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Friday, August 30, 2024

शून्यकाल | बचपन में सुनी कहानियां तय कर सकती हैं जीवन की दिशा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम - "शून्यकाल"                                                                       बचपन में सुनी कहानियां तय कर सकती हैं जीवन की दिशा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

      मेरी पीढ़ी का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने बचपन में अपनी नानी, दादी, नाना, दादा, माता, पिता, भाई, बहन या अन्य किसी से कहानियां नहीं सुनी होंगी। उस दौर में अपने बचपन में सभी कहानियां सुनते थे। राजा-रानी की, जंगल की, भूतों की और तरह-तरह की छोटी-बड़ी कहानियां। तब टीवी या मोबाईल नहीं थे। सोने से पहले बच्चों को कहानियां सुनाने का रिवाज़-सा था। कहानियां सुनने वाले तो नहीं लेकिन सुनाने वाले ज़रूर जानते थे कि उनकी कहानियां जीवन की दिशा तय करने का माद्दा रखती हैं। जैसे बचपन की कहानियों ने मेरे जीवन की भी दिशा तय की।
        मुझे एक कथा लेखिका बनना ही था। अच्छी, बुरी, छोटी, बड़ी कैसी भी, लेकिन कहानियां तो मुझे लिखनी ही थीं। मेरे बचपन से ही कहानियां मेरे जीवन में रच-बस गई थीं। मुझे सबसे अधिक कहानियां सुनने को मिलीं अपने नाना संत श्यामचरण सिंह जी से। उनके पास कहानियों का अगाध भंडार था। लगभग रोज रात को मैं और मेरी वर्षा दीदी नाना जी के बिस्तर पर जा बैठते और उनसे कहानी सुनाने का आग्रह करते। उन्होंने जो कहानियां सुनाईं उनमें से अधिकांश वे प्रसिद्ध कथाएं थीं जो स्कूली जीवन में मैंने कथा-पुस्तक के रूप में पढ़ीं। जैसे- अरेबियन नाईट्स की कहानियां, सिंहासन बत्तीसी, सिंदबाद के साहसिक कारनामे, हातिमताई के किस्से आदि। इसके अलावा महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक, राजाराम मोहन राय आदि की जीवनियां भी नाना जी हमें सुनाया करते थे। उन्हें अनेक लोककथाएं भी मालूम थीं। लेकिन वे अधिकतर छत्तीसगढ़ी लोककथाएं अधिक सुनाया करते थे। शायद इसलिए कि छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही और वहां के लोक जीवन से उन्हें अगाध लगाव था।

मेरे कमल मामा भी कहानियां सुनाने में माहिर थे। उनकी कहानियों के पात्र प्रायः शेर, भालू, सियार आदि वन्यपशु होते थे। ‘‘रंगा सियार’’ की प्रसिद्ध कथा सबसे पहले कमल मामा ने ही मुझे सुनाई थी। इनमें से कई ‘‘पंचतंत्र’’ की कहानियां होती थीं। नानाजी और मामाजी से हम दोनों बहनों ने खूब कहानियां सुनीं। मेरी तो यह दशा थी कि मुझे कहानी सुने बिना नींद नहीं आती थी और कई बार कहानी सुनते-सुनते सो जाने कि कारण कहानी का अंत का पता नहीं चल पाता था जिससे दूसरे दिन मैं फिर उसी कहानी को सुनाने की जिद करती। इन कहानियों ने मुझे कल्पनालोक में विचरण करने का भरपूर अवसर दिया। न जाने कितनी बार मैं सिंदबाद के साथ साहसिक यात्राओं पर गई। मुझे आज भी याद है कि सिंदबाद की एक कहानी में कुछ इस प्रकार की घटना थी कि सिंदबाद अपने जहाजियों सहित समुद्र की यात्रा कर रहा था। महीनों बीत गए थे लेकिन उन्हें कोई टापू दिखाई नहीं दिया था। अंततः उन्हें एक छोटा-सा टापू दिखाई दिया और जहाजी खुशी से उछल पड़े। सिंदबाद को उस टापू पर शंका हुई कि यह समुद्र के बीचोबीच कहां से आ गया? लेकिन उसके साथियों ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और वे टापू पर उतर गए। वह टापू चटियल और चिकना था। फिर भी जहाजियों ने उस पर टहलना और खाना पकाना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद अचानक वह टापू हिल उठा। सभी जहाजी इधर-उधर गिरने लगे। कुछ तो समुद्र में ही जा गिरे। वे सम्हल पाते इससे पहले ही वह टापू जोर से गोल घूमा और बड़ा-सा भंवर बनाता हुआ समुद्र में समा गया। उस भंवर से सिंदबाद का जहाज डगमगा गया और पलट गया। सिंदबाद का एक और एडवेंचर। सिंदबाद समझ गया कि वह टापू नहीं एक बड़ी व्हेल मछली थी जो पानी की सतह पर आराम कर रही थी और उसकी पीठ पर जहाजियों के द्वारा खाना पकाने से उसे आंच लगी जिससे वह विचलित हो गई और गहरे पानी में चली गई। उन दिनों व्हेल मछली को हमने मात्र चित्रों में देखा था। उन दिनों डिस्कवरी, नेशनल जियोग्राफी या बीबीसी अर्थ जैसे टीवी चैनल तो हुआ नहीं करते थे कि हम व्हेल को देख पाते। उस समय तक बस छोटी-छोटी मछलियां देखी थीं वह भी मेरे पन्ना शहर के छत्रसाल ग्राउंड में लगने वाले वार्षिक मेले में। उन्हीं नन्हीं मछलियों के आधार पर बड़ी-सी व्हेल की कल्पना करना मुझे बहुत अच्छा लगता था। एक इतनी बड़ी मछली कि जिसकी पीठ पर जहाजी टहल सकें और खाना पका सकें। मेरे लिए भी सिंदबाद की तरह रोमांचकारी रहता था। आज भी जब टीवी चैनल्स में व्हेल को पानी की सतह पर छपाके मारते और गहरे भंवर बनाते देखती हूं तो यह कहानी मेरे मानस में ताज़ा हो जाती है। 

मामाजी के नौकरी पर बाहर चले जाने के बाद उनके बदले कहानी सुनाने का जिम्मा वर्षा दीदी ने उठा लिया। वे ग़ज़ब की स्टोरी-टेलर थीं। उनकी विशेषता यह थी कि वे कहानियां मन से बना-बना कर सुनाती थीं। न जाने कितनी कहानियां उन्होंने मुझे सुनाईं। इस लिहाज़ से उन्हें कथालेखिका बनना चाहिए था। लेकिन शायद भीतर से वे मेरी अपेक्षा अधिक भावुक थीं, इसीलिए उन्होंने आगे चल कर ग़ज़ल की ओर अपनी प्रतिभा मोड़ दी। जबकि मैं कथा संसार में रमी रही। 
मुझे कहानियां सुनाने का श्रेय सिर्फ नानाजी, मामाजी और वर्षा दीदी को ही नहीं है, मेरे घर खाना पकाने वाली महाराजिन जिन्हें हम ‘‘बऊ’’ कह कर पुकारते थे, उन्हें भी हैं। जब हम रात्रि का भोजन करने रसोईघर में चूल्हे के पास जा बैठते, तब उनसे कहानी सुनाने का आग्रह करते और वे थोड़ी व्यस्तता का बहाना करने के बाद कहानी सुनाना शुरू कर देतीं। यह नखरे दिखाना उनकी स्टाईल में शामिल था ताकि उनकी महत्ता बनी रहे। जबकि उनकी कहानियां हमारे लिए हमेशा महत्वपूर्ण रहती थीं। उनकी कहानियों में भूत-प्रेत, भगवान के चमत्कार आदि भी शामिल रहते थे। लेकिन वे डरावनी नहीं होती थीं। उनकी एक कहानी का पात्र मैं कभी भूल नहीं सकती हूं, वह पात्र था ‘‘मजरसेठ’’। इस पात्र की कई कहानियां उन्होंने हमें सुनाई और यह भी बताया कि वे मजरसेठ के घर पर भी खाना पकाने का काम कर चुकी हैं। उनकी इस बात ने हमें बहुत प्रभावित किया। एक दिन किसी चर्चा के दौरान मैंने मां से पूछ लिया कि ये मजरसेठ कहां रहते हैं? उनकी दूकान कहां पर है जहां बैठ कर वे न्याय करते हैं। मां को पहले तो कुछ पल मेरा प्रश्न समझ में नहीं आया लेकिन जब समझ में आया तो वे खूब हंसी। उन्होंने बताया कि वह मजरसेठ नहीं ‘‘मजिस्ट्रेट’’ है। उसकी कोई दूकान नहीं है, वे तो अपनी अदालत में बैठ का फैसला सुनाते हैं। यह जानने के बाद भला मैं कैसे भूल सकती थी इस पात्र को? आज भी मजिस्ट्रेट शब्द सुनते ही ‘‘मजरसेठ’’ याद आ जाता है।

       लिखना-पढ़ना सीख जाने पर मैंने अखबारों में पहले मां की रचनाएं पढ़नी शुरू कीं। फिर दीदी की रचनाएं पढ़ने को मिलने लगीं। जाहिर है कि मेरे मन में भी लिखने और छपने का कीड़ा कुलबुलाने लगा। मैंने पहली कहानी जो कि बच्चों के काॅलम के लिए लिखी थी, मां और दीदी से छिपा कर चुपचाप पोस्ट कर दी। कहानी को लिखने से कहीं अधिक मुझे यह पता लगाने की मेहनत करना पड़ी कि मां और दीदी अपनी रचनाएं कैसे भेजती हैं। उन दिनों डाक से ही रचनाएं भेजी जाती थीं। एक लिफाफे में अपनी रचना, संपादक के नाम एक पत्र और अपना पता लिखा, टिकट लगा लिफाफा रख कर। लिफाफे पर वजन के अनुसार टिकट लगा कर पोस्ट करना पड़ता था। मैंने एक-दो बार ध्यान से देखा कि वे लोग किस तरह पत्र लिखती हैं, कैसे लिफाफा बंद करती हैं और फिर कहानी लिखने के बाद मैंने भी वहीं सब किया। धन्य हैं उस जमाने के साहित्य संपादक जो छोटे बच्चों को प्रोत्साहित करने में विश्वास रखते थे। वरना मेरी गंदी लिखावट के आधार पर मेरी कहानी रिजेक्ट हो सकती थी। लेकिन निश्चित रूप से उन्होंने कहानी को पढ़ा होगा और उन्हें लिखावट के बजाए कहानी अच्छी लगी होगी। असली मजा तो तब आया जब कहानी छप गई और अखबार हमारे घर आया। हमेशा की तरह सबसे पहले मां ने अखबार पढ़ने को उठाया। बच्चों के काॅलम में मेरी कहानी देख कर वे चकित रह गईं। उन्होंने मुझसे पहला प्रश्न यही किया कि -‘‘यह कब भेजी?’’ फिर दूसरा प्रश्न था कि ‘‘भेजने से पहले मुझे बताया क्यों नहीं?’’ मैंने भी बड़ी ईमानदारी से उन्हें उत्तर दिया कि यदि मैं आप लोगों को बता कर भेजती और यदि कहानी नहीं छपती तो आप लोग मेरी हंसी उडातीं। मेरा उत्तर सुन कर मां को कैसा लगा मुझे ठीक-ठीक अंदाज़ नहीं है लेकिन यह जरूर याद है कि उन्हें लाड़ से मेरे सिर पर हाथ फेरा था।    
               
          जैसे मेरे मानस पर बचपन की कहानियों ने गहरी छाप छोड़ी और मुझे कथा संसार से जोड़ दिया, ठीक उसी तरह न जाने कितने लोगों ने अपने जीवन की दिशा और प्रोफेशन इसी तरह की कहानियों से तय किए होंगे। आज के बच्चों को कहानियां सुनने को कम मिलती हैं और जो मिलती हैं उन ‘‘बेड टाईम स्टोरीज़’’ में वह प्रभाव नहीं होता जोकि होना चाहिए। क्योंकि ये कहानियां या तो इलेक्ट्राॅनिक यंत्र सुनाते हैं या फिर अपने काम से थके-मांदे माता-पिता। इसीलिए बच्चों की काल्पनिक दुनिया भी यांत्रिक हो चली है।  
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Tuesday, December 6, 2022

पुस्तक समीक्षा | दाम्पत्य जीवन की त्रासदियों को उकेरती कहानियां | समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 06.12.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक चन्द्रभान राही के कहानी संग्रह "रोटी की कीमत तथा अन्य कहानियां" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
दाम्पत्य जीवन की त्रासदियों को उकेरती कहानियां  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - रोटी की कीमत तथा अन्य कहानियां
लेखक      - चन्द्रभान राही
प्रकाशक     - इंदिरा पब्लिशिंग हाऊस, ई-5/21, अरेरा काॅलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल
मूल्य        - 295/-
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कथा और उपन्यास जगत में चंद्रभान राही तेजी से अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। उनका कहानी संग्रह ‘‘रोटी की कीमत’’ पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर संवेदनशील कहानियों का संग्रह है। कहानियों में परिवार एवं दाम्पत्य जीवन की समस्याओं को ले कर प्रेमचंद और उनके पूर्व के युग में बहुत-सी कहानियां लिखी गईं। दरअसल वह सामाजिक परिवर्तन का युग था जिसमें स्त्रियों ने घर से बाहर कदम रखना शुरू किया था। उस समय एक ऐसी समझ-बूझ की आवश्यकता थी जिसमें स्त्रियों के घर से बाहर निकलने को संवेदना के स्तर पर देखा जाए और उसे सकारात्मक दृष्टिकोण से स्वीकार किया जाए। इसके साथ ही स्त्रियों से भी यह आग्रह किया गया कि वे अपनी स्वतंत्रता और घरेलू दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखें। वह आरंभिक दौर था इसलिए इस प्रकार की सर्तकता एवं अपेक्षाएं स्वाभाविक थीं। इसके बाद ‘‘नई कहानी’’ का दौर आया जिसे कमलेश्वर और उत्तर कमलेश्वर कहानियों के रूप में भी देखा जाता है। इसी दौर में मन्नू भंडारी और ममता कालिया जैसी लेखिकाओं ने पारिवारिक एवं दाम्पत्य संबंधों में स्त्री और पुरुष के दायित्वों में संतुलन पर प्रश्न उठाए। इसी दौर में घर के बाहर के सामाजिक एवं आर्थिक जगत की कहानियां लिखी गईं। इन दोनों तरह की कहानियों की छाप चंद्रभान राही की कहानियों में देखी जा सकती है। उनके इस संग्रह की कुल कहनियों की पचहत्तर प्रतिशत कहानियों का मूल स्वर दाम्पत्य जीवन एवं स्त्री-पुरुष के सामाजिक संबंधों का है, शेष पच्चीस प्रतिशत कहानियां सामाजिक-आर्थिक आधार के कथानकों की हैं।
‘‘रोटी की कीमत तथा अन्य कहानियां’’ में कुल पचास कहानियां हैं। अपने संग्रह की शीर्षक कहानी के बारे में लेखक ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि -‘‘रोटी की कीमत कहानी की घटना ने मुझे अन्दर तक हिला कर रख दिया था। कहानी लिखने के बाद जब भी उसे पढ़ा करता था, तब शरीर के रोम-रोम में एक कम्पन हो जाती है। मन यह सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या मानव समाज अपने नैतिक दायित्वों का इतना पतन कर बैठा है कि उसे सामान्य और असमान्य व्यक्ति में अन्तर दिखाई नहीं देता।’’ तो संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात करने का क्रम ‘‘रोटी की कीमत से ही आरम्भ किया जाए। यह उन अनाथ लड़कों की कहानी है जो होटलों की फिंकी हुई जूठन के सहारे अपना जीवन चलाते हैं। न रहने का कोई स्थाई ठिकाना और न पेट भरने का कोई स्थाई जुगाड़। परिवार का अर्थ तो वे जानते भी नहीं। गली के आवारा कुत्तों से होड़ करते हुए रोटी के दो निवाले पाने की ज़द्दोजहद वाकई अंतर्मन को झकझोर देती है। जो भी इस कहानी को पढ़ेगा उसके मन में यही प्रश्न उठेगा कि क्या हम जिस समाज में रहते हैं, यह उसी का दृश्य है? अविश्वसनीय-सा लगने वाला सौ टका सच। इस कहानी का कथानक इतने में ही नहीं ठहरता है, इससे भी आगे एक और कटु सत्य, बल्कि वीभत्स सत्य सामने आता है जब यह कहानी स्मरण कराती है कि पागल भिखारिनों को भी किस तरह एक देह मात्र समझा जाता है। यह सामाजिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक संवाद करती कहानी है। इस कहानी को संग्रह का नाम दिया जाना सार्थक है। यद्यपि उत्साहवश लेखक ने इसमें एक भूल कर दी है। एक स्थान पर लेखक ने कथा नायक लड़का झिन्कू की ओर से लिखा है-‘‘मैंने एक जगह कोयले के पुल की अंदर की दीवार पर अपना नाम लिख दिया था- झिन्कू। वहीं अपना बिस्तर, एक फटी चादर में, एक गिलास और एक फूटी प्लेट के साथ लपेट रखा था।’’ यहां भूल यह है कि जो लड़का पेट भरने के लिए कुत्तों से होड़ कर के जूठन पाता है, झिन्कू ने अपनी पगली मां को नहीं देखा था बल्कि एक भिखारिन की गोद में अपनी आंखें खोली थीं तोे उसने लिखना कब और कहां से सीख लिया? उसका लिखना सीख पाना यथार्थ से हट कर लगता है। या तो यह प्रसंग आना चाहिए था कि उसे किसी ने लिखना सिखाया या फिर उसे निरक्षर ही रहने देना था।  
जैसाकि मैंने पहले कहा कि संग्रह की अधिकांश कहानियां दाम्पत्य जीवन की त्रासद दशाओं पर है। एक कहानी है ‘‘वापसी’’। इसमें तलाकशुदा पति-पत्नी संयोगवश एक ही ट्रेन में एक ही बोगी में आमने-सामने की सीट पर सफ़र करते हैं। दोनों अनुभव करते हैं कि परस्पर एक-दूसरे से उनकी अपेक्षाएं और आग्रह अभी भी छूटे नहीं हैं। जैसे, बोगी में चायवाले के आने पर पति सोचता है कि यदि मैं अपने लिए चाय लूंगा तो अपनी इस पूर्व पत्नी के लिए भी चाय लेनी पड़ेगी। यदि मैं इसके लिए चाय ले भी लूं और कहीं इसने सबके सामने मना कर दिया तो मेरा उपहास होगा। ठीक इसी समय पत्नी सोचती है कि मेरे पूर्व पति की हेठी अभी भी बरकरार है। इससे यह  भी पूछते नही बन रहा है कि क्या तुम चाय पियोगी? इसी तरह भोजन मंगाने के समय अंतद्र्वन्द्व चलता है। अंततः पति अपने लिए भोजन मंगा लेता है लेकिन उसमें बैंगन की सब्ज़ी दे कर वह दुखी हो जाता है। उसे बैंगन पसंद नहीं। पत्नी भी यह देख कर चिन्ता में पड़ जाती है कि अब वह कैसे खाएगा? पत्नी जब देखती है कि उसके पूर्व पति से खाया नहीं जा रहा है तो वह अपने साथ लाए हुए भोजन में से सब्ज़ी निकाल कर ख़ामोशी से उसकी थाली में रख देती है। यहां स्त्री की कोमल भावना स्पष्ट दिखाई देती है। फिर दोनों मौन धारण किए हुए भोजन करते हैं। इन घटनाओं से पता चलता है कि दोनों के बीच तलाक का कारण छोटी-छोटी बातों को ले कर का टकराव रहा होगा। यात्रा के अंत में दोनों एक ही स्थान पर पहुंचते हैं, जहां पति के मित्र का विवाह है। पति के मित्र ने अपनी भाभी को ‘‘पूर्व भाभी’’ न मानते हुए आमंत्रित किया। शायद वह चाहता था कि पति-पत्नी दोनों के बीच एक बार फिर संवाद हो। दरके हुए रिश्तों में भी एक बार सहज संवाद कई नवीन संभावनाओं को जन्म दे देते हैं, यही पक्ष कथाकार ने कहानी में रखा है। यह पक्ष ही कहानी को सकारात्मक बनाता  है। अन्यथा मात्र एक वाक्य जो नायक नायिका को अकेली यात्रा करते हुए देख कर दुर्भावनावश सोचता है, उसके वैचारिक चरित्र को उजागर करने के लिए पर्याप्त है-‘‘महेन्द्र सोच रहा था कि जब मैं बाजार जाने के लिए कहता था तो पूनम कहती -‘नहीं मैं अकेली नहीं जाऊंगी, मुझे डर लगता है। और आज देखो, अकेले ही सफ़र कर रही है। कहा जाता है कि औरत और जानवर पर से यदि अंकुश हटा दिया जाए तो उसकी रफ़्तार आंकना आसान नहीं।’’ अर्थात् जो व्यक्ति स्त्री और जानवर को एक समान मानता हो उसके दाम्पत्य संबंध में टकराव होना सुनिश्चत है, यदि उसकी पत्नी उससे सम्मान भरा व्यवहार चाहती हो।
‘‘बात’’ शीर्षक कहानी में एक नूतन कथानक उठाया गया है। कहानी की नायिका ऐसा पति नहीं चाहती है जो दास भाव से उसकी सेवा करता रहे और उसे महज रानी बना कर रखे। वह चाहती है कि एक सामान्य गृहणी की भांति उसे घर-गृहस्थी के काम करने दे। अपने पति के दासत्व भरे व्यवहार से तंग आ कर वह उसे छोड़ कर चली जाती है। तब पति का दोस्त उसे उसकी गलती बताता है। वस्तुतः लेखक ने इस कहानी में यह कहने का प्रयास किया है कि पति-पत्नी के पारस्परिक संबंध यदि सहज रहें तो दाम्पत्य जीवन सुखद रहता है। एक भी पलड़ा भारी या हल्का होने पर मामला गड़बड़ा सकता है। किन्तु दिलचस्प बात यह है कि यहां भी उत्साहवश लेखक से एक चूक हो गई है। पत्नी जब पति के साथ वापस घर लौटने पर राजी हो जाती है तब का दृश्य है-‘‘बाहर आने के बाद अनिल ने रजनी से सूटकेस लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि न जाने क्या सोच कर पीछे हट गया, जिसे देख कर रजनी के होंठों पर एक मीठी-सी मुस्कान दौड़ गई।’’ वस्तुतः यहां कोई और उदाहरण होना चाहिए था। यह उदाहरण आगामी विपरीत असंतुलन की ओर संकेत करता नज़र आता है। कहीं पति अब की बार पत्नी के प्रति दासभाव के बजाए पत्नी को दासी बनाने का प्रयास तो नहीं करने लगेगा? बहरहाल, ऐसी चूकों के प्रति लेखक को सर्तकता बरतने की आवश्यकता है क्योंकि इनसे अच्छी-भली कहानी एक झटके से पटरी से उतर जाती है।
एक कहानी है ‘‘कीमत’’। इस कहानी का कथानक कार्यालयीन संबंधों के स्याह पक्ष की ओर ले जाता है। कथानायिका रजनी एक कार्यालय में क्लर्क है। वह अपने नए स्टेनो बाॅस के पास एक फाईल ले कर जाती है ताकि उस फाईल पर अधिकारी से हस्ताक्षर करा सके। स्टेनो अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए फाईल वहीं छोड़ जाने को कहता है और बताता है कि अभी अधिकारी नहीं आया है। रजनी उससे कहती है कि जब अधिकारी आए तो उसे सूचित कर दे ताकि वह हस्ताक्षर करा सके। क्योंकि आज ही हस्ताक्षर जरूरी है। अंततः अधिकारी का फोन आ जाता है कि वह कार्यालय नहीं आएगा। तो स्टेनो वह फाईल ले कर अधिकारी के घर चला जाता है, हस्ताक्षर कराने। रजनी केबिन में स्टेनो और फाईल दोनों को नदारत पा कर नाराज़ हो जाती है। इस संबंध में उसे बड़े साहब से डांट भी खानी पड़ती है। दूसरे दिन वह अपना रोष स्टेनो पर प्रकट करती है। स्टेनो उसे न बता पाने की अपनी गलती स्वीकार करता है और दोनों ही कुछ देर बाद मित्रवत हो जाते हैं। रजनी सोचती है कि उसने स्टेनों को बुरा-भला कह कर भूल की। उसे पहले स्टेनो से शांत भाव से पूछताछ करनी चाहिए थी। लेकिन इसके बाद कहानी एक अचानक करवट लेती है और रजनी अपनी भूल की ऐसी कीमत अदा करती है जिसे कीमत कहा जाए या अदमित इच्छा की पूर्ति कहा जाए, यह विवाद का प्रश्न हो सकता है। या फिर यह भी हो सकता है कि वह एक स्याह रास्ते पर चल कर अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहती हो। ये प्रश्न पाइकों के विवेक पर छूट जाते हैं।
बहरहाल, चन्द्रभान राही की कहानियों में दाम्पत्य जीवन के संतुलन और सौंदर्य को ले कर जो आग्रह है वह महत्वपूर्ण है। बस, कमी है तो इस बात की कि वे कहीं-कहीं स्त्री की परंपरागत अनुचित-सी समझौतावादी भूमिका पर जोर देने लगते हैं। जिससे यह प्रश्न उठता है कि दाम्पत्य जीवन बनाए रखने के लिए हर बार स्त्री ही क्यों झुके? क्या दाम्पत्य जीवन बनाए क्या सिर्फ़ उसी की जिम्मेदारी है? वस्तुतः दाम्पत्य के परिदृश्य में झुकना किसी एक को नहीं चाहिए वरन दोनों को परस्पर एक-दूसरे के प्रति समान भाव से समर्पित रहना चाहिए। इस तरह के प्रश्नों का उठना भी कहानियों को विचारशीलता का पुट प्रदान करता है और इस दृष्टि से सभी कहानियां रोचक हैं। आरंभ से अंत तक पढ़ते जाने को विवश करती हैं। भाषा सरल और सहज है। संग्रह की कुछ कहानियां तो देर तक मन को उद्वेलित करने में सक्षम हैं। निःसंदेह यह संग्रह पठनीय है। 
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Tuesday, November 15, 2022

पुस्तक समीक्षा | सुदृढ़ सद्भाव किन्तु कमज़ोर शिल्प की कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 15.11.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक एस. एम. अली के कहानी संग्रह "रंग गुलाल" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
सुदृढ़ सद्भाव किन्तु कमज़ोर शिल्प की कहानियां
      समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह  - रंग गुलाल
लेखक       - एस. एम. अली
प्रकाशक     - इंक पब्लिकेशन, 333/1/1के, नया पुरा, करेली, प्रयागराज-211016
मूल्य        - 200/-
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 कहानी कहना और कहानी लिखना दोनों में शिल्प महत्वपूर्ण होता है। यदि कहानी कही यानी सुनाई जा रही है तो उसमें स्वर का उतार-चढ़ाव, स्वराघात, भावभंगिमा, हाथों का संचालन आदि तत्व कहानी में दृश्यात्मकता का संचार करते हैं। वहीं, यदि कहानी लिखी गई हो और उसे पाठक पढ़ रहा हो तो पाठक के लिए वह शिल्प आवश्यक हो जाता है जो देशकाल का बोध कराता हुआ कथानक के मर्म से जोड़े रखे। ऊपरीतौर पर कहानी लिखना या कहना बहुत सरल प्रतीत होता है किन्तु कहानी की शिल्प संरचना में बरती गई असावधानी कथानक के स्वरूप को भी आघात पहुंचाती है। लेखक एस.एम. अली का कहानी संग्रह ‘‘रंग गुलाल’’ इसका एक ऐसा उदाहरण है जो नवोदित कथाकारों को सचेत करने के लिए सामने रखा जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि लेखक अली सामाजिक सद्भावना, समरसता और मानवता के प्रति सजग हैं। संग्रह में संग्रहीत उनकी चैबीस कहानियां मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत हैं। वे अपनी प्रत्येक कहानी में एक उत्साही कथाकार की भांति घटनाक्रम पिरोते चले जाते हैं। उनकी इन कहानियों में अगर कुछ खटकता है तो वह शिल्प और देशकाल का बोध।
कहानी गद्य साहित्य की सबसे लोकप्रिय और रोचक विधा है। कहानी साहित्य की वह गद्य रचना है जिसमें जीवन के किसी एक पक्ष या एक घटना का कथात्मक वर्णन होता हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहानी में प्रवाह को महत्व माना था। उनके अनुसार, ‘‘नदी जैसे जलस्रोत की धार है, वैसे ही कहानी के लिए घटनाक्रम का प्रवाह हैं।’’ वस्तुतः कहानी अपेक्षाकृत कम शब्दों में जीवन की किसी एक घटना या किसी एक पक्ष को लिखा गया कथानक होता है। उपन्यास और कहानी के अंतर को स्पष्ट करते हुए प्रेमचंद ने कहा था कि ’’कहानी ऐसी रचना है, जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना लेखक का उद्देश्य रहता है। उसे उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथाविन्यास सभी उसी एक भाव से पुष्ट करने होते हैं।’’
लेखक एस.एम. अली की कहानियों के गुण-दोष पर दृष्टिपात करने से पूर्व उनके प्राक्कथन पर ध्यान देना आवश्यक है। लेखक ने अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता के बारे में लिखा है कि ‘‘जहां तक मेरे लेखन लिखने की प्रेरणा का प्रश्न है, मैं पूर्ण आश्वस्त हूं कि ये मुझे गाॅड गिफ्ट है। बचपन से ही मेरा लालन-पालन प्रगतिशील विचारधारा के अंतर्गत हुआ है। दकियानूसी विचारधारा मेरे परिवार मंे भी कोसों दूर है।’’ लेखक ने आगे लिखा है कि ‘‘देश-प्रेम, गंगा-जमुनी तहज़ीब, ग़रीबों के प्रति सहानुभूति, जीवन में ईमानदारी इन सभी चीजों से मुझे विशेष लगाव रहा है। आप इन चीजों का कहानियों में समावेश देख सकते हैं। मैंने अपनी सम्पूर्ण ज़िन्दगी का अनुभव कहानियों में दिखाने का प्रयास किया है।’’
6 जनवरी 1947 को जन्मे एस.एम.अली का यह प्रथम कहानी संग्रह है। उनके प्राक्कथन के बाद जब कहानियों का क्रम आरम्भ होता है तो उनके शब्द ‘‘गाॅड गिफ्ट’’ सहसा याद आ जाते हैं। यह माना जाता है कि ईश्वर या ख़ुदा (या चाहे जिस नाम से पुकारें) ने मनुष्य को बनाया है। ईश्वर मनुष्य को शिशु के रूप में जीवन का उपहार देता है। शिशु अपनी शैशवावस्था से आगे बढ़ते हुए लगभग प्रतिदिन नए अनुभवों को अपनी स्मृति और व्यवहार में संजोता जाता है। वह संस्कार, व्यवहार, परिवेश आदि से सीखता हुआ स्वयं को परिष्कृत करता है और ‘‘गाॅड गिफ्टेड’’ स्वयं के जीवन को संवारता है, परिपक्व बनाता है। लेखक एस.एम.अली मानते हैं कि उन्हें ‘‘लेखन लिखने’’ की प्रेरणा ऊपरवाले ने दी है, किन्तु उस प्रेरणा को सार्थक स्वरूप देना उनका दायित्व कहा जाएगा। उनके इस संग्रह की पहली कहानी ‘‘रंग गुलाल’’ से ही इस बात का अनुमान हो जाता है कि लेखक वाक्यों की काल संरचना को ले कर असावधान है। कहानी के दूसरे पैरे का यह अंश देखिए-‘‘गांव के गरीब तबके के लोग शहर जा कर मजदूरी करते हैं। पार्वती भी गांव के लोगों के साथ मजदूरी करने शहर आ जाती है। शहर के आउट-एरिया में दस-पंद्रह आमों के वृक्ष लगे थे। गंाव के लोगों के साथ ही पार्वती ने भी आमों के वृक्ष के नीचे पतली-पतली लकड़ियां गाड़ कर, पलास के पत्तों से ढंक कर झोपड़ी बना ली थी।’’ इस अंश में ‘‘दस पंद्रह आमों’’ के ‘‘वृक्ष’’ को (जो कि आम के दस-पंद्रह वृक्ष होने चाहिए थे) अनदेखा कर दिया जाए तो भी पार्वती ‘‘शहर आ जाती है’’ के समयबोध के तुरंत बाद ‘‘झोपड़ी बना ली थी’’ समयदोष उत्पन्न करता है। ‘‘झोपड़ी बना ली थी’’ के पूर्व ‘‘शहर आ गई थी’’ होना चाहिए था। इस प्रकार का व्याकरण दोष लगभग हर कहानी में मौजूद है, जो बहुत खटकता है। एक ऐसा लेखक जो कहानी लेखन के प्रति गंभीरता से संलग्न हो और अपनी आयु के अनुरूप दीर्घ जीवनानुभव से समृद्ध हो, उसकी कहानियों में व्याकरण दोष को रेखांकित करना अटपटा प्रतीत होता है। किन्तु इसे रेखांकित किया जाना आवश्यक है क्योंकि अब ये कहानियां पुस्तक के रूप में पाठकों और नवोदित रचनाकारों के हाथों में हैं। इन कहानियों के शिल्प का अनुकरण करने वालों को इस व्याकरणीय दोष को समझना ही होगा।
भाषा भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम होती है और शैली उस अभिव्यक्ति को प्रभाव और स्वरूप प्रदान करती है। एक प्रभावशाली कहानी में सरल एवं बोधगम्य भाषा का सर्वाधिक महत्व होता है। यद्यपि जयशंकर प्रसाद की संस्कृतनिष्ठ भाषा अपने देशकाल के कारण बोधगम्य साबित होती है। काल और पात्र की यथार्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा में स्वाभाविकता आवश्यक है। प्रेमचन्द की कहानियों का प्रभाव पाठको पर इसीलिए पड़ता है कि उनकी भाषा उनके कथापात्रों के अनुरूप है। भाषा को समर्थ और संप्रेषणीय बनाने के लिए शब्दों का सर्तकतापूर्ण   चयन आवश्यक हो जाता है। एक कुशल लेखक अपनी प्रभावी शैली से सामान्य कथानक को भी महत्वपूर्ण बना देने की क्षमता रखता है।
कहानी की संरचना के आधारभूत तत्वों को ध्यान में रख कर देखा जाए तो लेखक एस.एम.अली की कई कहानियां लेखकीय भ्रम में रची हुई प्रतीत होती हैं। वैसे कहानी संग्रह ‘‘रंग गुलाल’’ की कुछ कहानियां सशक्त बन पड़ी हैं, जैसे- ‘‘अंतिम इच्छा’’, ‘‘पैग़ाम’’, ‘‘वतन की ख़ुश्बू’’। कहानी ‘‘राम घाट’’ भी एक अच्छी कहानी है। इस कहानी का प्रत्येक घटनाक्रम बड़े धैर्य के साथ आगे बढ़ा है और अंत भी रोचक है। कहानी ‘‘भ्रम का माया जाल’’ भी एक सशक्त कहानी है। यह कहानी उन लागों को धिक्कारती है जो स्वार्थसिद्ध करने के लिए समाज में जाति और धर्म के अलगाव की बातें करते हैं। ऐसे स्वार्थी लोग किसी भी धर्म विशेष के लोगों को बुरा ठहराने से नहीं चूकते हैं। वे जानते हैं कि जब दो समुदाय आपस में टकराएंगे तो उन्हें अपराध करने का भरपूर अवसर मिलेगा और वे अपने अपराध को धार्मिक वैमनस्य के आड़ में छिपा लेंगे। बकरी के खोने जाने की घटना के बहाने लेखक ने एक संवेदनशील विषय पर रोचक ताना-बाना बुना है। यह कहानी लेखक एस.एम.अली के लेखकीय कौशल को सामने रखती है। जबकि संग्रह की शीर्षक कथा ‘‘रंग गुलाल’’ में कथानक का मूलभाव उस तरह स्पष्ट नहीं हो सका है जैसा कि हो सकता था। कहीं-कहीं शब्दिक दोष भी पात्र के चरित्र को समझने में बाधा बना है। जैसे कहानी ‘‘चीखें’’ एक अत्यंत मार्मिक कहानी है जिसमें वर्तमान पीढ़ी के द्वारा अपने माता-पिता की अवहेलना का वर्णन है। कथा के मुख्य पात्र लल्लन बाबू अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद निरंतर अपने बेटे-बहू के हाथों उपेक्षा झेलते रहते हैं। शारीरिक कष्ट से उत्पन्न उनकी चींखें सुनने की फ़ुर्सत किसी को नहीं है। इस कहानी का अंत अपने पीछे यह संदेश छोड़ जाता है कि अपने बुजुर्गों के साथ युवाओं को इस तरह दुव्र्यवहार नहीं करना चाहिए। किन्तु इसी सशक्त कहानी में खीर में कंकड़ की भांति प्रयुक्त हुआ है ‘‘तल्ख़ी’’ शब्द। इसे समझने के लिए यह अंश देखिए-‘‘लल्लन बाबू का शरीर डील-डौल से भारी-भरकम है। हंसमुख रहना उनके स्वभाव की विशेषता रही है, पर जब से पत्नी का स्वर्गवास हुआ है तो वे हंसते तो हैं, पर अब उनकी हंसी में पहले जैसी तल्ख़ी नहीं रही।’’ अब यहां ‘‘हंसमुख’’ स्वभाव और हंसी में ‘‘पहली जैसी तल्ख़ी’’ का प्रयोग करके लेखक क्या कहना चाहता है, यह समझना कठिन है। क्योंकि ‘‘तल्ख़ी’’ फ़ारसी शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘‘कड़वाहट’’ या ‘‘चिड़चिड़ापन’’।
‘‘बाबा की दुआ’’ और ‘‘दैवीय कृपा’’ कहानियों को पढ़ते समय एक बार फिर प्राक्कथन के वे शब्द याद आ जाते हैं जिसमें लेखक ने स्वयं को प्रगतिशील विचारधारा का समर्थक और दकियानूसी विचारों का विरोधी कहा है। दीवार गिरने पर बाबा की दुआ से पत्नी की जान बच जाना, प्राक्कथन के प्रति ‘‘कंट्रास्ट’’ पैदा करता है। वहीं ‘‘दैवीय कृपा’’ में पिता की बीमारी की ख़बर पा कर शीघ्रता में बिना टिकट ट्रेन पर सवार हो जाना और फिर टिकटचेकर को अपनी समस्या से अवगत कराना वह घटना है जिसके पक्ष में टीसी बेटिकट यात्री के रूप में उसे पकड़ता नहीं है। जिस मानवता के आधार पर टीसी उसे छोड़ देता है, उसी मानवता के कारण सहयात्री उसकी आगे की टिकट कटा देते हैं। किन्तु लेखक ने इसे दैवीय कृपा ठहराते हुए अपने ही प्राक्कथन के शब्दों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। रहा प्रश्न शब्द चयन का तो एक गड़बड़ी इसी कहानी में देखी जा सकती है जब लेखक ने रेलवे स्टेशन का वर्णन करते हुए लिखा है-‘‘ट्रेन का पहला हाॅर्न बज चुका था। राकेश ने गेट पर खड़े टीसी को बताया-‘सर, मेरा जाना बहुत जरूरी है।’ अब गाड़ी का दूसरा हाॅर्न बज चुका था, तीसरे हाॅर्न के साथ ही गाड़ी रेंगने लगी थी।’’ यहां विचारणीय है कि रेल के साथ सीटी अथवा व्हिसिल का प्रयोग किया जाता है ‘‘हाॅर्न’’ का नहीं। रेलगाड़ी पर एक प्रसिद्ध फिल्मी गाना भी है-‘‘गाड़ी बुला रहा है, सीटी बजा रही है।’’
कहानी संग्रह ‘‘रंग गुलाल’’ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि लेखक एस.एम.अली में कथालेखन का उत्साह है। वे स्वस्थ सामाजिक परिवेश की कहानियां लिखने में रुचि रखते हैं। बस, कमी है तो शब्दों के सही प्रयोग, समयसूचक निर्दोष वाक्य संरचना और स्वतः आकलन की। यदि लेखक ने स्वयं अपनी कहानियों को एक बार समीक्षात्मक दृष्टि से पढ़ा होता तो उसमें ये त्रुटियां नहीं रहतीं जो उनके लेखन को कमजोर की श्रेणी में धकेल रही हैं। फिर भी लेखक की लेखकीय प्रतिबद्धता को देखते हुए यह आशा की जा सकती है कि उनका अगला कहानी संग्रह शिल्प की दृष्टि से भी सशक्त रहेगा। वैसे कथावस्तु की दृष्टि से यह संग्रह भी पठनीय माना जा सकता है।     
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Tuesday, September 13, 2022

पुस्तक समीक्षा | मन-संसार को अभिव्यक्त करती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 13.09.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका सुश्री उषा वर्मन के कहानी  संग्रह  "यादों के झरोखों से" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
मन-संसार को अभिव्यक्त करती कहानियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - यादों के झरोखों से
लेखिका     - सुश्री उषा वर्मन
प्रकाशक    - जे.टी.एस. पब्लिकेशन, वी-508, गली नं.17ए विजय पार्क, दिल्ली
मूल्य       - 395/-
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    उषा वर्मन एक उदयीमान कहानीकार हैं। ‘‘यादों के झरोखों से’’ उनका प्रथम कहानी संग्रह है। इस संग्रह में उनकी कुल 101 कहानियां हैं। इनमें अधिकांश कहानियां मन-संसार को अभिव्यक्त करती हैं। उषा वर्मन की कहानियों में सामाजिक गतिविधियों के मन पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। ग्रेजुएट तक शिक्षित किन्तु स्वयं के विभिन्न व्यवसायों द्वारा अपने आपको कर्मठ बनाने वाली इस कथाकार के पास एक मौलिक अंतर्दृष्टि है। वे समस्याओं को अपनी दृष्टि और अपने अनुभव के आधार पर देखती हैं तथा उनका समाधान भी वे अपने दृष्टिकोण से ढूंढती हैं। इसीलिए उनकी कुछेक कहानियों में धर्म और विश्वास का चमत्कारी आग्रह मिलता है। जैसे इस संग्रह की पहली ही कहानी है ‘‘भक्ति का चमत्कार’’। कथानक के अनुसार श्रावण मास में अत्यधिक वर्षा से आप्लावित शहर की सड़कों से गुज़र कर कथानायिका जया मंदिर पहुंचती है। वहां पहुंच कर वह मंदिर में सफाई इत्यादि की सेवाकार्य करती है। इसी दौरान उसे मंदिर प्रांगण में फन फैलाया हुआ नाग दिखाई दे जाता है। वह उसे ईश्वर का चमत्कार मान कर नमन करती है और फिर पुजारी को बुला उसे भी दर्शन कराती है। वस्तुतः नागराज बाढ़ सदृश पानी में डूबे अपने बिल से निकल कर मंदिर प्रागण में शरणागत था जिसे ईश्वर का चमत्कार मान लिया गया।

संग्रह में एक कहानी है ‘‘पुनर्जन्म’’। यह कहानी गोया पुनर्जन्म की धारणा को स्थापित करने की दिशा में लिखी गई है। निशा को अपनी भतीजी में अपनी मां की उपस्थिति अर्थात् पुनर्जन्म का अहसास होता है और जल्दी ही उसे अपनी इस धारणा पर विश्वास भी हो जाता है।
ऐसा नहीं है कि ‘‘यादों के झरोखों से’’ कहानी संग्रह की सभी कहानियां धार्मिक चमत्कार या पुनर्जन्म पर आधारित हों, कई कहानियां सामाजिक विसंगतियों को आईना दिखाती है, तो कुछ महिला सशक्तिकरण के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। मनोवैज्ञानिक धरातल की भी कहानियां हैं जिनमें जेनरेशनगैप के दोनों चेहरे दिखाए गए हैं। एक कहानी है-‘‘बच्चे जब समझदार हो जाते हैं’’। इस कहानी में मां को ले कर भाई-बहन के बीच संवाद के बहाने एक अच्छा कथानक सामने रखा गया है। भाई-बहन दोनों मां से दूर दूसरे शहर में रह रहे हैं। भाई ने मां को कह रखा है कि वह सुबह-शाम अपने भोजन की थाली की तस्वीर खींच कर उसे मोबाईल पर भेज दिया करे। बहन को लगता है कि इस प्रक्रिया में मां का भोजन ठंडा हो जाता होगा और उन्हें ठंडा भोजन करना पड़ता होगा। तब भाई अपने इस आग्रह का औचित्य बताता है कि डबलरोटी खा कर रह जाने वाली मां फोटो शेयर करने की जिद के कारण पूरा भोजन बनाती है और पूरा भोजन करती है। यह सुन कर बहन भी भाई के आग्रह से सहमत हो जाती है। यह एक सकारात्मक कहानी है जो एक स्वस्थ मनोविज्ञान भी प्रस्तुत करती है। एक मां को इस बात का अहसास होना कि उसका बेटा इस बात के प्रति जिज्ञासु रहता है कि उसने क्या खाया? खाया या नहीं? उस दशा में मां को ढाढस बंधाने के लिए पर्याप्त है, जब उसके बच्चे उससे दूर रह रहे हों। यह जेनरेशन गैप को भरने वाली कहानी हैं। इस कहानी का कथानक उम्दा है। यदि इसे और विस्तार दिया गया होता तो यह और अधिक प्रभावी कहानी साबित होती।

जेनरेशन गैप पर एक और कहानी है -‘‘कटुता भरी ज़िन्दगी’’। यह जेनरेशन गैप का दूसरा पहलू दिखाती है। कथानायिका आशा को पति से अलगाव के बाद पति के जीवित होते हुए भी एक विधवा जैसा जीवन जीना पड़ा। उसने हिम्मत नहीं हारी और अपने बलबूते पर अपने दोनों बच्चों की परवरिश की। बच्चों के बड़े होने और माता-पिता के वृद्धावस्था की ओर बढ़ने से दोनों के बीच जो जेनरेशन गैप बढ़ता है उसे लेखिका ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-‘‘माता-पिता जी कब तक बच्चों का साथ देते। बढ़ती उम्र के साथ हैं इंसान का शरीर भी टूटता है और मन भी। कभी-कभी तो जीवन की डोर भी टूट जाती है। आशा की मां की भी जीवन की डोर टूट गई थी और आशा अब नितांत अकेली रह गई थी। खुली आंखों से देखे सपने टूट गए थे। पति था पर न होने के बराबर। अब उसे आशा से कोई वास्ता नहीं था। बच्चे थे पर शानोशौकत से जीने के आदी हो गए थे। बड़े से घर की सुख-सुविधाओं को छोड़कर वह आशा के छोटे से कमरे में क्यों जाते? यह दुनिया है सतरंगी।’’

कहानी ‘‘मां बेटे का रिश्ता’’ जिस सृदुढ़ता से आरम्भ होती है और एक मां के अपने बेटे के प्रति चिन्ता को जिस गंभीरता से चित्रित करती है, वह क्लाईमेक्स तक पहुंचती-पहुंचती बुरी तरह लड़खड़ा जाती है। कहानी में आरम्भिक दृश्य है कि -‘‘रात के अंधेरे में सांए-सांए करती हवा जब बंद कमरे के दरवाजों से टकराती तो मन में अजीब सी घबराहट होती। मन चीत्कार करने लगता- मेरा बेटा कहां होगा? कहां होगा और कैसा होगा? हे भगवान, मेरे बेटे की रक्षा करना। उसे कुछ भी नहीं होना चाहिए। वह मेरी जान है। हे प्रभु, मेरे वचन की लाज रखना। मेरी गोद मत उजड़ने देना। मैं आपको झूमर चढ़ाऊंगी। सवा पाव मिठाई और नारियल का प्रसाद चढ़ा आऊंगी।’’
   इसी कहानी में जब अंतिम पैरा आता है तो बिल्कुल ही विपरीत चिंतन दिखाई देता है- ‘‘ऐसा शास्त्रों में विदित है कि नौ माह का गर्भ किसी नर्क से कम नहीं है। मां के गर्भ में बच्चा सुख में नहीं बल्कि दुखी रहता है और बार-बार भगवान से यही प्रार्थना करता है कि मुझे इस नर्क से निकालो। भगवान बार-बार उसे पूर्व के बुरे कर्मों का एहसास दिलाते हैं और वह बार-बार माफी मांगता है और गर्भ से बाहर निकलने की चेष्टा करता है। ऐसा बुजुर्गों से सुना है। कथा भागवत में सुना है। और मां समझती है वह उसे पैर मार रहा है और वह आनंदित होती है।’’ कहानी का यह अंत स्तब्ध कर देता है और यही लगता है कि इस कहानी का कम से कम यह अंत नहीं होना चाहिए था। एक स्वस्थ चिंतन के साथ आरंभ कथा को एक कोरे गल्प के साथ यूं समाप्त करना लेखिका की चिंतनशीलता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने लगता है। इससे लेखिका को बचने की आवश्यकता है।
महिला सशक्तिकरण की कहानियों के अंतर्गत लेखिका ने आत्मानुभव को भी कथानक के रूप में रखा है। जैसे एक कहानी है -‘‘मेरी कहानी मेरी कलम से’’। इस कहानी में लेखिका ने बताया है कि वह शिक्षित बेरोजगारों द्वारा स्वयं के व्यवसाय के रूप में महिला टाईपिंग सेंटर खोलना चाहती थी। इसके लिए उसे बैंक से लोन की आवश्यकता थी। बैंक के मैनेजर ने परिचित होते हुए भी उसकी योग्यता पर विश्वास नहीं किया और उसे लोन नहीं दिया। तब एक गुरुजी और गुरुभाई ने उसकी मदद की, जिससे दूसरे बैंक से लोन मिल गया। टाईपिंग सेंटर सफलतापूर्वक चला। जिससे यह साबित हो गया कि उसमें योग्यता की कोई कमी नहीं थी, कमी थी तो उस पहले वाले बैंक के मैनेजर की सोच में जिसने मात्र इस कारण उसका लोन मना कर दिया था कि वह एक महिला है और वह न तो सफल हो सकेगी और न लोन की राशि चुका सकेगी। यह महिलाओं में आत्मविश्वास जगाने वाली और मार्ग सुझाने वाली एक अच्छी कहानी है।    

वस्तुतः इस संग्रह की कहानियों को पढ़ कर लगता है कि एक कथालेखिका के रूप में उषा वर्मन गंभीरता से प्रयास करना चाहती हैं किन्तु अभी उन्हें कथालेखन की बारीकियों को समझने की नितान्त आवश्यकता है। जिसने भी कथा साहित्य पढ़ा है, जानता है कि कहानी के मूलतः छः तत्व होते हैं - विषयवस्तु अथवा कथानक, चरित्र, संवाद, भाषा शैली, वातावरण और उद्देश्य। एक कुशल लेखक अपनी सुन्दर शैली से साधारण से साधारण कथानक में भी जान डाल देता है। शब्दों की सम्मोहनशक्ति के द्वारा वह पाठकों को मन्त्रमुग्ध कर देता है। आधुनिक कहानियों में मन-संसार के निरूपण और अवचेतन मन के विभिन्न स्तरों को खोलने के लिए विभिन्न प्रकार की शैलियों का प्रयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से कुछ नयी विधियों का प्रयोग किया जाने लगा है। कहानी का केन्द्रीय भाव ही वह हेतु या उद्देश्य है, जिसके लिए कहानी लिखी जाती है। संवेदना की विशिष्ट इकाई के मूल में लेखक का एक विशेष लक्ष्य होता है। जिस दिन उषा वर्मन कथालेखन की इन बारीकियों एवं महत्व को समझ जाएंगी उस दिन वे श्रेष्ठ, विचारशील एवं मनोरंजक कहानियां पाठकों को देने में सक्षम हो जाएंगी।    

उषा वर्मन के इस संग्रह को ले कर कुछ बातें और कहना मैं आवश्यक समझती हूं जो मात्र उषा वर्मन के लिए नहीं अपितु सभी नवोदित कथाकारों के लिए है। व्यस्तताओं से भरे वर्तमान जीवन में 244 पृष्ठों का 101 कहानियों का कहानी संग्रह पाठकों पर पहले ही मानसिक दबाव बना देता। यद्यपि ये सभी कहानियां छोटी-छोटी हैं फिर भी पृष्ठ संख्या को देखते हुए यह पहले ही समझ में आ जाता है कि पूरे संग्रह को पढ़ने के लिए बहुत सारे समय की आवश्यकता होगी। वहीं अधिक पृष्ठों की होने के कारण संग्रह का मूल्य भी रुपये 395/- है जोकि पाठक की जेब पर भी एक मुश्त अधिक भार डालता है। यदि ये कहानियां दो संग्रहों में विभक्त कर दी जातीं तो समय और मूल्य दोनों दृष्टि से पाठकों के लिए सुविधाजनक होती। बहरहाल, ‘‘यादों के झरोखों से’’ कहानी संग्रह की कहानियां पठनीय हैं विशेष रूप से उनके लिए जो कहानियों में विशेष नूतनता का आग्रह नहीं रखते हैं।  
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Tuesday, May 31, 2022

पुस्तक समीक्षा | समाज के परिष्कार का आग्रह करती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 31.05.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका शशि खरे  के कहानी संग्रह "पीले फूल कनेर" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
समाज के परिष्कार का आग्रह करती कहानियां
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कहानी संग्रह - पीले फूल कनेर
लेखिका     - शशि खरे
प्रकाशक    - शिल्पायन, 10295, लेन नं.1, वेस्ट गोरखा पार्क, शाहदरा, दिल्ली-32
मूल्य       - 450/-  
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समकालीन कथालेखन में इन दिनों बड़े उतार-चढ़ाव आए हैं जिसका सीधा संबंध वैश्विकीकरण एवं सूचना के विस्फोट से है। कथानकों में आईआईटी, इलेक्ट्राॅनिक मीडिया और कार्पोरेट जगत ने अपनी जगह बना ली है क्योंकि यह सब आज के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन भारतीय समाज बाजार की चकाचौंध में जितना प्रगतिशील और प्रसन्न दिखाई देता है वास्तव में उतना है नहीं। आज भी स्त्रियां घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं और बाबाओं के फेर में पड़ रही हैं। वैश्विकीकरण के समांतर वह समाज अभी भी मौजूद है जो दूषित परंपराओं को अपने सीने से लगाए बैठा है। इसीलिए कथाकार अपनी कहानियों के द्वारा इसका प्रतिरोध करता है।  

‘‘पीले फूल कनेर’’ लेखिका शशि खरे का यह पहला कहानी संग्रह है। इसमें कुल 22 कहानियां और एक संस्मरण संग्रहीत है। संग्रह की भूमिका ‘‘शशि खरे की कहानियों के बहाने एक गुफ्तगू‘‘ के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार, उपन्यासकार एवं ‘‘वर्तमान साहित्य’’ पत्रिका की संपादक रह चुकीं नमिता सिंह ने लिखा है। उन्होंने अपनी भूमिका में उस परिदृश्य से परिचित कराया है जिसमें ‘‘हंस’’ और ‘‘वर्तमान साहित्य’’ के द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर कहानी प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। जिनमें अन्य कहानीकारों के साथ शशि खरे ने भी अपनी कहानियां भेजी और वह निरंतर शामिल होती रहीं। उनकी कहानी का चयन तब तक नहीं हुआ जब तक वह कहानी लेखन में मंज नहीं गई। इस प्रसंग की चर्चा नमिता सिंह ने निश्चित रूप से यह जताने के लिए की है कि कहानी विधा अभ्यास और परिश्रम मांगती है, उसे हल्के से नहीं लिया जा सकता है। एक अच्छा कहानीकार बनने के लिए बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है। नमिता सिंह स्वयं एक समर्थ उपन्यासकार हैं अतः वे कथालेखन की बारीकियों, उसकी गरिमा और महत्ता से आत्मिक रूप से जुड़ी हुई हैं। उनकी भूमिका अर्थवत्ता पूर्ण है जो प्रत्येक नवोदित कथालेखकों के लिए दिशा निर्देश की भांति है।   

 अब बात करते हैं शशि खरे की कहानियों की। जैसाकि पहले ही मैंने उल्लेख किया कि शशि खरे ने धैर्य और परिश्रम के साथ कथा लेखन को साधा है इसलिए उनकी कहानियों में प्रभावी कथ्य और सुदृढ़ शिल्प है। संग्रह की पहली कहानी ‘‘बोनसाई’’ भोपाल गैस त्रासदी की विभीषिका की भाव-भूमि में पर्यावरण के प्रति चिंता करने का आग्रह करती है। कथा नायिका के घर पर सेविका और माली का काम करने वाली गेंदा गैस त्रासदी में अपने पति को गंवा चुकी है और उसे जहरीले वातावरण का कटु अनुभव है। जब वह देखती है कि उसकी मालकिन बोनसाई के प्रति आकृष्ट है तो वह आगाह करती है कि हमें बड़े-बड़े वृक्षों की जरूरत है न की बोनसाई की। संक्षेप में यह कथा भले ही सीधी-सादी लगे किंतु लेखिका ने इसे बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। वर्तमान परिवेश में यह बहुत जरूरी-सी कहानी है।
 
दूसरी कहानी है ‘‘चलती चाकी देखकर‘‘। यह घरेलू हिंसा की व्यथा कथा है। सरकार ने दसियों कानून बना दिए हैं जिनका सहारा लेकर स्त्री घरेलू हिंसा से बच सकती है। किन्तु आज भी 50 से 60 प्रतिशत स्त्रियों को इन कानूनों का ज्ञान नहीं है। उस पर पीढ़ियों से चला आ रहा अतिसहनशील होने का ठप्पा और यह धारणा कि पति तो परमेश्वर होता है और उसे पत्नी पर हाथ उठाने का अधिकार है, इन सब धारणा के चलते आज भी हज़ारों स्त्रियां चुपचाप धरेलू हिंसा सहन करती रहती हैं। जबकि एक ही स्त्री पत्नी बन कर आती है, बहू के रूप में परिवार में रहती है, बच्चों की मां बनती है, घर संवारती सहेजती है और सबसे बड़ी बात की वह अपना वह घर छोड़ कर हमेशा के लिए आती है, जहां वह जन्मी और पली-बढ़ी। इन सबके बावजूद उसका पति उसे प्रताड़ित करता है। यही त्रासदी है इस कथा की नायिका की भी। उसका पति उसे मारता-पीटता है, प्रताड़ित करता है और प्रताड़ना का यह क्रम वर्षों तक चलता है। यहां तक कि बेटों की शादी हो जाने के बाद और बहुओं के आ जाने के बाद भी बहुओं के सामने उसका पति उससे मार-पीट करता है। कहानी यद्यपि दुखांत है किंतु उसके अंत में यह कसक छिपी हुई है कि किसी स्त्री को इस प्रकार प्रताड़ना नहीं सहनी चाहिए बल्कि उसके विरोध में आवाज उठानी चाहिए। आखिर स्त्री का भी अपना कोई अस्तित्व होता है। ‘‘कभी तो ये मन के अंधेरे‘‘ का कथानक भी घरेलू हिंसा का है। इसमें भी पत्नी अपने पति के हाथों पिटती रहती है और समाज और परिवार के डर से खामोश रहती है। यद्यपि इस कहानी में हिंसा करने वाले पति को दंडित करने की भावना व्यक्त की गई है। किंतु वह रास्ता नहीं दिखाया गया है जो व्यावहारिक है। कोई सहानुभूति के आधार पर प्रताड़ित पत्नी के पति को रात के अंधेरे में मारपीट कर सबक सिखाता है। कथा-प्रभाव की भावुकता में यह हल भले ही सुखकर लगे किंतु कहानी तब अधिक सार्थक बनती जब वह स्त्री स्वयं प्रतिकार के लिए खड़ी होती और प्रताड़ना के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाती। वह कानून का सहारा लेती, लोगों का सहारा लेती और अपनी लड़ाई खुद लड़ती।
  
‘‘नई कविता‘‘ संग्रह में एक गैरजरूरी-सी कहानी है। इस कहानी में नई कविता पर कटाक्ष किया गया है। वस्तुतः यह कहानी न होकर व्यंग लेख का भान देती है। कहानी ‘‘जादू‘‘ का कथानक ज़रा हटकर है। इसमें वर्तमान जीवन पर कृत्रिमता का प्रभाव और प्रकृति से दूर होते जाने की वास्तविकता और उसके दुष्परिणाम सामने रखे गए हैं। वर्तमान भागमभाग से दूर एक दिन जंगल के वातावरण में अपने ढंग से उन्मुक्त भाव से जीवन जीने के बाद यह एहसास होना कि यह एक दिन ही जीवन का असली दिन है, प्रकृति और मनुष्य के बीच जुड़ाव की महत्ता को स्थापित करता है। उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में एक पल ठहर कर सांस लेने वाली कहानी है यह।

लेखिका वर्तमान में अन्यत्र शहर में निवास करती हैं किन्तु वे सागर में जन्मी हैं अतः अपने जन्मस्थान से मोह होना स्वाभाविक है। सागर शहर का सबसे बड़ा आकर्षण का केन्द्र वह झील है जिसके निकट सागर शहर बसा और शहर के विस्तार के चलते अब तो झील शहर के मध्य में आ गई है। कहानी ‘‘सागर‘‘ मैं सागर शहर की लाखा बंजारा झील के निर्माण की प्रचलित कथा को आधार बनाकर कथानक पिरोया गया है।
 
‘‘हैलो 85‘‘, ‘‘चल गोरी घर आपने‘‘, ‘‘बीती रात‘‘, ‘‘जिंदगी के सफे‘‘ समाज विमर्श रचती कहानियां हैं। वहीं ‘‘तंत्र-मंत्र‘‘ कहानी शीर्षक से ही स्पष्ट है कि इस कहानी में तांत्रिकों के छद्म की चर्चा की गई है। प्रायः महिलाएं विशेष रूप से घरेलू महिलाएं इस तरह के तंत्र-मंत्र के चक्कर में फंस जाती हैं अतः उन्हें ऐसे बाबाओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए यह एक संदेश देती कहानी है।
अकसर हम देखते आए है कि जब ‘वधू चाहिए’ के अंतर्गत वैवाहिक विज्ञापन दिया जाता है तो यही शब्दावली रहती है कि ‘‘सुंदर, सुशील कन्या’’ चाहिए। अर्थात् सुंदरता पहली शर्त है और सुंदरता का हमारे समाज में अर्थ है लड़की का गोरारंग। यदि वह गोरी नहीं है तो उसके विवाह को ले कर उसकि माता-पिता चिंता में घुलते रहते हैं। लड़की भले ही कितनी भी पढ़-लिख जाए किंतु उसका गोरारंग विवाह के लिए पहली शर्त बना रहता है। इसी धारणा के कारण गोरेरंग की क्रीमों का बाज़ार हमेशा दमकता रहा है। जबकि यह आवश्यक नहीं है कि जिसका रंग गोराचिट्टा हो, जिसके नाकनक़्श आकर्षक हों, वही अपने पति से सच्चा प्रेम कर सकती है अथवा सुघड़ता से घर सम्हाल सकती है। किसी माॅडल जैसा आकर्षक दिखने वाला पति जो मिट्टी के बर्तन आदि बना कर जीवकोपार्जन करता है, किसी कारणवश अंधत्व का शिकार हो जाता है। आर्थिक तंगी का प्रकोप झेलने की स्थिति आने पर उसकी सुंदर पत्नी उसे छोड़ कर अपने मायके चली जाती है। ऐसे विपरीत समय में एक युवती उसके जीवन में आती है और पत्नी बन कर उसका जीवन संवारती है, उसके बच्चों को मां की भांति प्यार देती है। जो लोग पहले उसकी सुंदर पत्नी की सुंदरता की तारीफ करते थे, वे ही लोग अब इस युवती की तारीफ करते नहीं थकते हैं। जबकि यह युवती रंग में सांवली और नैननक़्श में मामूली अथवा सामाजिक वैवाहिक मानदण्ड के हिसाब से बदसूरत कही जाएगी। विवाह के लिए लड़की के रूप सौंदर्य को प्राथमिकता देने के चलन के थोथेपन पर चोट करते हुए ‘‘तोता-मैना‘‘ कहानी में दांपत्य जीवन में प्रेम के महत्व को स्थापित किया गया है। कहानी का क्लाईमेक्स जिज्ञासा जगाने वाला है। तोता-मैना के संवाद के बहाने पति-पत्नी की प्रकृति और प्रवृत्ति पर सामाजिक दबाव का रोचक ढंग विवरण दिया गया है। यह एक सुखांत और सशक्त कहानी है।
संग्रह की शीर्षक कहानी पीले फूल कनेर दो सहेलियों की संवेदनशील कहानी है दोनों सहेलियां परस्पर विपरीत परिस्थितियों में रहती हैं किंतु उनमें घनिष्ठ मित्रता बनी रहती है विवाह उपरांत वर्षों बाद भी वे एक दूसरे को ढूंढ निकालते हैं। भावुक कर देने वाला कथाक्रम क्लाइमेक्स पर जाकर और अधिक संवेदनशील हो उठता है सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह संग्रह की एक श्रेष्ठ कहानी है। ‘‘झाबुआ’’ जो कहानी न हो कर संस्मरण है, बेहतरीन कथात्मकता लिए हुए है। इसकी दृश्यात्मक शैली प्रभावी है। लेखिका चाहें तो भविष्य में संस्मरण लेखन को भी अपनी लेखनी का अभिन्न हिस्सा बना सकती हैं। वैसे ‘‘पीले फूल कनेर’’ की कहानियां पठनीय हैं और लेखिका के भावी कथालेखन के प्रति आश्वस्त करती हैं।  
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Tuesday, April 26, 2022

पुस्तक समीक्षा | हिन्दी कथासाहित्य के भविष्य को आश्वस्त करती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 26.04.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई काव्या कटारे के कहानी  संग्रह "काली लड़की" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
हिन्दी कथासाहित्य के भविष्य को आश्वस्त करती कहानियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - काली लड़की
लेखिका     - काव्या कटारे
प्रकाशक     - बुक्स क्लीनिक पब्लिशिंग, बी डी काॅम्प्लेक्स, तिफ्रा ओव्हर ब्रिज के निकट,बिलासपुर (छग)
मूल्य       -  130 रुपए 
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हिन्दी साहित्य के समक्ष बार-बार एक यक्ष प्रश्न आ खड़ा होता है कि उसका भविष्य क्या है? किसी न किसी चिंतन गोष्ठी या डिबेट में यह आकुलता चिंता बनकर उछलती है कि हिन्दी साहित्य के पाठक कम होते जा रहे हैं। लम्बे-चैड़े मंथन के बाद यही निष्कर्ष निकाला जाता है कि हिन्दी साहित्य को पाठक कम मिलने का सबसे बड़ा कारण है कि नई पीढ़ी हिन्दी के बजाए अंग्रेजी के अधिक निकट है। हिन्दी का सारगर्भित गंभीर साहित्य पढ़ने के स्थान पर अंग्रेजी चिकलेट्स पढ़ना और समझना उनके लिए आसान होता है। इस विषय पर मैंने अपनी बात कई संगोष्ठियों में रखी है कि हम जैसा बोएंगे, वैसा ही काटेंगे। हमने अपनी नई पीढ़ी को अगर अंग्रेजी के खारे समुद्र में फेंक दिया है तो वे हिन्दी के मीठे पानी के प्राणी भला कैसे बन सकते हैं? यदि हम नई पीढ़ी को भाषा के रूप में अंग्रेजी दें किन्तु साहित्यिक संस्कार हिन्दी के दें तो कोई कारण नहीं है कि वे हिन्दी साहित्य से विमुख होंगे। मुझे अपनी बात सौ प्रतिशत खरी उतरती मिली जब मैंने युवा कथाकार काव्या कटारे की कहानियां पढ़ीं। काव्या कटारे का कथालेखन ही अपने आप में एक नया विमर्श रचता है। 
काव्या कटारे का कहानी संग्रह है ‘‘काली लड़की’’। इस संग्रह की कहानियों के कलेवर पर अथवा लेखिका पर मैं कोई विचार प्रकट करूं इसके पूर्व संग्रह की कहानियों में निहित भाषाई सौंदर्य की चर्चा करना आवश्यक समझती हूं। एक कहानी है ‘‘वृत्त’’। इस कहानी में एक संवाद है जिसे उाहरण के रूप में यहां दे रही हूं-‘‘बेटा, पूरा चांद तो महीने में एक बार आता है। और ईद का चांद वह तो पूरे साल में एक बार आता है। पर तारे रोज चादर बन कर पूरे आसमान को ढंक लेते हैं। ऐसा ही हमारी ज़िन्दगी में होता है। ये बड़ी-बड़ी खुशियां ईद के चांद की तरह होती हैं और छोटी-छोटी खुशियां इन तारों की तरह। बड़ी खुशियां हमारी ज़िन्दगी में चांद की तरह एक-दो बार ही आती हैं, पर छोटी-छोटी खुशियां रोज हमारी पूरी ज़िदगी ढंक लेती हैं। चांद तो महीने में बस एक बार दिखाई देता है। तारे रोज निकलते हैं। यही जीवन का वृत्त है।’’
एक वाक्य का एक उदाहरण और कहानी ‘‘चाय की प्याली’’ से-‘‘आसपास की सभी दूकानें आंखें बंद कर गहरी नींद में जा चुकी थीं।’’
इन दो उदाहरणों के बाद यह तथ्य सामने रखना चैंकाने से कम नहीं है इन्हें लिखने वाली लेखिका काव्या कटारे ने इन्हें मात्र 13-14 वर्ष की आयु में लिखा है। एक ऐसी किशोरी जिसकी सहेलियों का सरोकार खेल, मोबाईल और पढ़ाई के अलावा और किसी चीज से नहीं होगा, वह स्वयं हिन्दी में कथासाहित्य रच रही है। क्योंकि उसे अंग्रेजी मात्र एक भाषा के रूप में सौंपी गई है किन्तु संस्कार हिन्दी साहित्य के दिए गए है। संग्रह की भूमिका में काव्या ने इस बात को स्वयं स्वीकार किया है कि उसे साहित्य के संस्कार अपने दादा जी सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार महेश कटारे ‘सुगम’ से मिले हैं। किन्तु किसी साहित्यिक परिवार में जन्म लेना ही सबकुछ नहीं होता है, जब तक कि स्वयं के भीतर साहित्य के प्रति रुचि और समझ न हो। काव्या की कहानियां पढ़ कर यह दावे से कहा जा सकता है कि साहित्य सृजन की क्षमता काव्या के डीएनए में एक जिनोम की तरह है जिसमें सभी विधाओं के जींस विद्यमान हैं। फिलहाल काव्या ने अपनी प्रतिभा को एक कथाकार के रूप में प्रस्तुत करते हुए हिन्दी कथासाहित्य के भविष्य को भी चिंतामुक्त करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। काव्या के कथालेखन को देखते हुए इस बात से आश्वस्त हुआ जा सकता है कि हिन्दी कथासाहित्य का भविष्य उज्ज्वल है। यदि नौंवी कक्षा में पढ़ने वाली 14 वर्षीया छात्रा हिन्दी में इतनी परिपक्व कहानियां लिख सकती है तो हिन्दी कथासाहित्य को लेखन या पठन संबंधी किसी भी प्रकार का संकट नहीं है।
‘‘काली लड़की’’ कहानी संग्रह में कुल दस कहानियां हैं। संग्रह में कहानियों से पूर्व इन कहानियों एवं काव्या के कथालेखन पर हिन्दी साहित्य जगत के दिग्गजों की टिप्पणियां हैं। कथाकार आशुतोष लिखते हैं कि ‘‘मैं उस काव्या को जानता हूं जो कहानियां लिखती है’’। भालचंद्र जोशी टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि ‘‘काव्या की कहानियां लोकहित की संकल्पना और निर्णय में यथार्थ’’। राजनारायण बोहरे के अनुसार ‘‘काव्या एक प्रतिभाशाली कथा लेखिका’’ है। कथाकार मनीष वैद्य मानते हैं कि काव्या की कहानियां ‘‘साधारण से असाधारण खोजने की कहानियां’’ हैं। डाॅ. पद्मा शर्मा कहती हैं कि ‘‘काव्या की कहानियां हमें आश्वस्त करती हैं।’’ बात जिज्ञासा की है कि जब इतने सारे साहित्य मनीषी काव्या की कहानियों के प्रति विश्वास प्रकट कर रहे हैं तो ऐसा क्या है इन कहानियों में? यही रेखांकित करने योग्य मूल प्रश्न है जिसका उत्तर काव्य के कथालेखन को स्थापना दिलाता है। वस्तुतः लेखिका में अपनी आयु से आगे बढ़ कर समाज के मनोविज्ञान एवं व्यवस्था-अव्यवस्था को समझने की क्षमता है। न केवल समझने की अपितु उसे अपने दृष्टिकोण से विश्लेषित कर के सामने रखने की निपुणता भी है। जैसे कहानी ‘‘काली लड़की’’ में एक ऐसी लड़की की पीड़ा और झुंझलाहट को अभिव्यक्ति दी गई है जिसकी त्वचा की रंगत गहरी सांवली है। यह कहानी लड़की के रंग को ले कर भारतीय समाज की मानसिकता पर गहरी चोट करती है। इसका कथानक लीक से हट कर है किंतु पीड़ा परंपरागत है। विशेषता यह है कि इस कहानी में लेखिका काली लड़की की व्यथा को उस शिखर तक पहुंचा देती है जहां उसकी व्यथा उसका आत्मविश्वास बन कर उसके सामने आ खड़ी होती है। 
कोरोना काल के भयावह दौर ने सभी के अंतर्मन को छुआ है। उस ‘ब्लैक फेज़’ में हम में से बहुतों ने अपनों को खोया है। इस ब्लैेक फेज़ को ले कर अनेक कहानियां लिखी गईं। लेकिन कुछेक कहानियां ही ऐसी हैं जो उस समय की पीड़ा को समुचित अभिव्यक्ति दे सकी हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि काव्या की कहानी ‘‘चीखें’’ उनमें से एक है जो संज़ीदगी से लिखी गई है। दुर्भाग्यवश समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो कन्या के जन्म को अभिशाप मानते हैं। यदि वे गर्भ में कन्याभ्रूण को नहीं मरवा पाते हैं तो सद्यःजात कन्याशिशु को मार कर, कूड़े में फेंक कर अथवा नदी, नाले में बहा कर उस से पीछा छुड़ा लेते हैं। इसी अमानवीय कृत्य पर केन्द्रित है कहानी ‘‘कन्यादान’’। इस कहानी का ट्रीटमेंट नया है क्योंकि इसमें मां अथवा कन्याशिशु की ओर से नहीं बल्कि उस नदी की ओर से नरेशन है जिसमें सद्यःजात कन्याशिशु को जीते जी बहा दिया जाता है। 
सन् 2018 में दक्षिण कोरियाई लड़कों के एक म्यूजिक बैंड ‘‘बीटीएस’’ ने एक संगीतमय अभियान चलाया था जिसका मोटो का ‘‘लव माईसेल्फ’’। बैंड के सदस्य सूगा ने इस अभियान को स्पष्ट करते हुए कहा था कि ‘‘अपनी तुलना दूसरों से मत करो।’’ दूसरे सदस्य जे-होप ने कहा था कि ‘‘खुद को पहचानो कि तुम क्या चाहते हो और क्या कर सकते हो।’’ इसी बैंड के सदस्य आर एम का कहना था कि ‘‘खुद से कहो कि मैं अच्छा कर सकता हूं और खुद से प्यार करो।’’ सात सदस्यों का यह कोरियाई पाॅप बैंड उस समय किशोर आयु के युवकों का बैंड था जिसने अपने इस संदेश से पूरी दुनिया पर अपनी छाप छोड़ी और आज भी लोकप्रिय है। दरअसल जब युवा पीढ़ी निरंतर प्रतिस्पद्र्धाओं से जूझ रही हो तो उसमें हीन भावना और अवसाद जागना स्वाभाविक है। ऐसे दौर में युवाओं में आत्मविश्वास जगाना भी जरूरी है।  काव्या की कहानी ‘‘किस की तरह’’ इसी विषय पर एक सार्थक विमर्श खड़ा करती है। ‘‘तुम किसकी तरह बनना चाहती हो?’’ प्रश्न से कहानी आरम्भ होती है, फिर वहां से आगे बढ़ती हुई दिलचस्प मोड़ लेने लगती है और कहानी का अंत एक सुखद निर्णय पर पहुंचता है जिससे कहानी अत्यंत रोचक बन पड़ी है। 
‘‘गोद’’ एक मार्मिक कहानी है। यह कहानी इस बात की चर्चा करती है कि जब हमारे माता-पिता अथवा संबंधी हमारे साथ होते हैं तो हमें उनका महत्व समझ में नहीं आता है किन्तु उनके न होने पर हर पल उनकी कमी महसूस होती है। दोनों कहानियां- ‘‘वो’’ और ‘‘चाय की प्याली’’ यदि किसी बड़ी आयु के लेखक ने लिखी होती तो ये सामान्य कहानियां मानी जातीं क्योंकि इनमें कार्यालयीन जीवन में खटने, जूझने और असंतुष्ट होने का कथानक है। किन्तु ये दोनों कहानियां उस समय विशेष हो उठती हैं जब यह ध्यान रखा जाए कि इन्हें चैदह वर्षीया छात्रा ने लिखी है। कामकाजी व्यक्तियों के जीवन का लेखिका का आॅबजर्वेशन चकित कर देने वाला है। दोनों कहानियां प्रभावी हैं। विशेष रूप से ‘‘चाय की प्याली’’ तो बेहद सशक्त कहानी है। ‘‘वृत्त’’,‘‘अपना दुख-सुख’’ घटनाओं एवं मनःस्थितियों का बेहतरीन तानाबाना बुनती हैं। वहीं कहानी ‘‘हक़’’ लेखिका की संवेदनाओं के विस्तार को दर्शाती है जिसमें अचानक लाईट चले जाने पर कुछ ही देर में महसूस होने वाली असुविधा से कथानायिका बालिका के मन में यह विचार उठता है कि ‘‘जब थोड़ी देर के लिए लाईट जाने पर हम इतने बेचैन हो गए तो सोचिए, गांवों में लोग कैसे रहते होंगे। वहां तो लाईट होती ही नहीं। क्या सुख-सुविधाओं पर हमारा हक है, उन गांव वालों का कोई हक़ नहीं?’’ 
काव्या कटारे का एक बालकविता संग्रह ‘‘धमाचौकड़ी’’ प्रकाशित हो चुका है। ‘‘काली लड़की’’ उनकी दूसरी पुस्तक है। उनकी कहानियां देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। काव्या के कथालेखन में परिपक्वता दिखाई देती है। उनका यह प्रथम कहानी संग्रह स्वागतेय है, पठनीय है और उन कथालेखकों के लिए एक लाईटहाउस की तरह है जो आयु में भले ही बड़े हों किंतु लेखन में जिन्हें गहरी दृष्टि की जरूरत है। यदि एक वाक्य में इस संग्रह की समीक्षा की जाए तो बेझिझक कहा जा सकता है कि यह एक नन्हीं लेखिका का गहन-गंभीर कथासंग्रह है।
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Tuesday, January 18, 2022

पुस्तक समीक्षा | स्त्रीजीवन का मनोवैज्ञानिक विमर्श रचती कहानियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 18.01.2022 को दैनिक "आचरण" में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका श्रीमती आराधना खरे के कहानी संग्रह "मंथन" की समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
स्त्रीजीवन का मनोवैज्ञानिक विमर्श रचती कहानियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - मंथन
लेखिका     - आराधना खरे
प्रकाशक    - स्टोरीमिरर इंफोटेक प्रा.लि.,145, पहला माला, पवई प्लाज़ा, हीरानन्दानी गार्डन्स, मुंबई
मूल्य       - 200 रुपए 
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कहानियां हर व्यक्ति के जीवन में उसकी बाल्यावस्था से ही प्रवेश कर जाती हैं। नानी, दादी, मां, पिता एवं अपने परिवार के बड़ों से कहानी सुनने का अवसर हर किसी को मिलता है चाहे उसके परिजन शिक्षित हों या अशिक्षित। कहानी का प्रत्यक्ष संबंध शिक्षित होने से कहीं अधिक अनुभव एवं कल्पनाशीलता से होता है। किन्तु कहानी और शिक्षा का परस्पर बड़ा घनिष्ठ होता है। हर कहानी का उद्देश्य कोई न कोई शिक्षा अथवा जानकारी देना होता है, चाहे वह वीरता का संचार करने वाली राजा-रानी की कहानी ही क्यों न हो। ‘‘पंचतंत्र’’ की कहानियां इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं जो शिक्षा देने के उद्देश्य से ही लिखी गईं। हर कहानीकार कहानी के माध्यम से अपने अनुभवों को वे चाहे निजी हों, परिवार के हो, समाज के हो अथवा देश के हों, साझा करना चाहता है। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि यह आवश्यक नहीं कि कहानी लिखनेे वाला साहित्य का ही विद्यार्थी हो, वह किसी भी विषय का स्काॅलर हो सकता है। बस, शर्त यही है कि उसकी विषय का आकलन करने और उसे कथारूप में अभिव्यक्त करने की कला आती हो। आखिर कहानी को ‘‘कहानी कला’’ यूं ही तो नहीं कहा जाता है। कहानी के मूल तत्व अर्थात् कथानक, पात्र एवं चरित्र, संवाद, भाषा-शैली, वातावरण और उद्देश्य कहानी के स्वरूप को तय करते हैं। इन सभी तत्वों पर जिसकी अच्छी पकड़ हो वह श्रेष्ठ कहानी कह या लिख सकता है। 
इस बार जिस कहानी संग्रह को समीक्षा के लिए सामने रखा गया है उसका नाम है ‘‘मंथन’’। यह लेखिका आराधना खरे का प्रथम कहानी संग्रह है। आराधना खरे रसायनशास्त्र की व्याख्याता रही हैं किन्तु साहित्य के प्रति बचपन से ही इनका रुझान था। आकाशवाणी, पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कहानियां, कविताएं प्रसारित, प्रकाशित होती रहीं। ‘‘मंथन’’ उनकी 34 कहानियों का संग्रह है जिसमें इस नाम की कोई कहानी नहीं है अर्थात् संभवतः अब तक उनके द्वारा लिखी गई कहानियों का मंथन करके उनमें 34 कहानियों को संग्रह के लिए चुना गया और इसीलिए संग्रह का नाम ‘‘मंथन’’ रखा गया। चूंकि संग्रह में लेखिका की ओर कोई प्राक्कथन नहीं है अतः संग्रह का ‘‘मंथन’’ नाम रखे जाने के संबंध में अनुमान ही लगाया जा सकता है। इस संग्रह में एक गहन विचारणीय तथ्य है जिसके बारे में समीक्षा के अंतिम भाग में चर्चा करूंगी। पहले संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात आवश्यक है। 
आराधना खरे की कहानियां परिवार और समाज में स्त्री जीवन को व्याख्यायित करती कहानियां हैं। संग्रह की कहानियों से गुज़रते हुए यह मानना पड़ेगा कि लेखिका को मनोविज्ञान की अच्छी समझ है। उनके पात्रों का मनोविज्ञान कथा के महत्व को बखूबी प्रस्तावित करता है। जैसे संग्रह की पहली कहानी है ‘‘एक बार फिर’’। यह कहानी मनोवैज्ञानिक धरातल पर मानवीय विमर्श रचती है। लेखिका ने कहानी के माध्यम से यह यथार्थ सामने रखा है कि चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, उसकी यही इच्छा होती है कि उसका जीवनसाथी उसके अलावा और किसी को न चाहे। इस समस्या को लेकर कई बार दाम्पत्य संबंधों में दरार पड़ जाती है। जबकि कई बार स्त्री को दोयम होने का दंश सहन करना पड़ता है। ‘‘एक बार फिर’’ की नायिका अपने सांवले, साधारण रंग-रूप के कारण अपने छोटी बहन की तुलना में कमतर ही ठहराई जाती रही। फिर जब इकतीस वर्ष की आयु में उसका विवाह हुआ तो वह भी एक विधुर से। अतः विवाह के बाद उसे अपने पति की दिवंगत पूर्व पत्नी की सुंदरता की तुलनात्मक उपस्थिति का दंश सहने को विवश होना पड़ा। यह उसके अविवाहित जीवन के अनुभव से भी अधिक कष्टप्रद था। फिर भी एक स्त्री अपना दाम्पत्यजीवन को बचाने के लिए कभी आशा की डोर नहीं छोड़ती है। इसी तरह कथा की नायिका को भी आशा है कि संतान सुख उसके इस दुख को दूर कर देगा और उसका पति उसके आंतरिक सौंदर्य को समझ जाएगा। यह कहानी निराशा में आशा की डोर ढूंढ लेने का एक मजबूत आधार सुझाती है। संग्रह की सभी कहानियों की तरह यह भी एक छोटी-सी कहानी है किन्तु इसका कथानक दीर्घ विमर्श रचने में सक्षम है।
‘‘मंत्र’’ कहानी भी एक मनोवैज्ञानिक समस्या का महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करती है। पति अंतर्मुखी है और पत्नी  बहिर्मुखी। पति अपनी पत्नी की सुख-सुविधाओं में कोई कमी नहीं रखता है किन्तु पति के मौन स्वभाव के कारण पत्नी को घुटन महसूस होती रहती है जिसका असर उनके बच्चे पर भी पड़ने लगता है। धीरे-धीरे दोनों के बीच अलगाव की स्थिति भी आ जाती है किन्तु एक घटना उनके बीच के अंतर को मिटा देती है। यही घटना दाम्पत्य जीवन के सुख का मंत्र साबित होती है। इस कहानी में लेखिका ने एक सुंदर परिवार-विमर्श रचा है जिसका मूलमंत्र यही है कि यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसे व्यक्त भी करिए जोकि दाम्पत्य जीवन में सबसे आवश्यक है।
एक और कहानी है ‘‘अमृत’’। यह एक संदेशात्मक कहानी है। कहानी में इस तथ्य को केन्द्र में रखा गया है कि वैवाहिक संबंध में संबंधियों के बीच दिखावे से अधिक आत्मीयता को महत्व दिया जाना चाहिए। महत्व इस बात का नहीं होना चाहिए कि विवाह में कितना खर्च किया गया, कितना दिखावा किया गया अपितु महत्व इस बात का होना चाहिए कि विवाह के दौरान कितनी आत्मीयता और अपनत्व का आदान-प्रदान किया गया।  
‘‘निर्णय’’ आत्मकथात्मक कहानी है। गोया कोई अपने जीवन के पन्ने खोल कर सामने रख रहा हो। कहानी की नायिका अपनी सेवानिवृत्ति को ले कर बहुत अधिक उत्साहित थी क्योंकि उसने अपना अब तक का सारा जीवन एक कामकाजी गृहणी के रूप में व्यतीत किया था। अर्थात नौकरी के समय नौकरी और शेष समय सिर्फ़ घर-परिवार की चिंता। सेवानिवृत्ति के समय तक पुत्र-पुत्री अपने-अपने संसार में रच-बस चुके थे अतः वह अब अपने अधूरे रह गए सपनों को पूरा करना चाहती थी। ढेर सारा साहित्य पढ़ना और खूब लिखना। यही चाहती थी वह। किन्तु सेवानिवृत्ति के कुछ समय बाद ही उसे अहसास हो गया कि एक खालीपन उसके भीतर घर करता जा रहा है। सतत् दौड़-धूप में सक्रिय रहने वाली स्त्री एक स्थान पर बैठ कर अधिक समय स्वयं को व्यस्त नहीं रख सकती है। तब उसे स्वयं को व्यस्त रखने का एक और रास्ता अपनाना पड़ा। उसने अपने पति की सलाह पर बस्ती के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना शुरू कर दिया। यह कहानी उन सभी के लिए एक बड़ा संदेश देती है जो सेवानिवृत्ति के बाद रिक्तिता से घिरने लगते हैं और यही रिक्तिता आगे चल कर उनके अवसाद का कारण बनती है, फिर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। वस्तुतः यह भी एक मनोवैज्ञानिक समस्या है कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन भर दूसरों के लिए ही कुछ किया हो वह स्वयं पर केन्द्रित हो कर अधिक दिन तक संतुष्ट नहीं रह सकता है।
संग्रह की तीन कहानियों की बानगी से ही समझा जा सकता है कि लेखिका आराधना खरे कहानी के तानेबाने में मनोविज्ञान को बखूबी बुन सकती हैं। भाषा पर भी उनका अधिकार अच्छा है तथा शैली रोचकतापूर्ण है। छोटी कहानी में बहुत कुछ कह देने की कला उन्हें आती है। उनकी सभी कहानियां प्रभावी हैं और पठनीय हैं। 
अब बात करूंगी उस विषय की जिसके बारे में मैंने अंत में चर्चा करने की बात की थी। संग्रह के आरम्भ में तीन समीक्षात्मक लेख हैं जिनमें पहला लेख साहित्यकार टीकाराम त्रिपाठी का है। ‘‘भारतीय समाज और स्त्रीविमर्श’’ शीर्षक से यह लेख ‘‘पुस्तक समीक्षा’’ के रूप में दिया गया है जिसमें त्रिपाठी जी ने आराधना खरे के इस संग्रह की कहानियों की गहराई से समीक्षा की है। दूसरा समीक्षा लेख कैलाश तिवारी ‘‘विकल’’ का है तथा तीसरा समीक्षा लेख डाॅ. मनोज श्रीवास्तव का है। पुस्तक के आरम्भ में ही प्राक्कथन, भूमिका, प्रस्तावना, आमुख अथवा पुरोवचन होने के स्थान पर ‘‘पुस्तक समीक्षा’’ का होना खटकता है। पुस्तक समीक्षा तो वह तत्व है जो पुस्तक और पाठक के बीच सेतु का काम करती है जिसे पुस्तक के प्रथम संस्करण में नहीं अपितु समाचारपत्र, पत्रिका अथवा किसी अन्य माध्यम में होना चाहिए, जहां से पुस्तक के बारे में जानकारी पा कर, जिज्ञासु हो कर पाठक पुस्तक को पढ़ने का इच्छुक हो उठे। संग्रह के आरम्भिक पन्नों में पुस्तक समीक्षा का होना ऐसा प्रतीत होता है मानो मंगलाचरण के स्थान पर उपसंहार प्रस्तुत कर दिया गया हो। बस, यह अच्छी बात है कि संग्रह की कहानियां दमदार हैं इसलिए इस ‘‘नवप्रयोग’’ ने कहानियों के प्रभाव पर विपरीत असर नहीं डाला है। यह लेखिका का प्रथम कहानी संग्रह है अतः भविष्य में उन्हें इस प्रकार के प्रयोगों से बचना होगा। इसमें दो राय है नहीं कि यह कहानी संग्रह पढ़े जाने योग्य है इसीलिए मैंने संग्रह की सभी कहानियों की चर्चा नहीं की है शेष कहानियों के बारे में पाठक स्वयं पढ़ कर जाने तो अधिक रुचिकर रहेगा।             
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