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Thursday, August 11, 2022

हर घर तिरंगा : राष्ट्रीय गौरव की सहभागिता में एक ऐतिहासिक क़दम - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🇮🇳 हर घर तिरंगा : राष्ट्रीय गौरव की सहभागिता में एक ऐतिहासिक क़दम

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

देश की स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाने के लिए जिस बड़े निर्णय की घोषणा की गई वह है "हर घर तिरंगा"। वस्तुतः यह हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों को आजादी के अमृत महोत्सव पर दिया गया वह उपहार है जो उन्हें अपने घरों में ध्वज लहरा कर गौरवान्वित होने का अवसर प्रदान कर रहा है। हर व्यक्ति को अपने देश के ध्वज से प्रेम होता है और वह उसे अपने घर में भी ठहरा कर अपनी राष्ट्रीय भावना तथा देश के प्रति प्रेम को प्रदर्शित करना चाहता है आमजन की इसी अभिलाषा को प्रधानमंत्री ने समझा और अनुभव किया तथा देशवासियों को यह सुखद अवसर और अनुभूति प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय ध्वज संहिता में संशोधन कराया। यह वास्तव में एक ऐतिहासिक कदम है।
     सन 2002 में भी भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन किया गया था तथा इसमें नागरिकों को कुछ कठोर शर्तों के साथ अपने घरों कार्यालयों और फैक्ट्री में राष्ट्रीय दिवसों के अतिरिक्त किसी भी दिन ध्वज फहराने की अनुमति दी गई थी। अब नई संहिता की धारा 2 में सभी नागरिकों को अपने निज परिसर में अर्थात घरों में ध्वज फहराने का अधिकार दिया गया है।
       सोशल मीडिया पर भी यह छूट दी गई है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी डीपी में  राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लगा सकता है। हर घर तिरंगा के अभियान को उत्साहजनक और ग्लोबल बनाने के लिए एक साइड भी निर्मित की गई है जिस पर कोई भी व्यक्ति अपने घर में तिरंगा लहरा कर उसकी तस्वीर उस साइट पर अपलोड कर सकता है और अभियान में भाग लेने के स्वरूप सर्टिफिकेट डाउनलोड कर सकता है इस साइट का पता है - har ghar tiranga.com ।
      प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक स्वतंत्र ध्वज होता है। जो उस देश का प्रतीक होता है और उसकी पहचान होता है। यह ध्वज संपूर्ण देशवासियों के साथ ही देश के गौरव का भी प्रतीक होता है। इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करेगा और अपने प्राणों से भी बढ़कर उसकी सुरक्षा करेगा।
      भारतीय राष्ट्रीय ध्वज जिसे हम तिरंगा के नाम से जानते हैं, अपने तीन रंगों के कारण उसे यह नाम मिला है। इस तिरंगे को डिज़ाइन किया था आंध्र प्रदेश के पिंगली वेंकैयानंद ने। तिरंगे का वर्तमान स्वरूप सन 1947 की 22 जुलाई को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान स्वीकार गया था। इसके कुछ दिन बाद 15 अगस्त को जिस समय मध्यरात्रि को देश स्वतंत्र हुआ तो इस स्वतंत्रता की घोषणा तिरंगा फहरा कर की गई थी।
        भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्य तिरंगे में तीन रंग की आड़ी पट्टियां हैं। सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी। यह तीनों     आड़ी पट्टियां समान अनुपात में रहती हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात 2:3 का है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक के सारनाथ स्तंभ पर बने हुए चक्र से लिया गया है। इसका व्यास सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें कुल 24 तीलियां हैं।
       तिरंगे का इतिहास भी बहुत रोचक है। राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को मान्यता प्राप्त होने से पूर्व सन 1906 की 7 अगस्त को पारसी बागान चौक अर्थात ग्रीन पार्क, कोलकाता में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की आड़ी पट्टियों से बनाया गया था।
        इसके बाद सन 1907 में मैडम कामा और उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा पेरिस में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। किंतु उसका स्वरूप भी तिरंगे के समान नहीं था। उस ध्वज में सबसे ऊपर की पट्टी पर एक कमल था और साथ में सात तारे थे जो सप्तऋषि को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
         भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का तीसरा स्वरूप सन 1917 में सामने आया। जब  एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने आंतरिक शासन आंदोलन के दौरान इसे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में फहराया था। इस ध्वज में 5 लाल रंग की और 4 हरे रंग की आड़ी पट्टियां एक के बाद एक थीं और सप्तऋषि के आकार में सात तारे बने हुए थे। ध्वज के बायीं ओर ऊपरी किनारे पर यूनियन जैक था तथा एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
       इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज का एक और स्वरूप सामने आया, जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान सन 1921 में विजयवाड़ा में एक युवक ने झंडा बनाकर महात्मा गांधी को सौंपा। यह दो रंगों का बना था - लाल और हरे रंग का। किंतु गांधीजी ने उसे अस्वीकार करते हुए सुझाव दिया कि इसमें शांति के प्रतीक के रूप में सफेद पट्टी भी होनी चाहिए और साथ में स्वदेशी का संदेश देता हुआ चरखा भी होना चाहिए।
          सन 1931 में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को अपना असली स्वरूप मिलना प्रारंभ हुआ, जब तीन रंग के ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार करने पर सहमति बनी। इस ध्वज में केसरिया और हरे रंग के बीच में सफेद रंग तथा मध्य में चरखे की आकृति बनाई गई थी।
          जब देश को स्वतंत्रता मिलने की संभावना स्पष्ट दिखाई देने लगी तो ध्वज में परिवर्तन किए जाने का विचार सामने आया। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में घोषित करते हुए चरखे के स्थान पर अशोक के धर्म चक्र को अंकित किया गया। इस प्रकार स्वतंत्र भारत को अपना एक स्वतंत्र ध्वज प्राप्त हुआ। स्वतंत्र राष्ट्रीय ध्वज  में जो तीन रंग स्वीकार किए गए उसमें सबसे ऊपर केसरिया रंग शक्ति और साहस को प्रदर्शित करता है। सबसे निचली पट्टी जो हरे रंग की है, देश की उर्वरता, समृद्धि और भूमि की महत्ता को दर्शाती है। बीच में स्थित सफेद पट्टी शांति का प्रतीक है और उस पट्टी के मध्य में अंकित चक्र सत्य और निरंतर प्रगति का द्योतक है।


       हमें आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए इस बार अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को अपने-अपने घरों में फहराने का जो शुभ अवसर प्राप्त हुआ है उसे सम्मान पूर्वक स्वीकार करना चाहिए तथा अपने घरों में राष्ट्रीय ध्वज लहरा कर राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा एवं प्रेम को प्रदर्शित करना चाहिए। इस अवसर पर कवि श्यामलाल गुप्त "पार्षद" का यह सुप्रसिद्ध गीत स्मरणीय है -
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति बरसाने वाला,
प्रेम सुधा सरसाने वाला,
वीरों को हरषाने वाला,
मातृभूमि का तन-मन सारा।।
झंडा ऊंचा रहे हमारा ....
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Wednesday, December 6, 2017

चर्चा प्लस ... रेप और गैंगरेप के विरुद्ध ऐतिहासिक क़दम - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस (दैनिक सागर दिनकर, 29.11.2017)
रेप और गैंगरेप के विरुद्ध ऐतिहासिक क़दम
- डॉ.शरद सिंह

12 साल या उससे कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार तथा किसी महिला के साथ गैंगरेप के अपराधी को फांसी की सज़ा दिए जाने के ऐतिहासिक फैसले ने मध्यप्रदेश को महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सजग राज्य का पहला दर्जा दिला दिया है। यद्यपि इस प्रकार का कठोर दण्ड जहां एक ओर ऐसे जघन्य अपराध पर अंकुश लगाने का कार्य करेगा वहीं दूसरी ओर कानून और न्याय व्यवस्था से हर स्तर पर और अधिक सजगता, तत्परता और निष्पक्षता की मांग करेगा। तमाम साक्ष्यों के साथ यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा कि अभियुक्त वास्तविक अपराधी है या नहीं। इसके लिए उन सभी लोगों को भी भावुकता का त्याग करना होगा जो अपराध की गंभीरता एवं अमानवीयता को देख कर अभियुक्त का मुद्दमा न लड़ने की घोषणा कर बैठते हैं। अपराधी माने जा रहे व्यक्ति का अपराध जब तक सिद्ध न हो जाए उसे कानून के प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना पक्ष सामने रखने का अधिकार होता है। यह अधिकार उसे इसीलिए दिया जाता है कि कहीं कोई निरपराध सजा का भागी न बन जाए। फांसी जैसी सजा के मामले में यह दायित्व और अधिक गंभीर हो जाता है। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि यह बच्चियों एवं महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अपराधों के विरुद्ध एक कठोर और मजबूत कदम सिद्ध होगा। वैसे, रेप एवं गैंगरेप के मामलों में जुवेनाईल धाराओं में भी अभी संशोधन की आवश्यकता है।
 
Column Charcha Plus, Dainik Sagar Dinkar, Dr (Miss) Sharad Singh

आज देश में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि बलात्कार की घटनाओं पर कैसे अंकुश लगाया जाए? महिलाओं को यौन अपराध से कैसे सुरक्षित किया जाए? बलात्कारी को मृत्युदण्ड दिए जाने का प्रश्न भी एक ज्वलंत प्रश्न रहा है। इस प्रश्न पर सबसे बड़ी अड़चन यह आती रही है कहीं किसी निरपराधी को बलात्कारी का ठप्पा लगा कर सूली पर न चढ़ा दिया जाए। बहरहाल, मध्यप्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू होने से एक दिन पहले कैबिनेट ने 12 साल या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार या किसी भी उम्र की महिला से गैंगरेप के दोषी को फांसी की सज़ा देने को मंजूरी दे दी। कैबिनेट में अपने फैसले के लिये 376 ए ए और 376 डी ए के रूप में संशोधन किया गया। यह भी कहा गया है कि लोक अभियोजन की सुनवाई का अवसर दिए बिना जमानत नहीं होगी. शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने का प्रस्ताव किया गया। महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सज़ा देने के साथ महिलाओं का पीछा करने का अपराध दूसरी बार साबित होने पर न्यूनतम एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। कैबिनेट की बैठक के बाद वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कहा, “मंत्रिमंडल ने 12 साल या उससे कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार के दोषी को मृत्युदंड की मंजूरी दे दी है, गैंगरेप के दोषियों को भी मृत्युदंड का प्रस्ताव पारित कर दिया गया है।’’
यद्यपि पिछले कैबिनेट की बैठक में मलैया और ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने आशंका जताई थी कि बलात्कारियों के लिए मौत की सजा पीड़ितों के लिए एक बड़ा खतरा होगा क्योंकि अपराधी उन्हें मारने की कोशिश करेंगे। इसलिए कैबिनेट की मुहर लगाने से पहले इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिक विचार-विमर्श और कानूनी सलाह के लिये कुछ और समय लिया। मुख्यमंत्री चौहान ने भोपाल में 19 साल की युवती के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद कहा था कि बलात्कार के दोषियों को फांसी की सज़ा देनी चाहिये और वो कानून बनाकर विधेयक को मंजूरी के लिए भारत सरकार को भेजेंगे।
महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया है। महिलाओं का पीछा करने, छेड़छाड़, निर्वस्त्र करने, हमला करने और बलात्कार का आरोप साबित होने पर न्यूनतम जुर्माना एक लाख रुपए लगाया जाएगा। हाल ही में राजधानी भोपाल में हुई गैंग रेप की घटना के बाद मध्य प्रदेश सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हुए थे। यही नहीं, पीड़िता ने भी कहा था कि आरोपियों को चौराहे पर फांसी दी जाए।
सरकार ने बलात्कार मामले में सख्त फैसला लेते हुए आरोपियों के जमानत की राशि बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी है। इस तरह मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जहां बलात्कार के मामले में इस तरह के कानून के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। साथ ही शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।
निश्चित रूप से यह एक ऐतिहासिक और साहसिक फैसला है। आशा की जा सकती है कि इससे महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराध करने वालों में भय व्याप्त होगा तथा बलात्कार तथा अन्य प्रकार के यौनअपराधों में भी कमी आएगी। किन्तु इस फैसले का एक पक्ष और है जो अपनेआप में संवेदनशील है। यह पक्ष है कि कहीं किसी निर्दोष को दण्ड का भागी न बनना पड़े। इस बिन्दु पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक होगा- पहली बात तो यह कि पुलिस की पड़ताल और मेडिकल जांच में किसी तरह की कोताही न बरती जाए और वहीं पीड़िता स्वयं को अथवा उसके परिजन उसे मेडिकल जांच के लिए जल्दी से जल्दी प्रस्तुत कर दें। बलाकात्कार के संदर्भ में मनोवैज्ञानिक डॉ. वाणी नायर का कहना है कि -‘‘पीड़िता के लिए यह एक सदमे का विषय होता है। यह सामान्य चोट लगने जैसी स्थिति नहीं होती है कि घर जा कर तुरन्त सबको बता सकें। पीड़िता सदमें के उबरने के बाद ही घटना का विस्तृत विवरण दे पाती है।’’
जहां तक पुलिस छानबीन का प्रश्न है तो भोपाल में हुए बलात्कार कांड में पीड़िता के स्वयं थाने पहुंचने पर भी तत्परता से रिपोर्ट न लिखा जाना एक ऐसा उदाहरण है जो पुलिस की कार्यवाही पर उंगली उठाती है। यद्यपि इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों को विभागीय दण्ड दिया जा चुका है लेकिन प्रश्न उठता है कि इस प्रकार की ढीली-ढाली व्यवस्था में सही अपराधी के विरुद्ध दमदार साक्ष्य कैसे जुटाए जा सकेंगे। इस भोपाल बलात्कार कांड में पुलिस ने एक गलत आदमी को बलात्कार के संदेह में पकड़ ही लिया था और बाद में उसे छोड़ना पड़ा।
बलात्कार एक ऐसा जघन्य किन्तु संवेदनशील अपराध है जो पीड़िता के जीवन को तो प्रताड़ित करता ही है, साथ ही पूरे परिवार को प्रभावित करता है। न केवल पीड़िता और सके परिवार के पक्ष को अपितु उस हर व्यक्ति को चोट पहुंचाता है जिसे इस अपराध के संदेह में पकड़ा गया हो। भले ही वह व्यक्ति के बाद निर्दोष निकल आए किन्तु संदेह का दाग उसके दामन पर उम्र भर के लिए लग जाता है। फिर जब सज़ा का स्वरूप फांसी का हो तो आवेश, भावुकता अथवा लापरवाही कां छोड़ कर पुलिस की कार्यवाही में र्प्याप्त सजगता और तत्परता की दरकार होगी।
पिछले कुछ समय से भावुकतापूर्ण निर्णयों का चलन दिखाई देने लगा है। यह सच है कि गैंगरेप जैसे जधन्य अपराध की पीड़िता के प्रति सहानुभूति होना स्वाभाविक है। ऐसी घटनाएं प्रत्येक व्यक्ति को भावुकता से भर देती हैं और वह अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाना चाहता है। हरियाणा के स्कूल में एक बच्चे की हत्या के बाद वकीलों द्वारा भावुकता में आ कर अभियुक्त के पक्ष से मुकद्दमा नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी। जबकि सीबीआई की जांच से बाद इस बात के संकेत मिले कि दोषी माना जा रहा कंडक्टर वास्तव में दोषी नहीं था और उसने पुलिस की प्रताड़ना से घबरा कर अपराध स्वीकार कर लिया था जो कि उसने किया ही नहीं था। हाल ही में दूसरी बार भोपाल बलात्कार कांड में भी वकीलों ने अभियुक्तों की ओर से मुकद्दमा नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी। तमाम साक्ष्यों के साथ यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा कि अभियुक्त वास्तविक अपराधी है या नहीं। इसके लिए उन सभी लोगों को भी भावुकता का त्याग करना होगा जो अपराध की गंभीरता एवं अमानवीयता को देख कर अभियुक्त का मुद्दमा न लड़ने की घोषणा कर बैठते हैं। अपराधी माने जा रहे व्यक्ति का अपराध जब तक सिद्ध न हो जाए उसे कानून के प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना पक्ष सामने रखने का अधिकार होता है। यह अधिकार उसे इसीलिए दिया जाता है कि कहीं कोई निरपराध सजा का भागी न बन जाए।
वैसे, रेप एवं गैंगरेप के मामलों में जुवेनाईल धाराओं में भी अभी संशोधन की आवश्यकता है। यदि कोई नाबालिग बलात्कार जैसा बालिग अपराध करता है तो उसे बालिगों की श्रेणी में माना जाना चाहिए। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद यह मांग तेजी से उठी थी। तब सन् 2015 में जुवेनाइल बिल राज्य सभा में भी पास कर के राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा गया। इस बिल के में प्रावधान रखा गया कि अगर जुर्म ’जघन्य’ हो, यानी आईपीसी में उसकी सज़ा सात साल से अधिक हो तो, 16 से 18 साल की उम्र के नाबालिग को वयस्क माना जाएगा। इस कानून के जरिए नाबालिग़ को अदालत में पेश करने के एक महीने के अंदर ’जुवेनाइल जस्टीस बोर्ड’ ये जांच करेगा कि उसे ’बच्चा’ माना जाए या ’वयस्क’ और वयस्क माने जाने पर किशोर को मुकदमे के दौरान भी सामान्य जेल में रखा जाएगा। हालांकि अगर नाबालिग को वयस्क मान भी लिया जाए तो मुक़दमा ’बाल अदालत’ में चले और आईपीसी के तहत सज़ा हो उम्र क़ैद या मौत की सजा नहीं दी जा सकती। एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या में 132 फीसदी का इजाफा देखने के मिला है, जिसमें बलात्कार की घटनाओं में यह वृद्धि 60 फीसदी से अधिक है। इस रिपोर्ट के अनुसार दर्ज किए गए मामलों में 66 फीसदी से अधिक बच्चों की उम्र 16-18 साल के बीच है। नाबालिगों में इस तरह के अपराधों की बढ़ती दर को देखते हुए कानूनन कठोर कदम उठाया जाना जरूरी है।
यह बात तय है कि यदि हमें रेप, गैंगरेप, सोशल मीडिया पर यौनअपराध की वीडियो अपलोडिंग आदि अपराधों से मुक्ति चाहिए तो कठोर कदमों का स्वागत करना ही होगा।
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