Sunday, August 31, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह "कस्बाई साइमन" उपन्यास कन्नड़ पत्रिका "सुधा" में धारावाहिक - 6


कन्नड़ की लोकप्रिय, प्रतिष्ठित एवं बहुप्रसारित साप्ताहिक पत्रिका "सुधा" में धारावाहिक प्रकाशित हो रहे मेरे उपन्यास "कस्बाई सिमोन" की आज प्रकाशित 6 वीं कड़ी प्रस्तुत है.
Hearty Thanks "Sudha" Kannada Magazine  🚩🙏🚩
आभार विद्वान अनुवादक डी.एन. श्रीनाथ जी 🌹🙏🌹

Presenting the 6th episode of my novel "Kasbai Simon" published today, which is being serialized in the popular, reputed and widely circulated Kannada weekly magazine "Sudha".

Hearty Thanks "Sudha" Kannada Magazine 🚩🙏🚩
Thanks to the learned translator D.N. Srinath ji 🌹🙏🌹


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Saturday, August 30, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | इते ने गड्ढा से बचो जा सकत, ने खम्बा से | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम



टॉपिक एक्सपर्ट
इते ने गड्ढा से बचो जा सकत, ने खम्बा से
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
(पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | बुंदेली में)
 
गणपति पधार चुके हैं, सो फेस्टिवल को माहौल चल रओ आए। सो, ऐसे में तनक चुटकुला-मुटकुला याद करो जा सकत है। सो, हम बा चुटकुला सुना रए जोन को अनुभव आजकाल सबई जने कर रए। चलो, आप ओरें सोई सुनो जा चुटकुला। कि भओ का के एक रए बब्बा जू। उनें हार्ट अटैक आओ औ बे ढरक गए। उनके मोड़ा हरें जा सोच के खुस भए के अब उने जायदाद मिल जाहे। बे बब्बा की ठठरी ले के निकरे। संगे ‘राम नाम सत्त’ बोलत जा रए ते। इत्ते में पड़ो एक गड्ढा। मोड़ा हरें रपटे सो ठठरी गिर परी। बब्बा को लगो झटका औ बे उठ बैठे। मोड़ा हरें दुखी हो के उने घरे लौटा लाए। समै देखो के चार दिनां बाद बब्बा फेर के ढरक गए। मोड़ा हरें फेर के उनकी ठठरी ले के निकरे। रोड पे गड़ो तो बिजली को खम्बा जोन की शिफ्टिंग ने करी गई ती। ई दार बे ओरें खम्बा से भिड़ गए। फेर के बब्बा को झटका लगो औ बे फेर के जी उठे। मोड़ा हरें फेर उने घरे ले आए। 
कछू दिनां में बब्बा फेर ढरक गए। अबकी जो मोड़ा हरें उनकी ठठरी ले के निकरे तो ई दार बे ‘राम नाम सत्त’ की जांगा बोलत जा रए ते “गड्ढा, खम्बा बचा के!”  काए से के मोड़ा हरें ने चाउत्ते के बब्बा खों फेर के घरे ले जाने परे। अब बे ओरें कां लौं बचा पाए जे तो बेई जानें।  बाकी अपन ओरें तो ने गड्ढा से बच पा रये, ने खम्बा से बच पा रये। अब परसासन कछू कर सके तो करे, ने तो गड्ढा, खम्बा सो भाग में लिखोई आए।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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पत्रिका पुलिस अवार्ड 2025 सागर में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का काव्यपाठ, 29.08.2025


कल 29.08.2025 को "राजस्थान पत्रिका" के सागर संस्करण "पत्रिका" द्वारा विश्वविद्यालय के अभिमंच सभागार में " पत्रिका पुलिस अवार्ड 2025 का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य अतिथि थे विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर। इस गरिमामय आयोजन में सागर संभाग के विशिष्ट कार्य करने वाले पुलिस कर्मियों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर मैं भी अपनी एक कविता प्रस्तुत की जो कर्मनिष्ठ पुलिस कर्मियों को समर्पित है।
       मुझे इस कार्यक्रम में आमंत्रित करने तथा काव्य पाठ का अवसर प्रदान करने के लिए मैं पत्रिका परिवार तथा प्रिय रेशु जैन की हार्दिक आभारी हूं 🚩🙏🚩
      इस आयोजन पूर्व मंत्री भाई गोपाल भार्गव जी, खुरई विधायक भाई भूपेंद्र सिंह जी, जिला पंचायत अध्यक्ष भाई हीरा सिंह राजपूत जी, देवरी विधायक भाई बृज बिहारी पटेरिया जी  तथा एसवीएन विश्वविद्यालय के कुलपति भाई अनिल तिवारी की उल्लेखनीय उपस्थिति भी रही।


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Friday, August 29, 2025

शून्यकाल | गणपति के हैं नाम अनेक पर काम एक : जनकल्याण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | गणपति के हैं नाम अनेक पर काम एक : जनकल्याण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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शून्यकाल
गणपति के हैं नाम अनेक पर काम एक : जनकल्याण
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 
    जब हम किसी दुखी, पीड़ित व्यक्ति को देखते हैं तो उसकी सहायता करने की इच्छा हमारे मन में जागती है। फिर दूसरे ही पल हमें अपने सीमित सामथ्र्य याद आ जाता है और हम ठिठक जाते हैं। यह सच है कि आज के उपभोक्तावादी दौर में बहुसंख्यक व्यक्तियों के पास बहुत अधिक सहायता करने की क्षमता नहीं रहती है। किन्तु, श्रीगणेश यही तो सिखाते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कैसे दिखते हैं या हमारी क्षमताएं कितनी हैं, यदि हमारे मन में दृढ़इच्छा है तो हम किसी न किसी रूप में एक दुखी-पीड़ित की मदद कर सकते हैं। तभी तो श्रीगणेश के अनेक नाम हैं किन्तु काम एक ही है-जनकल्याण।

हिन्दू संस्कृति में श्रीगणेश एकमात्र ऐसे देवता है जिनका मुख हाथी का तथा शेष शरीर मनुष्यों अथवा देवताओं जैसा है। अलौकिक शक्ति के धनी होते हुए भी श्रीगणेश में समस्त गजतत्व मौजूद हैं। सृष्टि की योग्य कृति मानव तथा वन्य समुदाय की सर्वश्रेष्ठ रचना गज के सम्मिश्रण वाले श्री गणेश की शक्तियों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार गणेश जी ने ही महाभारत को अबाधगति से लिपिबद्ध किया था।
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितं।
उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।

श्रीगणेश के एक नहीं अपितु 108 नाम हैं। प्रत्येक नाम का अपना एक अलग महत्व है।
*श्रीगणेश के 108 नाम* 
अखुरथ- जिनके पास रथ के रूप में एक चूहा है, अलमपता- सदा सनातन भगवान, अमितःअतुलनीय प्रभु, अनंतचिद्रुपमयं- अनंत और चेतना-व्यक्तित्व, अवनीश- पूरी दुनिया के भगवान, अविघ्न- सभी बाधाओं को दूर करने वाला, बालगणपति- प्रिय और प्यारा बच्चा, भालचंद्र- चंद्रमा-कलक वाले भगवान, भीम- विशाल और विशाल, भूपति- देवताओं के स्वामी, भुवनपति - जगत के स्वामी, बुद्धिनाथ- ज्ञान के देवता, बुद्धिप्रिया- ज्ञान और बुद्धि को प्यार करने वाले भगवान, बुद्धिविधता- ज्ञान और बुद्धि के देवता, चतुर्भुज- चतुर्भुज भगवान, देवदेव- भगवानों के भगवान, देवंतकनशकारिन- राक्षसों का नाश करने वाले, देवव्रत- वह जो सभी तपस्या स्वीकार करता है, देवेंद्रशिका- सभी देवताओं के रक्षक, धार्मिक- वह जो धार्मिकता को बनाए रखता है, धूम्रवर्ण- धूम्र वर्ण वाले भगवान, दुर्जा- अजेय भगवान, द्वैमतुर- जिसकी दो माताएं हों, एकाक्षर - एक अक्षर से आवाहन करने वाला, एकदंत- एकल-दांत वाले भगवान, एकादृष्टा- एकाग्र भगवान, ईशानपुत्र- भगवान शिव के पुत्र, गदाधर - गदा धारण करने वाले, गजकर्ण - हाथी के कान वाले, गजानन- हाथी के चेहरे वाले भगवान, गजाननेति- हाथी के मुख वाले भगवान, गजवक्र- सूंड हुक की तरह मुड़ी हुई, गणधक्ष्य- सभी गणों (समूहों) के भगवान, गणध्यक्षिना- सभी गणों (समूहों) के नेता, गणपति- सभी गणों (समूहों) के भगवान, गौरीसुता- देवी गौरी के पुत्र, गुनिना- सभी गुणों के स्वामी, हरिद्रा- वह जो सुनहरे रंग का हो, हेरम्बा- मां का प्रिय पुत्र, कपिला- पीले-भूरे रंग के भगवान, कवीशा- कवियों के गुरु, कृति- संगीत के भगवान, क्षिप्रा- जिसे प्रसन्न करना आसान हो, लम्बकर्ण- लंबे कान वाले भगवान, लंबोदर- पेट वाले भगवान, महाबला- अत्यंत बलवान प्रभु, महागणपति- सर्वशक्तिमान और सर्वोच्च भगवान, महेश्वरम- ब्रह्मांड के भगवान, मंगलमूर्ति- सर्व शुभकर्ता, मनोमय - हृदय को जीतने वाले, मृत्युंजय- मृत्यु को जीतने वाले, मुंडकरम- सुख का धाम, मुक्तिदया- शाश्वत आनंद का दाता, मुसिकवाहन- जिसका वाहन चूहा है, नादप्रतितिष्ठः जिसकी संगीत से पूजा की जाती है, नमस्थेतु- सभी बुराइयों और दोषों और पापों का विजेता, नंदना- भगवान शिव के पुत्र, निदेश्वरम- धन और खजाने के दाता, पार्वतीनंदन- देवी पार्वती के पुत्र, पीताम्बरा - पीले वस्त्र धारण करने वाले, प्रमोदा- सुख के सभी निवासों के भगवान, प्रथमेश्वर- सभी देवताओं में सबसे पहले, पुरुष- सर्वशक्तिमान व्यक्तित्व, रक्ता- जिसका शरीर लाल रंग का हो, रुद्रप्रिया- भगवान शिव की प्रिय, सर्वदेवतामन- सभी दिव्य प्रसादों को स्वीकार करने वाला, सर्वसिद्धान्त- कौशल और ज्ञान के दाता, सर्वात्मान- ब्रह्मांड के रक्षक, शाम्भवी- पार्वती के पुत्र, शशिवर्णम- जिसका रंग चंद्रमा जैसा है, शूपर्णकर्ण- बड़े कान वाले भगवान, शुबनः सर्व मंगलमय प्रभु, शुभगुणकानन- वह जो सभी गुणों का स्वामी है, श्वेता- वह जो सफेद रंग की तरह पवित्र हो, सिद्धिधाता- सफलता और सिद्धियों के दाता, सिद्धिप्रिया- वह जो इच्छाओं और इच्छाओं को पूरा करती है, सिद्धिविनायक- सफलता के दाता, स्कंदपुर्वजा- स्कंद (भगवान मुरुगन) के बड़े भाई, सुमुख- जिसका मुख प्रसन्न है, सुरेश्वरम- सभी प्रभुओं के भगवान, स्वरूप - सौंदर्य के प्रेमी, तरुण- अजेय भगवान, उद्दंड- बुराइयों और दोषों की दासता, उमापुत्र- देवी उमा (पार्वती) के पुत्र, वक्रतुंड - घुमावदार सूंड वाले भगवान, वरगणपति - वरदानों के दाता, वरप्रदा- इच्छाओं और इच्छाओं का दाता, वरदविनायक - सफलता प्रदान करने वाले, वीरगणपति- वीर प्रभु, विद्यावारिधि- ज्ञान और बुद्धि के देवता, विघ्नहर्ता- विघ्नों का नाश करने वाले, विघ्नराज- सभी बाधाओं के भगवान, विघ्नस्वरूप- विघ्नों का रूप धारण करने वाले, विकट- विशाल और राक्षसी, विनायक- सभी लोगों के भगवान, विश्वमुख- ब्रह्मांड के स्वामी, विश्वराज- ब्रह्मांड के राजा, यज्ञकाय- सभी यज्ञों को स्वीकार करने वाले, यशस्करम- यश और कीर्ति के दाता, योगधिपा- ध्यान और योग के भगवान, योगक्षेमकारा- अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के दाता, योगिन- योग का अभ्यास करने वाला, युज- जो संघ का स्वामी है, कुमारा- हमेशा युवा भगवान, एकादृष्टा- एकाग्र भगवान, कृपालु- दयालु भगवान। श्रीगणेश के ये 108 नाम हैं, जिनका जाप किया जाता है।
श्रीगणेश के कुछ नामों की रोचक कथाएं भी देख ली जाएं। यही तो हमारी पौराणिक विरासत हैं-
*एकदंत की कथा*
श्रीगणेश के एकदंत होने की कई कथाएं मिलती हैं जिनमें एक इस प्रकार है कि एक बार विष्णु के अवतार परशुराम शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यानावस्थित थे तथा वे कोई व्यवधान नहीं चाहते थे। शिवपुत्र गणेश ने परशुराम को रोक दिया और मिलने की अनुमति नही दी। इस बात पर परशुराम क्रोधित हो उठे और उन्होंने श्री गणेश को युद्ध के लिए चुनौती दे दी। श्रीगणेश ने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच घनघोर युद्ध हुआ। इसी युद्ध में परशुरामजी के फरसे से उनका एक दांत टूट गया।
*लंबोदर*
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर मोहित हो गए। भावावेश में उनका स्खलन हो गया, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।
*विकट*
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।
*विघ्नराज*
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी भेंट शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया। शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए तब गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर उसके अत्याचार से सभी को मुक्त कराया।
*धूम्रवर्ण*
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। तभी उन्हें छींक आई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। अहम शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने श्री गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिया और अत्याचार बन बैठा। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर को युद्ध में हराकर जनकल्याण किया।
            श्रीगणेश अन्य देवताओं की भांति शारीरिक दृष्टि से सुंदर नहीं हैं किन्तु उनकी अपरिमित बुद्धि के कारण उन्हें प्रथमपूज्य देवता का पद प्राप्त है। यही वह बात है जिसे हम मनुष्यों को सीखना चाहिए कि जाति, धर्म, आकार, प्रकार, सुंदरता, असुंदरता का कोई अर्थ नहीं है, यदि किसी चीज का अर्थ है तो वह है जनकल्याण। यही तो सत्य मौजूद है श्रीगणेश के स्वरूप में।    
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Thursday, August 28, 2025

बतकाव बिन्ना की | परकम्मा करबे की शुरुआत करी ती गणेश जू ने | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
परकम्मा करबे की शुरुआत करी ती गणेश जू ने 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     
‘‘काए भौजी, घूम आईं बृंदाबन?’’ मैंने भौजी से पूछी। 
भौजी चार दिनां के लाने मथुरा बृंदाबन खों गई रईं। काए से उनकी बुआ सास मैहर से आईं रईं। बे बृंदाबन जान वारी हतीं सो भौजी को सोई उनके संगे प्लान बन गओ रओ। 
‘‘हऔ बिन्ना! घूम आए कान्हा की नगरी।’’ भौजी खुस होत भईं बोलीं।
‘‘औ आपकी बुआ सास नईं दिखा रईं? का बे उतई रै गईं?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे नईं बे तो उते से बनारस खों निकर गईं। हमसे सोई चलबे की कै रई हतीं, पर हमाए तो उतई गोड़े दुखा गए। ईसे ज्यादा हम नईं चल सकत्ते।’’ भौजी अपने घूंटा पे हात देत भईं बोलीं।
‘‘सो कोन आपखों पैदल जाने रओ? रेल से, ने तो बस से, ने तो कोनऊं टैक्सी में जातीं। सो, हो आने रओ।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जा बात तुमाई सई आए के बृंदाबन से बनारस लौं हमें निंगत नईं जाने रओ पर बृंदाबन में पांच कोसी परकम्मा कर के तो हमाए गोड़े दुखन लगे हते। आज लौं दुख रए।’’ भौजी फेर के अपनों घूंटा दबात भईं बोलीं।
‘‘आप ने करी पांच कोसी परकम्मा? पांच कोसी मने 15 किलोमीटर निंगो आपने?’’ मोए भौतई अचरज भओ।
‘‘हऔ बिन्ना! ऊ टेम पे सब के संगे कोन पता परो के कित्तो निंग लओ, मनो परकम्मा के बाद रात को खूबई गोड़ दुखे हमाए तो। इत्ते चलबे की अब आदत नईं रई हमाई तो। जेई लाने हमने उनके संगे बनारस जाबे खों मना कर दओ। का पता उते बी बे कोनऊं परकम्मा करान लगें। बाकी आओ बड़ो मजो। परकम्मा करत टेम बिलकुल पतो नई परो। उते तो मुतकी भीड़ रैत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कै रईं भौजी। अभईं पिछली नौरातें मैं ज्वालादेवी के दरसन के लाने गई रई। उते की छिड़ियंा देख के मोए लगो के मैं चढ़ पैहों के नईं? फेर जब चढ़न लगी तो पतई नई परी के कबे चढ़ गई। अच्छी ऊंची पहड़िया पे बिराजी हैं बे तो।’’ मैंने सोई कई।
‘‘बिन्ना उते हमें कोऊ ने बताओ के जे जो परकम्मा करबे की प्रथा आए जे बृंदाबन की पांच कोसी परकम्मा से शुरू भई रई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘जोन ने बताई बा झूठी बताई। होत का आए के अपनी जांगा खों बढ़ा-चढ़ा के बताबे के लाने कछू बी बोल दओ जात आए।’’ मैंने कई।
‘‘सो तुमें कैसे पतो के बा ने झूठी कई?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘हमें ऐसे पतो के ई बारे में पुराण में किसां मिलत आए।’’ मैंने कई।
‘‘कैसी किसां?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘आप पैले जे बताओ के पैले गणेशजू भए के पैले कान्हा भए?’’ मैंने भौजी से पूछो।
‘‘गणेशजू पैले भए। बे तो देवता आएं। मनो कान्हा सोई देवता आएं पर बे बिष्णु जी के अवतार रए।’’ भौजी ने कई।
‘‘बस, सो परकम्मा की शुरुआत भई गणेशजू से। औ वा बी महादेव और पार्वती जू के घरे से, सो, जा बृंदाबन से शुरू भई नईं हो सकत। मनो ओई टाईप से सब जांगा कोसी परकम्मा को चलन चल गओ। आप खों तो पतई हुइए के उतईं ब्रज में चैरासी कोस की परकम्मा होत आए जीमें 252 किलोमीटर चलने परत आए। जीमें बरसाना, नंदगांव, मथुरा, बृंदाबन गोवर्द्धन, राधाकुंड बगैरा सबई आ जात आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ, बा तो हमें पतो , बाकी गणेशजू जी की का किसां आए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘अरे ने पूछो आप, बड़ी मजेदार किसां आए। का भओ के एक दार नारद जू ने सुरसुरी छोड़ दई के इत्ते लौं देवी-देवता आएं के उते धरती पे मानुस हरें समझ ने पात आएं के कोन को नांव पैले लओ जाए। नारद जू को इत्तो कैनो तो के देवता हरें झगड़न लगे के हमाओ नांव पैले लओ जानो चाइए, हमाओ नांव पैले लओ जानो चाइए। जे झगड़ा मिटाबे के लाने महादेवजू ने कई के ऐसो करो के सबरे देवता जे ब्रह्मांड के चक्कर लगा लेओ। जोन सबसे पैले परकम्मा पूरो करहे ओई को पैले पूजो जाहे। ओई को नांव पैले लओ जाहे। सब देवता ईके लाने राजी हो गए। उतई गणेशजू के भैया कार्तिकेय सोई ढ़ाड़े हते। उन्ने सोची के जेई टेम सबसे बढ़िया आए। जो हम ई टेम पे गणेश खों हरा देवें तो हमाओ नांव ईसे पैले लओ जाहे। सो कार्तिकेय ने गणेशजू खों चैलेंज करी। गणेशजू ने चैलेंज मान लओ। सबरे अपने-अपने वाहन पे सवार हो के निकर परे। कार्तिकेय को वाहन हतो मोर, जबके गणेश जू को वाहन चोखरवा। अब जे तो तै रओ के मोर चोखरवा से पैले परकम्मा पूरो कर लैहे।
सब रे देवता औ कार्तिकेय परकम्मा के लाने निकर परे। सब में लग गई रेस। मनो गणेजू तो हते बुद्धि के देवता। उन्ने चतुराई से काम लओ औ अपने मताई-बाप मने महादेव जू और पार्वती जू की परकम्मा कर के ठाड़े हो गए। पार्वती जू ने जा देखो तो बे गणेश जू से पूछ बैठीं के तुम परकम्मा पे काए नईं गए? ईपे गणेशजू ने कई के हमने तो परकम्मा पूरो कर लओ। जा सुन के महादेव जू ने कई के तुम झूठीं काए बोल रए? तुम तो इतई हमाई परकम्मा ले के ठाड़े हो गए, तुम ब्रह्मांड की परकम्मा करबे कां गए? तब गणेश जू ने कई के पिताजी हम झूठ नईं बोल रए। माता-पिता में पूरो ब्रह्मांड समाओ रैत आए, सो हमने आप दोई की परकम्मा कर के पूरे ब्राह्मांड की परकम्मा कर लई। ईमें झूठ का आए? जो सुन के नारद जू मुस्क्यान लगे औ बोले, बिलकुल सई कई। हमें आप से जेई उमींद रई। आपई हो जोन को नांव सबसे पैले लओ जाओ चाइए औ आपई की पूजा सबसे पैले करी जानी चाइए। नारद जूं की बात सुन के महादेव जू सोई मंद-मंद मुस्क्यान लगे। काए से के बे तो पैलई समझ गए रए के नारद जू ने जा सुरसुरी काय के लाने छोड़ी रई। बे समझ गए रए के नारद जू सबसे बुद्धिमान देवता चुनो चात आएं जोन को नाव ले के मानुस हरें अपनो काम बिना कोनऊं बाधा के पूरो कर सकें। 
इत्ते में कार्तिकेय औ बाकी देवता हरें सोई ब्राह्मांड की परकम्मा कर के लौट आए। सबने कई के अब बताओं के हममें से कोन जीतो? नारद जू ने बता दओ के गणेशजू जीते। जा सुने के कार्तिकेय खों खूबई गुस्सा आओ। बे झगड़न लगे। तब महादेव जू ने उने पूरी किसां बताई और गणेशजू की बुद्धिमानी बताई। तब कार्तिकेय सोई मान गए के सबसे पैले नांव जिनको लओ जा सकत आए बे गणेशजू के अलावा औ कोई होई नईं सकत। फेर ब्रह्माजू बोले के सबसे पैली सई परकम्मा गणेशजू ने करी सो अब जेई समै से परकम्मा करे की प्रथा शुरू भई कहानी। 
सो जे रई गणेशजू की परकम्मा की किसां जो सबसे पैली परकम्मा हती। काए से है का के चाए कोनऊं तीरथ कर आओ मनो सई पुन्न तभई मिलत आए जब मताई-बाप खों खुस राखों औ उनकी सेवा करो। एक तो अपने धरती वारे मताई-बाप रैतईं आएं औ देखों जाए तो सबरे देवी-देवता हरें सोई अपने मताई-बाप ठैरे सो उनकी परकम्मा करी जात आए। जोन से जितनी कोस बने।’’ मैंने भौजी खों पूरी किसां सुना डारी।
‘‘जा किसां हमें ने पता रई। जे तो सई में बड़ी मजेदार आए औ नोनी आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो आजकाल तो मताई बाप औ भगवान को मतलबई बदल गओ आए।’’ भैयाजी बोल परे, जो उतईं खटिया पे परे-परे ऊंघ रए हते।
‘‘का मतलब आपको?’’ मैंने पूछी।
‘‘देख नईं रईं। राजनीति वारन के लाने उनको आका मताई-बाप, भगवान सब कछू होत आए। औ कऊं पार्टी ढरक गई तो आका मने भगवान सोई बदल जात आएं। जोन कुर्सी पे बिराजे, बेई भगवान औ बेई मताई-बाप।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, ऐसों की का कओ भैयाजी, बे तो अगरबत्ती की जांगा बिड़ी खोंस आएं औ कएं के हम अगरबत्ती जला आए। ऐसे लोगन को कोनऊं धरम नईं होत। बे धरम के नांव को भलई खा लेबें, मनो धरम-करम कोन जानत आएं। जेई लाने तो हर बरस गणेशजू पधारत आएं के सबई खों कछू बुद्धि दे दओ जाए। कछू बुद्धि ले लेत आएं औ कछू खाली चंदा खा के अफर जात आएं।’’ मैंने हंस के कई।
भैयाजू सोई हंसन लगे। फेर बे बृंदाबन को अपनो अनुभव सुनान लगे।               
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के बुद्धि के देवता गणेशजू सोई चात आएं के पैले मताई-बाप की सेवा करो, काए से उनकी सेवा करे से भगवानजू खुदई प्रसन्न हो जात आएं। सो बोलो, गणपति बप्पा की जै!!! 
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     गणपति बप्पा मोरया
     फोटो : डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Wednesday, August 27, 2025

बुंदेली बोल : अब बुंदेली बोले में कोऊ नईं सरमात - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, गेस्ट राईटर

"पत्रिका" परिवार को स्थापना दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं🌹🙏🌹


"राजस्थान पत्रिका" के मध्य प्रदेश संस्करण "पत्रिका" समाचार पत्र के सागर संस्करण ने स्थापना दिवस पर विशेषांक प्रकाशित किया है जिसमें "गेस्ट राइटर" के रूप में बुंदेली की वर्तमान स्थिति पर हैं मेरे विचार ....

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बुंदेली बोल : अब बुंदेली बोले में कोऊ नईं सरमात
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
   (पत्रिका स्थापना दिवस विशेषांक,27.08.2025)

अपनी जे बुंदेली आज ऊ मुकाम पे पौंच गई आए जां ऊको बोलबे वारे को मूंड़ शान से ऊंचो हो जात है। आज बुंदेली बोलबे में कोनऊं खों सरम नईं लगत। औ जे जो बुंदेली के दिन फिरे हैं ईमें फिल्मों औ सोसल मिडिया को बड़ो रोल आए। आप ओरन खों याद हुइए के 1998 में फिलम आई हती “चाईना गेट”, ऊमें अपने गोपालगंज के मुकेश तिवारी ‘जगीरा’ बने हते। ऊ फिलम में छूंछी बुंदेली के डायलॉग तो ने हते लेकन ‘जगीरा’ के सबरे डायलॉग बुंदेली स्टाइल में बोले गए ते। ईंसे बुंदेली की तरफी बॉलीवुड को ध्यान खिंचों। फेर तो औ फिलमें आईं जीमें बुंदेली डायलॉग रखे गए। बाकी बुंदेली को सबसे ज्यादा पापुलर बनाओ पैले टीवी के सीरियलों ने औ फेर रीलन ने। ‘हप्पू सिंह’, ‘टीका’,’मलखान’ के करैक्टरन ने तो मनो बुंदेली खों टॉप पे पौंचा दऔ। फेर कोरोना के जमाना में अपनई इते के हसरई गांव के आशीष उपाध्याय औ बिहारी उपाध्याय ने अपने भैयन के संगे मिलके सोसल मिडिया के लानें बुंदेली में रीलें बनानी सुरूं करीं। जोन ने धूम मचा दईं। इन रीलन की अच्छी बात जे हती के जे पारिवारिक टाईप की राखी गईं। कोऊ बी इनखों देख सकत्तो। कऊं कोऊं अस्लीलता नोंई हती। जेई से जे हिट भईं औ बुंदेली ने जानने वारन ने बी देखी। अब तो मुतकी बुंदेली रीलें बन रईं।
       एक बात बताई जानी जरूरी आए के महाराज छत्रसाल के जमाना में बुंदेली राजभाषा रई। ईके आगे राजा मधुकरशाह बुंदेला, मर्दनसिंह, बखतबली की चिठियां लौं बुंदेली में मिलत आएं। बा तो ने जाने कबे अंग्रेज हरों के फेर में पर के अपनी बुंदेली को गंवईं की बोली मानो जान लगो। मनो अब फेर के बुंदेली खों मान मिलन लगो है। अब बुंदेली बोले में कोऊ नईं सरमात।
       बाकी पत्रिका खों धन्यबाद देने तो सबसे पैले बनत आए के जो एक ऐसो राष्ट्रीय स्तर को अखबार आए जोन ने बुंदेली के लाने “टॉपिक एक्पर्ट” नांव को कॉलम छापबो सुरू करो औ मोरे नोने भाग के मोए ऊको लिखबे को मौका दओ। बुंदेली में साहित्य तो लिखोई जा रओ आए। गजलें-मजलें सोई लिखी जा रईं आएं। जे सब प्रयासन से भओ जे के आज बुंदेली बोली जा रई, देखी जा रई औ पढ़ी जा रई।
सो, बोलो जै बुंदेली!
जै बुंदेलखण्ड!
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गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !🚩 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !🚩 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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चर्चा प्लस | गणपति बप्पा मोरया ! प्रथमपूज्य देवता हैं श्री गणेश | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

पढ़िए  श्री गणेश प्रथम पूज्य कैसे बनें 🙏
चर्चा प्लस  
गणपति बप्पा मोरया ! प्रथमपूज्य देवता हैं श्री गणेश            
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह   
       हिन्दू पूजाविधि में श्रीगणेश की पूजा से ही हर अनुष्ठान आरम्भ होता है। हिन्दू धर्म में श्रीगणेश को कार्य आरम्भ करने का पर्याय माना गया है। यहां तक कि पत्राचार और बहीखाते में भी कई लोग ‘‘श्रीगणेशायनमः’’ लिख कर ही कुछ भी लिखना आरम्भ करते हैं। किसी भी कार्य को आरम्भ करते हुए कहा भी जाता है कि ‘‘श्रीगणेश किया जाए’’। गणेश को विघ्नविनाशक देवता माना गया है अतः कार्य प्रारम्भ होने के पूर्व यह विध्नहर्ता की प्रार्थना भी आवश्यक है। किन्तु श्रीगणेश ही क्यों प्रथमपूज्य देवता माने गए, जबकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तो स्वयं में सर्वशक्तिमान देवता हैं? तो चलिए देखते हैं उन पौराणिक कथाओं को जो यह बताती हैं कि गणेश प्रथमपूज्य देवता कैसे बने। ये कथाएं वर्तमान जीवन को भी महत्वपूर्ण सबक देती हैं।
      हिन्दू धर्म संस्कृति में हर शुभकार्य एवं पूजाविधि का आरंभ श्रीगणेश पूजा से ही होता है। कुछ लोग कार्य का शुभारंभ करते समय सर्वप्रथम ‘‘श्रीगणेशाय नमः’’ लिखते हैं। यहां तक कि चिट्ठी और महत्वपूर्ण कागजों में लिखते समय भी ‘‘ऊं’’ या ‘‘श्रीगणेश’’ का नाम अंकित करते हैं। क्योंकि यह माना जाता है कि श्रीगणेश के नाम स्मरण मात्र से उनके कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं। शुभकार्यों के आरंभ एवं पूजन के पूर्व श्रीगणेश पूजा ही क्यों की जाती है? इस संबंध में पौराणिक ग्रंथों में विविध कथाएं मिलती है। 
      एक कथा के अनुसार एक बार सभी देवता इंद्र की सभा में बैठे हुए थे। बात पृथ्वीलोक की होने लगी। तब यह प्रश्न उठा कि पृथ्वी पर किस देवता की पूजा सबसे पहले होनी चाहिए? सभी देवता स्वयं को बड़ा बताते हुए दावा करने लगे कि उनकी पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। तब देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप किया और सलाह दी कि सभी देवता अपने-अपने वाहन से पृथ्वी की परिक्रमा करें। जो देवता सबसे पहले परिक्रमा पूरी कर लेगा, वही पृथ्वी पर प्रथमपूज्य होगा। देवर्षि नारद ने शिव से निणार्यक बनने का आग्रह किया। सभी देव अपने वाहनों पर सवार हो चल पड़े। विष्णु गरुड़ पर, कार्तिकेय मयूर पर, इन्द्र ऐरावत पर सवार हो कर तेजी से निकल पड़े। जबकि श्रीगणेश मूषक पर सवार हुए और अपने पिता शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। माता पार्वती ने गणेश का यह कृत्य देखा तो उनसे पूछा कि ‘‘गणेश यह तुम क्या कर रहे हो? सभी देवता परिक्रमा के लिए निकल पड़े हैं और तुम हमारी परिक्रमा कर के यही खड़े हो? क्या तुम्हें पृथ्वी का प्रथमपूज्य देवता नहीं बनना है?’’
इस पर गणेश जी ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया,‘‘माता! मैंने आप दोनों की परिक्रमा कर के पृथ्वी ही नहीं अपितु पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर ली है। माता-पिता में ही पूरा ब्रह्मांड समाया होता है। अब मुझे पृथ्वी की परिक्रमा कर के क्या करना है!’’
पुत्र गणेश का उत्तर सुन कर शिव और पार्वती दोनों प्रसन्न हो गए। वे समझ गए कि उनका यह पुत्र सबसे अधिक बुद्धिमान है और एक सबसे बुद्धिमान देवता की पूजा से ही हर कार्य आरम्भ होना चाहिए। तभी सभी देवताओं में कार्तिकेय सबसे पहले लौटा और उसने गर्व से कहा कि ‘‘पिताश्री! मैं पृथ्वी की परिक्रमा कर के सबसे पहले आया हूं अतः अब पृथ्वीवासी सबसे पहले मेरी पूजा किया करेंगे। मैं ही प्रथमपूज्य देवता हूं।’’  
      तब शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि ‘‘हे पुत्र कार्तिकेय, तुम प्रथम नहीं आए हो! तुमसे पहले तुम्हारा भाई गणेश परिक्रमा कर चुका है। वह भी पृथ्वी की ही नहीं वरन पूरे ब्राम्हांड की। अतः यही प्रथमपूज्य होगा।’’ 
कार्तिकेय को यह सुन कर बहुत गुस्सा आया। उसे लगा कि माता-पिता पक्षपात कर रहे हैं। उसने शिव को उलाहना दिया कि ‘‘आप गणेश को इस लिए विजयी कह रहे हैं न क्योंकि वह आपका प्रिय पुत्र है? वह मोटा है और उसका वाहन छोटा चूहा है, इसलिए आपको उस पर दया आ रही है। यही बात है न?’’
यह सुन कर शिव ने पूर्ववत मुस्कुराते हुए कार्तिकेय को समझाया कि ‘‘नहीं पुत्र कार्तिकेय! मैं कोई पक्षपात नहीं कर रहा हूं। मेरे लिए मेरी सभी संतानें समान रूप से प्रिय हैं। तुम तथा अन्य देवता महर्षि नारद का प्रयोजन नहीं समझे जबकि गणेश ने समझ लिया। गणेश जान गया कि नारद बुद्धि की परीक्षा ले रहे हैं, परिक्रमा की गति की नहीं। अतः उसे बुद्धि से काम लिया और मेरी तथा तुम्हारी मां पार्वती की परिक्रमा करते हुए ब्रह्मांड की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त कर लिया। इस प्रकार उसने प्रतियोगिता भी जीत ली।’’
जब कार्तिकेय ने यह विवरण सुना तो वह लज्जित हो उठा और उसने श्रीगणेश को उनकी विजय पर बधाई दी। तब तक सभी देवता परिक्रमा कर के लौट आए थे। उन्होंने भी सर्व सम्मति से बुद्धि के देवता गणेश को प्रथमपूज्य देवता स्वीकार कर लिया।

दूसरी कथा है जो श्रीगणेश के जन्म से जुड़ी हुई है। एक बार माता पार्वती स्नान करने के लिए स्नानघर में प्रवेश करने वाली थीं। किन्तु वहां आस-पास कोई नहीं था जिसे वे द्वार पर पहरा देने का काम सौंपतीं। वे नहीं चाहती थीं कि जब वे स्नान कर रही हों तो कोई आ कर उनके स्नानकर्म में व्यवधान डाले। तब माता पार्वती को एक उपाय सूझा। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण फूंक कर उसे जीवित कर दिया। प्राण प्राप्त होते ही बालक ने हाथ जोड़ कर पूछा,‘‘मेरे लिए क्या आज्ञा है माता?’’
‘‘तुम इस महल के द्वार पर पहरा दोगे। जब तक मेरा स्नान पूर्ण न हो जाए तब तक किसी को भी महल में प्रवेश मत करने देना।’’ पार्वती ने आज्ञा दी। वह बालक द्वार पर पहरा देने लगा। 
कुछ देर में भगवान शिव वहां आ पहुंचे। द्वार पर बैठा बालक तो सद्यः जन्मा था अतः शिव अथवा किसी अन्य व्यक्ति के बारे में उसे ज्ञान नहीं था। उसने शिव को महल में प्रवेश करने से रोका। शिव ने उसे सामझाया कि वे इसी महल में रहते हैं और जिस माता की आज्ञा का तुम पालन कर रहे हो वह मेरी अद्र्धांगिनी है।
‘‘तो क्या अर्द्धांगिनी की कोई अपनी इच्छा या प्रतिष्ठा नहीं होती है? यदि वे चाहती हैं कि इस समय महल में कोई प्रवेश न करे, तो उनकी यह इच्छा आप पर भी लागू होती है।’’ उस बालक ने तर्क दिया। यह सुन कर शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोधावेश में बालक का सिर काट दिया। तब तक झगड़े की आवाज सुन कर पार्वती द्वार तक आ पहुंची थीं। उन्होंने उस बालक को सिरविहीन देखा तो दुख और क्रोध से भर उठीं।
‘‘यह आपने क्या किया? आपने मेरे पुत्र का सिर क्यों काटा? मेरा पुत्र आपका भी पुत्र हुआ अतः आपने अपने पुत्र का सिर काट कर आप पुत्रहंता बन गए।’’ पार्वती ने कहा।
‘‘मुझे नहीं मालूम था कि यह हमारा पुत्र है। यह हठ कर रहा था और मुझे महल में प्रवेश नहीं करने दे रहा था इसीलिए मुझे क्रोध आ गया।’’ शिव ने पार्वती को शांत करना चाहा।
‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती हूं! आप मेरे आज्ञाकारी पुत्र को जीवित करिए, अन्यथा मैं भी प्राण त्याग दूंगी।’’ पार्वती ने शिव को चेतावनी दी।
तब शिव ने हाथी के सद्यःमृत बच्चे के सिर को उस बालक के धड़ से जोड़ दिया जिससे वह बालक पुनर्जीवित हो उठा। सूंड़धारी उस बालक को माता पार्वती ने प्रसन्नता से गले लगा लिया। तब भगवान शिव ने उस बालक का नामकरण करते हुए उसे आर्शीवाद दिया कि ‘‘तुम आज से गणेश, गणपति एवं गजानन, गजवदन आदि नामों से जाने जाओगे और तुम बुद्धि के देवता होने के कारण सभी देवताओं से पहले पूजे जाओगे।’’
   यह सुन कर माता पार्वती का क्रोध शांत हो गया तथा उन्होंने अपने पुत्र गणेश को ‘‘श्रीगणेश’’ कह कर संबोधित किया।

तीसरी कथा इस प्रकार है कि एक बार पार्वती के मन में यह इच्छा पैदा हुई कि उनका एक ऐसा पुत्र हो जो समस्त देवताओं में प्रथम पूजन पाए। इन्होंने अपनी इच्छा भगवान शिव को बताई। इस पर शिव ने उन्हें पुष्पक व्रत करने की सलाह दी। पार्वती ने पुष्पक व्रत का अनुष्ठान करने का संकल्प किया और उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया। शुभ मुहूर्त पर यज्ञ का आरम्भ हुआ। ब्रह्माजी के पुत्र सनतकुमार यज्ञ की पुरोहिताई कर रहे थे। 
यज्ञ पूर्ण होने पर विष्णु ने पार्वती को आशीर्वाद दिया कि जिस प्रकार यह यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ है उसी प्रकार आपकी इच्छानुरूप विध्नविनाशक पुत्र आपको प्राप्त होगा। विष्णु से यह आशीर्वाद पा कर माता पार्वती प्रसन्न हो उठीं। यह देख कर सनतकुमार ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘‘मैं इस यज्ञ का ऋत्विक हूं। पुरोहित हूं। यज्ञ भले ही सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है, परंतु शास्त्र-विधि के अनुसार जब तक पुरोहित को उचित दक्षिणा देकर संतुष्ट नहीं किया जाएगा, तब तक यज्ञकर्ता को यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होगा।’’
‘‘बताइए आपको दक्षिणा में क्या चाहिए?’’ माता पार्वती ने सनतकुमार से पूछा।
‘‘माता भगवती, मैं आपके पतिदेव शिवजी को दक्षिणा स्वरूप चाहता हूं।’’सनतकुमार ने विचित्र मांग की। 
‘‘ऋत्विक सनतकुमार!, आप एक स्त्री से उसका पति अर्थात् उसका सौभाग्य मांग रहे हैं जो देना मेरे लिए संभव नहीं है। अतः आप कुछ और मांगिए।’’ माता पार्वती ने सनतकुमार की मांग ठुकराते हुए कहा। 
सनतकुमार अपनी मांग पर अड़ गए। पार्वती ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि यदि मैं आपको अपना पति सौंप दूंगी तो मुझे पुत्र की प्राप्ति कैसे होगी? यज्ञ का फल तो उस स्थिति में भी नहीं मिलेगा। अतः आप हठ छोड़ दें। किन्तु सनत कुमार अपना हठ छोड़ने को तैयार नहीं थे। तब शिव ने पार्वती को समझाया कि ‘‘आप मुझे सनतकुमार को दक्षिणा में दान कर दें और विश्वास रखें कि आपकी इच्छा भी पूर्ण होगी।’’ 
पार्वती सनतकुमार को दक्षिणा में शिव का दान करने ही वाली थीं कि एक दिव्य प्रकाश के रूप में विष्णु प्रकाशित हुए तथा अगले ही पल श्रीकृष्ण का रूप धारण कर के सनतकुमार के सामने आ खड़े हुए। सनतकुमार ने विष्णु के कृष्ण रूप का दर्शन किया और कहा,‘‘मेरी इच्छा पूर्ण हुई अब मुझे दक्षिणा नहीं चाहिए। मैं जानता था कि आपको दान देने से रोकने के लिए विष्णु मेरी इच्छा पूर्ण अवश्य करेंगे।’’
इसके बाद सभी देवता तथा यज्ञकर्ता पार्वती को आशीर्वाद देकर वहां से चले गए। पार्वती अभी अपनी प्रसन्नता से आनन्दित ही हो रही थीं कि एक विप्र याचक वहां आ गया। उसने खाने को कुछ मांगा। पार्वती ने उसे मिष्ठान्न दिए। उतना खा लेने के बाद वह याचक बोला,‘‘मां अभी भूख नहीं मिटी है, थोड़ा और दो!’’
पार्वती ने और मिष्ठान्न दे दिया। इसके बाद याचक खाता जाता और मांगता जाता। पार्वती उसे खिला-खिला कर थक गईं। उन्होंने शिव से कहा कि ‘‘ये न जाने कैसा याचक आया है जिसका पेट ही नहीं भर रहा है। मैं तो खिला-खिला कर थक गई।’’ 
‘‘कहां है वह याचक?’’ कहते हुए शिव याचक को देखने निकले तो वहां कोई नहीं था। पार्वती चकित रह गईं कि अभी तो वह याचक भोजन की मांग कर रहा था और पल भर में कहां चला गया? तब शिव ने पार्वती को उस याचक का रहस्य समझाया कि वह कोई याचक नहीं बल्कि तुम्हारे उदर से जन्म लेने की तैयार कर रहा गणेश है जो जन्म के बाद लंबोदर कहलाएगा और देवताओं में प्रथम भोग पाने वाला प्रथम पूज्य होगा।’’
ये तीनों कथाएं न केवल अयंत रोचक हैं बल्कि यह बताती हैं कि बुद्धि का उपयोग करने वाला ज्ञानी ही प्रथम पूज्य बनता है। इन कथाओं को मात्र धार्मिक भावना से नहीं, वरन ज्ञान भावना से भी समझने का प्रयास करना चाहिए। बुद्धि ही है जो जीवन में सुख, संपदा और सफलता दिलाती है तथा बुद्धि के देवता हैं श्री गणेश इसीलिए तो वे ही प्रथम पूज्य देवता हैं।   
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(दैनिक, सागर दिनकर में 27.08.2025 को प्रकाशित)  
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Tuesday, August 26, 2025

पुस्तक समीक्षा | शब्द-शब्द संवाद करती कविताओं का इन्द्रधनुष | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

'आचरण' में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा 
पुस्तक समीक्षा
शब्द-शब्द संवाद करती कविताओं का इन्द्रधनुष
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - इन्द्रधनुष
कवयित्री     - अनिता निहालानी
प्रकाशक     - विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी-221001
मूल्य        - 100/
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        कविता की प्रकृति ही संवादी होती है। किन्तु कई कविताएं तब मुखर हो कर संवाद नहीं कर पाती हैं, जब उनमें कलापक्ष कुछ अधिक प्रभावी हो जाता है। वस्तुतः वही कविताएं संवाद कर पाती हैं जिनमें भाव पक्ष सरल, सहज और सटीक शब्दों के साथ प्रस्तुत होता है। कवयित्री अनिता निहालानी का कविता संग्रह है ‘‘इन्द्रधनुष’’। जब ‘‘इन्द्रधनुष’’ की कविताओं को मैंने पढ़ा तो मुझे प्रत्येक कविता के हर शब्द मुखर हो कर संवाद करते मिले। जबकि विशेष यह है कि अनिता निहालानी जी से मेरा परिचय मात्र इतना है कि प्रकृति के सुंदर फोटोग्राफ खींच कर वे अपनी फेसबुक वाॅल पर शेयर करती हैं और मुझे वे पसंद आते हैं, मैं उन्हें ‘लाईक’ कर देती हूं। अर्थात मैं उन्हें प्रकृतिप्रेमी छायाचित्रकार के रूप में ही जानती रही जब तक कि मैंने उनका कविता संग्रह नहीं पढ़ा था। एक दिन अचानक मैसेंजर पर उन्होंने अपनी पुस्तकें मुझे भेजने के लिए मेरा पता मांगा। मैंने उन्हें पता दे दिया। क्योंकि यह मेरा पहले भी यह अनुभव रह चुका है कि बिना किसी शोरशराबे के शांतभाव से रचनाकर्म करने वाले रचनाकारों में कई बेहद प्रतिभावान रचनाकार मिले हैं। अनिता निहालानी जी के रूप में भी यही हुआ कि जब मैंने उनकी कविताएं पढ़ीं तो मुझे लगा कि इस कवयित्री के भावों और विचारों में वह गंभीरता है जो कम ही देखने को मिलती है।

प्रकृति से अनिता जी का लगाव तो है ही। इस संदर्भ में उन्होंने अपने कविता संग्रह के ‘‘आमुख’’ में भी लिखा है कि -‘‘प्रकृति का सौंदर्य किसे नहीं लुभाता, अनंत आकाश की नीलिमा, गहरा सागर, बारिश की पहली बूँद पड़ने पर धरा से उठने वाली सोंधी सी महक, पुष्प, पक्षी सभी मानव को आकर्षित करते हैं। यहीं से उसकी खोज शुरू होती है, क्योंकि जब बाहर का सौन्दर्य हर बार उसे भीतर एक सी प्रसन्नता का अनुभव नहीं करा पाता, उसका आनंद उसके ही मन द्वारा बाधित होता है, तब यह बात उसे मन की गहराई में जाने तथा उसे टटोलने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रयास में वह अपने ही मन की शक्तियों से परिचित होता है। अब बाहर की घटनाएँ उसे प्रभावित नहीं कर पातीं। वह स्वयं को कई दुखों से बचा ले जाता है, उसे जैसे एक नई दृष्टि मिल जाती है, एक नया जीवनदर्शन। अब वह अपने आस-पास के समाज पर नजर डालता है, उनका सुख-दुख महसूस कर पाता है। समाज के अनुभवों को बाँटते-बाँटते उसका हृदय विशाल हो जाता है, वह राष्ट्र और विश्व के साथ भी वही अपनापन महसूस करता है। देश और दुनिया के लोगों से जैसे-जैसे उसका सरोकार बढ़ता हुआ सा लगता है, वह अपने भीतर एक नए तत्व प्रेम का अनुभव करता है। उसे विश्व के प्रति अपने अंतर में उठती हुई एकत्व की भावना प्रेम के रूप में विकसित होती दिखाई देती है। प्रेम उसके अस्तित्व में समा जाता है। प्रेम की इस डगर पर एक दिन उसे अव्यक्त की झलक मिलती है, और अब वह उसकी खोज में निकल पड़ता है।’’

देखा जाए तो यह आमुख इस काव्य संग्रह का निचोड़ है, सार है। अनिता निहालानी ने संग्रह की अपनी सभी कविताओं को उनकी विषयवस्तु के अनुरूप सात भागों में विभक्त किया है और सभी भागों के पृथक शीर्षक हैं- प्रकृति, मन, जीवन दर्शन, समाज, देश दुनिया, प्रेम और अव्यक्त।
प्रकृति उनको प्रिय विषय है अतः अपनी कविताओं में उन्होंने प्रकृति की सुंदरता एवं विशालता से आरम्भ किया है। वे ‘‘प्रकृति’’ शीर्षक कविता में लिखती हैं -
अनगिन नक्षत्रों को धारे 
विस्तृत भू पर गगन विशाल 
शुभ्र नीलवर्णी अंबर पट 
सूर्य चंद्र से शोभित भाल।
निज कक्षा में भ्रमण कर रहे 
लघु, विशाल कई ग्रह अविराम 
दसों दिशाएँ देतीं पहरा 
मुक्त अनिल बहती हर याम।

     प्रकृति की विशालता कवयित्री को नक्षत्रों तक ले जाती है। वहीं ‘‘गर्मियों की एक शाम’’ का वर्णन करती हुई वे लिखती हैं -
स्मृतियों के उपवन में सजी 
उस सजीली साँझ की सुगन्ध 
रक्तिम नभ तले लौटते पंछी 
मन में भरते उच्छवास निर्बन्ध ।

यूं भी शाम का स्मृतियों से सीधा संबंध होता है। शाम होते ही मन व्याकुल हो उठता है और तब स्मृतियां जाग उठती हैं। किन्तु कवयित्री अनिता निहालानी यहीं नहीं ठहरतीं। वे निज से सर्व की ओर प्रस्थान करती हुईं बादल फटने से होने वाले विनाश को भी इंगित करती हैं और धिक्कारती हैं। ‘‘बादल फटा’’ कविता शीर्षक की कुछ पंक्तियां देखिए-
क्यों रे बादल 
क्यों फट पड़े तुम 
कहर बरपाया, 
सोते हुओं को जल समाधि दिला 
शांत हुए तुम मानव बलि पा।
हम मरे, बहे, कटे, जले 
अनगिनत बार... 
फिर-फिर जन्मेंगे 
सहने प्रकोप प्रकृति का, 
सुख पाने, प्रकृति बन महकेंगे।

प्रकृति मिट-मिट के बनती है, पुनः संवरती है, यही प्रकृति का यथार्थ है। प्रकृति की यह भी खूबी है कि वह मानव मन पर गहरी छाप छोड़ती है। वहीं मानव मन की भी अपनी एक निजी प्रकृति होती है। मन पर लिखी उनकी दो कविताओं मे से ‘‘मन-2’’ में मन की गोपनीय प्रकृति को कवयित्री ने लक्ष्य किया है-
भीतर कितने भेद छिपाए, 
बाहर रूप बदल कर आए 
द्वन्द्वों का शिकार हुआ जो, 
मन, हाँ पागल मन, कहलाए।

वर्तमान में सच झूठ के बोझ तले दबा हुआ मिलता है। दिखावा, आडम्बर, छल की प्रवृति इतनी अधिक प्रभावी हो गई है कि झूठ में से सच को छांट पाना कभी-कभी बड़ा कठिन हो जाता है। कविता है ‘‘सच’’। इसमें अनिता जी ने सच के स्वरूप की सुंदर व्याख्या की है- 
सच केवल सच होता है 
उसी तरह जैसे आकाश से तिरती बर्फ 
श्वेत, स्वच्छ, निर्मल 
सच को आवरण पहना देने से भी 
भीतर यह पवित्र रहता है
मन सच है
मन होता नहीं मलिन 
ओढ़ाए गए विचारों और कल्पनाओं से 
मन भोले निष्पाप शिशु सा

कवयित्री ने ‘समाज’ खण्ड में मानव और उसकी मनुष्यता का आकलन किया है ‘‘आदमी’’ कविता में। समाज और समाज को गढ़ने वाला मानव कितने दोहरेपन में जीता है, यह बात इस कविता में अक्षरशः उदाहरण सहित अभ्व्यिक्त है-
हम पंछियों को दाना चुगाते हैं 
गऊ माता को खिलाते हैं रोटी 
क्यों नजरें फेर लेते हैं, 
गली में खेलते नंग-धड़ंग बच्चे से...
उसकी चाल में पंछियों की सी उड़ान है, 
उसकी आँखें भी, 
मूक पशु की आँखों से 
कम सुंदर तो नहीं।
वह आदमी का बच्चा है तो, 
हिकारत का पात्र है

‘‘इस संग्रह ‘‘इन्द्रधनुष के पूर्व अनिता निहालानी के दो कविता संग्रह और प्रकाशित हो चुके हैं- ‘‘बस इतना सा सरमाया’’ और ‘‘श्रद्धा सुमन’’। यह संग्रह भी कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था किन्तु इसकी कविताओं में जो ताप है उसकी आंच को महसूस करने के लिए उनकी बार-बार चर्चा की जानी आवश्यक है। निश्चत रूप से अनिता जी के भावों में गहराई है और अभिव्यक्ति में स्पष्टता है और यही इस संग्रह की कविताओं को विशेष रूप से पठनीय बनाती है।
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(26.08.2025 )
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Saturday, August 23, 2025

संस्मरण | पद्मश्री रामसहाय पांडे - डॉ शरद सिंह | "चौमासा" पत्रिका में प्रकाशित

आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, भोपाल की पत्रिका  "चौमासा" के मार्च - जून 2025 अंक में सागर गौरव मृदंग वादक व राई नर्तक पद्मश्री स्व. पं. रामसहाय पाण्डेय जी के जीवन पर आधारित है मेरा लेख ....👇
🚩 हार्दिक आभारी हूं "चौमासा" के संपादक मण्डल की। 🌹🙏🌹 
         लेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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टॉपिक एक्सपर्ट | मुतके स्कूलन की पोलें खुल गईं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | बुंदेली में

टॉपिक एक्सपर्ट
मुतके स्कूलन की पोलें खुल गईं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अब आप ओरें सोच रए हुइए के ईमें नओ का? स्कूलन की पोलें तो बरहमेस, खुलत रैत आएं। अबई जेई साल में पता परी के गांव के टीचर हरें अपने बदले पढ़ाबे के लाने भाड़े के टीचर राख रए। बा पोल खुलतई साथ पूरो प्रसासन  तरे-ऊपरे हो गओ। जांच-जूंच चली, सजा दई गई। ऐसई कभऊं- कभऊं कछु सरकारी मालक हरें गांव-मांव में ढूंकबे पौंच जात आएं। सो उते उने कऊं टीचर कम मिलत आएं तो कऊं पूरोई स्कूल में तारो डरो मिलत आए। ओ कऊं-कऊं पढ़ाई की ऐसी के कओ बालक हरें माननीय मोदी जू खों अपने इते को मुख्य मंत्री बता देवें। बाकी जे न सोचो के हम जे वारी पोलों की कै रै। हम जिन पोलों की कै रै, बे दूजी आएं। 
    का आए के पढ़ाई के लाने स्कूल में सई माहौल बी तो भओ चाइए। औ गांव तो गांव, सहर के कछु स्कूलन में जो हाल आए ऊकी सबरी पोलें तो ई बारिस ने खोल दईं। एक तो कोऊं-कोऊं स्कूल में बच्चों के लाने बैठबे को फर्नीचर लौं नइयां, मनो ऊमें कछू नईं हमने सोई अपने जमाना में सरकारी स्कूल में फट्टी पे बैठ के पढ़ाई करी रई। मनों बरसात में उनकी छत ने टपकत्ती। अब तो ई दार बारिस ने बता दई के बच्चों के मूंड़ पे कां छत चुआ रई औ कां छत को पलस्तर गिर रओ। सो हम जे वारी पोल की बात कर रै। बच्चा हरें पढ़हें औ बढ़हे तब जब उनके मूंड़ पे पानी औ पलस्तर ने टपके। सो, ऐसे स्कूलन में बच्चों की जान की अमान रखी जाए, मालक! देस को आजाद भए 78 सालें हो गईं, औ जे हाल आए स्कूलन को। कछू तो सरम करी जाए, मालक !
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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