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Tuesday, December 2, 2025

पुस्तक समीक्षा | अनुभवों के गलियारे से गुजर कर निकली ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | अनुभवों के गलियारे से गुजर कर निकली ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
अनुभवों के गलियारे से गुजर कर निकली ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - सिसकती यादें
कवि        - रंजीत सिंह लोधी ‘संदेश’
प्रकाशक     - उत्कर्ष प्रकाशन, 142, शाक्यपुरी, कंकरखेड़ा, मेरठ कैण्ट, उ.प्र.- 250001
मूल्य       - 200/-
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ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसने हिंदी में प्रवेश पाने के बाद ही अपनी सत्ता स्थापित कर ली। यह विधा रचनाकारों को अपने भाव प्रकट करने के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में लुभाती है। दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को नवीन सरोकारों के साथ स्थापना दी। नए प्रयोग, नए बिम्ब, नए संदर्भ ने हिंदी ग़ज़ल में अभिव्यक्ति को अनंत विस्तार दिया। अब तो हिंदी ग़ज़ल अपने आप में एक साहित्यिक संस्कार का रूप ले चुकी है। इस संस्कार के प्रकाश में रणजीत सिंह लोधी “संदेश” का प्रथम ग़ज़ल संग्रह  “सिसकती यादें” पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत हुआ है।
रंजीत सिंह की ग़ज़लों पर चर्चा करने से पूर्व एक बात पर ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं जो उन्होंने अपने आत्मकथन में लिखी है कि “मुझे दिव्यांग होते हुए भी आगे बढ़ाने एवं मंच देने में मेरे सभी कुटुंब जनों का भरपूर सहयोग व असीम स्नेह प्राप्त हुआ।” तो इस संदर्भ में मैं यही कहूंगी कि शारीरिक दिव्यांगता किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में या जीवन में सफलताएं प्राप्त करने में कभी रुकावट नहीं बन सकती है, रुकावट बनती है तो व्यक्ति की मानसिक दिव्यांगता। ग्राम सेसई साजी, तहसील बंडा जिला सागर में 15 सितम्बर 1981 को जन्मे रंजीत सिंह लोधी में भरपूर संवेदनशीलता है और जो व्यक्ति दूसरों के दुखों को महसूस कर सकता है और अपने दुख की भांति उसे आत्मसात करके व्यक्त कर सकता है वह जीवन में किसी भी मोर्चे पर कभी हार नहीं मान सकता, जोकि उनकी ग़ज़लों से भी प्रकट होता है। उनकी जीवटता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि वे दिव्यांग होने के बावजूद यमुनौत्री, केदारनाथ तथा चंदनबाडी से केदारनाथ की साहसिक पैदल यात्रा कर चुके हैं, जैसा कि उनके परिचय में लिखा है। वर्तमान में ग्राम्य अंचल पथरिया गौड़ के शासकीय हाई स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं। हिंदी साहित्य में स्नातक रंजीत सिंह लोधी जीवन में आदर्श एवं नैतिक मूल्यों को महत्व देते हैं। इसीलिए अन्याय, असंतुलन आदि देख कर उन्हें पीड़ा होती है।
अब बात संग्रह की ग़ज़लों की तो रंजीत सिंह लोधी ‘संदेश’ की ग़ज़लों में नवीन प्रयोग हैं जो सहसा ध्यान आकर्षित करते हैं तथा विषय की परिपक्वता को रेखांकित करते हैं। जैसे संग्रह की प्रथम ग़ज़ल के ये तीन शेर देखिए जिसमें ‘ग्रेट निकोबार’, “आशिकी” में होने वाले ‘संहार’ जैसे बिम्ब और संदर्भ रखे गए हैं-
अपनी संगत को सुधारो, बढ़ोगे तब आगे
तला  के  टापू  कभी  ग्रेट निकोबार  हुए।
आशिकी चीज है महंगी कठिन खर्चीली
कई  परवान  चढ़े  और कई संहार हुए।
हमें तो ठीक से आता नहीं पहाड़ तक
गए उसूल अब तो, तीन व दो-चार हुए।
जब बात प्रेम की हो तो संयोग एवं वियोग दोनों स्थितियां सामने आती हैं। स्वाभाविक है कि संयोग सुखद लगता है और वियोग कष्टप्रद। उस पर, यदि इस बात का अंदाजा हो कि कहीं कोई छल कपट किया गया है तो स्थिति और अधिक पीड़ादायी हो जाती है। इस बात को रंजीत सिंह ने अपनी ग़ज़ल में बड़ी साफ बयानी से कहा है, जिसमें उलाहना भी है, प्रेम की गरिमा भी है और पीड़ा भी। शेर देखिए-
तेरी गुस्ताखियों का भी तुझे सिला देंगे
वफा के आंसुओं से, घर तेरा हिला देंगे
तूने छुप-छुप के उसे प्यार किया था लेकिन
हमें ऐतराज क्या, हम खुद तुझे मिला देंगे ।
रंजीत सिंह लोधी ‘संदेश’ ने अपनी रचना धर्मिता के विकास के बारे में अपने आत्मकथन में लिखा है कि - ‘‘बंदी, अभिनंदन पत्र, विदाई पत्र, आदि से प्रारंभ हुई काव्ययात्रा काफी उतार-चढ़ाव के बाद आज गजल विधा को प्रतिष्ठित हो रही है। प्रारंभिक लेखन में देशभक्ति गीत, धार्मिक प्रसंगों पर गीत, कव्वाली, भजन कीर्तन, लेख आदि पर ध्यान केंद्रित रहा। शैक्षिक जीवन की अतिव्यस्ता के बीच कुछ मनोभावों को अंदर तक झकझोर देने वाली स्थितियों का सामना किया, किरदार बदले, लेकिन बर्ताव वही चिरपरिचित, स्वार्थ, धोखा, दिखावा, लालच से मन कई बार टूटा, मनोदशा को स्थिर करने और अपने आप को पुनः जीवन के विविध रंगों की ओर ले जाने के उद्देश्य से पश्चाताप, ग्लानि, उदासी को गजल के रूप में उकेरने का प्रयास किया, शैक्षिक मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन वाणी, मेरा प्रिय विषय रहा है, इन्हीं सब बिंदुओं को समावेश करते हुए... सजल नयनों से ओतप्रोत ए प्रथम गजल संग्रह ‘सिसकती यादें’ आपके सम्मुख प्रस्तुत है।’’
रंजीत सिंह लोधी की ग़ज़लों को पढ़कर कहीं से भी ऐसा प्रतीत नहीं होगा कि यह एक नवोदित ग़ज़लकार का पहला संग्रह है। एक ही ग़ज़ल में भावनाओं के कई शेड्स मिलते हैं। एक ही ग़ज़ल के इन शेरों को पढ़कर स्वतः विश्वास हो जाएगा -
कहां नाम   रखने  के  मतलब  मिले हैं।
हिफाजत की कांटों ने, तब गुल खिले हैं।
जहां सत्य, विश्वास  आशा  की  चाहत
वहां  सिर्फ    बदले  में   धोखे मिले हैं।
मिटा  दो  ये  दूरी, मेरे  पास आओ
निकालो दिलों में, जो शिकवे गिले हैं।
हमें इल्म था होंगे लम्बे या छोटे
मगर नाप के उसने कपड़े सिले हैं।
हमें नाज है अपने माता-पिता पर
नियम -  कायदों में हमेशा चले हैं।
इस संग्रह की हर ग़ज़ल अनुभवों की रोशनी से नहाई हुई है, इसलिए हर पाठक को ये अपनी आप बीती-सी लगेंगी। कोई भी व्यक्ति आज ऐसा नहीं है जिसे खुरदुरे अनुभवों से कभी दो-चार होना न पड़ा हो। कभी रोजगार को लेकर, तो कभी व्यापार को लेकर और कभी संबंधों के सरोकार को लेकर अनुभवों के दंश मन-मस्तिष्क को लहू लुहान करते ही रहते हैं। इसी संदर्भ में मध्यम बहर की एक ग़ज़ल का मुखड़ा और एक शेर देखिए-
सपने भी बेरंग दिखाए आँखों ने।
उम्मीदों को पंख लगाए आँखों ने।
अंदाजा था बेगुनाह साबित होंगे
सारे छुपे सबूत दिखाए आँखों ने।
80 ग़ज़लों के इस संग्रह में कवि रंजीत सिंह ने “स्व” और “पर” के बीच की महीन रेखा को मिटाते हुए जिस समग्रता से भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है वह प्रशंसनीय है। अकबर इलाहाबादी ने लिखा था कि -
खींचो न  कमानों  को,  न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो
भले ही अकबर इलाहाबादी के इस शेर का संदर्भ अलग है किंतु कुछ इसी तरह के भाव रंजीत सिंह की ग़ज़ल में भी आए हैं जिनमें वे जीवन के विभिन्न संदर्भ में कलम को चुनने का आह्वान करते हैं-
करना है कुछ अलग शोध तो कलम चुनो।
लेना  चाहो,  प्रतिशोध  तो   कलम चुनो।
तलवारों  से  रक्त  बहा   इंसानों   का
मिट जाएं सब गतिरोध तो कलम चुनो।
सभ्यताओं की सृजनशीलता कौन लिखे
गर चाहो इतिहास बोध तो कलम चुनो।
इस संग्रह की ग़ज़लें इस बात का सबूत हैं कि कभी नहीं पीड़ा को हथियार बनाने और जिंदगी को जीने का आह्वान किया है। कटु अनुभवों की  सिसकती यादों को हृदय में दबा कर आगे बढ़ने की चाह घोर निराशा में भी आशा का संचार करने की शक्ति रखती है। कवि  रंजीत सिंह की भाषाई पकड़ अच्छी है। उनमें अभिव्यक्ति की बेहतरीन क्षमता है जिसकी झलक उनके इस प्रथम संग्रह में देखी जा सकती है। इस संग्रह की ग़ज़लों को जरूर पढ़ा जाना चाहिए। मौलिक बिम्ब विधान उनकी ग़ज़लों को विशेष बनाता है।
संग्रह में डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, अशोक मिजाज़ ‘बद्र’ एवं ईश्वर दयाल गोस्वामी के भूमिकात्मक विचार हैं तथा सहावेन्द्र्र प्रताप सिंह ‘शशि’ का शुभकामना संदेश है। ‘‘सिसकती यादें’’ ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों को पढ़ कर विश्वास हो जाता है कि रंजीत सिंह लोधी “संदेश” की रचना धर्मिता में असीम संभावनाएं हैं। मुझे विश्वास है कि उनका यह प्रथम ग़ज़ल संग्रह पाठकों को पसंद आएगा।      
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Tuesday, November 4, 2025

पुस्तक समीक्षा | दर्द से ताहिली तक : भावनाओं की पैरवी करती ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा | दर्द से ताहिली तक : भावनाओं की पैरवी करती ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
दर्द से ताहिली तक : भावनाओं की पैरवी करती ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह  - दर्द से ताहिली तक
कवयित्री     - सपना ‘क्षिति’
प्रकाशक     -  जवाहर पुस्तकालय हिन्दी पुस्तक प्रकाशक एवं वितरक मथुरा-281001 (उ.प्र.)
मूल्य       - 250/-
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फारसी से उर्दू और उर्दू से हिन्दी में आई ग़ज़ल विधा को एक देशकालजयी काव्य विधा कहा जा सकता है। जब बात आती है हिन्दी और उर्दू की मिश्रित ग़ज़लों की तो अपने आप कौंधने लगती हैं अमीर खुसरो की हिन्दवी ग़ज़लें। अमीर खुसरो ने अपनी ग़ज़लों के शेरों में प्रथम पंक्ति फारसी में कहा तो दूसरी पंक्ति तत्कालीन हिन्दी में। जैसे-
जे-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ
शबान-ए-हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ ओ रोज-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

अमीर खुसरो की इन सूफ़ियाना हिन्दवी ग़ज़लों ने ग़ज़ल विधा को सार्वभौमिक स्वरूप दिया। वर्तमान में हिन्दी ग़ज़लों में उर्दू की प्रचुरता से समावेश भी लिता है, भले ही उसे हिन्दवी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है किन्तु हिन्दी और उर्दू का संतुलित प्रयोग हिन्दी ग़ज़ल के अंतर्गत बहुप्रचलित है तथा मान्य भी है। इस संदर्भ में सपना ‘‘क्षिति’’ की ग़ज़लें हिन्दवी का स्मरण कराती हैं यद्यपि इसका आशय यह नहीं है कि उनकी ग़ज़लें अमीर खुसरो की ग़ज़लों के समकक्ष हैं किन्तु वे आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल विधा में भाषाई सौंदर्य के साथ सामने आती हैं।

यूं तो सपना ‘‘क्षिति’’ को काव्य सृजन की रुचि अपनी अवयस्क आयु से ही थी किन्तु जैसा कि उन्होंने अपने आत्मकथ्य में लिखा है कि विवाह के बाद उनके लेखन पर लगभग प्रतिबंध लग गया। यह बहुतेरी स्त्रियों के साथ हुआ है और होता रहता है कि ससुराल में सहयोग न मिलने से उनकी सृजनात्मकता धुंधली पड़ने लगती है। कई बार तो स्त्रियां अपनी साहित्यिक सृजनात्मकता को भूल कर घ-गृहस्थी की पर्याय बन कर रह जाती हैं। सपना ‘‘क्षिति’’ के साथ भी यही हो रहा था किन्तु उन्होंने विरोधों के समक्ष घुटने नहीं टेके। वे अपने आत्मकथ्य में लिखती हैं कि ‘‘चुनौतियों का सामना मुझे करना पड़ा। गजलों की तरफ मेरा रुझान 2017 से हुआ। उर्दू भाषा मुझे शुरू से ही अपनी ओर आकर्षित करती थी सो मैंने उम्दा गजलकारों को पढ़ना प्रारंभ कर दिया और इस तरह गजलों पर भी अपना हाथ आजमाना प्रारंभ कर दिया। ऐसा नहीं कि मैंने अन्य विधाओं में सृजन करना बंद कर दिया है। मैं आज भी हर विधा में लिखती हूँ। मैं अपनी गजलें या गीत लिखकर धुन बनाकर गाती भी हूँ। मैंने गजलों में मापनी को प्राथमिकता नहीं दी है क्योंकि मेरा मानना है कि यदि गजलों में भावों की भरमार हो तो ही वो दिलों तक पहुँचती हैं उसके लिये मापनी का होना अनिवार्य नहीं है।’’

ग़ज़ल में मापनी की अवहेलना प्रायः नहीं की जाती है अपितु इसे दोषपूर्ण भी माना जाता है। यद्यपि हिन्दी ग़ज़ल में उर्दू या फारसी मापनी अर्थात मीटर का पालन नहीं किया जाता है फिर भी मात्रिक छंद के स्वभाव को आत्मसात किया गया है। गेय ग़ज़लें मीटर के लिहाज़ से त्रुटिपूर्ण हो कर भी श्रवण में क्षम्य हो जाती हैं किन्तु जब वही ग़ज़लें पारखियों की दृृष्टि से गुज़रती हैं तो उन्हें दोषपूर्ण ठहराए जाने में एक पल नहीं लगता है। सपना ‘‘क्षिति’’ ने अपनी कई ग़ज़लों में मापनी की अवहेलना कर के जोखिम उठाया है किन्तु उनकी ग़ज़लें भावनात्मक दृष्टि से परिपक्व एवं महत्वपूर्ण हैं।

शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दमोह (म. प्र.) के हिन्दी के प्राध्यापक डॉ. कीर्तिकाम दुवे ने ‘‘खामोशी की जुबां’’ शीर्षक से संग्रह की भूमिका में लिखा है कि ‘‘सपना जी का प्रस्तुत गजल-संग्रह ये लगभग 80 रचनायें हैं, उनकी विषय-वस्तु भी बहुत व्यापक है। उनकी हर गजल को पढ़ते हुये मैं नये-नये अनुभव लोक से गुजरा, उन्होंने अपने ज्ञान, अनुभव और भाषा का सुन्दर सामंजस्य किया है। उन्होंने हर भाव को अपने केनवास पर उकेरा है-वे अपनी सच्चाई और साफगोई से बात करने व रखने में माहिर हैं। उनके पास भाषा की बड़ी ताकत है, मैंने अपने जीवन में पहली बार उर्दू और फारसी के इतने शब्दों से परिचय प्राप्त किया, जो मैंने सुने नहीं थे, क्षिति जी के पास हिन्दी-उर्दू का व्यापक शब्द संसार है, वे बाह्य आवरण रदीफ और काफिये को नहीं साधतीं, वे कई गजलों में उसकी आत्मा को छूती हैं। कई जगह उनकी प्रतिभा चमत्कृत करती है, उनकी गजलें दर्शन के कारण शायरी को नया फलसफाप्रदान करती हैं-यह गजल-संग्रह आम पाठक से लेकर दानिश्वरों तक सबको अपनी तरह का सुकूँन देगा। यह गजल के नीचे फुटनोट है, इसलिए क्लिष्ट शब्दों को समझने में दिक्कत नहीं होगी।’’

‘‘दर्द से ताहिली तक’’ की ग़ज़लों में भावनाओं की प्रधानता जीवन को भरपूर जीने का आग्रह करती हैं। कवयित्री सपना ‘‘क्षिति’’ अपने जीवन में जो दुख और विरोध झेले उनसे उन्हें जीने और आगे बढ़ने का माद्दा मिला जो कि उनकी ग़ज़लों में साफ़ देखा जा सकता है। ‘‘ग़ज़ल गुनगुनाओ’’ के रूप में वे संग्रह की पहली ग़ज़ल में ही आग्रह करती हैं कि- 
खुशियों की गजल गुनगुनाओ तुम।
खफा-खफा क्यूँ हो मुस्कुराओ तुम।
उल्फत को लगाके गले जी लो अब,
हसीं खुदाई नेमत को निभाओ तुम।
हों कितनी भी गर्दिशें घबराना नहीं,
चुनौती मान, ना शिकस्त खाओ तुम।

कुछ ग़ज़लें पूरी तरह उर्दू में बयान की गई हैं। जैसे एक ग़ज़ल है ‘‘कशिश’’। ज़िन्दगी को ख़्वाबों और हक़ीकत के बीच ही जिया जाता है इसीलिए कवयित्री अपने ख़्वाबों की चर्चा करती हुई कहती हैं कि-
बड़ी कशिश है मिरे ख़्वाबों में।
नफासत है उनके ही शबाबों में ।
शबो-फजर ये चहकते हैं रहते,
रहते हैं मुकम्मली के रुआबों में ।
कभी संजीदा तो कभी हैं शोख़
दिलकशी है इक उनकी ताबों में ।
मिरी तो हर नफस में ये हैं जी रहे,
जवाब नहीं है इनका जवाबों में।

जमाने का यह चलन है कि कुछ भी अच्छा करने वाले के मार्ग में बाधाएं खड़ी की जाती हैं। उन्हें रोकने और हतोत्साहित करने का यत्न किया जाता है। टोंकाटाकी तो आम बात है। जिसका मसले से कोई सरोकार न भी हो, वह भी टोंकने में कोताही नहीं बरतता है। ऐसे लोगों को नज़रअंदाज़ कर के जीवन जीने का आह्वान करती हैं कवयित्री सपना ‘‘क्षिति’’ -
जहां में कुछ तो लोग कहेंगे ही।
सरगोशियाँ जरूर ये तो भरेंगे ही।
परवाह ना कर जी ले खुलकर,
कयासों के दरिया तो बहेंगे ही।
पहनकर शोखियाँ निकल पड़,
बढ़ती उम्र के भी लम्हे डरेंगे ही।

जो दुख के दरिया को पार कर लेता है फिर उसे कोई डर सता नहीं सकता है। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अपने दर्द को हथियार बना कर जीने वाले ज़िन्दगी केा खुल कर जीना सीख जाते हैं। एक ग़ज़ल के चंद शेर देखिए -
बरहम बहुत थी तकदीर मिरी दर्दों-गम से,
मैंने उसमें भी बेशुमार हौसला जगा दिया।
मुद्दतों जलाके दिल बनाया है उसे कुंदन,
जमाने को अपना फैसला भी बता दिया।
थकी नहीं है अब तक ‘‘क्षिति’’ चलते हुये,
तबस्सुम ने गर्दिशों को भी सता दिया ।

इस संग्रह में एक बड़ी प्यारी-सी ग़ज़ल है जिसमें कवयित्री ने खुद को दुआ देने की बात कही है। अन्यथा लोग दुनियावी दुख-सुख में इतने डूब जाते हैं कि उन्हें खुद का खयाल नहीं रह जाता है। विशेष रूप से पारिविारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे लोग तथा बहुधा स्त्रियां अपनी ओर ध्यान ही नहीं दे पाती हैं, ऐसे सीाी लोगों के लिए यह गज़ल बहुत मायने रखती है-
खुद को भी दुआ दे, देखो कभी,
गमों का बोझ उतार फेको कभी।
खुद में ही है खुदा इल्म रहे तुम्हें,
खुद से भी मुहब्बत सीखो कभी।

कवयित्री सपना ‘‘क्षिति’’ में ग़ज़लगोई है और साथ ही भावप्रवणता भी। बस, मापनी के जोखिम को न उठाते हुए वे ग़ज़लें कहें तो उनकी ग़ज़लों का सैद्धांतिक महत्व भी बढ़ जाएगा। वैसे भावनाप्रधान ग़ज़लें होने के कारण ये सीधे दिल को छूती हैं और प्रभावित करती हैं। इस लिहाज़ से संग्रह पठनीय है।
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Tuesday, March 8, 2022

पुस्तक समीक्षा | परंपरागत कहन की खूबसूरत ग़ज़लें | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 08.03.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई शायर विनीत मोहन ‘फ़िक़्र’ सागरी के ग़़ज़ल संग्रह "अंदाज़-ए-सुखन" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
परंपरागत कहन की खूबसूरत ग़ज़लें
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह - अंदाज़-ए-सुखन
कवि       - विनीत मोहन ‘फ़िक़्र’ सागरी
प्रकाशक    - जिज्ञासा प्रकाशन प्रा.लि., गाजियाबाद - 201013
मूल्य       - 200 रुपए 
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ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जो जन्मी भले ही विदेशी भूमि पर, लेकिन भारतीय साहित्य में भी इसने भरपूर अपनत्व पाया है। देश का कोई भी सूबा हो या कोई भी शहर हो, ग़ज़ल कहने वाले मौजूद हैं। अब तो ग़ज़ल विधा भारतीय साहित्य में इतनी रच-बस गई है आंचलिक बोलियों में भी ग़ज़लें कहीं जा रही हैं। मध्यप्रदेश के सागर शहर में ही कई नामचीन शायर हुए हैं। साहित्य के लिए उर्वर सागर की ज़मीन पर विनीत मोहन ‘फ़िक़्र’ सागरी का ग़ज़ल संग्रह ‘‘अदाज़-ए-सुखन’’ आना सुखद है। यूं तो ‘फ़िक़्र’ सागरी के दो और ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं-‘‘ख़ुश्बू-ए-सुखन’’ और ‘‘कारवां-ए-ग़ज़ल’’। ‘‘अदाज़-ए-सुखन’’ में कुल सौ ग़ज़लें हैं। इस संग्रह की ग़जलों पर अपने विचार रखते हुए शाइर मित्रपाल शिशौदिया, देवेन्द्र मांझी तथा अशोक मिजाज़ बद्र ने ‘फ़िक्र’ सागरी की ग़ज़लों को ‘‘ताज़गी की ख़ुश्बू का अहसास’’ कराती ग़ज़लें कहा है। 
‘फ़िक्र’ सागरी जितनी गहराई से ग़ज़ल कहते हैं उतनी ही तन्मयता से उन्होंने साॅनेट्स पर भी काम किया है। काव्य की दो विपरीत विधाओं को साधने के लिए ‘फ़िक्र’ सागरी निरंतर काव्य साधना में लगे रहते हैं। किसी भी विधा को साधने के लिए साधना करना जरूरी है। डॉ. विनीत मोहन औदिच्य ‘फिक्र सागरी’ की गजलें न केवल खुद को एक उम्दा गजल साबित करती हैं बल्कि शायर की मेहनत और साधना की भी गवाही देती हैं। उनके दोनों ही गजल संग्रह बेहतरीन हैं और साहित्य को समृद्ध करने वाले हैं।
‘फिक्र सागरी’ की ग़ज़लों में ताना, उलाहना के साथ ही प्रेम के स्याह-सफ़ेद पक्ष को बखूबी सामने रखा गया है। ये सभी ग़ज़लें उर्दू तासीर की देवनागरी ग़ज़लें हैं जो ज़िन्दगी से बात कराती हैं, मुलाक़ात कराती हैं। संग्रह की पहली ग़ज़ल के शेर देखें-
बढ़ते ही  जा  रहे हैं,  आज़ार  ज़िन्दगी के।
लगते  नहीं हैं  अच्छे,   आसार ज़िन्दगी के।
इक शोख सी ग़ज़ल का उन्वान खो गया ज्यों
फ़ीके से  हो  चले हैं  अशआर ज़िन्दगी के।
शायर अशोक मिजाज बद्र ने फिक्र सागरी की ग़ज़लों अपने विचार प्रकट करते हुए भूमिका के रूप में टिप्पणी की है कि ‘‘फिक्र जी ....अपने जज़्बात का इजहार सीधे और सरल शब्दों में करते हैं उनकी सहजता पूर्ण अभिव्यक्ति भरपूर संप्रेषण भी है जो अपने दिल की बात सभी के दिलों तक पहुंचाने में कामयाब है।’’
संग्रह की कुछ गजलों का कहन वर्षों से चली आ रही परंपरा का अनुकरण करते हुए तय किया गया है जिसमें नयापन तो नहीं है लेकिन संवाद की क्षमता है। उदाहरण के लिए एक गजल के कुछ शेर देखिए-
दर्द का सिलसिला पुराना है 
भीड़ से दूर अब ठिकाना है 
मैं हूं काफिर सभी की नजरों में 
उसके कदमों में यह जमाना है 
जीस्त की उलझनों से हूं वाकिफ 
फर्ज  हर हाल में निभाना है
प्रेम की भावना संवेदना एवं आत्मिक अनुभवों का अभिन्न अंग है। प्रत्येक कवि अथवा शायर कभी न कभी प्रेमासिक्त काव्य रचना करता ही है।  फिक्र सागरी की गजलगोई भी इससे अछूती नहीं है।  इस संग्रह में  प्रेम की भावुकता से परिपूर्ण गजलें भी हैं। बानगी देखिए-
गमे इश्क में मुस्कुराने लगे हैं 
अभी होश अपने ठिकाने लगे हैं 
कभी पास आना कभी दूर जाना 
अदा हुस्न की वो बताने लगे हैं 
इसी स्वर की एक और गजल जिसमें शाइर ने एक समर्पित प्रेमी की भावनाओं को बड़ी  सुंदरता से व्यक्त किया है -
मोहब्बत का सबक जब से पढ़ा है 
जुबां से नाम तेरा ही लिया है 
भले हो बदगुमां अब लाख मुझसे 
यहां हर इम्तिहां  मैंने   दिया है 
जमाना दे भले इल्जाम मुझको 
तेरी अब चाह का बस आसरा है 
अरब में बादशाहों की तारीफ में कसीदे कहे जाते थे। कसीदे के पहले हिस्से को तशबीब कहा जाता था जिसमें हुस्न और शबाब की बातें होती थीं। इसमें खूबसूरती और दिलफ़रेबी का वर्णन रहता था। यह माना जाता है कि समय के साथ तशबीब ने ग़ज़ल के रूप में अपना स्वतंत्र स्वरूप पाया। ग़ज़ल के आरंभिक रूप में प्रेम भावना की प्रधानता रही है। इस परंपरा में आज भी शायरी कही जाती है। शायर फिक्र सागरी की एक ग़ज़ल के ये कुछ शेर देखें-
बज्म में अपनी बुलाओ तो सही 
बिजलियां मुझ पे गिराओ तो सही 
चांद तारे खिल उठेंगे नूर से 
रुख से तुम चिलमन हटाओ तो सही 
चूम लेगी कामयाबी पांव को 
इक कदम आगे बढ़ाओ तो सही 
ऐसा नहीं है कि शायद ‘‘फिक्र’’ सागरी ने सिर्फ इश्क़ मिजाज़ी की ग़ज़लें लिखी हों, इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें जमाने के हालात को भी बयां करती हैं।  उन्होंने वर्तमान समाज में स्त्री की दशा को देखा, परखा और समझा है तथा उसे अपनी ग़ज़ल में बखूबी पिरोया है। यह ग़ज़ल उस स्थिति पर भी उंगली उठाती है जिसमें कन्या जन्म को ही भार समझा जाता है और इस दूषित सोच के चलते एक स्त्री को बचपन से लेकर जीवन भर कष्टों का सामना करते रहना पड़ता है-
दुनिया को लगती जो भारी मैं औरत हूं 
काया से रखते सब यारी में औरत हूं 
बोझिल कामों में खपती है बचपन से जो
जाती है मां भी बलिहारी मैं औरत हूं 
अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस सब में नहीं होता है अधिक लोग ऐसे हैं जो अपनी आंखों के सामने अन्याय होते देखते हैं फिर भी ख़ामोश रहते हैं और कुछ लोगों को व्यवस्था के दबाव में आकर चुप रहना पड़ता है। ऐसे लोगों की ओर संकेत करते हुए शायर ने ये शेर कहे हैं- 
इक धुआं सा फिर उठा है चुप रहो 
वाकया  भीषण  हुआ  है चुप रहो 
चल रहे हैं लोग कुछ अंगार पर 
भेद यह सब पर खुला है चुप रहो 
देवेंद्र माझी द्वारा भूमिका के रूप में टिप्पणी करते हुए कहे गए विचार महत्व रखते हैं कि ‘‘ज्यों ज्यों पन्ने पलटने की प्रक्रिया चलती है इस संग्रह के पृष्ठ रूपी धरातल से नए भावनाओं के पुष्प अपनी ताजगी और खुशबू का अहसास कराते नजर आते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि साहित्य जगत में गजल के इस संग्रह का भरपूर स्वागत होगा और यह अपना विशेष मुकाम बनाएगा।’’ इस संग्रह की ज्यादातर ग़ज़लें प्रेम की ग़ज़लें हैं अतः यह ग़ज़ल संग्रह उन ग़ज़ल प्रेमियों अधिक पसंद आएगा जो प्रेम भावना में डूबी ग़ज़लें पसंद करते हैं।
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Thursday, March 16, 2017

‘‘बुंदेलखण्ड की कवयित्रियां’’ ग्रंथ में डॉ शरद सिंह का परिचय एवं ग़ज़लें

Bundel Khand Ki Kavyitriyan
अपनी एक ग़ज़ल यहां दे रही हूं जो प्रकाशित हुई है ‘‘बुंदेलखण्ड की कवयित्रियां’’ ग्रंथ में। इस ग्रंथ में मेरी और मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह का परिचय एवं ग़ज़लें भी शामिल हैं। बुंदेली साहित्य परम्परा के संदर्भ में महत्वपूर्ण ग्रंथ है यह।

इसका संपादन किया है वरिष्ठ साहित्यकार हरिविष्णु अवस्थी जी ने और प्रकाशित किया है श्री वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषद् टीकमगढ़ की ओर से सरस्वती साहित्य संस्थान, इलाहाबाद ने।
हरिविष्णु अवस्थी जी का आभार एवं उन्हें हार्दिक बधाई!

Bundel Khand Ki Kavyitriyan - Sharad Singh