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Wednesday, April 2, 2025

चर्चा प्लस | पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस (सागर दिनकर में प्रकाशित)
    पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का
       - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह  
         नवरात्रि देवी स्तुति के रूप में स्त्री शक्ति के जागरण का त्योहार है। नवरात्रि के दौरान इस बात का स्मरण किया जाता है कि जिस प्रकार देवी दुर्गा ने असुरों का वध किया और जगत के पालन के लिए विविध रूपों में प्रकट हुईं, ठीक उसी प्रकार स्त्री को भी अपनी शक्ति एवं दायित्वों को पहचानना, परखा और अमल में लाना चाहिए। यदि स्त्री स्वयं को शक्ति स्वरूपा मान कर आत्मबल से काम ले तो वह कभी अबला हो ही नहीं सकती है। यही संदेश निहित है इस पूरे नौदिवसीय त्योहार में। इसीलिए कहा गया है- ‘‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!’’    
       जब व्यक्ति दुख से ग्रस्त होता है तो उसे आत्मबल की आवश्यकता होती है और जब प्रत्यक्ष आत्मबल नहीं मिल पाता है तो अप्रत्यक्ष अर्थात दैवीय शक्ति के प्रति उसकी आस्था उसे आत्मबल प्रदान करती है। व्यक्ति यही सोचता है कि उसकी सहायता कोई करे या न करे, पर ईश्वर उसकी मदद करेगा। यही विचार उसे आत्मबल से भर देता है। इसके बाद निराशा से उबरा हुआ व्यक्ति अपने लिए सुगमता से सही मार्ग ढूंढ लेता है। स्त्रियां स्वयं को अबला, असहाय, अशक्त मान कर स्वयं को तुच्छ प्राणी न समझती रहें, इसीलिए नवरात्रि का त्योहार उन्हें विशेष आत्मबल प्रदान करता है। एक स्त्री भी शक्ति स्वरूपा हो सकती है यदि वह असुरों का डट कर मुकाबला करे और उनका दमन करने की ठान ले। वर्तमान समाज में असुर आचरण करने वाले वे सभी हैं जो स्त्रियों का मा सम्मान नहीं करते हैं तथा उन्हें मात्र उपभोग की वस्तु समझते हैं। किन्तु इसके लिए आवश्यकता है देवी दुर्गा के स्वरूपों को समझने की। 

चैत्र नवरात्रि हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। ये नौ दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना के लिए समर्पित हैं। यह चैत्र मास में मनाया जाता है। वैसे दो नवरात्रियों का सर्वाधिक महत्व है- शारदीय नवरात्रि तथा चैत्र नवरात्रि। अन्यथा, वर्ष में अन्य नवरात्रियों भी मनाई जाती हैं। तिथियों के अनुरूप वर्ष में पांच नवरात्रि होती हैं- शरदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, आषाढ़ नवरात्रि, पौष नवरात्रि और माघ नवरात्रि। इनमें से प्रत्येक नवरात्रि का अपना विशिष्ट महत्त्व है।
नवरात्रि में देवी दुर्गा के अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। लेकिन इन नवरात्रि के पीछे की एक पौराणिक कथा भी है। दरअसल पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीनकाल में महिषासुर नाम का एक दानव हुआ करता था। उसने कठोर तपस्या से ब्रम्हा जी को प्रसन्न कर लिया। ब्रम्हा ने प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा। तब महिषासुर ने भगवान ब्रम्हा से अमर होने का वरदान मांगा। ब्रम्हा ने कहा कि अमर होने का वरदान नहीं दिया जा सकता। तब उसने ब्रम्हा से यह वरदान मांगा कि कोई पुरुष या देव अथवा दानव  उसे न मार सके। ब्रम्हा ने उसे वरदान दे दिया कि तीनों लोकों में कोई पुरुष, देव अथवा दानव उसे नहीं मार सकता है। यह वरदान पाने के बाद महिषासुर निद्र्वन्द्व हो गया। उसके अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ने लगे। उसे यह विश्वास हो चला था कि ब्रम्हा के वरदान के बाद अब वह अमर हो चला है। अब उसे कोई नहीं मार सकता है। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अपनी सत्ता स्थापित करने की योजना बनाई और देवलोक पर आक्रमण कर दिया। इस बात से घबराकर सभी देवता ब्रम्हा, विष्णु और महेश की शरण में गए। किन्तु त्रिदेव भी ब्रह्मा द्वारा दिए गए वरदान के समक्ष वे विवश थे। तब त्रिदेवों ने देवी दुर्गा से प्रार्थना की कि वे अपनी शक्ति का प्रयोग करें और महिषासुर का वध कर के ऋषियों एवं देवताओं की रक्षा करें। तब देवी दुर्गा आदिशक्ति के रूप में प्रकट हुई। नौ दिनों तक महिषासुर दानव और देवी दुर्गा के बीच में घमासान युद्ध चला। दसवें दिन मां दुर्गा ने दुष्ट दानव महिषासुर का अंत कर दिया। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। 

   इस त्यौहार की समाप्ति नौवें दिन होती है, ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम का जन्म हुआ था। अतः श्रीरामनवमी भी मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि के साथ ही हिन्दू नववर्ष का आरम्भ भी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि ग्राष्मकाल के आगमन का प्रतीक है। ऋतु परिवर्तन के साथ ही फसल के चक्र में भी परिवर्तन होता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। माता के भक्त सभी नौ दिनों ओर व्रत आदि रखते हैं। ये नौ दिन घरों में व्रत पूजा को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। नवरात्रि में साबूदाना खिचड़ी, कूटू के आटे की पूरी और सिंघाड़े की पूरी आदि बनाई जाती हैं।
प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग रूप की पूजा की जाती है। पहला दिन शैलपुत्री को समर्पित है, दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी को, तीसरा दिन चंद्रघंटा को, चैथा दिन कुष्मांडा को, पांचवां दिन स्कंदमाता को, छठा दिन कात्यायनी को, सातवां दिन कालरात्रि को, आठवां दिन महागौरी को और नौवां दिन सिद्धिदात्री को।

1. शैलपुत्री - देवी दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री या शैलजा के नाम से जाना जाता है। शैल का अर्थ है पर्वत और यह रूप पर्वत की पुत्री या देवी पार्वती को संदर्भित करता है जो राजा हिमवत अर्थात हिमालय पर्वत की पुत्री थीं। देवी पार्वती को देवी सती का पुनर्जन्म माना जाता है और उन्हें दो हाथों और माथे पर अर्धचंद्र के साथ एक स्त्री रूप में दर्शाया जाता है। वे अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं। उन्हें अपने वाहन या नंदी बैल की सवारी के साथ दर्शाया जाता है।
2. ब्रह्मचारिणी - ब्रह्मचारिणी या देवी दुर्गा के महिला तपस्वी रूप की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। उन्हें एक ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में दर्शाया जाता है जो अपने दाहिने हाथ में सूखे रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं।
3. चंद्रघंटा - तीसरे दिन पूजा जाने वाली दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा है। उनके माथे पर घंटी के आकार का एक अर्धचंद्र है जिसके कारण उनका नाम चंद्रघंटा भी पड़ा। देवी को उनकी तीसरी आंख खुली हुई अवस्था में दिखाई जाती हैं और वे सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार रहती हैं। उन्हें रणचंडी के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस योद्धा रूप में उनके 10 हाथ होते हैं जिनमें से दो में त्रिशूल, गदा, धनुष और बाण, खड्ग, कमल, घंटा और कमंडल हैं, उनका एक हाथ हमेशा आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा में रहता है जो भय को दूर करता है। 
4. कुष्मांडा - नवरात्रि के चैथे दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का चैथा रूप कुष्मांडा है। कुष्मांडा नाम को कु, ऊष्मा और अंड में विभाजित किया जा सकता है, जहां ‘‘कु’’ का अर्थ है थोड़ा, ऊष्मा का अर्थ है गर्मी या ऊर्जा और अंड का अर्थ है ब्रह्मांड। देवी दुर्गा के इस रूप को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें आदि शक्ति के नाम से भी जाना जाता है जिन्हें ब्रह्मांड के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। वे अपने वाहन के रूप में सिंह पर सवार दिखाई देती हैं।
5. स्कंदमाता - स्कंदमाता देवी दुर्गा का पांचवां रूप है और नवरात्रि के पांचवें दिन इनकी पूजा की जाती है, देवी के इस रूप को कार्तिकेय को गोद में लिए हुए एक मातृ देवी के रूप में दर्शाया गया है। उल्लेखनीय है कि कार्तिकेय को स्कंद के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं, तीन आँखों और शेर पर सवार एक महिला देवता के रूप में दर्शाया जाता है। देवी की चार भुजाओं में से दो में कमल है जबकि अन्य दो में से एक में कार्तिकेय और दूसरे हाथ में आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा है। 
6. कात्यायनी - कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है और नवरात्रि के छठे दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें देवी महादेवी या दुर्गा के योद्धा रूप के रूप में दर्शाया जाता है। दुर्गा के अन्य दो उग्र रूप भद्रकाली और चंडिका हैं। देवी दुर्गा के इस रूप को अठारह भुजाओं और देवताओं द्वारा उपहार में दिए गए विभिन्न हथियारों के साथ शेर पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उन्हें ऋषि कात्यायन के नाम पर कात्यायनी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने देवी दुर्गा की तपस्या की और उन्हें वरदान के रूप में अपनी बेटी के रूप में जन्म लेने के लिए कहा। अर्थात ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायिनी।
7. कालरात्रि - कालरात्रि सातवां रूप हैं। नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह देवी दुर्गा के सबसे रौद्र रूपों में से एक हैं। वे अंधकार और अज्ञान का नाश करने वाली हैं और उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है, उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो आशीर्वाद और सुरक्षा की मुद्रा में हैं जबकि अन्य दो में तलवार और वज्र रहता है। उन्हें काली के नाम से भी जाना जाता है।
8. महागौरी - महागौरी देवी दुर्गा का आठवां रूप हैं और नवरात्रि के आठवें दिन इस रूप की पूजा की जाती है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जिनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू रहता है। अन्य दो भुजाएँ आशीर्वाद और भय को दूर करने के लिए होते हैं जिन्हें क्रमशः वरद और अभय मुद्रा के रूप में भी जाना जाता है। वे एक बैल या सफेद हाथी पर सवार होती हैं।
9. सिद्धिदात्रि - देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप सिद्धिदात्रि है और नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें सभी सिद्धियों की प्रदाता माना जाता है। देवी के इस रूप को कमल पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने चार हाथों में कमल, शंख, गदा और चक्र धारण किए हुए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे महाशक्ति या सर्वोच्च देवी का अवतार हैं, जिन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया और शिव ने देवी सिद्धिदात्रि की पूजा करके सभी सिद्धियाँ प्राप्त कीं थीं।

  इस प्रकार देवी के नौ रूपों में मौजूद नौ शक्तियों के स्मरण कात्योहार नवरात्रि। देवी दुर्गा की प्रतिमा में चार अथवा आठ या फिर इससे भी अधिक हाथ बनाए जाते हैं। इन सभी हाथों में विविध आयुध होते हैं। यह मां दुर्गा का शक्तिपुंज स्वरूप होता है। इसकी यदि आज के आधुनिक प्रसंग के रूप में व्याख्या की जाए तो दुर्गा के इस श्ीक्ति पुंज रूप का अरशय है कि बुराई के विरुद्ध विभिन्न स्त्रियों एकजुट हो कर शंखनाद करें और बुराई के शमन का प्रयास करें तो वे अपनी शक्तियों से किसी भी अपराधी को पराजित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, एक स्त्री सड़क पर जा रही है। कोई उद्दण्ड व्यक्ति उसका दुपट्टा या साड़ी का पल्लू खींचता है तो उस स्त्री को डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे जोर से चिल्लाना चाहिए। उसकी पुकार को सुन कर अन्य स्त्रियों को उसकी मदद के लिए आगे बढ़ना चाहिए और फिर सब मिल कर उस मनचले को सबक सिखा दें तो फिर कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकेगा। लेकिन एक दृश्य यदाकदा ही दिखता है कि जब महिलाएं अपनी शक्ति को पहचान कर, एक जुट हो कर अपने विरुद्ध उठाए गए हर कदम का विरोध करती हों। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौरूपों का स्मरण करने मात्र से संकट दूर होने की आकांक्षा रखने की बजाए उन नौ रूपों से सीख ले कर अपना आत्मबल बढ़ाना ही इस त्योहार की सार्थकता है।  इस त्योहार को यदि आडंबर की दृष्टि से न देख कर इन शक्तियों को सहज भाव से आत्मसात करने की दृष्टि से देखा जाए तो अनुभव होगा कि ये शक्तियों मनुष्य के भीतर आत्मबल के रूप में उपस्थित रहती हैं। इसी सत्य का स्मरण कराता है यह त्योहार।  
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Friday, September 13, 2024

शून्यकाल | श्रीगणेश के प्रथमपूज्य देवता होने का समसामयिक महत्व | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम - 'शून्यकाल'  
       श्रीगणेश के प्रथमपूज्य देवता होने का समसामयिक महत्व
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

             चाहे हिन्दू हों अथवा किसी अन्य धर्म को मानने वाले, किन्तु सभी जानते हैं कि हिन्दू पूजाविधि में श्रीगणेश की पूजा से ही हर अनुष्ठान आरम्भ होता है। हिन्दू धर्म में श्रीगणेश को कार्य आरम्भ करने का पर्याय माना गया है। इसीलिए किसी भी कार्य को आरम्भ करते हुए कहा जाता है कि ‘‘श्रीगणेश किया जाए’’। गणेश को विघ्नविनाशक देवता माना गया है अतः कार्य प्रारम्भ होने के पूर्व यह विध्नहर्ता की प्रार्थना भी आवश्यक है। किन्तु श्रीगणेश ही क्यों प्रथमपूज्य देवता माने गए, जबकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तो स्वयं में सर्वशक्तिमान देवता हैं? तो चलिए देखते हैं उन पौराणिक कथाओं को जो यह बताती हैं कि गणेश प्रथमपूज्य देवता कैसे बने। ये कथाएं वर्तमान जीवन को भी महत्वपूर्ण सबक देती हैं।

     हिन्दू धर्म संस्कृति में हर शुभकार्य एवं पूजाविधि का आरंभ श्रीगणेश पूजा से ही होता है। कुछ लोग कार्य का शुभारंभ करते समय सर्वप्रथम ‘‘श्रीगणेशाय नमः’’ लिखते हैं। यहां तक कि चिट्ठी और महत्वपूर्ण कागजों में लिखते समय भी ‘‘ऊं’’ या ‘‘श्रीगणेश’’ का नाम अंकित करते हैं। क्योंकि यह माना जाता है कि श्रीगणेश के नाम स्मरण मात्र से उनके कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं। शुभकार्यों के आरंभ एवं पूजन के पूर्व श्रीगणेश पूजा ही क्यों की जाती है? इस संबंध में पौराणिक ग्रंथों में विविध कथाएं मिलती है। 
कहा जाता है कि कोई भी जीत बल से नहीं वरन बुद्धि से हासिल होती है। एक पहलवान शारीरिक दृष्टि से कितना भी बलशाली क्यों न हो, यदि उसमें दांव-पेंच की बुद्धि नहीं है तो उसका पटखनी खाना तय है। इसी बात को प्रमाणित करती है यह कथा कि श्रीगणेश प्रथमपूज्य देवता कैसे बने। 

कथा के अनुसार एक बार सभी देवता इंद्र की सभा में बैठे हुए थे। बात पृथ्वीलोक की होने लगी। तब यह प्रश्न उठा कि पृथ्वी पर किस देवता की पूजा सबसे पहले होनी चाहिए? सभी देवता स्वयं को बड़ा बताते हुए दावा करने लगे कि उनकी पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। तब देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप किया और सलाह दी कि सभी देवता अपने-अपने वाहन से पृथ्वी की परिक्रमा करें। जो देवता सबसे पहले परिक्रमा पूरी कर लेगा, वही पृथ्वी पर प्रथमपूज्य होगा। देवर्षि नारद ने शिव से निणार्यक बनने का आग्रह किया। सभी देव अपने वाहनों पर सवार हो चल पड़े। विष्णु गरुड़ पर, कार्तिकेय मयूर पर, इन्द्र ऐरावत पर सवार हो कर तेजी से निकल पड़े। जबकि श्रीगणेश मूषक पर सवार हुए और अपने पिता शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। माता पार्वती ने गणेश का यह कृत्य देखा तो उनसे पूछा कि ‘‘गणेश यह तुम क्या कर रहे हो? सभी देवता परिक्रमा के लिए निकल पड़े हैं और तुम हमारी परिक्रमा कर के यही खड़े हो? क्या तुम्हें पृथ्वी का प्रथमपूज्य देवता नहीं बनना है?’’
इस पर गणेश जी ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया,‘‘माता! मैंने आप दोनों की परिक्रमा कर के पृथ्वी ही नहीं अपितु पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर ली है। माता-पिता में ही पूरा ब्रह्मांड समाया होता है। अब मुझे पृथ्वी की परिक्रमा कर के क्या करना है!’’
पुत्र गणेश का उत्तर सुन कर शिव और पार्वती दोनों प्रसन्न हो गए। वे समझ गए कि उनका यह पुत्र सबसे अधिक बुद्धिमान है और एक सबसे बुद्धिमान देवता की पूजा से ही हर कार्य आरम्भ होना चाहिए।
तभी सभी देवताओं में कार्तिकेय सबसे पहले लौटा और उसने गर्व से कहा कि ‘‘पिताश्री! मैं पृथ्वी की परिक्रमा कर के सबसे पहले आया हूं अतः अब पृथ्वीवासी सबसे पहले मेरी पूजा किया करेंगे। मैं ही प्रथमपूज्य देवता हूं।’’  
तब शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि ‘‘हे पुत्र कार्तिकेय, तुम प्रथम नहीं आए हो! तुमसे पहले तुम्हारा भाई गणेश परिक्रमा कर चुका है। वह भी पृथ्वी की ही नहीं वरन पूरे ब्राम्हांड की। अतः यही प्रथमपूज्य होगा।’’ 
कार्तिकेय को यह सुन कर बहुत गुस्सा आया। उसे लगा कि माता-पिता पक्षपात कर रहे हैं। उसने शिव को उलाहना दिया कि ‘‘आप गणेश को इस लिए विजयी कह रहे हैं न क्योंकि वह आपका प्रिय पुत्र है? वह मोटा है और उसका वाहन छोटा चूहा है, इसलिए आपको उस पर दया आ रही है। यही बात है न?’’
यह सुन कर शिव ने पूर्ववत मुस्कुराते हुए कार्तिकेय को समझाया कि ‘‘नहीं पुत्र कार्तिकेय! मैं कोई पक्षपात नहीं कर रहा हूं। मेरे लिए मेरी सभी संतानें समान रूप से प्रिय हैं। तुम तथा अन्य देवता महर्षि नारद का प्रयोजन नहीं समझे जबकि गणेश ने समझ लिया। गणेश जान गया कि नारद बुद्धि की परीक्षा ले रहे हैं, परिक्रमा की गति की नहीं। अतः उसे बुद्धि से काम लिया और मेरी तथा तुम्हारी मां पार्वती की परिक्रमा करते हुए ब्रह्मांड की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त कर लिया। इस प्रकार उसने प्रतियोगिता भी जीत ली।’’
जब कार्तिकेय ने यह विवरण सुना तो वह लज्जित हो उठा और उसने श्रीगणेश को उनकी विजय पर बधाई दी। तब तक सभी देवता परिक्रमा कर के लौट आए थे। उन्होंने भी सर्व सम्मति से बुद्धि के देवता गणेश को प्रथमपूज्य देवता स्वीकार कर लिया।

एक अन्य कथा भी है जो श्रीगणेश के जन्म से जुड़ी हुई है। एक बार माता पार्वती स्नान करने के लिए स्नानघर में प्रवेश करने वाली थीं। किन्तु वहां आस-पास कोई नहीं था जिसे वे द्वार पर पहरा देने का काम सौंपतीं। वे नहीं चाहती थीं कि जब वे स्नान कर रही हों तो कोई आ कर उनके स्नानकर्म में व्यवधान डाले। तब माता पार्वती को एक उपाय सूझा। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण फूंक कर उसे जीवित कर दिया। प्राण प्राप्त होते ही बालक ने हाथ जोड़ कर पूछा,‘‘मेरे लिए क्या आज्ञा है माता?’’
‘‘तुम इस महल के द्वार पर पहरा दोगे। जब तक मेरा स्नान पूर्ण न हो जाए तब तक किसी को भी महल में प्रवेश मत करने देना।’’ पार्वती ने आज्ञा दी।
‘‘आपकी आज्ञा शिरोधार्य माता!’’ कहते हुए वह बालक द्वार पर पहरा देने लगा। 
कुछ देर में भगवान शिव वहां आ पहुंचे। द्वार पर बैठा बालक तो सद्यः जन्मा था अतः शिव अथवा किसी अन्य व्यक्ति के बारे में उसे ज्ञान नहीं था। उसने शिव को महल में प्रवेश करने से रोका। शिव ने उसे सामझाया कि वे इसी महल में रहते हैं और जिस माता की आज्ञा का तुम पालन कर रहे हो वह मेरी अद्र्धांगिनी है।
‘‘तो क्या अद्र्धांगिनी की कोई अपनी इच्छा या प्रतिष्ठा नहीं होती है? यदि वे चाहती हैं कि इस समय महल में कोई प्रवेश न करे, तो उनकी यह इच्छा आप पर भी लागू होती है।’’ उस बालक ने तर्क दिया। यह सुन कर शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोधावेश में बालक का सिर काट दिया। तब तक झगड़े की आवाज सुन कर पार्वती द्वार तक आ पहुंची थीं। उन्होंने उस बालक को सिरविहीन देखा तो दुख और क्रोध से भर उठीं।
‘‘यह आपने क्या किया? आपने मेरे पुत्र का सिर क्यों काटा? मेरा पुत्र आपका भी पुत्र हुआ अतः आपने अपने पुत्र का सिर काट कर आप पुत्रहंता बन गए।’’ पार्वती ने कहा।
‘‘मुझे नहीं मालूम था कि यह आपका पुत्र है? यह हठ कर रहा था और मुझे महल में प्रवेश नहीं करने दे रहा था इसीलिए मुझे क्रोध आ गया।’’ शिव ने पार्वती को शांत करना चाहा।
‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती हूं! आप मेरे आज्ञाकारी पुत्र को जीवित करिए, अन्यथा मैं भी प्राण त्याग दूंगी।’’ पार्वती ने शिव को चेतावनी दी।
तब शिव ने हाथी के सद्यःमृत बच्चे के सिर को उस बालक धड़ से जोड़ दिया जिससे वह बालक पुनर्जीवित हो उठा। सूंड़धारी उस बालक को माता पार्वती ने प्रसन्नता से गले लगा लिया। उस बालक ने भगवान शिव को प्रणाम करते हुए कहा,‘‘पिताश्री, जिस प्रकार माता पार्वती ने मुझे बनाया और मुझे प्राण दिए उसी प्रकार आपने मुझे पुनर्जीवन दिया अतः आप दोनों मेरे जन्मदाता माता-पिता हैं, मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूं।’’
यह सुन कर भगवान शिव समझ गए कि यह बालक सामान्य नहीं है अपितु सभी देवताओं में बुद्धिमान है अतः उन्होंने उस बालक का नामकरण करते हुए उसे आर्शीवाद दिया कि ‘‘तुम आज से गणेश, गणपति एवं गजानन, गजवदन आदि नामों से जाने जाओगे और तुम बुद्धि के देवता होने के कारण सभी देवताओं से पहले पूजे जाओगे।’’
   यह सुन कर माता पार्वती का क्रोध शांत हो गया तथा उन्होंने अपने पुत्र गणेश को ‘‘श्रीगणेश’’ कह कर संबोधित किया।

श्रीगणेश के प्रथम पूज्य होने के संबंध में प्रचलित तीसरी कथा इस प्रकार है कि एक बार पार्वती के मन में यह इच्छा पैदा हुई कि उनका एक ऐसा पुत्र हो जो समस्त देवताओं में प्रथम पूजन पाए। इन्होंने अपनी इच्छा भगवान शिव को बताई। इस पर शिव ने उन्हें पुष्पक व्रत करने की सलाह दी। पार्वती ने पुष्पक व्रत का अनुष्ठान करने का संकल्प किया और उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया। शुभ मुहूर्त पर यज्ञ का आरम्भ हुआ। ब्रह्माजी के पुत्र सनत कुमार यज्ञ की पुरोहिताई कर रहे थे। 
यज्ञ पूर्ण होने पर विष्णु ने पार्वती को आशीर्वाद दिया कि जिस प्रकार यह यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ है उसी प्रकार आपकी इच्छानुरूप विध्नविनाशक पुत्र आपको प्राप्त होगा। विष्णु से यह आशीर्वाद पा कर माता पार्वती प्रसन्न हो उठीं। यह देख कर सनत कुमार ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘‘मैं इस यज्ञ का ऋत्विक हूं। पुरोहित हूं। यज्ञ भले ही सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है, परंतु शास्त्र-विधि के अनुसार जब तक पुरोहित को उचित दक्षिणा देकर संतुष्ट नहीं किया जाएगा, तब तक यज्ञकर्ता को यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होगा।’’
‘‘बताइए आपको दक्षिणा में क्या चाहिए?’’ माता पार्वती ने सनत कुमार से पूछा।
‘‘माता भगवती, मैं आपके पतिदेव शिव जी को दक्षिणा स्वरूप चाहता हूं।’’ सनत कुमार ने विचित्र मांग की। 
‘‘ऋत्विक सनत कुमार!, आप एक स्त्री से उसका पति अर्थात् उसका सौभाग्य मांग रहे हैं जो देना मेरे लिए संभव नहीं है। अतः आप कुछ और मांगिए।’’ माता पार्वती ने सनत कुमार की मांग ठुकराते हुए कहा। 
सनत कुमार अपनी मांग पर अड़ गए। पार्वती ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि यदि मैं आपको अपना पति सौंप दूंगी तो मुझे पुत्र की प्राप्ति कैसे होगी? यज्ञ का फल तो उस स्थिति में भी नहीं मिलेगा। अतः आप हठ छोड़ दें। किन्तु सनत कुमार अपना हठ छोड़ने को तैयार नहीं थे। तब शिव ने पार्वती को समझाया कि ‘‘आप मुझे सनत कुमार को दक्षिणा में दान कर दें और विश्वास रखें कि आपकी इच्छा भी पूर्ण होगी।’’ 
पार्वती सनत कुमार को दक्षिणा में शिव का दान करने ही वाली थीं कि एक दिव्य प्रकाश के रूप में विष्णु प्रकाशित हुए तथा अगले ही पल श्रीकृष्ण का रूप धारण कर के सनत कुमार के सामने आ खड़े हुए। सनत कुमार ने विष्णु के कृष्ण रूप का दर्शन किया और कहा,‘‘मेरी इच्छा पूर्ण हुई अब मुझे दक्षिणा नहीं चाहिए। मैं जानता था कि आपको दान देने से रोकने के लिए विष्णु मेरी इच्छा पूर्ण अवश्य करेंगे।’’
इसके बाद सभी देवता तथा यज्ञकर्ता पार्वती को आशीर्वाद देकर वहां से चले गए। पार्वती अभी अपनी प्रसन्नता से आनन्दित ही हो रही थीं कि एक विप्र याचक वहां आ गया। उसने खाने को कुछ मांगा। पार्वती ने उसे मिष्ठान्न दिए। उतना खा लेने के बाद वह याचक बोला,‘‘मां अभी भूख नहीं मिटी है, थोड़ा और दो!’’
पार्वती ने और मिष्ठान्न दे दिया। इसके बाद याचक खाता जाता और मांगता जाता। पार्वती उसे खिला-खिला कर थक गईं। उन्होंने शिव से कहा कि ‘‘ये न जाने कैसा याचक आया है जिसका पेट ही नहीं भर रहा है। मैं तो खिला-खिला कर थक गई।’’ 
‘‘कहां है वह याचक?’’ कहते हुए शिव याचक को देखने निकले तो वहां कोई नहीं था। पार्वती चकित रह गईं कि अभी तो वह याचक भोजन की मांग कर रहा था और पल भर में कहां चला गया? तब शिव ने पार्वती को उस याचक का रहस्य समझाया कि वह कोई याचक नहीं बल्कि तुम्हारे उदर से जन्म लेने की तैयार कर रहा गणेश है जो जन्म के बाद लंबोदर कहलाएगा और देवताओं में प्रथम भोग पाने वाला प्रथम पूज्य होगा।’’
ये तीनों कथाएं न केवल अयंत रोचक हैं बल्कि यह बताती हैं कि बुद्धि का उपयोग करने वाला ज्ञानी ही प्रथम पूज्य बनता है। इन कथाओं को मात्र धार्मिक भावना से नहीं, वरन ज्ञान भावना से भी समझने का प्रयास करना चाहिए। बुद्धि ही है जो जीवन में सुख, संपदा और सफलता दिलाती है तथा बुद्धि के देवता हैं श्री गणेश इसीलिए तो वे ही प्रथम पूज्य देवता हैं। 
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Wednesday, September 20, 2023

चर्चा प्लस | श्रीगणेश के प्रथमपूज्य देवता होने का समसामयिक महत्व | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
श्रीगणेश के प्रथमपूज्य देवता होने का समसामयिक महत्व           
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
          चाहे हिन्दू हों अथवा किसी अन्य धर्म को मानने वाले, किन्तु सभी जानते हैं कि हिन्दू पूजाविधि में श्रीगणेश की पूजा से ही हर अनुष्ठान आरम्भ होता है। हिन्दू धर्म में श्रीगणेश को कार्य आरम्भ करने का पर्याय माना गया है। इसीलिए किसी भी कार्य को आरम्भ करते हुए कहा जाता है कि ‘‘श्रीगणेश किया जाए’’। गणेश को विघ्नविनाशक देवता माना गया है अतः कार्य प्रारम्भ होने के पूर्व यह विघ्नहर्ता की प्रार्थना भी आवश्यक है। किन्तु श्रीगणेश ही क्यों प्रथमपूज्य देवता माने गए, जबकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तो स्वयं में सर्वशक्तिमान देवता हैं? तो चलिए देखते हैं उन पौराणिक कथाओं को जो यह बताती हैं कि गणेश प्रथमपूज्य देवता कैसे बने। ये कथाएं वर्तमान जीवन को भी महत्वपूर्ण सबक देती हैं।
हिन्दू धर्म संस्कृति में हर शुभकार्य एवं पूजाविधि का आरंभ श्रीगणेश पूजा से ही होता है। कुछ लोग कार्य का शुभारंभ करते समय सर्वप्रथम ‘‘श्रीगणेशाय नमः’’ लिखते हैं। यहां तक कि चिट्ठी और महत्वपूर्ण कागजों में लिखते समय भी ‘‘ऊं’’ या ‘‘श्रीगणेश’’ का नाम अंकित करते हैं। क्योंकि यह माना जाता है कि श्रीगणेश के नाम स्मरण मात्र से उनके कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं। शुभकार्यों के आरंभ एवं पूजन के पूर्व श्रीगणेश पूजा ही क्यों की जाती है? इस संबंध में पौराणिक ग्रंथों में विविध कथाएं मिलती है।
कहा जाता है कि कोई भी जीत बल से नहीं वरन बुद्धि से हासिल होती है। एक पहलवान शारीरिक दृष्टि से कितना भी बलशाली क्यों न हो, यदि उसमें दांव-पेंच की बुद्धि नहीं है तो उसका पटखनी खाना तय है। इसी बात को प्रमाणित करती है यह कथा कि श्रीगणेश प्रथमपूज्य देवता कैसे बने।
कथा के अनुसार एक बार सभी देवता इंद्र की सभा में बैठे हुए थे। बात पृथ्वीलोक की होने लगी। तब यह प्रश्न उठा कि पृथ्वी पर किस देवता की पूजा सबसे पहले होनी चाहिए? सभी देवता स्वयं को बड़ा बताते हुए दावा करने लगे कि उनकी पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। तब देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप किया और सलाह दी कि सभी देवता अपने-अपने वाहन से पृथ्वी की परिक्रमा करें। जो देवता सबसे पहले परिक्रमा पूरी कर लेगा, वही पृथ्वी पर प्रथमपूज्य होगा। देवर्षि नारद ने शिव से निणार्यक बनने का आग्रह किया। सभी देव अपने वाहनों पर सवार हो चल पड़े। विष्णु गरुड़ पर, कार्तिकेय मयूर पर, इन्द्र ऐरावत पर सवार हो कर तेजी से निकल पड़े। जबकि श्रीगणेश मूषक पर सवार हुए और अपने पिता शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। माता पार्वती ने गणेश का यह कृत्य देखा तो उनसे पूछा कि ‘‘गणेश यह तुम क्या कर रहे हो? सभी देवता परिक्रमा के लिए निकल पड़े हैं और तुम हमारी परिक्रमा कर के यही खड़े हो? क्या तुम्हें पृथ्वी का प्रथमपूज्य देवता नहीं बनना है?’’
इस पर गणेश जी ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया,‘‘माता! मैंने आप दोनों की परिक्रमा कर के पृथ्वी ही नहीं अपितु पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर ली है। माता-पिता में ही पूरा ब्रह्मांड समाया होता है। अब मुझे पृथ्वी की परिक्रमा कर के क्या करना है!’’
  पुत्र गणेश का उत्तर सुन कर शिव और पार्वती दोनों प्रसन्न हो गए। वे समझ गए कि उनका यह पुत्र सबसे अधिक बुद्धिमान है और एक सबसे बुद्धिमान देवता की पूजा से ही हर कार्य आरम्भ होना चाहिए।
तभी सभी देवताओं में कार्तिकेय सबसे पहले लौटा और उसने गर्व से कहा कि ‘‘पिताश्री! मैं पृथ्वी की परिक्रमा कर के सबसे पहले आया हूं अतः अब पृथ्वीवासी सबसे पहले मेरी पूजा किया करेंगे। मैं ही प्रथमपूज्य देवता हूं।’’  
तब शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि ‘‘हे पुत्र कार्तिकेय, तुम प्रथम नहीं आए हो! तुमसे पहले तुम्हारा भाई गणेश परिक्रमा कर चुका है। वह भी पृथ्वी की ही नहीं वरन पूरे ब्राम्हांड की। अतः यही प्रथमपूज्य होगा।’’
कार्तिकेय को यह सुन कर बहुत गुस्सा आया। उसे लगा कि माता-पिता पक्षपात कर रहे हैं। उसने शिव को उलाहना दिया कि ‘‘आप गणेश को इस लिए विजयी कह रहे हैं न क्योंकि वह आपका प्रिय पुत्र है? वह मोटा है और उसका वाहन छोटा चूहा है, इसलिए आपको उस पर दया आ रही है। यही बात है न?’’
यह सुन कर शिव ने पूर्ववत मुस्कुराते हुए कार्तिकेय को समझाया कि ‘‘नहीं पुत्र कार्तिकेय! मैं कोई पक्षपात नहीं कर रहा हूं। मेरे लिए मेरी सभी संतानें समान रूप से प्रिय हैं। तुम तथा अन्य देवता महर्षि नारद का प्रयोजन नहीं समझे जबकि गणेश ने समझ लिया। गणेश जान गया कि नारद बुद्धि की परीक्षा ले रहे हैं, परिक्रमा की गति की नहीं। अतः उसे बुद्धि से काम लिया और मेरी तथा तुम्हारी मां पार्वती की परिक्रमा करते हुए ब्रह्मांड की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त कर लिया। इस प्रकार उसने प्रतियोगिता भी जीत ली।’’
जब कार्तिकेय ने यह विवरण सुना तो वह लज्जित हो उठा और उसने श्रीगणेश को उनकी विजय पर बधाई दी। तब तक सभी देवता परिक्रमा कर के लौट आए थे। उन्होंने भी सर्व सम्मति से बुद्धि के देवता गणेश को प्रथमपूज्य देवता स्वीकार कर लिया।
       एक अन्य कथा भी है जो श्रीगणेश के जन्म से जुड़ी हुई है। एक बार माता पार्वती स्नान करने के लिए स्नानघर में प्रवेश करने वाली थीं। किन्तु वहां आस-पास कोई नहीं था जिसे वे द्वार पर पहरा देने का काम सौंपतीं। वे नहीं चाहती थीं कि जब वे स्नान कर रही हों तो कोई आ कर उनके स्नानकर्म में व्यवधान डाले। तब माता पार्वती को एक उपाय सूझा। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण फूंक कर उसे जीवित कर दिया। प्राण प्राप्त होते ही बालक ने हाथ जोड़ कर पूछा,‘‘मेरे लिए क्या आज्ञा है माता?’’
‘‘तुम इस महल के द्वार पर पहरा दोगे। जब तक मेरा स्नान पूर्ण न हो जाए तब तक किसी को भी महल में प्रवेश मत करने देना।’’ पार्वती ने आज्ञा दी।
‘‘आपकी आज्ञा शिरोधार्य माता!’’ कहते हुए वह बालक द्वार पर पहरा देने लगा।
कुछ देर में भगवान शिव वहां आ पहुंचे। द्वार पर बैठा बालक तो सद्यः जन्मा था अतः शिव अथवा किसी अन्य व्यक्ति के बारे में उसे ज्ञान नहीं था। उसने शिव को महल में प्रवेश करने से रोका। शिव ने उसे सामझाया कि वे इसी महल में रहते हैं और जिस माता की आज्ञा का तुम पालन कर रहे हो वह मेरी अद्र्धांगिनी है।
‘‘तो क्या अद्र्धांगिनी की कोई अपनी इच्छा या प्रतिष्ठा नहीं होती है? यदि वे चाहती हैं कि इस समय महल में कोई प्रवेश न करे, तो उनकी यह इच्छा आप पर भी लागू होती है।’’ उस बालक ने तर्क दिया। यह सुन कर शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोधावेश में बालक का सिर काट दिया। तब तक झगड़े की आवाज सुन कर पार्वती द्वार तक आ पहुंची थीं। उन्होंने उस बालक को सिरविहीन देखा तो दुख और क्रोध से भर उठीं।
‘‘यह आपने क्या किया? आपने मेरे पुत्र का सिर क्यों काटा? मेरा पुत्र आपका भी पुत्र हुआ अतः आपने अपने पुत्र का सिर काट कर आप पुत्रहंता बन गए।’’ पार्वती ने कहा।
‘‘मुझे नहीं मालूम था कि यह आपका पुत्र है? यह हठ कर रहा था और मुझे महल में प्रवेश नहीं करने दे रहा था इसीलिए मुझे क्रोध आ गया।’’ शिव ने पार्वती को शांत करना चाहा।
‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती हूं! आप मेरे आज्ञाकारी पुत्र को जीवित करिए, अन्यथा मैं भी प्राण त्याग दूंगी।’’ पार्वती ने शिव को चेतावनी दी।
तब शिव ने हाथी के सद्यःमृत बच्चे के सिर को उस बालक धड़ से जोड़ दिया जिससे वह बालक पुनर्जीवित हो उठा। सूंड़धारी उस बालक को माता पार्वती ने प्रसन्नता से गले लगा लिया। उस बालक ने भगवान शिव को प्रणाम करते हुए कहा,‘‘पिताश्री, जिस प्रकार माता पार्वती ने मुझे बनाया और मुझे प्राण दिए उसी प्रकार आपने मुझे पुनर्जीवन दिया अतः आप दोनों मेरे जन्मदाता माता-पिता हैं, मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूं।’’
यह सुन कर भगवान शिव समझ गए कि यह बालक सामान्य नहीं है अपितु सभी देवताओं में बुद्धिमान है अतः उन्होंने उस बालक का नामकरण करते हुए उसे आर्शीवाद दिया कि ‘‘तुम आज से गणेश, गणपति एवं गजानन, गजवदन आदि नामों से जाने जाओगे और तुम बुद्धि के देवता होने के कारण सभी देवताओं से पहले पूजे जाओगे।’’
   यह सुन कर माता पार्वती का क्रोध शांत हो गया तथा उन्होंने अपने पुत्र गणेश को ‘‘श्रीगणेश’’ कह कर संबोधित किया।
         श्रीगणेश के प्रथम पूज्य होने के संबंध में प्रचलित तीसरी कथा इस प्रकार है कि एक बार पार्वती के मन में यह इच्छा पैदा हुई कि उनका एक ऐसा पुत्र हो जो समस्त देवताओं में प्रथम पूजन पाए। इन्होंने अपनी इच्छा भगवान शिव को बताई। इस पर शिव ने उन्हें पुष्पक व्रत करने की सलाह दी। पार्वती ने पुष्पक व्रत का अनुष्ठान करने का संकल्प किया और उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया। शुभ मुहूर्त पर यज्ञ का आरम्भ हुआ। ब्रह्माजी के पुत्र सनत कुमार यज्ञ की पुरोहिताई कर रहे थे।
यज्ञ पूर्ण होने पर विष्णु ने पार्वती को आशीर्वाद दिया कि जिस प्रकार यह यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ है उसी प्रकार आपकी इच्छानुरूप विध्नविनाशक पुत्र आपको प्राप्त होगा। विष्णु से यह आशीर्वाद पा कर माता पार्वती प्रसन्न हो उठीं। यह देख कर सनत कुमार ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘‘मैं इस यज्ञ का ऋत्विक हूं। पुरोहित हूं। यज्ञ भले ही सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है, परंतु शास्त्र-विधि के अनुसार जब तक पुरोहित को उचित दक्षिणा देकर संतुष्ट नहीं किया जाएगा, तब तक यज्ञकर्ता को यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होगा।’’
‘‘बताइए आपको दक्षिणा में क्या चाहिए?’’ माता पार्वती ने सनत कुमार से पूछा।
‘‘माता भगवती, मैं आपके पतिदेव शिव जी को दक्षिणा स्वरूप चाहता हूं।’’ सनत कुमार ने विचित्र मांग की।
‘‘ऋत्विक सनत कुमार!, आप एक स्त्री से उसका पति अर्थात् उसका सौभाग्य मांग रहे हैं जो देना मेरे लिए संभव नहीं है। अतः आप कुछ और मांगिए।’’ माता पार्वती ने सनत कुमार की मांग ठुकराते हुए कहा।
सनत कुमार अपनी मांग पर अड़ गए। पार्वती ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि यदि मैं आपको अपना पति सौंप दूंगी तो मुझे पुत्र की प्राप्ति कैसे होगी? यज्ञ का फल तो उस स्थिति में भी नहीं मिलेगा। अतः आप हठ छोड़ दें। किन्तु सनत कुमार अपना हठ छोड़ने को तैयार नहीं थे। तब शिव ने पार्वती को समझाया कि ‘‘आप मुझे सनत कुमार को दक्षिणा में दान कर दें और विश्वास रखें कि आपकी इच्छा भी पूर्ण होगी।’’
पार्वती सनत कुमार को दक्षिणा में शिव का दान करने ही वाली थीं कि एक दिव्य प्रकाश के रूप में विष्णु प्रकाशित हुए तथा अगले ही पल श्रीकृष्ण का रूप धारण कर के सनत कुमार के सामने आ खड़े हुए। सनत कुमार ने विष्णु के कृष्ण रूप का दर्शन किया और कहा,‘‘मेरी इच्छा पूर्ण हुई अब मुझे दक्षिणा नहीं चाहिए। मैं जानता था कि आपको दान देने से रोकने के लिए विष्णु मेरी इच्छा पूर्ण अवश्य करेंगे।’’
इसके बाद सभी देवता तथा यज्ञकर्ता पार्वती को आशीर्वाद देकर वहां से चले गए। पार्वती अभी अपनी प्रसन्नता से आनन्दित ही हो रही थीं कि एक विप्र याचक वहां आ गया। उसने खाने को कुछ मांगा। पार्वती ने उसे मिष्ठान्न दिए। उतना खा लेने के बाद वह याचक बोला,‘‘मां अभी भूख नहीं मिटी है, थोड़ा और दो!’’
पार्वती ने और मिष्ठान्न दे दिया। इसके बाद याचक खाता जाता और मांगता जाता। पार्वती उसे खिला-खिला कर थक गईं। उन्होंने शिव से कहा कि ‘‘ये न जाने कैसा याचक आया है जिसका पेट ही नहीं भर रहा है। मैं तो खिला-खिला कर थक गई।’’
‘‘कहां है वह याचक?’’ कहते हुए शिव याचक को देखने निकले तो वहां कोई नहीं था। पार्वती चकित रह गईं कि अभी तो वह याचक भोजन की मांग कर रहा था और पल भर में कहां चला गया? तब शिव ने पार्वती को उस याचक का रहस्य समझाया कि वह कोई याचक नहीं बल्कि तुम्हारे उदर से जन्म लेने की तैयार कर रहा गणेश है जो जन्म के बाद लंबोदर कहलाएगा और देवताओं में प्रथम भोग पाने वाला प्रथम पूज्य होगा।’’
ये तीनों कथाएं न केवल अयंत रोचक हैं बल्कि यह बताती हैं कि बुद्धि का उपयोग करने वाला ज्ञानी ही प्रथम पूज्य बनता है। इन कथाओं को मात्र धार्मिक भावना से नहीं, वरन ज्ञान भावना से भी समझने का प्रयास करना चाहिए। बुद्धि ही है जो जीवन में सुख, संपदा और सफलता दिलाती है तथा बुद्धि के देवता हैं श्री गणेश इसीलिए तो वे ही प्रथम पूज्य देवता हैं।  
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