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Wednesday, February 11, 2026

चर्चा प्लस | पुण्यतिथि पर विशेष | पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स” | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
पुण्यतिथि पर विशेष 

पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स”

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ में एक ऐसे व्यक्ति थे जिन पर संघ अगाध विश्वास करता था। पं. दीनदयाल ने भी अपना सर्वस्व संघ के विचारों के पोषण एवं विस्तार के लिए अर्पित कर दिया था। उनकी संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई मृत्यु पर अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था-‘‘ वे संसद के सदस्य नहीं थे लेकिन भारतीय जनसंघ के जितने सदस्य इस सदन में और दूसरे सदन में बैठे हैं उनकी विजय का, जनसंघ को बनाने का, बढ़ाने का यदि किसी एक व्यक्ति को श्रेय जाता है तो वह श्री उपाध्याय जी को है। देखने में सीधे-सादे लेकिन मौलिक विचारक, कुशल संगठनकर्ता, दूरदर्शी नेता, सबको साथ ले कर चलने का जो गुण उन्होंने अपने जीवन में प्रकट किया, वह नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा।’’ 
     वह समय था जब एक ओर डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की असामयिक संदेहास्पद मृत्यु और दूसरी ओर जनसंघ में अंतरकलह - ये दोनों कारण दीनदयाल जी को चिन्ता में डालने लगे थे। जनसंघ के अध्यक्ष पं. मौलिचन्द्र शर्मा से कार्यकर्ता रुष्ट होने लगे थे। जनसंघ के केन्द्रीय अधिकारी एकनाथ राणाडे के कारण भी संघ में असंतोष बढ़ने लगा था। इनके अतिरिक्त विभिन्न रजवाड़ों को जनसंघ से जोड़ने वाले वसंतराव ओक भी इस अंतरकलह के शिकार हुए और उन्हें जनसंघ छोड़ना पड़ा। 
एक समय ऐसा आया कि लगने लगा जैसे जनसंघ पूरी तरह टूट कर बिखर जाएगा। कलह से भ्रमित कार्यकर्ताओं ने भी संघ को छोड़ना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय राजनैतिक दल का दर्जा पा लेने वाला जनसंघ जैसे नेतृत्वविहीन हो गया हो। ऐसी विकट परिस्थिति में डाॅ. रघुवीर ने जनसंघ की अध्यक्षता सम्हाल ली। दुर्भाग्यवश सन् 1962 में एक दुर्घटना में उनका निधन हो गया। इसके साथ ही एक बार फिर जनसंघ में नेतृत्व का संकट गहरा गया। लेकिन दीनदयाल जी किसी भी परिस्थिति में जनसंघ का पराभव नहीं देख सकते थे। उन्होंने डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशाओं के अनुरूप संगठनकर्ता के रूप में सक्रिय राजनीति में भाग लेना तय किया। संघ के अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता भी उनके इस निर्णय से उत्साहित हो उठे। जनसंघ में मानों पुनः आशा की लहर दौड़ गई। किन्तु जनसंघ अंतर्कलह से पूरी तरह उबरा नहीं था, जिसका परिणाम शीघ्र ही सामने आया।

जौनपुर उपचुनाव  

दीनदयालजी जनसंघ की राजनीतिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कृतसंकल्प थे किन्तु वे स्वयं एक राजनेता के रूप में चुनाव लड़ कर पद प्राप्त नहीं करना चाहते थे। सन् 1963 में लोकसभा के उपचुनाव हुए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने दीनदयाल जी से आग्रह किया कि वे जौनपुर से चुनाव लड़ें। दीनदयाल जी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे किन्तु वे गुरूजी अर्थात् माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का आग्रह भी टाल नहीं सकते थे। 
भाऊराव देवरस ने दीनदयाल जी से संबंधित अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ‘‘हमारे तीस वर्ष के सहचर्य में उनके मन के विरुद्ध मैंने केवल एक ही बात की और वह थी उन्हें जौनपुर से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने को विवश करना।  सन्  1962 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के हारने के कारण जनसंघ की दृष्टि से लोकसभा में एक प्रकार की रिक्तता उत्पन्न हो गई थी। उसे भरने के लिए सबकी सम्मति थी कि पण्डित जी चुनाव लड़ें। लेकिन पण्डित जी इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे रहे थे। उनका कहना था कि मैं स्वयंसेवक और प्रचारक हूं। चुनाव लड़ना मेरे लिए उचित नहीं होगा। प्रचारक भी चुनाव लड़ते हैं, ऐसी गलत परिपाटी इससे पड़ जाएगी और भविष्य में संगठन पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। हम सभी सहयोगियों ने एक मत से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा, तब कहीं वे माने।’’
अंततः दीनदयाल जी ने जौनपुर से नामांकन भर दिया और चुनाव की तैयारी करने लगे।  यद्यपि एक दिन उन्होंने अवसर पा कर अपने मन की बात गुरूजी से कह डाली थी कि ‘‘आपने मुझे किस झमेले में डाल दिया। मुझे प्रचारक का काम ही करने दें।’’
इस पर गोलवलकर गुरूजी ने उन्हें समझाया था कि ‘‘तुम्हारे अतिरिक्त इस झमेले में किसको डालें। संगठन के कार्य पर जिसके मन में इतनी अविचल श्रद्धा और निष्ठा है वही उस झमेले में रह कर कीचड़ में भी कीचड़ से अस्पृश्य रहता हुआ सुचारु रूप से वहां की सफाई कर सकेगा।’’
जौनपुर में जनसंघ के कार्यकर्ता जातिवादी समीकरण का सहारा लेना चाहते थे। जाधवराव देशमुख के अनुसार कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी से निवेदन किया कि ‘‘कांग्रेस ठाकुरवाद चला रही है तो हम ब्राह्मणवाद चला दें। इसमें क्या हानि है? चुनाव-युद्ध में सभी कुछ क्षम्य होता है न!’’
यह सुन कर दीनदयाल जी क्रोधित हो उठे। वे कार्यकर्त्ताओं को डांटते हुए बोले-‘‘सिद्धांत की बलि चढ़ा कर जातिवाद के सहारे मिलने वाली विजय, सच पूछो तो, पराजय से भी बुरी है।’’
उनकी यह बात सुन कर वहां सन्नाटा छा गया। इस पर दीनदयाल जी ने संयत होते हुए शांत स्वर में समझाया -‘‘भाईयों! राजनीतिक दल के जीवन में एक उपचुनाव कोई विशेष महत्व नहीं रखता, किन्तु एक चुनाव में जीतने के लिए हमने यदि जातिवाद का सहारा लिया तो वह भूत सदा के लिए हम पर सवार हो जाएगा और फिर कांग्रेस और जनसंघ में कोई अंतर नहीं रहेगा।’’
दीनदयाल जी का कहना था कि राजनीति में विचारधारा, सिद्धांत, नीति और कार्यक्रमों में सुन्दर ताल-मेल चाहिए, टकराव या विरोधाभास नहीं। वे कार्यकर्ताओं के ही नहीं, अपितु जन-सामान्य के राजनीतिक प्रशिक्षण पर भी बल देते थे। वे मतपत्र को कागज का टुकड़ा न मानकर अपना अधिकार-पत्र मानने को कहते थे। इस संबंध में उनका सिद्धांत स्पष्ट था जिसे वे तीन बिन्दुओं के रूप में कार्यकर्त्ताओं एवं आमजन के समक्ष रखते थे -
1. वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स 
2. वोट फार पार्टी, नाट फार पर्सन 
3. वोट फार आइडियोलोजी, नाट फार पार्टी
जब चुनाव का परिणाम घोषित हुआ तो स्पष्ट हो गया कि जनसंघ में अंतर्कलह समाप्त नहीं हुआ था। जौनपुर में संघ के कुछ कार्यकर्ता ऐसे थे जो दीनदयाल जी की ‘आइडियोलोजी’ के समर्थन में नहीं थे और आरम्भ से ही चाहते थे कि दीनदयाल जी वहां से चुनाव न लड़ें। उन कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी के चुनाव अभियान को सहयोग देने के बदले उनका विरोध किया था। इसका मतदाताओं के मन पर बुरा असर पड़ा और दीनदयाल जी चुनाव हार गए। किन्तु उनकी संघ के प्रति तत्परता एवं निष्ठा का देश के अन्य कार्यकर्ताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। स्वयं दीनदयाल जी को इस बात का संतोष था कि भले ही वे उपचुनाव हार गए किन्तु उन्होंने अपने और संघ के सिद्धांतों को जातिवादी समीकरण की भेंट नहीं चढ़ाया। 
चुनाव में पराजय के बाद दीनदयाल जी के व्यवहार के बारे में भाऊराव देवरस ने अपने एक संस्मरण में लिखा कि ‘‘चुनाव में हारने के दूसरे दिन ही वे (दीनदयाल जी) काशी के संघ वर्ग में पहुंच गए। वहां उनका आचरण देख कर हम सभी लोग आश्चर्य पड़ गए कि इतने बड़े चुनाव में हारने वाले क्या ये ही दीनदयाल जी हैं? उनका अत्यंत सहज और शांत आचरण देख कर मैं स्वयं दंग रह गया था।’’
     चुनाव में पराजित होने के बाद पत्रकारवार्ता में एक सम्वाददाता ने उनसे प्रश्न किया कि ‘‘देश में जब कांग्रेसविरोधी वातावरण है तो आप चुनाव कैसे हार गए?’’ इस पर दीनदयाल जी ने विनम्रतापूर्वक बिना किसी संकोच के कहा कि ‘‘स्पष्ट बताऊं, मेरे विरुद्ध खड़ा कांग्रेस का प्रत्याशी एक सच्चा कार्यकर्ता है। उसने अपने क्षेत्र में पर्याप्त काम किया है, इसीलिए लोगों ने उसे अधिक मत दिए।’’
       गोलवलकर गुरूजी ने एक बार दीनदयाल जी के संबंध में कहा था ‘‘बिलकुल नींव के पत्थर से प्रारम्भ कर जनसंघ के कार्य को इतना नाम और इतना रूप देने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वह दीनदयाल जी को ही देना होगा।’’
 
जनसंघ के अध्यक्ष घोषित

सरसंघ चालक गोलवलकर गुरूजी को दीनदयाल जी की क्षमता पर पूरा भरोसा था, इसीलिए दल की ओर से उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। सन् 1967 में जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ। दल के सभी पदाधिकारियों ने एकमत से निर्णय लेते हुए दीनदयाल जी को जनसंघ का अध्यक्ष घोषित किया।
दीनदयाल जी के जनसंघ के अध्यक्ष बनने से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जिस जनसंघ को डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक सुदृढ़ राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में देखना चाहते थे वह जनसंघ अब वास्तव में सुदृढ़ता प्राप्त करने वाला था। दीनदयाल जी के संगठनात्मक कौशल का लाभ जनसंघ को मिलने वाला था। दीनदयाल जी के द्वारा जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने से भारतीय राजनीति में पड़ने वाले प्रभाव पर शिकागो विश्वविद्यालय के लिए ‘‘जनसंघ आइडियोलाॅजी एण्ड ऑरगेनाइजेशन इन पार्टी बिहेवियर’’ विषय पर किए गए अपने शोध में वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन ने लिखा है कि ‘‘पण्डित दीनदयाल जी के सन् 1967 में जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने का यही अर्थ था कि दल की संगठनात्मक नींव डालने का काम पूरा हो गया है और राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रबल प्रतिस्पर्धी के नाते सत्ता की प्रतियोगिता में उतरने का उसका संकल्प है।’’
यही तथ्य वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन एवं श्रीधर डी. दामले की पुस्तक ‘‘द ब्रदरहुड इन सेफराॅन: द राष्ट्रीय सेवक संघ एण्ड हिन्दू रीवाइवलिज़्म’’ (वेस्ट व्यू प्रेस, आई एस बी एन: 0-8133-7358-1) में सन् 1987 के संस्करण में प्रकाश में आया।
जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद दीनदयाल उपाध्याय का ध्यान इस ओर गया कि जनसंघ की छवि एक हिन्दू सम्प्रदायवादी संस्था के रूप में मानी जा रही है। वे अपने दल को किसी सम्प्रदायवादी शक्ति नहीं वरन् देशभक्ति की शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। चुनावी रणनीति में भी उन्होंने स्वच्छ संकल्पना की और उसी पर अमल किया। उनके चुनावी आदर्श आज पथप्रदर्शक साबित हो सकते हैं और राजनीतिक स्वच्छता स्थापित कर सकते हैं, यदि कोई आदर्शों को आत्मसात करने का साहस करे।
(राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला के अंतर्गत सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी जीवनी-पुस्तक ‘‘दीनदयाल उपाध्याय’’ पर आधारित।)                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.02.2026 को प्रकाशित)  
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Wednesday, July 27, 2022

चर्चा प्लस | पुण्यतिथि | डाॅ. एपीजे अब्दुल क़लाम : अख़बार बेचनेवाला लड़का जो राष्ट्रपति बना | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस | पुण्यतिथि :
डाॅ. एपीजे अब्दुल क़लाम : अख़बार बेचनेवाला लड़का जो  राष्ट्रपति बना
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
           ‘‘यदि आप चाहते हैं कि आपके सपने सच हों तो इसके लिए आपको सबसे पहले सपने देखने होंगे।’’ यही तो कहा था ‘मिसाइल मैन’ के नाम से विख्यात वैज्ञानिक, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम ने। उन्होंने यह सिर्फ़ कहा नहीं बल्कि इसे अपने स्वयं के जीवन पर चरितार्थ कर के दिखाया। तभी तो अखबार बेचने वाला एक हाॅकर लड़का एक दिन भारत के लिए मिसाइल बना सका और उसने राष्ट्रपति बन कर देश का गौरव बढ़ाया। यह लड़का और कोई नहीं स्वयं डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम थे।
हमारा देश एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां सब कुछ संभव है। इस देश में चाय बेचने वाला एक लड़का बड़ा हो कर प्रधानमंत्री बन सकता है, आदिवासी जीवन के रूप में मुख्यधारा से कट कर जीवन जीने को विवश बालिका राष्ट्रपति बन सकती है, इसी प्रकार अपने स्कूल की फीस भरने के लिए अख़बार बेचने वाला एक लड़का पहले उच्चकोटि का वैज्ञानिक और फिर देश राष्ट्रपति बन सकता है।इन तीनों उदाहरणों में दो स्थितियां एक समान हैं- एक तो संघर्षमय अतिसामान्य जीवन से शुरुआत और दूसरी दृढ़ इच्छाशक्ति। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे जिन्होंने ज़मीन से आरम्भ किया और आसमान तक जा पहुंचे। देश के 11वें राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने भारत को सशक्त बनाने का सपना देखा और उस सपने को पूरा करने के लिए देश में ही मिसाइल निर्माण की शुरुआत की। इसीलिए उन्हें ‘‘मिसाईल मैन’’ भी कहा जाता है।
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पिता जैनुलाब्दीन नाविक थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे, न ही ज्यादा पैसे वाले थे। लेकिन वह नियम के बहुत पक्के थे। वह मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे। डॉ. कलाम ने अपनी शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए हाॅकर के रूप में अखबार बांटने काम किया था। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम था। उनका जन्म 15 अक्तूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम् जिले के धनुषकोड़ी गांव में हुआ था। कलाम एक बहुत बड़े परिवार के सदस्य थे, जिसमें पांच भाई और पांच बहन थी। कलाम ने अपनी आरम्भिक शिक्षा रामेश्वरम् में पूरी की, सेंट जोसेफ कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली। वे पायलेट बनना चाहते थे किन्तु किन्हीं कारणवश वे अपनी यह इच्छा पूरी नहीं कर सके। तब उन्होंने अपनी इच्छा के मार्ग को दूसरी ओर मोड़ दिया लेकिन यह मार्ग भी उन्हें आसमान की ओर ले जाता था। उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की।
डाॅ. कलाम बेहद सादगी से जीवन जीने वाले व्यक्ति थे। अनुशासन में रहना और दैनिक रूप से पढ़ना इनकी दिनचर्या में था। अपने गुरु से उन्होंने सीखा था कि यदि आप किसी भी चीज को पाना चाहते है तो अपनी इच्छा तीव्र रखनी होगी। डाॅ. कलाम विलासिता और दिखावे से दूर रहते थे। एक बार राष्ट्रपति भवन में उनके परिजन रहने के लिए आए, जहां उनका स्वागत उन्होंने बहुत अच्छे से किया। परिजन 9 दिन तक राष्ट्रपति भवन में रहे, जिसका खर्च साढ़े तीन लाख रुपए हुआ। यह बिल उन्होंने अपनी जेब से भरा।
सन् 1962 में वे अंतरिक्ष विभाग से जुड़ गए जहां उन्हें विक्रम साराभाई, सतीश धवन और ब्रह्म प्रकाश जैसे महान हस्तियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। 1980 में पूर्ण रूप से भारत में निर्मित उपग्रह रोहिणी का प्रक्षेपण किया, जो सफल रहा। अब्दुल कलाम विभिन्न सरकारों में विज्ञान सलाहकार और रक्षा सलाहकार के पद पर रहे। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन में रहते हुए इन्होंने ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ जैसी मिसाइल का निर्माण कराया। उन्होंने राजस्थान में हुए दूसरे परमाणु परीक्षण (शक्ति-2) को सफल बनाया।
डाॅ. कलाम बच्चों से बहुत प्रेम करते थे और वे बच्चों को जीवन में विज्ञान के महत्व के बारे में समझाया करते थे। वे कहते थे कि -‘‘विज्ञान जब विशेष ज्ञान है तो हमें उसकी विशेषताओं को समझना चाहिए और उससे लाभ उठाना चाहिए।’’
जब सन् 2002 में उन्होंने राष्ट्रपति पद का भार ग्रहण किया उसके बाद भी राष्ट्रपति-भवन के दरवाज़े सदा आमजन के लिए खुले रहे। युवा और बच्चे उन्हें पत्र लिख कर उनसे जीवन और विज्ञान संबंधी प्रश्न पूछा करते थे। उन पत्रों का जबाव वे स्वयं अपने हाथों से लिखकर देते थे।
डाॅ. कलाम अविवाहित थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देशसेवा को समर्पित कर दिया था। उनका जीवन एक महानायक की तरह था। उन्होंने 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘‘विंग्स ऑफ फायर’’, ‘‘इंडिया 2020’’, ‘‘इग्नाइटेड मांइड’’, ‘‘माय जर्नी’’ बहुचर्चित और प्रेरक रहीं। अब्दुल कलाम को 48 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूशन द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई थी। डाॅ. अब्दुल कलाम ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ की विचारधरा को मानते थे। वे मानते थे कि यह धरती ही एक मात्र उपग्रह है, जहां जीवन संभव है। मानव जाति को इसकी रक्षा और संरक्षण का दायित्व निभाना ही होगा। हमारा समाज और हमारी शासन प्रणाली अब पहले से कहीं अधिक संजीदा है क्योंकि मामूली सी देरी से भी अपूर्णीय क्षति हो सकती है। भारत रत्न डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्रकृति के संरक्षण के प्रति सजग थे। वे इसे पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य के जिए जरूरी मानते थे।  27 जुलाई, 2015 को शिलांग में, भारतीय प्रबंधन संस्थान में ‘क्रिएटिंग ए लिवेबल प्लैनेट अर्थ’ (पृथ्वी को रहने योग्य ग्रह बनाना) विषय पर अपने व्याख्यान में उन्होंने विकास की जद्दोजहद में पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को हो रहे नुक्सान के प्रति आगाह किया था। उन्होंने प्रकृति को बचाने के लिए भावी कार्ययोजना की रूपरेखा भी सामने रखी थी। डा. कलाम ने सबसे पहले 2 नवम्बर, 2012 को चीन में में भी अपने व्याख्यान के द्वारा इस ओर ध्यानाकर्षण किया था कि धरती को रहने योग्य बनाए रखना कितना जरूरी है।  उन्होंने कहा था कि मानव जाति को अपने सभी संघर्षों को परे धकेल कर पूरी दुनिया के नागरिकों के लिए शांति और खुशहाली का सांझा लक्ष्य रखना होगा। हमें एक रमणीक पृथ्वी के लिए वैश्विक दृष्टि विकसित करनी होगी। मानव जाति के लिए इससे अधिक कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। वर्ष 1996 में डॉक्टर कलाम टेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन, फोरकास्टिंग एंड एसेसमेंट काउंसिल (टिफैक) के अध्यक्ष थे और 1996-97 में उन्हीं की अध्यक्षता में ‘‘विजन 2020’’ डॉक्यूमेंट तैयार किया गया था। इसी के आधार पर संगठन ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया था कि साल 2020 तक भारत को क्या हुछ हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए। डॉ. कलाम ने सरकार को सलाह दी थी कि देश के विकास के तकनीक, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में सरकार को क्या करना चाहिए और इसमें आम नागरिक को क्या भूमिका निभानी चाहिए। इस किताब पर काम करने के लिए डॉ. अब्दुल कलाम और उनके सहयोगी वाईएस राजन ने दर्जनों जानकारों के इंटरव्यू किए और लाखों पन्नों के दस्तावेज पढ़े. ये किताब ‘‘इंडिया 2020: ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम’’ नाम से प्रकाशित हुई थी।
यूं तो ‘टिफैक’ की रिपोर्ट विज्ञान और तकनीक पर केंद्रित थी, लेकिन डाॅ. कलाम ने इसमें जोर दे कर कहा है कि विकास की राह में समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए। वे बुनियादी बातों से विकास की चर्चा शुरू करने में विश्वास रखते थे। डॉ. कलाम के अनुसार, ‘‘भारत में हर साल दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इस सभी बच्चों का क्या भविष्य होगा? जीवन में उनका लक्ष्य क्या होगा? क्या हमें उनके भविष्य के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए या फिर हमें उन्हें उनके नसीब के सहारे छोड़ अभिजात्य वर्ग के फायदे के लिए ही काम करना चाहिए?’’
 डॉ. कलाम ने इसमें सवाल उठाया था कि - ‘‘बाजार में मांग के अनुसार स्ट्रेटेजी, और कंपीटीशन का दौर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे या फिर आने वाले दो दशकों में उनके लिए कुछ खास योजना तैयार करेंगे।’’ साल 1998 में लिखी गई इस किताब में डॉक्टर अब्दुल कलाम कहा कि- ‘‘सैंकड़ों एक्सपर्ट से बात कर के और कई रिपोर्टें पढ़ने के बाद मैं ये समझ पाया हूं कि हमारा देश साल 2020 तक विकसित देशों की सूची में शामिल हो सकता है।’’ उन्होंनेे कहा था कि, ‘‘तब भारत के लोग गरीब नहीं रहेंगे, वो लोग तरक्की के लिए अधिक कुशलता से काम करेंगे और हमारी शिक्षा व्यवस्था भी और बेहतर होगी। ये सपना नहीं बल्कि हम सभी लोगों के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए।’’
डॉ. कलाम का कहना था कि देश के लक्ष्य हासिल करने के बाद रुकना नहीं चाहिए बल्कि और बेहतरी के लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए। उनका कहना था, ‘‘हमेशा के लिए हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि कैसे हम लोगों की जिंदगियों को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहें. वो केवल युवा हैं जिनमें ज्ञान और कौशल तो है ही। साथ ही कुछ हासिल करने का जज््बा भी है, उन्हें आगे नए लक्ष्यों की तरफ बढ़ना चाहिए। देश उस मुकाम तक पहुंचे इसके लिए हमें एक दूसरे की मदद करनी होगी और लक्ष्य के रास्ते से बिना डगमगाए हमें ये सुनिश्चित करना होगा ताकि बदलाव का असर हर व्यक्ति तक पहुंचे।’’
वे युवाओं से कहते थे कि ‘‘ये कभी मत सोचो कि आप अकेले अपने देश के लिए कुछ नहीं कर सकते, आप जिस भी क्षेत्र में काम कर रहे हों आप अपनी योग्यता बढ़ाएं। सभी के प्रयासों से ही भारत विकसित देश बन सकता है।’’
27 जुलाई 2015 को ‘‘अग्नि मिसाइल’’ को उड़ान देने वाले मशहूर वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे विलक्षण व्यक्तित्व ने इस नश्वर संसार से विदा ले ली। शिलांग आईआईएम में लेक्चर देते हुए उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। 83 वर्ष की आयु में डाॅ. कलाम ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं किन्तु देश को भविष्य के सपनों का रास्ता दिखा गए। डाॅ. अब्दुल कलाम उन चुनिंदा लोगों में से रहे हैं जिन्हें सभी सर्वोच्च पुरस्कार मिले। सन् 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से उन्हें सम्मानित किया गया था। वे एक सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।
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Wednesday, April 20, 2022

चर्चा प्लस | प्रथम पुण्यतिथि (20 अप्रैल) : साहित्य की मौन साधिका डाॅ. विद्यावती ‘मालविका | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
प्रथम पुण्यतिथि (20 अप्रैल) :
साहित्य की मौन साधिका डाॅ. विद्यावती ‘मालविका
           - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ एक ऐसा नाम है जिसे हिन्दी साहित्य जगत में आज भी सम्मान से लिया जाता है। उनका शोधग्रंथ ‘‘हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ आज भी वि़द्वानों एवं शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक का काम करता है। वे अपने समय की एक बड़ी लेखिका थीं। स्वयं राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें पीएच डी में गाईड किया था। वे चाहती तो एक शोहरत और दिखावे वाला जीवन जी सकती थीं लेकिन उन्होंने चुना सादगी भरा जीवन और ख़ामोशी से रह कर लेखन कार्य करने का मार्ग।  
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, सागर झील सहेली।।
उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किया,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर-भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,
सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।
महाकाल के चरणों में बचपन बीता
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,
ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।
          -यह कविता मात्र एक कविता नहीं है वरन संक्षिप्त काव्यात्मक जीवन परिचय है जो डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ ने स्वयं अपने बारे में लिखा था। डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ सागर नगर की एक ऐसी साहित्यकार थीं जिनका साहित्य-सृजन अनेक विधाओं, यथा- कहानी, एकांकी, नाटक एवं विविध विषयों पर शोध प्रबंध से ले कर कविता और गीत तक विस्तृत रहा है। लेखन के साथ ही चित्रकारी के द्वारा भी उन्होंने अपनी मनोभिव्यक्ति प्रस्तुत की। सन् 1928 की 13 मार्च को उज्जैन में जन्मीं डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ ने अपने जीवन के लगभग 60 वर्ष बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें 30 वर्ष से अधिक समय से वे मकरोनिया, सागर में निवासरत रहीं। डॉ. ‘मालविका’ को अपने पिता संत ठाकुर श्यामचरण सिंह एवं माता श्रीमती अमोला देवी से साहित्यिक संस्कार मिले। पिता संत श्यामचरण सिंह एक उत्कृष्ट साहित्यकार एवं गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अस्पृश्यता उन्मूलन एवं नशाबंदी में उल्लेखनीय योगदान दिया था। संत श्यामचरण सिंह को अपनी गतिविधियों को अंग्रेज शासन से बचाए रखने के लिए एक नाम और धारण करना पड़ा। छत्तीसगढ़ के दुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्र में जहां उन्होंने गांधीवादी आंदोलन चलाया, उन्हें पीलालाल चिनौरिया के नाम से भी जाना जाता रहा है। डॉ. विद्यावती अपने पिता के विचारों से अत्यंत प्रभावित रहीं और उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। बौद्ध धर्म एवं प्रणामी सम्प्रदाय पर उन्होने विशेष अध्ययन एवं लेखन किया।

डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा। जैसी कि उन समय परंपरा थी, एक पारिवारिक परिचित की मध्यस्थता से उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के ठाकुर रामधारी सिंह जी के साथ उनका विवाह हुआ। ठाकुर रामधारी सिंह सुलझे हुए व्यक्ति थे और वे भी गांधीवादी विचारों के समर्थक थे। वे अपने परिवारजन की भांति पुरातनपंथी भी नहीं थे। वे बेटियों के जन्म को अभिशाप नहीं समझते थे। किन्तु वे विद्यावती ‘मालविका’ जी का अधिक साथ नहीं दे सके। दो बेटियों के जन्म के कुछ समय बाद ही विद्यावती जी को वैधव्य का असीम दुख सहन करना पड़ा, किन्तु वे अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुईं। ससुराल पक्ष से कोई सहायता न मिलने पर उन्होंने शिक्षिका के रूप में आत्मनिर्भरता पूर्वक अपने वृद्ध पिता को सहारा दिया और अपने अनुज कमल सिंह को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाया। जो कि आदिम जाति कल्याण विभाग मघ्यप्रदेश शासन के हायर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। वे प्रसन्न थीं कि अपने छोटे भाई का जीवन संवार सकी थीं। किन्तु उन्हें अपने छोटे भाई कमल सिंह के उस दुख को देखना पड़ा जो उन्हें वर्षों तक भीतर ही भीतर उन्हें सालता रहा। समयापूर्व प्रथम प्रसव के दौरान कमल सिंह जी की जीवन साथी एवं अजन्मे शिशु का निधन हो गया। वे अकेले रह गए। एक बार फिर डॉ. विद्यावती जी ने अपने छोटे भाई को सम्हलने में मदद की। यद्यपि वे अपने भाई को पुनर्विवाह के लिए मना नहीं सकीं। लेकिन बहन-भाई का आपसी स्नेह जीवन भर रहा। सेवानिवृत्ति के उपरांत कमल सिंह विद्यावती जी के पास सागर आ गए तथा सन् 2017 में हृदयाघात से मृत्यु के उपरांत ही अपनी बड़ी बहन की स्नेहिल छांव से अलग हुए।
                डॉ. विद्यावती ने अपने बलबूते पर अपनी दोनों पुत्रियों वर्षा सिंह और शरद सिंह का लालन-पालन कर उन्हें उच्च दिलाई। उन्होंने व्याख्याता के रूप में मध्यप्रदेश शासन के शिक्षा विभाग में उज्जैन, रीवा एवं पन्ना आदि स्थानों में अपनी सेवाऐं दीं और सन् 1988 में पन्ना के मनहर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से सेवानिवृत्त हुईं। डॉ. विद्यावती शासकीय सेवा के साथ ही लेखन एवं शोध कार्यां में सदैव संलग्न रहीं। स्वाध्याय से हिन्दी में एम.ए. करने के उपरांत सन् 1966 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पीएच.डी. में उनके शोध निर्देशक (गाइड) हिन्दी तथा बौद्ध दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान राहुल सांकृत्यायन एवं पाली भाषा तथा बौद्ध दर्शन के अध्येता डॉ. भिक्षु धर्मरक्षित थे। उनका यह शोध प्रबंध आज भी युवा शोधकर्ताओं के लिए दिशानिर्देशक का काम करता है। डॉ. विद्यावती की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो हुईं, जिनमें प्रमुख हैं - कामना, पूर्णिमा, बुद्ध अर्चना (कविता संग्रह) श्रद्धा के फूल, नारी हृदय (कहानी संग्रह), आदर्श बौद्ध महिलाएं, भगवान बुद्ध (जीवनी) बौद्ध कलाकृतियां (पुरातत्व), सौंदर्य और साधिकाएं (निबंध संग्रह), अर्चना (एकांकी संग्रह), मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव, महामति प्राणनाथ-एक युगान्तरकारी व्यक्तित्व (शोध ग्रंथ) आदि। ‘‘आदर्श बौद्ध महिलाएं’’ पुस्तक का बर्मी एवं नेपाली भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुआ।
                डॉ. विद्यावती जहां रहीं वहां उन्होंने अपनी साहित्यिक प्रतिभा से सबको प्रभावित किया। जब वे उज्जैन में थीं तो डाॅ. श्याम परमार ने उन्हें ‘‘मालव कन्या’’ कहते हुए ‘‘मालविका’’ उपनाम दिया। जब वे अपने पिताजी के साथ छत्तीसगढ़ में रहीं तो वहां उनकी प्रतिभा को सभी ने सराहा। इस संबंध में जानकारी मिलती है उस लेख से जिसे दुर्ग (छत्तीसगढ़) के साहित्यकार अरुण कुमार निगम ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर लिखा था और जिसका शीर्षक है - ‘‘दुर्ग जिले की सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार: डॉ. विद्यावती ‘‘मालविका’’। उनके लेख का एक अंश साभार यहां दे रही हूं-
दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के चतुर्थ अधिवेशन, पाटन के अध्यक्ष श्री पतिराम साव ‘‘विशारद’’ के अभिभाषण दिनांक 23 अप्रैल 1961 के एक अंश में ‘‘नारी समाज और साहित्य चेतना’’ शीर्षक के अंतर्गत उल्लेखित है -‘‘हर्ष की बात है कि अपने दुर्ग जिले में श्रीमती मनोरमा पाटणकर और श्रीमती सुधा राजपूत कविता लिखती हैं तथा कवि सम्मेलनों में भाग लेती हैं। महिला समाज को साहित्य क्षेत्र में उतरने का नेतृत्व प्राप्त है। ‘‘श्रीमती विद्यावती मालविका’’ भी दुर्ग जिले की हैं, उन्होंने अपनी कम अवस्था में ही अनेक पुस्तकें लिखी हैं। आप श्री पीलालाल चिनौरिया की सुपुत्री हैं।’’
इसी प्रकार दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन पंचम अधिवेशन में बालोद के अध्यक्ष श्री दानेश्वर शर्मा ने अपने भाषण (गुरुवार दिनांक 21 जून 1962) में ‘‘हमारे गौरव’’ शीर्षक के अन्तर्गत कहा था -‘‘श्री पीला लाल चिनौरिया (संत श्यामा चरण सिंह ), शिशुपाल सिंह यादव उदय प्रसाद ‘‘उदय’’ व पतिराम साव ने तो दुर्ग में साहित्य की ज्योति ही जलाई है।’’ इसी भाषण में ‘‘जगमगाते नक्षत्र’’ शीर्षक के अंतर्गत उल्लेखित है - ‘‘श्रीमती मनोरमा पाटणकर, विद्यावती मालविका तथा विद्यावती खंडेलवाल इस जिले की महिला साहित्यकार हैं जिन्होंने अच्छी रचनाओं का सृजन किया है।’’
विशेष उल्लेखनीय है कि जनकवि कोदूराम ‘‘दलित’’ के शिक्षा गुरु तथा काव्य गुरु सन्त श्यामचरण सिंह उर्फ श्री पीलालाल चिनौरिया जी थे। श्री श्यामाचरण सिंह उर्फ पीलालाल चिनौरिया का विवाह सुमित्रा देवी ‘‘अमोला’’ से सन् 1925 में हुआ था। वे उन दिनों भिलाई, छत्तीसगढ़ में प्रधान-अध्यापक हुआ करते थे। उसी वर्ष उनका स्थानांतरण अर्जुन्दा में हुआ था। 13 मार्च सन् 1928 में विद्यावती मालविका का जन्म हुआ। श्री श्यामाचरण सिंह जी अध्यापक होने के साथ-साथ आशुकवि, एक उत्कृष्ट साहित्यकार, समाज सुधारक एवं गांधीवादी विचारधारा के थे। विद्यावती की माता श्रीमती सुमित्रा देवी ‘‘अमोला’’ भी विदुषी महिला थीं। वे गृहणी होने के साथ भक्तिभाव की रचनाएं लिखती थीं। विद्यावती ‘मालविका’ जी को अपने पिता श्यामाचरण सिंह एवं माता श्रीमती सुमित्रा देवी ‘अमोला’ से साहित्यिक संस्कार मिले थे। उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु अर्थात चालीस के दशक से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। शालेय शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने साहित्य रत्न तथा एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। तत्पश्चात ‘‘हिन्दी सन्त-साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में आगरा विश्वविद्यालय से पी एच डी की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनका वाईवा लिया था। वे 1944 में धरमजयगढ़ (छत्तीसगढ़) में अध्यापिका बनीं। 1945 में बौद्ध धर्म संबंधित उनकी पहली रचना ‘धर्मदूत’’ में प्रकाशित हुई थी।
            - उपरोक्त लेख से डॉ. विद्यावती जी के छत्तीसगढ़ में प्रभाव का पता चलता है। वहीं, वे जब सेवानिवृत्ति के बाद सागर की निवासी बनीं तो उन्होंने दैनिक भास्कर के सागर संस्करण में ‘‘सागर संभाग की कवयित्रियां’’ शीर्षक से धरावाहिक लेख लिखे। बुंदेलखंड के साहित्य जगत को समृद्ध करने में भी अपने मौलिक लेखन से उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। अजयगढ़ के सुप्रतिष्ठित कवि एवं साहित्यकार अंबिका प्रसाद ‘दिव्य’’ उन्हें ‘‘बुंदेलखंड की साहित्य ज्योति’’ कहा करते थे। आचार्य त्रिलोचन शास्त्री उन्हें ‘‘विदुषी बहन’’ कह कह पुकारा करते थे। शिवमंगल सिंह सुमन, पं. सूर्यनारायण व्यास, ब्रजभूषण सिंह आदर्श आदि सुप्रतिष्ठित साहित्यकारों ने सदा उनकी प्रशंसा की। वे चाहती तो एक शोहरत और दिखावे वाला जीवन जी सकती थीं लेकिन उन्होंने चुना सादगी भरा जीवन और ख़ामोशी से रह कर लेखन कार्य करने का मार्ग।  
डॉ. ‘मालविका’ को हिन्दी साहित्य सेवा के लिए अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए। जिनमें उल्लेखनीय हैं- सन् 1957 में स्वतंत्रता संग्राम शताब्दी सम्मान समारोह में मध्यप्रदेश शासन का साहित्य सृजन सम्मान, सन् 1958 में उत्तरप्रदेश शासन का कथा लेखन सम्मान, सन् 1959 में उत्तरप्रदेश शासन का जीवनी लेखन सम्मान, सन् 1964 में मध्यप्रदेश शासन का कथा साहित्य सम्मान, सन् 1966 में मध्यप्रदेश शासन का मीरा पुरस्कार प्रदान किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी डॉ. विद्यावती ने अपना लेखन सतत् जारी रखा। उनके इस साहित्य के प्रति सर्मपण को देखते हुए उन्हें सन् 1998 में महारानी लक्ष्मीबाई शास. उ.मा. कन्या विद्यालय क्रमांक-एक, सागर द्वारा ‘‘वरिष्ठ साहित्यसेवी सम्मान’’, सन् 2000 में भारतीय स्टेट बैंक सिविल लाइनस् शाखा सागर द्वारा ‘‘साहित्यसेवी सम्मान’’, वर्ष 2007 में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सागर द्वारा ‘‘सुंदरबाई पन्नालाल रांधेलिया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान’’ एवं सन् 2016 में हिन्दी दिवस पर श्यामलम् संस्था सागर द्वारा ‘‘आचार्य भगीरथ मिश्र हिन्दी साहित्य सम्मान’’ से सम्मानित किया गया। जुलाई 2020 में सागर के यूट्यूबर साहित्यकार वरुण प्रधान ने अपने प्रधाननामा चैनल में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक एपीसोड प्रसारित किया था जिसे आज भी यूट्यूब पर देखा जा सकता है।

           20 अप्रैल 2021 को हृदयाघात से डाॅ विद्यावती ‘‘मालविका’’ ने इस संसार से विदा ले ली। उनके निधन से व्यथित उनकी बड़ी पुत्री डाॅ. वर्षा सिंह ने ‘‘छोड़ गईं मां हमें अकेला.’’ शीर्षक से यह भावभीना गीत लिखा था-
दीपक जल कर फैलाता है
यादों का उजियाला।
मां ने किस ममता से हमको
संघर्षों में पाला।

लगा हुआ है जग का मेला
छोड़ गईं मां हमें अकेला
पल-पल भारी सी लगती है
आज कठिन यह दुख की बेला
भूख-प्यास सब गायब जैसे
भाता नहीं निवाला।

माना यह दुनिया है फानी
सबकी लगभग एक कहानी
किन्तु ये मन है नहीं मानता
सुनना चाहे मां की बानी
आएं कितनी ‘‘वर्षा’’ ऋतुएं
बुझे न मन की ज्वाला।
उस समय डाॅ विद्यावती जी की छोटी पुत्री डाॅ शरद सिंह को यह पता नहीं था कि मां के दुख में व्यथित उसकी वर्षा दीदी भी कोरोना संक्रमित हो कर जल्दी ही उसे छोड़ कर जाने वाली हैं।

हर बेटी को अपनी मां पर गर्व होता है, मुझे भी है। मेरे जीवन की सार्थकता यही है कि मैं डाॅ विद्यावती ‘‘मालविका’’ जी की बेटी और डाॅ. वर्षा सिंह जी की बहन हूं। मां की प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करती हूं और प्रर्थना करती हूं कि प्रत्येक जन्म में वे ही मेरी मां रहे।
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(20.04.2022)
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Wednesday, October 28, 2020

चर्चा प्लस | 28 अक्टूबर-पुण्यतिथि | कठिन है समझना राजेन्द्र यादव होने का अर्थ | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
28 अक्टूबर-पुण्यतिथि 
कठिन है समझना राजेन्द्र यादव होने का अर्थ
   - डाॅ शरद सिंह
         हिंदी साहित्य की मशहूर पत्रिका ‘‘हंस’’ के संपादक, हिंदी में नई कहानी आंदोलन के प्रवर्तकों में एक, कहानीकार, उपन्यासकार राजेंद्र यादव ने हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श को मजबूती से खड़ा करने में अपना जो योगदान दिया वह अद्वितीय है। बेशक वे हमेशा विवादों से घिरे रहे लेकिन विवादों से घबराने के बजाए उन्होंने विवादों से प्रेम किया। राजेन्द्र यादव के जाने के बाद हिन्दी साहित्य जगत में जो शून्य उत्पन्न हुआ है उसे अभी तक कोई भर नहीं सका है। गोया ज्वलंत विचारों की एक चिंनगारी थी जो बुझ गई लेकिन उसकी तपिश भविष्य के गर्त में कहीं दबी हुई है। 
हिन्दी साहित्य के ‘मील का पत्थर’ कहे जाने वाले राजेन्द्र यादव जी से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 1998 में सागर में ही हुई थी जब वे एक साहित्यिक समारोह में सागर आए थे। स्थानीय रवीन्द्र भवन में समारोह के उद्घाटन के दिन उनसे मेरी प्रथम भेंट हुई। इससे पूर्व मात्र पत्राचार था। उन्होंने मेरा परिचय पाते ही कहा-‘‘ ऐसी भी क्या नाराज़गी, हंस के लिए और कहानी भेजो!’’ उस समय भी उन्हें सागर नगर और विश्वविद्यालय के साहित्य प्रेमियों ने घेर रखा था। मगर वे किसी घेराव के परवाह करने वाले व्यक्ति थे ही नहीं। मैंने उनसे कहा कि आप जानते हैं मेरी नाराज़गी का कारण। राजेन्द्र जी बोले -‘‘ ठीक है आइन्दा ध्यान रखा जाएगा।’’ इतना कह कर वे हंसने लगे। हमारे बीच हुई वार्ता का सिर-पैर वहां उपस्थित लोगों के समझ से परे था। दरअसल हुआ यूं था कि मेरी एक कहानी ‘‘हंस’’ में प्रकाशित हुई और उस कहानी के साथ कुछ ज़्यादा ही बोल्ड रेखाचित्र प्रकाशित कर दिए गए। जो देखने में तो अटपटे थे ही और जिनसे कहानी की गंभीरता को भी चोट पहुंच रही थी। मैंने फोन कर के अपनी आपत्ति से उन्हें अवगत कराया था और साथ ही जोश में आ कर यह भी कह दिया था कि आइन्दा मैं ‘‘हंस’’ के लिए अपनी कोई कहानी नहीं भेजूंगी। बस, इसी बात पर वे मुझे टोंक रहे थे। सिर्फ़ मुझे ही नहीं, मेरी दीदी डाॅ. वर्षा सिंह से भी कहा था,‘‘आप तो अपनी ग़ज़लें भेज दिया करिए और इसे भी समझाइए।

दोबारा लखनऊ में ‘‘कथाक्रम’’ के आयोजन में राजेन्द्र यादव जी से भेंट हुई। उस समय तक वे मेरी कुछ और कहानियां ‘‘हंस’’ में प्रकाशित कर चुके थे और मेरा प्रथम उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ प्रकाशित हो चुका था। मुझे भी वहां बोलना था। मैंने अपनी बात रखते हुए कहा कि "साहित्य जगत में उठाने-गिराने का खेल चल रहा है, उससे साहित्य को ही क्षति पहुंच रही है।’’ और भी बहुत कुछ बोला था मैंने, लेकिन इस बात को राजेन्द्र यादव जी ने पकड़ लिया। दोपहर के भोजन के दौरान उन्होंने मुझसे कहा-‘‘बहुत ज़्यादा खरा-खरा बोल दिया तुमने। अब कई लोग तुमसे नाराज़ हो जाएंगे।’’ फिर हंस कर बोले-’’यह खरापन ही तुम्हें सबसे अलग बनाता है, इसे ऐसे ही ज़िन्दा रखना।’’ उनका यह कथन मेरे लिए चौंकाने वाला था। ‘‘उठाने-गिराने’’ का आरोप राजेन्द्र जी पर भी लगता रहा था इसलिए मुझे लगा था कि उन्हें भी मेरी बात बुरी लगी होगी लेकिन इसके विपरीत उन्होंने मेरा उत्साहवर्द्धन किया। उस समय मुझे लगा था कि जो दावा करते हैं कि वे राजेन्द्र यादव को समझते हैं, दरअसल उन्हें कोई नहीं समझ सकता है। वस्तुतः यह अबूझपन ही राजेन्द्र यादव को एक ऐसा संपादक बनाता था जो हिन्दी साहित्य को अपनी मनचाही दिशा देता जा रहा था। राजेन्द्र यादव जी ने स्वीकार किया था कि उन्हें मेरा पहला उपन्यास बहुत पसंद आया। ‘‘लीक से हट कर है’’ यही कहा था उन्होंने। 
समय-समय पर अन्य समारोहों में राजेन्द्र यादव जी से संक्षिप्त भेंट होती रही। किन्तु सन् 2013 में जब मैं एक आयोजन के सिलसिले में दिल्ली गई तो पता चला कि राजेन्द्र यादव जी अस्वस्थ चल रहे हैं। दिल्ली के ही एक मित्र के साथ मैं उनके निवास पर पहुंची। मैं पहली बार उनके घर गई थी। तब मुझे पता नहीं था कि यह मेरी उनसे अंतिम भेंट है। वे बीमार थे लेकिन उनका उत्साह देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे बीमार हैं। मुझे देख कर वे बहुत खुश हुए। काफी साहित्यिक चर्चाएं हुईं। उनसे विदा लेते हुए मैंने कहा था कि-‘‘आप जल्दी स्वस्थ हों। अगली बार दिल्ली आऊंगी तो फिर भेंट होगी।’’

मगर 28 अक्टूबर 2013 को रात्रि में टीवी समाचारों से ज्ञात हुआ कि राजेन्द्र यादव अब नहीं रहे। विश्वास करना कठिन था, मगर विश्वास करना पड़ा। मानो एक युग समाप्त हो गया था। 

28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे राजेंद्र यादव ने आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में हिन्दी विषय से एमए की डिग्री हासिल की थी। वे काफी दिनों तक कोलकाता में रहे। बाद में दिल्ली आ गए और और राजधानी के बौद्धिक जगत का एक अहम हिस्सा बन गए। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। संयुक्त मोर्चा सरकार में वह प्रसार भारती के सदस्य भी बनाए गए थे। वे हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक थे। ‘‘नयी कहानी’’ के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका ‘‘हंस’’ का पुनर्प्रकाशन प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को उन्होंने प्रारम्भ किया। इसके प्रकाशन का दायित्व पूरे 27 वर्ष यानी जीवनपर्यन्त निभाया। हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।

राजेन्द्र यादव जी की यह विशेषता थी कि उनसे वैचारिक मतभेद होते हुए भी उनके कार्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता था। राजेन्द्र यादव के निधन के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे मैनेजर पांडेय ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था-‘‘राजेंद्र यादव पिछली आधी सदी से हिंदी साहित्य में सक्रिय रहे। उन्होंने तीन-चार क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। नई कहानी के लेखकों में महत्वपूर्ण थे राजेंद्र यादव। उन्होंने कुछ अच्छे उपन्यास भी लिखे जिस पर ‘‘सारा आकाश’’ जैसी फिल्म भी बनी। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘‘हंस’’ पत्रिका निकाली, जो हिंदी की लोकप्रिय और विचारोत्तेजक पत्रिका मानी जाती है। इसके जरिए उन्होंने दो काम किए, पहला यह कि उन्होंने स्त्री दृष्टि और लेखन को बढ़ावा दिया। स्त्री दृष्टि पर उनकी राय विवादास्पद लेकिन विचारणीय रही। उन्होंने दूसरा काम यह किया कि हंस के जरिए उन्होंने दलित चिंतन और दलित साहित्य को बढ़ावा दिया। दलित साहित्य को हिंदी साहित्य में स्थापित करने में राजेंद्र यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदी में दलित साहित्य को आगे बढ़ाने में राजेंद्र यादव का बहुत बड़ा योगदान है। मेरी जानकारी में हिंदी में दलित साहित्य पर पहली गोष्ठी उन्होंने 1990 के दशक में कराई थी। उसके माध्यम से लोग यह जान सके कि हिंदी में दलित साहित्य की धारा विकसित हो रही है। उन्होंने दलित लेखकों की रचनाओं को हंस में प्रमुखता से छापा। दलित साहित्य पर हंस के कई विशेषांक निकाले। इसके जरिए दलित साहित्य को समझने और आगे बढ़ाने का काम राजेंद्र यादव ने किया। इसकी बदौलत दलित साहित्य हिंदी में स्थापित धारा बन पाया। युवा लेखकों को आगे बढ़ाने में भी राजेंद्र यादव का बड़ा योगदान है।  

सन् 2014 में स्त्रीविमर्श पर मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘औरत तीन तस्वीरें’’। उसमें मेरा एक लेख है-‘‘स्त्रीविमर्श के माईलस्टोन पुरुष’’। इस लेख में मैंने स्त्रीविमर्श के प्रति राजेन्द्र यादव के योगदान की चर्चा की है। लेख का अंश इस प्रकार है-‘‘स्त्री-विमर्श के संदर्भ में एक सुखद तथ्य यह भी है कि हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श को एक वैचारिक आन्दोलन के रूप में एक पुरुष ने स्थापित किया और उसमें स्त्रियों की सहभागिता को हरसंभव तरीके से बढ़ाया। यह नाम है राजेन्द्र यादव का। यह सच है कि स्त्रीविमर्श के अपने वैचारिक आन्दोलन के कारण उन्हें समय-समय पर अनेक कटाक्ष सहने पड़े हैं तथा लेखिकाओं के लेखन को ‘बिगाड़ने’ का आरोप भी उन पर लगाया जाता रहा है किन्तु सभी तरह के कटाक्षों और आरोपों से परे राजेन्द्र यादव ने साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के पटल पर लेखिकाओं को अपने विचारों को खुल कर सामने रखने का भरपूर अवसर दिया। राजेन्द्र यादव अपने सामाजिक सरोकार रखने वाले साहित्यक विचारों और उद्देश्य को ले कर सदा स्पष्ट रहे। उन्होंने कभी गोलमोल या बनावटी बातों का सहारा नहीं लिया। यूं भी अपनी स्पष्टवादिता के लिए वे विख्यात रहे हैं।  
राजेन्द्र यादव ने स्त्री स्वातंत्र्य की पैरवी की तो उसे अपने जीवन में भी जिया। एक बार जयंती रंगनाथन को साक्षात्कार देते हुए उन्होंने स्त्री विमर्श पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा। घर के अंदर भी स्त्री को जितनी आजादी चाहिए, बहन-बेटी को जो फ्रीडम चाहिए, एजुकेशन चाहिए,  मैंने दी है। बेटी को ज़िन्दगी में एक बार थप्पड़ मारा, आज तक उसका अफसोस है। बाद में ज़िन्दगी के सारे निर्णय उसने खुद ही लिए, यह फ्रीडम तो देनी ही पड़ेगी।’ वे स्त्री-लेखन और पुरुष लेखन के बुनियादी अन्तर को हमेशा रेखांकित करते रहे हैं। उनके अनुसार ‘जो पुरुष मानसिकता से लिखा गया है और जो स्त्री की मानसिकता से लिखा गया है, बेसिक अंतर है। दो अलग एप्रोच हैं। उस चीज को तो हमें मानना होगा।’ 

निःसंदेह, यह एक ऐसा तथ्य है जिसको नकारा नहीं जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में लेखिकाओं को यदि किसी ने सही अर्थ में मुखरता प्रदान की तो वह हैं राजेन्द्र यादव। यह हिन्दी साहित्य जगत में सतत् परिवर्तन की प्रक्रिया थी जो  कभी न कभी, कहीं से तो शुरू होनी ही थी। इस यात्रा का प्रस्थान बिन्दु बना राजेन्द्र यादव का वह साहस जो उन्हें यश-अपयश के बीच अडिग बनाए रखा।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मानते हैं कि तमाम विवादों के बावजूद राजेन्द्र यादव के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था-‘‘हंस साहित्यिक पत्रिका का पुनर्प्रकाशन उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाएगा। इसे उन्होंने एक ऐसे मंच का रूप दिया, जिस पर कई नए कहानीकार आए, जिन्हें कोई जानता तक नहीं था। राजेंद्र यादव ने उन्हें जगह दी। विवादों को जानबूझकर जन्म देते हुए और विवाद झेलते हुए भी उन्होंने नए लोगों को मौका दिया। इसके लिए उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि इसका परिणाम क्या होगा। हंस में उन्होंने साहित्य के इर्द-गिर्द सामाजिक विषयों पर बहस शुरू की। दलितों के सवाल पर, स्त्रियों के सवाल पर और यौन वृत्तियों के सवाल पर। यह भी उनका बड़ा योगदान है। राजेंद्र यादव उस त्रयी के सदस्य थे, जिनमें कमलेश्वर और मोहन राकेश का नाम आता है। इस त्रयी ने हिंदी कहानी को एक नई दिशा दी और उसके तेवर को बदलकर रख दिया।’’ 

दरअसल राजेन्द्र यादव ने उन सभी को मुखर होने का भरपूर अवसर दिया जो शायद कभी मुखर नहीं हो पाते यदि राजेन्द्र यादव न होते। लेकिन स्वयं राजेन्द्र यादव स्वयं विवाद और विमर्श के रूप में ही मुखर होते रहे। आज के साहित्यिक परिवेश में जिसे राजेन्द्र यादव के युग के बाद का समय कहा जा सकता है, राजेन्द्र यादव होने का अर्थ समझ पाना बहुत कठिन है। 
                   
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(दैनिक सागर दिनकर में 28.10.2020 को प्रकाशित)
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