण हो सके। भारतीय संविधान में नैतिकता और राजनीतिक परिपक्वता को आधार बनाया गया। लेकिन समूचे देश में महिलाओं साथ बढ़ते दुर्व्यवहार को देखते हुए यह लगने लगता है कि हमारे तंत्र से अब नैतिकता का लोप होने लगा है। गोया भारतीय स्त्री बर्बरयुग के किसी नए संस्करण को जी रही हो। भारत इस समय मानव तस्करी का वैश्विक मार्ग बन चुका है। यह बर्बरता भी हमारे संवैधानिक उसूलों का सिर झुकाने को र्प्याप्त है।
गणतांत्रिक भारत में देश की विविधता और जटिलता को एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में अपनाया गया और ऐसा करते समय विभिन्न क्षेत्रों में बहुलतावाद का सम्मान किया गया। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र में संघीय ढांचे और धार्मिक मामलों में धर्मनिरपेक्षता के सहारे एक नए गणतंत्र के मायनों को स्पष्ट किया गया। गणतंत्र के गठन के बाद से ही नीति निर्धारकों की प्राथमिकता देश के संघीय ढांचे को बनाए रखना थी।

यह सच है कि कोई भी तंत्र हो उसकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। लेकिन गणतंत्र की परिकल्पना मैं संवैधानिक समस्याओं के लिए कई रास्ते खुले रखे गए। संशोधनों के द्वारा संवैधानिक ढांचे में लचीलापन भी बनाए रखा गया। फिर भी प्रत्येक नए चुनाव में चाहे वह लोकसभा का हो या विधान सभा का या फिर किसी पंचायत अथवा निगम का, गरिमा के सीमाएं चटकती मिली हैं। गणतंत्रता के क्या है मायने आज हमारे देश में। इतने लम्बे अरसे में कितने नियमों का ईमानदारी से हमने निर्वाह किया है और कितने ऐसे संवैधानिक नियम है जिनको हमने संविधान के पन्नों पर लिख कर भुला दिया है। हमारा देश भारतवर्ष एक जनतांत्रिक देश है। जहां जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा ही देश की शासन व्यवस्था चलायी जाती है। गणतंत्र दिवस हमारे देश के इतिहास का वो दिन है, जिस दिन संविधान पूर्णरुपेण लागू किया गया था। देश की समस्त गतिविधियां इन संवैधानिक नियमों के आधार पर ही सुचारु ढंग से संचालित होती है। संविधान हमे जीने के तौर तरीके सीखाता है। एक सभ्य और कर्मठ राष्ट्र के सपने को साकार करता है हमारा संविधान। देश की गणतंत्रत को बनाये रखने हेतु प्रशासन के साथ साथ जनता का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। संविधान के नियम सबों के लिए बराबर होते है। वो किसी भी प्रकार के जातिभेद या वर्चस्व की भावना से ऊपर होता है। फिर भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विभिन्न प्रकार के संकट आज भी मुंहबाए खड़े हैं। अगर हम सिर्फ अपनी उन्नति के बारे में सोचते है तो ये हमारी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। हमे अपने देश और समाज के विषय में भी सोचने की जरूरत है। हमें ऐसे कार्यों की ओर स्वयं को अग्रसर करना है, जिनमें स्वयं के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति भी सम्मिलित हो। जैसे हमारा संविधान हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की समझ देता है। वैसे ही हमें भी देश के प्रति अपनी भावना परिलक्षित करनी चाहिए। युवावर्ग जो कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और उसके भविष्य का एकमात्र कार्यवाहक होता है।युवाओं की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता और कर्मठता ही राष्ट्र की अखण्डता रुपी महल के लिए ईंट का कार्य करते है। एक एक ईंट मिलकर ही एक विशाल महल का निर्माण करता है। आज जबकि हम इक्कीसवी सदी में कदम रख चुके है। तकनीक के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी अब बदल चुकी है। ऐसे समय में गणतंत्र दिवस को सिर्फ एक राष्ट्रीय दिवस अथवा एक दिन का उत्सव मान कर, टीवी के छोटे पर्दे पर झांकियां देख कर, नेताओं के भाषण सुन कर भुला देना और दूसरे दिन से यह भी याद न रखना कि हमारा कोई संविधान भी है, हमारा कोई गणतंत्र भी है जिसके प्रति हम उत्तरदायी हैं, यह हमारी नासमझी ही नहीं अपराध भी है।

हमारे गणतंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण अंग तंत्र है। लेकिन आजकल ऐसा लगता है जैसे तंत्र अनियंत्रित होता जा रहा है। उसे अपनी मनमानी करने से रोकने का दायित्व जिनका है कहीं कहीं तो वे खुद ही भ्रष्टाचार की मिसाल निकल आते हैं। तंत्र के इस कथन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज के दौर में सत्ता दल का राजनैतिक हस्तक्षेप प्रशासनिक अमले पर इतना अधिक रहता हैं कि वे चाहकर भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम नहीं कर सकते हैं। कोई भी जनप्रतिनिधि जब एक बार अपने राजनैतिक हित साधने के लिये तंत्र का उपयोग कर लेता हैं तो फिर गणतंत्र के मूल्यों में गिरावट आने लगती है। आर्थिक मुद्रास्फीति से कहीं अधिक घातक होती है नैतिकता की स्फीति।किसी भी समस्या को हल करने के लिये गण को तंत्र का साथ देने और तंत्र को त्वरित निराकरण के प्रयास करने आवश्यक होते हैं। आज महंगाई सबसे बड़ी समस्या हैं। हालांकि विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी, अंर्तराष्ट्रीय बाजार की उथल पुथल, नोटबंदी के बाद की आर्थिक स्थिति ने देश को भी हिला कर रख दिया है। लेकिन इतना कह देने मात्र से सरकार के कर्तव्यो की इतिश्री नहीं हो जाती है। और ना ही केन्द्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोपण़ करके बच सकतीं है। गण चुस्त और दुरुस्त रहें तथा तंत्र पूरी मुस्तैदी से देश के विकास और आम आदमी की खुशहाली के लिये संकल्पित हो, तभी देश एक बार फिर अपने स्वर्णिम मुकाम पर पहुंच सकेगा।
आज हम चारों ओर देख रहे हैं की बहुत सारे सरकारी कर्मचारी उन लोगों से घूस ले रहे हैं रिश्वत ले रहे हैं। क्या यही हम हमारे देश के प्रति कर्तव्य निभा रहे हैं । इसमें जिम्मेदार सिर्फ वह सरकारी आदमी नहीं है जिम्मेदार आम आदमी भी है रिश्वत लेने वाला और देने वाला भी जिम्मेदार है और रिश्वत देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है क्योंकि लोग अपना कर्तव्य भूल जाते हैं डॉक्टर, इंजीनियर या किसी भी विभाग के सरकारी कर्मचारी इस दूषित व्यवहार को अपनाते हैं और पूरे देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। विकास के पहिए ऐसे आचरण से ही बाधित हो जाते हैं। प्रश्न यह है कि सुरक्षा मामलों में भी भ्रष्टाचार के दाग़ जब उभर कर सामने आने लगे हैं तो यह मान ही लेना चाहिए कि हम अपने संवैधानिक उसूलों से भटक गए हैं। यदि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम खुले में शौचमुक्त देश बनाने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं तो विश्व के सक्षम राष्ट्रों से किस आधार पर अपनी तुलना कर सकते हैं? बहरहाल अब समय आ गया है कि हमें खुद को धोखा देने से रोकना होगा और सही मायने में खुद के लिए तय करना होगा कि हम अपने गणतंत्र के अनुरूप एक सही तथा अच्छे नागरिक कैसे साबित हो सकते हैं।
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Friday, January 16, 2026

शून्यकाल | आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल 
आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                                                                                      साहित्य में प्रेम का स्वरूप बड़े सुंदर ढंग से परिभाषित किया गया है। अलौकिक प्रेम की बात करे तो ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाय’ के माध्यम से अहं और ईश्वर दोनों का एक साथ प्रेम होना असंभव बताया गया है। वहीं लौकिक प्रेम में सादगी पर बल दिया जाता रहा है। लेकिन दोनों का आशय एक ही है। वैसे तेजी से बदलती जीवनशैली में कुछ घटनाओं को देख, सुन कर लगता है कि मानो समाज में प्रेम की भावना कम होती जा रही है। क्या सचमुच? या फिर प्रेम के प्रति समझ कम हो रही है?

    सूफ़ी संत रूमी से जुड़ा एक किस्सा है कि शिष्य ने अपने गुरु का द्वार खटखटाया। 
‘बाहर कौन है?’ गुरु ने पूछा।
‘मैं।’ शिष्य ने उत्तर दिया।
‘इस घर में मैं और तू एक साथ नहीं रह सकते।’ भीतर से गुरू की आवाज आई। 
दुखी होकर शिष्य जंगल में तप करने चला गया। साल भर बाद वह फिर लौटा। द्वार पर दस्तक दी। 
‘कौन है?’ फिर वही प्रश्न किया गुरु ने।
‘आप ही हैं।’ इस बार शिष्य ने जवाब दिया और द्वार खुल गया। 
संत रूमी कहते हैं- ‘प्रेम के मकान में सब एक-सी आत्माएं रहती हैं। बस प्रवेश करने से पहले मैं का चोला उतारना पड़ता है।’
यह ‘मैं’ का चोला यदि न उतारा जाए और दो के अस्तित्व को प्रेम में मिल कर एक न बनने दिया जाए तो प्रेम में विद्रूपता आए बिना नहीं रहती है। इसीलिए कबीर ने भी कहा है- ‘‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाय।
‘प्रेम’ एक जादुई शब्द है। कोई कहता है कि प्रेम एक अनभूति है तो कोई इसे भावनाओं का पाखण्ड मानता है। जितने मन, उतनी धारणाएं। मन में प्रेम का संचार होते ही एक ऐसा केन्द्र बिन्दु मिल जाता है जिस पर सारा ध्यान केन्द्रित हो कर रह जाता है। सोते-जागते, उठते-बैठते अपने प्रेम की उपस्थिति से बड़ी कोई उपस्थिति नहीं होती, अपने प्रेम से बढ़ कर कोई अनुभूति नहीं होती और अपने प्रेम से बढ़ कर कोई मूल्यवान वस्तु नहीं होती। निःसंदेह प्रेम एक निराकार भावना है किन्तु देह में प्रवेश करते ही यह आकार लेने लगती है। एक ऐसा आकार जिसमें स्त्री मात्र स्त्री हो जाती है और पुरुष मात्र पुरुष, फिर भी एकात्मा।
प्रश्न उठता है कि पृथ्वी गोल है इसलिए दो विपरीत ध्रुव टिके हुए हैं अथवा दो विपरीत ध्रुव़ों के होने से पृथ्वी अस्तित्व में है? ठीक इसी तरह प्रश्न जागता है कि प्रेम का अस्तित्व देह से है या देह का अस्तित्व प्रेम से? कोई भी व्यक्ति अपनी देह को उसी समय निहारता है जब वह किसी के प्रेम में पड़ता है अथवा प्रेम में पड़ने का इच्छुक हो उठता है। वह अपनी देह का आकलन करने लगता और उसे सजाने-संवारने लगता है। या फिर प्रेम के वशीभूत वह अपनी या पराई देह पर ध्यान देता है। प्रेम में पड़ कर पक्षी भी अपने परों को संवारने लगते हैं। बड़ी उलझी हुई भावना है प्रेम। इस भावना को लौकिक और अलौकिक के खेमे में बांट कर देखने से सामाजिक दबाव कम होता हुआ अनुभव होता है। इसीलिए कबीर बड़ी सहजत से ये कह पाते हैंकि -
‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, हुआ न पंडित कोय। 
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।’

प्रेम कोई पोथी तो नहीं जिसे पढ़ा जा सके, फिर प्रेम को कैसे पढ़ा जा सकता है? यदि प्रेम को पढ़ा नहीं जा सकता, बूझा नहीं जा सकता तो समझा कैसे जाएगा? तो क्या प्रेम सोचने का भी अवसर देता है? कहा तो यही जाता है कि प्रेम सोच-समझ कर नहीं किया जाता है। यदि सोच-समझ को प्रेम के साथ जोड़ दिया जाए तो लाभ-हानि का गणित भी साथ-साथ चलने लगता है। बहरहाल सच्चाई तो यही है कि प्रेम बदले में प्रेम ही चाहता है और इस प्रेम में कोई छोटा या बड़ा हो ही नहीं सकता है। जहां छोटे या बड़े की बात आती है, वहीं प्रेम का धागा चटकने लगता है। ‘‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।’’ प्रेम सरलता, सहजता और स्निग्धता चाहता है, अहम की गांठ नहीं। इसीलिए जब प्रेम किसी सामाजिक संबंध में ढल जाता है तो प्रेम करने वाले दो व्यक्तियों का पद स्वतः तय हो जाता है।

हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि ‘‘प्रेेम एक  संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’’ 

क्या सचमुच परिधि नहीं होती प्रेम की? यदि प्रेम की परिधि नहीं होती है तो सामाजिक संबंधों में बंधते ही प्रेम सीमित क्यों होने लगता है?

प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘‘मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’’

प्रेम की परिभाषा बहुत कठिन है क्योंकि इसका सम्बन्ध अक्सर आसक्ति (वासना) से जोड़ दिया जाता है जो कि बिल्कुल अलग चीज है। जबकि प्रेम का अर्थ, एक साथ महसूस की जाने वाली उन सभी भावनाओं से जुड़ा है, जो मजबूत लगाव, सम्मान, घनिष्ठता, आकर्षण और मोह से सम्बन्धित हैं। प्रेम होने पर परवाह करने और सुरक्षा प्रदान करने की गहरी भावना व्यक्ति के मन में सदैव बनी रहती है। प्रेम वह अहसास है जो लम्बे समय तक साथ देता है और एक लहर की तरह आकर चला नहीं जाता। इसके विपरीत आसक्ति में व्यक्ति  पर प्रबल इच्छाएं या लगाव की भावनाएं हावी हो जाती हैं। यह एक अविवेकी भावना है जिसका कोई आधार नहीं होता और यह थोड़े समय के लिए ही कायम रहती है लेकिन यह बहुत सघन, तीव्र होती है अक्सर जुनून की तरह होती है। प्रेम वह अनुभूति है, जिससे मन-मस्तिष्क में कोमल भावनाएं जागती हैं, नई ऊर्जा मिलती है व जीवन में मीठी यादों की ताजगी का समावेश हो जाता है।  

प्रेम का मार्ग कठिन होता है। प्रेम मार्ग में अनेक बाधाएं होती हैं। मीरा को भी विषपान करना पड़ा था। तभी तो  जिगर मुरादाबादी कहते हैं-
ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। 
प्रेम बलपूर्वक नहीं पाया जा सकता। दो व्यक्तियों में से कोई एक यह सोचे कि चूंकि मैं फलां से प्रेम करता हूं तो फलां को भी मुझसे प्रेम करना चाहिए, तो यह सबसे बड़ी भूल है। प्रेम कोई ‘एक्सचेंज़ ऑफर’ जैसा व्यवहार नहीं है कि आपने कुछ दिया है तो उसके बदले आप कुछ पाने के अधिकारी बन गए। यदि आपका प्रेम पात्र भी आपसे प्रेम करता होगा तो वह स्वतः प्रेरणा से प्रेम के बदले प्रेम देगा, अन्यथा आपको कुछ नहीं मिलेगा। बलात् पाने की चाह कामवासना हो सकती है प्रेम नहीं। वहीं, दो प्रेमियों के बीच कामवासना प्रेम का अंश हो सकती है सम्पूर्ण प्रेम नहीं। यदि प्रेम स्वयं ही अपूर्ण है तो वह प्रसन्नता, आह्ल्लाद कैसे देगा? वह दुख देगा, खिझाएगा और निरन्तर हठधर्मी बनाता चला जाएगा। प्रेम की इसी विचित्रता को रसखान ने इन शब्दों में लिखा है -
प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।
या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल।। 
आज के इस आधुनिक युग में भले ही लोग कहें कि प्रेम के मायने बदल गए हैं, लेकिन सच यही है कि सच्चे प्रेम का स्वरूप बदला नहीं है, वह जैसा सूर, कबीर और रसखान के समय था वैसा ही आज भी है, बस जरूरत है इसे समझने और याद रखने की। 
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Friday, January 9, 2026

शून्यकाल | बढ़ता जलवायु परिवर्तन, घटते वन्यजीव और हमारे प्रयास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
बढ़ता जलवायु परिवर्तन, घटते वन्यजीव और हमारे प्रयास
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

चाहे हम इसके लिए कटते जंगलों को दोष दें या बढ़ते शहरों को, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि हमारी गलतियों और लापरवाही की वजह से मौसम तेज़ी से बदल रहा है और इस बदलाव का असर वन्यजीवों पर पड़ा है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बढ़ रहा है, वन्यजीव कम होते जा रहे हैं। जिसके डरावने आंकड़े अब हमारे सामने आ रहे हैं। इसलिए अब हमारे पास एकमात्र विकल्प यही है कि हम जलवायु को सुधारें और वन्यजीवों को बचाएं, अभी नहीं तो कभी नहीं। याद रखें कि चीते पहले भारत में भी पाए जाते थे लेकिन अत्यधिक शिकार और आवास विनाश के कारण उन्हें 1947 में आखिरी बार देखा गया और 1952 में भारत से आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित किया गया।
हमने कहानियाँ पढ़ी हैं
शेरों, भालुओं और सियार की
अपने बचपन में,
हमने उन्हें शहर के चिड़ियाघरों में देखा है।
बहुत से जानवरों को देखा है
जो अब खत्म हो चुके हैं, उनकी तस्वीरों में।
क्या यह बायोलॉजिकल विरोधाभास नहीं है कि-
एक तरफ हमारे वैज्ञानिक
इस धरती पर
डायनासोर को वापस लाना चाहते हैं,
जबकि हम
मौजूद शेर, बाघ, तेंदुए
और काले हिरणों को बचाने में नाकाम रहे हैं।
तो कैसा होगा
हमारे भविष्य का वन्यजीवन
मौत से खाली
या जीवन से भरा?

यह सिर्फ़ मेरी कविता नहीं, बल्कि मेरा ध्यान भटकाने वाली बात है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन कई जंगली प्रजातियों के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा बनकर उभरा है, जिसके कारण जंगली जानवरों की कई प्रजातियों की संख्या कम हो रही है और कुछ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। हालाँकि, जलवायु परिवर्तन पक्षियों और स्तनधारियों दोनों के माइग्रेशन पैटर्न को बाधित कर सकता है और महत्वपूर्ण आवास को सिकोड़ सकता है। धीमी प्रजनन दर भी प्राइमेट्स और हाथियों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति संवेदनशील बनाती है। जलवायु परिवर्तन ने वन्यजीवों के लिए कई खतरे पैदा किए हैं। बढ़ते तापमान से कई प्रजातियों के जीवित रहने की दर कम हो जाती है, जिससे भोजन की कमी, कम सफल प्रजनन और स्थानीय वन्यजीवों के लिए पर्यावरण में हस्तक्षेप होता है। नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की खतरे में पड़ी प्रजातियों की रेड लिस्ट में शामिल 47 प्रतिशत स्तनधारी और 23 प्रतिशत पक्षी जलवायु परिवर्तन से नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया, इटली और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं की एक टीम ने 130 अध्ययनों का अध्ययन किया, जिसमें यह दस्तावेज़ किया गया था कि कोई प्रजाति जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुई है या नहीं। यह 1990 और 2015 के बीच प्रकाशित हुआ था, जिसका मतलब है कि यह पुराना डेटा है, लेकिन आज के लिए चेतावनी देने के लिए काफी है।
मानवजनित या प्राकृतिक परिस्थितियाँ वन्यजीवों को इंसानों पर हमला करने के लिए मजबूर करती हैं। जब जंगल बहुतायत में थे, तो इंसान और वन्यजीव दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में सुरक्षित रहते थे, लेकिन समय बदला और आबादी भी बढ़ी, तो जंगलों का अंधाधुंध विनाश शुरू हो गया। इसके परिणामस्वरूप इंसानों और वन्यजीवों के बीच कभी न खत्म होने वाले संघर्षों की एक श्रृंखला शुरू हो गई। इंसान अपनी कई ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों का शोषण कर रहा है, जिसके कारण इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएँ सामने आ रही हैं। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन ने भी वन्यजीवों को प्रभावित किया है या यह कहना गलत नहीं होगा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा असर वन्यजीवों पर पड़ा है। वन्यजीवों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण, उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाता है, जिसके कारण वन्यजीव मानव बस्तियों में चले जाते हैं और इससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। कोरोना काल के लॉकडाउन के दौरान, मुंबई के गोरेगांव इलाके में एक रिहायशी कॉलोनी की सुबह एक तेंदुआ बेखौफ घूमता हुआ देखा गया। तेंदुआ बिल्डिंग के पार्किंग एरिया के पास बेखौफ घूम रहा था। दरअसल, सुबह-सुबह सड़कों पर ज़्यादा लोग नहीं होते हैं। ऐसे में तेंदुआ बहुत आराम से घूमता हुआ देखा गया। यह अकेली घटना नहीं थी। ऐसी कई घटनाएँ सामने आती रहती हैं जब खूंखार जंगली जानवर इंसानी बस्तियों में घुस जाते हैं। तेंदुओं का इंसानी बस्तियों में घूमना आम बात नहीं है। जंगली जानवर इंसानों से दूर रहना पसंद करते हैं। असल में, जंगली जानवरों के अपने इलाके से बाहर निकलने के कारण भी वही हैं जो जलवायु में तेज़ी से बदलाव ला रहे हैं। इसका मतलब है जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई और वन्यजीवों के रहने की जगह का सिकुड़ना। अपने छोटे से इलाके में पर्याप्त खाना और घूमने की जगह न मिलने के कारण, जंगली जानवर इंसानी बस्तियों की तरफ आने लगते हैं। जहाँ का माहौल अशांत और प्रदूषित होता है, वह उन्हें मानसिक रूप से आक्रामक बना देता है। इस तरह, जंगली जानवरों के व्यवहार में बदलाव कभी-कभी उनकी जान को खतरे में डाल देता है।
पूरी दुनिया की तरह भारत में भी जंगली जानवरों पर संकट गहराता जा रहा है। उदाहरण के लिए, राजस्थान का रेगिस्तानी इलाका सदियों से सूखा रहा है, लेकिन अब यहां बाढ़ की वजह से जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। बाढ़ के कारण पश्चिमी इलाकों में कई ऐसे इलाके हैं, जहां पहले बड़ी संख्या में काले हिरण पाए जाते थे। आज वे इलाके बाढ़ की वजह से दलदली हो गए हैं। इस वजह से काले हिरणों को इधर-उधर घूमने में दिक्कत होने लगी है। और कई इन दलदली इलाकों में फंसकर मर जाते हैं। इतना ही नहीं, पहले इन इलाकों में गर्मियां सूखी होती थीं और आज स्थिति यह है कि इन इलाकों में बहुत ज़्यादा नमी है। यह मौसम काले हिरणों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है। हिरणों की संख्या में कमी इस बात का काफी संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यहां के पर्यावरण में तेज़ी से बदलाव आया है। वन विभाग के 2022 के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 2002 की वन्यजीव जनगणना की तुलना में पश्चिमी राजस्थान के सभी पांच जिलों में उनकी संख्या आधी भी नहीं रह गई । दो दशक पहले तक यहां 4,237 काले हिरण पाए जाते थे, लेकिन इस साल की जनगणना के अनुसार, इस इलाके में सिर्फ़ 2,346 हिरण बचे हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि हिरणों की संख्या में कमी का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है।

चीते पहले भारत में पाए जाते थे और उनका एक लंबा इतिहास है, लेकिन अत्यधिक शिकार और आवास विनाश के कारण उन्हें 1947 में आखिरी बार देखा गया और 1952 में भारत से आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित कर दिया गया था। इसलिए, जब हम अपनी वाइल्डलाइफ को बेहतर बनाने के लिए विदेशों से चीते जैसे जंगली जानवर लाए हैं, तो उसी समय हमें उन कारणों को खत्म करने पर भी ध्यान देना होगा जिनकी वजह से क्लाइमेट बदल रहा है और जंगली जानवरों की ज़िंदगी खतरे में पड़ रही है।
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Friday, January 2, 2026

शून्यकाल | नए साल में कुछ लक्ष्य तय करें सिर्फ़ अपने नहीं, पूरी दुनिया के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
नए साल में कुछ लक्ष्य तय करें सिर्फ़ अपने नहीं, पूरी दुनिया के लिए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हर नए साल में हम अपने व्यक्तिगत लक्ष्य तय करते हैं। इस बार निजी लक्ष्यों के साथ ऐसे लक्ष्य भी तय करें जिनसे हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी एक अच्छा वातावरण मिले। हम जानते हैं कि आजकल क्लाइमेट चेंज सबसे चिंताजनक विषय है। मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव अब हमें मौसम में बदलाव के रूप में दिखाई दे रहे हैं। कहीं सूखा पड़ रहा है, कहीं बाढ़ आ रही है, कहीं जंगल में आग लग रही है या सुनामी आ रही है, और कई गंभीर नतीजे सामने आ रहे हैं। लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। पूरी दुनिया इस दिशा में कोशिश कर रही है। अगर हम भी नए साल में कुछ ऐसे लक्ष्य तय करें जिनसे क्लाइमेट चेंज की रफ्तार धीमी हो सके, तो यह हमारे भविष्य और हमारी धरती के लिए अच्छा होगा। तो आइए कुछ ऐसे लक्ष्य तय करें जिन्हें हम अपनी रोजाना की जिंदगी में अपना सकें और उन्हें आसानी से हासिल कर सकें।
     
      इस समय कड़ाके की ठंड पड़ रही है। नए साल के शुरू में हर बार कड़ाके की ठंड पड़ती है। पड़नी भी चाहिए। यह जलवायु के लिए अच्छा संकेत होता है किन्तु इसके बाद अगर भीषण गर्मी पड़ जाए तो स्थिति चिंताजनक हो उठती है। आमतौर पर हम मौसम के अनुरूप अपने लिए व्यवस्थाएं कर के निश्चिंत हो जाते हैं और मौसम का सामना कर लेते हैं लेकिन हमें मौसम के उस बदलाव को भी ध्यान से देखना चाहिए जो जलवायु परिवर्तन के यप में हमारे सामने आ रहा है। जाने-माने वैज्ञानिकों के अनुसार, 2027 में दुनिया एक और रिकॉर्ड तोड़ गर्म साल देख सकती है, क्योंकि उत्सर्जन में वृद्धि और अल नीनो जैसे तूफानों से मौसम की घटना के प्रभाव के कारण वैश्विक तापमान लगातार बढ़ रहा है, जो सर्दियों में चरम पर होता है और वैश्विक औसत तापमान को अपने चरम पर पहुंचाता है। इसका असर इस साल यानी 2026 में भी दिख सकता है क्योंकि हम विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई कर रहे हैं, जलाशयों को सुखा रहे हैं और सूर्य के ताप को सोख कर वातावरण गर्म करने वाले कांक्रीट की बस्तियां बसाते जा रहे हैं। जो हवा है वह प्रदूषित है, पानी प्रदूषित है और भूमि बंजर होती जा रही है। मुट्ठी भर खेती से अरबों लोगों का पेट नहीं भरा जा सकता है। हम विकल्प के रूप में कम पानी में पैदा होने मोटे अनाज को चुन रहे हैं लेकिन वह भी कब तक साथ देगा? अपना भविष्य हमें ही सोचना होगा। 
वस्तुतः वैश्विक जलवायु प्रणाली 5 भागों से बनी है- वायुमंडल, स्थलमंडल, जलमंडल, क्रायोस्फीयर और जीवमंडल। वैश्विक जलवायु कई कारकों से प्रभावित होती है, जिसमें सूर्य, सूर्य के सापेक्ष अंतरिक्ष में पृथ्वी की स्थिति, और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसे मानव निर्मित कारक शामिल हैं। पेरिस समझौते में बताए गए अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न रखने के लिए, 2030 तक उत्सर्जन को 45ः कम करने और 2050 तक नेट जीरो तक पहुंचने की जरूरत है। जबकि आज जीवित मनुष्यों के समय के पैमाने पर पृथ्वी की जलवायु पर मानवीय गतिविधियों के प्रभाव अपरिवर्तनीय हैं, भविष्य में तापमान में होने वाली हर थोड़ी सी वृद्धि से कम गर्मी होती है जो अन्यथा हमेशा के लिए बनी रहेगी। इसलिए क्लाइमेट प्लेज 2040 तक नेट-जीरो कार्बन तक पहुंचने की प्रतिबद्धता है।
ये प्रयास बहुत बड़े पैमाने के लगते हैं, लेकिन असल में हमारे छोटे-छोटे व्यक्तिगत प्रयास इन्हें लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वह कैसे? आइए देखें।
सबसे पहले हमें प्लास्टिक बैग और बोतलों का इस्तेमाल करने से मना करना चाहिए। असल में, प्लास्टिक का इस्तेमाल हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है और इस हानिकारक हिस्से से छुटकारा पाने के लिए हमें अपनी आदतें बदलनी होंगी। प्लास्टिक सस्ता और टिकाऊ है और इसने मानवीय गतिविधियों में क्रांति ला दी है। आधुनिक जीवन इस बहुमुखी पदार्थ का आदी और निर्भर है, जो कंप्यूटर से लेकर चिकित्सा उपकरणों से लेकर खाद्य पैकेजिंग तक हर चीज में पाया जाता है। दुर्भाग्य से, अनुमान है कि हर साल 8.5 मिलियन मीट्रिक टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा हमारे महासागरों में फेंका जाता है। समुद्र वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर हम इसी तरह समुद्र में प्लास्टिक कचरा फेंकते रहे, तो 2050 तक महासागरों में वजन के हिसाब से मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होगा। यह समुद्री जीवन के लिए हानिकारक होगा। खासकर मूंगा चट्टानों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। सवाल यह उठता है कि समुद्र के पास जाए बिना, हम उसे प्लास्टिक कचरे से कैसे भर रहे हैं? इसका सीधा सा जवाब है कि हम सीधे तौर पर ऐसा नहीं कर रहे हैं, बल्कि कचरा फेंकने वाले हमारे द्वारा फेंके गए कचरे को नदियों, तालाबों और महासागरों में अवैध रूप से फेंक रहे हैं, जिसका निपटान नहीं किया जा सकता। प्लास्टिक कचरे से न सिर्फ पानी में बल्कि जमीन पर भी प्रदूषण होता है, जिसका असर मौसम पर पड़ रहा है। यही वजह है कि अब मौसम का पैटर्न पहले जैसा नहीं रहा। पिछले साल 2025 में गर्मी फरवरी महीने में ही शुरू हो गई थी। मौसम जितनी तेजी से अपना पैटर्न बदल रहा है, उतनी तेजी से हम इसे ठीक नहीं कर सकते। हालांकि, अगर हम अपनी लाइफस्टाइल को इको-फ्रेंडली बनाएं तो इस बदलाव की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। हमें उन चीजों का इस्तेमाल कम करना चाहिए जो मौसम को नुकसान पहुंचा रही हैं। इस दिशा में प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना सबसे जरूरी कदम होगा। बेशक, हमने प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने की कोशिश शुरू कर दी है, लेकिन इसकी रफ्तार धीमी है। हमें अपनी कोशिशों को तेज करना होगा ताकि प्लास्टिक कचरे से होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके।
खाने से होने वाला प्रदूषण भी क्लाइमेट पर बुरा असर डाल रहा है। हमारा खाना ही हमारा दुश्मन बनता जा रहा है। खाने से होने वाले प्रदूषण को कैसे कम किया जा सकता है? सच तो यह है कि फूड सेक्टर से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए प्रोड्यूसर से लेकर कंज्यूमर तक, सभी स्टेज पर बदलाव की जरूरत है। अपनी डाइट में ज्यादा से ज्यादा शाकाहारी खाना शामिल करके हम ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को काफी कम कर सकते हैं। ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली चीजों - जैसे मांस और डेयरी प्रोडक्ट्स जैसे मक्खन, दूध, पनीर, मांस, नारियल तेल और पाम तेल - के बजाय कम प्रदूषण फैलाने वाली चीजों - जैसे बीन्स, छोले, दालें, मेवे और अनाज - का ज्यादा सेवन करें। अपनी खाने की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके हम अपने पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को काफी कम कर सकते हैं। यह बदलाव हर लिहाज से सेहत और क्लाइमेट दोनों के लिए फायदेमंद होगा। पिछले दशक में, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित पश्चिमी देशों में शाकाहारी बनने का चलन बढ़ा है। इसके पीछे कोई धार्मिक कारण नहीं है, बल्कि कार्बन फुटप्रिंट कम करने की इच्छा है। इसीलिए, जो लोग पीढ़ियों से मांस खा रहे थे, वे भी वीगन बन रहे हैं। ऐसे प्रयास क्लाइमेट में कार्बन फुटप्रिंट कम करने की दिशा में बहुत मायने रखते हैं। इसलिए, हमें भी अपने खाने के व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए ताकि हम भी कम से कम कार्बन फुटप्रिंट छोड़ें।
हमें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में प्रदूषण कम करने के लिए कदम उठाने चाहिए। यह कैसे मुमकिन है? कोई बड़ी बात नहीं, बस कुछ कदम उठाकर प्रदूषण कम किया जा सकता है। प्रदूषण कम करने के सबसे अच्छे तरीके हैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना, इस्तेमाल न होने पर लाइट बंद करना, रीसायकल और दोबारा इस्तेमाल करना, प्लास्टिक बैग को श्नाश् कहना, जंगल की आग और धूम्रपान कम करना, एयर कंडीशनर के बजाय पंखे का इस्तेमाल करना, हवा, पानी, सौर, थर्मल, बायोमास ऊर्जा जैसी रिन्यूएबल एनर्जी को प्राथमिकता देना। याद रखें कि हर इंसान को सांस लेने के लिए शुद्ध हवा चाहिए और हर कोई एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता। इसीलिए हवा को साफ रखना जरूरी है! हर इंसान को पीने के लिए शुद्ध पानी चाहिए और हर कोई वॉटर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता। इसीलिए पानी को साफ रखना जरूरी है! इसलिए, यह जरूरी है कि हम प्रदूषण के खिलाफ अपनी आदतें बदलें और रोजमर्रा की जिंदगी में साफ-सफाई अपनाएं। इन लक्ष्यों को अपनाकर और पूरा करके ही हम क्लाइमेट चेंज की गति को धीमा कर सकते हैं, और इस तरह अपने भविष्य और अपने ग्रह को एक स्वस्थ क्लाइमेट दे सकते हैं। अगर हम संक्षेप में देखें, तो नए साल के लिए हमारे लक्ष्य ये होने चाहिए - प्रदूषण-मुक्त, फॉसिल फ्यूल के इस्तेमाल में जितनी हो सके उतनी कमी, हमारी खाने की आदतों में हेल्दी बदलाव, जंगलों और हरियाली की रक्षा करना, प्रकृति से प्यार करना और अपनी जरूरतों को कम करना ताकि हम अपना कार्बन फुटप्रिंट कम कर सकें। पानी बचाना भी जरूरी है। यह बहुत जरूरी है। सिर्फ इन लक्ष्यों को अपनाकर और पूरा करके ही हम क्लाइमेट चेंज की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं, और इस तरह अपने भविष्य और अपने ग्रह को एक हेल्दी माहौल दे सकते हैं। क्या हम इन लक्ष्यों को पूरा नहीं कर सकते हैं इस नए साल में? 
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Friday, December 26, 2025

शून्यकाल | ‘सम्मान’ का बदलता हुआ समाजशास्त्र | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
‘सम्मान’ का बदलता हुआ समाजशास्त्र
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

      सम्मान पाना, सम्मानित होना सभी को अच्छा लगता है क्योंकि यह उसके अच्छे कार्यों की सामाजिक स्वीकृति की घोषणा होती है। लेकिन स्वयं सम्मान का समाजशास्त्र विगत एक डेढ़ दशक में बदल चुका है। आरोप लगते हैं कि सम्मान खरीदे गए, सम्मान उत्कोच के रूप में दिए गए, भाई-भतीजावाद अपनाया गया  आदि- आदि। कुछ सम्मान को असम्मान की दृष्टि से देखते हुए लौटा भी देते हैं। इन दोनों श्रेणियों की गहराई में जाना विशद विषय है। चूंकि मैंने साहित्य में वाद अथवा खेमे को नई अपनाया अतः सभी से मेरा कुछ न कुछ संवाद रहा। वर्तमान में तो सोशल मीडिया के सौजन्य से सम्मानों की बाढ़ आई हुई है। अक्तूबर - दिसम्बर, 2015 के ‘‘सामायिक सरस्वती’’ के संपादकीय में मैंने बतौर कार्यकारी संपादक सम्मान के बदलते समाजशास्त्र पर टिप्पणी की थी, उसका कुछ अंश इस लेख में शामिल है। पढ़िए और विचार कीजिए कि ‘सम्मान’ आखिर है क्या?
     ‘सम्मान’... मात्र एक शब्द नहीं  अपितु सामूहिक भावनाओं की ऐसी अदरांजलि है जो किसी व्यक्ति को उसके कृतित्व के लिए अर्पित की जाती है। व्यक्ति सिर्फ़ माध्यम होता है और कृतित्व अथवा कर्म उसका मूल..., इसीलिए जब कोई व्यक्ति अपने सम्मान को लौटाता है तो उसके तारतम्य में स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न उठ खड़े होते हैं। उचित-अनुचित का गाढ़ा चिन्तन उफनती  नदी के जल के समान बह निकलता है। जहां विचार हैं वहां चिन्तन भी होगा और जहां चिन्तन है वहां विचार भी होंगे। वाद-विवाद स्वस्थ सांस्कृतिक परिदृश्य का द्योतक होता है। जहां वाद-विवाद न हो तो वहां यदि कुछ हो सकता है तो सिर्फ़ तानाशाही। भारतीय लोकतंत्र में उचित और अनुचित को मापने की जितनी मुखर स्वतंत्रता है, उतनी विश्व के किसी और देश में नहीं। अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता भारतीय संविधान की सबसे प्रमुख विशेषता है किन्तु यही विशेषता इस बात का भी आग्रह करती है कि आवेश में आ कर कोई भारतीय नागरिक स्वतंत्रता का इस तरह भी उपभोग न करने लगे कि जिससे वैश्विक पटल पर देश अपमानित होने लगे। व्यक्ति जिस देश में जन्म लेता है उस देश की यदि सुख-सुविधा और संस्कृति उसे विरासत में मिलती है तो उस देश के दुख, कष्ट और विसंगतियां भी उस व्यक्ति के हिस्से आती हैं, जिन्हें स्वीकार करते हुए उन्हें दूर करने अथवा दुरुस्त करने के रास्ते निकालना भी उस व्यक्ति का नागरिक कत्र्तव्य होता है। जिस तरह जन्मदात्री मां का कोई विकल्प (क्लोन) नहीं हो सकता, उसी तरह अपनी मातृभूमि का भी कोई विकल्प अथवा क्लोन नहीं हो सकता है। इसीलिए समस्याओं से घबराकर पलायन के विचारों को मन में प्रश्रय क्यों दिया जाए? अडिग रह कर ही समस्याओं का हल ढूंढा जा सकता है, विचलित हो कर नहीं। बहरहाल, ‘सम्मान’ अर्जन का भाव है विसर्जन का नहीं। इस संदर्भ में रहीम का यह दोहा याद आ रहा है-
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून।    
पानी गए न  उबरै  मोती,  मानुष चून।।

इलेक्ट्रानिक माध्यम ने साहित्य का बहुत भला किया है, वहीं कुछ न होने योग्य भी हो रहा है। सोशल मीडिया की अनेक शाखाएं फल-फूल रही हैं। उनमें नए साहित्यकारों एवं नूतन साहित्य की बाढ़ आई हुई है। जैसाकि बाढ़ का पानी अपने साथ सब कुछ बहा लाता है-अच्छी रेत, उपजाऊ मिट्टी घातक मलबा और विषैले तत्व भी। उपजाऊ मिट्टी खेती को हरा-भरा कर देती है किन्तु विषैली वस्तुएं अथवा मलबा खड़ी फसल को भी मिटा देते हैं। जिन खेमों के लिए मूर्धन्य साहित्यकार आपस में परस्पर एक-दूसरे को कोसते रहे, उन्हीं खेमों के असंख्य छोटे-छोटे रूप उग आए हैं। अनेक मठाधीश नवोदितों को साहित्य के पहाड़े सिखा और पढ़ा रहे हैं किन्तु अपने हिसाब से। जहां तक सम्मान का प्रश्न है तो इनमें कागज और छपाई का भी व्यय नहीं है, समारोह का खर्चे का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। सुबह रचना पटल पर आती है और शाम तक एक सम्मानपत्र पटल पर चमचमाने लगता है। लुभावना परिदृश्य है। यह परिदृश्य साहित्य का कितना भला कर रहा है यह तो सभी जानते हैं। जब सम्मान और त्वरित ख्याति की भूख सृजन पर हावी होने लगे साहित्य किसी चौराहे पर उधार का बच्चा गोद में लिए भीख मांगती भिखारिन की भांति दिखाई देने लगता है। 

        जो कल था वह आज भी हो, यह आवश्यक नहीं है। यह भी आवश्यक नहीं है कि जो आज है वह आगामी कल में भी रहेगा। फिर भी कुछ होने का भाव, कुछ खोने के भाव को भी अपने साथ ले कर आता है। जैसा कि एस. आर. हरनोट ने अपनी कहानी ‘लिटन ब्लाॅक गिर रहा है’ के कथानक की विषय-भूमि में पाया कि लार्ड लिटन के नाम पर शिमला में बनाया गया लिटन ब्लाॅक भवन  अपने निर्माण के लगभग सौ वर्ष से भी अधिक समय के बाद जर्जर हो गया और जब उसे वर्ष 2010 में उसे गिराया गया तो ऐसा लगा गोया एक युग ढह गया। एक निर्जीव इमारत के प्रति इतनी संवेदना कि उसके ढहने पर युग ढहने जैसा महसूस हो, वस्तुतः यही तो वह मानवीय चेतना है जो अन्य प्राणियों से मनुष्य को श्रेष्ठ सिद्ध करती है। समय, मूल्य अथवा व्यक्ति किसी को भी खो देना मानवीय चेतना के लिए सबसे बड़ी पीड़ा का विषय होता है। 
भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो विपरीत धुरी की तरह स्थापित रहे हैं। बेशक दोनों के विचारमूल्यों में हमेशा टकराव होता रहा है किन्तु राष्ट्रवाद का मुद्दा दोनों के लिए समान रूप से सर्वोपरि रहा है। देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को परिस्थितिजन्य अनेक लांछन सहने पड़े, फिर भी उसकी साख मिटी नहीं। आखिर ऐसा क्या विशेष है संघ के वैचारिक मूल में? इसी प्रश्न के उत्तर को सामने रखता हुआ सामयिक सरस्वती के अक्टूबर-दिसम्बर 2015 के अंक में राकेश सिन्हा के लेख ‘संघ विमर्श का यथार्थ’ ने चिन्तन के नए कपाट खोल दिए थे। विचारों का सम्मान अजेय होता है और हमेशा अजेय रहेगा।  

     स्मृतियों के पिटारे से एक स्मृति साझा कर रही हूं - 06 नवम्बर से 08 नवम्बर 2015 तक चंडीगढ़ में चंडीगढ़ लिटरेरी सोसायटी द्वारा तीन दिवसीय लिटरेरी फेस्टविल आयोजित किया गया। कुल सोलह सत्र वैचारिक चर्चाओं की सोलह कलाओं की तरह रोचक एवं स्वतःस्फूर्त्त। नयनतारा सहगल, तवलीन सिंह, लीला सेठ, गुल पनाग, पायल धर, नीलांजन मुखोपाध्याय, सोहेला कपूर, अशोक वाजपेयी, सुधीर मिश्र, माधव कौशिक, सगुना जैन आदि लेखकों, रंगकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के साथ अनुभव साझा करना मेरे लिए एक सुखद एवं अविस्मरणीय अनुभव रहा। अहिन्दी भाषी क्षेत्र में मेरे हिन्दी उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ के पाठकों की रुचि ने मुझे चकित कर दिया। वहां पहुंच कर मुझे विश्वास हो गया कि साहित्य विभिन्न भाषाओं के बीच एक बेहतर सेतु का काम कर सकता है। इस लेटरेरी फेस्टिवल से जुड़ा एक तथ्य और है जिसका उल्लेख करना मैं आवश्यक समझती हूं कि इस फेस्ट को आयोजित करने से लेकर इसे सफल बनाने में प्रमुख रूप से महिलाओं का योगदान रहा। फेस्ट की निदेशक थीं सुमिता मिश्रा। जो स्वयं एक अच्छी कवयित्री एवं सफल प्रशासिका रही हैं। सुपर्णा सरस्वती पुरी, हरलीन शेखों, सिमरन ग्रेवाल, पुनीत कपूर की सुव्यवस्था एवं आत्मीयता ने मन को छू लिया। विविध देश, विविध प्रांत विविध भाषाएं, विविध विषय और विविध विधाएं, कुल मिला कर यह आयोजन एक साहित्यिक कुंभ के समान था। वहां कोई विवाद नहीं था। साहित्य था और सिर्फ़ साहित्य। सम्मान था तो प्रत्येक साहित्यकार का परस्पर एक-दूसरे के प्रति।
और अंत में, तमाम विवादों को परे  धकेलते हुए -
शिराओं में बहती आकांक्षाएं
आंखों में तैरते सपने
होंठों पर थिरकती ध्वनियां
मुझे बनने दो धरती, हवा और बादल
बनाने दो आकृतियां अपनी देह से
उगाने दो आत्म-स्वरों की नई फसलें
तमाम बंधनों से परे
तमाम पिंजरों से बाहर
तमाम संबंधों से इतर
हो कर उन्मुक्त.... 
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Friday, December 19, 2025

शून्यकाल | क्यों नहीं देख पा रहे हैं कोकून के बाहर फैला अनंत प्रकाश | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | क्यों नहीं देख पा रहे हैं कोकून के बाहर फैला अनंत प्रकाश | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल
क्यों नहीं देख पा रहे हैं कोकून के बाहर फैला अनंत प्रकाश
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

       हम जिस ओर बढ़ रहे हैं वह चिंता जनक है। विश्व धार्मिक कट्टरपंथियों से घबराया रहता है। वहीं यदि सारी कट्टरता मिटा दी जाए तो मानवता का प्रकाश जगमगाता मिलेगा। रेशम का कीड़ा रेशम से अपना घर यानी कोकून गढ़ता है और उसी के भीतर जीवन बिताता है उसे पता ही नहीं चलता कि कोकून के बाहर अनंत प्रकाश है। कहीं हम खुद को अनंत सुविधाओं के रेशम में खुद को लपेटते जा रहे हैं, मानवता के प्रकाश को भुलाते हुए? दरअसल ये लेख है "सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के अक्टूबर-दिसम्बर 2017 अंक में प्रकाशित बतौर कार्यकारी संपादक मेरे संपादकीय का अंश। क्या तब से अब तक में कुछ बदला?... यदि बदला तो क्या और कितना?


आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ
है कहां वह आग जो मुझको जलाए
है कहां वह ज्वाल मेरे पास आए
रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ,
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ
       - हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तियां दशकों बाद भी आह्वान करती हैं उस दीपक को जलाने का जिसके अभाव में सकल मानवता अपने भविष्य के प्रति बड़ा-सा प्रश्नचिन्ह उठाए खड़ी है। यह प्रश्न चिन्ह उस पृथ्वी से भी भारी है जिसे कच्छप अपनी पीठ पर ढो रहा है अथवा उससे भी अधिक भारी जिसे हर्लक्युलिस अपने कांधे पर उठाए हुए है। यह प्रश्नचिन्ह आकार ही न ले पाता यदि हम सजग होते कि कब संवेदनाओं का तेल हमारे हदय के दिए से कम होने लगा और बाती शुष्क हो चली है। यदि हमारा व्यवहार किसी अनार्की की तरह होने लगे तो यह ठहर कर सोचने का विषय है। आत्ममुग्धता इस हद तक बढ़ जाए कि व्यक्ति अनर्गल विचारों की सार्वजनिक घोषणा करने लगे तो चिन्तनीय है। कभी-कभी लगता है कि वर्तमान दौर विवादों को सप्रयास जन्म देने का दौर है। गोया एक घायल सड़क पर पड़ा है और यदि कोई उस घायल से सबका ध्यान हटाना चाहता है तो उसे करना सिर्फ़ इतना ही है कि सबकी नज़र बचा कर भीड़ पर एक गिट्टी उछाल दे और फिर होने दे तू-तू, मैं-मैं। कहीं हम इसी दूषित सोच की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं? हमारी दृष्टि का वह परिष्कार कहां गया जिसमें ताजमहल हमें कला की अनुपमकृति दिखाई देता था और खजुराहो को हम कलातीर्थ की संज्ञा देते थे। कोई भी नवीन शोध दृष्टिकोण के नए रास्ते प्रशस्त करता है किन्तु पूर्वाग्रहपूर्ण रास्तों पर चलते हुए कोई नवीन शोध हो ही नहीं सकता है। नवीन शोध अपने आप में एक ऐसी प्रविधि होती है जो जीवन के प्रत्येक बिन्दु को प्रभावित करती है। इस तथ्य को समझने के लिए दृष्टिपात किया जा सकता है प्रो. चोम्स्की के भाषा संबंधी शोधकार्य पर।
  मेसाचुएटस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालाजी के सेवानिवृत्त  प्राध्यापक, भाषावैज्ञानिक, दार्शनिक, लेखक एवं राजनैतिक एक्टीविस्ट प्रो. एवरम नोम चोम्स्की। प्रो. चोम्स्की के भाषा विज्ञान से कम्प्यूटर की प्रोग्रामिंग भाषाओं को समझने में सुगमता होती है। विकासवादी मनोविज्ञान और गणित के क्षेत्र में भी चोम्स्की के भाषाई सिद्धांतों से मदद ली जाती है। चोम्सकी ने मनोविज्ञान के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बी. एफ. स्कीनर की पुस्तक ‘वर्बल बिहेवियर’ की आलोचना की, जिसके बाद संज्ञानात्मक (काग्नीटिव) मनोविज्ञान के क्षेत्रा में मानो क्रांति ही हो गई और दशाओं को समझने के नवीन सिद्धांत सामने आए। सन् 1984 में चिकित्सा विज्ञान एवं शरीर विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेता नील्स काज जेरने ने चोम्स्की के जेनेरेटिव माडल का प्रयोग मानव शरीर में स्थित प्रोटीन संरचनाओं के गठन एवं शरीर की प्रतिरक्षा में उसके महत्व को समझाने के लिए किया था। अपने शोध ‘द जेनेरेटिव ग्रामर ऑफ इम्यून सिस्टम’ में जेरने ने प्रो. चोम्स्की के सिद्धांतों को आधार बना कर जेटेरेटिव व्याकरण प्रतिपादित किया। यदि प्रो. चोम्स्की के उदाहरण को लें तो यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जा सकता है कि भाषा और साहित्य जीवन की प्रत्येक चेष्टाओं को प्रभावित एवं प्रेरित करते हैं। बशर्ते शोध ईमानदारी से किए गए हों। यूं भी जीवन और साहित्य सिक्के के दो पहलू हैं अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि ये दोनों परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं। जीवन से साहित्य उपजता है और साहित्य से जीवन को दिशा मिलती है। भारत विभाजन की त्रासदी और उस त्रासदी की पीड़ा को इतिहास के पन्नों से कहीं अधिक खुल कर साहित्य के पन्नों ने मन-मस्तिष्क के करीब पहुंचाया।
   डोमेनिक लैपियर एवं लैरी कॉलिंस के ‘फ्रीडम एट मिड नाईट’, खुशवंत सिंह के ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, सलमान रुश्दी के ‘मिडनाईट चिल्ड्रेन’ और सआदत हसन मंटो के कथा साहित्य जैसे इतर भाषा के साहित्य के उदाहरणों से परे हिन्दी साहित्य में ही देखा जाए तो प्रसिद्ध उपन्यासकार यशपाल का दो खंडों में प्रकाशित उपन्यास ‘झूठा सच’ विभाजन की त्रासदी पर हिन्दी में लिखा गया पहला ऐसा उपन्यास है जो इसे विराट ऐतिहासिक, राजनीतिक फलक पर सामने रखता है। बदीउज्जमा का ‘छाको की वापसी’ और कमलेश्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ भी विभाजन पर हिन्दी में लिखे गए उल्लेखनीय उपन्यास हैं। विभाजन को लेकर लिखा गया भीष्म साहनी का उपन्यास ‘तमस’ भी पाठकों को कालयात्रा कराते हुए अंतस तक सिहरा देता है। राही मासूम राजा का ‘आधा गांव’ भी विभाजन से पहले की घटनाओं और इसके कारण प्रभावित सामाजिक ताने-बाने से परिचित कराता है। हिन्दी की शीर्षस्थ कथाकार कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान’ ने पाकिस्तान स्थित पंजाब के गुजरात से विस्थापित होकर पहले दिल्ली में शरणार्थी के रूप में आने और फिर भारत स्थित गुजरात के सिरोही राज्य में वहां के राजकुमार की गवर्नेस के रूप में नौकरी करने वाले पात्र की कहानी है। विशेष बात यह है कि यह उपन्यास कथानक की खांटी सच्चाई को उजागर करता है क्योंकि अकसर उपन्यासों के कथानक के संबंध में लेखक का कथन होता है कि उपन्यास के पात्र और वर्णित घटनाएं काल्पनिक हैं, लेकिन इसमें लिखा गया कि इसके सभी पात्र और घटनाएं वास्तविक और ऐतिहासिक हैं। उपन्यास का पात्र सिकंदरलाल विभाजन पर टिप्पणी करते हुए कहता है कि ‘यह तवारीख़ का काला सितारा सियासत पर यूं ग़ालिब हुआ कि जिन्ना ने दौड़ाए इस्लामी घोड़े और गांधी, जवाहर ने पोरसवाले हाथी।’ कृष्णा सोबती के इस उपन्यास से पहले भी कई उपन्यास आए जिन्होंने विभाजन और शरणार्थियों की त्रासदी के रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरण प्रस्तुत किए। इसी तारतम्य में स्मरण की जा सकती है ‘अज्ञेय’ की वे दो कविताएं जो उन्होंने 12 अक्तूबर 1947 से 12 नवंबर 1947 के बीच लिखी थीं। पहली कविता इलाहाबाद में और दूसरी मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर। इसमें ‘शरणार्थी’ शीर्षक वाली यह लंबी कविता ग्यारह खंडों में है और उस समय की त्रासदी का बेहद मार्मिक चित्राण करती है।
   शरणार्थी होने की त्रासदी झेल रहे हैं रोहिंग्या भी। म्यांमार के सबसे ग़रीब प्रांत रख़ाइन में 10 लाख से ज़्यादा रोहिंग्या रहते थे  और उन्हें वहां का नागरिक नहीं माना गया। राष्ट्र संघ के आंकड़ों के मुताबिक 40,000 रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार की सीमा पार कर बांग्लादेश पहुंचे। नोबल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफ़जई ने सवाल किया, ‘अगर उनका घर म्यांमार में नहीं है तो उनकी पीढ़ियां कहां रह रही थी? उनका मूल कहां है?’ उन्होंने कहा, ‘रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार की नागरिकता दी जाए। वह देश जहां वे पैदा हुए हैं।’
    क्या सभी देशों को द्रवित होने के लिए उस तस्वीर की प्रतीक्षा है जो एलन कुर्दी की थी। वह कुर्दी मूल का तीन वर्षीय सीरियाई बालक था जिसके शव की तस्वीर पूरे विश्व को कंपकपा गई थी। एलन का परिवार सीरियाई गृहयुद्ध से बचने के लिए 2 सितंबर 2015 को एक नौका में तुर्की से ग्रीस जाने की कोशिश कर रहा था, पर नौका के डूबने से एलन की मौत हो गई और उसका शव लावारिस की तरह समुद्र तट पर पड़ा मिला। यह तो तय करना ही होगा कि ऐसी मौतें और नहीं हों।

और अंत में मेरी यह कविता -
बुन रखा है हमने
अपनी जातीयता, अपनी राजनीति
अपने समाज, अपने अर्थशास्त्र
और नितांत अपनी आकांक्षाओं का कोकून
जिसके भीतर है 
साम्राज्य गहन अंधकार का,
इससे पहले कि
घुट जाए दम आंखों का,
समझना होगा-
कोकून के बाहर फैला है अनंत प्रकाश
जो बना सकता है हमें
प्रकृति की तरह,
सार्वभौमिक, सर्वहितकारी
घुटनरहित, कुण्ठारहित, द्वंद्वरहित।
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Friday, December 12, 2025

शून्यकाल | उत्तर आधुनिकता का ‘सेकेंड फेज़’ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | उत्तर आधुनिकता का ‘सेकेंड फेज़’ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल 
उत्तर आधुनिकता का ‘सेकेंड फेज़’
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
       हम परिवर्तनों पर ख़ुश होते हैं या चिंता करते हैं यह आकलन करना शायद हमारे स्वभाव में ही नहीं है। हम औद्योगिक एवं प्रौद्योगिक प्रगति पर गर्व करने से नहीं चूकते हैं। चूकना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह हमारे सुविधाभोगी उत्सवधर्मी मन को खुशी देता है। किन्तु यही प्रगति काबू से बाहर हो जाती है तो कोरोना महामारी के रूप में सारी दुनिया को कंपा देती है। यहां स्पष्ट कर दूं कि यह लेख मैंने  कोरोना पेंडेमिक के बहुत पहले “सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के अक्टूबर-दिसम्बर 2016 अंक के कार्यकारी संपादक के रूप में  संपादकीय लिखा था। 2016 से 2026 आने वाला है, क्या कुछ स्थितियां बदलीं, सोचिएगा।
     
       परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जो कल था, वह आज नहीं है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। बड़ी से बड़ी शिलाओं का भी जल के प्रवाह से आकार बदल जाता है। स्टीफन हॉकिंग ने भविष्यवाणी की है कि पृथ्वी का भविष्य संकट में है और मानवजाति का जीवन लगभग एक हज़ार साल का बचा है। सुनने-पढ़ने में यह किसी साई-फाई फिक्शन जैसा लगता है। इसमें कोई शक़ नहीं कि मनुष्य ने कुछ सार्थक परिवर्तन किए और प्रागैतिहासिक जीवन से आगे बढ़ कर सभ्यताओं के सोपान पा लिए। लेकिन कुछ घातक परिवर्तन भी किए जैसे खनिज संपदा का अधैर्यपूर्ण दोहन, जंगलों की कटाई और वायु में ज़हरीली गैसों का निरंतर निष्पादन। किसने सोचा था कि दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर मापने की क्षमता से भी कहीं अधिक पाया जाएगा। शाम होते-होते धुंधलका छा जाना कई वर्षोंं से दिल्ली के लिए आम बात रही है। सभी ने इसे लगभग अनदेखा किया। देश की राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में छाई धुंध ने जता दिया कि हम अपनी सांसों के प्रति कितने लापरवाह हैं।
विकसित देशों का प्रत्येक नागरिक भी जान बचाने के लिए मंगलग्रह नहीं जा सकता है तो हमारी तो कोई बिसात ही नहीं है। हमें यहीं इसी पृथ्वी पर, इन्हीं शहरों, गांवों और कस्बों में सांस लेना है और हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी, यदि वे सांस की बीमारियों से ग्रसित हो कर भी एक हज़ार साल तक प्रवाहमान रहीं तो। गंभीरता से सोचा जाए तो यक़ीनन स्थिति भयावह है। मगर इस स्थिति को बदला अथवा कुछ आगे भी बढ़ाया जा सकता है यदि हम अभी भी चेत जाएं और पर्यावरण के प्रति खुद की लापरवाहियों के विरुद्ध कुछ कठोर क़दम उठाएं।
       जैसे एक कठोर कदम उठाया गया कालेधन के विरुद्ध। देश की जनता ही नहीं, वैश्विक जगत ने भी नहीं सोचा था कि एक रात अचानक लगभग साढ़े तीन घंटे की अवधि में भारतीय मुद्रा की दो महत्वपूर्ण इकाइयां रद्दी के टुकड़े में बदल जाएंगी। यह एक इतना बड़ा निर्णय था जिसने सम्पूर्ण विश्व को चौंका दिया। भारत विपुल जनसंख्या का देश है और यहां वास्तविक साक्षरता का प्रतिशत भी विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। ऐसे में ‘लिक्विड मनी’ की ओर तेजी से क़दम बढ़ाना किसी जोखिम से कम नहीं है। फिर भी इस दिशा में इतना बड़ा डग धरा गया कि जैसे त्रेता युग में वामन ने अपने एक डग से एक लोक नाप लिया था। दफ़्तर के झगड़े, घरेलू पचड़े इन सब को भूल कर आमजन बैंकों के, एटीएम के दरवाज़ों पर कतारबद्ध हो गए। हज़ार और पांच सौ के पुराने नोट जमा करा देने के बाद पचास, बीस और दस के नोट इतनी संख्या में किसी के पास भी नहीं बचे कि वह दो-तीन महीने के लिए आश्वस्त हो सके। कालाधन बाहर आने के उत्साह के बीच घबराहट और तनाव का माहौल। इस परिवर्तन से साहित्य जगत भी प्रभावित हुआ है। मुद्रा की बात छोड़ दी जाए तो तथ्य और कथ्य साहित्य की हर विधा पर अपना प्रभाव छोड़ कर रहेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस दौर के साहित्य में इस पूरे माहौल को स्थान मिलेगा। किसी कहानी में कसमसाता हुआ कालाबाज़ारी करने वाला दिखाई देगा तो वहीं किसी कविता में वह बेचैन पिता मिलेगा जिसने बेटी की शादी के लिए बैंक से बड़े नोट निकलवाए थे और आपाधापी में उसे उन्हें वापस जमा कराना पड़ा। वह चिन्तित खाली हाथ पिता किसी न किसी कविता में अपनी जगह जरूर बना लेगा। या फिर वह दिहाड़ी मज़दूर जो ‘नोटबंदी’ से उपजी आर्थिक समस्या के कारण कई रात भूखा सोया। साहित्य में सबके लिए जगह है। इतिहास से कहीं अधिक उदार होता है साहित्य।
           साहित्य में परिवर्तनकारी तत्व सदैव परिलक्षित होते रहे हैं। इन तत्वों से उपजनेवाली प्रवृत्तियों में अब तक हम सबसे नूतन प्रवृत्ति उत्तर आधुनिकता को मानते आए हैं। इतिहासकार अर्नाल्ड जे.टायनबी के अनुसार आधुनिकता के बाद उत्तर आधुनिकता तब शुरू होती है जब लोग कई अर्थों में अपने जीवन, विचार एवं भावनाओं में तार्किकता एवम् संगति को त्याग कर अतार्किकता एवम् असंगतियों को अपना लेते हैं। इसकी चेतना विगत को एवम् विगत के प्रतिमानों को भुला देने के सक्रिय उत्साह में दीख पड़ती है। इस प्रकार उत्तर आधुनिकतावाद आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की समाप्ति के बाद की स्थिति है। जबकि पाउलोस मार ग्रगोरिओस ने उत्तर आधुनिकता को एक विचारधारा या लक्ष्य केंद्रित या नियम अनुशासित आंदोलन न मान कर पश्चिमी मानवतावाद की दुर्दशा माना। आज पश्चिम जगत में अनेक मानक टूट रहे हैं। जबकि हमारा देश नए मानक गढ़ रहा है। ये नए मानक उनसे भी ऊपर उभर कर आने की राह बना रहे हैं जो कल तक यू इलीट, कारपोरेट बुल, ब्यूरोक्रेट्स पावर, मीडिया मुगल्स, मॉस प्रोडक्शन, मॉस डिस्ट्रीब्यूशन, मॉस एजूकेशन, मॉस कम्यूनिकेशन तथा मॉस डेमोक्रेसी जैसे शब्दों से पहचाने जाते रहे हैं। ये सभी उत्तर आधुनिकता की ही देन हैं। अमेरिकी लेखक एवं भविष्यवादी एल्विन टाफ्लर ने तीन पुस्तकें लिखीं -‘फ्यूचर-शॉक’, ‘दि थर्ड वेब’, ‘पॉवर शिफ्ट’। इन तीनों पुस्तकों में उत्तर-आधुनिकतावाद के विभिन्न पक्षों का नवीन परिवर्तन के रूप में विवेचन किया गया है।  ‘फ्यूचर शॉक’ बेस्टसेलर रही, जिसकी विश्व भर में 6 मिलियन से अधिक प्रतियां बिकीं। 27 जून, 2016 को 87 वर्ष की आयु में लास एंजेल्स में उनका निधन हो गया। एल्विन टाफ्लर का कहना था कि ‘‘समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो बुजुर्गों की देखभाल करें और उनके प्रति दयालु और ईमानदार रहें। अस्पताल में काम करने वालों की आवश्यकता है। विभिन्न प्रकार के कौशल वाले व्यक्तियों की आवश्यकता है। समाज भावना और कौशल के संयोग से चल सकता है, डाटा और कम्प्यूटर मात्रा से नहीं।’’
कुछ विद्वान उत्तर-आधुनिकतावाद को बहुलतावाद और नवसंस्कृतिवाद से जोड़ कर देखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भूमंडलीकरण, उदारवाद और बाजारवाद अपने पूरे लक्षणों के साथ समाज पर असर डालता दिखाई पड़ता है। वहीं जब मैं टायनबी, पाउलोस मार ग्रगोरिओस और एल्विन टाफ्लर के विचारों के आधार पर हिन्दी साहित्य में उत्तर आधुनिकता को परखने का प्रयास करती हूं तो मुझे लगता है कि हम अब उत्तर आधुनिकता के ‘सेकेंड फेज़’ में प्रवेश कर चुके हैं। हम पारिवारिक विखण्डन को अपना चुके हैं, परिवार की नैनो इकाइयों की ओर बढ़ रहे हैं, लिव इन रिलेशन और समलैंगिकता को सहज रूप में लेने का मन बनाते जा रहे हैं, आर्थिक तौर पर प्लास्टिक मनी और लिक्विड मनी को आत्मसात करने के लिए कटिबद्ध हैं और इन सबसे अधिक परिवर्तनकारी प्रवृत्ति कि हम पहले की अपेक्षा अधिक आत्मकेन्द्रित हो चले हैं। यह उत्तर आधुनिकता का द्वितीय चरण ही कहा जा सकता है।

मैनेजर पाण्डेय ने हिन्दी साहित्य में बोध, विश्लेषण तथा मूल्यांकन के महत्व को स्थापित करने के साथ ही हिन्दी भाषा में साहित्य की समाजशास्त्रीय नूतन दृष्टि को विकसित किया है। वे आलोचना-कर्म में परम्परा के विश्लेषणात्मक पुनर्मूल्यांकन के पक्षधर रहे हैं। उन्होंने भक्त कवि सूरदास के साहित्य की समकालीन सन्दर्भों में व्याख्या कर भक्तियुगीन काव्य की परंपरागत प्रचलित धारणा से अलग एक सर्वथा नयी तार्किक प्रासंगिकता को रेखांकित किया है। दलित साहित्य और स्त्री-स्वतन्त्रता के समकालीन प्रश्नों पर भी मैनेजर पाण्डेय की अपनी एक स्वतंत्र दृष्टि है।

आलोचना संदर्भ के क्रम में भारत यायावर का लेख "नन्दकिशोर नवल की आलोचनात्मकता के तारतम्य में हिन्दी साहित्य" में आलोचना के नए पक्षों को सामने रखा है जिन पर चिंतन-मनन किया जाना आवश्यक है। यूं भी एक अरसे से यह माना जा रहा है कि हिन्दी का आलोचनात्मक पक्ष कमजोर होता जा रहा है।
    रोहिणी अग्रवाल इस प्रश्न को उठा कर झकझोरती हैं कि ‘क्या समूचा हिन्दी साहित्य गहरे राग या उदग्र द्वेष से बन्धे भावोच्छ्वासों का अखाड़ा है, जो अपने-अपने द्वीपों में कैद रचयिता को अपने-अपने हिसाब चुकता करने का अवसर देता है?’ उन्होंने इस तथ्य को भी याद दिलाया है कि मीराबाई के बाद हिन्दी साहित्य में स्त्री अभिव्यक्ति के स्वर आधुनिक काल में सुनाई पड़ते हैं। वहीं सुषमा सहरावत भी यही मानती हैं कि स्त्री विमर्श के बीज हमें मीराबाई के काव्य में मिलते हैं। इन्हीं बीजों ने प्रस्फुटित होकर आगे चलकर स्त्री विमर्श को व्यापक धरातल पर स्वरूप प्रदान किया।
समाज बदल रहा है, स्त्री का जीवन बदल रहा है, विचार और प्रवृत्तियां बदल रही हैं। यह साल भी बदल जाएगा।
परिवर्तन पर अपनी ये पंक्तियां याद आ रही हैं मुझे -
अब न वो वन है न कानन
न पेड़, न झुरमुट
न नदी के स्वच्छ किनारे
कोलाहल में गुम वंशीस्वर
और उजड़े हुए हमारे मिलन स्थल
कहो कान्हा! 
मैं तुमसे कहां मिलू?
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Friday, December 5, 2025

शून्यकाल | अटल जी के विचार धर्मस्थलों के राजनीतिक उपयोग पर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | अटल जी के विचार धर्मस्थलों के राजनीतिक उपयोग पर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल
अटल जी के विचार धर्मस्थलों के राजनीतिक उपयोग पर
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

     ‘‘जो राजनीति को सम्प्रदाय के साथ जोड़ते हैं या सम्प्रदाय को राजनीति के साथ सम्बद्ध करते हैं, वे अंतःकरण से असाम्प्रदायिकता के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते। फिर चाहे वे साम्प्रदायिकता के विरुद्ध कितने ही भाषण दें, अधिवेशन में बैठ कर लम्बे-लम्बे प्रस्ताव पास करें। आज राजनीति और सम्प्रदाय को मिलाने के फिर से प्रयत्न हो रहे हैं। अगर इनको रोका नहीं जा सका तो देश में साम्प्रदायिकता फिर से सिर उठाएगी और हमारी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के लिए एक भयंकर संकट खड़ा हो जाएगा।’’- यही तो कहा था अटल बिहारी वाजपेयी ने जो सर्वकालिक सटीक आग्रह कहा जा सकता है।
 

धार्मिक स्थलों का राजनीतिक मामलों के लिए उपयोग किया जाना चाहिए या नहीं? यह एक विवाद का प्रश्न रहा है। एक पक्ष सहमत होता है तो दूसरा असहमत। इस ज्वलंत प्रश्न पर अटल बिहारी वाजपेयी ने 17 फरवरी, 1961, लोकसभा में धर्मस्थलों का राजनीतिक उपयोग करने से रोकने के सम्बन्ध में प्रस्ताव के अंतर्गत भाषण देते हुए अपने जो विचार प्रकट किए थे, वे इस प्रकार थे-
‘‘सभापति जी, 
मैं इस प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं, यद्यपि चाहता हूं कि प्रस्ताव के अंतर्गत प्लेसस आॅफ पिलग्रिमेज का,े तीर्थ के जो स्थान हैं, उनको लाने के सम्बन्ध में प्रस्तावक महोदय को फिर से विचार करना चाहिए। जहां तक पूजा के स्थानों का राजनीतिक प्रचार के लिए दुरुपयोग रोकने का प्रश्न है, इस सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते और अगर हम भारतीय गणराज्य के असाम्प्रदायिक स्वरूप को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो इस सम्बन्ध में हमारे सामने अंतिम निर्णय लेने की स्थिति आ गई है। जिन परिस्थितियों में देश का विभाजन हुआ, विभाजन के जिन दुष्परिणामों को हम अभी तक भूल नहीं सके हैं, उनको ध्यान में रख कर हमें ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना है जो राष्ट्रीय एकता को दुर्बल करती हैं, भारतीय गणराज्य के असाम्प्रदायिक स्वरूप पर कुठाराघात करती हैं और देश में फिर से साम्प्रदायिकता के उन्माद का जागरण करती हैं।
‘‘हमने एक असाम्प्रदायिक राज्य का निर्माण किया है। इसका स्वाभाविक पर्याय यह है कि राजनीति और सम्प्रदाय को अलग-अलग रखा जाना चाहिए। जो राजनीति को सम्प्रदाय के साथ जोड़ते हैं या सम्प्रदाय को राजनीति के साथ सम्बद्ध करते हैं, वे अंतःकरण से असाम्प्रदायिकता के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते। फिर चाहे वे साम्प्रदायिकता के विरुद्ध कितने ही भाषण दें, अधिवेशन में बैठ कर लम्बे-लम्बे प्रस्ताव पास करें। आज राजनीति और सम्प्रदाय को मिलाने के फिर से प्रयत्न हो रहे हैं। अगर इनको रोका नहीं जा सका तो देश में साम्प्रदायिकता फिर से सिर उठाएगी और हमारी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के लिए एक भयंकर संकट खड़ा हो जाएगा। 
‘‘हमने लोकतंत्रात्मक मार्ग का अवलम्बन किया है। किसी भी सम्प्रदाय को स्वतंत्रता है कि वह राजनीतिक दल का निर्माण करे, खुले मैदान में आकर चुनाव लड़े, अपनी आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर विचार करे। इसके लिए मंदिर में, मस्जिद में, गुरुद्वारे या गिरजाघर में जाकर आंदोलन चलाने की क्या आवश्यकता है? मुझे ताज्जुब हुआ कि श्री सरहदी साहब ने जहांगीर के काल का उदाहरण दिया। समय बीत गया है। यह केवल सिख बन्धुओं के लिए ही सही नहीं है। अतीत काल में स्वतंत्रता के लिए जितने संघर्ष हुए, वे सब धर्म के साथ जुड़े हुए थे लेकिन आज पूजा की पद्धति को और राजनीति को जोड़ने का कोई औचित्य नहीं है। हां, गुरुद्वारे में बैठकर, मंदिर में बैठकर अगर पूजा करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, राज्य की ओर से कोई भेद-भाव की नीति बरती जाती है, शुद्ध धार्मिक मामलों में, तो उसका विचार हो सकता है लेकिन मस्जिदों में चुनावों के सम्बन्ध में फतवे दिए जाएं, गुरुद्वारों से एक पृथक राज्य के निर्माण का राजनीतिक और साम्प्रदायिक आंदोलन चलाया जाए, गिरजाघरों को भारत की एकता को खंडित करने का केन्द्र बनाया जाए और फिर उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप लोग मंदिरों में भी राजनीतिक गतिविधियों को ले जाने का प्रयत्न करें, इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। तेरह वर्ष हुए देश का विभाजन हुए।’’
(सांसद नवल प्रभाकर के इस हस्तक्षेप पर कि, ‘आर. एस. एस. की मीटिंगें मंदिरों में ही होती हैं।’)
‘‘आर.एस.एस. कोई राजनीतिक दल नहीं है और मेरा निवेदन है कि अगर होता हैं तो वह भी गलत हैं और वह चीज भी बंद होनी चाहिए, और जब मैं इस बात का समर्थन करता हूं तो आर. एस. एस. भी बचने वाला नहीं है मगर कांग्रेस के माननीय सदस्यों में यह नैतिक साहस होना चाहिए कि इस प्रस्ताव का वे समर्थन करें, मगर यह वे नहीं कर सकते। वे साम्प्रदायिकता के विरुद्ध भाषण दे सकते हैं मगर चुनाव लड़ने के लिए साम्प्रदायिक तत्वों से समझौता करते हैं। वे राष्ट्रीयता की बात करते हैं मगर दलों के स्वार्थों को बलि पर नहीं चढ़ा सकते। यही कारण है कि तेरह वर्ष के बाद भी साम्प्रदायिकता फिर से पनप रही है और यह तब तक नहीं मिटेगी जब तक कि हम इस साम्प्रदायिकता के सम्बन्ध में कभी न समझौता करने वाला दृष्टिकोण नहीं अपनाएंगे।
‘‘कोई भी दल हो, पूजा का कोई भी स्थान हो, उसको अपनी राजनीतिक गतिविधियां वहां चलाने की छूट नहीं होनी चाहिए। अभी कहा गया है कि राजनीतिक गतिविधियों की परिभाषा क्या हो, किसे कहा जाए कि यह राजनीतिक गतिविधि है और किसे कहा जाए कि यह नहीं है। मेरा निवेदन है कि केन्द्रीय सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए नियम बना रखे हैं कि वे राजनीति में भाग नहीं ले सकते। यह परिभाषा की कठिनाई उनके सामने तो नहीं आती है। सरकार का कोई कर्मचारी अगर राजनीतिक गतिविधि में भाग लेता है तो उसे दण्ड भोगना पड़ता है और अगर कोई परिभाषा की कठिनाई है भी तो उस पर बैठ कर विचार किया जा सकता है। उसके सम्बन्ध में लोगों की राय ली जा सकती है और एक ऐसी सर्वसम्मत परिभाषा बनाई जा सकती है, जिसके अंतर्गत सत्ता प्राप्ति को या राजनीतिक चुनाव लड़ने को इसमें शामिल करते हुए बाकी के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न लगे। 

‘‘इसके लिए आवश्यक है कि इस प्रस्ताव की मूल भावना से सब सहमत हों। राजनीतिक गतिविधियों की परिभाषा नहीं हो सकती, इसलिए धार्मिक स्थानों में राजनीति चलती रहे, इस चीज को स्वीकार करने के लिए मैं तैयार नहीं हूं। सिद्धांत के रूप में मैं चाहता हूं कि हम स्वीकार कर लें कि समय आ गया है कि पूजा के स्थान राजनीति के अड्डे न बनाए जाएं और फिर इसके लिए कैसा कानून बनाया जाए, उसकी परिभाषा क्या हो, उसकी परिधि क्या हो, ये विचार के विषय हो सकते हैं। इन पर मिल बैठ कर गम्भीरता से सोच सकते हैं। 
‘‘मेरा निवेदन है कि राष्ट्रीय एकता पर जो संकट है, कोई भी राष्ट्रवादी उसकी ओर से आंखें नहीं मूंद सकता और यह संकट भिन्न-भिन्न रूपों में खड़ा है। मेरा निवेदन है कि हम किसी भी सम्प्रदाय की साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त न करें। चाहे वह कम संख्या वालों की हो, चाहे अनेक संख्या वालों की। जो नियम बनते हैं, वे सबके लिए एक से होते हैं मगर देखा गया है कि पंजाब में गुरुद्वारों में पुलिस नहीं जा सकती पर चंडीगढ़ के आर्यसमाज मंदिर में पुलिस प्रवेश कर सकती है। अगर नियम बने हुए हैं तो सभी के लिए एक से होने चाहिए। अभी जालंधर में आर्यसमाज मंदिर में प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी, जबकि महीनों तक गुरुद्वारों का उपयोग क्या एक साम्प्रदायिक आंदोलन को चलाने के लिए नहीं होता रहा है?
‘‘वह रोक उठा ली गई है, इसका मैं स्वागत करता हूं। मैं इस बात का समर्थन नहीं करता कि आर्यसमाज के मंदिरों में राजनीतिक गतिविधियां चलें। मैं कहता हूं कि किसी को भी इस तरह की कार्रवाई करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, फिर चाहे वो गुरुद्वारे हांे, चाहे आर्यसमाज मंदिर हों या दूसरे धर्मस्थान हों। इस सम्बन्ध में हमें कट्टरता और कठोरता की नीति अपनाने की आवश्यकता है। अगर हमने इस नीति को नहीं अपनाया तो असाम्प्रदायिक राज्य स्थापित करने का हमारा स्वप्न कभी भी सत्य नहीं हो सकेगा। 
‘‘देश के विभाजन से भी अगर हम शिक्षा नहीं लेंगे, राजनीति को मजहब से अलग नहीं रखेंगे, इस सम्बन्ध में जनमत की भावना का कानून के रूप में प्रयोग नहीं करेंगे तो केवल यह कह कर कि जनमत जाग्रत किया जाए, कोई अधिक परिणाम नहीं निकल सकता। मैं पूछना चाहता हूं कि हिन्दू कोड बिल के बारे में जनमत कितना जाग्रत किया गया था? हिन्दू कोड बिल तो बन गया मगर सिविल कोड बिल अभी तक नहीं बना है। गुरुद्वारों में पुलिस प्रवेश नहीं कर सकती, आर्यसमाज मंदिरों में कर सकती है। मस्जिदों में चुनाव जीतने के लिए फतवे दिए जा सकते हैं, विदेशी मिशनरी गिरजाघरों में बैठकर राष्ट्रीय एकता विच्छेदन करने के षड्यंत्र कर सकती हैं और इन सब चीजों को आज बर्दाश्त किया जाता है। अगर इन संकटों को हम आज भी नहीं समझेंगे तो हमारी स्वतंत्रता और हमारी राष्ट्रीयता की रक्षा नहीं हो सकेगी।
‘‘मैं कहना चाहता हूं कि यह प्रस्ताव नहीं है, यह शासन को कसौटी पर कसा जा रहा है और एक-एक कांग्रेसी की राष्ट्रीयता को मानो आज चुनौती दी जा रही है। अगर वे चाहते हैं कि राजनीति का साम्प्रदायिकता में प्रवेश नहीं होना चाहिए तो इस प्रस्ताव का उनको समर्थन करना चाहिए, वरना कहा जाएगा कि वे राष्ट्रीय एकता की बातें तो कर सकते हैं मगर उसके निर्माण के लिए कदम नहीं उठा सकते। धन्यवाद!’’
अटल बिहारी वाजपेयी के लोकसभा में इस भाषण से साफ पता चलता है कि वे धार्मिक स्थलों को समान राजनीतिक दृष्टि से देखे जाने के पक्षधर थे तथा धार्मिक स्थलों का राजनीति से दूर रहना उचित समझते थे।
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Friday, November 21, 2025

शून्यकाल | मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल
मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                                   संस्कृति व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के सतत् विकास का महत्त्व पूर्ण आधार है। मानव मूल्य संस्कृति से ही उत्पन्न होते हैं और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सत्य, शिव और सुन्दर के शाश्वत मूल्यों से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति में पाषाण जैसी जड़ वस्तु भी देवत्व प्राप्त कर सर्वशक्तिमान हो सकती है और नदियां एवं पर्वत माता, पिता, बहन, आदि पारिवारिक संबंधी बन जाते हैं। ऐसी भारतीय संस्कृति की नाभि में मानवमूल्य ठीक उसी तरह अवस्थित है जैसे भगवान विष्णु की नाभि में कमल पुष्प और उस कमल पुष्प पर जिस तरह ब्रह्मा विद्यमान हैं, उसी तरह मानवमूल्य पर ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः’ की लोक कल्याणकारी भावना विराजमान है। वस्तुतः मूल भारतीय संस्कृति में धर्म, जाति, विचार आदि के भेद को ‘भेद’ या अलगाव नहीं वरन् विविधता माना गया है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है।

      संस्कृति, राष्ट्र और समाज ये तीन ईकाइयां हैं, जो मानव संस्कृति को आकार देती हैं। सुसंस्कृति से सुराष्ट्र आकार लेता है और अपसंस्कृति से अपराष्ट्र। शब्द अनसुना सा लग सकता है-‘‘अपराष्ट्र’‘। किन्तु यदि राष्ट्रों की राजनीतिक स्तर पर अपराधों में लिप्तता राजनीतिक कुसंस्कारों को जन्म देती है और यही कुसंस्कार राष्ट्र में अतंकवाद की गतिविधियों को प्रश्रय देते हैं। विश्व में कई देश ऐसे हैं जो राजनीतिक दृष्टि से अपराष्ट्र की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। वहीं भारत की संस्कृति का स्वरूप इस प्रकार का है जिसमें अपसंस्कारों की कोई जगह नहीं है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है। यदि प्रत्येक मनुष्य में देवत्व के गुण जाग्रत हो जाएं तो सांस्कृतिक विकार जागने अथवा किसी विषम पल में जाग भी जाए तो उसके स्थाई रूप से बने रहने का प्रश्न ही नहीं है। संस्कृत में प्रणीत हमारा संपूर्ण वाङ्मय वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भागवत, भगवद्गीता आदि के रूप में विद्यमान है, जिसमें हमारे जीवन को सार्थक बनाने के सभी उपक्रमों का विस्तृत विवरण विद्यमान है। इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है कि संस्कृति एक शाब्दिक ईकाई नहीं वरन् जीवन की समग्रता की द्योतक है। संस्कृति मात्र चेतन तत्वों के लिए ही नहीं अपितु जड़तत्वों के लिए भी प्रतिबद्धता का आग्रह करती है। अब प्रश्न उठता है कि क्या जड़ तत्वों के लिए भी कोई सांस्कृतिक आह्वान होता है जबकि जड़ तो जड़ है, निचेष्ट, निर्जीव। फिर निर्जीव के लिए संसकृति का कैसा स्वरूप, कैसा रूप? ठीक इसी बिन्दु पर भारतीय संस्कृति की महत्ता स्वयंसिद्ध होने लगती है।
      भारतीय संस्कृति समस्त जड़ ओर समस्त चेतन जगत से तादात्म्य स्थापित करने का तीव्र आग्रह करती है। यही आग्रह आज हम पर्यावरण संतुलन के आग्रह के रूप में देखते हैं, सुनते हैं और उसके लिए चिन्तन-मनन करते हैं। जब पा्रणियों का शरीर पंचतत्वों से बना हुआ है और ये पंचतत्व वही हैं जिनसे संसार के जड़ तत्वों की भी पृथक-पृथक रचना हुई है, तो जड़ और चेतन के पारस्परिक संबंध अलग कहां हैं? ये दोनों तो घनिष्ठता से परस्पर जुड़े हुए हैं। 
        संस्कृति की ध्वजा को फहराते रहने का दायित्व मानव का है क्योंकि वही धरती पर उपस्थित शेष प्राणियों में सबसे अधिक विचारवान और निर्मितिपूर्ण है। निर्माणकौशल के सतत् विकास ने मानव को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठतर बना दिया है। मनुष्य के निर्माणकौशल ने ही उसे सामाजिक प्राणी बनाया और मिलजुल कर रहने के लाभ को जानना सिखाया। मानव के निर्माणकौशल के विकास ने आज उसे इलेक्ट्राॅनिकयुग तक पहुंचा दिया है और यह विकासयात्रा अभी जारी है। किन्तु इसी विकास ने मानवजीवन में ‘‘मूल्य’’ शब्द के स्वरूप को अर्थतंत्र का अनुगामी बना दिया है। यूं तो ‘‘मूल्य’’ एक मानक है श्रेष्ठता के आकलन का। जिसके लिए अधिक श्रम, अधिक मुद्रा खर्च करनी पड़े, जिसके लिए मानव मन में अधिक ललक हो किन्तु उपलब्धता सीमित हो, वह मूल्यवान है। इसके विपरीत जो सुगमता से, कम मुद्राओं में मिल जाए, जिसकी उपलब्धता भी प्रचुर हो और जिसके प्रति मानव मन में अधिक ललक न हो वह सस्ता कहलाता है। यही परिभाषा बनाई है अर्थशास्त्रियों ने। किन्तु जब बात संसकृति की हो अर्थात् जीवनशैली की हो तो ‘‘मूल्य’’ शब्द का अर्थ असीमित और अपरिमित हो जाता है। संस्कृति बाज़ार की वस्तु नहीं है, उसे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है। संस्कृति तो आचरण है जिसे अपनाया अथवा छोड़ा जा सकता है। जो संस्कृति को अपनाता है वह संस्कारवान होता है और जो संस्कृति का त्याग कर देता है, त्याग से यहां आशय सांस्कृति मूल्यों के त्याग से है। तो, जो संस्कृति को त्याग देता है वह असंस्कारी हो जाता है। 
                 भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाये गये शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्त्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि हज़ारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है, जबकि मिस्र, असीरिया, यूनान और रोम की संस्कृतियों अपने मूल स्वरूप को लगभग विस्मृत कर चुकी हैं। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्य तथा अन्य प्राकृतिक देवी- देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है। देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतना ही है, जितना हज़ारों वर्ष पूर्व था। गीता और उपनिषदों के सन्देश हज़ारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। समयानुसार परिवर्तनों के बाद भी भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में निरन्तरता रही है।
भारतीय संस्कृति वह मार्ग सुझाती है कि वे सांस्कृतिक मूल्य कहां से सीख सकते हैं जो मनावजीवन को मूल्यवान बना दे -
परोपकाराय फलन्ति वृक्षः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदम् शरीरम्।

अर्थात् - वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियां परोपकार के लिए बहती हैं, गाय परोकार के लिए दूध देती हैं अतः अपने शरीर अर्थात् अपने जीवन को भी परोपकार में लगा देना चाहिए।

भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चौ्रासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ मानती है किन्तु साथ ही अन्य योनियों की महत्ता को भी स्वीकार करती है। जिसका आशय है कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। और यह तभी संभव है जब प्रकृति के प्रति मनुष्य की आत्मीयता ठीक उसी प्रकार हो जैसे अपने माता-पिता, भाई, बहन, गुरु और सखा आदि प्रियजन से होती है। यह आत्मीयता भारतीय संस्कृति में जिस तरह रची-बसी है कि उसकी झलक गुरुगंभीर श्लोकों के साथ ही लोकव्यवहार में देखा जा सकता है। लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मां है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे। भारतीय संस्कृति लोक व्यवहार की संस्कृति है जो हमने प्रकृति से सीखी है, इस बात को हमेशा हमें याद रखना चाहिए।  
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Friday, November 14, 2025

शून्यकाल | बाल दिवस विशेष : कैसा भविष्य दे रहे हैं हम बच्चों को? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | बाल दिवस विशेष : कैसा भविष्य दे रहे हैं हम बच्चों को?  | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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शून्यकाल
बाल दिवस विशेष : कैसा भविष्य दे रहे हैं हम बच्चों को ?             
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                    
           हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन हैं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? हमारे ये उपहार बच्चों को न तो अच्छा वर्तमान दे सकते हैं और न अच्छा भविष्य।*


पीठ पर लदा भारी-भरकम स्कूल बैग, कोचिंग क्लासेस के लिए भागमभाग कुल मिला कर बेइंतहा तनाव में जीते बच्चे। यदि बच्चा खेलना चाहता है तो उससे उस खेल को खेलने के लिए बाध्य किया जाता है जिसमें आगे चल कर वह कैरियर बना सके और लाखों कमा सके। यदि बच्चे को नाचने या गाने में रुचि है तो उसकी इस रुचि में भी टेलेण्ट-हण्ट वाले टी.वी. शोज़ में सहभागिता की चमक-दमक दिखाई देने लगती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बच्चे की रुचि में कमाई का जरिया देखने की आदत बनती जा रही है। जब यह तस्वीर है वर्तमान की तो भविष्य कैसा होगा? जबकि हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए न तो स्वच्छ वातावरण छोड़े रहे हैं और न प्र्याप्त प्राकृतिक संसाधन। जैसे एक जुआरी पिता जुआ खेलने के लिए कर्ज लेता चला जाता है और इस बात का कतई ध्यान नहीं रखता है कि उसके बच्चे उस कर्ज को कैसे चुकाएंगे, कुछ ऐसी ही दशा की ओर बढ़ रहे हैं हम और हमारे बच्चे।
दिल्ली जैसे महानगरों में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है कि अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों से ग्रस्त बच्चों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। नाक पर नक़ाब लगा कर सांस लेने को मज़बूर बच्चे और बाज़ारवाद के शिकार होते उनके माता-पिता सब कुछ देख कर भी मानो कुछ नहीं देख पा रहे हैं। जो नक़ाब आॅपरेशन थियेटर में पहने जाते थे, वे नक़ाब अब घर से निकलते ही लगाने की नौबत है। गोया समूचा शहर ही आॅपरेशन थियेटर में बदल गया हो। बस, अंतर यही है कि आॅपरेशन थियेटर के अन्दर का वातावरण स्वच्छ रहता है और उस स्वच्छता को बनाए रखने के लिए दस्ताने और नक़ाब पहने जाते हैं लेकिन शहर में गंदगी से बचने के लिए नक़ाब पहनने की जरूरत पड़ने लगी है। 
जो गंदगी भरा वातावरण हम अपने बच्चों को दे रहे हैं उसी का परिणाम है कि आज पालने में झूलने वाले नन्हें बच्चे जीका वायरस से जूझ रहे हैं। यह वायरस देश के लगभग हर राज्य में फैलता जा रहा है। मध्यप्रदेश में यहां तक कि सागर जैसे कम विकसित शहर में भी इसके मरीज़ मिलने लगे हैं। ज़ीका वायरस दिन में एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। इस बीमारी में बुखार के साथ जोड़ों में दर्द और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसका कोई टीका नहीं है, न ही कोई ख़ास उपचार है। ये मच्छरों से ही फैलता है। ये वायरस दिन में ज्यादा सक्रिय रहता है। पाया गया है कि विशेष रूप से गर्भावस्था में महिलाएं इससे ज्यादा संक्रमित होती हैं।  इससे प्रभावित बच्चे का जन्म आकार में छोटे और अविकसित दिमाग के साथ होता है। ये गर्भावस्था के दौरान वायरस के संक्रमण से होता है। इसमें शिशु दोष के साथ पैदा हो सकता है। नवजात का सिर छोटा हो सकता है। उसके ब्रेन डैमेज की ज्यादा आशंका होती है। साथ ही जन्मजात तौर पर अंधापन, बहरापन, दौरे और अन्य तरह के दोष दे सकता है। इसका सिंड्रोम शरीर के तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और इसके चलते लोग लकवा का शिकार हो जाते हैं। ये न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं भी दे सकता है। जीका वायरस कोई नया नहीं है। इसकी पहचान पहली बार सन् 1947 में हुई थी। जिसके बाद ये कई बार अफ्रीका व साउथ ईस्ट एशिया के देशों के कुछ हिस्सों में फैला था। अभी तक कैरेबियाई ,उत्तर व दक्षिणी अमेरिका के 21 देशों में ये वायरस फैल चुका है। भारत में इसके फैलने का सबसे बड़ा कारण है ऐसी गंदगी जहां मच्छर पलते रहते हैं। किसी भी स्वच्छता मिशन का सरकारी स्वरूप आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वातावरण नहीं दे सकता है। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को स्वच्छता को जीवनचर्या बनाना होगा। भले ही वह नागरिक करोड़ों के भवनों में रह रहा हो या झोपड़पट्टी में रहता हो। खुद के लिए नही ंतो अपने बच्चों के लिए यह जरूरी है। आज जीका वायरस है तो कल कुछ और इससे भी भयावह वायरस आ जाएगा, यदि आज हम नहीं सम्हले तो।
आपराधिक स्तर पर भी बच्चे अपराध से घिरे हुए दिखाई देते हैं। जब अवयस्क युवा बलात्कार जैसा घिनौना अपराध करने लगें या फिर तीन-चार साल की नन्हीं बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जाने लगे तो इसे अच्छी सामाजिक दशा तो हरगिज नहीं कहा जा सकता है। अपराध और अपराधियों से आज बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। विकास के दावों के बीच यह एक कड़वा सच है कि हमने अपराधों में कहीं अधिक विकास कर लिया है। हमारे बच्चे न तो घर-परिवार में सुरक्षित हैं, न मोहल्ले में और न स्कूलों में। कोई दुश्मनी भी नहीं, मात्र व्यक्तिगत आनन्द के लिए बच्चों को शिकार बनाया जा रहा है। 
देश के विकास की दिशा में यूं तो लक्ष्य रखा गया है बच्चों के प्रति दुराचार, उनका शोषण, तस्करी, हिंसा और उत्पीड़न समाप्त करना। किन्तु सच तो यह है कि हमारी व्यवस्थाएं नहीं बचा पा रही हैं अपने बच्चों को। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन ‘चाइल्ड एब्यूज़ इन इंडिया’ के अनुसार भारत में 53.22 प्रतिशत बच्चों के साथ एक या एक से ज़्यादा तरह का यौन दुव्र्यवहार और उत्पीड़न हुआ होता है। इन आंकड़ों को देख कर चिंता होने लगती है कि जब हम बच्चों को उनका सुरक्षित वर्तमान नहीं दे पा रहे हैं तो एक सुरक्षित भविष्य कहां से देंगे?  
दिनों-दिन बढ़ते हुए बाल-अपराध हमारे सामाजिक जीवन के लिए एक चुनौती हैं। छोटे-छोटे बच्चों में अपराधी प्रवृत्तियां एक गंभीर समस्या बन गई है। बाल जीवन में बढ़ती जा रही हिंसा, क्रूरता, गुण्डागर्दी, नशेबाजी, आवारापन मानव-समाज के लिए एक गंभीर समस्या है। बाल अपराध इस तरह बढ़ रहे हैं कि उनका अनुमान कर सकना मुश्किल है। यूं तो बाल अपराधों के लिए सर्वेक्षण होता रहता है किन्तु कहीं की भी पूरे आंकड़े सामने नहीं आ पाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के अपराधों पर पर्दा डालते रहते हैं। अपने बच्चों के आपराधिक कारनामों को छिपाने के लिए माता-पिता जितनी ऊर्जा और धन खर्च करते हैं, यदि उससे आधी ऊर्जा और धन भी बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देने में लगाएं तो बच्चों के अच्छे संस्कार खोने नहीं पाएंगे। बच्चों का दिमाग़ तो कोरी स्लेट के समान होता है, उसमें यदि आपराधिक प्रवृत्तियां लिख दी जाएं तो वहीं जीवन भर लिखी रहेंगी। 
आज बच्चे अगर अपने माता-पिता या मेहमानों को पलट कर जवाब देते हैं या बेअदबी से पेश आते हैं तो इसमें दोष बच्चों का नहीं, उन माता-पिता का है जिन्होंने हंस कर बढ़ावा दिया और अपराधी बनने की पहली सीढ़ी यानी ढिठाई पर चढ़ा दिया। आज 80 प्रतिशत बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी करते ही कैरियर वाली पढ़ाई के चक्कर में अपने घर से दूर पराये शहरों में चले जाते हैं। इसके बाद उनकी हमेशा के लिए अपनी घर वापसी बहुत कम हो पाती है। जो लौटते भी हैं वे फ्रस्टेशन से ग्रस्त रहते हैं। यह फ्रस्टेशन भी उन्हें उसी वातावरण से मिलता है जो हमने आर्थिक दबाव के रूप में रच दिया है। कमाऊ युवाओं के उदाहरणों से घिरे बेरोजगार युवा पारिवारिक दबाव में आ कर गलत कदम उठाने लगते हैं। या तो वे आत्मघाती हो उठते हैं या फिर अपराधी बन जाते हैं। 
    हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन है,ं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? 
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Friday, October 31, 2025

शून्यकाल | प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | नई शिक्षा नीति में भाषाई प्रावधान का प्रश्नचिन्ह | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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शून्यकाल 
जन्मदिन विशेष 
प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

      स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। ‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल एक सच्चे देशभक्त थे। आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में उन्होंने भारतीय गणराज्य में रियासतों के एकीकरण का दुरूह कार्य जिस कुशलता से कर दिखाया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा। स्वभाव से वे निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासनप्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय गुण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था तथा देश सेवा उनकी साधना थी। उनका राजनैतिक योगदान देश के व्यापक हित से जुड़ा हुआ होने के कारण ही उन्हें ‘भारतीय बिस्मार्क’ भी कहा जाता है।


   वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते।
       सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। करमसाड गांव के आस-पास दो उपजातियों का निवास था- लेवा और कहवा। इन दोनों उपजातियों की उत्पत्ति भगवान रामचन्द्र के पुत्रों लव और कुश से मानी जाती है। वल्लभ भाई पटेल का परिवार लव से उत्पन्न लेवा उपजाति का था जो पटेल उपनाम का प्रयोग करते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्रा नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े। नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
        बचपन से ही संषर्घमय जीवन व्यतीत करने के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल के स्वभाव में कठोरता तो आई ही थी, साथ ही साथ कठिन से कठिन समस्याओं को सहज ढंग से सुलझाने की क्षमता का भी विकास उनमें हुआ था। उनके स्वभाव में गम्भीरता थी और इच्छाशक्ति में लोहे जैसी मजबूती। वल्लभ भाई बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे किन्तु उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे इंग्लैंड जा सकें। उन्होंने वकालत करके धन जोड़ा और जब इंग्लैंड जाने का समय आया तो उनके बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें पहले इंग्लैंड जाने दें। अनुपम त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वल्लभ भाई ने अपने बड़े भाई को अपने बदले इंग्लैंड जाने दिया और स्वयं उनके लौटने के कुछ समय बाद इंग्लैंड गये।
         इंग्लैंड जा कर उन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई अच्छे अंकों से पूरी की। भारत वापस आ कर एक बार फिर वकालत आरम्भ की और वकालत के क्षेत्र में ख्याति एवं प्रतिष्ठा अर्जित की। आरम्भ में वल्लभ भाई महात्मा गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे किन्तु जब वे गांधी जी के निकट सम्पर्क में आए तो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने न केवल अहिंसा एवं सत्याग्रह को अपनाया अपितु पाश्चात्य वस्त्रों को सदा के लिए त्याग कर धोती-कुर्ता की विशुद्ध भारतीय वेश-भूषा अपना ली।
         स्वतंत्रता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार  का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
        महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे।
        वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू के बीच संबंध


सरदार पटेल और नेहरू की प्रकृति में असमानता थी, एक ओर पटेल एक साधारण किसान परिवार से ग्रामीण परिवेश में पले बड़े हुए, वहीं नेहरू को पारिवारिक विरासत का धनी कहा जा सकता है। व्यक्ति अपनी प्रकृति का अनुसरण करके ही कार्य कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है पटेल और नेहरू दोनों के लिए मार्गदर्शी महात्मा गाँधी ही थे और जो कुछ सामंजस्य या वैचारिकता का आदान-प्रदान रहता उसमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी, क्योंकि महात्मा गाँधी समय की नजाकत को पहले ही भांप लेते थे। सरदार पटेल भी ऐसा कोई कार्य नहीं करते थे जिससे गाँधीजी को ठेस पहुँचे परन्तु जब मामला राष्ट्रहित का होता या भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए मत भिन्न होता तो वे गाँधीजी को इससे सचेत करते थे और आव यकता होने पर विरोध भी जताते थे। पटेल और नेहरू दोनों को ही आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है और दोनों में अनेक समानताओं के होते हुए भी वैचारिक भिन्नता थी। दोनों में ही राष्ट्र भक्ति, नेतृत्व क्षमता, आदर्शों के प्रति आस्था थी। डॉ. बी.के. केसकर ने कहा था- नेहरू और पटेल दो विरोधी तत्वों का एक ऐसा मिश्रण थे, जो एक-दूसरे के पूरक थे। नेहरू की विचारधारा साम्यवाद से प्रभावित थी जबकि पटेल ने किसी भी विचारधारा को अपने पर हावी नहीं होने दिया। इन विपरीत स्वभावों से जुड़ी दोनों धुरियों को महात्मा गाँधी ने एक साथ बांधे रखने का कार्य किया था। हालाकि सरदार पटेल और नेहरू दोनों का सपना एक मजबूत भारत का निर्माण करना था परन्तु पटेल वास्तविक  एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण से समस्या पर विचार करते थे और प्रत्येक समस्या के भविष्य के परिणामों का अंदाजा लगा लेते थे। उदाहरण के तौर पर जूनागढ़ और हैदराबाद के मामले में पटेल ने नेहरू की इच्छा के विरूद्ध जाकर कार्यवाही की और भारत में मिला लिया। क मीर के मामले में नेहरू ने अपनी अन्तर्राष्ट्रीय नीति के कारण बिना पटेल से विचार विमर्श किए समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए जिसके पटेल सख्त विरोधी रहे और समस्या आज तक बनी हुई है। इसी प्रकार चीन की मित्रता पर भी पटेल ने कभी विश्वास नहीं किया बल्कि संभावित खतरों की ओर पहले ही ईशारा कर दिया था। नेहरू ने 1 अगस्त 1947 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ। इस पत्र का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तम्भ हैं। इसी के उत्तर में पटेल ने नेहरू को लिखा कि एक अगस्त के पत्र के लिए धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग व प्रेम रहा है तथा 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आ है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको इस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी ने नहीं किया है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए में आपका कृतज्ञ हूँ।”
      सरदार पटेल वचन के पक्के तथा सहयोग से काम करने वाले व्यक्ति थे जबकि जवाहरलाल नेहरू महत्वाकांक्षी अधिक थे लेकिन महत्वाकांक्षी होते हुए भी पटेल की योग्यता पर पूर्ण वि वासी थे। गाँधीजी की मृत्यु उपरांत 3 फरवरी 1948 को पं. नेहरू ने पटेल को लिखा-"बापू की अन्तिम अभिलाषा यह थी हम दोनों ने अब तक जिस तरह कन्धे से कन्धा मिलाकर काम किया है, उसी तरह आगे भी करते रहें। हमारे मतभेदों में से भी हमारे बीच महत्व के विषयों में जो मतैक्य है, वह स्पष्ट रूप से सामने आ चुका है और उसी में से एक दूसरे के प्रति हमारा आदर भाव भी प्रकट हुआ है।"
          वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते। वस्तुतः वल्लभ भाई पटेल के जीवन के बारे में पढ़ना भारतीय संस्कृति एवं भारतीय मूल्यों को पढ़ने के समान है।  
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