Tuesday, January 13, 2026

पुस्तक समीक्षा | गहन संवेदनाओं रेखांकन है हरजिंदर सिंह सेठी की कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
गहन संवेदनाओं रेखांकन है हरजिंदर सिंह सेठी की कविताओं में 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - मेरी धरती के लोग 
कवि            - हरजिंदर सिंह सेठी
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य       - 250/-
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हरजिंदर सिंह सेठी एक चिरपरिचित नाम हैं, पाठकों के लिए भी और मेरे लिए भी। इनके विविधतापूर्ण लेखन ने एक बड़ा पाठक वर्ग अपने लिए पाया है। 22 जुलाई 1947 को गाजियाबाद में जन्मे हरजिंदर सिंह सेठी  वर्तमान में मुंबई में निवासरत हैं। इनकी शिक्षा तथा इनका कार्यक्षेत्र भी मुंबई ही रहा है। जीवन से गहरा जमीनी जुड़ाव रखते हैं। इनकी अभी इस कविता संग्रह के पूर्व छः पुस्तकें प्रकाशित हुईं - गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी), यह चुप रहने का समय नहीं (कविता संग्रह), सौ सवाल सौ जवाब (इतिहास), कुछ किताबें कुछ लोग (समीक्षा संस्मरण), नामदेव वाणी: व्याख्या विवेचन (अध्ययन) तथा बादशाह दरवेश (जीवन गाथा)। इनमें से सेठी जी ने अपनी प्रथम पुस्तक "गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व" मेरी माता जी डाॅ विद्यावती ‘मालविका’’ जी को डाक द्वारा भेंट की थी। उसी दौरान मैंने सेठी जी की पुस्तक पढ़ कर गुरु तेगबहादुर जी के बारे में विस्तार से ज्ञान प्राप्त किया। तदोपरांत मेरी दीदी डाॅ वर्षा सिंह जी का भी सेठी जी से संक्षिप्त पत्र संवाद रहा। अब जब अपनी नवीनतम पुस्तक उन्होंने मुझे प्रेषित की तो मुझे लगा कि मैं एक पारिवारिक परंपरा को जी रही हूं। किसी परिचित की पुस्तक समीक्षार्थ हाथों में होना धर्मसंकट खड़ा करता है किन्तु जब मैंने हरजिंदर सिंह सेठी का यह नवीनतम काव्य संग्रह पढ़ा तो मेरे सारे संकट स्वतः कट गए। इस काव्य संग्रह की समस्त कविताएं इतनी सशक्त एवं संवादनात्मक हैं कि वे स्वयं अपनी प्रकृति से परिचित कराती हैं तथा निष्पक्षता से प्रशंसा करने के लिए बाध्य करती हैं।
‘‘मेरी धरती के लोग’’ नाम है हरजिंदर सिंह सेठी के नवीनतम काव्य संग्रह का। इसका मुखपृष्ठ ही बहुत कुछ बयान कर जाता है जिसमें पूरी ताकत से एक मालवाहक रिक्शा खींचता हुए रिक्शाचालक की तस्वीर है। ये या इन जैसे मेहनककश भी तो हमारी धरती के लोग हैं। किन्तु हममें से अधिकांश देख कर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। उनकी दृष्टि में ये बुनियादी लोग नहीं वरन ‘छोटे लोग’ हैं जिनसे कोई वास्ता रखना गोया गुनाह है। ऐसे ही मनुष्यों की तथा उनके परिवेश की कविताएं हैं ‘‘मेरी धरती के लोग’’ में। इस संदर्भ में कवि ने अपने संग्रह की पहली कविता ‘‘सूरज उगने तक’’ में ही अपने कवित्व का ध्येय स्पष्ट कर दिया है, कुछ पंक्तियां देखिए-
मेरे पास कहने के लिए 
अपना तो कुछ भी नहीं।
वही लिखता हूं 
00000000
मैं तो हूं सिर्फ अनुवादक 
उनकी भावनाओं का। 
कठिन समय से गुजरती 
उनकी जिंदगी की क्रूरताओं को
रूपांतरित करता हूं अपने शब्दों में।

एक कप चाय और एक बड़ापाव खा कर अथवा एक कप चाय के साथ आधा प्लेट पोहा खा कर घंटों पैडल रिक्शा चलाना, हम्माली करते हुए अपने कंधों और पीठ पर सैंकड़ों किलो बोझा ढोना क्या आसान है? फिर भी लोग उनसे मोल-भाव करने से नहीं हिचकते हैं। एक हम्माल से जो पांच रुपए वे कम कराते हैं उनसे उनके लिए चबा का थूक देने वाला शायद एक पान भी न आए किन्तु उसी पांच रुपए से वह मेहनतकश एक कप कट चाय पी कर कई किलो बोझा और ढो सकता है। गरीबी सपने तो देती है किन्तु उन सपनों को पूरा करने की क्षमता सोख लेती है। इस मार्मिक सत्य को अपनी कविता ‘‘ढाबे में पहाड़’’ में बड़ी स्पष्टता से सेठी जी ने वर्णित किया है-
भाई की उंगली पकड़े 
छोटे-छोटे पैर रखता 
पहाड़ से नीचे उतर आया है/बीर सिंह।
बीर सिंह रहेगा 
दिल्ली के किसी होटल या ढाबे में 
फर्श पर लगायेगा झाडू,/मांजेगा बर्तन 
चाय का गिलास रखेगा टेबल पर 
ग्राहक के सामने। 

      विकास अथवा प्रगति के क्या मायने होने चाहिए? क्या यही कि शहर फैलते जाएं, उनमें चमचमाती सड़कें पसरती जाएं और गरीबों को बदनुमा दाग मान कर पीछे, बहुत पीछे धकिया दिया जाए, जहां से वे दिखाई भी न दे सकें और फिर देश को खुशहाल मान लिया जाए। यह खरी सच्चाई अपने पूरे खुरदेरेपन के साथ उतर आई है सेठी जी की कविता ‘‘स्मार्ट सिटी’’ में। एक अंश कविता का-
यहां से दिखेगी 
एक खुशहाल और उन्नत देश की तस्वीर।
यहां से नहीं दिखेंगी 
टीन टप्पर वाली झुग्गी झोंपड़ियां 
कीचड़, बदबू और कूड़े के ढेर वाली बस्तियां, 
अंधेरी गलियां, टूटे फूटे रास्ते। 
बिजली और पेयजल के लिए 
तरसते लोग। 

    सच को ढांक कर ढोंग भले ही किया जा सके किन्तु सच को देर तक छिपाए नहीं रखा जा सकता है। फिर भी साहित्य का एक हिस्सा आज मानो लकवाग्रस्त हो गया है। उसने सच बयानी से अपना नात तोड़ लिया है। ऐसे पंगु साहित्य के एक-एक शब्द साहित्य की वास्तविक आत्मा को आहत करते हैं। जैसे ‘‘कविता आजकल’’ में हरजिंदर सिंह सेठी लिखते हैं-
आजकल बहुत उदास है 
कविता क्रांति की भाषा बोलने वाली 
एक दम शांत चुप है। 
क्षीण पड़ गया है, प्रतिरोध का स्वर
लड़खड़ा रहे हैं, उसके सारे शब्द 
निरीह से जाकर बैठ गए हैं 
दाहिने कोने में 
जहां जिंदगी सहम गई है।

      निःसंदेह जब समाज को दर्पण दिखाने वाला, लड़खड़ाने वाले को सहारा देने वाला साहित्य लाचारी का कंबल ओढ़ लेता है तो ज़िन्दगी सहम जाती है तथा अव्यवस्थाएं सिर उठाने लगती हैं। जब व्यवस्थाएं चरमराती हैं तो हमारी अपनी बेटियां भी सुरक्षित नहीं रहती हैं। ‘‘कब तक’’ शीर्षक से सेठी जी प्रश्न करते हैं कि-
कब तक भय के माहौल में 
जिएंगी लड़कियां। 
कब तक चुप्पी ओढ़कर 
बैठे रहेंगे हम लोग 
कब तक बने रहेंगे गूंगे 
कब तक जलाते रहेंगे मोमबतियां।

      मोमबत्तियां जलाने का प्रतीक उस लाचारी को दर्शाता है जहां हम सकल पीड़ा से दुखी तो हैं, अपने दुख का प्रदर्शन भी कर रहे हैं किन्तु पुरजोर प्रतिकार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। दरअसल यह संवेदनाओं में आती जा रही कमी का प्रत्यक्ष उदाहरण है। ऐसा ही एक उाहरण है जब किसी की मृत्यु को भुनाने का प्रयास किया जाता है। यह संवेदनाओं की अकाल मृत्यु नहीं तो और क्या है। ‘‘एक कवि की मौत पर’’ कविता इसका खांटी बयान करती है-
मैंने कवि की मृत्यु पर 
गहरा दुःख व्यक्त किया 
और अखबार में खबर छपवाई।
मैंने उसकी उपलब्धियों पर 
पत्रिकाओं में लेख लिखे 
और ढेर सा पारिश्रमिक पाया।

कुल 60 कविताओं में संग्रह की अंतिम कविता है ‘‘मेरी धरती के लोग’’। यह कविता इस संग्रह की सभी कविताओं का मानो निचोड़ प्रस्तुत करती है तथा उनकी उपस्थिति का स्मरण कराती है जिन्हें सामने देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है-‘‘मुझे अच्छे लगते हैं-/यह बशीरा/जो रिक्शा चलाता है/यह अन्ना/जो ठेला खींचता है/यह गोपालन/जो भाजी बेचती है,/यह सरबतिया/जो खोमचा लगाती है/यह सोहन सिंह/जो टैक्सी चलाता है।

हरजिदर सिंह सेठी की कविताएं पाठकों की आत्मा से संवाद करने में सक्षम हैं। इन्हें पढ़ने वाला ठिठक कर सोचेगा और उनकी ओर कम से कम एक बार अवश्य दृष्टिपात करेगा जिन्हें वह देख कर भी नहीं देखता है। इस लिहाज़ से हरजिंदर सिंह सेठी के इस काव्य संग्रह ‘‘मेरी धरती के लोग’’ की हर कविताएं अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। 
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Saturday, January 10, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सुप्रीमकोर्ट के माननीय हरें भौत बुद्धिमान ठैरे, तभईं तो सबरे न्याय के लाने उनपे भरोसो करत आएं। ई दारे बी उन्ने भौतई सई कई। कोन मामला में? सो, ई टेम पे सबसे बड़ो मामलो सामने ठाड़ो आवारा कुत्तन को। देखो जाए तो जे नेशनल इश्यू बन गओ आए। एक तरफी कुत्ता प्रेमी औ दूसरी तरफी आवारा कुत्तन से छुटकारो चाउने वारे। आवारा कुत्तन के साईड वारे लोगन की तरफी से कपिल सिब्बल जू ने सुप्रीमकोर्ट में कई के जो कुत्तन के संगे सहूरी से पेश आओ जाए तो बे न काटहे। ईपे सुप्रीमकोर्ट के माननीय जज हरों ने कई के कोई कोऊ खों पतो नहीं रैत के कुत्ता को मूड का आए औ कबे काट ले। सुप्रीम कोर्ट ने जे सोई कई के स्कूलें होंए चाए अस्पतालें होंए औ चाए अदालत को कंपाउंड होए, उते आवारा कुत्तन खों काए फिरो चाइए? औ ऐसी जांगा से उने हटाबे में कोनऊं खों काए आब्जेक्शन भओ चाइए?
    आवारा कुत्तन खों जो मामलो आए जो सुप्रीम कोर्ट में चल रओ। सो, अपन ओरें डिसीजन होबे लौं का करें? जे बात हमने अपने एक पैचान वारे वकील से पूंछी सो, बे बोले के तब तक जो आवारा कुत्ता सामने परे तो ऊंसे तुरतईं पूछियो के ‘‘डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है? आप हमें काटहो तो नईं? जो ऊको मूड ठीक हुइए तो न काटहे औ जो ऊको मूड खराब हुइए तो सुजी लगाबे वारे खों ढूंढियो।’’  जा उन्ने ठिठोली में नोंई, पूरी गंभीरता से कई रई। सो, डिसीजन आबे तक तनक बच के रहियो आवारा कुत्तन से। संगे जा सोई सोचियो के जोन देस में कुत्ता रोड पे आवारा नईं फिरत का उते के लोग कुत्ता खों चाउने वारे नईं होत?
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, January 9, 2026

शून्यकाल | बढ़ता जलवायु परिवर्तन, घटते वन्यजीव और हमारे प्रयास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
बढ़ता जलवायु परिवर्तन, घटते वन्यजीव और हमारे प्रयास
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

चाहे हम इसके लिए कटते जंगलों को दोष दें या बढ़ते शहरों को, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि हमारी गलतियों और लापरवाही की वजह से मौसम तेज़ी से बदल रहा है और इस बदलाव का असर वन्यजीवों पर पड़ा है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बढ़ रहा है, वन्यजीव कम होते जा रहे हैं। जिसके डरावने आंकड़े अब हमारे सामने आ रहे हैं। इसलिए अब हमारे पास एकमात्र विकल्प यही है कि हम जलवायु को सुधारें और वन्यजीवों को बचाएं, अभी नहीं तो कभी नहीं। याद रखें कि चीते पहले भारत में भी पाए जाते थे लेकिन अत्यधिक शिकार और आवास विनाश के कारण उन्हें 1947 में आखिरी बार देखा गया और 1952 में भारत से आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित किया गया।
हमने कहानियाँ पढ़ी हैं
शेरों, भालुओं और सियार की
अपने बचपन में,
हमने उन्हें शहर के चिड़ियाघरों में देखा है।
बहुत से जानवरों को देखा है
जो अब खत्म हो चुके हैं, उनकी तस्वीरों में।
क्या यह बायोलॉजिकल विरोधाभास नहीं है कि-
एक तरफ हमारे वैज्ञानिक
इस धरती पर
डायनासोर को वापस लाना चाहते हैं,
जबकि हम
मौजूद शेर, बाघ, तेंदुए
और काले हिरणों को बचाने में नाकाम रहे हैं।
तो कैसा होगा
हमारे भविष्य का वन्यजीवन
मौत से खाली
या जीवन से भरा?

यह सिर्फ़ मेरी कविता नहीं, बल्कि मेरा ध्यान भटकाने वाली बात है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन कई जंगली प्रजातियों के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा बनकर उभरा है, जिसके कारण जंगली जानवरों की कई प्रजातियों की संख्या कम हो रही है और कुछ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। हालाँकि, जलवायु परिवर्तन पक्षियों और स्तनधारियों दोनों के माइग्रेशन पैटर्न को बाधित कर सकता है और महत्वपूर्ण आवास को सिकोड़ सकता है। धीमी प्रजनन दर भी प्राइमेट्स और हाथियों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति संवेदनशील बनाती है। जलवायु परिवर्तन ने वन्यजीवों के लिए कई खतरे पैदा किए हैं। बढ़ते तापमान से कई प्रजातियों के जीवित रहने की दर कम हो जाती है, जिससे भोजन की कमी, कम सफल प्रजनन और स्थानीय वन्यजीवों के लिए पर्यावरण में हस्तक्षेप होता है। नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की खतरे में पड़ी प्रजातियों की रेड लिस्ट में शामिल 47 प्रतिशत स्तनधारी और 23 प्रतिशत पक्षी जलवायु परिवर्तन से नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया, इटली और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं की एक टीम ने 130 अध्ययनों का अध्ययन किया, जिसमें यह दस्तावेज़ किया गया था कि कोई प्रजाति जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुई है या नहीं। यह 1990 और 2015 के बीच प्रकाशित हुआ था, जिसका मतलब है कि यह पुराना डेटा है, लेकिन आज के लिए चेतावनी देने के लिए काफी है।
मानवजनित या प्राकृतिक परिस्थितियाँ वन्यजीवों को इंसानों पर हमला करने के लिए मजबूर करती हैं। जब जंगल बहुतायत में थे, तो इंसान और वन्यजीव दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में सुरक्षित रहते थे, लेकिन समय बदला और आबादी भी बढ़ी, तो जंगलों का अंधाधुंध विनाश शुरू हो गया। इसके परिणामस्वरूप इंसानों और वन्यजीवों के बीच कभी न खत्म होने वाले संघर्षों की एक श्रृंखला शुरू हो गई। इंसान अपनी कई ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों का शोषण कर रहा है, जिसके कारण इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएँ सामने आ रही हैं। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन ने भी वन्यजीवों को प्रभावित किया है या यह कहना गलत नहीं होगा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा असर वन्यजीवों पर पड़ा है। वन्यजीवों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण, उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाता है, जिसके कारण वन्यजीव मानव बस्तियों में चले जाते हैं और इससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। कोरोना काल के लॉकडाउन के दौरान, मुंबई के गोरेगांव इलाके में एक रिहायशी कॉलोनी की सुबह एक तेंदुआ बेखौफ घूमता हुआ देखा गया। तेंदुआ बिल्डिंग के पार्किंग एरिया के पास बेखौफ घूम रहा था। दरअसल, सुबह-सुबह सड़कों पर ज़्यादा लोग नहीं होते हैं। ऐसे में तेंदुआ बहुत आराम से घूमता हुआ देखा गया। यह अकेली घटना नहीं थी। ऐसी कई घटनाएँ सामने आती रहती हैं जब खूंखार जंगली जानवर इंसानी बस्तियों में घुस जाते हैं। तेंदुओं का इंसानी बस्तियों में घूमना आम बात नहीं है। जंगली जानवर इंसानों से दूर रहना पसंद करते हैं। असल में, जंगली जानवरों के अपने इलाके से बाहर निकलने के कारण भी वही हैं जो जलवायु में तेज़ी से बदलाव ला रहे हैं। इसका मतलब है जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई और वन्यजीवों के रहने की जगह का सिकुड़ना। अपने छोटे से इलाके में पर्याप्त खाना और घूमने की जगह न मिलने के कारण, जंगली जानवर इंसानी बस्तियों की तरफ आने लगते हैं। जहाँ का माहौल अशांत और प्रदूषित होता है, वह उन्हें मानसिक रूप से आक्रामक बना देता है। इस तरह, जंगली जानवरों के व्यवहार में बदलाव कभी-कभी उनकी जान को खतरे में डाल देता है।
पूरी दुनिया की तरह भारत में भी जंगली जानवरों पर संकट गहराता जा रहा है। उदाहरण के लिए, राजस्थान का रेगिस्तानी इलाका सदियों से सूखा रहा है, लेकिन अब यहां बाढ़ की वजह से जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। बाढ़ के कारण पश्चिमी इलाकों में कई ऐसे इलाके हैं, जहां पहले बड़ी संख्या में काले हिरण पाए जाते थे। आज वे इलाके बाढ़ की वजह से दलदली हो गए हैं। इस वजह से काले हिरणों को इधर-उधर घूमने में दिक्कत होने लगी है। और कई इन दलदली इलाकों में फंसकर मर जाते हैं। इतना ही नहीं, पहले इन इलाकों में गर्मियां सूखी होती थीं और आज स्थिति यह है कि इन इलाकों में बहुत ज़्यादा नमी है। यह मौसम काले हिरणों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है। हिरणों की संख्या में कमी इस बात का काफी संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यहां के पर्यावरण में तेज़ी से बदलाव आया है। वन विभाग के 2022 के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 2002 की वन्यजीव जनगणना की तुलना में पश्चिमी राजस्थान के सभी पांच जिलों में उनकी संख्या आधी भी नहीं रह गई । दो दशक पहले तक यहां 4,237 काले हिरण पाए जाते थे, लेकिन इस साल की जनगणना के अनुसार, इस इलाके में सिर्फ़ 2,346 हिरण बचे हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि हिरणों की संख्या में कमी का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है।

चीते पहले भारत में पाए जाते थे और उनका एक लंबा इतिहास है, लेकिन अत्यधिक शिकार और आवास विनाश के कारण उन्हें 1947 में आखिरी बार देखा गया और 1952 में भारत से आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित कर दिया गया था। इसलिए, जब हम अपनी वाइल्डलाइफ को बेहतर बनाने के लिए विदेशों से चीते जैसे जंगली जानवर लाए हैं, तो उसी समय हमें उन कारणों को खत्म करने पर भी ध्यान देना होगा जिनकी वजह से क्लाइमेट बदल रहा है और जंगली जानवरों की ज़िंदगी खतरे में पड़ रही है।
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Thursday, January 8, 2026

बतकाव बिन्ना की | देख तो बिन्ना, जे को जाने का-का हो रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की    
       
देख तो बिन्ना, जे को जाने का-का हो रओ                             
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


‘‘संकारे से अखबार में इन्दोर की खबरें पढ़-पढ़ के दिमाक खराब सो हो रओ तो। इंसान पानी पियत आए जिन्दा रैबे खों औ उते पानी पी के जाने जा रईं। कोन सोच सकत्तो के प्रदेस की सबसे साफ-सुथरी कहाबे वारी सिटी में सबसे गंदो पानी पिलाओ जा रओ। अपन ओरों की होय तो कछू समझ में आए के इते तो ऊंसई पानी की सल्ल मची रैत आए औ संगे गंदगी सोई फैली रैत आए। मनो उते देखो का से का भओ जा रओ। सई में देखो तो बिन्ना को जाने का-का हो रओ। जा सब सुन-सुन के जी डरात आए।’’ भौजी ने कई।
‘‘कै तो आप सई रईं मनो ऐसो कोनऊं सिटी में कोनऊं के संगे ने होए सो अच्छो। काए से अपनों को खोबे की पीरा का होत आए बा कोरोना ने मुतके जनों खों समझा दई आए। मैंने सोई झूली आए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई से तो हम कै रए के, ईके बाद बी इत्ती बड़ी लापरवाई करी गई। अरे अब तो सबई खों जीवन को मोल समझो चाइए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, बाकी अपने इते बी अब पानी की टंकियन पे ध्यान दओ गओ आए। कई ठों टंकियन में गिलावो औ गंदगी मिली।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो मोए समझ में नई आत आए के परसासन कोनऊं बड़ी घटना होबे को इंतजार काए करत रैत आए? अब इन्दोर में जब गंदे पानी पीबे से मौतें होन लगीं तो सबरे शहर के परसासन वारे जा उठे, औ ईके पैले पल्ली ओढ़ के सो रए हते। ऐसईं जब कोनऊं रोड पे मुतके एक्सीडेंट हो जात आएं तब परसासन खों लगत आए के चल के उते एक ठइयां बोर्ड ठाड़ो कर दओ जाए के इते खतरा आए। अरे, पैले लगा देते तो का जातो?’’ मैंने कई।
‘‘अरे, सो अबई देख लेओ! ठंडी परन लगी हती औ संकारे से कोहरा सो सोई छान लगो रओ मनो स्कूल को टेम ने बदलो जा रओ हतो। जब अखबार वारन ने लिखो तो तब टेम बदरवे की सुद आई। जे तो कओ के बच्चा हरें बीमार ने परे, ने तो बड़ी सल्ल बींदती।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, चाए आबारा कुत्तन को झुण्ड फिरत रए चाए सांड बीच सड़क पे लड़त रएं, को ध्यान दे रओ। औ हमें तो लगत आए के सांड़ पकरबे वारे सोई एक मोहल्ला के सांड पकर के दूसरे मोहल्ला में छोर आउत आएं। जीसें देखत में नओ सांड़ रए औ ऊकी ब्यावस्था बी ने करने परे। परसासन वारों को तो बस मों चलाबो आउत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘औ इत्तोई नोंई, ऊपे नेता हरें फिजूल की बतकाव करन लगे, बा बी पत्रकारन से।’’ मैंने कई।
‘‘बा तो ई लाने बिन्ना के असली मुद्दा पांछू रै जाए औ खबरों में तू-तू, मैं-मैं चलत रए। के उन्ने ऐसी काए कई, के उन्ने ऐसी काए ने कई? बा जो मर गए औ जोन मरत जा रए उनके लाने का हो रओ जा पे कोनऊं बात ने चले।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का कओ जाए बिन्ना, पूरी दुनिया में घिनौच-सी मची। जोन खों तनक पावर मिल गओ बोई गर्रान लगत आए औ दोंदरा देन लगे आए। अब ट्रम्प खोंई देख लेओ। इत्तो बड़ो देस को राष्ट्रपति आए, सो तनक अपनो बड़प्पन दिखातो। कोनऊ सई रास्तो पकरतो। मगर नईं, ऊको तो अपनी दादागिरी दिखाने। सो, वेनेजुएला पे चढ़ बैठो। अब तुम कोन होत आओ दूसरे देस के मामलन में टांग अड़ाबे वारे? उनखों खुदई निपटन-सुलझन देओ। पर नईं, उने तो अपनी गर्राहट दिखाने।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे ऊ दिनां जब जा खबर छपी रई तो मिसराइन मोसे कै रई हती के कऊं ऐसो ने होए के कोऊ दिनां जो ट्रम्प इते अपने देस में घुस आए इते सब कछू नेहरू जी के जमाने से बिगरो परो, सो हम इको सुदारबे आ गए। सो हमने मिसराइन से कई के जो भारत आए, कोनऊं वेनेजुएला नोंई, के मों उठाए चले आए। इते थपड़िया दओ जैहे। सो तुम ने डरो’’ भौजी बोलीं।
‘‘कओ थपड़ियाबे के संगे कछू सयाने उनकी तारीफ में इत्ती कबिताएं पढ़न लगें के बे खुसी में फूल-फूल के खुदई फट जाए। अपने इते चमचोईं करबे वारों की कमी नोईं। कोऊ कै भर देवे के हमाई चमचोईं करो हम तुमें बड़ो सो पुरस्कार देवा दैहें, सो बे कओ चमचोईं के पूरो रिकार्ड तोड़ डारें।’’ मैंने हंस के कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! बाकी पैले बी तो ऐसई होत्तो। कछू ऐसे जने हरेक राजा के दरबार में पाए जात्ते। बे राजा साब की बड़वारी करत्ते औ कऊं राजकवि बन जात्ते, तो कऊं जगीरें पा जात्ते। बाकी बड़वारी करे में कोनऊं गलत नोंई, जो बड़वारी करे जोग होय सो करो, ने तो उनकी गलतियां बताओ। ईसे बे खुद खों सुदार सकें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बिन्ना हमने तो पानी उबाल के औ छान के पीनों सुरू कर दओ आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘आप सो आरो लेबे वारी हतीं?’’ मैंने पूछी।
‘‘हओ सोची तो रई, बाकी हमने तुमाओ एक लेख पढ़ लओ रओ जीमें तुमने लिखो रओ के आरो लगाए से मुतको पानी बेकार चलो जात आए सो हमने बिचार बदल दओ रओ। अबे पैले पीबे के पानी में तनक फिटकरी चला देत्ते, मनो जब से इन्दोर वारी खबर सुनी तब से उबाल के औ छान के पियन लगे। तुम सोई उबाल रईं के नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘अबे तो नईं। खाली छान के पी रई। उबलो पानी इठैलो सो लगत आए। पियो कोन जात आए!’’ मैंने कई।
‘‘अरे, कैसऊं लगे बिन्ना, जान आए तो जहान आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप ओरें इत्तो ने डराओ, अपने इते इत्ती दसा नईं बिगरी। औ अब तो इते सोई परसासन सात कुआं झांक रई।’’ मैंने कई।
‘‘जे भुलाए में ने रओ, बिन्ना! उते इन्दोर में कोन ने सोची हुइए के पानी इत्तो बुरओ कर दैहे। सो तनक सम्हर के चलबे में ई भलाई आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, बात तो आप सांची कै रए। मैं सोई पानी उबाल लओ करहों।’’ मैंने कई।
‘‘ऊंसई इत्ती ठंडी पर रई के ईमें उबलो भओ कुनकुनो पानी पियो चाइए।’’ भौजी बोलीं।  
जेई पे से फेर जड़कारे की बतकाव चल निकरी।   
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़िया हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। औ सोचो के का करो जाए के इन्दोर वारी घटना औ कऊं ने घटे। परसासन खों जगाए राखबे के लाने अपन को का करने परहे ई के बारे में तनक सोचियो। 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, January 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़बरदस्त रोमांचक है अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आज समाज

"आज समाज" दैनिक में आज पुस्तक समीक्षा - "ज़बरदस्त रोमांचक है अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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चर्चा प्लस | वैदिक युगीन लोग जानते थे हवा, पानी और जंगल की शुद्धता-महत्व | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
वैदिक युगीन लोग जानते थे हवा, पानी और जंगल की शुद्धता-महत्व
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

     पर्यावरण असंतुलन एवं विभिन्न प्रकार के प्रदूषण ऐसी समस्या है जिससे आज दुनिया का हर देश जूझ रहा है। इस समस्या को हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले वैदिक युग में ही न केवल समझ लिया था अपितु समस्या का हल भी अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था इसीलिए उन्हें कभी भी पर्यावरण असंतुलन जैसी समस्या से नहीं जूझना पड़ा। वे इस तथ्य को जान चुके थे कि इस पृथ्वी पर स्थित प्रत्येक वस्तु चाहे वह जड़ हो या चेतन, प्राकृतिक तत्वों से मिल कर बनी है। मनुष्य का शरीर भी पंच-तत्व से मिल कर बना हुआ है अत: मानव जीवन के लिए प्राकृतिक पदार्थों का उनके मूल एवं विशुद्ध रूप में बने रहना अत्यंत आवश्यक है। पर्यावरण का सीधा संबंध प्रकृति से है, जहां समस्त जीवधारी प्राणियों और निर्जीव पदार्थों में सदा एक दूसरे पर निर्भरता और समन्वय की स्थिति रही है। प्रकृति में सजीव और निर्जीव पदार्थ होते हैं जो एक दूसरे के पूरक बन कर प्रकृति की समस्त क्रियाओं का संचालन, संवहन एवं संचरण करते हैं। इन्हीं सजीव एवं निर्जीव पदार्थों का परस्पर पूरक संबंध पर्यावरण का निर्माण करते है।


      पृथ्वी पर और उसके चारो ओर व्याप्त वायुमण्डल तथा सभी प्रकार के जैन अजैव तत्वों में परस्पर सामंजस्य रहता है। यही सामन्जस्य पर्यावरण को जन्म देता है। भारत में प्राचीनकाल से ही इस तथ्य को भली भांति समझ लिया गया था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद, पुराण आदि में पर्यावरण के विविध तत्वों पर अत्यंत सूक्ष्मता से न केवल प्रकाश डाला गया है अपितु उन्हें स्तुत्य भी माना गया है। वस्तुतरू जब हम किसी व्यक्ति के प्रति आभार का अनुभव करते हैं, स्वयं को उसका ऋणी मानते है अथवा उसकी उपस्थिति प्राणदायिनी के रूप में अत्यंत आवश्यक मानते है तब हम उसे देवत्व के योग्य मान कर उसकी पूजा करने लगते है तथा यही कामना करते हैं कि उसका अस्तित्व सदा बना रहे तथा हम उससे लाभान्वित होते रहे। इस प्रकार की पारणा के मे मूल में धार्मिकता नहीं अपितु उसके महल को स्वीकार करने की भावना निहित होती है। हमारे प्राचीन ऋषी मुनियों ने प्रकृति एवं पर्यावरण के महत्व को न केवल समझा बल्कि प्रकृति एवं पर्यावरण के तत्वों को पूजनीय माना । वेदों में स्वस्थ एवं संतुलित पर्यावरण की प्रार्थना भी की गई है।

हमारे ऋषि-मुनियों को पर्यावरणतंत्र का समुचित ज्ञान था। उन्होंने जड़ जगत अर्थात् पृथ्वी, नदिया, पर्वत, पठार आदि तथा चेतन जगत अर्थात् मानव, पशु, पक्षी, जलचर, वन आदि के पारस्परिक सामंजस्य को भी समझा तथा इस सामंजस्य को पर्यावरण के लिए आवश्यक निरूपित किया। वे यह भी समझ गए थे कि जड़ एवं चेतन तत्वों में से किसी की भी क्षति होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है और इसीलिए उन्होंने प्रत्येक तत्व के प्रति आदर भावना को प्रतिपादित किया जिससे मानव किसी श्री तत्व को पति पहचाने में संकोच करे। धीरे-धीरे हम प्राचीन मूल्यों को भूलते गए और इसी का प्रतिफ ल है कि आज हमें पर्यावरण के असंतुलन के संकट से जूझना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए यह स्मरण किया जा सकता है कि जब तक वन का स्वरूप हमारे मन-मस्तिष्क में एक देवता के रूप में स्थापित था तब तक हमने वनों की अंधाधुंध कटाई नहीं की थी लेकिन जैसे-जैसे हमने वनों को देवता मानना छोड़ दिया वैसे- वैसे वन हमें मात्र उपभोग की वस्तु दिखने लगे और हमने अंधाधुंध कटाई शुरू कर दी। वेदों में प्रकृति और पर्यावरण के संबंध में विस्तृत जानकारी मिलती है। ऋग्वेद को प्रकृति विज्ञान की प्रथम पुस्तक माना गया है। इसमें मनुष्य एवं प्रकृति के अंतर्सम्बन्धों के बारे में भी बताया गया है। यजुर्वेद में पर्यावरण को शुद्ध एवं संतुलित रखने के बारे में उल्लेख किया गया है। वेदों में पर्यावरण क आकार अत्यंत व्यापक है। पर्यावरण के महत्तर स्वरूप पर वेदों में पूरे-पूरे सूक्त रचे गए हैं। पृथ्वी सूक्त भी एक ऐसा ही सूक्त जिसमें पृथ्वी की महत्ता के साथ-साथ उसके प्रति अगाध निष्ठा एवं विश्वास को निरूपित किया गया है-
ऋषियों के अनुसार प्राकृतिक तत्वों से ही मानव इस जीवन को तथा श्रेष्ठता को प्राप्त करता है।

अतो देवा अवन्तुना यतो विष्णुर्विचक्रमे पृथिव्याः सप्त द्याममिः।। ( 16/6/22 ऋग्वेद)

अर्थात जगदीश्वर ने जिन सात तत्व अर्थात पृथ्वी, जल, अगि, वायु, विराट, परमाणु और प्रकृति से चराचर जगत् का निर्माण किया है, वे ही तत्व हमारी रक्षा करते रहें।
त्रिरश्विना सिन्धुमिरू सप्तमात मिखय आहावाखेचा हविष्कृताम् ।
तिखः पृथिवीपरि प्रवादियो कुमिति।।  5/8/34, ऋग्वेद)

अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि वायु के छेदन, आकर्षण और वृष्टि कराने वाले गुणों से नदी बहती तथा हवन किया हुआ द्रव्य दुर्गान्ध आदि दोषों का निवारण कर सबको दुखों से रहित कर सुखों को सिद्ध करता है। इसके बिना कोई भी प्राणि जी नहीं सकता है अतः इसकी शुद्धि के लिए यशरूपी कर्म नित्य ही करना चाहिए।

वैदिक ऋषियों ने प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करने का उपदेश दिया क्योंकि प्रकृति के सभी तत्व परस्पर पूरक के रूप में पाए जाते है -
ते जझिरे दिन ऋष्वास उक्षणों रूद्रस्य मर्या असुरा अरपसः ।
पावकासः शुचयः सूर्यो इव सत्वानो न द्रप्सिना घोरवर्पसः । (6/2/54/ ऋग्वेद)

- अर्थात् मनुष्यों के लिए उचित है कि जो रुद्रस्य जीव व प्राण के संबंधी पवन, प्रकाश से उत्पन्न होते हैं, जो सूर्य की किरणों के समान ज्ञान के हेतु संचन एवं पवित्र करने वाले हैं जिनमें सत्व एवं शुद्ध गुण है जो असुर नहीं है उन्हीं के साथ विद्या जैसे उत्तम गुणों को ग्रहण करें ।

वायु शुद्धता - सजीव संसार की रक्षा के लिए वायु स्वच्छता को प्राथमिकता दी जाती थी। ऋषियों ने यह भी माना कि प्राणवायु (ऑक्सिजन) के अभाव में एक पल भी जीवित रहना संभव नहीं है इसीलिए ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तो पृथ्वी के चारो ओर वायु का संचरण किया। वेदों में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि शुद्ध वायु हमारे प्राणों की रक्षा करती है तथा पेड़-पौधे वायु को शुद्ध रखते हैं।
विश्वेदेवा देवेषु देवाः
पथो अनतु मध्वा घृतेन।। (27/12/यजुर्वेद )

सवितसर वसमता भणमनि व्युष्टिषु क्षपः
कण्वासस्त्वा सुतसोमाय इन्द्यते हव्यवाहं स्वध्वर ।1 (28/8/44/ऋग्वेद)
इस श्लोक में कहा गया है कि मनुष्यों को चाहिए कि वायु एवं वृष्टि को शुद्ध करने वाले यश का प्रकाश करके अपने कार्यों को सिद्ध करें।

जलशुद्धि - पर्यावरण का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है पानी। वेदों में जल के संबंध में विस्तृत जानकारी मिलती है। वैदिक काल में जल को शुद्ध रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता था। जल को दिव्य देवता माना जाता था । ऋग्वेद में आहान किया गया है कि जल को शुद्ध रहने दो क्योंकि शुद्ध जल मृत्यु से रक्षा करता है। स्वच्छ जल औषधि के समान होता है अतरू स्वच्छ जल मनुष्य को निरोग रखता है। यह आयुवर्द्धक एवं अमृत के समान है। यह प्राणों को रक्षक है।
शं नो देवीरभिष्य आयो भवन्तु पीयते ।
शंयोरभि खवन्तु नः।। (10/9/4/ऋग्वेद)

ऋग्वेद में यह भी प्रार्थना की गई है कि स्वच्छ जल जो कि जीवनदायी एवं बलदायी है, हमारे वर्तमान को मिले, भविष्य को भी मिले और हमारे लिए सब प्रकार से सुख और स्वास्थ्य प्रदान करने वाला हो । वैदिकयुग के ऋषि कुशल जल चिकित्सक भी थे। वे शुद्ध जल के प्रयोग से एदर, नेत्र और शक्ति संबंधी चिकित्सा किया करते थे। सौंदर्यवर्धन के लिए भी जलचिकित्सा का उल्लेख मिलता है। आपो भद्रा वृतमिदाप आयो विवत्साप इत्ताः ।
आदित्पश्यसम्युत वा शृणोम्या मा घोषो गच्छिति वाङ्ग मासाम् ।
मन्ये भेजानो अमृतस्य तर्हि हिरण्यवर्णा अतृप यदा वः ।। (3/13/6/अथर्ववेद)

ऋषियों ने जल को पाचन हेतु तीव्र रस, प्राण, कांति, बल, पौरुष, अमरत्व प्रदान करने वाला प्रमुख तत्व कहा तथा इसकी रक्षा करने एवं इसे शुद्ध रखने का आह्वान किया। वनसंपदा एवं तत्व रक्षा रू वन एवं वनसंपदा तथा समस्त प्रकार के जड़ तत्वों के संबंध में वेदों में रक्षा एवं शुद्धता का आह्वान किया गया है। ऋषियों ने पृथ्वी को माता का स्थान दे कर उसकी सेवा एवं रक्षा की भावना को सुनिश्चित किया। उन्होंने ने कहा कि पृथ्वी हमारी माता है और हम इसकी सन्तान है। जो भी प्राणधारी इस पृथ्वी पर है वह पृथ्वी की संतान है। यह पृथ्वी हमें फल, औषधि, अन्न एवं जल प्रदान करती है अतरू इस पृथ्वी के सभी तत्वों को संरक्षण देना हमारा कर्तव्य है ।
सारांशतः यह कहा जा सकता है कि वेदों में पर्यावरण एवं प्रकृति के संबंध में विस्तृत ज्ञान निहित है साथ ही निहित है वे समाधान भी जिन्हें अपना कर पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से निजात पाया जा सकता है। यदि हम आज के भौतिकवादी युग की कृत्रिमता को त्याग का प्रकृति के मौलिक स्वरूप पर ध्यान दें तथा उसे उचित संरक्षण प्रदान करें एवं अपनी जीवनचर्या में वेदों में निर्देशित संयम को आत्मसात करें तो हम निश्चित हो कर प्रदूषणमुक्त भविष्य की कल्पना कर सकते है। अतः जितनी आवश्यकता वेदो को संरक्षित करने तथा ज्ञान के प्राचीन स्रोत को संरक्षित करने की है उतनी ही आवश्यकता वेदों में दिए गए पर्यावरण संबंधी आचरण को जीवन में उतारने की है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 07 .01.2025 को प्रकाशित) 
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Tuesday, January 6, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा  

ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ 

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - राज़महल 
लेखक       - मुकेश भारद्वाज
प्रकाशक     - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
मूल्य       - 395/-
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‘‘जनसत्ता’’ के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज अपने काॅलम ‘‘बेबाक बोल’’ के लिए तो चर्चित हैं ही किन्तु जब उन्होंने थ्रिलर उपन्यास लिखना शुरू किया तो अपने पहले उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ ने ही तहलका मचा दिया। हिन्दी जगत में रोमांचक जासूसी उपन्यासों को ले कर एक शून्यता का अनुभव हो रहा था, उस शून्यता को मुकेश भारद्वाज ने अपने उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ से भर दिया। उपन्यास का मुख्य पात्र अभिमन्यु पाठकों के मन-मस्तिष्क पर छा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि एक साल बाद ही दूसरा जासूसी उपन्यास ‘‘बेगुनाह’’ और फिर तीसरा उपन्यास ‘‘नक्काश’’ पाठकों के हाथों में आ गया। यदि पाठक पसंद करें तो लेखक भी उत्साहित होता है। जिस तरह कभी विनोद-हमीद, सुनील और मेजर बलवंत के लिए पाठकों में जुनून पाया जाता था, ठीक उसी तरह ‘‘अभिमन्यु’’ के लिए भी पाठकों में जुनून जाग उठा है। वे अभिमन्यु के किरदार से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। वे उसके साथ-साथ चल कर हर मिस्ट्री को सुलझाना चाहते हैं। बल्कि कई बार तो पाठक अपने प्रिय पात्र को भी मात दे कर आगे बढ़ जाना चाहता है और उससे पहले हत्या की गुत्थी सुलझा लेना चाहता है। यह वस्तुतः उस पात्र से जुड़ा यथार्थबोध होता है जो पाठकों को उकसाता है। थ्रिलर के मंजे हुए लेखक अपने पात्र और पाठकों के इस रिश्ते को भली-भांति समझते हैं और इसी सूत्र को पकड़ कर कथानक को आगे बढ़ाते हैं जिससे पाठकों को कभी अपना प्रिय पात्र यानी उपन्यास का हीरो आगे लगे तो कभी वे स्वयं को उससे आगे महसूस करें। यह ताना-बाना उपन्यास को सफलता के शिखर पर पहुंचा देता है। 
अभिमन्यु सिरीज़ का नवीनतम उपन्यास है ‘‘राज़महल’’। जी हां, राजा-रानी वाला कोरा सियासी ‘‘राजमहल’’ नहीं, वरन  ‘‘राज़महल’’ जिसमें राज़ ही राज़ हैं यानी ढेर सारा सस्पेंस। थ्रिलर उपन्यासों की मुख्य विशेषता ही होती है पाठकों के चेतन-अवचेतन में रोमांच, शंका और सतत उद्वेलन को जगाना। रहस्य-रोमांच  उपन्यासों के विपरीत, रोमांचकारी यानी थ्रिलर उपन्यास मात्र पूर्व घटित अपराध को सुलझाने पर केंद्रित नहीं होते हैं, वरन वे समय सीमा के भीतर भविष्य में होने वाले अपराध को रोकने का संघर्ष भी दिखाते हैं। थ्रिलर उपन्यासों की सबसे प्रमुख विशेषता होती है रोमांच और गति। थ्रिल यानी रोमांच तभी पैदा होता है जब पाठकों को आने वाले खतरे और परिणाम के बारे में अनिश्चितता का एहसास हो और उनकी उत्सुकता बनी रहे कि अब क्या होने जा रहा है? इसके साथ ही कथानक की गति भी इसे रोमांचक बनाती है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भरपूर एक्शन। ताकि पाठक एक बार पढ़ना शुरू करे उसे पूरा पढ़ कर ही थमें। इतना ही नहीं थमने के बाद भी वह अपने मानस में मुख्य पात्र के साथ कई-कई दिन तक घटनाओं का विश्लेषण करता रहे। यही प्रक्रिया उस सिरीज के अगले उपन्यास के लिए पाठक का मानस तैयार कर देती है। एक व्याकुलता जगा देती है कि इस सिरीज का अगला उपन्यास कब आएगा? फिर जब नया उपन्यास आता है तो उसकी उत्सुकता चरम पर पहुंच जाती है। 

मुकेश भरद्वाज ने अभिमन्यु के रूप में पाठकों को एक ऐसा पात्र दिया है जो कभी जेम्सबांड की तरह बिंदास एवं दिलफेंक है तो कभी शारलाक होम्स की तरह गंभीर, कभी सुनील की तरह दिल्ली की छाप लिए हुए तो कभी एक अनूठा अद्वितीय चरित्र जो देश के किसी भी हिस्से के पाठक को अपना-सा लगेगा। ‘‘राज़महल’’ उपन्यास में भी अभिमन्यु अपने पूरे किरदार के साथ उपस्थित है। इसीलिए आर्म डीलर निहाल सिंह की दूकान पर जब बला की खूबसूरत टाटा घोष से उसकी मुलाकात होती है तो वह टाटा से दोस्ती करने में एक पल की देर नहीं करता है। यह कोई रोमांटिक भेंट नहीं थी। टाटा घोष उस दूकान पर रिवाल्वर खरीदने आई थी। वह खरीदती भी है। यहीं से सस्पेंस शुरू हो जाता है कि एक सुंदर स्त्री किस पर गोली चलाने जा रही है? और क्यों? 
दूकानदार निहाल सिंह के रूप में पंजाबी बोली का तड़का आरम्भ से ही गुदगुदाता है। कुछ पन्नों की यात्रा के बाद मधुमालिनी और सुदक्षदीप सिंह की कहानी से गुज़रना होता है। सुदक्षदीप सिंह का कुत्सित कर्म और शिकार बनती है मधुमालिनी। कई बार एक अपनराध दूसरे अपराध की जमीन तैयार कर देता है। न्याय के नाम पर ही सही। ऐसे बिन्दु पर यह तय करना कठिन हो जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित? पाठक का मानस उस पर एक चित्त हो कर विक्टिम यानी पीड़ित के पक्ष में डट कर खड़ा हो जाता है। सुदक्षदीप सिंह की रहस्यमयी मौत पाठक के मन को राहत तो देती है किन्तु उत्सुकता भी जगाती है कि उसे इस अंजाम तक किसने पहुंचाया? 

चाहे सत्या सुहानी हो, सबीना या सनम हो, उपन्यास के सभी पात्र अपनी-अपनी भूमिका में खरे उतरते हुए कथानक को जिस प्रकार गति देते हैं वह पाठकों को बांधे रखने के लिए पर्याप्त है। थ्रिलर लेखक अकसर कथानक में अप्रत्याशित मोड़ और भ्रामक संकेत दे कर तनाव और आश्चर्य बनाए रखते हैं। पाठक इन टूल्स से कुछ समय के लिए गुमराह हो जाता है और उलझ कर रह जाता है। यूं भी थ्रिलर उपन्यास का नायक प्रथमदृष्ट्या एक साधारण व्यक्ति होता है जिसे खतरे का आंशिक अनुभव तो होता है फिर भी वह स्वयं को असाधारण और जानलेवा स्थिति में फंसने से रोक नहीं पाता है। उसकी यह ‘डेयरिंग’ ही उसे पाठकों का प्रिय बना देती है। जैसे पाठक अभिमन्यु से जुड़ाव महसूस करते हैं और उसकी सुरक्षा और सफलता को ले कर चिंतित होने लगते हैं। भ्रम को सच के बोध में बदल कर लेखक अपने पात्र को पाठकों के मन-मस्तिष्क में उतार देता है, बड़ी चतुराई से उनका सहगामी बना देता है। एक थ्रिलर की मूल विशेषता है कि वह भय और समाधान की इच्छा जैसी मूलभूत मानवीय प्रवृत्तियों को जगा कर वास्तविकता से एक गहन, एड्रेनालाईन- युक्त संसार रचता है जिसमें परम उत्तेजना के पल पाठक को स्वयं एक जासूस बनने को विवश कर देते हैं। इसी बिन्दु पर लेखक की लेखकीय क्षमता की परीक्षा भी होती है। अभिमन्यु के किरदार का पाठको के मन पर छा जाना इस बात का सबूत है कि मुकेश भरद्वाज थ्रिलर लेखन के टूल्स से खेलने में माहिर हैं। वे जानते हैं कि कहां अभिमन्यु को चुस्त-चालाक दिखाना है और कहां उसे एक लापरवाह खिलंदड़ा रखना है।  
 
पाठकों को क्राइम और थ्रिलर फिक्शन पसंद क्यों आता है? क्योंकि यह उन्हें जीवन के घटनाक्रमों के अनजान हिस्सों को अनुभव करने का मौका देता है। वे अपनी जगह बैठे-बैठे जीवन के उन खतरनाक मोड़ों पर पहुंच सकते हैं जहां अपराधी पनपते हैं। वे अपराध के घिनौने रूपों से साक्षात्कार कर सकते हैं। वे स्वयं को अपराध रोकने वाले के पक्ष में खड़ा होते अनुभव कर सकते हैं। थ्रिलर सस्पेंस, एक्साइटमेंट और उत्सुकता पैदा करता है, जो दर्शकों को क्राइम, रहस्य, जासूसी या मनोवैज्ञानिक तनाव वाली हाई-स्टेक कहानियों के साथ मानसिक यात्रा करता है, जिसमें अक्सर तेज गति, अप्रत्याशित मोड़ और नायक समय या खतरे के खिलाफ दौड़ते हैं। इसमें लेखक सस्पेंस और उत्सुकता रूप जानकारी को नियंत्रित करके और अपरिहार्य घटनाओं में देरी करके तनाव पैदा करता है। हाई स्टेक्स रूप अक्सर जानलेवा स्थितियों, खतरे या मनोवैज्ञानिक यातना स्वाभाविक रूप से शामिल होती है। जटिलतम परिस्थितियों में नायक आमतौर पर भारी बाधाओं का सामना करता है, अक्सर अकेला होता है, एक खलनायक या टिक-टिक करती घड़ी के विरुद्ध काम करता है।

थ्रिलर की एक खूबी यह भी होती है कि उनमें से किसी एक को अंतिम रूप से ‘‘सबसे अच्छा’’ ठहराया नहीं जा सकता है लेकिन लेखकीय क्षमता किसी भी थ्रिलर को सर्वाधिक पाठक उपलब्ध करा कर उसे ‘बेस्ट सेलर’ बना देती है। जैसे कुछ प्रसिद्ध आधुनिक वास्तुशिल्प उपन्यासों में द साइलेंट पेशेंट (एलेक्स माइकलाइड्स), द हाउसमेड (फ्रीडा मैकफैडेन), द गर्ल ऑन द ट्रेन (पाउला हॉकिन्स), द ग्रैबेड मिस्टर रिपल (पेट्रीसिया हाईस्मिथ), और डी ऑफ द जैकल (फ्रेडरिक फोर्सिथ) शामिल हैं, जो अपने वैज्ञानिक गहराई, स्ट्रेनल फ्लेक्स और स्ट्रेंथ सैस्पेंस के लिए जाने जाते हैं। इसी क्रम में यदि हिन्दी थ्रिलर उपन्यास को देखें तो ‘‘राज़महल’’ पूरी तरह खरा उतरता है।
‘‘राज़महल" का  कवर पेज ही इस किताब के कंटेंट को पढ़ने के लिए उत्सुकता जगाता है। मध्य में पीठ पीछे पिस्तौल छिपाए खड़ा आदमी, उसके इर्दगिर्द मदिरा, रुपए, एक ओर एक पिस्तौलधारी जो दबे पांव अपने शिकार की ओर बढ़ रहा है, दूसरी ओर मात्र एक पिस्तौल जिसके साथ उंगलियों की मज़बूत पकड़ तो दिख रही है किन्तु उसे थामने वाला गोपन में है, कुछ लैंडमार्क जो घटनाओं के स्थान की ओर संकेत करते हैं। 

  किसी भी थ्रिलर उपन्यास के बारे में समीक्षात्मक लिखना कठिन होता है क्योंकि आप उसके कथानक को छू भी नहीं सकते हैं क्योंकि किसी भी तरह से भेद खोल कर लेखक की मेहनत पर पानी नहीं फेर सकते हैं। लेकिन बतौर समीक्षक यह दावा किया जा सकता है कि इसे पढ़ा जाए अथवा नहीं? या फिर लेखक ने कथानक के साथ न्याय किया है या नहीं? तो बेझिझक यह दावा किया जा सकता है कि मुकेश भारद्वाज का नवीनतम थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ उन सभी पाठको को अवश्य पढ़ना चाहिए जिनकी रहस्य और रोमांच में गहरी रुचि है। लेखक ने अपनी पूरी लेखकीय क्षमता को काम लाते हुए इतने प्रभावी ढंग से उपन्यास का ताना-बाना बुना है कि इसके मुख्य पात्र अभिमन्यु के साथ पाठक भी स्वयं को एक जासूस की भांति महसूस करेगा। महल से निकला राज़ किस तरह एक पूरा राज़महल खड़ा कर सकता है, यह भी अनुभव होगा पाठकों को। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि पाठक इसे पढ़ने के बाद अभिमन्यु सिरीज के अगले उपन्यास के लिए लेखक पर दबाव डालने लगें। यही इस उपन्यास की लोकप्रियता एवं सफलता का मानक है।
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