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Tuesday, March 17, 2026

पुस्तक समीक्षा | सच की आंच में तपी हुई कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
सच की आंच में तपी हुई कविताएं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - वक्त की ही तू तलाश है
कवि - डाॅ. प्रदीप पाण्डेय
प्रकाशक -सुभारती प्रकाशन, डी ब्लाॅक, पाॅकेट 16, 153,सेक्टर-7, राहिणी, नई दिल्ली-85
मूल्य -350/-
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यह कहा जाता है कि सच कड़वा होता है। निःसंदेह जो लोग सच में कड़वाहट घोलने के लिए जिम्मेदार होते हैं उनके लिए सच कड़वा ही होता है। गोया वे अपना को कृत्य स्वयं देख, सुन नहीं सकते या सहन नहीं कर पाते हैं। ठीक वहीं दूसरी ओर जो सच की कड़वाहट से जूझता है और उस कड़वाहट को मिठास में बदलने की आकांक्षा रखता है उसके लिए यही कड़वाहट एक चुनौती होती है। कवि प्रदीप पांडेय की कविताओं में विपरीत परिस्थितियों के प्रति एक ललकार ध्वनित होती है।  प्रदीप पांडेय एक ऐसे रचनाकार है जो समाज में व्याप्त विसंगतियों के विरुद्ध आवाज उठाने में विश्वास रखते हैं। उनकी पहली कृति  ‘‘पक्षद्रोह’’ उपन्यास  के रूप में पाठकों के समक्ष आई, जिसमें उन्होंने न्याय, कानून  तथा सरकारी तंत्र में व्याप्त विसंगतियों पर करारा प्रहार किया था । उनका यह काव्य संग्रह ‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ लगभग उसी तेवर पर आधारित है। विधा उपन्यास के स्थान पर कविताओं में ढल गई है किंतु ललकार की ध्वनि वही है जो उनके उपन्यास में मौजूद है। इस इस संग्रह की कविताओं में कवि प्रदीप पांडेय ने बिना किसी संकोच के कठोर से कठोर शब्दों में उन लोगों को ललकारा है जो जागते हुए भी सो रहे हैं और अव्यवस्था को निरंतर अनदेखा किया जा रहे हैं। साहित्य में इस प्रकार के तेवर आज काम ही दिखाई देते हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सीधे-सपाट तरीके से सच कहने का माद्दा रखते हैं। सृजन के दौरान जब भावनाएं पूरे आवेग से प्रभाव डाल रही हों तो शिल्प गौण होने लगता है लेकिन कविता वह विधा है जो शिल्प की गौणता को भी संभाल लेती है और एक वैशिष्ट्य में परिवर्तित कर देती है।
‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है कि प्रदीप पांडेय अपनी कविताओं में शब्दों से उलझाते नहीं हैं वरन वे अपनी बात स्पष्टता से कहते हैं। जैसे उनकी कविता है- ‘‘जिंदा हो कि मर गए हो’’ । इस कविता में बिना किसी लाग-लपेट के सीधे करारे शब्दों में कटाक्ष किया गया है-
सहमे - सहमे दुबके- दुबके
जियत हो कैंसें, तुम छुप-छुपके
कोई कांड कहूं, कछु कर गए हो
कछु तो बोलो !
जिंदा हो कि मर गए हो !
प्रदीप पांडेय की कविताओं में रोष का अपना एक अलग रंग है। ‘‘ये गधों की रेस है’’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं कि-
करता है जी
उठा लूँ बेसवाल या बल्ला
पकडू सिरमौरों को
जमाऊं रोज
चाहे करते रहें
अब्बा व लल्ला
फीलिंग्स है अंदर ही दम तोड़ देती है
जाने दो गुनहगारों ये सोचकर छोड़ देती है
आज हर शहर विकसित भी है और समस्याओं से जकड़ा हुआ भी ।अपने शहर को लक्षित करते हुए प्रदीप पांडेय उस सारी अव्यवस्था को लक्ष्य करते हैं जिसके कारण शहर कोलाहल से भरा हुआ होने पर भी निष्पंद और निःशब्द प्रतीत होता है। शहर में व्याप्त सारी सक्रियता थोथी नजर आती है। ‘‘ये मेरा शहर’’ कविता में देश-दुनिया के तमाम शहर समाए हुए हैं-
न सुने दर्द की आवाजें
न देखे दाग जिगर के
जिंदा जैसे दिखने वाले
है मुर्दे लोग शहर के
संग्रह की कुछ कविताओं में शब्दों का चयन जितना चैंकाता है, उतना ही गुदगुदाता भी है। जैसे ‘‘ऐ मुश्किलों’’ कविता में वे ‘‘दामाद’’ शब्द का प्रयोग करते हुए कवि ने मखमली प्रहार किया है-
ऐ मुश्किलों
ज्यादा न इतराओ
दामाद हूँ तुम्हारा
दूर कहाँ जाऊँगा
साथ तुम्हारा /मुझको भी
बहुत भाता है /कमजर्फ नहीं हूँ
तुमको जो भूल जाऊंगा।
संतान आयु में चाहे जितनी भी बड़ी हो जाए किंतु उसके लिए मां का आंचल सदा महत्वपूर्ण रहता है। हर संतान हर आयु में यही चाहती है कि उसकी मां हमेशा स्फूर्त, चैतन्य और युवा रहे तथा उसकी ममत्व की छांह हमेशा मिलती रहे। कवि की आकांक्षा भी यही है । ‘‘माँ तुम और बूढ़ी न होना’’ कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
थपकियां बनकर
मुझको सुलाती उंगलियां
कभी ‘‘मां’’ सिर पर
फेरा करती थी
तो सब कुछ भूल जाता
कैसे गिले कैसे शिकवे
कहां याद रहते
जब मै रोता
तो वो मुझको मनाती
ढेरों किस्से कहानी सुनाती।
संग्रह की छः कविताएं एक अलग ही धरातल की रोचक कविताएं हैं। ये सभी कविताएं मदिरा और मदिरा पान करने वालों पर केंद्रित हैं। जैसे - ‘‘हे मदिराप्रेमी’’, ‘‘मद्यासक्त’’, ‘‘मदिरादृष्टि’’, ‘‘मदिरा योग’’, ‘‘मद्याभिलाषी’’ तथा ‘‘हे मधुग्राही’’। ‘‘मद्याभिलासी’’ कविता में व्यंजना-अभिव्यंजना में निबद्ध शब्दावली  की छटा निराली है। यथा-
हे मद्याभिलासी !
मद्यसक्त धैर्य न खोना,
न छटपटाना
बरसती धूप हो या समंदर
तुम सूखे गले ठेके पे जाना
सरकार ने सजाये है ठेके
तुम्हारी आस विश्वास में
कैसा धर्म? कैसी नीति?
तुम तो बस! प्याले उठाना।
और अंत में उस कविता की चर्चा जो संग्रह की शीर्षक कविता है। ‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ कविता की भावभूमि सच की आंच में तप कर सुदृढ़ हुए व्यक्ति का आत्मपरिचय प्रस्तुत करती हुई हृदय में ओज का संचार करती है-
आज कर, इसी वक्त कर
एक प्रण! कर ठान ले ।
है तू ही य सर्वज्ञ जग में
आज इतना जान ले ।
उठ जिगर में, भरकर
आंधी बैठा क्यों, होकर
उदास है वक्त ने बोया है तुझको
वक्त की ही, तू तलाश है ।
कवि प्रदीप पांडे की कविताएं वर्तमान के प्रत्येक सच को खुलकर रेखांकित करती है तथा विसंगतियों को मिटाने का आह्वान करती हैं। कविताओं की भाषा सरल, सहज एवं आम बोलचाल की है। छंद मुक्त होते हुए भी इनमें एक प्रवाह है जो पाठकों को बांधे रखने में सक्षम है। यह संग्रह पठनीय है क्योंकि इसकी कविताओं में एक विशेष वैचारिक उद्वेलन है जो मानस को झकझोरता है और ठहर कर सोचने को विवश करता है।      
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