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Wednesday, September 2, 2026

चर्चा प्लस | कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  

कृति सेनन के ब्रालेट से ज्यादा चिंता करिए प्राकृतिक चेतावनी की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 


        एक कामर्शियल विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन के ब्रालेट पहनने पर पक्ष और विपक्ष में जितनी तलवारें खिंची यदि उसकी आधी भी बहस प्राकृति संकट को ले कर होती तो नेपाल जैसी विभीषिका से बचा जा सकता था। हम इंसानों के द्वारा प्रकृति के असंतुलित दोहन से स्थितियां दिन पर दिन बदतर हो रही हैं। जोशी मठ हासदे से ले कर हाल ही में नेपाल में आई कीचड़ की बाढ़ ने जता दिया कि प्रकृति नाराज़ है और वह बार-बार चेतावनी दे रही है किन्तु हमारी वर्तमान राष्ट््रीय चिंता तो एक विज्ञापन में पहना गया ब्रालेट है। विज्ञापन को नकारने के बजाए उसे पूरी पब्लीसिटी देना गोया राष्ट््रीय कर्तव्य है। क्या 903 लोगों की मौतें और चार हजार से अधिक लोगों का लापता हो जाना मामूली बात है? जबकि अभी संकट की दस्तक मात्र है।         

ज़लज़ला आया और आ के हो गया रुख़सत मगर
वक़्त  के रुख़  पे  तबाही की इबारत लिख गया।
     - शायर फ़राज़ हामिदी का यह शेर जोशीमठ से नेपाल तक की आपदा की पीड़ा को बाखूबी बयां करता है।
       मुझे याद आ रही है एक कहानी जो मैंने प्रायमरी स्कूल के दौरान पढ़ी थी। सिलेबस में या सिलेबस के बाहर, यह याद नहीं है। बहुत सोचा लेकिन उस कहानी के लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है। सो, यदि किसी को लेखक का नाम पता हो तो मुझे जरूर बताने का कष्ट करे। उस कहानी का कथानक और शिल्प इतना प्रभावी था कि कहानी आज भी मुझे याद है। यह कहानी सन् 1935 में क्वेटा में आए भीषण भूकंप की चर्चा पर आधारित थी। क्वेटा पहले भारत का हिस्सा था लेकिन अब पाकिस्तान में है और बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है। कहानी का सारांश यह था कि कपड़ा बेचने वाला एक दूकानदार अपने दूकान में दूकानदारी कर रहा है। वह ग्राहकों को कपड़ा दिखाता है और उनसे क्वेटा में हुई जान-माल की हानि के बारे में प्रश्न करता जाता है। वह एक प्रश्न करता है कि कैसा कपड़ा चाहिए? तो उसका दूसरा प्रश्न होता है कि क्वेटा में कितने लोग मारे गए? फिर वह कपड़े की खूबियां बताता है और साथ में पूछता है कि वहां तो सब कुछ बर्बाद हो गया होगा? इसी प्रकार पह कपड़ा बेचते हुए वह अपने ग्राहकों से क्वेटा में आए भूकंप की भीषणता की चर्चा करता है, जानकारी लेता है और अपनी चिंता व्यक्त करता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा और मानवीय जीवन संबंधी विवशताओं के समीकरण पर यह अद्भुत कहानी थी। लेकिन आज स्थिति इससे दुखद हो गई है। आज भूकंप के खतरे बढ़ गए हैं लेकिन हमारे सरोकार प्रकृति को ले कर वर्तमानजीवी हो गए हैं। आज बाढ़ें भयावह रूप लेती जा रही हैं। लेकिन इस बारे में चिंता करने के बजाय कृति सेनन के ब्रालेट की चिंता में समय खपाना जागरूकता की निशानी बन गया है। एक पक्ष इसे भारतीय संस्कृति की तौहीन बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे स्त्री की आजादी से जोड़ कर इसकी पैरवी कर रहा है। सोशल मीडिया कृति सेनन और कंगना रनौत की कम और पूरे कपड़ों के साथ टांके गए पोस्टों से भारा पड़ा है। इक्का-दुक्का पोस्ट नेपाल के हादसे पर भी दिख जाती है गोया कुछ लोग स्वयं को जागरूक दिखाना चाहते हैं। अन्यथा इस तरह की आपदा की जड़ तक पहुंचने में भला किसको दिलचस्पी है? 
6 फरवरी 2023 को जब टर्की में विनाशकारी भूकंप आया था तब मुझे एक आश्चर्यजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा था। भूकंप की खबर पढ़ने के बाद जब मैंने अपने परिचित से चर्चा की कि टर्की में कितना विनाशकारी भूकंप आया है तो पहले तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की जब कि भूकंप की ख़बरों से टीवी और मोबाईल अपडेट भरे हुए थे। फिर भी उन्हें पता नहीं था। खैर, मैंने उन्हें बताया कि भूकंप की तीव्रता 7.8 रिक्टर स्केल थी। लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना करते हुए पूछा कि टर्की तो मुस्लिम देश है न? मैं उनका प्रश्न सुन कर अवाक रह गई थी। भूकंप में मरने वाले मनुष्य थे, हिन्दू या मुस्लिम तो बाद की बात है। इसके बाद मुझे समझ में नहीं आया था कि मैं उस उच्च शिक्षित (?) व्यक्ति से टर्की के भूकंप के बारे में आगे क्या बात करूं? फिर भी मैंने खुद को तसल्ली दी और चर्चा को भूकंप पर केन्द्रित किया। तो इस पर वे लापरवाही से बोले कि हां, अभी महाराष्ट्र में भूकंप आया था लेकिन अपने यहां सागर में कोई ख़तरा नहीं है। मैंने पूछा था कि आप इतने दावे से कैसे कह सकते हैं कि यहां कभी भूकंप नहीं आएगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहां न तो कोई बड़ी नदी है और कोई बड़े पहाड़। उनके इस ज्ञान ने मुझे उन्हें याद दिलाने को मजबूर कर दिया कि हम जिस ठोस जमीन पर रह रहे हैं वह टेक्टोनिक प्लेट्स पर टिकी हुई है और ये प्लेट्स भू-केन्द्र के तरल पदार्थ पर तैर रही हैं। फिर मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब-जब जबलपुर में भूकंप के झटके आए हैं तब-तब उसकी तरंगे हमारे सागर शहर की भूमि को भी मामूली स्तर पर हिला चुकी हैं।
भूकंप के जिस ज्ञान को हम अपनी छोटी कक्षाओं में अर्जित कर चुके हैं उन्हें बड़े हो कर कैसे भूलते जा रहे हैं? यह सोच कर आश्चर्य होता है। आज हमें सोने (गोल्ड) के भाव के उतार-चढ़ाव की चिंता रहती है लेकिन प्रकृति को अपने द्वारा पहुंचाए जा रहे नुकसान की चिंता नहीं रहती है। जबकि सोना हमें सुख दे सकता है पर जीवन नहीं। राजा मिडास की कहानी ने यही तो समझाया था हमें। जिसने राजा मिडास की कहानी सुनी होगी उसे याद होगा कि राजा मिडास ने भगवान से वरदान मांगा कि वह जिस चीज को छुए वह सोने की हो जाए। मिडास ने अपना महल, सिंहासन, पेड़-पौधे अब को छू-छू कर सोने का बना लिया। यहां तक कि जब उसने अपनी पत्नी, अपनी बेटी को छुआ तो वे भी सोने की मूर्ति में बदल गईं। फिर उसे जब भूख लगी और वह खाने बैठा तो हाथ लगाते ही भोजन सोने में बदल गया। पानी भी सोने में बदल गया। जब भूख-प्यास से प्राण निकलने की नौबत आ गई तब कहीं जा कर राजा मिडास को अपनी भूल का अहसास हुआ। लेकिन तब तक पहुत देर हो चुकी थी। जाने-अनजाने हम भी राजा मिडास की तरह प्रकृति को भूल कर लालच की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को जड़ से काटते जा रहे हैं। भूकंप की बढ़ती संख्या और बढ़ती तीव्रता उसी का दुष्परिणाम है जो हमने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है। हमने पेड़ काटे, जंगल छोटे कर दिए, भूमि से उसकी नमी सोख ली, भूमि पर मिट्टी का ठहराव घटा दिया। बड़े-बड़े बांध बना कर स्थिर और ठोस जमीन को लहरों वाले तरल पानी से भर दिया। गगनचुंबी इमारतों के जंगल खड़े कर दिए, यह ठीक से जांचे बिना कि वहां की भूमिगत चट्टानें उन इमारतों का बोझ उठा सकती हैं या नहीं? नए सरकारी नियम हैं कि भूकंप सुरक्षित भवन बनाए जाएं लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि इसका पूरी तरह से पालन बहुत कम होता है। जैसे नियम बनाया गया था कि नए भवनों पर रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाए लेकिन गोया हम मान कर चलते हैं कि नियम बस्तों में बंधे रहने के लिए होते हैं। टर्की तो एक विकसित देश है। वहां आधुनिक संसाधन अपनाए जाते हैं। फिर भी वहां की मल्टीस्टोरी इमारतें भूकंप की 7.8 की तीव्रता नहीं झेल सकीं थीं। तो हमारा क्या होगा जब हमें इस तीव्रता का भूकंप झेलना पड़ेगा?
तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप से दोनों देशों के कई शहरों में भारी तबाही हुई थी। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई और इससे हजारों लोगों के मारे गए थे। तुर्की दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में से एक है। भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं है। चाहे भारत हो या नेपाल हो बड़े बांधों से पैदा होने वाले संकट को अनदेखा करना, ग्लेशियर्स के तेजी से पिघलने को अनदेखा करना ही हमें विनाश का आईना दिखा देगा। नेपाल में आया ‘‘मड फ्लड’’ अर्थात कीचड़ की बाढ़ के पीछे असली कारण ग्लेशियर्स पिघलने से अचानक जलस्तर बढ़ना था। ग्लेशिर्यस क्यों तेजी से पिघल रहे हैं? क्योंकि पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, क्योंकि इससे मौसम के पैटर्न में तेजी से बदलाव हो रहा है। दुख की बात ये है कि यह सब हमारे संज्ञान में है, फिर भी प्रकृति को चोट पहुंचाने से हम बाज नहीं आ रहे हैं। 
मां पहले प्यार से समझाती है। फिर भी बच्चा तोड़-फोड़ करने को उतारू रहता है तो मां विवश हो कर उस पर हाथ उठाती है ताकि वह सुधर जाए। भूकंप के रूप में धरती माता हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो। लेकिन हम उनकी चेतावनी को लगातार अनसुना कर रहे हैं। अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के कुछ घरों में पहली बार दरारें दिखाई दीं। एक साल बाद, 11 जनवरी तक, शहर के सभी नौ वार्डों में 723 घरों के फर्श, छत और दीवारों में बड़ी या छोटी दरारें दिखने लगीं। कई घरों में पोल उखड़ गए। जवाब में, शहर के भीतर कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। लेकिन बेहतर होता कि आपदा की आहटें पहले ही सुन ली गई होतीं।
वैज्ञानिकों ने हमेशा इस ओर ध्यान दिलाया और चेतावनी भी दी। प्रसिद्ध स्विस भूविज्ञानी अर्नोल्ड हेम और उनके सहयोगी ऑगस्टो गैस्टर ने 1936 में मध्य हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना पर पहला अभियान चलाया, तो उन्होंने अपना यात्रा वृतांत ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड्स (1938)’’ और शोध कार्य ‘‘सेंट्रल हिमालय: जियोलॉजिकल द ऑब्जर्वेशन’’ रिकॉर्ड किया। स्विस अभियान 1936 (1939) ने विवर्तनिक दरारों, मुख्य केंद्रीय दोष (एमटीसी) की उपस्थिति की पहचान की, और चमोली गढ़वाल में हेलंग से तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय रूप से संवेदनशील बताया। मध्य हिमालय के भूविज्ञान पर अनुसंधान और अध्ययन आगे बढ़े इसके बाद 1976 में ‘‘मिश्रा समिति’’ ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर इलाज के सुझाव दिए। सन 2022 में उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडरा रहे खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तमाम चेतावनियों के बाद भी जोशीमठ को बचाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि वहां बड़ी-बड़ी इमारतों का जंगल उगता चला गया। बढ़ती जनसंख्या के कारण जोशीमठ के गर्भ में उतरता रहा। आज जोशीमठ उसी दलदल पर असहनीय बोझ तले दबकर अलकनन्दा की ओर सरक रहा है।
6 फरवरी को टर्की में आए भूकंप में भी लगभग यही बात सामने आई थी कि वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी। बल्कि नीदरलैंड के शोधकर्ता वैज्ञानिक फ्रेंक होगरबीट्स ने 3 फरवरी 2023 को एक ट्वीट कर के लिखा था कि निकट भविष्य में, दक्षिण-मध्य तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान में 7.5 तीव्रता का भूकंप आएगा। अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भूकंप का केंद्र दिखाते हुए एक नक्शा भी शेयर किया था। उनकी बात सही निकली। बल्कि उनकी चेतावनी से दशमलव तीन प्रतिशत अधिक का यानी 7.8 तीव्रता का भूकंप आया। 
यदि बात करें भारत की तो सितंबर 2019 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनएमडीए) ने एक भूकंप आपदा जोखिम सूचकांक (एड्री) रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महानगरों और भूकंपीय क्षेत्र जोन चार और जोन पांच के शहरों सहित 50 शहरों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था। सर्वेक्षण किए गए शहरों में से 30 शहर (दिल्ली सहित) मध्यम स्तर के जोखिम पर हैं और 13 (शिमला सहित अधिकतर हिमालयी शहर) उच्च जोखिम पर हैं। लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि दिल्ली को भी एक बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि अधिकांश शहर स्व-निर्मित है। बिना तकनीकी इनपुट के जो इसे उच्च तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील बनाता है।


नेपाल की ओर से बह कर आने वाली नदियां हों या चीन से उतरने वालीं, भारत के लिए संकट पैदा करने में सक्षम है। नेपाल आपदा के बाद यह आशंका जताई भी गई थी कि कहीं चीने को अपने दो बंाधों ये यदि बंधान खोले तो और अधिक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इस गंभीर समाचार पर कितने लोगों ने ध्यान दिया? शायद गिनती के लोगों ने। अधिकांश का सरोकार तो ब्रालेट पहनी अभिनेत्री के विज्ञापन से था। उन्हें संस्कृति की चिंता थी जिसे उस विज्ञापन को अनदेखा कर के, उसे अप्रभावकारी साबित कर के भी संस्कृति के पक्ष में खड़ा हुआ जा सकता था। जबकि कोई भी संस्कृति तभी तक है जब तक उस संस्कृति के लोग सुरक्षित हैं और जीवित हैं। अतः पहली और प्रखर चिंता होनी चाहिए थी प्राकृतिक आपदा की, बालेट की नहीं। 
दरअसल हमने प्रकृति को निरंतर नुकसान पहुंचा कर उसे अशांत कर दिया है। हम भूगर्भीय हलचलों को रोक नहीं सकते, लेकिन ग्लेशिर्य के पिघलने की गति को कम कर सकते हैं। इस तरह प्रकृति को संरक्षित कर के नुकसान की तीव्रता को कम कर सकते हैं। बशर्तें हम समय रहते सचेत हो जाएं और प्रकृति द्वारा दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान देना शुरू कर दें। यदि हमें किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से बचना है तो हमें प्रकृति-मित्र बनना होगा। प्रकृति की चिंता करनी होगी।                                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 02.09.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 26, 2026

चर्चा प्लस | साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
26 अगस्त, जन्मदिवस विशेष:

साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
      
‘‘वैशाली की नगर वधू’’ जैसा ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले आचार्य चतुरसेन शास्त्री का नाम हिन्दी साहित्य के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज़ है किन्तु हिन्दी से दूर होती नवोदित पीढ़ी उनके नाम का भी स्मरण नहीं रख पा रही है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने उपन्यासों के अलावा उन्होंने विपुल मात्रा में कहानियाँ भी लिखी हैं, साथ ही गद्य-काव्य के अतिरिक्त धर्म, राजनीति, इतिहास, समाजशास्त्र, स्वास्थ्य और चिकित्सा जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण लेखन किया। इसके साथ ही नाटक, एकांकी, आत्मकथा जैसी विधाओं में भी कलम चलाई। 26 अगस्त 1891 को जन्में आचार्य चतुरसेन शास्त्री के साहित्यिक योगदान को सदा याद रखा जाना चाहिए तभी हिन्दी साहित्य की वास्तविक वैचारिक समृद्धि से परिचित हो सकेंगे। 
 


आचार्य चतुरसेन शास्त्री का जन्म 26 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के चाँदोख ग्राम में हुआ था। बचपन में उनका नाम चतुर्भुज रखा गया। उनके पिता का नाम केवलराम वर्मा और माता का नाम नन्हीं देवी था। उनके पिता चाहते थे कि पुत्र चतुरसेन चिकित्सा के क्षेत्र में नाम कमाएं। सिंकदराबाद से आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद चतुरसेन शास्त्री ने जयपुर के संस्कृत कॉलेज से आयुर्वेद में आचार्य और संस्कृत में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपने कार्य जीवन का आरंभ एक आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में किया था और कुछ समय एक धर्मार्थ औषधालय में 25 रुपए मासिक वेतन पर नौकरी भी की। बाद में उनकी नियुक्ति डी.ए.वी कॉलेज, लाहौर में आयुर्वेद के प्राध्यापक के रूप में हो गई, लेकिन प्रबंधन से उनकी बन नहीं सकी और उन्होंने कुछ वर्षों बाद ही त्यागपत्र दे दिया। अब वह अजमेर चले गए जहाँ अपने ससुर के औषधालय में सहयोग करने लगे। मरीजों को देखने के साथ ही उनका साहित्य प्रेम घटने के बजाए बढ़ता गया। यूं भी वे किशोरावस्था से ही लेखन करने लगे थे। वस्तुतः शिक्षा समाप्त होने के बाद उन्होंने दिल्ली में आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में अभ्यास शुरू किया, लेकिन वह सफल नहीं रहे और उन्हें दुकान बंद कर दी। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि उनकी पत्नी के गहने तक गिर गए। गुजरात के लिए उन्होंने एक धर्मार्थ औषधालय में 25 रुपये प्रतिमाह वेतन पर काम किया। सन 1917 में वे डीएवी कॉलेज, लाहौर में आयुर्वेद के वरिष्ठ प्रोफेसर बने, लेकिन प्रबंधन के असहयोग के कारण उन्होंने छोड़ दिया और अजमेर चले गए।  अजमेर में दोस्तों के यहाँ रहते हुए उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। बाद में दिल्ली में उन्होंने लंबे समय तक चिकित्सा कार्य (सन् 1936 से अभ्यास की) और विपुल मात्रा में ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रचनाएँ लिखीं, जिससे उन्हें प्रसिद्धि मिली।

उनका निजी जीवन कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा। एक के बाद एक तीन पत्नियों के असामयिक देहांत ने मन को आहत रखा था तो लेखन में यश पा सकने की पीड़ा से भी गुजरते रहे थे। चैथे विवाह के बाद उनके जीवन में पुनः कुछ स्थिरता आई और उन्होंने अपनी कृति ‘वैशाली की नगरवधू’ लिखकर पूरी की। यह कृति उनके लिए स्थायी यश कारण बनी। इसके साथ ही उनके एक नए लेखक रूप का उभार हुआ और वह एक उपन्यासकार के रूप में समादृत हुए।
ऐतिहासिक विषय-वस्तु के उनके उपन्यास अपनी श्रेणी में विशिष्ट स्थान रखते हैं।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक ऐतिहासिक उपन्यास है। इस उपन्यास की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं। यह उपन्यास ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्ध काल, मगध साम्राज्य और लिच्छवि गणराज्य (वैशाली) की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें प्राचीन भारत की राजनीति, संस्कृति और समाज का जीवंत चित्रण किया गया है। सशक्त एवं प्रधान चरित्र आम्रपाली (अम्बपाली) उपन्यास का मुख्य केंद्र बिंदु वैशाली की नगरवधू और लोक-सुंदरी आम्रपाली का चरित्र है। आम्रपाली केवल सौंदर्य की प्रतीक नहीं है, बल्कि वह स्वाभिमान, आत्मबल, और त्याग की साक्षात मूर्ति के रूप में उभरती है। इस उपन्यास में तत्कालीन समाज के आंतरिक संकट, वज्जि गणतंत्र के कानूनों तथा बिंबसार, अजातशत्रु जैसे राजाओं की महत्वाकांक्षाओं का यथार्थवादी वर्णन है। उपन्यास में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय, तथा भगवान बुद्ध व महावीर स्वामी के समाज-सुधार व समतामूलक विचारों के प्रभाव को बहुत सुंदरता से दर्शाया गया है। चतुरसेन शास्त्री ने ऐतिहासिक और पुराकालीन वातावरण को जीवंत करने के लिए संस्कृतनिष्ठ और तत्सम शब्दों से युक्त प्रभावी भाषा का प्रयोग किया है। जिससे कथानक का देशकाल जीवंत लगता है। वस्तुतः आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ उपन्यास केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक और ऐतिहासिक संदेश के साथ लिखा था। लेखक ने स्वयं इस उपन्यास के बारे में कहा था, ‘‘मैं अब तक की अपनी सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ, और वैशाली की नगरवधू को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ।’’
चतुरसेन शास्त्री इस उपन्यास के माध्यम से भारत के प्राचीन इतिहास (विशेषकर ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बौद्ध कालीन वैभव, वैशाली गणतंत्र और मगध साम्राज्य) को प्रामाणिकता के साथ पाठकों के सामने लाना चाहते थे। उपन्यास का सबसे बड़ा उद्देश्य यह भी था कि ‘‘नगरवधू’’ जैसी कुप्रथा के माध्यम से पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के शोषण को तर्जनी दिखाई जा सके। आम्रपाली को उसकी इच्छा के विरुद्ध पूरे नगर की संपत्ति घोषित कर दिया जाता है। शास्त्री जी ने इस घटना के माध्यम से स्त्री अधिकारों और उनकी गरिमा का प्रश्न उठाया है। साथ ही उपन्यास में गणतंत्र के पतन की अवस्था को भी सामने रखा गया है। वैशाली एक महान और शक्तिशाली गणतंत्र था, लेकिन आंतरिक ईष्र्या, गुटबाजी और विलासिता के कारण उसका पतन हुआ। लेखक ने इसके माध्यम से यह संदेश दिया है कि यदि कोई समाज अंदर से कमजोर हो जाए, तो बाहरी ताकतें (जैसे मगध) उसका विनाश कर देती हैं। उपन्यास का अंत आम्रपाली द्वारा भगवान बुद्ध की शरण में जाने और बौद्ध भिक्षुणी बनने से होता है। इसके जरिए लेखक ने यह सिद्ध किया है कि सत्ता, रूप और वैभव क्षणभंगुर हैं, और अंतिम शांति केवल त्याग, अध्यात्म और करुणा से ही मिल सकती है।
यह उपन्यास एक सम्पूर्ण आख्यान की भांति है जिसमें तत्कालीन राजनीतिक पक्ष पर भी विस्तार से पक्ष रखा गया है। इसमें आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने प्राचीन भारत के दो सबसे शक्तिशाली राज्यों वैशाली (वज्जी संघ) और मगध साम्राज्य के बीच के गहरे राजनीतिक, सामाजिक और कूटनीतिक संघर्ष को बेहद सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। यह संघर्ष केवल दो राजाओं का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग शासन प्रणालियों का टकराव था। वैशाली आठ कुलों का एक संघ (वज्जी संघ) था, जहाँ गणतंत्र व्यवस्था थी। यहाँ निर्णय राजाओं की संस्था (संथागार) में लोकतांत्रिक तरीके से लिए जाते थे। वहीं मगध में साम्राज्यवादी राजतंत्र था, जहाँ सत्ता एक ही राजा (बिंबिसार और बाद में अजातशत्रु) के हाथ में केंद्रित थी। मगध का एकमात्र लक्ष्य साम, दाम, दंड, भेद से अपने साम्राज्य का विस्तार करना था। उपन्यास दिखाता है कि कोई भी लोकतंत्र तब तक नहीं हारता, जब तक वह अंदर से कमजोर न हो। वैशाली के लिच्छवि सरदार आपस में ही ईष्र्या, अहंकार और पारस्परिक कलह में लिप्त थे। वैशाली के गणतंत्र का एक क्रूर नियम था कि नगर की सबसे सुंदर स्त्री किसी एक पुरुष की पत्नी नहीं बन सकती, उसे ‘‘नगरवधू’’ (सार्वजनिक संपत्ति) बनना होगा। आम्रपाली को नगरवधू बनने के लिए बाध्य किया जाता है जिससे वैशाली के भीतर ही असंतोष व्याप्त हो जाता है। मगध के शासकों ने वैशाली की इसी आंतरिक कमजोरी का लाभ उठाया।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपने इस उपन्यास के द्वारा यह तथ्य रखा कि जब राष्ट्र की सुरक्षा पर आंतरिक राजनीति और अहंकार हावी हो जाते हैं, तो पूरे समाज को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ‘‘वैशाली की नगरवधू’’ के अतिरिक्त ‘‘आत्मदाह’’, ‘‘बहते आँसू’’, ‘‘दो किनारे’’, ‘‘नरमेध’’, ‘‘अपराजिता’’, ‘‘बगुला के पंख’’, ‘‘मोती’’, ‘‘पूर्णाहुति’’, ‘‘रक्त की प्यास’’, ‘‘सोमनाथ’’, ‘‘आलमगीर’’, ‘‘वयंरक्षाम’’, ‘‘सह्याद्रि की चट्टानें’’ आदि उपन्यास लिखे। उन्होंने नाटक भी लिखे- राजसिंह, मेघनाथ, छत्रसाल, गांधारी, श्रीराम, अमर राठौर, उत्सर्ग, क्षमा। ‘‘मेरी आत्मकहानी’’ नाम से आत्मकथा लिखी।
‘‘रजकण’’ तथा ‘‘अक्षत’’उनके कहानी ससंग्रह हैं तथा निबंध संग्रह हैं- ‘‘अंतस्तल’’, ‘‘मेरी खाल की हाय’’, ‘‘तरलाग्नि’’। इनके अतिरिक्त उन्होंने बाल साहित्य, एकांकी तथा चिकित्सा से संबंणित पुस्तकें भी लिखीं। सन 1909 से 1948 के 40 वर्षों की अवधि में वह 84 छोटी-बड़ी पुस्तकें लिख चुके थे और पत्रिकाओं में सैकड़ों लेखों का प्रकाशन हो चुका था।
शास्त्री जी की कहानियाँ उत्कृष्ठ थीं। उनकी एक कहानी ‘‘खूनी’’ के ‘‘प्रताप’’ पत्रिका में प्रकाशित होने पर ‘‘प्रताप’’ के संपादक पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा था, ‘‘खूनी को छाप कर प्रताप निहाल हो गया।’’
उनकी गद्यकाव्य रचनाएं प्रायः  ‘‘प्रताप’’ में प्रकाशित होती रहीं जिनमें ‘चित्तौड़ के किले में’’, ‘‘स्वदेश’’ व ‘‘अनूप शहर के घाट पर’’ आदि प्रमुख हैं। ‘‘अन्तस्तल’’ अचार्य शास्त्री का प्रसिद्ध गद्यकाव्य संग्रह है। यह हिन्दी में गद्य काव्य की प्रथम प्रकाशित पुस्तक मानी जाती है।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री छायावाद युग के प्रमुख उपन्यासकार और कथाकार रहे। उनका मुख्य लेखन काल प्रेमचंद के समकालीन और उनके बाद का है, जिसमें हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास-लेखन की परंपरा को समृद्ध करने का श्रेय प्राप्त है। 2 फरवरी 1960 को उनका निधन हुआ। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कृतियां हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। इन कृतियों को पढ़े बिना इतिहासपरक साहित्य लेखन की बारीकियों को समझा नहीं जा सकता है। वे साहित्य में इतिहास को पिरोने में माहिर थे।       

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(दैनिक, सागर दिनकर में 26.08.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, August 5, 2026

चर्चा प्लस | समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
समय रहते समझना ही होगा ऊर्जा संरक्षण के महत्व और तरीकों को
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
          जब लाईट चली जाती है तो हम झुंझला उठते हैं। यदि सरकार के द्वारा विद्युत कटौती की जाने लगती है तो हमारा क्रोध और बढ़ जाता है। डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हम घबरा उठते हैं। लेकिन क्या हम ऊर्जा के इन स्रोतों की बचत के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर कभी गंभीरता से विचार करते हैं? जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां आ गईं लेकिन बिजली उत्पादन के लिए भी तो कोयला जैसा जीवाश्म ईंधन लगता है। यानी आगे चल कर हमें अपनाना होगा बिजली के पारंपरिक स्रोत का विकल्प। तो वह, अभी से क्यों नहीं? इस पर विचार करना जरूरी है।
   सन 2006 में भारत बुक सेंटर, लखनऊ से मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘सस्ता और सुरक्षित ऊर्जा स्रोतरू सौर तापीय ऊर्जा’’। इस पुस्तक के प्राक्कथन में मैंने लिखा था-‘‘वर्तमान समय ऊर्जा और उसके स्रोतों पर चिंतन करने का समय है। हम ऊर्जा संकट के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, वह हमें अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर पुनः दृष्टिपात करने का आग्रह कर रहा है। लकड़ी, कोयला, पनबिजली, गैस, खनिज तेल आदि हमारे परंपरागत ऊर्जा स्रोत मानव के द्वारा उस समय से काम में लाए जा रहे हैं जबसे इन स्रोतों की जानकारी मनुष्य को हुई। हजारों वर्षों से इन ऊर्जा स्रोतों के निरंतर काम में आने, जनसंख्या के दबाव बढ़ने तथा इन ऊर्जा स्रोतों की भावी उपलब्धता की गंभीरता की ओर स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को न तो पुनर्जीवित किया जा सकता है और न पुनर्निर्मित किया जा सकता है। इनका भंडार समाप्त हो जाने पर हम ऊर्जाहीन हो जाएंगे। अतः समय रहते परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के एक ऐसे विकल्प को अपना लेना आवश्यक है जो हमारी भावी आवश्यकताओं को सुचारू रूप से पूरा कर सके। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत के रूप में जिन परंपरागत स्रोतों को अपनाया जा सकता है, वे हैं- 1.सौर ऊर्जा 2.पवन ऊर्जा 3.ज्वारीय ऊर्जा 4.भू-तापीय ऊर्जा। इन परंपरागत ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा अथवा सौर तापीय ऊर्जा सबसे उत्तम ऊर्जा स्रोत है। यह सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा है और इसीलिए इसकी उपलब्धता सतत एवं अक्षुण्ण है। सौर तापीय ऊर्जा सब जगह उपलब्ध हो सकती है। इसको उपयोग में लाना भी आसान है। सौर तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं तथा यह भविष्य की विश्वसनीय ऊर्जा के रूप में स्वीकार की जा चुकी है। सुदूर ग्रामीण अंचलों के लिए भी सौर तापीय ऊर्जा के द्वारा ईंधन एवं विद्युत की आपूर्ति की जा सकती है जो अन्य किसी स्रोत से दीर्घकाल तक संभव नहीं है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, मैंने सौर तापीय उर्जा के बारे में जैसे-जैसे अध्ययन किया, वैसे-वैसे मैंने इसे एक सशक्त विश्वसनीय और उपयोग में आसान ऊर्जा स्रोत के रूप में पाया। मुझे लगता है कि सौर तापीय ऊर्जा भारत जैसे विकासशील देश में समाज के प्रत्येक स्तर के नागरिकों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। इससे देश की राष्ट्रीय आय के एक बड़े भाग की बचत हो सकेगी, जो परंपरागत ऊर्जा को आयात करने में व्यय हो जाती है। सौर तापीय ऊर्जा को अपना कर न केवल ईंधन अपितु विद्युत आपूर्ति से संबंधित संकटों से भी हम उबर सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेंगे।’’

तब से अब तक ऊर्जा के संबंध में स्थितियां बेहतर नहीं हुई हैं बल्कि और अधिक बिगड़ी हैं। आज फिर वही शब्द लिखने पड़ रहे हैं जो मैंने उस समय लिखे थे कि आमजन जीवन में सौर ऊर्जा को अपनाए जाने की जरूरत है।
कोयले की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं और कोयला बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। कोयले की उपलब्धता के भावी संकट को देखते हुए जर्मनी ने अपने देश में कोयला खनन का काम बंद कर चुका है। अन्य देश भी इस दिशा में अपनी योजनाएं बना रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए एकदम से कोयले का उपयोग बंद कर देना संभव नहीं है अतः उसने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में सन् 2030 से 2050 तक का समय मांगा है। लेकिन क्या यह हमारे लिए सन 2030 तक संभव है? हम यदि रेलवे लाईन के पास पहुंच कर देखें तो कुछ ही देर में कोयले से भरी मालगाड़ी सामने से गुज़रती हुई दिखाई दे जाएगी। वह पचासों बोगियों में भरा हुआ कोयला कारखानों और विद्युत तापगृहों में पहुंच कर ऊर्जा उत्पादन का काम करता है। वर्षों से इस प्रकार कोयला खनन किया जा रहा है। हजारों वर्ष में तैयार यह कोयला जिस तेजी से और जिस बड़े पैमाने में हमने उपयोग में लाया है, उससे भूमि के नीचे मौजूद कोयले का भंडार अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। कोयले का पुर्नउत्पादन इतनी तेजी से नहीं हो सकता है कि हम खोदते जाएं, कोयला निकालते जाएं और पृथ्वी हमें कोयला बना-बना कर देती जाए। यह हजारों वर्ष की प्राकृतिक प्रक्रिया से निर्मित होता है। इस बात को जानते हुए भी हमने यह अनदेखी की कि कोयला एक दिन पूरी तरह समाप्त हो सकता है। इसीलिए स्थिति इस गंभीरता तक आ पहुंची है कि कोयले का उपयोग बंद किए जाने का वैश्विक स्तर पर प्रयास आरम्भ करना पड़ रहा है।

हम दैनिक जीवन में विद्युत ऊर्जा का बेहद उपयोग करते हैं। अब तो ई-बाईक, ई-कार आदि के रूप में उपयोग बढ़ता जा रहा है। इस ‘ई’ का मतलब है इलेक्ट्रिक या बिजली। तो जब तक बिजली पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर है और हमारे पारंपरिक स्रोत समाप्त नहीं हुए हैं तब तक हमें बिजली प्राप्त होती रहेगी। लेकिन उसके बाद? क्या हम अंधकारयुग में जीने को तैयार हैं? कदापि नहीं। इसकी कल्पना भी हम नहीं करना चाहते हैं। तो फिर क्यों न समय रहते ऊर्जा के अपने स्रोत को पारंपरिक से बदल कर वैकल्कि पर ‘‘स्विच’’ कर दिया जाए। यानी हम जीवाश्म ईंधन के बदले सौर ऊर्जा को स्रोत के रूप में पूरी तरह से अपना लें।

यूं तो देश में हर वर्ष राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाया भी जाता है। यह ऊर्जा खपत के महत्व और हमारे दैनिक जीवन में इसके उपयोग और वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति पर इसके प्रभाव का आकलन करने के लिए मनाया जाता है। भारत में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस मनाने का उद्देश्य रहता है, लोगों को ऊर्जा के महत्व, ऊर्जा की बचत, और ऊर्जा संरक्षण के बारे में जागरुक किया जा सके। ऊर्जा संरक्षण का सही अर्थ है ऊर्जा के अनावश्यक उपयोग को कम करके कम ऊर्जा का उपयोग कर ऊर्जा की बचत की जाए। लेकिन यह दिवस भी अन्य दिवसों की भांति एक दिन का समारोह बन कर रह जाता है। 
   कुशलता से ऊर्जा का उपयोग भविष्य में उपयोग के लिए इसे बचाने के लिए बहुत आवश्यक है। यह सच है कि विद्युत जैसी ऊर्जा को बचा कर उसका भंडारण नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसके उत्पादन में लगने वाले कोयला जैसे स्रोत बचाए जा सकते हैं और मंहगी बिजली के विरुद्ध सौर ऊर्जा को अपना कर अपने घरेलू बजट को भी सम्हाला जा सकता है।

यह सच है कि वर्तमान में हमारे देश में सौर उपकरण घर में लगवाने मंहगे पड़ते हैं किन्तु आरंभिक खर्च के बाद न्यूनतम खर्च उसे बैलेंस कर देता है। यदि इस दिशा में सरकार कारगर सब्सिडी लागू कर दे तो सौर ऊर्जा के घरेलू उपकरण हर नागरिक के लिए सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे। इस दिशा में चीन ने हमारे देश के बाजार को आकर्षित करने में कसर नहीं छोड़ी है। ऑनलाईन बाजार में कम से कम कीमत में उसने ऐसे उत्पाद उतार दिए हैं जो दिन भर सौर ऊर्जा ग्रहण करते हैं और रात भर घर, लॉन, सड़क आदि को रोशन करते हैं। बेशक ये उपकरण बिना गारंटी के होते हैं किन्तु इनकी कम कीमत इनके ‘‘यूज एंड थ्रो’’ की क्वालिटी के आड़े नहीं आती है। यदि खाना पकाने के सोलर कुकर, चूल्हे और घरेलू बिजली के उपकरणों को सब्सिडी के साथ खुले बाजार में उपलब्ध कराया जाए तो इसे सभी लोग खरीदना पसंद करेंगे। इसका अनुमान बिजली बचाने वाले बल्बों, पंखों आदि की खरीदी के प्रति रुझान को देख कर लगाया जा सकता है। क्योंकि सुविधा पाने के साथ-साथ पैसे की बचत हर कोई करना चाहता है।  

यह भी सच है कि हमें ऊर्जा की बचत की आदत नहीं है। यह आदत हमें अपनानी होगी। कोई भी ऊर्जा की बचत इसकी गंभीरता से देखभाल करके कर सकता है। दैनिक उपयोग के बहुत से विद्युत उपकरणों को जैसे- बिना उपयोग के चलते हुए पंखों, बल्बों, एसी, हीटर आदि को बंद कर के विद्युत की बचत की जा सकती है। इस तरह ऊर्जा की बचत का तरीका ऊर्जा संरक्षण अभियान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। जीवाश्म ईंधन, कच्चे तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस आदि दैनिक जीवन में उपयोग के लिए पर्याप्त ऊर्जा उत्पन्न करते हैं लेकिन दिनों-दिन इनकी बढ़ती मांग प्राकृतिक संसाधनों के कम होने का भय पैदा करने लगा है। ऊर्जा संरक्षण ही केवल एक ऐसा रास्ता है जो ऊर्जा के गैर-नवीनीकृत साधनों के स्थान पर नवीनीकृत साधनों को प्रतिस्थापित करता है। ऊर्जा उपयोगकर्ताओं को ऊर्जा की कम खपत करने के साथ ही कुशल ऊर्जा संरक्षण के लिये जागरुक करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की सरकारों ने ऊर्जा और कार्बन के उपयोग पर कर लगा रखा है। उच्च ऊर्जा उपभोग पर कर ऊर्जा के प्रयोग को कम करने के साथ ही उपभोक्ताओं को एक सीमा के अन्दर ही ऊर्जा का प्रयोग करने के लिये प्रोत्साहित करता है। किन्तु इससे अधिक नागरिक हित का तरीका है सौर ऊर्जा को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।

भवन निर्माण के समय थर्मल इंसुलेशन का प्रयोग हमारे देश में नहीं किया जाता है किन्तु इस दिशा में ऊर्जा के बचत वाले निर्माण को बढ़ावा दिया जा सकता है जिससे ठंड की ऋतु में ऊर्जा की बचत की जा सके। अन्यथा, ठंड के मौसम में हीटर, ब्लोअर आदि उपकरणों पर बड़े पैमाने पर ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। थर्मल पर्दें, स्मार्ट खिड़कियां इस दिशा में कारगर साबित हो रही हैं। ऊर्जा की एक बड़ी मात्रा को प्राकृतिक रोशनी और कॉम्पैक्ट फ्लोरोसेंट लैंप या सीएफएल से और अन्य साधनों के द्वारा ऊर्जा खपत कम की जा सकती है। साथ ही फ्लोरोसेंट बल्ब, रैखिक फ्लोरोसेंट, सौर स्मार्ट टॉर्च, स्काई लाइट, खिड़कियों से प्रकाश व्यवस्था और सौर लाइट का प्रयोग करके बचाया जा सकता है। जल संरक्षण भी बेहतर ऊर्जा संरक्षण का कार्य करता है। लोगों के द्वारा हर साल लगभग हजारों गैलन पानी बर्बाद किया जाता है जिसकी विभिन्न संरक्षण के साधनों जैसे- 6 जीपीएम या कम से कम प्रवाह वाले फव्वारों, बहुत कम फ्लश वाले शौचालय, नल जलवाहक, खाद शौचालयों का प्रयोग करके बचत की जा सकती है।

 राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण अभियान भारत में ऊर्जा संरक्षण की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए विद्युत मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया। भारत में पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान एसोसिएशन वर्ष 1977 में भारत सरकार द्वारा भारतीय लोगों के बीच ऊर्जा संरक्षण और कुशलता को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था। ये ऊर्जा का संरक्षण महान स्तर पर करने के लिये भारत सरकार द्वारा उठाया गया बहुत बड़ा कदम है। बेहतर ऊर्जा कुशलता और संरक्षण के लिए भारत सरकार ने एक अन्य संगठन ऊर्जा दक्षता ब्यूरों को भी 2001 में स्थापित किया गया।

ऊर्जा संरक्षण दिवस वस्तुतः एक राष्ट्रीय जागरूकता अभियान दिवस है। लेकिन जैसा कि हमारी प्रवृत्ति है कि चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या सरकारी स्तर पर, दिवस मनाने के बाद हम अपने सारे संकल्प भूल जाते हैं और सारी योजनाएं ठंडे-बस्ते में बांध देते हैं। लेकिन अब वह समय आ ही गया है कि हमें ऊर्जा की उपलब्धता एवं ऊर्जा स्रोतों के प्रति गंभीर होना होगा। हमें लापरवाही और अनदेखा करने की अपनी प्रवृत्ति को बदला होगा। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को खाली कोयला खदानें और तेल के रिक्त कुए सौंपने के बजाए उन्हें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, सागरीय ऊर्जा के कभी न खाली होने वाले भंडार सौंप कर जाएं। विशेष रूप से सौर ऊर्जा का वह भंडार, जिससे दैनिक जीवन में भी सस्ती और सुगम ऊर्जा मिलती रहे।                                                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 05.08.2026 को प्रकाशित)  
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Wednesday, July 29, 2026

चर्चा प्लस | प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  

प्रेमचंद की कहानियों में मौजूद है बुंदेलखंड का इतिहास और संस्कृति 

 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

                                      

    प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना।


31 जुलाई 1880 को जन्मे प्रेमचंद को हिन्दी साहित्य का ‘कथा सम्राट’ कहा जाता है। प्रेमचंद ने ‘‘नवाबराय’’ के नाम से उर्दू में साहित्य सृजन किया। यह नवाबराय नाम उन्हें अपने चाचा से मिला था जो उनके बचपन में उन्हें लाड़-प्यार में ‘‘नवाबराय’’ कह कर पुकारा करते थे। किन्तु अंग्रेज सरकार के कारण उन्हें अपना लेखकीय नाम ‘‘नवाबराय’’ से बदलकर ‘‘प्रेमचंद’’ करना पड़ा। हुआ यह कि उनकी ’सोज़े वतन’ (1909, ज़माना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियां तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने ज़ब्त कर लीं। उर्दू अखबार “ज़माना“ के संपादक मुंशी दयानरायण निगम ने उन्हें सलाह दी कि वे सरकार के कोपभाजन बनने से बचाने के लिए ‘‘नबावराय’’ के स्थान पर ’प्रेमचंद’ लिखने लगें। इसके बाद वे ‘‘प्रेमचंद’’ के नाम से लेखनकार्य करने लगे। 

प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।

‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया। जुझार सिंह मुगल शासक शाहजहां के समकालीन थे। वे साहसी थे, वीर थे किन्तु उनकी संदेही प्रवृत्ति उनके इन गुणों को लांछित कर गई। इस वास्तविक घटना का सारांश यह है कि जब जुझार सिंह अपने दक्षिण भारत के अभियान पर गए तब उनका छोटा भाई हरदौल अपनी भाभी रानी कुलीना के साथ राज्य सम्हाल रहा था। दोनों का रिश्ता माता-पुत्र जैसा था। किन्तु कुछ ईर्ष्यालुओं ने जुझार सिंह के वापस आते ही रानी और हरदौल के मध्य अनैतिक संबंधों की चर्चा कर के जुझाार सिंह को भ्रमित कर दिया। संदेही जुझार सिंह अपने भाई और अपनी पत्नी की पवित्रता को नहीं देख सका और उसने अपनी पत्नी रानी कुलीना को आदेश दिया कि वह अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए हरदौर को विष खिला दे। रानी स्तब्ध रह गई। अपने पुत्र समान देवर को जहर देना उसके लिए कठिन था। तब हरदौल ने अपनी भाभी को समझाया की सम्मान से बड़ा जीवन नहीं होता है, वे विष मिला भोजन परोस दें। अंततः रानी के द्वारा विष मिले भोजन को खा कर हरदौल ने अपना बलिदान दे दिया। यह भी कथा है कि जुझार सिंह ने रानी द्वारा भोजन में विष न दे पाने के कारण रानी से ही विष मिला पान का बीड़ा बनवा कर हरदौल को खिला दिया था जिससे हरदौल की मृत्यु हो गई थी। ओरछा में लाला हरदौल की समाधि आज भी मौजूद है और यह परम्परा है कि बुंदेलखंड में विवाह का पहला कार्ड लाला हरदौल का नाम लिख कर उनकी समाधि पर पहुंचाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से लाला हरदौल वधूपक्ष के घर वधू के मामा के रूप में आते हैं और विवाह निर्विघ्न सम्पन्न होता है।   

प्रेमचंद ने पान में विष मिला कर देने की कथा को अपनी कहानी में पिरोया है। उन्होंने ‘राजा हरदौल’ कहानी इन पंक्तियों से आरम्भ की है, ‘‘बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है।’’ 

वे बुंदेलों के चरित्र की विशेषताओं को सामने रखते हुए हरदौल की ओर से यह संवाद लिखते हैं कि ‘खबरदार, बुंदेलों की लाज रहे या न रहे; पर उनकी प्रतिष्ठा में बल न पड़ने पाए- यदि किसी ने औरों को यह कहने का अवसर दिया कि ओरछे वाले तलवार से न जीत सके तो धांधली कर बैठे, वह अपने को जाति का शत्रु समझे।’ वहीं जुझार सिंह युद्ध के लिए विदा लेते समय अपनी रानी से कहता है, ‘प्यारी, यह रोने का समय नहीं है। बुंदेलों की स्त्रियां ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं।’ इसी कहानी में प्रेमचंद ने एक ऐसी स्त्री के मनोभावों को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है जो अपने पुत्र, अपने भाई सरीखे देवर को विष देने के लिए विवश की जा रही है- ‘‘ रानी सोचने लगी, क्या हरदौल के प्राण लूं? निर्दोष, सच्चरित्र वीर हरदौल की जान से अपने सतीत्व की परीक्षा दूं? उस हरदौल के खून से अपना हाथ काला करूं जो मुझे बहन समझता है? यह पाप किसके सिर पड़ेगा? क्या एक निर्दोष का खून रंग न लाएगा? आह! अभागी कुलीना! तुझे आज अपने सतीत्व की परीक्षा देने की आवश्यकता पड़ी है और वह ऐसी कठिन? नहीं यह पाप मुझसे नहीं होगा। यदि राजा मुझे कुलटा समझते हैं, तो समझें, उन्हें मुझ पर संदेह है, तो हो। मुझसे यह पाप न होगा। राजा को ऐसा संदेह क्यों हुआ? क्या केवल थालों के बदल जाने से? नहीं, अवश्य कोई और बात है। आज हरदौल उन्हें जंगल में मिल गया। राजा ने उसकी कमर में तलवार देखी होगी। क्या आश्चर्य है, हरदौल से कोई अपमान भी हो गया हो। मेरा अपराध क्या है? मुझ पर इतना बड़ा दोष क्यों लगाया जाता है? केवल थालों के बदल जाने से? हे ईश्वर! मैं किससे अपना दुख कहूं? तू ही मेरा साक्षी है। जो चाहे सो हो, पर मुझसे यह पाप न होगा।’’

बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारंधा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे। मुसलमानों की सेनाएं बार-बार उन पर हमले करती थीं पर हार कर लौट जाती थीं।’ 

‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बंुदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। कहानी के आरंभ में ही वे लिखते हैं-‘‘ अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियां। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गांव है। यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’’ प्रेमचंद ने बुंदेलखंड की स्त्री के आत्मसम्मान को बखूबी परखा और फिर उसे इन शब्दों में व्यक्त किया-‘‘ वायुमण्डल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थीं। ओरछे के किले से बुन्देलों की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा दे कर कहा-बुन्देलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है।’’

प्रेमचंद ने रानी सारंधा की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए इस तथ्य को अपनी कहानी में सुंदर ढंग से पिरोया है कि रानी सारंधा ने राजा चम्पतराय के मन में स्वाभिमान को पुनःजाग्रत किया। उन्होंने लिखा है-‘‘ सारंधा-ओरछे में मैं एक राजा की रानी थी। यहां मैं एक जागीरदार की चेरी हूं। ओरछे में वह थी जो अवध में कौशल्या थीं यहां मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री हूँ। जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं वह कल आपके नाम से कांपता था। रानी से चेरी हो कर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है। आपने यह पद और ये विलास की सामग्रियां बड़े महंगे दामों मोल ली हैं।’’ चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया। वे अब तक सारंधा की आत्मिक उच्चता को न जानते थे। जैसे बे-मां-बाप का बालक मां की चर्चा सुन कर रोने लगता है उसी तरह ओरछे की याद से चम्पतराय की आंखें सजल हो गयीं। उन्होंने आदरयुक्त अनुराग के साथ सारंधा को हृदय से लगा लिया।’’

प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।                 -----------------------

(दैनिक, सागर दिनकर में 29.07.2026 को प्रकाशित)  

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Wednesday, July 22, 2026

चर्चा प्लस | फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
फुटबॉल की दुनिया सिखाती है कि मेहनत से भाग्य बदला जा सकता है       
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह   
                                                               
  यदि यह कहा जाए के विश्व कप में खेलने वाला हर खिलाड़ी अरबों डॉलर का धनी है तो यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु यह जान कर अवश्य आश्चर्य होगा कि इनमें से कई प्रसिद्ध खिलाड़ी वे हैं जिनका बचपन भूख और गरीबी में कटा। इनके पास अपने जूते तक नहीं थे, फुटबॉल नहीं थी और तो और भरपेट खाना भी नहीं था। लेकिन वे अपनी मेहनत के दम पर आज फुटबॉल के साम्राज्य के मिलेनियर हैं। उनमें से कई अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन स्थानों के विकास में दान कर रहे हैं जहां उनका बचपन अभाव और गरीबी में बीता था।


    20 जुलाई 2026 का अर्थात इसी माह में फीफा वर्ल्ड कप 2026 का समापन हुआ। एक नए इतिहास के साथ। जिसमें 16 वर्ष बाद स्पेन ने वर्ल्ड कप जीत कर अर्जेंटीना की उम्मींदों पर पानी फेर दिया और उनके स्टार खिलाड़ी लियोनेल आंद्रेस मेसी के अंतिम वर्ल्डकप को पराजय का उपहार दे दिया। लेकिन खेल तो खेल होता है। कोई हारता है तो कोई जीतता है। अर्जेंटीना हारा और स्पेन जीता। किन्तु विश्व कप में शामिल लगभग हर टीम के लिए एक बात अपराजित रही कि उनमें कई खिलाड़ी ऐसे थे जिन्होंने अपने जीवन में भूख और अभाव झेला था पर मेहनत के बल पर वे अपनी किस्मत बदल सके। 
      विश्व फुटबॉल में कई महान खिलाड़ियों ने अत्यधिक गरीबी से उठकर खेल की दुनिया में सर्वाेच्च स्थान, प्रशंसकों का प्यार और अपार धन प्राप्त किया है। इन खिलाड़ियों ने फटे-पुराने कपड़े की बॉल बना कर अपने जीवन में फुटबॉल को स्थान देते हुए सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वे विश्व कप के सितारे बन कर चमकेंगे। फुटबॉल के वे महान खिलाड़ी जो अत्यंत गरीबी से उठकर आए उनमें सबसे पहला नाम आता है ‘‘द किंग ऑफ फुटबॉल’’ कहे जाने वाले ब्राजील के महान खिलाड़ी पेले का। उनका जन्म ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनका बचपन इतनी गरीबी में बीता कि वे जूते तक नहीं खरीद पाते थे और अक्सर मोजे में अखबार भरकर फुटबॉल खेलते थे। कई बार वह स्थिति आई जब उन्होंने उबले आलू के छिलके खा कर अपना पेट भरा। यह फुटबॉल के उनके कौशल का कमाल था कि गरीबी से निकलकर उन्होंने ब्राजील को तीन बार फीफा विश्व कप जिताया।
        महान फुटबॉलर पेले का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी, कड़े संघर्ष और फुटबॉल के प्रति अटूट जुनून से भरा हुआ था। पेले का वास्तविक नाम था एडिसन अरंतस डो नैसिमेंटो। उनका यह नाम महान अमेरिकी आविष्कारक थॉमस एडिसन के नाम पर रखा गया था। पेले का ‘‘पेले’’ नाम पड़ने का भी एक दिलचस्प किस्सा है। बचपन में उनका निकनेम ‘‘डिको’’ था। उनके पसंदीदा खिलाड़ी स्थानीय क्लब के गोलकीपर थे जिनका नाम ‘‘बेले’’ था। बचपन में पेले इस नाम का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे और अनजाने में उन्हें ‘‘पेले’’ बोलते थे। उनके दोस्तों ने उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें ‘‘पेले’’ बुलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में पेले को यह नाम बिल्कुल पसंद नहीं था और वे चिढ़ जाते थे, लेकिन बाद में यही नाम इतिहास बन गया।
पेले का जन्म 23 अक्टूबर 1940 को ब्राजील के मिनस गेरैस के एक छोटे से कस्बे ट्रैस कोराकोस में हुआ था। उनके पिता का नाम डोडिन्हो था, जो खुद एक स्थानीय फुटबॉल खिलाड़ी थे, लेकिन घुटने की गंभीर चोट के कारण उनका करियर खत्म हो गया था। उनकी माँ का नाम सेलेस्टे अरांटस था। उनकी माली हालत बहुत खराब थी। पेले का बचपन भयंकर गरीबी में बीता। उनका परिवार ब्राजील के बाऊ शहर में एक बेहद तंग झोपड़ी जैसे मकान में रहता था, जहां अकसर उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे। परिवार का हाथ बंटाने के लिए छोटी आयु में ही पेले चाय की दुकानों पर बर्तन धोने और रेलवे स्टेशन पर जूते पॉलिश करने का काम करना पड़ा। फिर भी फुटबॉल के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। फुटबॉल खेलने के लिए जूते होना जरूरी थे लेकिन पेले के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे एक जोड़ी जूते खरीद सकें। उनके साथी लड़के जूते पहन कर फुटबॉल खेलते मगर पेले उनके साथ नंगे पैर ही खेला करते थे। इससे उनके पैरों में चोट लगती रहती थी। लेकिन वे चोटें फुटबॉल के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर सके। फुटबॉल की असली बॉल खरीदना उनके लिए एक सपना था। इसलिए, वे फटे हुए पुराने मोजों के अंदर अखबार या फटे कपड़े ठूंसकर, उन्हें रस्सी से बांधकर फुटबॉल बनाते थे और गलियों में खेला करते थे। पेले ने गलियों में खेलते हुए ‘‘बाऊ: एथलेटिक क्लब’’ की जूनियर टीम में जगह बनाई। वहाँ उन्होंने अपनी जादुई ड्रिबलिंग से सबको हैरान कर दिया। जिससे ब्राजील के पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी वाल्डेमार डी ब्रिटो ने पेले की छिपी हुई प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने पेले को ट्रेनिंग दी और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्हें ब्राजील के बड़े क्लब ‘‘सैंटोस एफसी’’ के ट्रायल के लिए ले गए। ब्रिटो ने सैंटोस के निदेशकों से कहा था कि ‘‘यह लड़का दुनिया का सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी बनेगा।’’
पेले ने अपनी मेहनत से अपने मेंटोर ब्रिटो की भविष्यवाणी को सच कर दिखाया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मात्र 17 साल की उम्र में 1958 के विश्व कप में ब्राजील को चैंपियन बनाकर साबित कर दिया कि मेहनत एक गरीब को भी दुनिया का बेताज बादशाह बना सकती है।
     अर्जेंटीना के डिएगो माराडोना भी एक ऐसे ही खिलाड़ी हुए जिनका बचपन भीषण गरीबी में बीता। फुटबॉल इतिहास के सबसे जादुई खिलाड़ियों में से एक, माराडोना का जन्म अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स के एक बहुत ही गरीब इलाके यानी स्लम बस्ती में हुआ था। वे अपने 8 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने पैसों की कमी से जूझते हुए अपना बचपन बिताया। उनके माता-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मेराडोना को एक अच्छा फुटबॉल, जूते या जर्सी दिला पाते। किन्तु ये कमियां मेराडोना के मनोबल को तोड़ नहीं सकीं। उन्होंने अपने खेल कौशल को निरंतर चमकाया और अपनी असाधारण ड्रिबलिंग के बल पर दुनिया के सबसे महान खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई।
   पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो आज विश्व के महानतम खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उनका बचपन भी बेहद गरीबी में बीता। वे पुर्तगाल के मदीरा में एक छोटे से घर में पले-बढ़े, जहाँ आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनकी माँ उनके जन्म से पहले गर्भपात तक करवा लेना चाहती थीं। उनके पिता माली का काम करते थे जिसमें उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उस पर उनके पिता को शराब पीने की लत थी जिससे उनके कमाए पैसों में से अधिकांश शराब की भेंट चढ़ जाते थे। शराब की लत के कारण घर की स्थिति काफी खराब थी। कई बार पूरे परिवार को आधापेट खा कर रह जाना पड़ता था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो को फुटबॉल से प्यार था और वे सारी मुश्किलों से जूझते हुए फुटबॉल में अपने कौशल को चमकाते रहे। यह उनकी मेहनत ही थी जिसके दम पर उन्होंने पुर्तगाल के उच्चकोटि के खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बनाई और आज उनका नाम  दुनिया के सबसे सफल और अमीर खिलाड़ियों में गिना जाता हैं।
    स्पेन के लामिन यमाल का नाम इस समय हर फुटबॉल प्रेमी के दिल में है। हाल के वर्षों में वे विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े स्टार के रूप में सामने आए। यमाल का बचपन भी अत्यंत गरीबी में बीता। उनका परिवार स्पेन के जिस इलाके में रहता था, वहाँ की आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती थी और उनके पिता परिवार का पेट पालने के लिए कड़ा संघर्ष करते थे। उस समय वे लामिन यमाल को फुटबॉल खेलने पर झिड़का भी करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि खेलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। तब उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके बेटे की मेहनत उनके बेटे को फुटबॉल के आकाश का चमकता सितारा बना देगी और पैसों की बरसात करेगी। 
        ज्लाटन इब्राहिमोविच यूं तो स्विडिश फुटबॉलर के नाम से जाने जाते हैं किन्तु उनके माता-पिता बोस्निया और क्रोएशिया से आए अप्रवासी थे। ज्लाटन  का बचपन भूख और अभावों में गुजरा। वे माल्मो के एक ऐसे गरीब इलाके में पले-बढ़े जहां अपराध का बोलबाला था। वहां के बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख कर अपने सपने पूरा करने की कोशिश करते थे। ज्लाटन के पिता की आमदनी अच्छी नहीं थी। कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। ऐसे विपरीत वातावरण में ज्लाटन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दम पर अपने व्यक्तित्व को सही राह दी। उन्होंने पहले ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट हासिल किया लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम और समर्पण उनका करियर बना। विश्व कप में खेल कर उन्होंने साबित कर दिया कि यदि मेहनत और हौसला हो तो हालात बदले जा सकते हैं।
सेनेगल के सादियो माने भी एक ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने बचपन में अथाह गरीबी झेली और आगे चल कर एक महान फुटबॉलर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सेनेगल के बाम्बली गांव के सादियो माने का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके पास खेलने के लिए न तो फुटबॉल था और न जूते। उन्होंने गांव के मैदानों में नंगे पैर फुटबॉल खेलकर अपना सफर शुरू किया। आज वे विश्व के बेहतरीन विंगर्स में से एक हैं। उनकी विशेषता यह भी है कि वे जिस गांव से उठ कर उंचाइयों तक पहुंचे उस गांव के विकास के लिए और वहां और स्कूलों के निर्माण एवं व्यवस्था के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दान में देते हैं।
      स्पेन की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम में हाल के इतिहास में सबसे गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी लामिन यमाल हैं। वे स्पेन के बार्सिलोना के पास स्थित रोकाफोंडा नामक इलाके में पले-बढ़े हैं, जिसे स्पेन के सबसे पिछड़े और गरीब पड़ोसों में से एक माना जाता है, जहाँ की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लामिन यमाल की माँ इक्वेटोरियल गिनी से और पिता मोरक्को से आए अप्रवासी थे। जब यमाल का जन्म हुआ, तब उनकी माँ की उम्र महज 16 वर्ष थी। उनके पिता सड़कों पर कचरा और सामान बीनने का काम करते थे ताकि परिवार को भोजन मिल सके। शुरुआती दिनों में उनका परिवार एक ऐसे कम्यूनल सेंटर (सामूहिक आवास) में रहता था जहां सबको मुफ्त भोजन दिया जाता था। बाद में वे कुछ समय दोस्तों के घरों में एक कमरा लेकर रहे। जब वे पहली बार बार्सिलोना की मशहूर एकेडमी ‘‘ला मासिया’’ पहुंचे, तो उनके पास खुद के स्पोर्ट जूते तक नहीं थे। वहाँ के कोच ने उन्हें पुराने जूते खरीद दिए जो उनके पैरों से बड़े साईज़ के थे। पर वे डटे रहे। अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर वे मात्र 15-16 साल की उम्र में स्टार बन गए। आज वे बार्सिलोना और स्पेन की टीम के सबसे मुख्य खिलाड़ियों में से एक हैं और उन्होंने अपनी कमाई से अपने माता-पिता और दादी के लिए आलीशान घर खरीद दिया है।
इन खिलाड़ियों की कहानी यह साबित करती है कि प्रतिभा और असीम मेहनत के आगे विपरीत परिस्थितियां और गरीबी भी हार मान लेती है। वहीं यह भी मानना होगा कि फुटबॉल ने ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए आकाश दिया। क्रिकेट या टेनिस की दुनिया में भले ही ऐसे उदाहण कम ही मिलते हों किन्तु फुटबॉल की दुनिया में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि मेहनत करने वाला अपनी ज़िन्दगी की दिशा मोड़ सकता है और भुखमरी से अपना सफर शुरू कर के भी उस सम्पन्नता तक पहुंच सकता है जहां वह दूसरों की भलाई के लिए दान करने में सक्षम हो सके।                                        -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 22.07.2026 को प्रकाशित) 
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Thursday, June 25, 2026

चर्चा प्लस | हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
हिन्दू मंदिरों में बढ़ता ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ बनाम असली भक्त      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                           
      विशेष रूप से उत्तर भारत में मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन कल्चर’’ अपने पांव पसारता जा रहा है। यदि आप राजनीतिक, प्रशासनिक रूप से या पैसों से पॉवरफुल हैं तो आपको उन मंदिरों में भी गर्भगृह तक जाने और देवप्रतिमा के निकट पहुंच कर दर्शन करने की सुविधा मिल जाएगी जहां आमजन के लिए प्रवेश निषेध है। क्या ईश्वर की निकटता पैसों और पॉवर से बंधी हुई है? हम श्रीमदभगवद्गीता पढ़ते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उसकी शपथ भी लेते हैं, हम वेद, पुराण पढ़ते-सुनते हैं और प्रवचनों में उनके उद्धरण सुन कर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। क्या कभी हमने ध्यान से पढ़ा है कि भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने किसे असली भक्त और अपना प्रिय बताया है? ‘‘ऋग्वेद’’ में किसे ईश्वर का प्रिय बताया गया है? या फिर क्या हमने कभी ध्यान दिया गया है कि ‘‘रामचरित मानस’’ में किसे असली भक्त कहा गया है? इन सबको समझे बिना यदि हम मंदिरों में ईश-दर्शन पर वीआईपी संस्कृति थोपते जाएंगे तो हम अपने धर्म का भी व्यवसायीकरण करते जाएंगे। जबकि धर्म आस्था है बाजार नहीं।  
यह तो सभी ने देखा होगा कि नवरात्रि अथवा विशेष हिन्दू पर्वों में ग्रामीण अथवा आर्थिकरूप से कमजोर तबके के लोग, चाहे वे स्त्री हो या पुरुष ईश्वर की आस्था से प्रेरित हो कर धर्म ध्वज उठाए पैदल निकल पड़ते हैं मंदिरों की ओर। कुछ लोग तो डामरीकृत अथवा सीसीरोड पर तपन की परवाह किए बिना लेट-लेट कर अपने घर से मंदिर तक की दूरी तय करते हैं। कांवरियों के बारे में तो सभी जानते हैं। जिस प्रकार श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को ईशस्थल के दर्शन कराने के लिए कांवर में उन्हें ढोया था ठीक वैसे ही एक पलड़े में आस्था और दूसरे पलड़े में ईश्वर के प्रति प्रेममय समर्पण रख कर कांवरियां निकल पड़ते हैं। इस प्रकार के समर्पित भक्तों को जिनके मन में श्रद्धा और भक्ति हिलोरें लेती रहती हैं क्या वीआईपी दर्शन मिलते हैं? उत्तर होगा ‘नहीं!’ क्योंकि ये विशुद्ध भक्त हैं, धनपति, पॉवरपति या प्रशासनपति नहीं। इन्हें गर्भगृह में प्रवेश करने की अनुमति कभी नहीं होती है। 

हर वर्ष नवरात्रि पर मैं अपनी आंखों से देखती हूं कि किस प्रकार वीआईपी कल्चर उन मंदिरों में भी प्रवेश पा चुका है जहां पहले हर प्रकार के भक्त को कदम रखने की अनुमति थी। पिछले वर्ष की नवरात्रि की घटना है, मैं रानगिर मंदिर दर्शन करने गई थी। रास्ते में मैंने अनेक ऐसे भक्त देखे जो माता का ध्वज पैदल जा रहे थे। उनमें कुछ ऐसे भी थे जो सड़क पर दंडवत लेट-लेट कर रस्ता तय कर रहे थे। आस्था का घोर समर्पित रूप जिसमें श्रद्धालु स्वयं को कष्ट पहुंचाता है ताकि देवी को प्रसन्न कर सके। देवी के दर्शन कर के उसकी कृपा पा सके। किन्तु मंदिर में पहुंच कर लंबी लाईन में लगने के बाद भी उसे वह निकट दर्शन नहीं मिलते हैं जो एक विधायक, मंत्री, कमिश्नर, कलेक्टर या किया धन सम्पन्न व्यक्ति को सुगमता से मिलते हैं। क्या कष्ट उठा कर पहुंचने वाले भक्त की भक्ति में कोई कमी है और शक्ति सम्पन्न भक्त की भक्ति विशिष्ट है? दोनों की भक्ति में कोई अंतर होता तो नहीं है लेकिन बना दिया जाता है। फिर भी यदि बारीकी से धर्म के पलड़े पर तौला जाए तो कष्ट उठा कर आने वाले भक्त का पलड़ा भारी ही रहेगा। फिर भी उसे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं मिलेगा, जबकि एक वीआईपी को तत्काल मिल जाएगा। जब ईश्वर अपने भक्तों में भेद-भाव नहीं करता है तो हमारे मंदिरों में इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है?

इस बात का आशय यह नहीं है कि हर व्यक्ति को मंदरों के गर्भगृह में प्रवेश दिया जाए। यदि सुरक्षा कारणों से यह उचित नहीं है तो प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। मंदिर के पुरोहित या पुजारी आदि को ही यह अनुमति मिलनी चाहिए। हर भक्त एक निश्चित दूरी से ईशप्रतिमा के दर्शन करे। लेकिन ‘‘हर भक्त’’। इस नियम को कोई वीआईपी भी न तोड़ सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। क्या यह उचित नहीं होगा? कि या तो हर भक्त को प्रवेश मिले अथवा किसी भी भक्त को प्रवेश न मिले। ईश्वर के दरबार में सभी एक समान महसूस कर सकें। यही धर्मोचित व्यवस्था कहलाएगी।  

ईश्वर का प्रिय भक्त कौन है और उसकी क्या विशेषता होनी चाहिए इस बारे में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में स्पष्ट उल्लेख है कि ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त है जो निस्वार्थ, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान रहता है और निरंतर प्रभु के प्रति समर्पित होता है। ‘‘गीता’’ के 12वें अध्याय के 13वें और 14वें श्लोक में स्पष्ट कहा किया कि -
श्लोकःअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्याे मद्भक्तः स मे प्रियः।।
 - अर्थात जो व्यक्ति किसी भी जीव से द्वेषभाव नहीं रखता, सब प्राणियों का मित्र और दयालु है, ममता से युक्त, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समान (शांत) रहने वाला और क्षमाशील है। जो योगी निरंतर संतुष्ट है, जिसने मन और इंद्रियों को वश में कर रखा है, जिसका मन और बुद्धि मुझमें अर्पित हैं, ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
इसी प्रकार गीता के 12वें अध्याय का 15वां श्लोक है कि 
‘‘रूयस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोड्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।
- अर्थात जिससे किसी भी जीव को कष्ट नहीं होता, जो किसी जीव से स्वयं भी भयभीत नहीं होता, और जो हर्ष (अत्यधिक ख़ुशी), अमर्ष (ईर्ष्या/क्रोध), भय तथा उद्वेगों से मुक्त है, वह भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है।
गीता के 12वें अध्याय का 16वां श्लोक इस संबंध में और अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि-
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।
- अर्थात जो भक्त सांसारिक कामनाओं से रहित, भीतर-बाहर से पवित्र, कार्य करने में कुशल, पक्षपातरहित, दुखों से मुक्त है और जिसने सभी आरंभों (कर्मों के फलों की चाहना) का त्याग कर दिया है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है।
भगवद गीता के अलावा, अन्य हिंदू धर्मग्रंथों जैसे रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पुराण और ऋग्वेद में भी ईश्वर के प्रिय भक्त के गुणों और लक्षणों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में उन लोगों को ईश्वर का प्रिय बताया गया है जो सत्य मार्ग पर चलते हैं और ईश्वर की स्तुति करते हैं। देखिए ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 31, श्लोक 6 -
सत्यं वदन्तं कवयः पृच्छन्ति 
नयन्ति धीराः सुकृताय लोकं।।
- अर्थात जो मनुष्य हमेशा सत्य का आचरण करता है, सत्य बोलता है, वही बुद्धिमान, श्रेष्ठ और ईश्वर का प्रिय है। ऐसे ही सच्चे ज्ञानी मनुष्य को ईश्वर उत्तम लोक तक ले जाते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार ईश्वर का सबसे प्रिय वह भक्त होता है जो निष्कपट, अहंकारहीन हो और सांसारिक दिखावे से दूर रहकर निष्काम भाव से प्रभु के प्रेम में लीन रहता है। इस संबंध में श्रीहरि और नारद मुनि की एक बहुत प्रसिद्ध पौराणिक कथा है। श्रीमद्भागवत पुराण इस ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण प्रह्लाद के चरित्र के माध्यम से बताते हैं कि ईश्वर का प्रिय कौन है? (स्कंध 7, अध्याय 14)-
निर्ममा निरहङ्काराः समदुःखसुखाः सुहृदः।
निःसङ्गाः सर्वतो येषां मयि सन्निवेशितं मनः।।
- अर्थात जो ममता और अहंकार से रहित हैं, सुख-दुख में समान हैं, सब प्राणियों के सच्चे हितैषी (सुहृद) हैं, आसक्तिहीन हैं और जिनका मन पूरी तरह से मुझमें (परमात्मा में) लगा हुआ है, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

तुलसीदासकृत ‘‘रामचरितमानस’’ में प्रभु श्रीराम ने शबरी को बताते हुए ईश्वर के प्रिय के लक्षण स्पष्ट किए हैं। रामचरितमानस में यह प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। देखिए अरण्यकाण्ड, दोहा 35-36, रामचरित मानस -
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। 
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
करम बचन मन राउर चेरा। 
सोइ जनु मोर परम प्रिय नेरा।।
-अर्थात जिसका मन निष्कपट और निर्मल होता है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है। मुझे छल-कपट और दूसरों में दोष (छिद्र) ढूँढना बिल्कुल पसंद नहीं है। जो मनुष्य कर्म, वचन और मन से मेरा (ईश्वर का) दास है, वही मेरा परम प्रिय है। 

संत रैदास की भक्ति मुख्य रूप से दास्य भाव और बिना शर्त समर्पण पर आधारित है। उनके अनुसार ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि शुद्ध मन और प्रेम से प्राप्त होती है। इसीलिए तो वे कहते हैं कि ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’’ संत कबीर ने अपनी रचनाओं में ईश्वर भक्ति के नाम पर होने वाले आडंबरों, दिखावे और कर्मकांडों का घोर विरोध किया है। उनके अनुसार, ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे मंदिरों या मस्जिदों में नहीं, बल्कि सच्चे मन और प्रेम में बसते हैं। चाहे रैदास हों या कबीर यही कहते हैं कि ईश्वर की निकटता आडम्बरहीन रहने में है, आडम्बरों नहीं। 

दरअसल, मंदिरों में ‘‘वीआईपी दर्शन’’ एक ज्वलंत विषय है। ईश्वर के दरबार में सभी भक्तों को समान माना जाना चाहिए, लेकिन वीआईपी संस्कृति के तहत प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं और अधिकारियों को विशेष सुविधाएँ मिलती हैं, जिससे आम जनता को घंटों लाइनों में इंतजार करना पड़ता है। मद्रास हाईकोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि भगवान के सामने सभी भक्त बराबर हैं। अदालतों का मानना है कि मंदिरों में विशेषाधिकार की बजाय समानता का भाव होना चाहिए। जहां वीआईपी कुछ ही मिनटों में दर्शन करके लौट जाते हैं, वहीं आम श्रद्धालुओं को कई घंटों तक लंबी और थका देने वाली कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। वीआईपी आगमन के समय अक्सर आम कतारों को रोक दिया जाता है या सुरक्षाकर्मियों को आम जनता से धक्का-मुक्की करनी पड़ती है, जिससे भगदड़  का खतरा बढ़ जाता है। कई मंदिरों में वीआईपी और विशेष दर्शन के लिए अलग-अलग राशि तय कर दी गई है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भक्ति भी अब एक व्यापार बन चुकी है। 
जबकि सिख धर्म में ऐसा नहीं है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां किसी भी प्रकार का वीआईपी या प्राथमिकता पास नहीं होता। सभी को एक ही आम कतार से गुजरना पड़ता है। अन्य गुरु़द्वारे भी इसका पालन करते हैं। फिर हिन्दू मंदिरों में वीआईपी कल्चर की अपसंस्कृति को क्यों घुसपैंठ करने दिया जा रहा है? इससे हिन्दू धर्म को ही ठेस पहुंच रही है। वैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वीआईपी दर्शन जैसी कोई सुविधा देनी ही है तो वह वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों  और अतिआवश्यक संवैधानिक पदों तक ही सीमित रखना चाहिए। बहरहाल, इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार किया जाना जरूरी है।                          -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 25.06.2026 को प्रकाशित)  
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Wednesday, June 10, 2026

चर्चा प्लस | प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
प्रदेश सरकार की लोकहित योजनाओं का कितना ज्ञान है लोक को       
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                          

     यदि मध्यप्रदेश में सरकारी योजनाओं को देखा जाए तो मन खुश हो जाता है। ‘‘अच्छे दिन’’ का सपना साकार होने की संभावना बढ़ जाती है। किन्तु विडम्बना यह है कि लोकहित की योजनाएं जितनी चुस्त-दुरुस्त हैं उनका क्रियान्वयन उतना ही सुस्त है। यदि सुस्त नहीं होता तो प्रदेश की तस्वीर आज कुछ और होती। बेशक तस्वीर बदल रही है किन्तु उस गति से नहीं जिस गति से बदलनी चाहिए थी। यहां तक कि जिनके लिए योजनाएं हैं उन्हें भी सभी लाभकारी योजनाओं का ज्ञान नहीं है। सुशिक्षित लोगों को भी नहीं। यह सोचने का विषय है कि इस खामी का जिम्मेदार कौन है?


हाल ही में एक सीनियर सिटिजन से मेरी चर्चा हो रही थी। मैंने उनसे पूछा कि आपने अपना सीनियर सिटिजन कार्ड बनवाया कि नहीं? वे मेरा मुंह ताकने लगे। उन्हें ऐसे किसी भी कार्ड की जानकारी नहीं थी। हां, आयुष्मान योजना की जानकारी अवश्य थी जिसके लिए उन्होंने आह भरते हुए कहा कि ‘‘अभी तो मैं पैंसठ का ही हुआ हूं। अभी मुझे आयुष्मान योजना के लिए पांच साल और इंतजार करना पड़ेगा, यदि तब तक मैं जिन्दा रहा।’’ दरअसल वे नौकरी पेशा नहीं रहे। उनका अपना छोटा-सा व्यवसाय था। उनके बच्चे पढ़-लिख कर मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी पर चले गए हैं। अब पति-पत्नी ही बचे हैं। दोनों के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आता रहता है। कुछ हद तक उनकी अपनी सेविंग से काम चल जाता है लेकिन जब कोई मंहगे मेडिकल टेस्ट कराने की नौबत आती है तो उन्हें अपने बच्चों से गुहार लगानी पड़ती है। वे अकेले नहीं, अनेक ऐसे सीनियर सिटिजन हैं जो सरकारी सहायता के लिए तरसते रहते हैं। इसका पहला कारण कि उन्हें अधिकांश योजनाओं का पता ही नहीं है। जिन बहुचर्चित, बहुप्रचारित योजनाओं का पता है वे उनके दायरे में नहीं आते हैं। जिन योजनाओं दायरे में आते भी हैं उनका लाभ लेने का रास्ता उन्हें नहीं पता। सभी सीनियर सिटिजन इतने ‘‘इंटरनेट मित्र’’ नहीं हैं कि वे ऑनलाईन आवेदन कर सकें। लगभग यही हाल उन सभी का है जिन्हें इंटरनेट पर सोशल मीडिया के कुछ एप्प चलाने के अलावा और कुछ नहीं बनता है। उन्हें कियोस्क केन्द्रों की शरण में जाना पड़ता है और पैसे खर्च करने पड़ते हैं।
अभी माह भर पहले की बात है मैंने अपने एक परिचित से पूछा कि ‘‘आपको अपनी मध्यप्रदेश सरकार की नवांकुर योजना का पता तो होगा?’’
‘‘ये कौन-सी योजना है?’’ उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की और फिर अटकल लगाते हुए बोले। स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए होगी यह योजना, है न!’’
उनकी इस अटकल पर मुझे हंसी भी आई और रोना भी। प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के बारे में उन उच्चशिक्षित, रोज अखबार पढ़ने वाले व्यक्ति को पता नहीं है तो सामान्य लोगों से तो इसकी उम्मींद करना ही व्यर्थ है। मैं कुछ बोल पाती इसके पहले ही वे बोल उठे ‘‘मुझे तो बस, लाड़ली लक्ष्मी, जननी योजना और वो जो किसानों के बिल-विल माफ कर दिए जाते हैं, बस उन्हीं पता है।’’
उनके इस कथन में दम था क्योंकि जिन योजनाओं को बहुप्रचारित किया जाए, जिनकी तस्वीरें सबसे ज्यादा छापी जाएं उनके बारे में पता रहना स्वाभाविक है। अब हर योजना के लिए फीता काटने मंत्री महोदय तो आएंगे नहीं। फिर बाकी योजनाओं पर बड़ी खबर कैसे बनेगी? और आजकल तो यही चलन है कि जिस पर विवाद हो, टीवी के न्यूज चैनल्स पर वाद-विवाद हो, टॉक-शो हो, वही जानकारी के पन्ने पर अपनी जगह बना पाता है। खैर, बात चली है नवांकुर योजना की तो उस पर एक संक्षिप्त दृष्टि डाल ली जाए। इससे कम से कम मुझे भी इस योजना की प्रमुख बातें याद रह जाएंगी, जिन्हें मैं औरों से शेयर कर सकूंगी। 
दरअसल, नवांकुर योजना का मूल उद्देश्य प्रदेश में समाज एवं शासन के मध्य सेतु के रूप में कार्य करना है। विकास के कार्यों में समाज की सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु यह आवश्यक है कि समाज विकास के विभिन्न विषयों में दक्ष स्वैच्छिक संगठन उपलब्ध हों। अतः विभिन्न विषयों जैसे जल संरक्षण, सबको शिक्षा सहित भारतीय संस्कारों की शिक्षा, नशामुक्ति, सबको स्वास्थ्य, हरियाली/पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता एवं साफ सफाई, ऊर्जा संरक्षण, कृषि को लाभकारी बनाना, कुपोषण एवं परिवार नियोजन, सामाजिक समरसता तथा विवाद रहित समाज/ग्राम आदि पर विशेषज्ञता रखने वाले स्वैच्छिक संगठन प्रत्येक सेक्टर स्तर पर विकसित किये जायेगें। इन स्वैच्छिक संगठनों द्वारा सेक्टर में गठित प्रस्फुटन समितियों को उनके कार्यों में आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान किया जायेगा, वहीं मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास पाठयक्रम के छात्रों को इंटर्नशिप कराई जायेगी तथा पाठयक्रम संबंधी परामर्श प्रदान किया जावेगा। समाज की स्वैच्छिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने हेतु प्रति वर्ष प्रत्येक विकासखण्ड में 05 (प्रत्येक विकासखण्ड में प्रति सेक्टर हेतु 01 नवांकुर संस्था के मान से) का चयन कर प्रति वर्ष प्रोत्साहन राशि रूपये 01.00 लाख निरंतर (कार्य संतोषजनक पाए जाने पर) प्रदान की जावेगी। यह संस्थायें उस विकासखण्ड के सेक्टर हेतु लीड स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करेंगी। इस प्रकार योजनांतर्गत स्वैच्छिक संगठनों के उन्मुखीकरण एवं पोषण हेतु जिला स्तर पर गठित समिति के माध्यम से प्रदेश में 1565 स्वैच्छिक संगठनों का चयन किया जायेगा। है न बेहतरीन योजना। लेकिन यह सब कुछ कितने प्रतिशत होते दिख रहा है, यह विचारणीय है।
वैसे नवांकुर योजना का लक्ष्य है सेक्टर स्तर पर सक्रिय प्रस्फुटन समितियों/नवीन स्वयंसेवी संस्थाओं का उन्मुखीकरण एवं पोषण करना तथा सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में इनकी भागीदारी सुनिश्चित करते हुये आत्म निर्भर मध्यप्रदेश का निर्माण करना। वहीं इसका उद्देश्य है ऐसे स्वैच्छिक संगठन का निर्माण करना जो विकास के प्रमुख विषयों में विशेषज्ञता रखते हो। विकास के प्रमुख विषयों पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने हेतु विषय विशेषज्ञ/स्वैच्छिक कार्यकर्ता तैयार करना। स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से योजनाओं के संचालन हेतु परियोजना निर्माण तथा क्रियान्वयन करना। सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में स्वैच्छिक संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए विकास प्रक्रिया में नागरिक समुदाय को शामिल करना। सामाजिक सुरक्षा एवं समरसता सुनिश्चित् करना। केन्द्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार एवं उनके क्रियान्वयन में सहयोग करना। नवीन व स्थानीय संस्थाओं का पोषण व उनका क्षमतावर्द्धन करना।
चयन हेतु पात्र संस्थाओं के लिए योजनांतर्गत चयन हेतु परिषद की वेबसाइट पर विज्ञप्ति जारी की करने का प्रावधान रखा गया। उन नगर/ग्राम विकास प्रस्फुटन समितियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी रखा गया जिनके द्वारा संबंधित विकासखण्ड अंतर्गत लगातार तीन वर्ष तक कार्य किया गया हो तथा परिषद द्वारा संचालित कार्यक्रमों/अभियानों में उनकी निरन्तर भागीदारी रही हो। यह भी सुनिश्चित किया गया कि म.प्र. फमर््स एवं संस्थायें पंजीकरण अधिनियम 1973 के अंतर्गत वे ही पंजीकृत संस्थाएं मान्य होगी जिनमें 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित विकासखण्ड तथा 50 प्रतिशत सदस्य संबंधित जिले के स्थानीय निवासी हो।
इस सुंदर नवांकुर योजना में नवकरीण ऊर्जा के तहत ऊर्जा साक्षरता अभियान और लोक सेवा प्रबंधन के तहत सी.एम. जनसेवा योजना भी है। यह कितने लोगों को पता है? और नवांकुर की तमाम योजना के अंतर्गत अब तक कितनी प्रगति हुई यह कितने लोगों को पता है? योजना तैयार करने वालों को? कागजी कार्यवाही करने वालों को? जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों एवं जनप्रतिनिधियों को? या फिर इन सबके बारे में कितना पता है उन लोगों को जिनके हित के लिए ये योजनाएं हैं। एक योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’। मेरी एक घरेलू सहायिका यानी कामवाली बहन से बात हुई तो पता चला कि वह अपनी बहू के लिए राजगार ढूंढ रही है लेकिन घर-घर जा कर चौका-बरतन का काम उससे नहीं कराना चाहती है। उसकी बहू को लाड़ली लक्ष्मी और बीपीएल के लाभ मिल रहे हैं किन्तु बिना मेहनत के हाथ आए पैसों का उसे मोल नहीं है। इसीलिए सास चाहती है कि बहू कुछ काम करके भी पैसे कमाए ताकि उसके खर्चों पर लगाम लगे। लेकिन परेशानी ये कि उसकी बहू को घर के कामों के अलावा कुछ नहीं आता है। मैंने उससे कहा कि सरकार की योजना है ‘‘सीखो और कमाओ’’, सो उसे सिलाई सीखने भेजो। वहीं से उसकी कमाई भी शुरू हो जाएगी। इस बारे में उस कामवाली बहन को तनिक भी जानकारी नहीं थी। उसे जानकारी थी तो बस लाड़ली लक्ष्मी योजना की, समूह सहायता योजना ही और साहूकार से कर्जा लेने की। सच तो यह था कि समूह सहायता योजना का वास्तविक स्वरूप भी उसे पता नहीं था। उसने मुझसे पूछा कि वह अपनी बहू को सिलाई सीखने कहां भेजे? सेंटर कहां है? मैं उसे क्या बताती क्योंकि मुझे भी सेंटर के बारे में पता नहीं था। मैंने उसे महिला बाल विकास के दफ्तर का पता बता दिया कि शायद उसे वहां से कोई जानकारी मिल जाए। उसी समय मुझे लगा कि आशा कार्यकर्ता की भांति ऐसी कार्यकर्ताएं भी होनी चाहिए जो योजनाओं की विस्तृत जानकारी घर-घर पहुंचा सकें। 
चलिए बात की जाए योजनाओं के क्रियान्वयन की तो अभी हाल ही में चल रहे जनगणना योजना को ही ले लीजिए। पहली बात तो इसे भरी गर्मी में आरंभ कर दिया गया जिससे गणना करने वालों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। उन्हें चिलचिलाती धूप में दर-दर भटकना पड़ा। उस पर गर्मी की सूनी दोपहर में सब लोग दरवाजा खोलने में भी झिझकते हैं। लिहाजा अभी भी अनेक घर ऐसे हैं जहां गणना करने वाले पहुंचे ही नहीं है, या फिर पड़ोसी से पूछ कर खानापूरी कर बैठे हैं। क्या इससे योजनाओं के लिए सही जानकारी मिल सकेगी? क्या गलत आंकड़ों के आधार पर नई सही योजनाएं बन सकेंगी? वस्तुतः सरकारी योजनाओं में कोई खामी नहीं है लेकिन उनके क्रियान्वयन में अनेक व्यवहारिक खामियां हैं जिन्हें किसी अधिकारी या कर्मचारी को सस्पेंड कर के दूर नहीं किया जा सकता है। खामियां दूर करने के लिए जरूरी है कि लोकहित की योजनाओं को लोक की आवश्यकता के अनुरूप व्यापक बनाया जाए। जिनके लिए यह योजनाएं बनाई जाती हैं उन तक जानकारी की पहुंच बनाई जाए। साथ कुछ योजनाओं को और अधिक व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है तथा मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बदले रोजगार के अवसर बढ़ाने जरूरत है। तभी लोकहितकारी योजनाएं अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त कर सकेंगी और गतिवान बन सकेंगी।    ------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 10.06.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, May 20, 2026

चर्चा प्लस | अब जरूरी है आमजन को जलवायु परिवर्तन के बारे में शिक्षित करना | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
अब जरूरी है आमजन को जलवायु परिवर्तन के बारे में शिक्षित करना       
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
     मौसम में अनियमितताएँ, नई बीमारियों का फैलना, बदलते मौसमी चक्रों का अनाज उत्पादन पर बुरा असर, इंसानों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में बदलाव आदि कुछ ऐसे संकेत हैं जो मानव जीवन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से होने वाले खतरों के प्रति आगाह कर रहे हैं। इसके बावजूद, आम नागरिक अभी भी जलवायु परिवर्तन के बारे में सोचते भी नहीं हैं, क्योंकि उन्हें जलवायु परिवर्तन और इसके खतरनाक प्रभावों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसलिए, आम नागरिकों के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़ी साक्षरता सुनिश्चित करना ज़रूरी है।
पर्यावरण के सभी हिस्सों में से, जलवायु का मानव जीवन पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है। क्योंकि जलवायु का इंसानों के पहनावे, खाने-पीने की आदतों, जीवनशैली और जन-स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत में कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और जलवायु में होने वाले बदलावों से सबसे ज़्यादा प्रभावित होती है। जलवायु हमारे जीवन के लगभग हर पहलू पर असर डालती है - हमारे भोजन के स्रोतों से लेकर हमारे परिवहन के बुनियादी ढांचे तक, हम कैसे कपड़े पहनते हैं, और हम छुट्टियों पर कहाँ जाते हैं, इन सभी पर। इसका हमारी आजीविका, हमारे स्वास्थ्य और हमारे भविष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। जलवायु किसी खास जगह पर मौसम की स्थितियों का लंबे समय तक बना रहने वाला पैटर्न है। इसके अलावा, जलवायु प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई मानवीय गतिविधियों जैसे उद्योग, व्यापार, परिवहन और संचार प्रणाली आदि पर भी असर डालती है।

जलवायु परिवर्तन में इतनी शक्ति है कि यह लोगों के जीवन को तबाह भी कर सकता है और बेहतर भी बना सकता है। समय-समय पर इसके प्रभावों के बारे में कई भविष्यवाणियाँ की गई हैं। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों पर 2018 की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन भूख और विस्थापन का एक मुख्य कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2030 और 2050 के बीच, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले कुपोषण, मलेरिया, दस्त और बढ़ती गर्मी की वजह से होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि होगी। कई कॉर्पाेरेट संस्थानों, अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों आदि ने लोगों के बीच जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता पैदा करने की पहल की है। इन सबके बावजूद, जिस गति से काम होना चाहिए, उस गति से काम नहीं हो रहा है। सरकारी प्रयासों में गरीबी उन्मूलन, स्वच्छता, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों को प्राथमिकता दी जा रही है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रयासों की कमी के कारण ही केरल में बाढ़ आई थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभाव भारत सहित कई विकासशील देशों पर ज़्यादा पड़ेंगे। विश्व बैंक का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन अगले तीस वर्षों में भारत के सकल घरेलू उत्पाद  को 2.8 प्रतिशत तक कम कर देगा, और देश की लगभग आधी आबादी के जीवन स्तर में गिरावट का कारण बनेगा। इस संदर्भ में, स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या वे लोग जो जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना रखते हैं, इसके बुरे प्रभावों के बारे में जागरूक हैं? क्या उन्हें पता है कि यह बदलाव उनके स्वास्थ्य, आजीविका, उनके परिवारों और समुदायों के जीवन पर किस तरह असर डालने वाला है?

     यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन यह पूरी तरह से असंभव नहीं है। जब मिलकर प्रयास किए जाते हैं, तो ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकता है। इसके लिए, व्यक्तियों और सरकारों, दोनों को ही इसे हासिल करने की दिशा में कदम उठाने होंगे। हमें ग्रीनहाउस गैसों को कम करने से शुरुआत करनी चाहिए। इसके अलावा, उन्हें पेट्रोल की खपत पर भी नज़र रखनी चाहिए। हाइब्रिड कार का इस्तेमाल शुरू करें और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करें। साथ ही, नागरिक सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल कर सकते हैं या मिलकर कारपूल कर सकते हैं। इसके बाद, रीसाइक्लिंग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब आप खरीदारी करने जाएं, तो अपना कपड़े का थैला साथ ले जाएं। आप एक और कदम उठा सकते हैं, वह है बिजली का इस्तेमाल सीमित करना, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन रुकेगा। सरकार की ओर से, उन्हें औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण रखना चाहिए और उन्हें हवा में हानिकारक गैसें छोड़ने से रोकना चाहिए। पेड़ों की कटाई तुरंत बंद होनी चाहिए और पेड़ लगाने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। संक्षेप में, हम सभी को यह समझना चाहिए कि हमारी पृथ्वी की हालत ठीक नहीं है। इसे इलाज की ज़रूरत है और हम इसे ठीक करने में मदद कर सकते हैं। आज की पीढ़ी को ग्लोबल वार्मिंग को रोकने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कष्ट न उठाना पड़े। इसलिए, हर छोटा कदमकृचाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, बहुत मायने रखता है और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में काफी महत्वपूर्ण है।
हालाँकि, हमारे देश ने हमेशा जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता दिखाते हुए वैश्विक स्तर पर पहल की है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों के साथ मिलकर ‘‘लाइफ़’’ नाम से एक आंदोलन शुरू किया, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर अपनाए जा रहे बेहतरीन तरीकों को बढ़ावा देकर लोगों और समुदायों के बीच जलवायु- अनुकूल व्यवहार परिवर्तन के समाधानों को बढ़ावा देना है। ‘‘लाइफ़’’ अभियान का यह विचार भारत के प्रधानमंत्री ने 2021 में ग्लासगो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 2026 के दौरान प्रस्तुत किया था। इसके तहत, पर्यावरण के प्रति जागरूक जीवनशैली को बढ़ावा देने के उपायों का विस्तार किया जाएगा और संसाधनों की अंधाधुंध खपत और बर्बादी के बजाय संसाधनों के सावधानीपूर्वक और विवेकपूर्ण उपयोग पर ज़ोर दिया जाएगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘‘लाइफ़’’ का विज़न एक ऐसी जीवनशैली अपनाना है जो हमारे ग्रह के साथ सामंजस्य में हो और उसे कोई नुकसान न पहुँचाए। जो लोग ऐसी जीवनशैली अपनाते हैं, उन्हें ‘‘ग्रह-अनुकूल लोगों’’ का दर्जा दिया जाता है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘‘मिशन लाईफ अतीत से प्रेरणा लेकर और वर्तमान में कार्रवाई करके भविष्य पर ध्यान केंद्रित करता है। ‘‘कम करना, दोबारा इस्तेमाल करना और रीसायकल करना’’  हमारे जीवन के मूल सिद्धांत हैं। चक्रीय अर्थव्यवस्था हमारी संस्कृति का केंद्र है, और भारत का वन क्षेत्र बढ़ रहा है; साथ ही शेर, बाघ, तेंदुए, हाथी और गैंडों की आबादी भी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि स्थापित बिजली क्षमता का 40प्रतिशत तक हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन-आधारित स्रोतों से आ सकता है। अपने लक्ष्य तक पहुँचने की भारत की प्रतिबद्धता निर्धारित समय से नौ साल पहले ही पूरी हो गई है।’’

जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार हैं तो मैं चाहती हूँ कि हम अपनी अगली पीढ़ी को एक स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी सौंपें, ताकि पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनी रहे। भारतीय संस्कृति ‘‘वसुधैव कुटुंबकम’’ की विचारधारा पर आधारित है, यानी पूरी पृथ्वी ही हमारा परिवार है। मैं हमेशा अपने प्राचीन ग्रंथों से उन सांस्कृतिक मूल्यों को चुनकर लोगों को याद दिलाने की कोशिश करती हूँ, जिनमें पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संरक्षण का ज़िक्र है। हमारी भारतीय संस्कृति दुनिया की दूसरी सभ्यताओं के मुकाबले प्रकृति के प्रति ज़्यादा विचारशील रही है। आज भी, हम सब कुछ सही करना चाहते हैं, लेकिन उसे सही ढंग से कर नहीं पाते। मैं आपको अपने ही एक फ़ैसले का उदाहरण देकर यह बात समझाती हूँ। यह फ़ैसला लेते समय मुझे दुख हुआ, लेकिन मैं मजबूर थी। तब मैंने खुद को दिलासा दिया कि जब भी मुझे मौका मिलेगा, मैं अपना फ़ैसला बदल लूँगी। फिर भी, मन में एक कसक सी रह गई है।
हुआ यूँ कि मैंने एक स्कूटर खरीदने का फ़ैसला किया। मैं एक इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदना चाहती थी। इस तरह मैं जीवाश्म ईंधन की बर्बादी से बच सकता था और पर्यावरण को भी जीवाश्म ईंधन से होने वाले प्रदूषण से बचा सकता था। जब मैंने इलेक्ट्रिक स्कूटरों के बारे में पूछताछ शुरू की, तो मुझे पता चला कि जहाँ पेट्रोल से चलने वाले स्कूटर 1 लाख रुपये तक में मिल रहे थे, वहीं इलेक्ट्रिक स्कूटरों की शुरुआती कीमत ही 1.5 लाख रुपये थी। अगर किसी अच्छी कंपनी के इलेक्ट्रिक स्कूटर में लगी बैटरी को पाँच साल बाद बदलना पड़े, तो उसमें 25-30 हज़ार रुपये का खर्च आएगा। अच्छी बात यह थी कि बिजली का खर्च पेट्रोल के खर्च से कम पड़ने वाला था। लेकिन मेरे शहर में उस समय चार्जिंग स्टेशन थे ही नहीं। अगर मैं घर पर स्कूटर चार्ज करना भूल जाऊँ और बीच रास्ते में ही ‘‘लो-बैटरी’’ का सिग्नल मिलने लगे, तो मैं कहाँ जाऊँगी और उसे कैसे चार्ज करूँगी? क्या मुझे किसी के दरवाज़े पर जाकर उनसे यह गुज़ारिश करनी पड़ेगी कि वे मुझे अपना स्कूटर चार्ज करने दें? या फिर मुझे अपने स्कूटर को वहाँ से किसी दूसरे वाहन पर लादकर ले जाने का इंतज़ाम करना पड़ेगा। यह एक बहुत ही व्यावहारिक बात है। स्कूटर बेचने वाले लोग इस बारे में बात करना बिल्कुल पसंद नहीं करते। अगर हम फिर भी उनसे इस बारे में बात करते हैं, तो वे हँसकर कहते हैं कि ‘‘यह एक छोटा शहर है, यहाँ ऐसी कोई समस्या कभी पैदा नहीं होगी।’’ ज़ाहिर है, अगर घर से निकलने से पहले कार को पूरी तरह चार्ज कर लिया जाए, तो ऐसी कोई दिक्कत नहीं आएगी। हर समय इतना ज़्यादा चौकन्ना रहने की ज़रूरत नहीं है। यहाँ मैं किसी भी ईवी बनाने वाली कंपनी, किसी ईवी एजेंसी या उनके सेल्सपर्सन पर कोई इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहती। इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। वे भी ईवी के पक्ष में हैं, ताकि सड़कों पर प्रदूषण-मुक्त गाड़ियाँ चल सकें। अगर कोई गलती है, तो वह हमारे सिस्टम की धीमी रफ़्तार है। जिस तेज़ी से बाज़ार में ईवी गाड़ियाँ उतारी गई हैं, उस तेज़ी से चार्जिंग स्टेशन नहीं बनाए गए हैं। मेरे शहर जैसे छोटे शहरों में एक-दो साल पहले तक कोई चार्जिंग स्टेशन नहीं था। गाँवों में चार्जिंग स्टेशन लगाने में अभी भी काफ़ी समय लगेगा। 

मैंने व्यावहारिक रूप से सोचा और अपने लिए एक पेट्रोल से चलने वाला स्कूटर खरीद लिया। इसे खरीदते समय मुझे ऐसा लगा, जैसे मैं अपने सिद्धांतों को तोड़ रही हूँ। जैसे मैं कोई अपराध कर रही हूँ। लेकिन मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। गाड़ी चाहे कोई भी हो, दिन या रात में किसी भी समय उसकी ज़रूरत पड़ सकती है। 

इन सब बातों का मतलब यह है कि हम जलवायु परिवर्तन की जिस तेज़ी से हो रहा है, और हम जिस उत्साह से उसकी रफ़्तार धीमी करना चाहते हैं, उन दोनों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को कम करने के लिए हमें अपने प्रयासों में व्यावहारिक रूप से तेज़ी लाने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी जिस चीज़ की कमी है, वह है आम लोगों के बीच पर्याप्त जागरूकता लाना। जब तक हर नागरिक जलवायु संरक्षण के बारे में जागरूक नहीं होगा, तब तक सभी प्रयासों की गति धीमी ही रहेगी। अब वह समय आ गया है, जब आम लोगों को यह पता होना चाहिए कि यदि ध्रुवों पर मौजूद ग्लेशियर तेज़ी से पिघलते हैं, तो इसका असर हर इंसान, हर जानवर और हर पौधे पर पड़ता है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 20.05.2026 को प्रकाशित)  
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Thursday, May 14, 2026

चर्चा प्लस | नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                  
     वेदों में यह माना जाता है कि हमें ब्रह्मांड में मौजूद सभी प्रकार के जल की रक्षा करनी चाहिए। नदियों के जल को सबसे अधिक संरक्षित माना गया है, क्योंकि उससे खेतों की सिंचाई होती है, जिसके कारण जीवों का जीवन चलता रहता है। नदियों का बहता हुआ जल पवित्र माना जाता है। इसीलिए वेदों में कहा गया है कि नदियों को प्रदूषित नहीं करना चाहिए। वैदिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद आने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। इसी संदर्भ में माना गया है कि स्वर्ग तक केवल वैतरणी को पार करने के बाद ही पहुंचा जा सकता है, इसलिए यदि जो वैतरणी को पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता और उसकी आत्मा प्यासी भटकती रहती है।


   हिंदू वैदिक, पौराणिक कथाओं के अनुसार, वैतरणी नदी (स्टिक्स नदी) में भयानक कीड़े, मगरमच्छ और वज्र जैसी चोंच वाले गिद्ध रहते हैं। मृत्यु के बाद, जब यमदूत पापी आत्मा को लेकर वैतरणी नदी से गुज़रते हैं, तो नदी का पानी उबलने लगता है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है यानी जो जीवन में बुरे कर्म करता है, धार्मिक कार्य, दान-पुण्य नहीं करता, उस पापी आत्मा को वैतरणी नदी पार करने में बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। जो व्यक्ति नदी के जल को हानि पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद मिलने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। चूंकि स्वर्ग तक पहुंचने के लिए वैतरणी नदी को पार करना अनिवार्य है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति वैतरणी पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। गरुड़ पुराण के अनुसार, यह नदी पृथ्वी के अलावा कई अन्य स्थानों पर भी प्रवाहित होती है। जिस नदी की यहां बात की जा रही है, वह यमलोक से नरक तक बहती है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस नदी का नाम वैतरणी नदी है। यह 100 योजन अर्थात् 120 किलोमीटर लंबी है और रक्त (खून) से भरी हुई है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इस नदी का एक हिस्सा पृथ्वी से होकर यमलोक तक जाता है, और वहां से नरक के द्वार तक पहुंचता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा को यमलोक में यमराज के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। यदि उसके कर्मों के अनुसार उसे नरक की प्राप्ति होती है, तो यमदूत उस पापी आत्मा को इस नदी के पास ले जाते हैं। किसी भी पापी आत्मा को देखते ही नदी का रक्त उबलने लगता है और नदी से एक भयानक गर्जना उठने लगती है। वहीं, जो व्यक्ति अपने जीवन में दान-पुण्य करता है, तथा प्रकृति और नदी के जल को कोई हानि नहीं पहुंचाता, वैतरणी नदी उसकी आत्मा की रक्षा करती है। हमारे विद्वान पूर्वजों ने नदीजल संरक्षण को पारलौकिक जीवन से जोड़ कर जो भय पैदा किया वह नदीजल संरक्षण में सहायक रहा। किन्तु आधुनिकता ने इन प्राचीन संदेशों की अनदेखी की है और नदियों को गंभीर क्षति पहुंचाया है। हमारे पूर्वजों ने संभवतः इसी कारणवश धार्मिक ग्रंथों में वैतरणी नदी के अस्तित्व का उल्लेख किया गया है, ताकि मनुष्य प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाने से भयभीत हों; वे अच्छे कर्म करें, प्रकृति का संरक्षण करें, जल बचाए और जैव विविधता की रक्षा करें।

जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय नदियों की जलवायु की स्थिति लगातार खराब हो रही है, जिसमें अनिश्चितकालीन वृद्धि, अत्यधिक वृद्धि, ज्वालामुखी का पिघलना और पानी की कमी मुख्य चुनौतियाँ हैं। बढ़ते तापमान के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे नदियां समय से पहले सूख रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 2070-2100 तक मानसून में नदियों का तापमान 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को पानी देने वाले हिमालयी ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना इन नदियों का प्रवाह प्रभावित कर रहा है।  बारिश के पैटर्न में बदलाव से बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है। भारत में बाढ़ की दर बढ़ी है। वहीं अनियमित बारिश से सूखा और बंजरपन भी बढ़ रहा है। पृथ्वी की सतह का 71 प्रतिशत भाग जल से ढंका हुआ है, लेकिन मात्र 1 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। गंगा, यमुना और साबरमती जैसी नदियां पूरे भारत में पूजनीय हैं। नदी का जल वाणिज्यिक और औद्योगिक विकास, जलविद्युत उत्पादन, कृषि, नए बहुउद्देशीय बांधों और पर्यटन स्थलों के लिए महत्वपूर्ण है। यद्यपि कीटनाशकों, भारी धातुओं, जैविक अपशिष्ट, रासायनिक अपशिष्ट और सीधे सीवेज के निर्वहन जैसे विभिन्न प्रदूषकों की उपस्थिति ने नदी के जल की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाया है। भारत में, नदी जल प्रदूषण एक प्रमुख समस्या है जिसने न केवल मानव और पशु स्वास्थ्य को, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया है।

सन 2023 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में पांच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई थी। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया था कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं। दरअसल, हिमनद यानी ग्लेसियर्स पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियां पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है।’’
इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा। गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियां झेलम, चिनाब, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियां सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं। पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहां पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है।

हमारे पूर्वज नदी जल के महत्व को हमसे कहीं अधिक समझते थे। ‘‘जलमेव जीवनं’’ भारतीय संस्कृति में जल और जलाशयों के महत्व को प्राचीन काल से ही स्वीकार किया गया है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे वैदिक साहित्य में जल के स्रोतों, सभी जीवों के लिए जल के महत्व, जल की गुणवत्ता और उसके संरक्षण पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है। वेदों में जल को ‘‘विश्वभेषजं’’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि सभी औषधियां जल में ही समाहित हैं (अर्थात् शुद्ध जल सभी जीवों के लिए अत्यंत लाभकारी, हितकारी और महत्वपूर्ण है)। वर्तमान में भी जल चिकित्सा के महत्व को स्वीकार किया जाता है। ऋग्वेद में जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-‘‘अप्सवमृतमप्सु भेषजं।’’

- इसका अर्थ है कि जल में अमृत है, जल में औषधि है। वास्तव में, आर्य संस्कृति नदियों के किनारों पर ही फली-फूली और विकसित हुई। बड़े-बड़े प्राचीन नगर नदियों के किनारों पर ही समृद्ध हुए। जैसे सरयू के तट पर अयोध्या, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जयिनी, त्रिवेणी के तट पर प्रयाग, यमुना के तट पर मथुरा आदि। पंजाब को ‘‘सप्तसिंधु’’ प्रदेश कहा जाता है। वैदिक काल में, सरस्वती नदी के तट के समीप रहते हुए और इस नदी के जल का सेवन करते हुए, ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया।
पवित्र नदियों की महिमा का गान हजारों नामों से किया जाता है। ऋग्वेद के दशम मंडल के ‘‘नदी सूक्त’’ में भारत की नदियों की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है-
गंगे च यमुने चौव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
- इसका अर्थ है, हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी नदियों! आप सभी मेरे स्नान के लिए इस जल में पधारें।
गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा।
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया चर्मण्वती वेदिका।।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी।
पूर्णाः पूर्णजलैः समुद्रसहिताः कुर्वन्तु मे मङ्गलं।।

आदिग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित वेदों में, जल को एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व मानते हुए उसकी स्तुति की गई है। अथर्ववेद में जल को लाभकारी बताते हुए कहा गया है कि ‘‘जो जल मरुस्थल में है, जो जल तालाब में है, जो जल घड़े में लाया जाता है, जो जल वर्षा से प्राप्त होता है, ये सभी जल हमारे लिए कल्याणकारी हों। कुओं का जल हमें समृद्धि प्रदान करे। संचित जल हमें समृद्धि दे, वर्षा का जल हमें समृद्धि दे।’’ औषधि के रूप में जल का स्थान चिकित्सा विज्ञान, औषध-शास्त्र और विभिन्न देशों की चिकित्सा पद्धतियों में सर्वाेच्च है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ-साथ, सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसके दर्शन का विस्तार से वर्णन किया गया है। जल समस्त रोगों की औषधि है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जो जल स्वर्ण के समान कांतिमान है, अत्यंत सुंदर है, जो पवित्रता प्रदान करता है, जिससे सवितादेव और अग्निदेव का जन्म हुआ, जो सर्वाेत्तम वर्ण वाला और ‘‘अग्निगर्भ’’ है, वह जल हमारे रोगों को दूर करने में सक्षम है; सभी को सुख और शांति की प्राप्ति हो। ऋग्वेद में जल-संस्कृति का निरंतर प्रवाह देखने को मिलता है। ऋग्वेद की जल-संस्कृति और परंपरा का विकास अथर्ववेद में भी परिलक्षित होता है। जल ही एक सुखी और समृद्ध जीवन का आधार है। शतपथ ब्राह्मण में जल को ‘‘आपो वै प्राणाः’’ (जल ही प्राण है) कहकर जीवन के रूप में वर्णित किया गया है। समस्त देवता जल में ही प्रतिष्ठित हैं। देवताओं तक हमारी स्तुतियों को पहुँचाने का माध्यम भी जल ही है।
वस्तुतः, प्रवाहित जल अर्थात् नदी के जल को सर्वाधिक पवित्र मानते हुए, वेदों में नदी जल के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है; क्योंकि नदी ही वह एकमात्र तत्व है जो जीवन के इस पार और उस पार ‘‘दोनों लोकों में’’ विद्यमान रहती है, और मनुष्य को सुख तथा स्वर्ग की प्राप्ति कराती है। यही कारण है कि शास्त्रों में नदी जल को बचाने का आह्वान किया गया है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 14.05.2026 को प्रकाशित) 
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