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Friday, July 17, 2026

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात

बतकाव बिन्ना की  
मताई के नांव को एक पेड़ लगाओ के नईं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    कल हम तिगड्डा लौं गए के उते एक पैचान वारे मिल गए। उन्ने हमसे ने हमाओ हाल पूछो औ ने चाल पूछो, बस, छूटतई जेई पूछो के ‘‘आपने मताई के नांव को पेड़ लगाओ के नईं?’’
‘‘कोन की मताई के नांव को? हमने पूछी।
‘‘अरे अपनी मताई के नांव को।’’ उन्ने कई।
‘‘हमने तो पर की साल लगाओ रओ, आपने लगाओ के नईं?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘हमने पर की साल बी लगाओ रओ औ ई साल बी लगा आए। परों तो लगाओ आए।’’ बे उचकत भए बोले। संगे उन्ने हमसे जे सोई पूछ लई, ‘‘काए आपने हमाओ फेसबुक नईं देखो का? हमने पेड़ लगात की फोटुएं ऊमें डारी रईं। औ स्टेटस में सोई डारी रईं।’’
‘‘बा तो हम नें देख पाए, बाकी आप कै रए तो आपने पेड़ जरूर लगाओ हुइए।’’ हमने कई।
‘‘आपको सोई लगाओ चाइए। ईसे मताई की याद बनी रैहे।’’ बे आगे बोले।
‘‘हऔ, आप सई कै रए। बाकी अपने बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी औ उनके बी बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी ने पेड़ लगाओ रओ। मने हमाए पुरखा ने बी पेड़ लगाओ रओ जिनें अपन ओंरन ने काट डारो। अब जो जंगल कम पड़न लगे सो एक पेड़ मताई के नांव को लगाबे को डिरामा कर रए।’’ मोसे कै आई।
‘‘हाय रे, आप जो का कै रईं? हमने सो आज लौं एक डगरिया ने कटवाई, औ आप पेड़ कटवाबे को दोस हमपे मढ़ रईं। जे तो गल्त बात आए।’’ बे भिनकत भए बोले।
‘‘हमने अकेली आप की नईं कई। हमने तो सबकी कई जीमें कछू ने कछू जिम्मेवारी हमाई सोई आए।’’ हमने कई।
‘‘का मतलब?’’ उन्ने पूछी।
‘‘मतलब जे के आप ने बा कहनात सुनी हुईए के जो आप कतल करबे वारे खों कतल करते देख के बी हल्ला नईं मचा रए तो मनो आप सोई कतल में सामिल कहाए। सो अपन ओरन ने जगंल कटबे की खूब खबरें पढ़ीं। मनों मों से बोल ने फूटें। कभऊं खुल के बिरोध ने करी।’’ हमने कई।
‘‘सो अपन ओरें का कर सकत आएं? अपन ने तो खबई पढ़ी, अपनी आंखन से तो नईं देखो।’’ बे ढिठाई दिखात भए बोले।
‘‘सई कई के अपन ने अपनी सगी आंखन से तो नईं देखो। मनो अपन गांव, बस्ती, सहर खों तो बढ़त देख रए। जे जंगल की जमीन पे नईं फैल रए तो का चांद पे फैल रए?’’ हमने सोई कई।
‘‘अब जनसंख्या बढ़हे तो मकान तो लगहेंईं।’’ उन्ने कई।
‘‘जनसंख्या उत्ती नईं बढ़ी जित्ते की मकान बढ़ गए। काए से अब कोऊ बाप-मताई के संगे नईं रैत। सबखों अपने लगाने अलग मकान चाऊने। पैले का होत्तो के सबरे संगे रैत्ते। सो उतई पुस्तैनी मकान में चार तल्ला भले बना लए जात्ते मनों अलग रैबे की कोऊ ने सोचत्तो। अब तो सबखों अलग-अलग रैने औ सबखों अपनो अलग मकान चाऊने। काए सई कई के नईं।’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘कै तो आप सई रई, पर जे सब तो चलन की बात आए। आजकाल जेई चलन चल रओ। का करो जा सकत आए?’’ बे मासूम बनत भए बोले।
‘‘ध्यान से सुनियो आप औ बुरऔ ने मानियो! का आए के बच्चा ऊंसईं बनत आएं जैसे मताई-बाप होत आएं। आप खों लेओ, आप उते बरिया चौक को अपनो पुरानो मकान छोर के नई बस्ती में रैबे खों चले आए। मताई-बाप खों उतई छोर आए। मने बा मकान बी आपको औ जे नओ मकान बी आपको। अब आप के लरका-बच्चा सोई जेई कर रए कोऊ नोएडा में घरे खरीद रओ तो कोऊ गुरुग्राम में तो कोऊ बैगलुरु में। मनों इते को मकान बी उने नई छोड़ने। उल्टे आजकाल सो जे चलन हो रओ के बे ओरें उते पइसा कमा के इते गांव-जंगल में अपनो फारम हाऊस खरीद के डार रए। जीमें उनको साल-दो साल में कभऊं-कभार आने। मनों एसेट्स के नांव पे जंगलई तो कटवाने उनें।’’ हमने कै डारी।
‘‘आप से तो कछू कैबो फजूल आए। आप से कओ आम, सो आप नींम की सुनान लगत आओ। हम जा रए।’’ बे बमकत भए बोले। काए से के हमें पता हती के उनके लरका औ बिटिया ने इते अपनों-अपनों फारम हाऊस खरीदो आए। अब आपई सोचो के जिनकी जिनगी नोएडा औ बैंगलुरु में कटनी होए, उनें इते जमीन दबा के बैठबे की का जरूरत? मनों नईं बा उनके लाने धरती मां को टुकड़ा नोईं, बा तो एसेट्स आए। भले ईके बदले कई एकड़ को जंगल कट गओ होए चाए खेती मिट गई होए।
‘‘अरे, आप बुरौ काए मान रए? हम तो जग की कै रए। आप हमाए कहे को पर्सनल ने लेओ। आप तो जे बताओ के पर की साल को आपको लगाओ गओ पेड़ कैसो आए?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘अच्छो हुइए।’’ बे बोले।
‘‘का मतलब के अच्छो हुइए? आप ऊको जा के देखत नइयां का?’’ महने पूछी।
‘‘अब लगा दओ रओ पेड़। सो अब बेर-बेर उते जा के को आ देख रओ? का जे नेता हरें अपनों लगाओ पेड़ देखबे खों जात आएं?’’ उन्ने उल्टे हमई से पूछ लई।
‘‘बे काए खों जैहें? का उने औ कोनऊं काम नइयां? औ फेर उनखों मताई के नांव को हर गांव-सहर में एक पेड़ लगाने होत आए, बे कां-कां जा के देखहें? मनों आप तो जा सकत हो।’’ हमने कई।
‘‘जेई तो बात आए के पेड़ लगा दओ। अब ऊको रोजीना को देख रओ।’’ बे बोले।
‘‘सई कई आपने। एक दिनां अपनी मताई खों याद कर लओ, ऊके नांव पे एक पेड़ लगा दओ, जीके लाने उते गड्डा पैले से खुदे मिलत आएं। ऊमें पेड़ लगाओ औ फोटू खेंचाई, फेर पानी डारो औ फोटू खेंचाई। फेर ऊ सबरी फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार दओ। कऊं पौंच लग गई तो अखबार में फोटू छपवा लई। हो गओ एक पेड़ मताई के नांव को। जै राम जी की।’’ हमने कई।
‘‘तो का? जेई से सब कर रए।’’ बे अपनो पल्ला झारत भए बोले।
‘‘फेर तो जे सई रैहे के ई दफा हमने पेड़ नईं लगाओ आए, सो कोऊ दिनां आप संगे चलियो औ पेड़ लगात भए हमाई फोटू खेंच दइयो। हम सोई उन फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार के पेड़न खों श्रद्धांजलि दे लेबी।’’ हमने उनसे कई।
‘‘हऔ जरूर! जब चलने हो हमें फोन कर लइयो। हम संगे चले चलबी। हम सोई एकाध पेड़ औ लगा देबी।’’ बे हुलसत भए बोले। उन्ने हमाई कई ‘श्रद्धांजलि’ पे कान ई ने दओ। बे हमाओ ब्यंग ने समझे।
बे तो ‘राम-राम’ कर के चले गए, मनों हम जेई सोचत रए के अपन ओरें इंसान हो के हाथी घांईं बनत जा रए जीके खाबे के दांत औ, दिखाबे के औ। हम तो बे गइया-बकरी से गए गुजरे होत जा रए जोन घास खों ऊपरे-ऊपरे से खाउत आएं, जड़ें छोरत जात आएं, ताके दूसरे दिनां फेर के उनको घास मिल सके। हम तो सब कछू जड़ई से खा जात आएं। कल के लाने बचाबे की कोन खों परी?
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरन में से जोन-जोन ने मताई के नांव को पेड़ लगाओ, बे पलट के अपनों लगाओ पेड़ देखबे गए के नईं? औ गए तो कित्ती बेर?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Thursday, January 16, 2025

बतकाव बिन्ना की | को तै करहे ई राजनीति में का जायज औ का नाजायज? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
       को तै करहे ई राजनीति में का जायज औ  का नाजायज?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘का सोच रए भैयाजी?’’ मैंने देखो के भैयाजी मूंड़ पे हाथ धरे बैठे हते।
‘‘हम जा सोच रए के साल बदल गओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, बा तो बदल गओ। औ अब तो आदो मइना गुजर गओ। ईमें कछू सोचबे को का?’’मैंने भैयाजी से पूछी।
‘सोचबे को जे के साल बदल गओ। 2024 से 2025 लग गओ, मनो हाल बदलो का?’’ भैयाजी सोचत भए बोले।
‘‘हाल का बदल जैहे? खाली कलैण्डर बदलो आए। पर की साल को उतार के नओ लटका दओ। जेई पंचांग के संगे करो। मनो पंचांग तो अबे पुरानो सोई धर लओ आए। काय से के कोनऊं पुरानी तिथी-मिथी देखबे की जरूरत पर जाए तो कहां ढूंढत फिरबी?’’मैंने भैयाजी से कई। 
‘‘जेई सो हम कै रए के कलैण्डर बदलवे से कछू नईं बदलो। सगरी प्राबलम जां के तां धरीं।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘कोन सी प्राब्लम?’’ मैंने पूछी।
‘‘एक हो तो गिनाएं, बाकी तुमई देख लेओ के ने तो सिटी की रोडन खों आवारा पशुअन से छुटकारो मिलो औ ने रोडें सई से बनीं। अबे अग्निवीर की भर्ती चल रई हती, सो ऊमें भिंड-मुरैना के मुतके लड़का आए रहे। आजकाल तो चार ठो जांगा के लाने चार से चौदह हजार मोड़ा आ ठाड़े होत जात आएं। ई ठंडी में उन ओरन ने खींब दौड़े लगाईं। जे तो कओ अच्छो रओ के कछू दान करबे वारन ने उनकी मुफत में पंगत करा दई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘तो सई तो करो। अखीर बे ओरें बी तो कोनऊं के बच्चा आएं। उनके मताई-बाप हरों खों तनक तो सहूरी भई हुइए।’’ मैंने कई।
‘‘काए, तुम का सोचत आओ जे अग्निवीर के बारे में? जे भर्ती होन चाइए के नईं?’’ भैयाजी ने अचानक मोसे पूछ लओ।
‘‘हमाए बिचार में तो जो सई आए। कुल्ल देसों में सो सैनिक शिक्षा सबको लेने परत आए, फेर बे चाए बड़े सेलीबिरटी होंए चाए कोनऊं पब्लिक होए। सो हमाई जान में तो जे सई आए। ईंसे जे जो आजकाल सबसे ज्यादा जो बिगड़े जा राए अपने मोड़ा हरें, उनमें कछू तमीज आहे।’’ मैंने कई।       
‘‘हऔ सई कई। आजकाल अपने ज्वान हरें दो टाईप के भए जा रए। एक तो मोबाईल ले के बैठे रैबे वारे, जोन खों हाथ-गोड़े हलाबे में पहाड़ टूटत आएं। उनसे बाप-मताई कछू काम करबै की कैत आएं सो बे ठन्न से कै दैत आएं के, हमाए पास अबे टेम नईयां!’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ दूसरे टाईप के?’’ मैंने पूछी।
‘‘दूसरे टाईप के बे ओरे आएं जोन खों अपनी बौडी बनाबे से फुरसत नईयां। कऊं जिम जैहें औ कऊं बो का कहाऊत आए... हौ, बा मैंगी-मैंगी प्रोटीन ड्रिंक पीहें। जो उनसे कओ के भैया हरों अम्मा ने हींग के बघार वारी अच्छी दार बनाई आए, तनक बा खा लेओ, सो नांक-मों बनन लगत आएं। उनखों दार को प्रोटीन नईं पुसात। औ जो कोनऊं काम करबे की कओ सो उने सोसल मीडिया पे अपनी रील बनाबे औ पैलबे से फरसत नइयां। सई में ऐसे मोड़ा हरों खो तो कछू टेम के लाने फौज में भेजो जाने चाइए। फेर जां रैहें, तरीका से रैहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बाकी एक बात तो आए भैयाजी!’’मैंने कई औ तनक सस्पेंस बनाबे खों इत्तई बोल के चुप रै गई।
‘‘कोन सी बात?’’ भैयाजी पूछे बिगर नईं रै सके।
‘‘कछू तो बदलाव दिखान लगो आए जे नए साल में।’’ मैंने कई।
‘‘तुमें कोन सो बदलाव दिखान लगे?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आपने नईं देखो का?’’ मैंने पूछी।
‘‘कां? हमें तो कछू नओ नई दिखानो।’’ भैयाजी बोले।
‘ऐल्लो, मने आप अपडेट नई रैत आओ!’’ मैंने तनक चिकोटी-सी लई।
‘‘काए की अपडेट? अब बुझौव्वल ने बुझाओ, इते कोनऊं केबीसी नईं हो रओ।’’ भैयाजी झुंझलात भए बोले।
‘‘कोन ने कई के इते केबीसी हो रओ? मैं तो उन खबरन की कै रई जोन में कओ गओ के अपने इते की राजनीति में नई खेप आ गई।’’ मैंने कई।
‘‘राजनीति में नईं खेप? जो सब का कै रईं, हमें तो कछू समझ नईं पर रओ।’’ भैयाजी अपनो मूंड़ खुजाउन लगे।
‘‘नई खेप मने अपने नेता हरन के बाल-बच्चा अब राजनीति के मैदान में कूंद परे आएं।’’ मैंने तनक और साफ कर के बताई।
‘‘सो ईमें नओ का आए? अपने शिवराज भैया मने अपने पुराने वारे मुख्यमंत्री के बेटा जू सो पैलेई आ चुके आएं। उन्ने चुनाव में प्रचार बी करो रओ और भषन-माषन बी दओ रओ।’’ भैयाजी मोरे सस्पेंस की हवा निकारत भए बोले।
‘‘मैं उनकी नईं कै रई। बे सो पैले आ गए। मनो अब अपने दूसरे नेता हरों के बच्चा हरें बी उद्घाटन-मुद्घाअन में दिखान लगे। मने अब जे साफ दिखान लगो के उनके बच्चा हरों में से कोन खों लांच करो जा रओ औ कोन खों बैकफुट में रखो गओ आए।’’ मैंने भैयाजी खों तनक औ समझाई।
‘अच्छा हऔ, हम समझ गए के तुम कोन-कोन के लाने कै रईं। मनो, सुनो बिन्ना! अब तुमई सोचो के डाक्टर अपने बच्चा खों डाॅक्टर बनाबो चात आए, कलेक्अर अपने बच्चा खों कलेक्टर बनाओ चात आए, एक्टर अपने बच्चा खों एक्टर बनाबो चात आए तो जो नेता अपने बच्चा खों नेता बनाबे की सोचें सो ईमें बुराई का?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘बुराई कछु नईयां। काय से जोन लड़कोरे से राजनीति के अंगना में गुलली-डंडा खेल रए होंए उनके लाने उते काम करबो आसान रैहे। हम तो कै रए के ऐसे होबे में कोनऊं बुराई नइयां।’’मैंने कई।
‘‘सो फेर ईमें बतकाव करबे की का आए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘बतकाव करबे की जे आए के जो उनके अपने बच्चा राजनीति में आएं सो बा जनसेवा कहाई, कहाई के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। 
‘‘हऔ तो? ईमें का?’’
‘‘ईमें जे के बा कहनात आए ने के जो ‘अपनो घर कांच को बनो होए, सो दूसरों के घर पे पथरा नईं मैकों जात आए’, सो दूसरन के बंसबाद पे बतकाव करत समै जे सोई ध्यान रखो चाइए।’’ मैंने कई।
‘‘तुम तो गजबई कर रईं बिन्ना! ऐसो कैत भए तुमें डर नईं लगत?’’ भैयाजी चैंक परे।
‘‘काय को डर? हम का गलत कई? जो गलत कई होय सो कओ आप!’’ मैंने भैयाजी खों चैलेंज करो।
‘‘नईं, कै तो तुम सांची रईं, मगर बिन्ना कभऊं-कभऊं सांची बात कोऊं-कोऊं खों करई लगन लगत आए। सो सोच के बोलो करो।’’ भैयाजी ने मोए समझाओ।
‘‘आपने बा कहनात सोई सुनी हुइए के साहित्य समाज को दरपन होत आए, ओ मैं ठैरी साहित्य वारी। सो, दरपन दिखाए बिगर मोए सोई चैन कां परहे। औ फेर गलत का कै रई? मैं तो जे कै रई के जा राजनीति के मैदान में खेलो औ खेलन देओ। जो तगड़ो हुइए बा जीत जैहे। होन देओ खुल के नूरा कुश्ती। सई की टांग खैंचो, झूठी नईं।’’ मैंने कई।
‘‘अब जेई पे तुम सोई बा कैनात याद कर लेओ के ‘प्यार औ लड़ाई में सब जायज रैत आए’। राजनीति में अपनो चित्त, सो चित्त रैत आए औ दूसरो चित्त बी पट्ट कओ जात आए।’’भैयाजी ने अब मोए समझाओ।
‘‘ठीक कई भैयाजी आपने।’’ मोए भैयाजी की कई मानने परी। बे सोई सांची कै रए हते।   
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में, को तै करहे ई राजनीति में का जायज औ नाजायज?
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Thursday, July 25, 2024

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
कविताई में सोई बड़ो दम होत आए
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       आज बड़े संकारे भैयाजी को फोन आओ। मैंने सोची के ऐसी कोन सी बात आन परी के भैयाजी इत्ते संकारे फोन कर रए? मैंने तुरतईं फोन उठाओ। 
‘‘का कर रईं बिन्ना?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘कछू नईं! अबई नल गए सो अब चाय बनाबे की तैयारी कर रई हती। आप ओरें सोई आ जाओ औ मोरे संगे चाय पीलो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हमें चाय नईं पीने, बाकी तुमसे बड़ो जरूरी सो काम आए।’’ भैयाजी बोले। उनके बोलबे में उतावलोपन साफ झलक रओ हतो। 
‘‘हऔ, कओ भैयाजी, का काम आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘फोन पे नईं बता सकत। या तो तुम इते आ जाओ, ने तो हम उते आए जा रए।’’ भैयाजी बोले। उनकी बात सुन के मोरे पेट में पीरा होन लगी के ऐसी कोन सी बात आए जो भैयाजी फोन पे नईं बता सकत? 
‘‘आपई आ जाओ! काय से मोय दरवाजो-बरवाजो बंद करबे में तनक टेम लगहे। औ मोरी चाय को पानी सोई चूला पे चढ़ो आए। 
‘‘हऔ, सो हम आ रए।’’ कैत भए भैयाजी ने तुरतईं फोन काट दओ।
मैंने चाय को पानी बढ़ाओ। एक की दो करी। ऊमें चाय की पत्ती, शक्कर औ दूध डारो, के इत्ते में भैयाजी आ गए। औ आतई साथ बोले,‘‘जा चाय-माय छोड़ो, तुम तो हमाई सुनो!’’
‘‘अरे, तनक तो गम्म खाओ आप! बस चाय बनई गई। छानने भर आए।’’ मैंने भैयाजी से कई। फेर मैंने झट्टई चाय छानी और एक कप उने पकराई औ एक मैं ले के बैठ गई।
‘‘हऔ, अब आप बताओ के ऐसी कोन सी बात आए के आप मोए फोन पे नईं बता पा रए हते?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ, फोन पे नई बताओ जा सकत्तो!’’ भैयाजी जल्दी-जल्दी चाय सुड़कत भए बोले। फेर उन्ने पूछो,‘‘काय बसी नईयां का?’’
‘‘बसी-असी कछू नईयां! आजकाल को पी रओ बसी में ढार के चाय? औ आप सोई तसल्ली से फूंक-फूंक के चाय पियो, अपनो मों ने जरा लईयो।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई। बाकी जोन टाईप से बे चाय सुड़क रए हते ऊसे उनको मों तो जरो हुइए, पक्के में।
‘‘लेओ, पी लई चाय! अब सुनो हमाई।’’ भैयाजी ने दो मिनट में चाय सूंट के कप एक तरफी धरो औ कैन लगे।
‘‘हऔ, चलो बताओ आप! पर ठैरो, कऊं आपने कछू गड़बड़ तो नईं करी आए? भौजी के पीठ पांछू कछू गुल तो नईं खिला आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, कां की बात कर रईं। ऐसो कछू नइयां।’’ भैयाजी झल्लात भए बोले।
‘‘फेर ठीक! अब बताओ आप के का हो गओ?’’ मोए तनक सहूरी आई।
‘‘हमने कल रात पांच-छै कविताएं लिख डारीं।’’ भैयाजी एकई सांस में बोल गए।
‘‘ऐं? का कई आपने?’’ मोय अपने सुने पे भरोसो ने भओ।
‘‘हम जे कै रए के कल रात को हमने पांच-छै कविताएं लिख डारीं। अब तुम इने तनक चैक कर देओ। कऊं कछू सुधारने होय सो सुधार दइयो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे आपको अचानक कविता कां से सूझ परी, अच्छे भले तो हते आप?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘सो का हम कविता लिख के बिगड़ गए? अपने बुंदेलखंड में तो एक से एक कवि हो चुके। सो का हम तनकऊं ने लिख सकत का?’’ भैयाजी बुरौ मानत भए बोले।
‘‘अरे, मोरो मतलब जे ने हतो। आप तो खूब लिखों कविता, मैं आप खों रोक थोड़े रई।’’ मैंने तुरतईं बात सम्हारी।
‘‘अच्छा तुम्हाई बताओ के रायप्रवीण ने अकबर खों कविता सुनाई रई के नईं?’’ बो कोन सी कविता हती...।’’ कैत भए भैयाजी सोचन लगे।
‘‘बिनती रायप्रबीन की, सुनिये साह सुजान।
जूठी पतरी भखत हैं, बारी-बायस-स्वान।।’’ - मैंने भैयाजी खों रायप्रवीण को बा कवित्त याद दिलाओ।
‘‘हऔ! औ तनक सोचो के जा कवित्त से अकबर इत्तो शर्मिंदा भओ के ऊने रायप्रवीण खों साथ इज्जत के वापस भिजवा दओ रओ। ने तो पैले तो ऊकी नीयत खराब हो गई रई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कई भैयाजी!’’ मैंने सोई हामी भरी।
‘‘औ महाराज छत्रसाल तो सोई कविता लिखो करत्ते। उने जबे बारीराव से मदद चाउंने रई सो, उन्ने एक कवित्त लिख के बाजीराव के पास भेजी रई। औ बा कवित्त पढ़ के बाजीराव मदद करबे के लाने भगत चले आए रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, बा कवित्त ई रओ के -
जो गति ग्राह गजेन्द्र की, सो गति जानहु आज।
बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजी लाज।।’’ 
- मैंने भैयाजी खों बा कवित्त सुना दओ।
‘‘सो तुमई देखो के कविताई में कित्तो दम होत आए। सो हमने बी सोची के हम सोई कविता लिखबी। फेर का हती, हमने अपनो जा मोबाईल उठाओ औ एक दार में पांच-छैं कविताएं सूंट दईं। अब बस, तुमें इनको पढ़ के बताने के, जे ठीक आएं के नईं।’’ भैयाजी बोले। उनको टोन जोई हतो के उनकी कविता जांचबे को मतलब आए के सब अच्छी-अच्छी कैने, बुरई नईं बताने।
‘‘चलो, आप सुनाओ फेर!’’ मैंने भैयाजी कई। 
‘‘चलो, हम एक ठइयां सुनाय दे रए, बाकी तुम खुद पढ़ लइयो!’’ कैत भए भैयाजी कविता सुनना लगे-
‘‘पब्लिक से मों फेर रए हैं दद्दा जू।
 बातन के  भए शेर रए हैं दद्दा जू।
 मैंगाई से  मरे  जा  रए  इते सबई
 उड़न खटोला  हेर रए हैं दद्दा जू।
 सड़क मिट रई,नरदा पुर रए,देखो तो
 कोन तरक्की  टेर रए है दद्दा जू।’’
भैयाजी की कविता सुन के मोरे तो होशई उड़ गए। मैंने उनसे पूछी,‘‘जे आपई ने लिखी?’’
‘‘औ का? कऊं से कट-पेस्ट नोंई करी।’’ भैयाजी ने शान से कई।
‘‘सो, आपतो बड़े अच्छे कवि निकरे! अबे लौं कां छिपे रए? पैले काय नईं लिखी?’’मैंने भैयाजी से पूछ डारो।
‘‘ऐसो आए के कविता में हमाई रुचि तो भौत पैले से रई। तुमाई भौजी खों देख-देख के कविता लिखो करत्ते और फेर उने पुरजा में लिख के भेजो करत्ते। तभईं तो बे हमसे लव करन लगीं हतीं। बाकी जब हम काॅलेज के छात्र संघ में अध्यक्ष औ उपाध्यक्ष रए, ऊ टेम पे सोई हमने अपनी केनवासिंग के लाने कविताएं लिखी रईं। जोन के बल पे हम जीते बी रए।’’ भैयाजी बतान लगे।
‘‘सो फेर कविता लिखबो छोड़ काय दओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। 
‘‘अरे हमें लगो के, जे कविताई में कछू नईं धरो! कछू कमाए-धमाएं सो घर चलहे। फेर तुमाई भौजी से हमाओ ब्याओ सोई गओ रओ, सो औ कविता लिखबे की जरूरत ने हती।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘सो अब रातई-रात में कोन-सी जरूरत आन परी के आप रात भर में छै कविताएं लिख के बैठ गए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब तुमसे का छुपाने, भओ का के कल शाम को हमाए एक चिनारी वारे को बाहरे से फोन आओ। बा सोई छोटो-मोटो कवि आए। बा मंचो पे कविताएं पढ़त आए। ऊने बताओ के आजकाल मंच पे कविता पढबे पे खूब पइसा मिलत आए। औ कऊं टीवी के कोनऊं बड़े चैनल के बड़े प्रोग्राम में कविता पढ़बे को मिल गओ, तो समझो नरमदा जी नहा लओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो जे बात आए! आपको कविता प्रेम नईं जागो, आपको तो रुपैया पे्रम जागो आए। तभई तो मैं सोच रई हती के आप जे अचानक कविताई काय करन लगे। बाकी आपकी कविता मनो सई में बड़ी नोंनी आए। ईपे खूबई तालियां बजहें। सो पैले आप मोरो परसेंटेज फिक्स करो फेर मैं आपकी बाकी कविताएं सुनहों या पड़हों।’’ मैंने भैयाजी से सौदेबाजी करी। 
‘‘हऔ, ले लइयो, जित्तो लेने होय! पैले हमें कऊं पढ़बे तो जान देओ।’’भैयाजी खुस होत भए बोले। काय से के उने कविताई को आजकाल को दम समझ में आ गओ रओ।
सो, भैया औ बैन हरों हो सकत के कोऊ दिनां भैयाजी आपके शहर के कोनऊं कविसम्मेलन में दिखा जाएं तो तनक उनको सुन लइयो। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।  
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Thursday, June 13, 2024

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
जे टीवी सीरियल आएं के भूत-चुड़ैल के अड्डा आएं
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘बिन्ना तनक आ तो जाओ, तुमाई भौजी पगला रईं।’’ भैयाजी ने संकारे से मोय फोन करो। उनकी जे बात सुन के मोय बड़ो अचरज भओ। भैयाजी ने कई के भौजी बीमार भई जा रईं, अब ईको का मतलब भओ? ऐसो का कर रईं बे? खैर, उते जाए बिगैर पतो चलने ने हतो, सो मैंने झट्टई तारा-कुची उठाई औ घरे तारा डार के भैयाजी के इते जा पौंची।
‘‘भौजी को का हो गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुमई देख लेओ!’’ भैयाजी ने भौजी की तरफी इशारा करो।
मैंने देखो के बे डरी-डरी सी दिखा रईं हतीं।
‘‘काय भौजी का हो गओ?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘कछू नईं।’’ भौजी टालत भईं बोलीं।
‘‘सो, आपको मों सुफेद सो काय परो जा रओ औ आप डरी सी काय दिखा रईं? कोनऊं ने धमकाओ-वमकाओ तो नई?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘तुम और! इनको को आ धमका सकत आए? जे तो सबई खों उल्टो लटकाए फिरत आएं।’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘चुड़ैलें लटकत आएं उल्टी, औ बेई सब खों उल्टो लटकाए फिरत आएं। का हम आपके लाने चुड़ैल दिखा रए?’’ भौजी भैयाजी पे बमक परीं।
भैयाजी तनक हड़बड़ा गए, मनो ईसे भौजी के मों पे तनक रौनक लौट आई। बे अपनो डर भूल-भाल के भैयाजी खों फटकारन लगीं।
‘‘मनो भओ का आए? तनक मोय सोई बताओ आप ओरें!’’ मैंने दोई से पूछी।
‘‘अब हम तुमें का कताएं बिन्ना, जे जो तुमाई भौजी आएं, परमेसरी अजूबई आएं।’’ भौयाजी बोले।
‘‘आपने फेर हमाई बुराई करी!’’ भौजी को मुंडा खराब हो गओ।
‘‘अरे, हम तुमाई बुराई नोई कर रए। बस, हम तो बिन्ना खों जे बता रए के तुमाई जे दसा काय भई जा रई।’’ भैयाजी भौजी खों समझात भए बोले।
‘‘का भई हमाई दसा खों? ठीक तो आए।’’ भौजी तनक सम्हरत भईं बोलीं।
‘‘सो रात से तुम डरा काय रईं?’’ भैयाजी ने भौजी से पूछी औ फेर मोय बतान लगे,‘‘का भओ आए बिन्ना के आजकाल तुमाई भौजी बे भूत-चुड़ैल वारे टीवी सीरियल देखन लगीं आएं। हमने इने समझाई रई के तुमें तो भूत-चुड़ैल से डर लगत आए, फेर काय के लाने ऐसे सीरियल देखत आओ? सो जे बोलीं के लड़कौंरी में डरात्ते, अब डर नईं लगत। सो, दो-चार दिनां तो इन्ने खूबई मजा ले-ले के देखो औ फेर डरान लगीं। कल रात खों तो को जाने कोन सो सीरियल देख रई हतीं के बा सीरियल खतम ने हो पाओ औ जे डरान लगीं।’’
‘‘कनऊं नई, हम नईं डरा रए हते।’’ भौजी ने टोंको।
‘‘औ जो नईं डरा रईं हतीं तो इत्ती गरमी में मों से चदरा ओढ़ के काय सो रई हतीं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘बा तो ऊंसई। मछरा काट रए हते।’’ भौजी ने झूठी कई।
‘‘हऔ, हमें तो एकऊ ने नई काटो! का बे स्पेसल तुमें काटबे के लाने आए हते?’’ भैयाजी भौजी से बोले।
‘‘हऔ, ऐसई हतो!’’ भौजी झुंझलात भईं बोलीं।
‘‘औ इत्तई नई बिन्ना! अब हम तुमें का बताए के इन्ने हमाए संगे अब लौं रैत भर की जिनगी में पैली बार हमें जगाओ औ बोलीं के हमाए संगे बाथरूम लो चलो। हम तो इनकी जे बात सुन के डरा गए के कऊं इनकी तबीयत तो ने बिगर रई? हमने इनसे पूछी के काय तुमें चक्कर-मक्कर आ रए का? तो जे बोलीं नईं बस तुम संगे चलो। सो हम इनके संगे बाथरूम के दोरे लौं गए। उते भीतरे से जे इत्ती जल्दी बाहरे लौंटीं के हमें लगो के इन्ने बाथरूम करो के ऊंसई भाग आईं। अब तुमई बताओ के जे सोचबे वारी बात आए के नईं? काय से के तुमाई भौजी कभऊं मों से चदरा ओढ़ के नईं सोतीं औ ने जे अंदियारे में जाबे से डरात आएं। मगर अब को जाने का हो गओ इने।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘आप ठीक कै रए, जे बा सीरियल देख के डरा गईं हुइएं। हो जात आए कभऊं-कभऊं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
फेर मैंने उन दोई को अपनी किसां बताई के ‘‘जब मैं लोहरी हती तो मोय सोई अंदियारे में जाबे से डरात्ती।’’
‘‘तुमाई तो समझ में आई के तुम जबें लोहरी हतीं, पर जे तो सयानी ठैरीं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘डर को का? डर तो कभऊं बी लग सकत आए। डर कोनऊं उम्मर नईं देखत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई। मैं जा कै के भौजी की साईड बी लेबो चा रई हती। जीसे उनको डर कम होय। औ ईको असर बी भओ।
‘‘देखो ने बिन्ना! तुमाए भैयाजी हमाए लाने ठेन करे जा रए। अरे हमने चुड़ैल खों छत पे उल्टे लटको देखो, तो का हमें डर न लगहे?’’ भौजी अखीर बोल परीं।
‘‘आपने कां देख लओ चुड़ैल खों?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अरे बा सीरियल आउत आए ने, ‘डायन को बदला’ बोई में देखो। तुमने देखो?’’ भौजी फेर के तनक डरात भई बोलीं।
‘‘बा सीरियल तो नई देखो, बाकी मोय सोई डरावनी फिल्में पसंद आउत आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘सो तुमें डर नईं लगत?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘उने देख के काय को डर? बे ओरें कलाकार ठैरे। उने भूल-चुड़ैल बनबे के मिल रए लाखों रुपैया। उनसे का डराने?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘पर सई मानों के जे डायने-मायने होत आएं, तभई तो ऐसो सीरियल बनाओ जात आए।’’ भौजी बोल परीं।
‘‘जे खूब कई भौजी आपने! आप पढ़ी-लिखी आओ औ फेर बी ऐसी बात कर रईं? अब तो आपको ई टाईप के सीरियल देखबो छोड़ देनो चाइए। आप तो डिस्कवरी और नेशनल जियोग्राफी के सीरियल देखो करे। उनखों देख के आप समझ जैहो के जे भूत-चुड़ैल कछू नई होत आएं।’’ मैंने भौजी खों समझाई। फेर मैंने भैयाजी से कई,‘‘भैयाजी, मोय तो जा सोच के चिंता हो रई के जे कोन टाईप के सीरियल आजकाल टीवी पे दिखाए जा रए? जबें अपनी भौजी घांई समझदार लुगाई डरान लगीं तो बाकी के संगे का होत हुइए? जे तंत्र-मंत्र, भूत-चुड़ैल वारे सीरियल के लाने परमीशन कोन देत आए? फिलम तो मानो ढाई-तीन घंटा में बढ़ा जात आए, पर जे सीरियल तो रोजीना तनक-तनक डोज़ सो देत रैत आएं।’’
‘‘सई कई बिन्ना! पैले कित्ते नोने सीरियल आत्ते टीवी पे। हमने पैले ‘भारत एक खोज’ ‘तमस’ ‘हमलोग’ ‘चंद्रकांता’, ‘रामयण’, ‘महाभारत’ घांईं कित्ते अच्छे सीरियल देखे रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, बा ‘नुक्कड़’ सीरियल कित्तो अच्छो रओ, औ बा ‘मालगुडी डेज’। औ एक रओ ‘रजनी’ सीरियल। ऊमें बताओ जात्तो के कछू गलत होत देखो तो तुरतई आवाज उठाओ। सई में भौतई अच्छे सीरियल रए बे। बाकी रामसे वारन ने ‘जी हाॅरर शो’ बनाओ रओ। फेर ‘आहट’ ‘श्श्श कोई है’ घांई सीरियल सोई चलत रए, मनो बे ज्यादा रात को आत्ते, औ जोन खों देखने रैत्तो, बेई देखत्ते। अब तो सबई चैनल में दो-चार ऐसे वारे सीरियल चलत रैत आएं। बाकी भूत-प्रेत लौं होंय तो ठीक, मनो अब तो तंत्र-मंत्र सोई खूब दिखाओ जान लगो आए। जो अंधविश्वास फैलाबे को काम हो रओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ-हऔ, अब हम समझ गए, अब ने देखहें ऐसो सीरियल।’’ भौजी मुस्कात भईं बोलीं। हम ओरन की बतकाव सुन के उनको डर दूर हो गओ।
‘‘बाकी बिन्ना हमें जे समझ में ने आत आए के जे टीवी सीरियल आएं के भूत-चुड़ैल के अड्डा आएं?’’ कैत भए भैयाजी हंसन लगे।    
आप ओरें बी सोचियो के जे सब का चल रओ? बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Thursday, February 1, 2024

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात

बतकाव बिन्ना की
काए, तुम सोई थाली के भंटा भए जा रए
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       हम ओरें तीनों जने बैठे बतकाव कर रए हते। हम तीनों मने भैयाजी, भौजी और मैं। संझा की बिरियां हती। अंदियारो सोई घिर आओ रओ। ठंड सो मनो पड़ई रई आए। सो, हम ओरन ने गुरसी जला रखी हती। बाकी आजकाल चलन नईं रै गओ गुरसी को। कोनऊं के इते जाओ सो जो वो तनक लंबरदार घांईं माल वारो हुइए तो एसी चला के कमरा में बैठो मिलहे, ने तो तनक नीचे वारो हुइए तो हीटर, ने तो ब्लोअर चला के कमरा में बिड़ो मिलहे। अब गुरसी बंद कमरा में सो जलाई नईं जा सकत, ने तो तापबे वारो दो-चार घंटा में अपनी सुरग की टिकट कटा लैहे। सो गुरसी तनक खुले आंगन में ने तो कमरा को दरवाजो खुलो रख के तापी जाती आए। ईसे होत का है के बाहरे की ताजा हवा सोई मिलत रैत आए। फेर सोबे की बेरा तो पल्ली में मूंड़ घुसा के सोनेई रैत आए।
खैर, मैं कां की कां पौंच गई। वैसे देखो जाए तो कई बेरा जेई होत आए के बात कां की कां पौंच जात आए। जेई भओ ऊ टेम पे जबे हम तीनो जने गुरसी की आगी तापत भए बतकाव कर रए हते। बतकाव करत-करत बात निकर आई बिहार की। फेर नितीश राय जू की।
‘‘देखो तो भैयाजी, इने बेर-बेर पलटी खात भए शरम नईं आत?’’ मैंने कई।
‘‘काय की शरम बिन्ना! हमाए एक साथ के पढ़बे वारे रए, उनको पेटेंट डायलाग रओ के-‘जिनने खाई सरम, उनके फूटे करम’।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हट् ऐसो कईं होत आए? जो इंसान में लाज-शरम ने होय तो ई दुनिया में न जाने का-का होन लगे।’’ भौजी ने भैयाजी खों टोकों।
‘‘हम तो अपनी संगवारे की कै रए। मनो, तुमई देखो के दल बदले से फायदा भओ के ने भओ?’’ भैयाजी बोले।
‘‘काय को फायदा? कुर्सी भले मिल गई मनो जग हंसाईं सो भई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरी परमेसरी! राजनीति में का कोनऊं जगहंसाई देखत आए? सबई खों कुर्सी की लगी रैत आए। उनको लाने तो कुर्सी प्यारी, सबसे न्यारी।’’ भैयाजी कविताई करत सी बोले।
‘‘मने हमें तो जे नई पोसात। अरे पैले के नेता हरों खों देखो सगरो जीवन एकई पार्टी में रैत भए निकार देत्ते। अटल बिहारी जू खों ई याद कर लेओ तनक।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे तुमें नईं पतो, हमने पढ़ो आए। एक दार तो जे बिन्ना ने अपने एक लेख में सोई लिखों रओ, काए बिन्ना?’’ भैयाजी ने मोसे कई।
‘‘का लिखो रओ?’’ अब मोय का समझ में आतो के भैयाजी कोन से टाॅपिक, कोन से लेख की बात कर रए?
‘‘जेई दलबदल पे।’’ भैयाजी बोले। फेर भौजी खों बतान लगे,‘‘ अरे पैले तो ऐसे नेता हो चुके जोन ने घंटा-खांड़ में दल बदल लओ रओ।’’
‘‘सच्ची?’’ भौजी खों यकीन नई भओ। उने लगो के भैयाजी फंकाई दे रए।
‘‘औ का! हमने पढ़ी रई, जे 1967 की बात आए। ऊ टेम पे हरियाणा में एक निर्दलीय विधायक रए, नांव हतो गया लाल। चुनाव जीतबे के बाद बे पैलेे कांग्रेस में शामिल हो गए, मगर फेर पंद्रा दिनां के भीतरे उन्ने तीन बेर दल बदल लओ रओ। निर्दलीय से कांग्रेस में आए रए। उते ने बनी सो विशाल हरियाणा पार्टी (विहपा) में शामिल हो गए। फेर उते बात ने बनी सो गया लाल जू कछू दिनां मेंई  कांग्रेस में लौट आए। मनो बे इत्तई पे ने रुके। केवल नौ घंटे मेंई फेर के विशाल हरियाणा पार्टी ज्वाइन कर लई। केवल नौ घंटा में। ईके बाद विहपा के नेता राव बीरेन्द्र सिंह ने उनई के आंगू एक प्रेस कांफ्रेंस में उनके लाने कई रई के ‘गया राम’ अब ‘आया राम’ है’.। बस, तभई से ‘आया राम गया राम’ वारी कहनात चल परी।’’ भैयाजी ने भौजी खों बताई। उनकी बतकाव सुन के मोय बी याद आ गई के मैंने तीन-चार एपीसोड को एक लम्बो लेख लिखो रओ हतो दलबदल पे।
‘‘राम-राम! जे ऐसे नेता हरों ने का भला करो हुइए पब्लिक को।’’ भौजी बोलीं।.
‘‘बे पब्लिक को भलो करबे राजनीति में नईं उतरत, उने तो अपनो भलो करबे की परी रैत आए। बाकी कछू कओ, जिनगी में कछू-कछू बदलाव होने बी चाइए।’’ भैयाजी कछू सोचत भए बोले।
‘‘का मतलब तुमओ?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘मतलब जे, के एकई लुगाई के संगे पूरी जिनगी काटबे का मतलब? एक खों छोर के दूसरी के संगे रओ जाओ चाइए।’’ भैयाजी अचानक बोल परे। उनकी मति मारी गई रई जो भौजी से ऐसी ठिठोली कर बैठे।
‘‘काय, तुम सोई थाली के भंटा बनबे के लाने मरे जा रए? तुमें लुगाई बदलने से का मिल जैहे? तुमें कोनऊं मंत्री का चपरासी लो ने बनेहे।’’ भौजी बमक परीं।
‘‘काय, हा सकत के हमें कोनऊं नेताइन मिल जाए सो हमाए भाग खुल जाएं। हम सोई कऊं से चुनाव में ठाड़े हो के मंत्री बन जाएं। औ ने तो बा लुगाई जो कछू में रैहे, ऊके पति होबे के कारण हम सोई पार्षदपति, विधायकपति, मंत्रीपति, मनो जो कछू बा हुइए, बा पति कहलाबी। हमाओ सोई रुतबा बढ़ जैहे। अबे तो कोनऊं पूछत नईयां।’’ भैयाजी शेखचिल्ली घांई बोले।
‘‘सुनो! स्टाॅम्प पेपर पे लिखा लेओ हमसे, पैले तो तुमें कोनऊं औ मिलहे ना, औ जो मिली सो इत्ती ने पूछहे जित्ती हम तुमें पूछत आएं। ऊकी चप्पलें उठाए फिरने परहे।’’ भौजी को मंुडा गरम होन लगो। बे ने ताड़ पाईं के भैयाजी मजाक कर रए। मनो जे टाईप को टापिक होतई सेंसटिव आए। कोन जाने कैत-कैत मानुस को मनई बदल जाए। आखिर बे सोई मानुसई तो होत आएं जोन रोज की पर्टी बदलत रैत आएं। बाकी मोय भैयाजी पे भरोसो आए के बे भौजी खों कभऊं नईं छोड़ सकत। ई मामले में बे भाजपा औ आरएसएस घाईं अपनी पार्टी के लाने ईमानदार आएं, मने भौजी के लाने ईमानदार आएं।
‘‘अरे, तुम तो हमाई ठिठोली खों सीरियसली ले बैठीं। हम तुमें छोड़ के कां जाबी?’’ भैयाजी खों सोई बात की गंभीरता समझ परी। बे समझ गए के जे राजनीति नोईं उनकी जिनगी आए जोन में जो भौजी रूठ गईं सो उनकी जिनगी झण्ड हो जैहे। सो बे भौजी खों पुटियान लगे।
‘‘काय, तुम तो बुरौ मान गईं! हम सो मजाक कर रए हते। सुनो! हम का कै रै, के अब गुरसी में अच्छे अंगरा हो गए, ईपे एकाद भटां ने भून लओ जाए, अच्छो भरता बन जैहे।’’ भैयाजी बात बदलत भए बोले।
‘‘भंटा काय, तुमई खों ने भून दें ईपे, तुम तो सोई भंटा भए जा रए। थाली पे लुढ़कबे की बड़ी पर रई।’’ भौजी खुंखियात भई बोलीं।
‘‘अरे धना! हम तुमाए पांव परें, हम तुमें छोरबे की का कभऊं सोच सकत?’’ भैयाजी पूरे सरेण्डर होत भए बोले।
‘‘सोचियो बी नईं! ने तुम कोनऊं नितीश कुमार आओ औ ने हम जनता दल यूनाईटेड आएं, जो हम तुमें वनपीस बदलबे दैंहें। तुमाए हाथ-गोड़े तोड़-ताड़ के तुमाए मूंड़ पे रख दैंहें।’’ भौजी ने भैयाजी खों चेतावनी दे डारी। फेर मोसे बोलीं,‘‘काय बिन्ना हम ठीक कै रए के नईं।’’
‘‘बिलकुल ठीक कै रईं भौजी!’’ मैंने भौजी खों समर्थन करो। भैयाजी अपनो कान पकरन लगे। सो आप ओरें सोई ध्यान राखियो के घरे कोनऊं जो बदरबे की बात करे सो भौजी घांईं स्टैंड लइयो।    
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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#बतकावबिन्नाकी  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn #प्रवीणप्रभात #praveenprabhat

Thursday, November 30, 2023

बतकाव बिन्ना की | काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं?" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं?
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       कुल्ल दिनां बाद भैयाजी के घरे रौनक सी दिखानी। काय से के चुनाव के टेम पे तो बे ऐसे बिजी भए के मनो बे खुदई चुनाव में ठाड़े भये होंय। दो दिना से ऊंसई बदरा ऊंदें आएं। तनक-मनक बौछारें सी सोई पड़ गईं। मनो मावठे को पानी खेती के लाने सो अच्छो रैत आए पर जड़कारो सोई शुरू हो गओ कहाओ। खैर, बात हो रई हती भैयाजी की। पिछले कछू दिनां बे चुनाव के काम में बिजी रए। कोनऊं की केनवासिंग करी, तो कोनऊं के लाने झंडा टांगत फिरे। वोई टेम पे मोए एक दिना एक पार्टी को झंडा लगाउत दिखा गए रए। मैंने देखी के बे डंडा पे जोन झंडा बांध रए हते ऊपे पार्टी को निसान बनो हतो औ संगे निसान के नैचे अंग्रेजी में पार्टी को पूरो नांव लिखो हतो। मैने भैयाजी से पूछी के ‘‘काय भैयाजी, जोन जे मोहल्ला में आप जो झंडा लगा रए का इते इत्ते पढ़े-लिखे लोग आएं के जे पार्टी को नांव अंग्रजी में पढ़ लैंहें?’’
‘‘बे का पढ़ पाहें? जेई सो तो संगे निसान छापो गओ आए के लोग जे निसान देख के पैचान लेवें।’’ भैयाजी बोले हते।
‘‘मनो इते जे अंग्रेजी वारे झंडा भेजबे की जरूरतई का हती?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘को जाने? हमें तो लगत आए के जे उतई दिल्ली-मिल्ली से बन के आए हुइएं। ने तो इते होतो तो हिन्दी में लिखो जातो।’’ भैयाजी ने अपनी राय दई।
‘‘ठीक कओ आपने! मनो ऐसी पार्टी को का हुइए, मोय तो जे समझ में नई आ रई? जोन को इत्तई नई पतो के कोन सी जांगा पे कोन टाईप से प्रचार करो जाओ चाइए।’’ मैंने कई हती।
बाकी जा बात अब हो गई पुरानी। अब तो रिजल्ट को इंतजार आए। मैंने सोची के ई बारे में भैयाजी से तनक बतकाव करी जाए। सो मैं भैयाजी के घरे जा पौंची।
‘‘का हो रओ भैया जी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘होने को का आए? कारवां सो कढ़ गओ अब गुबार की धूरा फांक रए।’’ भैयाजी तनक कविताई करत भए बोले।
‘‘सो अब का होबे जा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘का मतलब?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मतलब जे, के जोन जे भैया हरें चुनाव में ठाड़े भए हैं, औ बैनजी हरें सोई, सबई की धुकधुकी हो रई हुइए के को जीतहे, को हारहे!’’ मैंने कई।
‘‘सो तो है! अभई परों बा एक उम्मींदवार मिले हतो। हमने उसे कई के आप तो जीत हो ई। सो बे कैन लगे के का पतो, जा जनता कोन खों चुनहे? मने उनको खुदई भरोसो सो नई दिखा रओ हतो के बे जीतहें के नईं। अब ऐसे में धुकधुकी सो हुइए ई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप को का लग रओ के कोन की बनहे सरकार? कछू उलटफेर हुइए का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब जे हमसे ने पूछो! जे सब के लाने बे टीवी वारे ई भौत आएं। बे सो सुभै से रात लों जेई अटकलें घालत रैत आएं के ई दफे बा आहे, ई दफे जा आहे। मनो बे वोट देबे वारन के पेट में सो घुसे बैठे जो उने सब पतो होय!’’ भैयाजी टीवी वारन पे भड़कत भए बोले।
‘‘अब बे ओरे बी का करें, उने सोई अपनी टीआरपी बढ़ाने रैत आए, सो बे ई टाईप के डिबेट कराउत आएं, एक्जिट पोल बताउत आएं औ मनो जोन सी बी नौटंकी करने परत है सो करत हैं। का करें, उने सोई अपनों पेट पालने परत आए।’’ मैंने टीवी वारन को पक्ष लओ।
‘‘तुमें बड़ी दया आ रई उन ओरन पे? औ बे जब खंडहर को रहस्य, भूत वारो कुआ जैसी रपट दिखात आएं सो तुमई गरियात आओ उनकों। बा सब बी तो बे अपनो पेट की खातिर दिखात आएं। तबे काय नईं आत दया तुमें उनपे?’’ भैयाजी को मौका मिल गओ मोरी टांग खिचाईं करबे को।
‘‘बा अंधविश्वास फैलाबे वारी बात आए। ऊको ई से काए जोड़ रए?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘काय ने जोड़ें? जो बा गलत सो जा गलत। औ जो जा सई, सो बा बी सई।’’ भैयाजी बहस करत भए बोले। आखिर चुनाव टेम पे नेता हरों के संगे फिरबे को कछू तो असर हुइए ई।
‘‘हऔ, चलो दोई सई औ दोई गलत। अब काय गिचड़ रए उन ओरन के नांव पे?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ सई कै रईं बिन्ना! उन ओरन को का? अपनी ड्यूटी बजाउत बेरा इते-उते की बतकाव करी, चिंचिंया-चिंचिंया के दो-चार खबरें सुनाईं औ फेर कोनऊं पब-फब में बैठ के दो-चार बाटलें चढ़ाईं औ घरे जा के पर रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे जो आप उन ओरन के बारे में बोल रए, जे कछू ज्यादा नईं हो गई?’’ मैंने भैयाजी खों टोको।
‘‘चलो छोड़ो! अपन ओरें सोई कां से कां पौंच गए? बात शुरू भई रई उम्मीदवारन से औ जा पौंची टीवी वारन लों। औ तुम बताओ के तुमाओ का चल रओ?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘मोरो का चलने? चलत तो उनकी आए जोन के पास लुटाबे खों पइसा होय, सोर्स-सिफारिश होय, उनसे सबई की अटकत होय! मैं सो ठैरी ऊंसई, सो मोरी का चलने।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे, तुम तो इमोशनल भई जा रईं! हमने सो ऊंसई पूछी रई। हम तुमाओ दिल नईं दुखाओ चात्ते।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मोय पतो आए। आपई ओंरे सो हो जो मोरो दुख-दरद समझत हो, ने तो बाकी के पास सो टेम लो नईयां के कभऊं हाल-खबर पूछ लेंवें।;’’ कैत भए मोय सांची में दुख सो लगो।
‘‘अरे, तुम काय दुखी हो रईं? जे दुनिया सो ऐसई चलत आए। इते कोनऊं खों कोनऊं की नईं परी। अभईं देखियो, तनक चुनाव को रिजल्ट तो आन देओ। जोन जे अपने उम्मींदवार के पांछू-पांछू फिरकी बने घूम रए हते, जो कऊं उनको उम्मीवार हार गओ, सो ऊके घरे झांकबे ने जाहें। जे जो अबे जैकारे लगात फिर रए हते, बे ऊसे हल्लो-हाय लों ने करहें। सो तुम अपनो जी ने दुखाओ। जोन को जो करने, सो करन दो।’’ भैयाजी मोय समझात भए बोले।
‘‘हऔ भैया! मैंने सोई गौर करी आए के कछू जने सो चुनाव टेम पे खाली प्रचार को पइसा खाबे खों आगे-आगे हो दिखात आएं। जो चुनाव हो गओ, सो बे सोई डकार लए बिगैर अपने घरे पर रैत आएं। आप सांची कै रए के बड़ी स्वारथ की दुनिया आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘जे स्वारथ सोई राजनीति वारन ने ई अपन ओरन खों सिखाओ आए। उनको झूठ बोलत देख के अपन ओरें झूठ बोलबो सीख गए। उनको स्वारथपना देख के अपन ओरें स्वारथ की बतकाव करन लगें। जे राजनीति वारे सो आएं जो जात-धरम को भेद मिटाबे की जांगा भेद बढ़ात जा रए। पैले धरम की सल्ल रई औ अब जात-बिरादरी के सल्ल लों बात पौंचा दई। हमें सो जे सब अच्छो नईं लगत, मनो का करो जाए? एक हमाए सुधारे से सबरे थोड़ईं सुधरहें।’ भैयाजी सोई इमोशनल होत भए कैन लगे।
‘‘अब आप अपनो जी ने दुखाओ भैयाजी!’’ अबकी मैंने भैयाजी खों सहूरी बंधावे की कोशिश करी।
‘‘हऔ, हम तो जा सोचत आएं के कोनऊं जीते, मनो बा सबई के लाने अच्छो काम करे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ कछू ज्यादई उम्मींद नईं लगा रए आप?’’ मैंने भैयाजी खों टोंकी, ‘‘काय से के इते कोनऊं हमाम नोईं, इते तो खुल्ला घाट आएं ईमें सबई खुल्ला नहाऊत आएं। कोनऊं खों कोनऊं से शरम नोई। तभई तो ने तो पार्टी बदलत में देर लगत आए औ ने भ्रष्टाचार को कांड करे में कोनऊं शरम आऊत आए।’’
‘‘सांची कई। बाकी अब का सोचन लगीं?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘सोच नई रई कछू! बाकी जो जी कर रओ के चुनाव में ठाड़े नेता हरों से जा के पूछो जाए के काय भैया हरों धुकधुकी हो रई के नईं?’’ मैंने मुस्का के भैयाजी से कई।
‘‘सो चलो, संगे चलत हैं! एकाध से तो पूछ ई सकत आएं।’’ कैत भए भैयाजी सांची में ठाड़े हो गए। मैंने बी सोची के चलों जा करबे में तनक मूड अच्छो सो हो जेहे। ऊंसई अबे तो नेता हरें फेर बी बतकाव कर लैंहें। औ जो कऊं एक बेरा जीत गए सो हम ओरन को मों देखबे को उनके पास टेम नई रैने। सो हम दोई निकर परे टीवी वारन घांईं चिटपिया सवाल धर के। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #बुंदेलखंड #BatkavBinnaKi #Bundeli #DrMissSharadSingh
#Bundelkhand #बुंदेलीव्यंग्य

Thursday, October 12, 2023

बतकाव बिन्ना की | भरोसा पुरानई पे करो जात आए, समझे के नई? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"भरोसा पुरानई पे करो जात आए, समझे के नई?" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की      
भरोसा पुरानई पे करो जात आए, समझे के नई?
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
            हम ओरें भाजपा  के उम्मींदवारन की लिस्ट पे बतकाव कर रए हते। हम ओरें मने, मैं औ भैया जी। भैयाजी कै रए हते, ‘‘सब उनई ओरन खों चुनाव लड़ाओ जा रओ जो पैले ठाड़े हो चुके औ जीत चुके।’’
‘‘सो, सई तो आए! जो कछू कर चुके उनई पे संगठन वारे भरोसा कर सकते आएं। बाकी जोन के काम से जनता खुश ने हो पाई हुइए, उने बाहरे को रास्ता खुदई दिखा देहै।’’ मैंने कई।
भैयाजी की बात सई हती के भाजपा  ने ई बेर के चुनाव में बी उनई लोगन खों टिकट दई जोन खों पिछली बेरा दई हती। मने भाजपा कोनऊं रिस्क नई लेबो चा रई।
‘‘तुमें नईं लगत बिन्ना, के ईसे उन ओरन खो कित्तो दिल टूटो हुइए जो कई बरस से काम कर रए जेई आशा में कभऊं ने कभऊं तो टिकट मिलहे?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘सो, उनको वारो कभऊं अबकी नईं आओ, जेई उने मान लओ चाइए। पार्टी बोई घोड़ा पे दांव लगाबो पसंद करत आए जोन को रेस जीतबे को भरोसो होय।’’ मैंने तनक भैयाजी खों तनक अच्छे से समझाने को प्रयास करो।
‘‘हऔ, चाए बो घोड़ा दलबदल कर के दूसरी पार्टी से आओ होय!’’ भैयाजी ठिठोली करत भए बोले।
‘‘हऔ, चाय कऊं से आओ होय। हरेक पार्टी के लाने जीत जरूरी होत आए, उम्मींदवार को नरा नोईं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
मोरी बात सुन के भैयाजी खों खूबई हंसी आई। फेर बे हंसत भए बोले,‘‘तुमाई नरा वारी बात पे हमें एक सांची किसां याद आ गई। कओ तो सुनाएं?’’
‘‘हऔ! सुना देओ!’’ मैंने कई।
‘‘का भओ के ऊ टेम पे डालचंद जी जैन पन्ना-दमोय सीट के सांसद हते। सबई जानत आएं के उने चुटुकला सुनाबो अच्छो लगत्तो। सो, एक दफा बे अपने क्षेत्र को दौरा करत भए हटा पौंचे। उते कोनऊं ने उनसे कई के इते तो समस्या ई समस्या आए, जो एक खतम नईं हो पात के दूसरी ठाढ़ी दिखात आए। आप कछू ऐसी करो के जे क्षेत्र खों समस्याओं से छुटकारा मिल जाए। जे सुन के डालचंद दादा मुस्काए फेर बोले के भैया, ऐसो नईं हो सकत। जे सुन के उते ठाड़े सबई जने मों बाए रै गए। अरे, कां तो उने कओ चाइए रओ के अब हम आ गए सो अब कोनऊं समस्या ने रैहे, मगर जे का? बे कै रए हते के सबरी समस्या कभऊं नई मिटहें। दादा डालचंद हते चतुर। बे ताड़ गए के बे ओरें का सोच रए। सो, दादा बोले, के तुम ओरे जेई सोच रए न, के हम जे का कै रए। सो जान लेओ के हम तुम ओरन से झूठ नई बोल सकत आएं। औ सच जेई आए जो हमने तुम ओरन से कई।’’
‘‘हऔ, जबके नेता हरें फंकाई पे फंकाई देत रैत आएं।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, आगे की तो सुनो! दादा बोले के हम चाए कित्तौ मूंड़ फोड़ लेबें, एक न एक समस्या सो बनई रैहे। फेर उन्ने एक किसां सुनाई। बोले हम बता रए के समस्याएं काय नई मिट सकत आएं। का है के एक गांव में एक तला हतो। ऊ तला में कऊं से एक मगरमच्छ आ गओ। जनता ने सोची के एक मगरमच्छ से का फरक परत आए? रैन दो! बे तला में सपरत-खोंरत रए औ मगरमच्छ उते रैत रऔ। कछू दिनां बाद एक मगरमच्छ औ आ गओ। गांव वारन ने सोची के जे दो हो गए सो होन दो। जे दो मगरमच्छ हमाओ का बिगार लेहैं। पर गंाव वारन ने ध्यान नई दओ के उनमें एक मगरमच्छ हतो औ एक मगरमच्छी हती। कछू दिनां में दोई प्राणियन ने अपनों परिवार बढ़ा लओ। देखत-देखत मगरमच्छन से तला पुर गओ। बे गांव वारन के गाय-गरुआ मार के खान लगे। खुद गांव वारन के जान पे बन आई। तब बे भगे-भगे राजा के ऐंगर पौंचे और गुहार लगाई के कछू करो, हमें बचाओ। राजा ने एक शिकारी से बात करी। शिकारी बोलो के जे बड़ो जोखिम को काम आए सो हमें एक मगरमच्छ मारबे के बदले सोने के दस सिक्का दइयो। राजा ने सोची के जे एक बेरा को खर्चा आए। एक दफा जो जे सारे मगरमच्छ मारे जेहैं, फेर जे शिकारी को का काम? सो राजा ने शिकारी की बात मान लई। शिकारी गांव पौंचो। ऊंनंे मगरमच्छ मारबो शुरू करो। कछू दिनां में सबरे मार दए, मनो दो छोड़ दए। एक नर औ एक मादा। कछू दिनां गांव में सहूरी रई। फेर कछू दिनां बाद बोई समस्या फेर के आ गई। तला मगरमच्छन से पुर गओ। गांव वारे फेर के राजा के ऐंगर भगत गए। राजा ने फेर के शिकारी को भेजो। शिकारी ने फेर के सबरे मगरमच्छ मारे। औ फेर के दो छोड़ दए। जब ऐंसई-ऐंसई दो-तीन दफा भओ सो राजा ने शिकारी से पूछी के जे तुम हर बेरा दो मगरमच्छ काए छोड़ आत आओ? सब के सब काय नईं मारत? सो बो शिकारी बोलो के महाराज! आप राजा हो के इत्तई नईं समझे? अरे, जो हम सब के सबई मार देहैं औ दो ने छोड़हें सो हम को पूछहे? जबलौं मगरमच्छ आएं, तबलौं हमाई पूछ-बकत आए। जे किसां सुना के दादा डालचंद जैन जी ने उते ठाड़ी जनता से पूछी के कछू समझे के नईं? सो जभईं एक सच्चो चुटकुला हो गओ। के उतई ठाड़ो एक आदमी बोलो के हम कां से समझें, हमाए बब्बा ने सो हमाओ नरा उते तला ई में गाड़ो रओ। बा पगला की बात पे सबई हंस परे। मनो, बात जे आए के राजनीति में ने तो सांची चलत आए औ ने झूठी, जनता जो समझ लेवे बोई दौड़त आए।’’ भैयाजी पूरी किसां सुनात भए बोले।
‘‘हऔ, जे किसां बे अकसर सुनात्ते। मैंने सोई कई दफे सुनी रई। बाकी बा नरा गड़े की बात खूबई रई।’’ मैंने हंस के कई।
हम ओरें बतकाव करई रै हते के इत्ते में भौजी लौट आईं। बे कऊं सुहागनें करबे खों गई रईं।
‘‘का बतकाव हो रई भैया-बैन में?’’ भौजी मुस्कात भई बोलीं औ उतई हम ओरने के लिंगे बैठ गईं।
‘‘कछू खास नईं। चुनाव औ उम्मीदवारन की चर्चा कर रए हते।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, सबरे बेई चेहरा दिखाहें।’’ भौजी बोलीं।
‘‘चलो तुम दोई जनी बैठो हम सबई के लाने चाय बना लात आएं।’’ कैत भए भैयाजी ठाड़े हो गए।
‘‘तुम कां चले, चाय तनक देर में बना लइयो! पैले उम्मींदवारन की चर्चा सो कर लेओ! बताओ बिन्ना खों के का भओ?’’ भौजी ने भौयाजी को कुर्ता को छोर पकर उने रोकत भई कई।
‘‘अरे बिन्ना खों का बताने? हम सो ऐसई ठिठोली कर रए हते।’’ भैयाजी घबड़ात भए बोले।
‘‘का भओ? कछू तो बताओ!’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘का भओ बिन्ना के आजकाल अखबार में खूबई विज्ञापन छप रए। कऊं कार के तो कऊं टीवी के तो कऊं बरतन-भाड़े के। उनमें एक्सचेंज आॅफर सोई रैत आए। सो परों जे तुमाए भैयाजी एक विज्ञापन देख के बर्रान लगे के जे सबई कछू को विज्ञापन देत रैत आएं मनो घरवाली के लाने कोनऊं विज्ञापन नई रैत? हमने पूछी के का मतलब तुमाओ? तो जे कैन लगे के जो कोनऊं घरवाली बदलवे के लाने कोनऊं आॅफर होतो सो हम सोई तुमें बदल देते।’’ भौजी सुनात भई हंसन लगीं।
‘‘हैं? ऐसी कई भैयाजी ने?’’ मोय बड़ो अचरज भओ।
‘‘हऔ! रामधई ऐसई कई रई। हमने सोई कै दई के सोच लेओ, बदलबे खों तो बिना आॅफर के तुम बदल सकत आओ। कओ तो हमई तुमाए लाने ढूंढ देंवें। मनों एक बात याद राखियो के पुरानी टिकाऊं औ भरोसे की होत आए। नई के भरोसे तुमाई जिनगी ने चल पाहे। औ देख लेओ, अबे जो भाजपा के उम्मींदवारन की लिस्ट आई सो ऊंमें का भओ? राजनीति वारे बी पुरानों पे भरोसो कर रए। हमने पढ़ा दई पूरी लिस्ट इनके लाने, के देखों औ ने गर्रेयाओ!’’ भौजी भैयाजी खों कुतका दिखात भईं हंस के बोलीं।
‘‘सई कई भौजी। जो टिकाऊं होय बोई पे भरोसो करो चाइए और जोन पे भरोसो होय, उनेई टिके रैन दओ चाइए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हमें तो तुमाए भैया पे खूबई भरोसो आए तभईं तो हम इने टिकाए भए आएं।’’ भौजी ठठा के हंस परीं। भैयाजी सोई झेंपत-झेंपत हंसन लगे।
‘‘देखों, अब कांग्रेस औ दूसरी पार्टियन में का होने जा रओ?’’ मैंने कई।
‘‘उनकी बे जाने! ओ काय बिन्ना के भैयाजी ! भरोसा पुरानई पे करो जात आए, समझे के नई?’’ भौजी हंसन लगीं औ भैयाजी उते से उठ के खसक गए चाय बनाबे खों।  
सो, बात तो मनो सई आए के। भरोसो पुराने पे करो जा सकत आए बाकी जे ईको जे बी मतलब नोंई के नओं खों मौकई ने दओ जाए। हम जे जग की कै रए राजनीति की नोईं। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Thursday, August 10, 2023

बतकाव बिन्ना की | आ गओ सीजन अटकन-चटकन को | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"आ गओ सीजन अटकन-चटकन को" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
आ गओ सीजन अटकन-चटकन को             
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
         ‘‘अटकन-चटकन दही चटोकन’’ जो मैं भैयाजी के घरे पौंची सो मैंने देखी के भैयाजी तखत पे बैठे अपनी दोई टांगे हिलात भए गा रए हते।
‘‘जो का कर रए भैयाजी?’’ मोय बड़ो अचरज भओ।
‘‘कछू नईं अटकन-चटकन की याद आ गई, सो बोई देख रए हते के अब लों कित्तो भूल गए औ कित्तो याद रओ।’’ भैयाजी अपनी टांगे हिलाबो बंद करत भए बोले।
‘‘पर जे अटकन-चटकन की याद कैसे आ गई? कऊं आप बचपने में सो नईं लौट गए? जैसे बो एक फिलम आई रई श्रीदेवी की। जीमें ऊ ज्वान-जहान उम्मर में अपने बचपने में चली जात आए औ गुड्डा-गुड़ियन से खेलन लगत आए। बाकी जे अटकन-चटकन सो औ लोहरी उम्मर को कहाओ!’’ मैंने भैयाजी से कई। काए से मोए उनकी फिकर होन लगी।
‘‘सो ऊ में का? कोनऊं उम्मर की याद आ सकता आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बा सो ठीक आए, बाकी आपके मूंड़ पे कोनऊं चोट तो ने घली? आप कोनऊं से टकराए तो नईं? आप के मूंड़ पे कोनऊं ने एकाध डंडा तो ने घाल दओ?’’ मैंने भैया जी पूछी।
‘‘जे का अंट-शंट बोले जा रईं? तुम का सोच रईं के मोरी यादाश्त चली गई? मोय सिरफ लड़कपन याद रओ औ कछू नईं? जो ऐसो होतो तो हम तुमें कैसे चीन्ह पाउंते?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, कै तो आप सांची रए। आप मोय कैसे पैचानते? बाकी एक बात आए भैयाजी के मैंने जे देखो है के जो कोनऊं सई दिमाग वालो होय सो मोय भूल जात आए, मानो कोनऊं अगला-पगला होय सो ऊको मोरी खूब याद रैत आए।’’ मैंने कई।
‘‘तुम सोई कोनऊं पगलिया से कम आओ का?’’ मोरी बात सुन के भैयाजी हंसन लगे।
‘‘चलो आप हंसे तो! सो अब बताओ आप को आज जे अटकन-चटकन कां से याद आ गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब ऐसो आए बिन्ना के, अपन ओरन के संगे 24 के चुनाव लों अटकन-चटकन ई करो जाने आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का मतलब?’’
‘‘मतलब जे बिन्ना, के तुमें अटकन-चटकन याद आए?’’
‘‘हऔ!’’
‘‘बताओ कैसो करो जात आए?’’
‘‘मोय पापाजी की याद नोईं, काय से के आप तो जानत हो के जो मैं दो साल की हती तो बे गुज़र गए रए। बाकी मामाजी मोय अपने पांवन के पंजा पे बिठा के झूला झुलात्ते औ अटकन-चटकन गाउत्ते। ऊ टेम पे ऐसो लगत्तो जैसे कोनऊं असल झूला पे झुलाओ जा रओ होय। बड़ों मजो आउत्तो। बे संगे गाउत्ते-
अटकन-चटकन दही चटोकन
राजा जी को घोड़ा अड़ गओ
पान-बरेजा में पत्ता सड़ गओ
झरबेरी तईं  कांटा  गड़ गओ
बूढ़ी डुकरिया सुजी ल्ये आई
मंागे  बा   कांटा   निकराई ....!’’
- कैत-कैत मोरी आंखें भर आईं, संगे गलो भर आओ, ऊ टेम की याद कर के।
‘‘अरे बिन्ना, तुम तो रोन लगीं। हमने ईके लाने याद करबे की नई कई के तुम रोन लगो। बाकी हमाए इते अटकन-चटकन के बोल दूसरे रैत्ते कोनऊं ई टाईप के-
अटकन-चटकन दहीं चटोकन
बाबा लाए सात कटोरी
एक कटोरी फूटी,
नई दुलैया रूठी
बऊ की बातें झूठीं
ठाई ठक्का ठाई ठक्का,
रै गए सबरे हक्का-बक्का....
-बाकी, जे गीतन की जेई तो खूबी रई के इनमें मुखड़ा बोई रैत्तो औ बाकी नेचें की लाईनें अपनी तरफी से बना-बना के गा दी जात्तीं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जे तो होत्तो! मनो अब तो जे सब कऊं बिला गए। अभईं आन देओ गणेशजी को टेम, सो देखियो आप, के पांच-पाच, छै-छै साल के मोड़ा-मोड़ी स्टेज पे कोन किसम के गाना पे नचहें। बा जब ‘शीला की ज्वानी’ वारो गाना चलत्तों, तो ऊं पे स्टेज पे नचत्ते, फेर ‘कम्मरिया’ आओ सो बित्ता भर की मोड़ियां अपनी कमरिया हिलान लगीं औ उनके मम्मी-पापा देख के खुस होत रए। अब ई बार ऐसई कोनऊं गाना हुइए।’’ मैंने कई।
‘‘जे तो आए बिन्ना! बाकी जब अपन ओरें छोटे हते तो ऊं टेम पे ऐसे गाने नई बन्नत्ते, पर जो बनत्ते बे सोई छेड़ा-छेड़ी के रैत्ते औ ऊंपे तो स्कूल में डांस कराओ जात्तो। जैसे एक ऊ गाना रओ-‘‘मोए पनघट पे नंदलाल छेड़ गओ रे...’। अब जे गाना कां से बच्चा हरों के जोग रओ?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! मैंने सोई करो हतो ईपे डांस। ऊं टेम पे मैं दूसरी, ने तो तीसरी कक्षा में पढ़त्ती। औ मोय छेड़ गओ को मतलबई ने पतो रओ। मोय तो बस, लैंगा-चुन्नी पहनबे को शौक रओ, जोन के लाने डांस करो हतो। खैंर, जे सब छोड़ो आप। आप तो जे बताओ के आपके लाने जे अटकन-चटकन कां से याद आ गई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हम तो तुमें जेई सो बातबे वारे हते के अब अटकन-चटकन को सीजन आ गओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बो कैसे?’’
‘‘बो ऐसे के अब चाए ‘कां’ पार्टी के होंय, चाए ‘भा’ पार्टी के औ चाए ‘आ’ औ ‘बा’ के, सबरे घर के दुआरे आ-आ के अटकन-चटकन कराहें।
‘‘बो कैसे? औ काय को?
‘‘बो ऐसे के, बे सबरे अपन ओरन को अपने वादा को झूला झुलैहें। झूला बी असल वारो नोईं, झूठ को झूला। बे अटकन-चटकन घांई वादन को गीत गाहें, पांव पकर-पकर के उल्लू बनाहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ईमें नओ का? जे सो हर पांच साल में होत रैत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, हमें अटकन-चटकन की आदत सो पर गई आए। कोनऊं झूला ने झुलाए सो अपन ओरन को मजो नई आऊत।’’ भैयाजी चिढ़त भए बोले।
‘‘ईमें चिढ़बे वारी बात कोन-सी? बे तो आहेंईं। अब आपई सोचो, के बे जो बेंचबे वारे आउत आएं -आरो वारे, चटाई वारे, झाडू वारो, साड़ी वारे - जे सबई अपनो समान ले के आप के दुआरे पे आउत आएं के नईं? बेंचबे के टेम पे बे कैत आएं के जे झाडू पांच साल चलहे, जे साड़ी पांच साल चलहे, जे आरो की मशीन कभऊं ने बिगरहे। मनो ऊंको सो पलट के आने नइयां, सो कैबे में का हरजा? अब चाए झाडू की दो दिनां में एकऊं फुर्री ने बचे, चाए धुतिया बैठतई साथ पांछू से चर्र बोल जाए औ चाय आरो की बा मशीन को पानी पी के धनी अस्पताले पौंच जाए, ईसे बेंचबे वारे को का? ऊंने सो अपनो माल बेंचो औ अपनो काम बना लओ। अब आप जानें, आपको फूटो भाग जानें।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘हऔ बिन्ना, जेई सो हम सोच रए हते के अपन ओरें कैसे वोटर आएं के इत्ते साले हो गईं, मनो सही-गलत पैचानबो ने सीख पाए? बातन में आ के इतने अंधरा हो जात आएं के थथोलत-थथोलत जा के बटन दबा आउत आएं।’’
‘‘जेई से तो मतदाता जागरूकता अभियान चलाओ जात आए।’’ मैंने अपनी जानकारी बताई।
‘‘हऔ, बो सोई सरकार औ निर्वाचन आयोग चलाउत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ तो, सरकारई तो हमें सिखाउत आए के शौच के बाद साबुन से हाथ धो लओ करे। अब औ का-का सिखाए, बिचारी सरकार। जेई मारे तो बा ठीक से कामकाज नईं कर पाउत आए। अब हाथ धोबो सिखाए के, वोट डारबो सिखाए, के अपनो काम-काज करे। बाकी आप सोई अटकन-चटकन को मजा लइयो! जेई तो लोकतंत्र आए!’’ मैंने भैयाजी से कई।
भैयाजी हंसन लगे। औ मैं उते से उठ परी। काए से के बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Thursday, March 30, 2023

बतकाव बिन्ना की | काए, जो सब का चल रओ? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"काए, जो सब का चल रओ?"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
काए, जो सब का चल रओ?                  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘भैयाजी! एक ठइयां बात बताओ!’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘पूछो! का पूछ रईं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे बताओ के जो सब का चल रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जो सब? का सब?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘अरे जेई सब!’’ मैंने कई।
‘‘हमें नोई समझ पर रई तुमाई बतकाव? तनक खुल के बोलो के का पूछो चा रईं?’’ भैयाजी झुंझलात भए बोले।
‘‘अरे जोई के कोनऊं धनी कै रओ के अपने गांधी बापू ने वकालत की कोनऊं डिग्री ने लई हती, तो कोनऊं कै रओ के राहुल गांधी खों संसद से निकार दओ, सो अच्छो करो। जो सब का आए? जे सो ऐसो लगत आए के कोनऊं खों गांधी नांव से खुन्नस आए। ने तो मोहनदास से खुन्नस, ने तो राहुल से। काय नई लगत ऐसो?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सो तुमें का? जोन खों जो कछुू बोलने होय सो बोलन देओ। तुम ने परो जे सब में।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काय ने परो का मोहनदास करमचंद गांधी जी अपने राष्ट्रपिता नोंई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘सो ईसे का? का उनके पढ़े, ने पढ़े से का बे अपन ओरन के बापू ने रैहें? अपने इते सो दूसरी फेल सांसद रै चुके आएं। जे राजनीति में पढ़े, ने पढ़े से कोनऊं फरक नईं परत। बाकी अपने बापू पे कोनऊं ऐसी-वेसी बात होनी ने चाइए। ईसे बिदेसन तक में गलत असर परत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जेई से सो राहुल भैया खों हड़काओ गओ के बे बिलायत की अनवरसिटी में काय इते की बोल आए?’’ मैंने कई।
‘‘सो का जेई के लाने उने संसद से निकार दओ गओ?’’ भैयाजी ने अचरज से पूछी।
‘‘अरे नईं, बा तो उनसे जे लाने संसद की सदस्यता छुड़ा लई गई के उन्ने चार साल पैले कोनऊं खों अपमान करबे वालो डायलाॅग बोल दओ रओ।’’ मैंने भैयाजी के आगूं अपनो अधकचरो ज्ञान बघारो।
‘‘लेओ, उन्ने अपमान करोे चार साल पैले औ सदस्यता छिनी अबे?’’ भैयाजी बोले। फेर बे मजाक करत भए कै बैठे के -‘‘बड़ी जल्दी करी।’’
‘‘हऔ, अपने इते की अदालते सो ऊंसई तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख के लाने मशहूर आएं, जे सो सांची में कछु जल्दी निपट गए।’’ मैंने कई। मोए अपने सनी देओल भैया की बा फिलम याद आ गई जोन में जा तारीख वारो डायलाॅग उन्ने बोलो रओ। शायद ‘‘दामिनी’’ हती बा फिलम।
‘‘का सोचन लगी?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मोय याद आ गई के मैंने एक भौत बड्डे वाले संपादकजी की पोस्ट पे टिप्पणी करी के जो कऊं आज लेखक जार्ज आर्वेल होते सो बे का लिखते? उन्ने जवाब दओ के बे 1984 सो लिख चुके, 2024 ही लिखते। मोरो जी करो के मैं टिप्पणी करौं के जे गलत जवाब! काय से के जार्ज आर्वेल ने 1948 में लिखी रई ‘‘1984’’ जो 1949 में छपी रई। सो बे आज होते तो ‘‘2042’’ लिखते 2024 नोईं। औ 2042 बी काय, बे 2023 में 2032 लिखते। है के नईं?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सो तुमने ऐसो लिखो नई उनको?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘अब ऐसो आए के मोरे मन में उनके लाने बड़ो सम्मान आए, सो मोसे जे ठिठोली करी ने गई।’’ मैंने कई।
‘‘अच्छी करी! अब जे गुणा-भाग छोड़ो के बे तुमाए का कहाउत आएं, के जार्ज आरवेल होते सो का लिखते औ का नई लिखते? बे होते सो अपनी कलमई तोड़ताड़ के मईं खों फेक देते। काय से के इते कल को भरोसो नईं के कल को का कै देवै।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सही कई भैयाजी आपने! मनो भगवान ने मों दओ, सो ऊंको कैसऊं बी चलात रओ, जे मोय सोई नई पोसात। कछू सो गम्म खाओ चाइए।’’ मैंने कई।
‘‘ओ छोड़ो, जे कां की राजनीति की सल्ल ले बैठीं। जे बताओ के परों संझा को कां गई हतीं? हम तुमाए दुआरे के आगूं से कढ़े सो ताला परो दिखो।’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘भूल गए आप? मैंने आप के लाने बताई तो हती के मोय बा नाटक देखबे जाने है, आपके लाने सो सोई मैंने कही रई के आप सोई चलो। पर आप बोले हते के आपखों कछू जरूरी काम हतो।’’ मैंने भैयाजी खों याद कराई।
‘‘अरे हओ! मोय सोई देखने रओ, बड़ो अच्छो सो नांव रओ ऊं नाटक को।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ ऊंको नांव रओ -‘ऐरी बऊ, कबे बज हे रमतूला’। बे अपने जगदीश शर्मा भैया है न, उन्ने लिखो रओ औ उन्ने ई ऊको डायरेक्शन करो रओ। बे भए औ अपने अतुल श्रीवास्तव भैया भए औ बे सतीश साहू भैया, जे इन ओरन ने एक्टिंग करी, मंच सम्हारो औ संगे बाजे सोई बजाओ। औ हम का बताएं आपके लाने भैया जी के अतुल भैया हरें सो इत्ती नोनी लुगाई बने रए के देख के मजोई आ गओ। जे सो बड़ी काली मूंछें औ ऊपे मूंड़ पे धुतिया को घूंघट सो करें, देखतई बन रए हते। बाकी जोन को रमतूला ने बज पा रओ हतो बा कल्लू बने हते अपने कपिल नाहर भैया। ऐसी नोनी एक्टिंग करी के ने पूछो। बाकी सबई जने अच्छे रए। आपने देखी होती सो आपको भौतई अच्छो लगतो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अब का करो जाए, कछू जरूरी सो काम आन परो रऔ, ने तो मोय सो जानेई रओ। एक सो नाटक औ वा बी अपनी बुंदेली में। मोय सो बड़ी ललक रई देखबे की।’’ भैयाजी तनक पछतात से बोले।
‘‘अरे कछू नईं भैयाजी! जी छोटो ने करो! जो फेर के हुइए, सो देख लइयो। अबईं सो जे नाटक खों देखो जो अपने इते की राजनीति में चल रओ आए।’’ मैंने भैयाजी खों तनक चुटकी लई।
‘‘तुम सोई, फेर उतई के उतई आ गईं!’’ भैयाजी खों हंसी आई गई।
‘‘हऔ, सो का करो जाए। चाए फेसबुक देख लेओ, चाए ट्विटर देख लेओ औ चाय व्हाट्सअप्प देख लेओ, सबई जागां, सबई जने राजनीति के एक्पर्ट घांईं गिचड़ कर रए। इत्ती ज्यादा किचर-किचर हो रई आए के अब तो मोसे जे सोशल मीडिया देखो नई जा रओ।’’ मैंने कई।
‘‘सो काय देख रईं? देवी मैया के दरसन करो औ भजन गाओ।’’भैयाजी बोले।
‘‘देवी दरसन की ने कऔ भैयाजी! मैं सो रानगिर वारी औ बाघराज वारी दोई हरसिद्धी माता के दरसन कर आई औ भजन सोई गा आई। मैंने ढोल सोई बजा के देख लओ। मनो जे बड़ी पोल वारी राजनीति की ढोल कछू ज्यादी जोर से ढमर-ढमर कर रई। ईके मारे कछू औ सुनाई नई परत।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, कै सो सांची रईं तुम। सुनाई की सो छोड़ो, कछू के कछू समझ परत आए। अभईं ऊं दिनां तुमाई भौजी बोलीं जे किवार के जोड़े खुले जा रए, तनक इनखों बनवा दइयो। औ हमने सुनी का? के बे बोल रईं के हम किवार जोड़बे जा रए। सो हम कै बैठे के मोरी धना जे जोड़ा-जोड़ी ने करो, ने तो तोड़ा-तोड़ी हो जेहै। बे जा सुन के बोलीं- के का सठिया गए जो अंटशंट बके जा रए? हम किवार के जोड़ ठीक कराबे की कै रए भारत जोड़बे की नोंईं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘जे सोई खूब रई।’’ मोय हंसी फूट परी। भैयाजी सोई हंसन लगे।  
सो, मोरे भैया-बैन हरों, रई मोरे सवाल की, सो बा तो अबे लों स्टेंडबाई आए के-‘‘काय जो सब का चल रओ?’’ मनो, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Thursday, October 13, 2022

बतकाव बिन्ना की | ई बेरा जड़कारो नई कटने | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात | बुंदेली व्यंग्य

"ई बेरा जड़कारो नई कटने"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
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बतकाव बिन्ना की         
ई बेरा जड़कारो नई कटने
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह       
          ‘‘का हो गओ बिन्ना! ऐसो मों लटकाए काए फिर रईं?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘मों ने लटकाओं सो का करों? ’’
‘‘काए का हो गओ?’’ भैयाजी ने फेर के पूछी।
‘‘ई दफा सो इत्ती लाईट जा रई, ऊपे मोरे इन्वर्टर की बैटरी चीं बोल गई। दो मिनट की लाईट ने दे पा रई हती। कछु बेकअप बचो सो नई हतो।’’ मैंने भैयाजी खों  बताई।
‘‘सो, फेर का करी?’’
‘‘करने का हती, बैटरी बदलवाई है कल्ल। अच्छी-खासी चपत घल गई। मनो अब करो का जाए, अंधेरे में रओ नई जात आए। अभई परों संझा की बिरियां झोर-झोर के पानी बरस रओ हतो, ऊपे से लाईट चली गई। सगरो अंदियारो छा गओ। ऊ अंधेरा में बिजुरिया ऐसी चमक रई हती के मनो कोनऊ हाॅरर फिलम होय। जे कहो के मोए डर नईं लगो। कोनऊं लोहरी मोड़ी होती सो डरा जाती। दो घंटा में लाईट आई हती।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘कोन खों बता रईं बिन्ना? हम सोई जेई मोहल्ला में रैत आएं। हम सोई अंदियारे में मोमबत्ती के लाने भगवानजी की अलमारी में थथोलत फिर रए हते के तुमाई भौजी चैका से एक मोमबत्ती जला के ई टाईप से आईं के हम सो सच्ची डरा गए हते। हमने सो उनखों डांटो बी के जे ऐसे मोमबत्ती ले के कहूं फिरो जात आए? हम तो समझे के कोनऊं भूतनी आ गई। सो बे कैन लगीं के हमाए रैत भए कोनऊ भूतनी तुमाए लिंगे आ के सो देखे, ऊके बाल पटा देबी, ऊकी दोई उल्टी टंागे सीधी कर देबी। तुमाई भौजी के जे बात सुन के मोय औ डर लगो के कहूं कोनऊं भूतनी ने सुन लओ सो पांछू लग जेहे। सो, हमने तुमाई भौजी खों ध्यान बटाओ। सो बे कैन लगीं के शरद बिन्ना घांई इन्वर्टर लगवा लेओ। जे मोमबत्ती ले के फिरने न परहे औ तुमे डर बी न लगहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, सो सांची सो कै रईं भौजी! लगवा लेओ इन्वर्टर। काए से के अब लाईट पर से भरोसो उठो जा रओ। एक तो जे पानी पीछो नई छोड़ रओ, ऊपे जे लाईट घंटा-घंटा भर खों चली जात आए।’’ मैंने कही।
‘‘तुमाओ सो मुतको पुरानो आए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ! जबे दिग्विजय सिंह अपने मुख्यमंत्री रए औ लाईट कभऊं-कभऊं आत्ती, तभईं लगवाने परो हतो इंवर्टर। मनो तब इत्तो मैंगो नहीं हतो, अब सो कुल्ल मैंगो हो गओ। मनो करो का जाए? पंखा सो चलानई परत आए। इत्तो पानी गिर रओ, मनो ठंडक नई आई। पंखा बंद होतई साथ पसीना चुअन लगत आए।’’ मैंने कहीं।
‘‘हऔ, सो ईमें पंखा चल जात आए, औ ब्लोअर चलहे के नईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘इत्ती गरमी में आप खों ब्लोअर सूझ रओ?’’ मोए अचरज भओ।
‘‘अभई से सोचबो जरूरी आए, बिन्ना! काए से के ई बेरा जे जो इत्तो पानी बरस रओ, सो उत्तई जड़कारो परहे। मोए सो सोचई के डर लग रओ। तापने के लाने कोयला, कंडा जोड़ के रखने परहे। ने तो ठिठुर जेबी। तुम सोई कछु जुगाड़ कर लइयो। कहो सो तुमाए लाने सोई कोयला, कंडा ला देबी। तनक पानी ठैरे सो मोए गुरसी सोई बनवाने है। कहो सो तुमाए लाने सोई बनवा देबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे नई भैयाजी! मोए न कोयला कंडा चाउने औ न गुरसी-वुरसी। मोए सोई एक ब्लोअर ले लेने है। जोन खो जगत बेरा चला के कमरा गरम कर लेबी और सोत समै बंद देबी। मैं ऊंसई सोत बेरा हीटर, ब्लोअर कछु नईं चलात हूं।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘काए, पर तुमाए इते सो एक ब्लोअर पाओ जात्तो! बो कां गओ? खराब हो गओ का?’’ भैयाजी ने पूछीं
‘‘खराबई सो नई भओ। खराब हो गओ रैतो सो नोनो रैतो।’’ मैंने कही।
‘‘काए ऐसो काय कै रईं?’’
‘‘अब का कहों भैयाजी! भओ का के पर की साल सोई कड़ाके को जड़कारो पड़ो रओ। आप खों याद हुइए के एक मईना दिन में सोई ब्लोअर चलाने परो रओ। मैंने सोची के जान है सो जहान है, चलो, चला लेओ जाए ब्लोअर। जब बिल आहे सो देखो जेहे। औ जबे बिल आओ सो ऊको देख के मोए सो भरे जड़कारे में पसीना छूट गओ। बिजली को उत्तो बिल कभऊं ने आओ रओ। एक दिना मोए बो स्विच बदलने वारे लड़का खों बुलाने परो। मैंने बातई-बात में ऊसे अपनो बिल को बखान करो। ऊने मोसे कही के तनक अपनो ब्लोअर दिखाओ। मैंने ऊको दिखा दओ। बो कैन लगो, दीदीजी, आप ब्लोअर चला रईं के का चला रईं, ईमें सो असली मशीन कौन लगी। आपने एकाद बेरा सुधरवाओ हुइए सो ईमें ज्यादा पावर वारी मशीन लगा दई गई आए। जे सुन के मोए आग सी लग गई। जोन के इते से मैंने ब्लोअर सुधरवाओ रओ, ऊको मनई मन हजार-हजार गालियां दईं। सो, ई बेरा मोए सोई नओ ब्लोबर लेने परहे, जोन में बिजली को खर्चा कम होत होय।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ बिन्ना! मोय सोई ईको खयाल रखने परहे। मनो ई बेरा लग रओ के जड़कारो नईं कटने।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, ऐसे ने डरो भैयाजी! तनक उन ओरन की सोचो जोन खों खुल्ला में डरे रैने परत आए। उनको सोई जिनगी काटने परत आए।’’ मैंने भैयाजी खों याद दिलाई।
‘‘हऔ बिन्ना, सांची कै रईं! उन ओरन के बारे में कोनऊ खों फिकर नई रैत। अभई देख लेओ। पैलऊं मैंगाई बढ़ी, फेर कर्मचारियन खों मैंगाई भत्ता बढ़ाबे की घोषण कर दई गई। औ बे ओरे मैंगाई से कैसे निपटहें जो कर्मचारी नइयां? उनके लाने का? ईसे तो साजो रैतो के मैंगाई कम करबे को उपाय करो जातो। पर चुनाव ड्यूटी देबे वारे कर्मचारियन को खुस रखबो ज्यादा जरूरी आए।’’ भैयाजी गुस्सा होत भए बोले।
‘‘अरे, अपनो दिमाग खराब ने करो भैयाजी, जे सब सो हमेसई से होत आ रओ। आप सो जे बताओ के आप जड़कारे के लाने औ का तैयारी करबे वारे हो?’’ बात बदलबे की गरज से मैंने भैयाजी पूछी।
‘‘तैयारी का करने, सोचत हों के अभई दो-चार दिनां में इंवर्टर लगवा लेहों, फेर दिवारी बाद एक ब्लोअर ले लेहों। बाकी तुमाई भौजी सोठ, अदरक वारी चाय सो बनतई रैहे। हौ, औ मेथी को लड़ुआ बनवा लेहों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘गजब! आप ने सो सब पैलऊं से सोच रखो आए। अब काए डरा रए जड़कारे से?’’ मैं हंसत भई बोली।
‘‘अब लोहरी उम्मर नई रही बिन्ना! अब सो डरनेई परत आए।’’ भैयाजी तनक गंभीर होत भए बोले।
‘‘हऔ, सो आपकी उम्मर कितनऊं हो जाए पर आपको जड़कारो भगाने के लाने एक उपाय पक्को पाओ जात आए।’’ मैंने कही।
‘‘कौन सो उपाय?’’ भैयाजी चकित होत भए बोले।
‘‘भौजी को गुस्सा! जब ज्यादा जड़कारो लगे सो कछु ऐसो काज कर दइयो के बे बेलन ले के आपके पांछू दौड़ें, बस, सो आप को जड़कारो तुरतई छू हो जेहे।’’ मैं गंभीर बनबे की कोशिश करत भई बोली।
‘‘बिन्ना, जे तो बताओ के तुम हमाई बहना हो के दुश्मन? ऐसो उपाय सुझा रईं। तुमाई भौजी को गुस्सा झेलबे से अच्छो के जड़कारो झेल लेबी।’’ कैत भए भैयाजी सोई हंसन लगे।        
 बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब भैयाजी चाए ब्लोबर से जड़कारो मिटाएं चाय भौजी की डांट से, मोए का करने? रई ई बेरा जड़कारा कटने औ न कटने की, सो उन ओरन के लाने पैलऊं से कछू करो चाइए जिने खुल्ले में रात बिताने परत आए। है न! तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(13.10.2022)
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Thursday, October 6, 2022

बतकाव बिन्ना की | काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे?"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
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बतकाव बिन्ना की         
काए भैयाजी, जे रावण फाईनली कबे मरहे?
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
        
‘‘काए भौजी, लिपाई-पुताई हो गई का?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अभई कां, दिवारी के पैलऊं हुईए!’’ भौजी बोलीं।
‘‘नईं, मैं वो वारी लिपाई-पुताई की नई कै रई, अभईं दशहरा के लाने कछु ने करहो का?’’ मैंने भौजी से साफ-साफ पूछी।
‘‘ने करबी का? आंगन देखो कैसो फूटो सो डरो आए, पर तुमाए भैयाजी खों कछु दिखाए तब न!’’ भौजी खिजियात भईं बोलीं।
‘‘सो, ई बेरा उनके जिम्मे है का जे काम?’’ मैंने पूछी।
‘‘हौ, बे करहें? आड़ी की काड़ी सो टरत नइयां उनसे, लिपाई-पुताई करहें? खूब कही तुमने बिन्ना!’’ भौजी भैयाजी के लाने ताना मारत भई बोलीं।
‘‘सो, फेर काए उनके लाने परखीं बैठीं? कछु मोरे जोग काम हो सो कहो!’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘तुम का कर पैहो? तुमने सो कभऊं गोबर न छुओ हुइए।’’ भौजी हंसत भईं बोलीं।
‘‘जे लो, तुमने सोई खूब कही भौजी! हमने सोई लिपाई-पुताई करी आए। मनो दीवारन की नई, पर आंगन की खूब करी, ढिग सोई धरत्ती। उते पन्ना में हमाओ सरकारी मकान घनो छोटो रओ, पर आंगन खूबई बड़ो हतो। मैं और मोरी दीदी, दोई जनी गोबर बीन लातत्तीं औ पैलऊ लीपत्तीं, फेर ऊके किनार पे ढिग धरत्तीं।’’ मैंने भौजी को बताई।
‘‘अरे, वाह! बाकी अब तो तुमाए ऐंगर आंगन ई नइयां। सो, प्रैक्टिस छूट गई हुइए!’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे तुम भी भौजीं, कहूं लीपनो-पोतनों कोऊं कभऊं भूलत आए? बाकी अब गोबर छीबे में जरूर अच्छो नईं लगत। काए से के अब गोबर कछु औरई तरहा से बतास आए।’’ मैंने भौजी से सांची बात कै दई।
‘‘हौ सो, अब पैलऊं जैसो कहां से बसाहे? पैलऊं गाइयां हरें घास-पात खात्तीं। मनो अब सो उने पन्नी लो खाने परत आए। जेई लाने हम सो डेयरी वाले यादव भैया के हियंा से गोबर मंगा लेत आएं। औ जेई सो सल्ल बिधींे कहानी। हम तीन दिनां से तुमाए भौयाजी के लाने ठेन कर रए के यादव डेयरी से हमाए लाने गोबर लान देओ, मगर तुमाए भौयाजी सुनें तब न!’’ भौजी घूमत-फिरत फेर के भैयाजी पे आ गईं।
तभईं भैयाजी प्रगट भए।
‘‘राम-राम भैयाजी!’’
‘‘राम-राम बिन्ना!’’
‘‘कां हो आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे कहूं नईं, इतई लों!’’ भैयाजी बोले।
‘‘इने कहां जाने? गए हुइएं सट्टा लगाबे!’’ भौजी कुड़कुड़ात भई बोलीं।
‘‘सट्टा? आप कब से खेलन लगे?’’ मोए भारी अचरज भओ जे सुन के।
‘‘अरे नईं! हम कां खेलत आएं सट्टा-मट्टा!’’ फेर भौजी से बोले,‘‘तुम औ, बिन्ना से झूठ काए बोल रईं? जे का सोचहे?’’
‘‘हम कां झूठ बोल रए? ऊ दिनां तुम ओरें सट्टा की बात नई कर रए हते का? जो दिनां कांग्रेस को अध्यक्ष चुनो जाने रओ। बो तुमाओ करिया छुटकुल कै रओ हतो के हमने सो खड़से पे सट्टा लओ आए, बेई बनहें। औ तुम सोई कै रए हते के दिग्गी राजा के सो कोनऊं चांस नई दिखा रओ। काय कै रए हते के नईं?’’ भौजी ने तमक के पूछी।
‘‘हऔ, कै रए हते! मनो हम सो बतकाव ई कर रए हते, हम कौन सट्टा लगा रए हते? बा तो छुटकुल हरें जुटे हते।’’ भैयाजी सफाई देत भए बोले।
‘‘हऔ, सो तुम सो बड़े दूध के धुले कहाने! का पतो, सट्टा लगाओ होय, औ हार गए सो चिमा रए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे नईं मोरी मैयां, ऐसो नईयां! कांग्रेस पे सट्टा लगे के मोए जुधिष्ठिर बनने है का, के राज-पाट सबई कछु हार गए।’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘राज-पाट का हार हो? बाकी कभऊं मोए दांव पे लगाबे की सोचीं सो जेई मुंगरिया से तुमाओ मूंड़ कुचर देबी!’’ भौजी पास रखी मुंगरिया ठोंकत भईं बोलीं।
‘‘अरे मालकन! गम्म खाओ! हम कभऊं कछु ऐसो-वैसो ने करबी।’’ भैयाजी अपने दोई हाथ जोड़त भए बोले।
‘‘खैर, जे सब आप ओरें छोड़ो! भैयाजी आप आ कां से रए हो? दो दिनां से दिखाने बी नईं, कहूं बिजी हो का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे कहूं नईं! बो दशहरा के लाने रावण बनाओ जाने है, सो बोई के लाने तैयारी चल रई। बे ओरें बोले के पटाखों को इंतेजाम कर दइयो, सो हमने हामी भर दई। आज पटाखन के लाने गए हते, अभई उतई से आ रए।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘भैयाजी, रावण बनाबे में पटाखो लगाबो का जरूरी होत आए?’’ मैैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जरूरी सो कछू नईं, पर अच्छो लगत आए। जब बे फट्ट-फट्ट फूटत आएं, सो ऐसो लगत आए के मनो रावण ई के मूंड फूट रए होएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बाकी रावण को तो रामजी ने मार दओ रओ, सो अब जे मूंड कां से आत रैत आएं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुम औ! ऐसे पूंछ रईं जैसे पैलऊं कभऊं रावण मरत देखो नइयां! बिन्ना, जे तो प्रतीक आए! अब तुम लो सब जानत भईं, अनजान बन रईं।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अरे, मोरो मतलब जो नइयां, मैं सो जे पूछो चाह रई के हम ओंरे कब तक लो हर बरस रावण मारत रैबी? रावण कभऊं फाईनली मरहे के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे बिन्ना! जब लो ई धरती पे रावण घांईं लोग रैहें, तब लों रावण फाईनली कां मरहे।’’ भैयाजी बोल।
‘‘सो हम जित्ती ताकत रावण को पुतरा बनाबे में लगात आएं उत्ती ताकत समाज से रावण हरों खों मारबे में काए नईं लगात?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब जे सब छोड़ो!’’ भैयाजी टरकान लगे।
‘‘अरे काए छोड़ो? बिन्ना सांची सो कै रई के जित्तो टेम तुमने पटाखे ढूंढबे में हरजा कर दए, उत्ते टेम सो तुम कभऊं एक जागां टिकतई नइयां! ऊ दिनां दमोए वारी चाची खों हस्पताल में भरती कर करा के, दवा-दारू रख के ऐसे उते से भागे हो के हम कां कहें? अरे, तनक देर रुक लेते सो सब को सहूरी बंधती। मगर तुमाए लाने सो रावण के पुतरा के लाने पटाखें लाने को टेम है, मनो गोबर लाने को टेम नइयां।’’ भौजी बोलीं।
भौजी के इत्ते नोने लेक्चर की अखीरी लाईन सुन के मोए लगो के भौजी ने गोबर की बतकाव का के इत्तो गंभीर टाॅपिक को गुड़-गोबर कर दओ।
‘‘हऔ, लान देबी! चाय पिला देओ! फेर जात हों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘तुमने सही कई भौजी! अपन ओरें हर साल रावण को पुतरा सो फूंकत रैत आएं पर जो कभऊं कोनऊं आजकाल के रावण के बारे में सुनी परत आए सो जेई कैन लगत अरएं के अपन अकेले का कर सकत हैं?’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘औ सांची सो आए! आजकाल के रावण हरों से कोनऊं अकेले नईं निपट सकत!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हौ, औ रामचन्दर जी सो अजोध्या से पूरी सेना ले के गए रए न बनवास के लाने? अरे, बे और उनके लोहरे भैया लछमन के अलावा औ कौन रओ उनके संगे? बाकी उन्ने हिम्मत ने हारी औ छोटे-बड़े भूल के सबई खों अपने संगे लओ, तभईं सो रावण खों मार पाए। औ एक अपन ओरें आएं जो संगे चलबो ई भूले जा रए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘कै सो तुम ठीक रईं बिन्ना! बाकी आजकाल जो दसा आए ऊमें हम का, कोनऊं बता नईं सकत के रावण फाईनली कबे मरहे! जब लों जनता औ कानून संगे ने चलहे, तब तक कछु नईं हो सकत।’’ भैयाजी दुखी होत भए बोले।
‘‘दुखी न हो भैयाजी! मैंने आपके लाने दुखी करबे को जे सब नईं कही। बा सो दुनियादारी देख के कै आई। अब आप सो उठो औ भौजी के लाने गोबर लान देओ औ उते पुतरा में पटाखा भरवा दइयो! चलो उठो आप, गम्म ने खाओ!’’ मैंने भैयाजी से कही।        
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रावण को पुतरा में चाए पटाखो भरो जाए, चाए बम, मोए का करने? बात सो तब बनहे जब अपन ओरें मिल के ई समाज से रावण हरों खों फाईनली मार देबी! तनक सोचियो ई पे! अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
औ बो का कहाऊत आए... हैप्पी दशहरा!!!
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(29.09.2022)
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #बुंदेलखंड #बिन्ना #भैयाजी #बतकाव #BatkavBinnaKi #DrMissSharadSingh #Bundeli
#Bundelkhand #Binna #Bhaiyaji #Batkav #बुंदेलीव्यंग्य

Thursday, September 29, 2022

बतकाव बिन्ना की | नौ दिनां कछू गल्त ने करबी | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

 "नौ दिनां कछू गल्त ने करबी"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
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बतकाव बिन्ना की        
नौ दिनां कछू गल्त ने करबी
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
        ‘‘बिन्ना! तनक साजी सी चाय सो पिला देओ!’’ भैयाजी आतई साथ बोले। मोए समझ में आ गई के कोनऊं सल्ल बींध गई हुइए जो आतई साथ भैयाजी चाय के लाने बोल रए।
‘‘हऔ! अभईं लो!’’ मैंने कही। फेर तुरतईं चाय बना लाई।
‘‘अब तनक अच्छो लगो!’’ चाय सुड़कत भए भैयाजी बोले। 
‘‘का हो गऔ? काय की सल्ल बींध गई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे ने पूछो!’’
‘‘अरे कछू तो बताओ आप!’’ मैंने सोई जिद पकर लई।
‘‘अरे बो आए न, अपन ओरने के इते को नेता!’’
‘‘को? कौन की कै रए?’’ मोए कछु समझ में ने आई।
‘‘अरे बोई जमुना, जमुना पार्षद!’’
‘‘अरे, उनकी कह रै! का कर दओ जमुना भेया ने?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे तुम सोई, ऊको भैया-वैया ने कहो!’’
‘‘काए? ईमें का बुराई दिखा रई?’’
‘‘बुराई तुमाए कैबे में नई दिखा रई, बो आदमई बुरौ कहानो!’’ भैयाजी चिड़कत भए बोले।
‘‘अब बे काए के लाने बुरै बन गए? काल तक तो आप ई ऊकी तारीफ करत फिरत्ते।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, मोए का पता रओ को जमुना सोई ऐसो निकरहे।’’ भैयाजी गुस्सा दिखात भए बोले।
‘‘मनो ऐसो का कर दओ उन्ने?’’ मैंने पूछी।
‘‘हमने कही न, के ऊके लाने इज्जत से ने बोलो! बो ई के काबिल नइयां! औ फेर ऊ तो ऊंसई तुमसे लोहरो ठैरो, सो तुम तो ऊको आप-वाप ने कहो करो।’’ भैयाजी मोय समझान लगे।
‘‘हऔ, हमें पतो आए के कौन से कैसे बात करी जात आए। आप सो अपनी कहो के ऊने आपके कौन से खेत काट लए?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘बो का हमाओ खेत काटहे? अगली बेरा आन देओ चुनाव, चार से ज्यादा वोटें ने मिल पाहें ऊको!’’ भैयाजी तिन्नात भए बोले।
‘‘चार? चार कौन-कौन की? एक आपकी, एक भौजी की....!’’
‘‘हम काए खों देबी?’’ मोरी बात काटत भए भैयाजी बोल परे।
‘‘सो, औ को देहे?’’ मैंने पूछी।
‘‘एक मताई की, एक बापराम की, एक लुगाई की औ एक ऊकी खुद की! ई चार से पांचवीं वोट ऊको मिल जाए सो हमाओ नांव बदल दइयो!’’ भैयाजी उखड़त भए बोले।
‘‘ऐसो का कर दओ ऊने? चलो अब आपई बता देओ!’’ अब मोए से रओ नई जा रओ हतो।
‘‘भओ का, के कुल्ल दिनां से हमाओ एक काम अटको डरो आए नगरपालिका में। सो हम सोचई रै हते के कोई दिनां जमुना मिल जेहे सो ऊसे कै देबी के हमाओ जल्दी काम करा देओ। अभईं आज संकारे जमुना हमें दिखा गओ। हमने ऊसे कहीं के हमाओ काम नगरपालिका में अटको परो आए, सो तुम तनक जल्दी करा देओ।’’
‘‘सो का कही ऊने? करा देहे जल्दी?’’ मैंने बीचई में पूछ लई।
‘‘अरे काय खों, ऊ ससुरो कहन लगो के अभई नौरातें चल रईं सो हम कछु ऐसो-वैसो काम नईं करा सकत आएं। काए से हम नौरातें में गल्त काम नईं करत।’’ भैयाजी बतान लगे।
‘‘ऐं? ऊने ऐसी कही? पर आपको तो गल्त काम नइयां, मोए पतो आए।’’ मोरे मों से निकर परो।
‘‘औ का! हमाओ काम ठक्का-ठाई आए! एकदम सांचो!’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ऊने ऐसी काए कई?’’ मोए अचरज भओ।
‘‘हमने सोई ऊसे पूछी, के भैया जमुना तुमाओ मुंडा सो ठिकाने पे आए के नईं? हम कोनऊ गल्त काम कराबे खों नईं कै रए, जो तुम हमाए लाने भाव दिखा रए। सो बो कैन लगो के अरे नईं भैयाजी आपको काम सो सांचो आए मनो जो आपको काम कराबी सो दस जने औ आ जेहें अपनों काम ले के। अब सबको काम सांचो सो रैहे ने, औ ई नौरातें चलत में हम गल्त काम ने करत आएं औ ने करात आएं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘जे का बात भई? मने नौरातें के आगूं-पांछू बो गल्त करत रैत आए?’’ मोए बड़ो अचरज भओ जे सुन के।
‘‘औ का! तभईं सो हमाओे मुंडा खराब हो गओ। हमई ने सो ऊको जिताबे के लाने तरे-ऊपरे एक करो रओ और जे देखो! ऊ समै कैत रओ के अब कछु ने गल्त करबी औ ने गल्त होने देबी, औ अब देखो! हमें सो अभई की ऊकी बात सुन के जी में आओ रओ के ससुरे को एक लपाड़ा दे दें, बाकी हम गम्म खा के रै गए के मोहल्ला वारे का कैहें? हमाओ बकरा, हमई खों सींग दिखा रओ।’’ भैयाजी खदबदात भए बोले।
भैयाजी की कहनात सुन के मोए हंसी फूट परी -‘‘हमाओ बकरा, हमई खों सींग दिखा रओ।’’
‘‘भैयाजी, मनो अब सो ऊने सो आपई खों बकरा बना दओ।’’ मोसे हंसी रोकत ने बनीं। मोरी हंसी सुन के भैयाजी सोई हंसन लगे। मनो ईसे उनको मूड ठीक हो गओ।
‘‘भैयाजी आप तो जे सोचो के बो कम से कम नौरातें को तो लिहाज कर रओ, ने तों आजकाल नेता हरें एकऊं रातन को लिहाज नईं करत आएं। उनको सो चैबीसों घंटा औ सातो दिनां गल्त-सल्त करबे में जी लगो रैत आए।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई।
‘‘हऔ, सो कोनऊं किरपा कर रओ का? ऊको सो पूरे बारहों मईना ईमानदारी से काम करो चाइए। चुनाव से पैलऊं खुदई कैत रओ के मोए सो कभऊं गल्त नहीं करने।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई सो नेता औ जनता में फरक आए भैयाजी! उने बेवकूफ बनात बनत आए औ जनता खों सिरफ बेवकूफ बनबो आत आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘ठीक कही बिन्ना तुमने, मनो जे बताओ के ऐसे में देवी मैया ऊपे कैसे के किरपा करहें? ऐसो ध्रम-करम कोनऊं काम खों नईंया।’’ भैयाजी ने कही।
‘‘देवी मैया की सो पतो नइयां भैयाजी, पर जे सो पक्को कहानो के अगली चुनाव में आप ऊपे किरपा ने करहो!’’ मैंने हंसत भए कही।
‘‘रामधईं! कभऊं ने करबी। ससुरो लबरा कहीं को।’’ भैयाजी सोई हंसन लगे। फेर कहन लगे,‘‘अब चलन देओ मोए, एकाध चक्कर खुदई लगाने पड़हे नगरपालिका को।’’
‘‘अभई उते ने जाओ भैयाजी! अभईं बे ओरें देवी पूजा में बिजी हुइएं।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई।
‘‘काए? जे आॅफिस के टेम पे काए बिजी हुइएं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आप सो ऐसे पूछ रए मनो आप कोनऊं औरई ग्रह से आए हो! जे कओ के आप खों पैले काम नई परो सो आप खों पतो नइयां मनो...!’’
‘‘हऔ-हऔ, आ गई समझ में!’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले औ चलबे खों ठाड़े हो गए।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए अगली चुनाव में जमुना भैया रैं जाए गंगा भैया, मोए का करने? अगली चुनाव में सो ऊंसई मुतको समै ठैरो, तब लों सो इन्हईं खों झेलने परहे। सो आप ओरें सोई सहूरी राखो! अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(29.09.2022)
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Thursday, September 22, 2022

बतकाव बिन्ना की | टाईगर के अंगना में चीता घूम रए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

 "टाईगर के अंगना में चीता घूम रए"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
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बतकाव बिन्ना की
टाईगर के अंगना में चीता घूम रए
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
        ‘‘काए बिन्ना! अपने इते चीता आ गए!’’ भैयाजी आतई साथ बोले।
‘‘अपने इते नईं, बे कूनो नेशनल पार्क में आए हैं। आप अखबार नईं पढ़त का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काए नईं पढ़त? भुनसारे से जोई तो सबसे पैलो काम करत आएं। औ तुम कह रईं...बाकी छोड़ो जे सब! कूनो सो सोई अपने प्रदेश में आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ! बरोबर!’’
‘‘हमने सुनी के अपने इते नौरादेही अभयारण्य में सोई लाए जेहें।’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ, सुनी सो हमने सोई रही, बाकी ने आएं सो अच्छो!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘काए? अपने ओरन खों दूर नईं जाने परहे चीता देखबे के लाने, इतई नौरादेही में दिख जाओ करहें।’’ भैयाजी उचकत भए बोले, मनो कल चीता उते लाए जा रए होंय औ भैयाजी खों उते चीफगेस्ट बना के बुलाओ गओ होय।
‘‘भैयाजी, तनक सोचो, अपन ओरें उनखों देखबे लाने जाएं सो तो ठीक, मनो जो बे ओरे अपन ओरन खों देखबे के लाने इते आ लगे सो का हुइए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काए हमें डरा रईं? बे ओरें काए आहें इते? बे अपने घरे रैहें, औ अपन अपने घरे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उनको घर कुठरिया घांई नईं होत आए भैयाजी! उनके लाने खूब सारो लम्बो-चैड़ो जंगल चाउने परत आए। इते कोनऊ चिड़ियाघर नई बनाओ जा रओ। जो उन्हें लाहें, जंगल में ऊंसईं राखहें जोन टाईप से शेर, बाघ, तेंदुआ हरें रैत आएं। मने उन ओरन को इते छुट्टा रखो जेहे। सो जे दिना बे उते बोर होन लगहें सो घूमत भए अपन ओरन की तरफी निकर आहें।’’ मैंने सोची के भैयाजी खों तनक औ डराओ जाए।
‘‘हऔ, ऐसो ने हुइए।’’ भैयाजी डरात भए बोले।
‘‘काए ने हुइए? चीता हरें सो पेड़ पे चढ़ सकत आएं। उनकी दौड़ सबसे तेज होत आए। बे इते काए नईं आ सकत? कहो कोऊ दिनां आपकी अटारी पे बैठे दिखाहें।’’ मैंने कही।
‘‘अब हम समझ गए के तुम हमें चिड़का रईं।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अरे, नईं मोए का करने आपखों चिड़का के? बो तो आपने पूछी, सो मैंने बता दई।’’ मैंने सोची के उनखों तनक देर डरन तो देओ।
‘‘अच्छा बिन्ना जे बताओ के जे जो चिता लाए गए औ जो और लाए जेहें, सो जे अपने ओरन खों नमीबिया वारे गिफ्ट में दे रए, के अपने ओरें इने खरीद रए?’’ भैयाजी ने मोए चैंकात भए जे सवाल कर दओ।
‘‘आपको आम खाने से मतलब के गुठलिया गिनबे से? अब चाए फोकट में मिले होंए, चाए खरीदे गए होंए, आपको का करने?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘नईं, मनो जे हमाए दिल में खयाल आओ के जो इने खरीदो गओ, सो कित्ते में खरीदो गओ हुइए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो जेई सो मैं कह रई भैयाजी के आपको का लेने-देने ईसे के खरीदे गए, के फोकट में आए। बात जे के चीता अपने इते आ गए। ने तो इते से तो मुतकी साल पैले बढ़ा गए रए।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई।
‘‘काए बिन्ना, हमें काए नईं लेने-देने? जो फोकट में आए होंए सो कोनऊं बात नईं, बाकी खरीदो गओ होय सो ऊमें अपन ओरन खों पइसा लगो कहानो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘येलो! जोन सी बात विपक्ष को नईं सूझ रई, बे बात आप कर रए? कोनऊं अपनी पार्टी बनाबे की सोच रए का?’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘लेओ अब ईमें अपनी पार्टी बनाबे की बात कहां से आ गई? का हम कछु पूछ नईं सकत?’’ भैयाजी उखड़त भए बोले।
‘‘अब आप काए तिन्ना रए?’’
‘‘काए ने तिन्नाएं? तुम बातई ऐसी कर रईं।’’ भैयाजी औरई बमक परे।
‘‘गम्म खाओ भैयाजी! मोए सो पतो नइयां ई बारे में, जो तुमें जानने होय सो कहूं और से पतो कर लेओ।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘जे बात तुम पैले नईं बोल सकत्तीं? बाकी काए बोलतीं? तुमाओ जी सो हमें डराबे में लगो रओ।’’ भैयाजी तनक ठंडे पड़त भए बोले। फेर कहन लगे,‘‘हमें जे समझ में ने आई के कूनो मेंई काए इन ओरन खों रखो गओ? उते का खास आए?’’
‘‘जेई तो बात आए! आपने पढ़ी नईं, औ मैंने पढ़ रखी आए।’’
‘‘मने?’’
‘‘मने जे, के जे जहां से आए हैं, नमीबिया से, उते के तापमान औ इते के तापमान में कोनऊं अंतर नईं आए। उते 31-32 डिग्री रैत आए औ इते कूनो में 30 रैत आए। औ जो इते-उते के और पेड़ कटत रैंहें सो इते सोई तापमान 35-40 लो पौंच जेहे। चीता के लाने ऊंची घास वारे मैदान चाउने परत आएं। सो कूनो में उने मिल जेहें। उते नमीबिया में सवाना के घास को मैदान 2.25 लाख वर्ग किलोमीटर को आए और इते अपने कूनो में पूरो नेशनल पार्क 3200 वर्ग किलोमीटर को आए।’’ मैं भैयाजी खों बता रई हती के बे मोए बीच में टोंकत भए बोल परे।
‘‘जो का कै रईं? उते सवा दो लाख वर्ग किलोमीटर आए औ अपने इते पूरो पार्कई 3200 वर्ग किलोमीटर को आए। सो उनके लाने जागां छोटी ने परहे?’’
‘‘हऔ, जो इते नौरादेही में आ गए सो और छोटी परहे जागां। जेई से सो मैं कह रई हती के बे ओरें जब बोर फील करहें, सो अपन ओरन खों देखबे के लाने आ जाओ करहें।’’ मैंने हंस के कही।  
‘‘जे सो बड़ी चिंता फिकर की बात कहानी।’’ भैयाजी फिकर करत भए बोले।
‘‘अरे आप फिकर ने करो भैयाजी! जोन लाएं हैं उन्ने कछू सोच रखो हुइए।’’ मैंने भैयाजी खों तनक सहूरी बंधाई।
‘‘नई बिन्ना! मोय सो फिकर होन लगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, ने डरो आप! मनो एक बात है भैयाजी!’’
‘‘का बात?’’
‘‘जे के अपने इते जे जो चीता आ गए, सो अपन ओरें कै सकत आएं के टाईगर के अंगना में चीता घूम रए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, अपने इते सो टाईगर प्रोजेक्ट पैलई से आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मैं बे प्रोजेक्ट वारे टाईगर की बात नईं कर रई। मैं सो अपने टाईगर भैया की बात कर रई!’’ मैंने ही।
‘‘जे को आ तुमाए टाईगर भैया?’’ भैयाजी चैंकत भए बोले।
‘‘लेओ आपखों नई पतो? अरे आप भूल गए बो डायलाग जब अपने शिवराज भैया ने कही रई के ‘अभी टाईगर जिंदा है’ तभई से मैं उने टाईगर भैया कहन लगी।’’
‘‘अरे हऔ, सो तुम उनकी बात कर रईं।’’
‘‘औ का, अपने टाईगर भैया के अंगना में चीता घूम रए। ठैरी ने मजे की बात?’’ मैंने कही।  
‘‘हऔ, कै तो ठीक रईं तुम! मनो अब मोए चलन देओ। काए से के तुमाई भौजी ने सेंधो नमक मंगाओ रओ। जो देर हो जेहे सो बे शेरनी नईं अब सो चीतनी बन जेहें।’’ कहत भए भैयाजी बढ़ लिए। मनो मोए उनकी ‘‘चीतनी’’ वारी बात पे खूबई हंसी आई।                        
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए चीता हरें प्रोजेक्ट एरिया में रएं चाए गांव, शहर में घूमें, मोए का करने? अपने लाने सो टाईगर भैया जिंदाबाद! बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(23.09.2022)
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह #बुंदेली #बुंदेलखंड #बिन्ना #भैयाजी #बतकाव #BatkavBinnaKi #DrMissSharadSingh #Bundeli
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