Sharadakshara
शरदाक्षरा....डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Expressions of Dr (Miss) Sharad Singh
Tuesday, January 13, 2026
पुस्तक समीक्षा | गहन संवेदनाओं रेखांकन है हरजिंदर सिंह सेठी की कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
Saturday, January 10, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Friday, January 9, 2026
शून्यकाल | बढ़ता जलवायु परिवर्तन, घटते वन्यजीव और हमारे प्रयास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
Thursday, January 8, 2026
बतकाव बिन्ना की | देख तो बिन्ना, जे को जाने का-का हो रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, January 7, 2026
पुस्तक समीक्षा | ज़बरदस्त रोमांचक है अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आज समाज
चर्चा प्लस | वैदिक युगीन लोग जानते थे हवा, पानी और जंगल की शुद्धता-महत्व | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
वैदिक युगीन लोग जानते थे हवा, पानी और जंगल की शुद्धता-महत्व
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
पर्यावरण असंतुलन एवं विभिन्न प्रकार के प्रदूषण ऐसी समस्या है जिससे आज दुनिया का हर देश जूझ रहा है। इस समस्या को हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले वैदिक युग में ही न केवल समझ लिया था अपितु समस्या का हल भी अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था इसीलिए उन्हें कभी भी पर्यावरण असंतुलन जैसी समस्या से नहीं जूझना पड़ा। वे इस तथ्य को जान चुके थे कि इस पृथ्वी पर स्थित प्रत्येक वस्तु चाहे वह जड़ हो या चेतन, प्राकृतिक तत्वों से मिल कर बनी है। मनुष्य का शरीर भी पंच-तत्व से मिल कर बना हुआ है अत: मानव जीवन के लिए प्राकृतिक पदार्थों का उनके मूल एवं विशुद्ध रूप में बने रहना अत्यंत आवश्यक है। पर्यावरण का सीधा संबंध प्रकृति से है, जहां समस्त जीवधारी प्राणियों और निर्जीव पदार्थों में सदा एक दूसरे पर निर्भरता और समन्वय की स्थिति रही है। प्रकृति में सजीव और निर्जीव पदार्थ होते हैं जो एक दूसरे के पूरक बन कर प्रकृति की समस्त क्रियाओं का संचालन, संवहन एवं संचरण करते हैं। इन्हीं सजीव एवं निर्जीव पदार्थों का परस्पर पूरक संबंध पर्यावरण का निर्माण करते है।
पृथ्वी पर और उसके चारो ओर व्याप्त वायुमण्डल तथा सभी प्रकार के जैन अजैव तत्वों में परस्पर सामंजस्य रहता है। यही सामन्जस्य पर्यावरण को जन्म देता है। भारत में प्राचीनकाल से ही इस तथ्य को भली भांति समझ लिया गया था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद, पुराण आदि में पर्यावरण के विविध तत्वों पर अत्यंत सूक्ष्मता से न केवल प्रकाश डाला गया है अपितु उन्हें स्तुत्य भी माना गया है। वस्तुतरू जब हम किसी व्यक्ति के प्रति आभार का अनुभव करते हैं, स्वयं को उसका ऋणी मानते है अथवा उसकी उपस्थिति प्राणदायिनी के रूप में अत्यंत आवश्यक मानते है तब हम उसे देवत्व के योग्य मान कर उसकी पूजा करने लगते है तथा यही कामना करते हैं कि उसका अस्तित्व सदा बना रहे तथा हम उससे लाभान्वित होते रहे। इस प्रकार की पारणा के मे मूल में धार्मिकता नहीं अपितु उसके महल को स्वीकार करने की भावना निहित होती है। हमारे प्राचीन ऋषी मुनियों ने प्रकृति एवं पर्यावरण के महत्व को न केवल समझा बल्कि प्रकृति एवं पर्यावरण के तत्वों को पूजनीय माना । वेदों में स्वस्थ एवं संतुलित पर्यावरण की प्रार्थना भी की गई है।
हमारे ऋषि-मुनियों को पर्यावरणतंत्र का समुचित ज्ञान था। उन्होंने जड़ जगत अर्थात् पृथ्वी, नदिया, पर्वत, पठार आदि तथा चेतन जगत अर्थात् मानव, पशु, पक्षी, जलचर, वन आदि के पारस्परिक सामंजस्य को भी समझा तथा इस सामंजस्य को पर्यावरण के लिए आवश्यक निरूपित किया। वे यह भी समझ गए थे कि जड़ एवं चेतन तत्वों में से किसी की भी क्षति होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है और इसीलिए उन्होंने प्रत्येक तत्व के प्रति आदर भावना को प्रतिपादित किया जिससे मानव किसी श्री तत्व को पति पहचाने में संकोच करे। धीरे-धीरे हम प्राचीन मूल्यों को भूलते गए और इसी का प्रतिफ ल है कि आज हमें पर्यावरण के असंतुलन के संकट से जूझना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए यह स्मरण किया जा सकता है कि जब तक वन का स्वरूप हमारे मन-मस्तिष्क में एक देवता के रूप में स्थापित था तब तक हमने वनों की अंधाधुंध कटाई नहीं की थी लेकिन जैसे-जैसे हमने वनों को देवता मानना छोड़ दिया वैसे- वैसे वन हमें मात्र उपभोग की वस्तु दिखने लगे और हमने अंधाधुंध कटाई शुरू कर दी। वेदों में प्रकृति और पर्यावरण के संबंध में विस्तृत जानकारी मिलती है। ऋग्वेद को प्रकृति विज्ञान की प्रथम पुस्तक माना गया है। इसमें मनुष्य एवं प्रकृति के अंतर्सम्बन्धों के बारे में भी बताया गया है। यजुर्वेद में पर्यावरण को शुद्ध एवं संतुलित रखने के बारे में उल्लेख किया गया है। वेदों में पर्यावरण क आकार अत्यंत व्यापक है। पर्यावरण के महत्तर स्वरूप पर वेदों में पूरे-पूरे सूक्त रचे गए हैं। पृथ्वी सूक्त भी एक ऐसा ही सूक्त जिसमें पृथ्वी की महत्ता के साथ-साथ उसके प्रति अगाध निष्ठा एवं विश्वास को निरूपित किया गया है-
ऋषियों के अनुसार प्राकृतिक तत्वों से ही मानव इस जीवन को तथा श्रेष्ठता को प्राप्त करता है।
अतो देवा अवन्तुना यतो विष्णुर्विचक्रमे पृथिव्याः सप्त द्याममिः।। ( 16/6/22 ऋग्वेद)
अर्थात जगदीश्वर ने जिन सात तत्व अर्थात पृथ्वी, जल, अगि, वायु, विराट, परमाणु और प्रकृति से चराचर जगत् का निर्माण किया है, वे ही तत्व हमारी रक्षा करते रहें।
त्रिरश्विना सिन्धुमिरू सप्तमात मिखय आहावाखेचा हविष्कृताम् ।
तिखः पृथिवीपरि प्रवादियो कुमिति।। 5/8/34, ऋग्वेद)
अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि वायु के छेदन, आकर्षण और वृष्टि कराने वाले गुणों से नदी बहती तथा हवन किया हुआ द्रव्य दुर्गान्ध आदि दोषों का निवारण कर सबको दुखों से रहित कर सुखों को सिद्ध करता है। इसके बिना कोई भी प्राणि जी नहीं सकता है अतः इसकी शुद्धि के लिए यशरूपी कर्म नित्य ही करना चाहिए।
वैदिक ऋषियों ने प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करने का उपदेश दिया क्योंकि प्रकृति के सभी तत्व परस्पर पूरक के रूप में पाए जाते है -
ते जझिरे दिन ऋष्वास उक्षणों रूद्रस्य मर्या असुरा अरपसः ।
पावकासः शुचयः सूर्यो इव सत्वानो न द्रप्सिना घोरवर्पसः । (6/2/54/ ऋग्वेद)
- अर्थात् मनुष्यों के लिए उचित है कि जो रुद्रस्य जीव व प्राण के संबंधी पवन, प्रकाश से उत्पन्न होते हैं, जो सूर्य की किरणों के समान ज्ञान के हेतु संचन एवं पवित्र करने वाले हैं जिनमें सत्व एवं शुद्ध गुण है जो असुर नहीं है उन्हीं के साथ विद्या जैसे उत्तम गुणों को ग्रहण करें ।
वायु शुद्धता - सजीव संसार की रक्षा के लिए वायु स्वच्छता को प्राथमिकता दी जाती थी। ऋषियों ने यह भी माना कि प्राणवायु (ऑक्सिजन) के अभाव में एक पल भी जीवित रहना संभव नहीं है इसीलिए ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तो पृथ्वी के चारो ओर वायु का संचरण किया। वेदों में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि शुद्ध वायु हमारे प्राणों की रक्षा करती है तथा पेड़-पौधे वायु को शुद्ध रखते हैं।
विश्वेदेवा देवेषु देवाः
पथो अनतु मध्वा घृतेन।। (27/12/यजुर्वेद )
सवितसर वसमता भणमनि व्युष्टिषु क्षपः
कण्वासस्त्वा सुतसोमाय इन्द्यते हव्यवाहं स्वध्वर ।1 (28/8/44/ऋग्वेद)
इस श्लोक में कहा गया है कि मनुष्यों को चाहिए कि वायु एवं वृष्टि को शुद्ध करने वाले यश का प्रकाश करके अपने कार्यों को सिद्ध करें।
जलशुद्धि - पर्यावरण का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है पानी। वेदों में जल के संबंध में विस्तृत जानकारी मिलती है। वैदिक काल में जल को शुद्ध रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता था। जल को दिव्य देवता माना जाता था । ऋग्वेद में आहान किया गया है कि जल को शुद्ध रहने दो क्योंकि शुद्ध जल मृत्यु से रक्षा करता है। स्वच्छ जल औषधि के समान होता है अतरू स्वच्छ जल मनुष्य को निरोग रखता है। यह आयुवर्द्धक एवं अमृत के समान है। यह प्राणों को रक्षक है।
शं नो देवीरभिष्य आयो भवन्तु पीयते ।
शंयोरभि खवन्तु नः।। (10/9/4/ऋग्वेद)
ऋग्वेद में यह भी प्रार्थना की गई है कि स्वच्छ जल जो कि जीवनदायी एवं बलदायी है, हमारे वर्तमान को मिले, भविष्य को भी मिले और हमारे लिए सब प्रकार से सुख और स्वास्थ्य प्रदान करने वाला हो । वैदिकयुग के ऋषि कुशल जल चिकित्सक भी थे। वे शुद्ध जल के प्रयोग से एदर, नेत्र और शक्ति संबंधी चिकित्सा किया करते थे। सौंदर्यवर्धन के लिए भी जलचिकित्सा का उल्लेख मिलता है। आपो भद्रा वृतमिदाप आयो विवत्साप इत्ताः ।
आदित्पश्यसम्युत वा शृणोम्या मा घोषो गच्छिति वाङ्ग मासाम् ।
मन्ये भेजानो अमृतस्य तर्हि हिरण्यवर्णा अतृप यदा वः ।। (3/13/6/अथर्ववेद)
ऋषियों ने जल को पाचन हेतु तीव्र रस, प्राण, कांति, बल, पौरुष, अमरत्व प्रदान करने वाला प्रमुख तत्व कहा तथा इसकी रक्षा करने एवं इसे शुद्ध रखने का आह्वान किया। वनसंपदा एवं तत्व रक्षा रू वन एवं वनसंपदा तथा समस्त प्रकार के जड़ तत्वों के संबंध में वेदों में रक्षा एवं शुद्धता का आह्वान किया गया है। ऋषियों ने पृथ्वी को माता का स्थान दे कर उसकी सेवा एवं रक्षा की भावना को सुनिश्चित किया। उन्होंने ने कहा कि पृथ्वी हमारी माता है और हम इसकी सन्तान है। जो भी प्राणधारी इस पृथ्वी पर है वह पृथ्वी की संतान है। यह पृथ्वी हमें फल, औषधि, अन्न एवं जल प्रदान करती है अतरू इस पृथ्वी के सभी तत्वों को संरक्षण देना हमारा कर्तव्य है ।
सारांशतः यह कहा जा सकता है कि वेदों में पर्यावरण एवं प्रकृति के संबंध में विस्तृत ज्ञान निहित है साथ ही निहित है वे समाधान भी जिन्हें अपना कर पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से निजात पाया जा सकता है। यदि हम आज के भौतिकवादी युग की कृत्रिमता को त्याग का प्रकृति के मौलिक स्वरूप पर ध्यान दें तथा उसे उचित संरक्षण प्रदान करें एवं अपनी जीवनचर्या में वेदों में निर्देशित संयम को आत्मसात करें तो हम निश्चित हो कर प्रदूषणमुक्त भविष्य की कल्पना कर सकते है। अतः जितनी आवश्यकता वेदो को संरक्षित करने तथा ज्ञान के प्राचीन स्रोत को संरक्षित करने की है उतनी ही आवश्यकता वेदों में दिए गए पर्यावरण संबंधी आचरण को जीवन में उतारने की है।
—------–--------
(दैनिक, सागर दिनकर में 07 .01.2025 को प्रकाशित)
------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस #सागरदिनकर #charchaplus #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह