Wednesday, June 3, 2026

चर्चा प्लस | क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
क्या ग्लेशियर के पिघलने से सागरवालों पर कोई असर पड़ेगा?      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                    
     यह सच है कि हममें से 99 प्रतिशत लोगों ने कभी खुद जाकर ग्लेशियर नहीं देखे हैं; उन्हें केवल टीवी या इंटरनेट पर ही देखा है। ग्लेशियरों को पिघलते हुए भी हमने सीधे तौर पर नहीं देखा है। तो फिर हमें इस बात की चिंता क्यों करनी चाहिए कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जबकि हम तो मैदानी इलाकों के निवासी हैं? हालाँकि, हम मैदानी इलाकों के निवासियों ने तो कभी बर्फबारी भी नहीं देखी है। लेकिन जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है, तो पूरा मैदानी इलाका भी शीत लहरों की चपेट में आ जाता है। राजस्थान की गर्म हवाएं मध्यप्रदेश को झुलसा देती हैं। तो क्या हमें सचमुच चिंता नहीं करनी चाहिए?
सागरवाले कौन हैं? मैं सागरवाली हूँ। हाँ, मैं सागर में रहती हूँ, जो भारत के दिल यानी मध्य प्रदेश में स्थित एक विकासशील शहर है, और इसीलिए मैं सागरवाली हूँ। कुछ दिन पहले मैं एक परिचित से चर्चा कर रही था कि आजकल मौसम बहुत अस्थिर हो गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मौसम भी बदल रहा है, जिसे हम अपने जीवन में ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। माफ़ कीजिए, जब तक हम इसे समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। मेरे परिचित ने बड़े ही हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि मौसम तो बदलता ही रहता है, इसमें चिंता की क्या बात है? इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आप बेवजह ही जलवायु और मौसम को लेकर चिंता करती रहता हैं। अरे, जिस जगह पर हम रहते हैं, वहाँ इन सब चीज़ों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है। मैंने कहा - वाह! क्या आपने वह कहावत नहीं सुनी है कि अगर धरती पर एक पत्ता भी हिलता है, तो उसका असर दूर अंतरिक्ष तक होता है? तो जब धरती पर ही कोई घटना घटती है, तो उसका असर धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक ज़रूर होगा। अब देखिए, जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उसका असर पूरी धरती पर पड़ना स्वाभाविक है। यह सुनकर उन्होंने कहा, ‘‘आप कहती हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और यह चिंता का विषय है। बेशक यह चिंता का विषय होगा, लेकिन हमारे लिए नहीं। हम तो बीच के इलाके में रहते हैं। हमें चिंता क्यों करनी चाहिए? हम यहाँ सागर में रहते हैं, जो समुद्र से बहुत दूर है। हमें ग्लेशियरों के पिघलने से क्यों डरना चाहिए? अगर ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है, तो समुद्र के तटीय इलाकों में रहने वालों को चिंता करनी चाहिए, हमें नहीं।’’
क्या सचमुच एक सागरवाले, एक भोपाली, एक लखनवी या एक लुधियानवी को ग्लेशियरों के पिघलने से नहीं डरना चाहिए? असल में, ग्लेशियरों का पिघलना आज ग्लोबल वार्मिंग का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। सीधे शब्दों में कहें तो, ग्लेशियरों की सफ़ेद सतहें सूरज की किरणों को परावर्तित करती हैं, जिससे हमारे मौजूदा मौसम को मध्यम बनाए रखने में मदद मिलती है। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो नीचे की काली सतहें सामने आ जाती हैं, जो गर्मी को सोखती और छोड़ती हैं, जिससे तापमान बढ़ जाता है। ग्लेशियर पानी के भंडार के रूप में काम करते हैं, जो गर्मियों के मौसम में भी बने रहते हैं। ग्लेशियरों से लगातार पिघलने वाला पानी सूखे महीनों के दौरान भी पारिस्थितिकी तंत्र को मिलता रहता है, जिससे बारहमासी जलधाराओं का निर्माण होता है और पेड़-पौधों व जानवरों के लिए पानी का स्रोत बना रहता है। ग्लेशियरों से बहकर आने वाला ठंडा पानी, नीचे की ओर बहने वाली नदियों और जलधाराओं के तापमान को भी प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन का अर्थ है - पर्यावरण में बदलाव। यह बदलाव हमारे सामने बेमौसम बारिश, बर्फ़बारी, बढ़ती गर्मी और सूखे के रूप में आ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। अंटार्कटिका से लेकर ग्रीनलैंड तक, इन क्षेत्रों का अस्तित्व खतरे में है। जीवनदायिनी नदियाँ सूख रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने के कारण समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते निकट भविष्य में दुनिया के नक्शे से कई देशों का अस्तित्व मिट जाने की आशंका है। पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में भी वृद्धि देखी गई है। जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक और मानवीय, दोनों ही कारण हैं; लेकिन वर्तमान समय में जो परिणाम सामने आए हैं, वे मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण हैं। हमारे सामने एक बड़ा संकट खड़ा है, और दुर्भाग्य से हम इससे अनजान हैं। जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति को तेज़ कर रहे हैं, जिससे उन 75 करोड़ लोगों का जीवन और आजीविका खतरे में पड़ गई है, जो इन ग्लेशियरों और बर्फ से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। पिघलते ग्लेशियर समुद्र के बढ़ते जलस्तर में योगदान देते हैं, जिससे तटीय कटाव बढ़ता है और तूफानी लहरों (ेजवतउ ेनतहमे) का खतरा बढ़ जाता है; क्योंकि गर्म होती हवा और समुद्री तापमान के कारण हरिकेन और टाइफून जैसे तटीय तूफान अधिक बार-बार और अधिक तीव्रता के साथ आते हैं। चिंताजनक बात यह है कि यदि ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल गई, तो इससे वैश्विक समुद्र का जलस्तर 20 फीट तक बढ़ जाएगा।

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, ग्लेशियरों का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर प्रमाणों में से एक है। यह इस बात का सबूत है कि ग्लोबल वार्मिंग न केवल पृथ्वी का तापमान बढ़ा रही है, बल्कि यह मौसम और जलवायु को भी बदल रही है। मौसम पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव का अर्थ है कि कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है, तो कहीं भारी वर्षा होती है। इसका कृषि और बागवानी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जलस्तर कम होने के कारण पेयजल का संकट भी उत्पन्न हो जाता है। हमने पिछले पाँच वर्षों के दौरान बुंदेलखंड क्षेत्र में पड़े सूखे के दौरान इन सभी बातों के उदाहरण पहले ही देख लिए हैं। इसलिए, यह सोचना कि हिमालय या ध्रुवीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने का हमारे देश के भीतरी इलाकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, स्वयं को भ्रम में रखना है। इसीलिए दुनिया के हर व्यक्ति के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह ग्लोबल वार्मिंग की गति को धीमा करने में अपना योगदान दे। हमें यह समझना होगा कि यदि ग्लेशियरों के पिघलने का प्रभाव तटीय क्षेत्रों पर 50 प्रतिशत होगा, तो उसी समय भीतरी इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका प्रभाव कम से कम 10 से 20 प्रतिशत अवश्य पड़ेगा। इसलिए, जागिएकृचाहे आप सागर के निवासी हों, भोपाली हों, लखनवी हों, लुधियानवी हों, या फिर आप कहीं के भी नागरिक हों।

2025 का संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 10-21 नवंबर 2025 को ब्राजील के बेलेम में आयोजित किया गया था। इसमें 190 से अधिक देशों के नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के सदस्यों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्यों पर चर्चा करने के लिए एक साथ लाया गया, जिसमें पहले वैश्विक स्टॉकटेक  के परिणामों को ठोस राष्ट्रीय कार्यों में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया गया था। अगला सम्मेलन नवंबर 2026 में होगा।

बीसवीं शताब्दी में तीव्र हुई ग्लेशियरों के पिघलने से हमारा ग्रह बर्फ़विहीन होता जा रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में मानवीय गतिविधियाँ मुख्य भूमिका निभाती हैं। समुद्र का स्तर और वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि बर्फ़ के ये विशाल भंडार किस प्रकार विकसित होते हैं। जलवायु परिवर्तन के निरंतर बढ़ते प्रभाव के कारण पृथ्वी के ग्लेशियर आधी सदी से भी अधिक समय से सिकुड़ रहे हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय (स्विट्जरलैंड) द्वारा 2019 में किए गए एक उपग्रह अध्ययन के के बाद कहा गया था कि दक्षिण-पूर्व एशिया को छोड़कर पृथ्वी पर कोई भी स्थान इस घटना के प्रभावों को झेलने में सक्षम नहीं है, जिसने 1961 से अब तक दुनिया भर में 9.6 अरब टन से अधिक हिमनद बर्फ पिघला दी है, और विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, 2100 तक एक तिहाई से अधिक ग्लेशियरों के वाष्पीकृत होने का खतरा है। दुर्भाग्य से यह भविष्यवाणी सच होने लगी है।

ग्लेशियर क्या होता है और यह कैसे बनता है? दरअसल, बर्फ के ये विशालकाय गतिशील पिंड ठंडे स्थानों में जमा हुई बर्फ के संघनन और पुनरू क्रिस्टलीकरण से बनते हैं, जैसा कि उदाहरण के लिए पर्वतीय और ध्रुवीय ग्लेशियरों में होता है, जिन्हें विशाल आर्कटिक प्लेटों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। हिमनदों को उनकी आकृति विज्ञान के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है - हिमक्षेत्र, सर्क हिमनद, घाटी हिमनद, आदि - जलवायु के अनुसार - ध्रुवीय, उष्णकटिबंधीय या समशीतोष्ण - और उनकी तापीय स्थितियों के अनुसार - ठंडा, गर्म या बहुतापीय आधार। एक हिमनद के निर्माण में हजारों वर्ष लगते हैं, और इसका आकार इसके जीवनकाल में इसमें मौजूद बर्फ की मात्रा के आधार पर बदलता रहता है। बर्फ पिघलने के दौरान इन हिमनदों का व्यवहार उन नदियों के समान होता है जिन्हें ये पानी देते हैं, और इनकी गति घर्षण और उस भूभाग की ढलान पर निर्भर करती है जिस पर ये चलते हैं। कुल मिलाकर, हिमनद पृथ्वी की सतह के 10 प्रतिशत भाग को ढकते हैं और बर्फ की चोटियों के साथ मिलकर विश्व के लगभग 70 प्रतिशत ताजे पानी का स्रोत हैं।
पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने ग्लेशियरों के पिघलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज, जलवायु परिवर्तन की बढ़ती गति के कारण ये रिकॉर्ड समय में विलुप्त हो सकते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन- उद्योग, परिवहन, वनों की कटाई और जीवाश्म ईंधन जलाने जैसी मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की वायुमंडलीय सांद्रता पृथ्वी को गर्म करती है और ग्लेशियरों को पिघलाती है। महासागर पृथ्वी की 90 प्रतिशत गर्मी को अवशोषित करते हैं, और यह तथ्य समुद्री ग्लेशियरों के पिघलने को प्रभावित करता है, जो ज्यादातर ध्रुवों के पास और अलास्का (संयुक्त राज्य अमेरिका) के तटों पर स्थित हैं। ज्यूरिख विश्वविद्यालय ने पाया कि पिछले तीन दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो गई है। बर्फ का यह नुकसान पहले ही 335 अरब टन प्रति वर्ष तक पहुंच चुका है, जो समुद्र के वर्तमान विस्तार की दर का 30 प्रतिशत  है।

ग्लेशियरों के पिघलने के मुख्य परिणाम घातक हैं। सन 1961 से हिमनदों के पिघलने के कारण समुद्र का स्तर 2.7 सेंटीमीटर बढ़ गया है। इसके अलावा, दुनिया के ग्लेशियरों में लगभग 170,000 घन किलोमीटर बर्फ मौजूद है, जो समुद्र के स्तर को लगभग आधा मीटर तक बढ़ा सकती है। ध्रुवों पर हिमनदों के पिघलने से समुद्री धाराओं की गति धीमी हो रही है, यह एक ऐसी घटना है जो वैश्विक जलवायु में परिवर्तन और दुनिया भर में तेजी से बढ़ती चरम मौसम घटनाओं की एक श्रृंखला से संबंधित है। हिमनदों के पिघलने से कई प्रजातियों का विलुप्त होना भी तय है, क्योंकि हिमनद स्थलीय और जलीय दोनों प्रकार के कई जानवरों का प्राकृतिक आवास हैं। ग्लेशियरों के लुप्त होने का अर्थ यह भी है कि जनसंख्या द्वारा उपभोग के लिए कम पानी, जलविद्युत ऊर्जा उत्पादन क्षमता में कमी और सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा कम हो जाती है।
ग्लेशियर वैज्ञानिकों का मानना है कि भारी बर्फ पिघलने के बावजूद, हमारे पास अभी भी हिमनदों को उनके अनुमानित लुप्त होने से बचाने का समय है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में हम कैसे मदद कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को कम करने और ग्लेशियरों को बचाने के लिए, यह अनिवार्य है कि अगले दशक में वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम किया जाए, और 2050 के बाद इसे शून्य तक लाया जाए।
जरा सोचिए कि सागर भी इसी पृथ्वी पर है। यदि पृथ्वी में प्राकृतिक असंतुलन होगा तो उसके दुष्प्रभावों से सागर भी बचेगा नहीं। इस बार गर्मियों में रिकार्ड तोड़ तपन और हीटवेव्स ने चेतावनी दे ही दी है कि यदि हम पेड़ काटते रहे, जलाशय सुखाते रहे तो हम चाहे सागर में रहें या जबलपुर में, हमें ग्लेशियरों के पिघलने का असर झेलना ही होगा।      
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(दैनिक, सागर दिनकर में 03.06.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, June 2, 2026

पुस्तक समीक्षा | क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - क्यों आई हो! अब यहाँ?
लेखक - आर. के. तिवारी
प्रकाशक-एन.डी.पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य - 150/-
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कहानी समाज का सच बयान करती है, चाहे प्रेमचंद की ‘कफन‘ कहानी हो या चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था‘ या फिर उर्मिला शिरीष की ‘हरा पत्ता‘। हर कहानी का अपना एक सच होता है, भले ही उसे कहानी की शैली में कल्पना का मिश्रण हो, फैंटेसी हो लेकिन सच उसके मूल में समाया रहता है। कथाकार समाज से ही कथानक चुनता है और एक ऐसा मनोविज्ञान रचता है जो कहानी के पात्रों की मनोदशा से पाठकों को सीधे जोड़ा जा सके। मां की लोरी के बाद कहानियां ही वह साहित्यिक चेष्टाएं होती हैं जो बाल मन को दुनिया का पाठ पढ़ती हैं और भले-बुरे की समझ पैदा करती हैं। इसलिए कथा साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता चाहे कहानी अपने आकार में छोटी हो या बड़ी, कठिन भाषा में लिखी गई हो या सरल भाषा में, उसमें मौजूद संदेश ही उन कहानियों की आत्मा होती है।

बैंक से सेवानिवृत्ति के बाद  अपने जीवन की दूसरी पारी में ‘‘हल्ला कन्हैया का‘‘  भजन संग्रह लिखने के बाद कथा साहित्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते गए और आज सागर साहित्य जगत में एक परिचित नाम हैं कहानीकार आर. के.  तिवारी। 74 वर्ष की आयु में उनकी दसवीं पुस्तक कहानी संग्रह के रूप में ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ प्रकाशित हुई है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक उपलब्धि है जो अपने जीवन की दूसरी पारी में हताश, निराश हो जाते हैं उनके लिए आर.के. तिवारी का लेखन एवं सक्रियता एक अनुपम उदाहरण है कि जीवन को साहित्यिक उल्लास के साथ भी जिया जा सकता है। इसके पूर्व उनका एक काव्य संग्रह, तीन लघु उपन्यास, चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानी है जो अलग-अलग शेड्स की हैं। कथन को में विषय की विविधता किसी भी कहानी संग्रह को रोचक बना देता है। यह कहानियां हैं - नसीब, कर्नल रंजीत और सिया, कोरबा थाने का सिपाही, रामरति एक आन्दोलन का नाम, मेरी बड़ी भाभी, दीपा की सहेली, कुल का बुझा हुआ दीया, गहरा जख्म, सुगना की बहू और एक शिकारी, कुरवाई वाली भाभी, चूहा पचरंगी, बेटा में तेरी माँ हूँ डायन नहीं, छोटी बहन, ट्रक ड्राइवर एवं फूलझड़ी, मेरी दादी माँ, पापी, क्यों आई हो! अब यहाँ , खोटा सिक्का, कुंवर बाई रतनगढ़, सलवार सूट वाली, पिता जी का चश्मा।
हर कहानी के पात्रों का अपना एक संघर्ष है, अपना एक मनोविज्ञान है। जैसे संग्रह की पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘‘नसीब‘‘ एक ऐसे युवा की कहानी है जो परिस्थितिवश अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के प्रतिकार में अपराध कर बैठता है। यह कहा भी जाता है कि कोई भी अपराधी जन्म से अपराधी पैदा नहीं होता है परिस्थितियां उसे अपराध में लिप्त कर देती हैं। किसी भी युवा लड़के पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाना और फिर उसे उसके सहपाठियों द्वारा निरंतर ताने मारा जाना उसकी उस मनोदशा को स्पष्ट करता है जहां एक ईमानदार सच्चरित्र युवा मानसिक रूप से हताहत होकर अपना आप खो बैठता है। उस समय उसे अच्छे या बुरे परिणाम का ख्याल भी नहीं आता है। यह कहानी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचती है जहां समाज का वह पक्ष उभर कर सामने आता है जिसमें सिर्फ सुनी सुनाई बात को स्वीकार करके किसी भी व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाने लगता है। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ के आरंभिक  पृष्ठों  में ‘‘समीक्षा‘‘  शीर्षक के अंतर्गत समाजसेवी एवं लेखिका डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे ने संग्रह की कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘‘आर. के. तिवारी जी की लेखनी न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि सामाजिक अन्याय, गरीबी, पारिवारिक रिश्तों के सम्बन्धों जैसे गम्भीर विषयों पर सम्पूर्ण एवं वास्तविक सच्चाई को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार तिवारी जी की हर कहानी सरल, सहज और संवेदनशील है। प्रत्येक कहानी एक रोचक ढंग से लिखी है। जो पाठक को बाँधकर रखती है। कहानियाँ सैद्धान्तिक और समाज के नैतिक मूल्यों पर आधारित उनका संदेश बताती है।‘‘
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘कर्नल रंजीत और सिया‘‘। यह कहानी पाठकों को एक अलग धरातल पर ले जाती है जहां जीवन का आदर्श अपने सुंदर रूप में प्रकट होता है तथा प्रेरणास्पद आचरण की पैरवी करता है। अति गरीब परिवार की बालिका जो मिलिट्री हेलीकॉप्टर छलांग लगाते समय पैराशूट न खुलने से हताहत हो जाता है उस कर्नल की जान बचाती है। सिया नाम की उस बालिका का गरीब पिता जो बकरियां चरा कर और महुआ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था, कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसकी बेटी एक दिन पायलट बनेगी। सिया के द्वारा जान बचाने पर जख्मी कर्नल रंजीत एक दिन वापस आता है और सिया को उसके उसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां पायलट सिया के रूप में एक दिन उसे देश सेवा करनी थी। आज जब लोग स्वार्थ में डूबे हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मदद तभी करता है जब उसे बदले में कुछ पाने की उम्मीद होती है। ऐसे शुष्क समय में यह कहानी आशा का एक नया रंग भरती है। ‘‘कोरबा थाने का सिपाही‘‘ भी इसी शेड की कहानी है जो एक मानवीय आदर्श रचती है। 
‘‘रामरति एक आन्दोलन का नाम‘‘ उस स्त्री की कहानी है जो न केवल जंगली जानवरों से अपने गांव के लोगों को बचाने का रास्ता सुझाती है बल्कि आगे चलकर वह अपने गांव में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करवाने में भी सफल रहती है। इस प्रकार वह अपने गांव वालों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है। कहानी ‘‘मेरी बड़ी भाभी‘‘ की बड़ी भाभी परिवार की जड़ों को बचाए रखने और संस्कारों को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहती है, भले ही इसके लिए उसे अपने परिजनों से भी वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। ‘‘दीपा की सहेली‘‘ कहानी वैवाहिक ठगी की घटना पर आधारित है। जिससे निकलने का रास्ता भी कहानी में सुझाया गया है। 
“कुल का बुझा हुआ दीया” एक मर्म स्पर्शी कहानी है जो मन को द्रवित  करने में सक्षम है। “गहरा जख्म”, “सुगना की बहू”, “और एक शिकारी”, “कुरवाई वाली भाभी”, “चूहा पचरंगी” आदि शेष कहानी कथानक के विविध संवाद रचती हैं। यह सभी कहानियां छोटी है किंतु रोचक एवं संदेशवाहक हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी “क्यों आई हो! अब यहाँ?” उस वर्तमान परिदृश्य की कहानी है जिसमें बहू-बेटे अपनी मां को बोझ समझकर अपने साथ नहीं रखना चाहते और गांव में छोड़ आते हैं। बाजारवाद की आंधी दौड़ ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी और सुविधा भोगी बना दिया है कि उसे अपने खून के रिश्ते भी दिखाई नहीं देते हैं। मां और बेटे का अटूट संबंध भी टूटता, चटकता नजर आता है। न बेटे को अपनी बीमार बूढी मां की परवाह है और न बहू को। बस, एक पोता है जो अपनी दादी की दशा देखकर विचलित हो जाता है। वह दादी की हर संभव सहायता करना चाहता है। परंतु उसे छोटे बालक के वश में सब कुछ तो नहीं है, अपने माता-पिता के प्रति सिर्फ एक आक्रोश है जो उसके भीतर पलता, बढ़ता है और दादी की मृत्यु पर यही आक्रोश लावा बनाकर फट पड़ता है। यह कहानी इस बात के लिए प्रेरणा देती है कि अपने बुजुर्गों की अवहेलना नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में चाह कर भी कोई गलती सुधारी नहीं जा सकती है, कोई पश्चाताप नहीं किया जा सकता है। इस कहानी के शीर्षक पर इस कहानी संग्रह का नाम है जो कि जिज्ञासा जगाने वाला है और पाठक को अपनी और सहज ही आकर्षित करता है।
आर.के. तिवारी की कहानियों में गहरी संवेदनात्मक पकड़ है। यह कहानियां बिगड़ी हुई सामाजिक पारिवारिक स्थितियों को सुधारने का आग्रह करती हैं और मार्ग भी दिखती हैं। इप कहानियों में कथाशिल्प से उपजी व्यंजना और अलंकारिकता भले ही कम है किंतु चेतन-अवचेतन से संवाद की भरपूर क्षमता है। कथाकार आर.के. तिवारी की लेखक की सक्रियता को रेखांकित करते हुए लेखक और वक्ता डॉ. आशीष द्विवेदी  ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि - ‘‘करीब आधे दशक से श्रीमान राजकुमार तिवारी जी सतत लिख रहे हैं, अब तक अर्जित अपनी संपूर्ण मेधा शक्तिको उन्होंने लेखन में झोंक दिया है। जो अंगुलियां ताजिंदगी बैंक में करेंसी गिनती रहीं सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने कलम उठा ली, सरस्वती के साधक बन गए। एक अनोखा रूपांतरण! उनकी सृजन सक्रियता अलबेली है, जिसमें कहानी, कविता के साथ तनिक व्यंग्य भी हैं।‘‘
आर. के. तिवारी की भाषा सीधी सरल और आम बोलचाल की भाषा है। ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह की कहानियां रोचक एवं पठनीय होने के साथ ही मानवीय आदर्श रचती हुई संदेशप्रद हैं। वस्तुतः इन कहानियों से हो कर गुजरना आज के समाज के हर व्यक्ति के लिए स्वयं की अंर्तआत्मा का आकलन करने की भांति है। 
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Sunday, May 31, 2026

लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर | जीवनी | लेखिका शरद सिंह (डॉ (सुश्री) शरद सिंह)

आज लोक माता देवी अहिल्याबाई की जन्म जयंती है... 
स्त्री शक्ति की प्रतीक लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर के जन्म दिवस पर उन्हें शत-शत प्रणाम 🙏
लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर के बारे में विस्तार से जानने के लिए पढ़िए सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी पुस्तक "लोकमाता अहिल्याबाई होलकर"।  यह एक जीवनी पुस्तक है जो उनके व्यक्तित्व एवं सुशासन  से परिचित कराती है। अवश्य पढ़ें 🙏 आप इसे सीधे प्रकाशक से भी मंगा कर पढ़ सकते हैं और ऑनलाइन मंगाने के लिए अमेजन का लिंक यहां दे रही हूं...
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Saturday, May 30, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट 
पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कछू बरस पैले एक फिलम आई रई जोन मे आयुष्मान खुराना हीरो रओ। ऊं फिलम में जो गाना रओ -”पानी दा रंग वेख के, अँखियाँ चो हंजो रोड दे/ माहिया ना आया मेरा, माहिया ना आया”। ईको मतलब जो आए के पानी को रंग देखके मोरी अंखियों से अंसुवा बै रै। काए से के मोरों चाएबो वारो ने आओ।” 
अब आप ओरें सोच रए हुइयों के पानी तो बरसों नईं औ जे को जाने कां को पानी को रंग देख के रोन लगीं। मनो टाटा वारन की सप्लाई को पानी को रंग देख के अंसुवां तो आहें, पर हम अबे टाटा वारन के पानी की नईं, ऊके पानी के बिल की बात कर रै, जोन ने अंखियन से अंसुवां चुवा दए। चलो हम अपनी सुना रए। का भऔ के हम अप्रैल मईना में संपत्ती टैक्स भरने गए सो उते मुतकी पेनाल्टी ठुंक गई। उन्ने बताई के 31मार्च से पैले भरो चाइए रओ। सो, अपने जी पे फथरा रख के पेनाल्टी भर दई। ओई टेम पे हमने सोंसी के पानी को पईसा भर देवें। साल भर को इकट्ठा भरे में एक मईना की छूट मिल जैहे तो कछू गम गलत हो जैहे। लेकन उते बताओ गओ के साफ्टवेयर  अपडेट हो रओ तो, सो मई में आइयो। रामधई, हम तो उधनईं समझ गए रए के जे ओरें छूट ने दैंहे। औ देख लेओ के बोई भओ। बिल लौं भेजत नइयां औ पेनाल्टी  ठोंकते आएं, छूट मसक लेते आएं। अब कोसत रओ चाए टाटा वारन खों, चाए नगरपालिका वारन कों, चाए निगम वारन खों, औ पूरों बिल भरत रओ। कओ पानी औ कचरा पे भी पेनाल्टी ठोंक दई जाए तो गश ने खाइयों। बीजासेन माईं किरपा करें! बाकी हम तो अपने अंसुवां पोंछईं रए औ गा रए-
पानी को रंग देख के अंखियों से अंसुवां छलके, 
बिल लौं ने मिलों कभऊं, बिल लौं ने आओ …
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, May 29, 2026

शायर डॉ बशीर बद्र साहब को विनम्र श्रद्धांजलि - डॉ सुश्री शरद सिंह

अलविदा मेरे पसंदीदा शायर बशीर बद्र साहब ... आप अपनी शायरी में  हमेशा जिंदा रहेंगे 😔
▪️ वर्षों पहले मेरे शहर सागर में ही उनके साथ एक कवि - सम्मेलन मुशायरा पढ़ने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था... इससे पहले वह मुझे सुखद आश्चर्य में डाल चुके थे, हुआ यूं था कि तत्कालीन बहुचर्चित साहित्यिक पत्रिका "सापेक्ष"  के लिए विजय वाते जी ने बशीर बद्र साहब से एक  इंटरव्यू लिया था जिसमें उन्होंने शायरी में नएपन का उदाहरण देते हुए मेरे एक शेर को उद्धृत किया था। जब वह विशेषांक मेरे हाथों में आया तो अगर सीधे-सीधे कहा जाए तो मैं बेहोश होते-होते बची क्योंकि यह मेरे लिए अत्यंत सुखद आश्चर्य था कि जिस शायर की शायरी को मैं बहुत पसंद करती हूं और जिन्हें मैं एक उम्दा शायर मानती हूं उन्होंने मेरे शायरी को रेखांकित किया यह उनकी सहजता और शायरी के प्रति समर्पण था कि जिन्होंने सिर्फ़ शायरी को पहचाना, पहचान के आधार पर शायरी को नहीं... यही उनका बड़प्पन था जिसने मेरे दिल को छू लिया था...
▪️ अपने इंटरव्यू में डॉ बशीर बद्र साहब ने कहा था -
"कुछ लोग ग़ज़ल की पुरानी परम्पराओं और नई बदली हुई जुबान को खूबसूरती से मिला कर नई ग़ज़ल लिख रहे हैं। इस तरह नई गज़ल की नई रूह सामने आ रही है। मसलन, शरद सिंह का ये शेर -
     फिर हवा के हाथ में हैं शीत के नेजे नुकीले,
     फट गया है ताप का अस्तर, चलो, चलना कहां है ?"
- डॉ. बशीर बद्र, सापेक्ष-32, ग़ज़ल विशेषांक
(यह विशेषांक आज भी मेरे पास सुरक्षित है एक अविस्मरणीय कृति के रूप में)
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Wednesday, May 27, 2026

चर्चा प्लस | बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
बदल रहा है मौसम का पैटर्न और इंसानी स्वभाव का भी      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                      

    हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ने को मिली जिसमें मौसम के पैटर्न बदलने के गंभीर आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे। समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ रिपोर्ट का अंश। कितने लोगों ने पढ़ा? इसके आंकड़े बता पाना मुश्किल है लेकिन यह तो तय है कि उससे बहुत कम लोगों ने जितनों ने ‘‘हनी ट्रैप ’’, ‘‘ट्विशा केस’’ अथवा ‘‘मेलोडी’’ के समाचार पर अपनी आंखें गड़ाए रखी होंगी। कितने आश्चर्य के बात है न कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसके निरंतर कटने का हमें अहसास नहीं है लेकिन चटखारे भरे समाचारों पर हमारा पूरा ध्यान केन्द्रित रहता है। दरअसल, हमारा मौसम जिस तरह घातक रूप से अपना पैटर्न बदल रहा है, ठीक उसी प्रकार इंसानी स्वभाव भी बदल रहा है।


      मौसम में परिवर्तन होना एक स्वाभाविक एवं स्वस्थ प्राकृतिक क्रिया है। किन्तु जब मौसम अपनी प्रकृति के विपरीत चलने लगे तो स्थिति स्वाभाविक नहीं रह जाती है। जैसे यदि कोई नदी अपना रास्ता बदल कर बहने लगे तो वह गांव, शहर, खेत सबकुछ बरबाद कर सकती है। मौसम का चक्र भी अपनी गति या प्रकृति को बदलता है तो यह मानना होगा कि विनाश की दस्तक पड़ना शुरू हो गई है। अब यह इस पर निर्भर है कि हम उस दस्तक को कितनी देर से अथवा कितनी जल्दी सुनते हैं। जब बात आती है जलवायु परिवर्तन अथवा मौसम के परिवर्तन की तो लोगों का रवैया लापरवाह हो जाता है। वे साशल मीडिया पर घंटों ‘‘हनी ट्रैप’’ के किस्से ढूंढ-ढूंढ के पढ़ सकते हैं, ‘‘मेलोडी चॉकलेट’’ से जुड़े किस्से पर वाद-विवाद में पूरा-पूरा दिन बिता सकते हैं, हाई प्रोफाईल ‘‘ट्विशा मर्डर केस’’ पर परिणाम विहीन चिंन्तन में सिर खपा सकते हैं लेकिन उस संकट की ओर ध्यान देने का समय नहीं निकाल पाते हैं जिसके शिकंजे में धीरे-धीरे पूरी पृथ्वी और पूरी मानव सभ्यता जकड़ती जा रही है। अभी भी स्थिति पर नियंत्रण पाने का समय है किन्तु उस पर विचार करने का हमारे पास न तो समय है और न इच्छा। हम आभासीय दुनिया के गुलाम बन कर स्वयं को बुद्धिजीवी मानने का भ्रम पाल चुके हैं। जबकि बुद्धिजीवी का असल दायित्व होता है कि वह सबसे पहले पृथ्वी और सकल मानवता के बारे में गंभीरता से सोचे।  

हाल ही में समाचार पत्रों में यह रिपोर्ट पढ़ी कि हिमालय में बर्फबारी का पैटर्न बदल रहा है। बर्फबारी के महीने माने जाने वाले जनवरी-फरवरी से ज्यादा बर्फ अब मार्च-अप्रैल में गिर रही है। इसका सीधा असर वाटर बैंक माने जाने वाले ग्लेशियरों पर पड़ेगा। इस पैटर्न के कारण ट्री लाइन भी लगातार ऊपर को खिसक रही है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। ताजा शोध जर्मनी की एप्लाइड जियोमेटिक्स शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है। हिमालय में सर्दियों की तुलना में गर्मियों में ज्यादा हो रही बर्फबारी का कारण पश्चिमी विक्षोभ में आई असमानता है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर होने से बारिश और बर्फबारी में कमी आ रही है। गर्मियों में इसके बढ़ने से बर्फबारी के साथ बारिश, ओलावृष्टि और आपदाओं के खतरे बढ़े हैं। पर्यावरणविद् पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी के मुताबिक, हिमालय में मौसम के बदले पैटर्न से आर्थिक और सामाजिक नुकसान का खतरा भी बढ़ा है। पश्चिमी विक्षोभ में आ रही असमानता से हर साल खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी। इससे अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं। पर्यटन और हॉर्टिकल्चर प्रभावित होगा। ग्लेशियरों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया गया, तो आपदाओं के खतरे ज्यादा बढ़ेंगे। मार्च-अप्रैल में हो रही बर्फबारी से ग्लेशियर खतरे में हैं। डॉ. पंकज चौहान बताते हैं कि मार्च-अप्रैल में धरती का तापमान अधिक रहता है। इससे बर्फ जिस गति से पड़ रही है, उसी गति से पिघल रही है और ग्लेशियर कमजोर पड़ रहे हैं। ये भविष्य में स्रोत-जलधाराओं को प्रभावित करेंगे। साथ ही आपदा के खतरों को भी बढ़ाएंगे। बर्फबारी के बदले पैटर्न ने हिमालय में ट्री लाइन को भी प्रभावित किया है। अलग-अलग घाटियों में ट्री लाइन पहले की तुलना में ऊपर खिसकी है। मध्य हिमालय में औसत ट्री लाइन 3600 मीटर तक मानी जाती है, लेकिन अब ये 3800 मीटर तक पहुंच रही है।

दूसरी ओर एक समाचार और भी पढ़ा जिसमें दूसरे ग्रहों में मानव बस्तियां बसा कर मानव एवं पृथ्वी की प्रजातियों को बचाने के अभियान की चर्चा थी। मुझे आद आया किस्सा ‘‘नूह की नाव’’ का। नूह की नाव की कहानी ‘‘कुरान’’ और ‘‘बाईबल’’ में दर्ज़ है। कहानी के अनुसार, जब पृथ्वी पर पाप और अत्याचार बढ़े, तो ईश्वर/अल्लाह/याहोवा ने एक विनाशकारी जलप्रलय (महाबाधा) द्वारा दुष्ट दुष्टों को सजा देने का निर्णय लिया।  ईश्वर ने अपने भक्त नूह को एक विशाल नाव बनाने का आदेश दिया, क्योंकि वही एकमात्र नेक इंसान थे।  पानी से बचने के लिए नाव को सील कर के वाटरप्रूफ बना दिया गया था। इसमें तीन मंजिलें थीं। नूह ने ईश्वर के निर्देशों के अनुसार अपने परिवार (पत्नी, तीन पुत्र और उनके अनुयायी) को पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव-जंतु, पशु-पक्षियों के नर और मादा जोड़े के साथ नाव में सुरक्षित रख लिया।  जब सभी लोग और जानवर नाव में सुरक्षित चले गए। फिर तेज़ बारिश शुरू हो गई और धरती जलमग्न हो गई। नाव के बाहर का सारा जीवन नष्ट हो गया।  कई दिनों तक पानी में तैरने के बाद, जब बाढ़ का पानी कम होने लगा, तो नाव अरारत पर्वत (माउंट अरारत) की चोटियों पर जा टिकी और वहीं से धरती पर जीवन का पुनः विकास हुआ।
भारतीय पौराणिक ग्रंथों में शूकर या वराह रूप में पृथ्वी पर जल प्रलय (रसतल) से भगवान विष्णु के तीसरे अवतार की कथा है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में दिति के पुत्र और दैत्य हिरण्यक्ष ने घोर तपस्या कर अपार शक्तियां प्राप्त कर लीं। उसने सभी लोकों पर अधिकार कर लिया और पृथ्वी को समुद्र तट (रसातल) की गहराई में छिपा दिया। पृथ्वी के जलमग्न होने से हाहाकार मच गया। तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर, उनके नासिका (नाक) से भगवान विष्णु एक छोटे से वराह (शूकर) के रूप में प्रकट हुए।  देखते ही देखते वराह भगवान का आकार अत्यंत विशाल हो गया। वे समुद्र में गहरे उतर गए। हिरण्याक्ष ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी, लेकिन भगवान वराह ने उन्हें अपने वध से परास्त कर दिया।  वराह भगवान ने अपने विशाल दांत (थूथनी) से पृथ्वी को स्थिर किया और जल के ऊपर उसे अपने मूल स्थान पर स्थापित कर दिया।

      महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपनी महाकाव्य ‘‘कामायनी’’ की शुरुआत ही जल प्रलय (प्रलय प्रवाह) से की है।  महाकाव्य के पहले सर्ग, जिसका नाम ‘‘चिंता’’ है, में शामिल हैं मनु हिमालय के विशाल शिखर पर बैठ कर प्रलय का दृश्य देख रहा है।  ‘‘कामायनी’’ के अनुसार देव संस्कृति में भोग-विलासिता की भारी वृद्धि हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति ने अपना भीषण रूप दिखाया और जल प्रलय (महाजल-प्लावन) के द्वारा पूरी तरह से देव संस्कृति नष्ट हो गई।  इस प्रलय के बाद केवल मनु ही जीवित बचा और उसने मानव जाति के पुनर्विकास को सुनिश्चित किया।

     जल प्रलय और हिमयुग की अनेक कथाएं हैं। हॉलीवुड ने तो ‘‘आईस एज़’’ नाम से फिल्मों की एक श्रृंखला ही बना डाली। जिनमें डायनोसार युग के विशाकाय पशुओं के लुप्त होने की कड़ी और आई एज़ की भयावहता को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। दिलचस्प बात है कि इन फिल्मों को बच्चों से ले कर वयस्कों तक ने बहुत पसंद किया लेकिन उसमें कहे गए संदेश की गंभीरता को नहीं समझा। शायद हम मौसम को ले कर तात्कालिक चर्चा से आगे बढ़ने की प्रवृति खोते जा रहे हैं। जबकि वैज्ञानिक मानव व्यवहार में आते जा रहे परिवर्तन का आलन करते हुए निरंतर इस तथ्य से आगाह कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन में बदलाव का प्रभाव मानव व्यवहार पर भी पड़ रहा है। 
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती हुई जलवायु और चरम मौसम का मानव व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। इन लोगों में मानसिक तनाव और आक्रामकता बहुतायत है।। साथ ही, सीमित औपचारिकता के लिए संघर्ष, पलायन और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के कारण मानवीय निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। अत्यधिक गर्मी और लू के दिनों में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, जिससे लोगों में हिंसक व्यवहार और अपराध की दर में वृद्धि देखी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं, मधुमेह और मधुमेह के कारण होने वाले नुकसान से लोगों में ‘‘इको-एंजाइटी’’ (पर्यावरण चिंता), अवसाद और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) का खतरा बढ़ जाता है। खराब मौसम और राजनीतिक संकट के कारण लोगों का ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती है, जिससे वे कई बार जोखिम और निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं।  रहने लायक जगह और पानी की कमी के कारण एक बड़े वर्ग का शहरों की ओर पलायन होना है। इससे भीड़-भाड़ वाले इलाकों में रहने लायक जगह और सामाजिक तनाव बढ़ गया है। नई पीढ़ी के शारीरिक विकास और लंबाई में भी बदलाव आ रहे हैं। हम आजकल अकसर पढ़ते हैं कि कम आयुवर्ग में भी हार्ट के साईलेंट अटैक की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन घटनाओं के कारण में कुछ प्रतिशत प्रभाव जलवायु परिवर्तन का भी है। हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी का जितना श्रेय गरीबी और बेरोजगारी को है उतना ही उस एग्रेसिवनेस को जिसके चलते जल्दी गुस्सा आता है और इंसान बिना सोचे समझे हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है।

    प्रश्न यह है कि कैसे रोका जा सकता है मौसम के पैटर्न में बदलाव और मानव स्वाभाव में आते जा रहे परिवर्तनों को? मौसम के पैटर्न (जलवायु परिवर्तन) और मानव स्वभाव में आ रहे नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के लिएव्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर ठोस कदम उठाना आवश्यक है। प्राकृतिक गैसों के उपयोग को कम करके मौसम में ही सुधारा जा सकता है। ग्रेड और तेल की जगह सौर ऊर्जा (सौर ऊर्जा), पवन ऊर्जा (पवन ऊर्जा), और पनबिजली के उपयोग को बढ़ावा देना। वनों की कटाई को रोकें और अधिक से अधिक वृक्षों की कटाई करें, ताकि कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक रूप से अवशोषित हो सके। सतत कृषि (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) यानी रासायनिक खादों के बजाय जैविक खेती का उपयोग करें, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और जल संरक्षण हो सके।

   आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीक की लता और तनाव के कारण मानव स्वभाव में आक्रामकता और शरीर में कमी आ रही है। इसके लिए योग, ध्यान (मेडिटेशन) और प्राणायाम का दैनिक अवलोकन का हिस्सा। इससे मानसिक शांति और साहस बढ़ता है। स्क्रीन और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग सीमित करें। इसके बजाय परिवार, दोस्तों और प्रकृति के साथ वास्तविक समय जोड़ें। डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है। यदि मन शांत रहेगा तो भौतिकता की अंधी दौड़ में पड़ कर प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और स्वयं तथा आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित कर सकेगा। यह समय है उन वैदिक मूल्यों की ओर जाने की जहां प्रकृति एवं पृथ्वी के संरक्षण के साथ मानव व्यवहार में आने वाले नकारात्मक परिवर्तनों को रोकने के उपाय सुझाए गए हैं। जरूरत है कि वैदिक ग्रंथों को मात्र धार्मिक ग्रंथों के रूप में देखने के बजाए जीवन रक्षक मूल्यों के रूप में देखने की। मौसम के पैटर्न और मानव स्वभाव में परिवर्तन को सुधारने कोई परग्रहवासी नहीं आएगा, इसे हमें ही सुधारना होगा।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 27.05.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, May 26, 2026

पुस्तक समीक्षा | छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
छः समीक्षात्मक वैचारिक द्वारों से गुज़रती एक कहानी “हरा पत्ता”
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - हरा पत्ता - उर्मिला शिरीष की कहानी
सम्पादक - हरि भटनागर, बृजनारायण शर्मा
प्रकाशक - रचना समय, 197, सेक्टर-बी, सर्वधर्म कॉलोनी, कोलार रोड भोपाल - 462042 (मध्यप्रदेश)
मूल्य - 100/-
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हिंदी साहित्य जगत अथवा हिंदी साहित्य से संबंधित पत्रिकाओं में ऐसी उदारता कम ही देखने को मिलती है जब किसी रचनाकार की किसी एक रचना को केंद्र में रखकर पूरी एक पुस्तिका प्रकाशित की जाए। मेरे संज्ञान में यह किसी भी पत्रिका का पहला अवदान है कि एक पुस्तिका जिसमें सिर्फ एक कहानी पर सामग्री केंद्रित रखी गई हो, अन्यथा किसी रचनाकार के समग्र साहित्य अथवा किसी एक संग्रह पर पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। वरिष्ठ कथाकार एवं अनुभवी संपादक हरि भटनागर के संपादन में ‘‘रचना समय’’ ने वह पुस्तिका प्रकाशित की है जिसमें हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित कथाकार उर्मिला शिरीष की एक चर्चित कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ पर समीक्षात्मक  लेखों सहित कहानी को प्रकाशित किया गया है। यह कहानी पूर्व में मैं उर्मिला शिरीष के कहानी संग्रह में पढ़ चुकी हूं इसीलिए जब ‘‘रचना समय’’ की यह पुस्तिका मेरे हाथों में आई तो मुझे सुखद लगा क्योंकि यह कहानी मुझे भी उस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी लगी थी। यह एक ऐसी कहानी है जो पाठक का ध्यान अपनी ओर न केवल आकर्षित करती है बल्कि देर तक सोचने को विवश करती है। “उस बहार का इंतज़ार” कहानी संग्रह की चौथी कहानी है “हरा पत्ता”। उर्मिला शिरीष के 11 कहानियों के संग्रह की समीक्षा करते समय मैंने कहानी “हरा पत्ता” के संबंध में लिखा था- “यह कहानी विदेश में बस गए बेटे-बेटियों के पास जाने के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद का खुलासा करती है। एक मायावी संजाल ही तो है ग्रीन कार्ड, जिसके मोह से बाहर निकलना कठिन है, लेकिन जिसकी वास्तविकता समझने के बाद धुंधला पड़ने लगता है मोह और तब शुरू होता है एक गाढ़ा अंतर्द्वंद। विदेश में बसी संतानों के पास जाने के लिए स्वर्ग द्वार के समान ग्रीन कार्ड पाने का मोह छोड़ना क्या संभव है? यह कहानी मनष्चेतना की आंखें खोलती है और एक नई संभावना सामने रखती है।”
“यह पुस्तिका” शीर्षक से संपादक हरि भटनागर ने लिखा है तोलस्तोय की एक कहानी है “हाऊ मच लैंड डज़ ए मेन नीड” की याद दिलाई है कि किस प्रकार एक इंसान जमीन पाने के लालच में दौड़ता चला जाता है और अंत में एक बड़ी जमीन उसके हिस्से में आती है किन्तु इसके साथ ही वह थक कर मर चुका होता है। हरि भटनागर कहा है कि लालच की इस अंतहीन दौड़ में एक ठहराव आना ही चाहिए और यही तो कहानी ‘हरा पत्ता’’ का आग्रह है।
जैसा कि मैंने पहले ही उद्धृत किया कि इस पुस्तिका में एक कहानी है और उस कहानी पर छः साहित्यकारों के विचार हैं जिनसे कहानी के प्रत्येक पक्ष पर भरपूर प्रकाश पड़ता है। क्रमवार सबसे पहले कहानी है, उसके बाद उससे संबंधित 6 लेख इस प्रकार हैं- उर्मिला शिरीष की कहानी: हरे पत्ते का यथार्थ - सूरज पालीवाल, एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी: हरा पत्ता - अरुण होता, हरा पत्ता: कहानी को इस तरह ‘‘देखिए’’ - सुधांशु गुप्त, ग्लोबलाइज़ेशन द्वारा रचे गये यथार्थ के, प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता - हरियश राय, समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक - प्रज्ञा, घर छूटने से मुरझाया: हरा पत्ता - अंकित नरवाल।
कहानी हरा पत्ता उस बुजुर्ग दंपति की कथा है जिसने बड़ी मेहनत और आशाओं के साथ अपनी संतान को पाल-पोसकर इस योग्य बनाया कि वह विदेश में जाकर नौकरी कर सके तथा वहां सुखपूर्वक रह सके। संतान ने भी सोचा कि उसके माता-पिता उसके पास आकर रहें और उसके साथ विदेश में ही बस जाएं। यहीं से शुरू होता है हरे पत्ते का खेल। हरा पत्ता यानी “ग्रीन कार्ड” जो कि विदेश में बसने के लिए जरूरी है। लंबी-चौड़ी लिखा-पढ़ी, जांच-पड़ताल और एंबेसी के धक्के खाने के बाद आखिर वह दिन आ जाता है जब ग्रीन कार्ड पानी के लिए अंतिम औपचारिकता निभाई जाने वाली रहती है। यह औपचारिकता भी आसान नहीं है। वृद्ध पिता लंबी कतार में प्रतीक्षा करते हुए चिंतन करता है और उसके मन में प्रश्न उठता है कि वह अपना देश छोड़कर हमेशा के लिए विदेश जाने का जो कदम उठा रहा है क्या वह उचित है अथवा नहीं? एक मंथन, पत्नी द्वारा एक प्रतिरोध, बच्चों के रूठ जाने का भय इन सब से पार पाना आसान नहीं था। कहानी का अंत चौंकाता है और पढ़ने वाले के मन में अनेक विचार चस्पा करता हुआ अपने क्लाइमेक्स पर पहुंचता है। इस कहानी के पात्र मेच्योर हैं विचारशील है और  उनमें जिंदगी की गहरी समझ है। लेखिका ने जिस प्रकार एक लंबे संघर्ष और एक गहरे अंतर्द्वंद्व के बाद जिस प्रकार निर्णय तक पहुंचा है वह रोचकता से भरा हुआ है। पाठक जिज्ञास होकर सोचता है कि अब यह लोग क्या करेंगे? प्रश्न विकट है। निर्णय के लिए वह मानसिक कठोरता आवश्यक है जो एक झटके से उभरती है और बहुत कुछ कह जाती है।
सूरज पालीवाल ने अपने लेख “हरे पत्ते का यथार्थ”  लिखते हुए इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है कि हमारी अर्थव्यवस्था पाश्चात्य अर्थव्यवस्था के मुकाबले कितनी कमजोर है। इसी कहानी से उदाहरण देते हुए स्मरण कराया है जब विदेश में बसी संतान अपने पिता के पास पैसे भेजते थे तो नोटों की गड्डियों से उनके हाथ भर जाते थे जबकि अपने देश में बेरोजगारी का अंतहीन सिलसिला है। यही कारण है कि चाहे माता-पिता हो या संतान सभी को हरे पत्ते का यानी ग्रीन कार्ड का लालच आकर्षित करता है। पूरे परिवार का सुखद भविष्य उसमें प्रतिबिंब की भांति चमकता है। सूरज पालीवाल ने कहानी की सार्थकता को रेखांकित करते हुए यह लिखा है कि यह कहानी मात्र एक पिता का उद्घोष नहीं बल्कि डॉलर की व्यर्थता के यथार्थ को भी सामने रखती है।
“एक बहुआयामी और प्रासंगिक कहानी हरा पत्ता” - यह उद्घोष करते हुए अरुण होता ने कहानी को वैचारिक स्तर पर टटोला है। उन्होंने हरा पत्ता को एक सहज और स्वाभाविक कहानी ठहराया है जिसमें संवाद धर्मिता के साथ भाषाई सौंदर्य भी है। अरुण होता ने कहानी में दो संस्कृतियों की सामाजिक, आर्थिक एवं परिवेशगत भिन्नताओं को पूरी गंभीरता से लेखबद्ध करने को कहानी की विशेषता कहा है।
“हरा पत्ता कहानी को इस तरह देखिए” - यह सुधांशु गुप्त का आग्रह है। उन्होंने एक अलग ही दृष्टि से कहानी को खंगाला है। उन्होंने उदाहरण के लिए स्मरण दिलाया है मुंबई में आकर बसने वाले उन हजारों लोगों के बारे में जो गांव से लगाव तो रखते हैं किंतु एक बार मुंबई में बसने के बाद कभी गांव लौट कर नहीं जाते। अपने गांव की यादों के साथ वह महानगर भी उनका अपना हो जाता है। इसी प्रकार विदेश में बसने वाले अपने देश लौटने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन लौटने के नाम पर उनके पांव ठिठक जाते हैं। सुधांशु गुप्त ने कहानी के अंत को लेखिका की सदेच्छा के रूप में पाया है।
“ग्लोबलाइजेशन द्वारा रचे गए यथार्थ के प्रतिरोध की कहानी: हरा पत्ता” ठहराते हुए हरियश राय कहानी के कथानक में उभरे  द्वंद्व के लिए उस ग्लोबलाइजेशन को जिम्मेदार मानते हैं जो 1990 से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। हमारा देश भी उससे अछूता नहीं है। डॉलर के हाथों गिरवी रखे रूपयों के समान बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास गिरवी युवाओं का जीवन मुक्त होने के लिए छटपटाता है लेकिन साथ ही उन्हें अपने बंधन से मोह भी होने लगता है। इसी प्रकार अपने देश में छूट गए वृद्ध माता-पिता के समक्ष भी एक द्वंद्व खड़ा रहता है। जिसमें एक ओर उनकी संतान है जो विदेश में बस गई है और उन्हें अपने पास रहने को आमंत्रित कर रही है और दूसरी ओर उनका अपना देश है जहां उनकी अपनी संस्कृति, अपने लोग और अपनी चिरपरिचित समस्याएं हैं। दोनों के बीच चुनाव करने की स्थिति बहुत कठिन है। इस कठिनाई को पार करते हुए देखकर हरियश राय इस ग्लोबलाइजेशन के विरुद्ध प्रतिरोध की कहानी मानते हैं।
“समृद्धि के बंजर से स्वत्व के अंकुरण तक” शीर्षक से प्रज्ञा ने कहानी के यथार्थ को एक मजबूत धरातल ठहराया है। उन्होंने भौतिकवाद में जकड़ते जा रहे भारतीय समाज की दशा की ओर भी इंगित किया है। उन्होंने कथाकार कि उसे सचेत दृष्टि की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है जो देसी विस्थापन और ग्लोबल विस्थापन के बीच सरकार होती घबराई हुई दुनिया का दृश्य रचती है। यही वर्तमान का यथार्थ है। प्रज्ञा के अनुसार यह कहानी विकास की अंधी दौड़ के बीच एक वैकल्पिक रास्ता सुझाती है।
“घर छूटने से मुरझाया हरा पत्ता” अंकित नरवाल इन शब्दों के साथ हमेशा के लिए देश छोड़ने और ग्रीन कार्ड धारक बनाकर विदेश में बस जाने को लेकर अपने देश के प्रति जगे हुए मुंह से उपजे वैचारिक ऊहापोह को इस कहानी का केंद्र मानते हैं। पहले बच्चे विदेश जाकर अपने लिए जमीन तलाश करते हैं और फिर उसे खाली जमीन में अपनापन भरने के लिए अपने माता-पिता को भी अपने पास बुला लेना चाहते हैं लेकिन क्या माता-पिता के लिए अपनी जड़ों से कट कर जाना इतना आसान है? इसीलिए अंकित नरवाल कहानी “हरा पत्ता” को तय शुदा अंत वाली कहानी परंपरा का अंत करने वाली कहानी निरूपित किया है।
उर्मिला शिरीष एक सशक्त कहानीकार हैं। उनकी कहानी ‘‘हरा पत्ता’’ ग्रीन कार्ड के संदर्भ में  वर्तमान सामाजिक संकट को बहुत गहराई से रेखांकित करती है और यह पुस्तिका जिसमें इस कहानी पर 6 विद्वानों के विचार संकलित किए गए हैं अपने आप में कहानी पर समग्र समीक्षात्मक कलेवर प्रस्तुत करते हैं। ‘‘रचना समय’’ तथा उसके संपादक हरि भटनागर, बृज नारायण शर्मा तथा उप संपादक सौमित्र बधाई के पात्र हैं जिन्होंने एक महत्वपूर्ण कहानी को पाठकों के चिंतन-मनन के लिए सामने रखते हुए समीक्षात्मक लेखों सहित एक पुस्तिका के रूप में प्रस्तुत किया है। यह हिंदी साहित्य में एक अच्छी पहल है जिसे सतत जारी रहना चाहिए।
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Thursday, May 21, 2026

बतकाव बिन्ना की | जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जा मैंगाई सो अबई से लूघरा छुबान लगी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘सुनियों तनक ठंडो पानी पिलइयोे!’’ भैयाजी कऊं बायरे से आए। पसीना में भींजे भए दिखा रए हते। बेर-बेर अपनो माथा गमछा से पोंछत जा रए हते।
‘‘कां से आ रए भैयाजी?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे का बताएं, बजार गए रए। बेजा गरमी पर रई। रामधई, भुंटा से भुन गए।’’ भैया जी अकुलाने से बोले।
‘‘हऔ गरमी सो खीब जम के पर रई। कल अपने करीब 46 डिग्री रओ औ उते खजुराहो में 47 लौं पोंच गओ। आगी से बर रई बायरे तो।’’ मैंने कई।
‘‘जेई से तो हमने कई रई के अबे ने जाओ संझा खों ले आइयो। ऐसो कोनऊं जरूरी को सामान ने हतो।’’ भौजी भैयाजी खों पानी को गिलास पकरात भईं बोलीं। फेर मोंसे पूंछी,‘‘तुमें पीने?’’
‘‘नईं, अबई तो पियो रओ।’’ मैंने कई।
‘‘इत्ती देर घाम में फिरत रए औ जे का ले आए इत्तो सो?’’ भौजी ने थैलिया उठात भए पूंछी।
‘‘अब तुमई देख लेओ।’’ भैयाजी बोले। ठंडो पानी पी के उने तनक सहूरी सी लगी हती।
‘‘जे का? जे इत्ती सी भिंडी, दो ठइयां करेला? बस? औ धना तो ले न पाओ हुइए आपने। जबके बे ओरें कोनऊं मूफत-वूफत में नईं देत आएं। बे तो सब्जी में पैले से धना के पइसा जोछ़े रैत आएं।’’ भौजी ने भैयाजी से कई।
‘‘अरे अब कोनऊं नहीं दे रओ धना-मना। हमने तो ऊसे कई रई, मनो बा बोलो के धना सोई मैंगी हो गई सा अब हम ने दे पाबी। खरीदने होए सो खरीद लेओ।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हऔ खरीद लेओ।’’ भौजीे मों बनात भईं बोली,‘‘ हम तो होते तो ऊसे कैते के हऔ हम धना खरीद लेत आएं मनो तुम सबई सब्जियन पांच-पांच रुपइया कम करो। औ जे इत्ती सी सब्जी को का हुइए? जे दोई सब्जियां बनात में पुचक जात आएं। चटनी घांई खाने परहे।’’ भौजी बोलीे।
‘‘अब चटनी खाबे के दिन आ गए समझो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का मतलब?’’भौजी ने करेला खों उलट-पटल के देखत भईं पूंछी।
‘‘मतलब जे के अब तो थैलिया भर के पइसा ले जाओ औ मुठिया भर के सब्जी लाओ। जे हो रओ। सबई सब्जियन के दाम बढ़ गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रै भैयाजी!’’ काल मैंने र्सोअ फतकुली के दाम पूछे औ पलट के मोए कैने परो के नईं भैया रैन देओ। तुम तो जोन कछू कम की होए सो बताओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘उते सब्जी वारे के इते हमाओ एक दोस्त मिलो रओ बा बता रओ तो के अब तो होअलन में भी सब्जी रोटी के दाम बढ़ गए। बा अबे बी मोबाईल से पइसा नईं देत। ऊसे बनत नइयां। सो बा जित्ते नोट ले के परों अपनी फैमिली को होटल में खबावे खों ले गओ रओ, उत्ते नोट कम पर गए। बा तो ऊको मोड़ा मोबाईल से पइसा देबो जानत आए औ ऊके मोबाईल में पइसा हते सो ऊने बाकी पइसा मोबाइल से दे दए ने तो उन ओरन की बड़ी फजीयत होती।’’भैयाजी ने बताई।
‘‘तेल तो ऊंसई कम खा रए। तलो-फुलो बनाबो छोड़ दओ, का अब साग-भाजी खाबो बी छोड़ने परहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, बे चाए हवाई जाहज में उड़े, बे चाए दावतें करें, बे चाए दौरा में फूंके, मनो पब्लिक खों ने तो तेल खाने, ने तो गाड़ी पे चलने औ ने सोनो खरीदने। अब औ का-का छोरने परहे बा औ बता देते संगे। तुमें पतो के जे दो ठइया करेला कितेक में आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘आए हुइएं बीस रुपइया में।’’ भौजी अटकल लगात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, का धरे बीस रुपइया में? जे दो ठइया करेला साठ रुपइया के आएं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘हे माई! इत्ते मैंगे? सो काए खों ले आए? कछू दूसरो ले आउते।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का ले आते? सबई तो मैंगी हो गईं। मनो बे ओरें बी का करें? उने बी तो मंडी से बजरिया लौं लाबे में गाड़ी को खर्चा लगत आए। औ गाड़ी को किराया सोई बढ़ गओ आए। गरीब खा खाए, का पैने औ का ओढ़े?’’भैयाजी बोले।
‘‘काए गरीबन के लाने बा मुतकी योजनाएं सो चल रईं। जे लच्छमी बा लच्छमी। मुफत को तो बंाट रई सरकार। बा नईं दिखा रओ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो का? उने का सामान ने खरीने परहे? जोन मिलत आए, बा बी पूरो ने परहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘एक बेर कोरोना में मुतके निपट गए औ अब जे मैंगाई लील जैहे। कोनऊं से जुट्ट बना के जे नईं दबाव डारत बन रओ के लड़ाई खतम करी जाए। बे लड़-मर रए औ संगे अपन सोई निपटाए जा रए।’’ भैयाजी फिर के भड़कत भए बोले।
भैया खों भड़कबो सई हतो, काए से के जोन को तीस रुपइया में एक ठो करेला खरीदने परहे बा तो भड़कहे ई। मोए सोई लगत आए के जे जो मैंगाई ऐसई बढ़त रई तो का हुइए?
‘‘भैयाजी, मोए जे बताओ के डीजल औ पेट््रोल बचाबे के लाने सायकिल पे चलबे की फोटुएं छप रईं। जबके सई तो जा आए के पब्लिक के पास अब सायकिल रैती कां आए? गांव दो किलोमीटर से बारा किलोमीटर लौं पसर गए। सहर बीस-तीस किलोमीटर लौं फैलत चले गए। औ पांछू कछू दिनां से तो जेई चलन बन परी के कालोनी इते बनाओ तो बसस्टेंड उते सहर से बायरे बनाओ। अब सायकिल ने तो पैदल कोऊ कैसे जा पा रओ। ऊपे से आदत लौं नई रई। फेर तुमके घर ऐसे आंए जीमें बच्चा सबरे बायरे दूसरे सहर, ने तो दूसरे देस चले गए कमाबे के लाने औ घरे बुड्ढा-बुड्ढी रै रए। बे का करहें?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘तुम तो उन ओरन की सोंस रईं, अब तो जे कए रै के इत्ते करै घाम में सायकिल चलाबो ने तो पैदत चलबो का आसान आए? पेड़ सो पैलई सबरे कटा दए गए। मूंड़ पे छायरी लौं ने बची।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो जे बी तो कै कए रए के गाड़ी में एक-दूसरे के संगे चलो।’’ मैंने याद कराई।
‘‘कोऊ कोनऊं खों संगे नईं ले जा रओ। फेर अपने इते के लोग इत्ते साजे बी नोंई के एक दिनां एक पेट््रल भरा ले औ दूसरे दिन दूसरो। बे कैने लगहंे के हमाई सो कड़की चल रई। औ दोई दिनो में जा अपनी गैल, बा अपनी गैल।  
‘‘रामधई बिन्ना, जे मैंगाई तो लूघरा छुबान लगी। आगे का हुइए? मोरो तो सोचई के जी घबरान लगो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ने घबड़ाओ भौजी। एक तो ऊंसई गरमी पर रई, ऊमें तुम ने अपनी तबीयत बिगार लई तो बड़ी सल्ल बींध जैहे।’’ मैंने भौजी खों समझाई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के जे मैंगाई चुनाव से पैले काए ने बढ़ी जबके लड़ाई तो पैले से चल रई हती?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, May 20, 2026

चर्चा प्लस | अब जरूरी है आमजन को जलवायु परिवर्तन के बारे में शिक्षित करना | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
अब जरूरी है आमजन को जलवायु परिवर्तन के बारे में शिक्षित करना       
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
     मौसम में अनियमितताएँ, नई बीमारियों का फैलना, बदलते मौसमी चक्रों का अनाज उत्पादन पर बुरा असर, इंसानों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में बदलाव आदि कुछ ऐसे संकेत हैं जो मानव जीवन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से होने वाले खतरों के प्रति आगाह कर रहे हैं। इसके बावजूद, आम नागरिक अभी भी जलवायु परिवर्तन के बारे में सोचते भी नहीं हैं, क्योंकि उन्हें जलवायु परिवर्तन और इसके खतरनाक प्रभावों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसलिए, आम नागरिकों के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़ी साक्षरता सुनिश्चित करना ज़रूरी है।
पर्यावरण के सभी हिस्सों में से, जलवायु का मानव जीवन पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है। क्योंकि जलवायु का इंसानों के पहनावे, खाने-पीने की आदतों, जीवनशैली और जन-स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत में कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और जलवायु में होने वाले बदलावों से सबसे ज़्यादा प्रभावित होती है। जलवायु हमारे जीवन के लगभग हर पहलू पर असर डालती है - हमारे भोजन के स्रोतों से लेकर हमारे परिवहन के बुनियादी ढांचे तक, हम कैसे कपड़े पहनते हैं, और हम छुट्टियों पर कहाँ जाते हैं, इन सभी पर। इसका हमारी आजीविका, हमारे स्वास्थ्य और हमारे भविष्य पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। जलवायु किसी खास जगह पर मौसम की स्थितियों का लंबे समय तक बना रहने वाला पैटर्न है। इसके अलावा, जलवायु प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई मानवीय गतिविधियों जैसे उद्योग, व्यापार, परिवहन और संचार प्रणाली आदि पर भी असर डालती है।

जलवायु परिवर्तन में इतनी शक्ति है कि यह लोगों के जीवन को तबाह भी कर सकता है और बेहतर भी बना सकता है। समय-समय पर इसके प्रभावों के बारे में कई भविष्यवाणियाँ की गई हैं। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों पर 2018 की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन भूख और विस्थापन का एक मुख्य कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2030 और 2050 के बीच, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले कुपोषण, मलेरिया, दस्त और बढ़ती गर्मी की वजह से होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि होगी। कई कॉर्पाेरेट संस्थानों, अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों आदि ने लोगों के बीच जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता पैदा करने की पहल की है। इन सबके बावजूद, जिस गति से काम होना चाहिए, उस गति से काम नहीं हो रहा है। सरकारी प्रयासों में गरीबी उन्मूलन, स्वच्छता, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों को प्राथमिकता दी जा रही है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रयासों की कमी के कारण ही केरल में बाढ़ आई थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभाव भारत सहित कई विकासशील देशों पर ज़्यादा पड़ेंगे। विश्व बैंक का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन अगले तीस वर्षों में भारत के सकल घरेलू उत्पाद  को 2.8 प्रतिशत तक कम कर देगा, और देश की लगभग आधी आबादी के जीवन स्तर में गिरावट का कारण बनेगा। इस संदर्भ में, स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या वे लोग जो जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने की संभावना रखते हैं, इसके बुरे प्रभावों के बारे में जागरूक हैं? क्या उन्हें पता है कि यह बदलाव उनके स्वास्थ्य, आजीविका, उनके परिवारों और समुदायों के जीवन पर किस तरह असर डालने वाला है?

     यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन यह पूरी तरह से असंभव नहीं है। जब मिलकर प्रयास किए जाते हैं, तो ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकता है। इसके लिए, व्यक्तियों और सरकारों, दोनों को ही इसे हासिल करने की दिशा में कदम उठाने होंगे। हमें ग्रीनहाउस गैसों को कम करने से शुरुआत करनी चाहिए। इसके अलावा, उन्हें पेट्रोल की खपत पर भी नज़र रखनी चाहिए। हाइब्रिड कार का इस्तेमाल शुरू करें और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करें। साथ ही, नागरिक सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल कर सकते हैं या मिलकर कारपूल कर सकते हैं। इसके बाद, रीसाइक्लिंग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब आप खरीदारी करने जाएं, तो अपना कपड़े का थैला साथ ले जाएं। आप एक और कदम उठा सकते हैं, वह है बिजली का इस्तेमाल सीमित करना, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन रुकेगा। सरकार की ओर से, उन्हें औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण रखना चाहिए और उन्हें हवा में हानिकारक गैसें छोड़ने से रोकना चाहिए। पेड़ों की कटाई तुरंत बंद होनी चाहिए और पेड़ लगाने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। संक्षेप में, हम सभी को यह समझना चाहिए कि हमारी पृथ्वी की हालत ठीक नहीं है। इसे इलाज की ज़रूरत है और हम इसे ठीक करने में मदद कर सकते हैं। आज की पीढ़ी को ग्लोबल वार्मिंग को रोकने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कष्ट न उठाना पड़े। इसलिए, हर छोटा कदमकृचाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, बहुत मायने रखता है और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में काफी महत्वपूर्ण है।
हालाँकि, हमारे देश ने हमेशा जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता दिखाते हुए वैश्विक स्तर पर पहल की है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों के साथ मिलकर ‘‘लाइफ़’’ नाम से एक आंदोलन शुरू किया, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर अपनाए जा रहे बेहतरीन तरीकों को बढ़ावा देकर लोगों और समुदायों के बीच जलवायु- अनुकूल व्यवहार परिवर्तन के समाधानों को बढ़ावा देना है। ‘‘लाइफ़’’ अभियान का यह विचार भारत के प्रधानमंत्री ने 2021 में ग्लासगो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 2026 के दौरान प्रस्तुत किया था। इसके तहत, पर्यावरण के प्रति जागरूक जीवनशैली को बढ़ावा देने के उपायों का विस्तार किया जाएगा और संसाधनों की अंधाधुंध खपत और बर्बादी के बजाय संसाधनों के सावधानीपूर्वक और विवेकपूर्ण उपयोग पर ज़ोर दिया जाएगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘‘लाइफ़’’ का विज़न एक ऐसी जीवनशैली अपनाना है जो हमारे ग्रह के साथ सामंजस्य में हो और उसे कोई नुकसान न पहुँचाए। जो लोग ऐसी जीवनशैली अपनाते हैं, उन्हें ‘‘ग्रह-अनुकूल लोगों’’ का दर्जा दिया जाता है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘‘मिशन लाईफ अतीत से प्रेरणा लेकर और वर्तमान में कार्रवाई करके भविष्य पर ध्यान केंद्रित करता है। ‘‘कम करना, दोबारा इस्तेमाल करना और रीसायकल करना’’  हमारे जीवन के मूल सिद्धांत हैं। चक्रीय अर्थव्यवस्था हमारी संस्कृति का केंद्र है, और भारत का वन क्षेत्र बढ़ रहा है; साथ ही शेर, बाघ, तेंदुए, हाथी और गैंडों की आबादी भी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि स्थापित बिजली क्षमता का 40प्रतिशत तक हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन-आधारित स्रोतों से आ सकता है। अपने लक्ष्य तक पहुँचने की भारत की प्रतिबद्धता निर्धारित समय से नौ साल पहले ही पूरी हो गई है।’’

जहां तक मेरा व्यक्तिगत विचार हैं तो मैं चाहती हूँ कि हम अपनी अगली पीढ़ी को एक स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी सौंपें, ताकि पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनी रहे। भारतीय संस्कृति ‘‘वसुधैव कुटुंबकम’’ की विचारधारा पर आधारित है, यानी पूरी पृथ्वी ही हमारा परिवार है। मैं हमेशा अपने प्राचीन ग्रंथों से उन सांस्कृतिक मूल्यों को चुनकर लोगों को याद दिलाने की कोशिश करती हूँ, जिनमें पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संरक्षण का ज़िक्र है। हमारी भारतीय संस्कृति दुनिया की दूसरी सभ्यताओं के मुकाबले प्रकृति के प्रति ज़्यादा विचारशील रही है। आज भी, हम सब कुछ सही करना चाहते हैं, लेकिन उसे सही ढंग से कर नहीं पाते। मैं आपको अपने ही एक फ़ैसले का उदाहरण देकर यह बात समझाती हूँ। यह फ़ैसला लेते समय मुझे दुख हुआ, लेकिन मैं मजबूर थी। तब मैंने खुद को दिलासा दिया कि जब भी मुझे मौका मिलेगा, मैं अपना फ़ैसला बदल लूँगी। फिर भी, मन में एक कसक सी रह गई है।
हुआ यूँ कि मैंने एक स्कूटर खरीदने का फ़ैसला किया। मैं एक इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदना चाहती थी। इस तरह मैं जीवाश्म ईंधन की बर्बादी से बच सकता था और पर्यावरण को भी जीवाश्म ईंधन से होने वाले प्रदूषण से बचा सकता था। जब मैंने इलेक्ट्रिक स्कूटरों के बारे में पूछताछ शुरू की, तो मुझे पता चला कि जहाँ पेट्रोल से चलने वाले स्कूटर 1 लाख रुपये तक में मिल रहे थे, वहीं इलेक्ट्रिक स्कूटरों की शुरुआती कीमत ही 1.5 लाख रुपये थी। अगर किसी अच्छी कंपनी के इलेक्ट्रिक स्कूटर में लगी बैटरी को पाँच साल बाद बदलना पड़े, तो उसमें 25-30 हज़ार रुपये का खर्च आएगा। अच्छी बात यह थी कि बिजली का खर्च पेट्रोल के खर्च से कम पड़ने वाला था। लेकिन मेरे शहर में उस समय चार्जिंग स्टेशन थे ही नहीं। अगर मैं घर पर स्कूटर चार्ज करना भूल जाऊँ और बीच रास्ते में ही ‘‘लो-बैटरी’’ का सिग्नल मिलने लगे, तो मैं कहाँ जाऊँगी और उसे कैसे चार्ज करूँगी? क्या मुझे किसी के दरवाज़े पर जाकर उनसे यह गुज़ारिश करनी पड़ेगी कि वे मुझे अपना स्कूटर चार्ज करने दें? या फिर मुझे अपने स्कूटर को वहाँ से किसी दूसरे वाहन पर लादकर ले जाने का इंतज़ाम करना पड़ेगा। यह एक बहुत ही व्यावहारिक बात है। स्कूटर बेचने वाले लोग इस बारे में बात करना बिल्कुल पसंद नहीं करते। अगर हम फिर भी उनसे इस बारे में बात करते हैं, तो वे हँसकर कहते हैं कि ‘‘यह एक छोटा शहर है, यहाँ ऐसी कोई समस्या कभी पैदा नहीं होगी।’’ ज़ाहिर है, अगर घर से निकलने से पहले कार को पूरी तरह चार्ज कर लिया जाए, तो ऐसी कोई दिक्कत नहीं आएगी। हर समय इतना ज़्यादा चौकन्ना रहने की ज़रूरत नहीं है। यहाँ मैं किसी भी ईवी बनाने वाली कंपनी, किसी ईवी एजेंसी या उनके सेल्सपर्सन पर कोई इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहती। इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। वे भी ईवी के पक्ष में हैं, ताकि सड़कों पर प्रदूषण-मुक्त गाड़ियाँ चल सकें। अगर कोई गलती है, तो वह हमारे सिस्टम की धीमी रफ़्तार है। जिस तेज़ी से बाज़ार में ईवी गाड़ियाँ उतारी गई हैं, उस तेज़ी से चार्जिंग स्टेशन नहीं बनाए गए हैं। मेरे शहर जैसे छोटे शहरों में एक-दो साल पहले तक कोई चार्जिंग स्टेशन नहीं था। गाँवों में चार्जिंग स्टेशन लगाने में अभी भी काफ़ी समय लगेगा। 

मैंने व्यावहारिक रूप से सोचा और अपने लिए एक पेट्रोल से चलने वाला स्कूटर खरीद लिया। इसे खरीदते समय मुझे ऐसा लगा, जैसे मैं अपने सिद्धांतों को तोड़ रही हूँ। जैसे मैं कोई अपराध कर रही हूँ। लेकिन मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। गाड़ी चाहे कोई भी हो, दिन या रात में किसी भी समय उसकी ज़रूरत पड़ सकती है। 

इन सब बातों का मतलब यह है कि हम जलवायु परिवर्तन की जिस तेज़ी से हो रहा है, और हम जिस उत्साह से उसकी रफ़्तार धीमी करना चाहते हैं, उन दोनों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को कम करने के लिए हमें अपने प्रयासों में व्यावहारिक रूप से तेज़ी लाने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी जिस चीज़ की कमी है, वह है आम लोगों के बीच पर्याप्त जागरूकता लाना। जब तक हर नागरिक जलवायु संरक्षण के बारे में जागरूक नहीं होगा, तब तक सभी प्रयासों की गति धीमी ही रहेगी। अब वह समय आ गया है, जब आम लोगों को यह पता होना चाहिए कि यदि ध्रुवों पर मौजूद ग्लेशियर तेज़ी से पिघलते हैं, तो इसका असर हर इंसान, हर जानवर और हर पौधे पर पड़ता है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 20.05.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, May 19, 2026

बोध कथा | पहले मन को करो चंगा - शरद सिंह | नया हिन्दुस्तान


आज "नया हिन्दुस्तान" समाचारपत्र में ...

हार्दिक आभार नया हिन्दुस्तान एवं सामयिक प्रकाशन 🙏

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बोध कथा | पहले मन को करो चंगा

- शरद सिंह

गुरु नानक देव किशोरावस्था में संतों की सेवा करते समय खाना-पीना तक भूल जाते थे। इससे उनकी सेहत गिरने लगी। वे दुबले हो गए। पुत्र की ऐसी दशा देख कर उनके पिता ने गांव के सबसे योग्य वैद्य हरिदास को बुलाया।

     वैद्य गुरु नानक देव की नाड़ी देखने लगे। जब उन्होंने वैद्य से पूछा कि वह क्या कर रहे हैं, तो वैद्य ने जवाब दिया कि वे उनकी नाड़ी की गति से उनके रोग का पता लगा लगा रहे हैं। इससे उनका सही इलाज हो सकेगा। नानक साहब ने वैद्य से कहा कि उनका शरीर बीमार नहीं है। हां, अगर उनका मन बीमार हो, तो क्या वे उसका इलाज कर देंगे? वैद्य उनकी बात समझ नहीं पाया और उन्हें फटी हुई आंखों से देखने लगा। यह देख गुरु नानक ने वैद्य से कहा कि पहले वे अपने तन-मन का इलाज करें।

     यह सुन कर वैद्य ने गुरु नानक से कहा कि वे यह क्या कह रहे हैं। उन्हें तो कोई बीमारी नहीं है। वे तो एकदम स्वस्थ और प्रसन्न हैं। उन्हें लगा कि ऐसा कहकर बालक नानक उनका अपमान कर रहे हैं।

     गुरु नानक देव ने शांत स्वर में फिर कहा, 'वैद्यजी, आप अत्यंत गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं।'

बताओ 'मैं, और गंभीर बीमारी से पीड़ित हूं? यह तुम क्या कह रहे हो?' वैद्य को क्रोध आ गया। 'मैं सच कह रहा हूं।' गुरु नानक देव ने कहा। 'ऐसा है, तो कि मुझे कौन-सी बीमारी है?' वैद्य ने पूछा।

'वैद्यजी, आपको जन्म और मृत्यु की चिंता की बीमारी है। जन्म और मृत्यु की चिंता से बड़ी बीमारी इस दुनिया में दूसरी नहीं है। इस बीमारी का इलाज नब्ज देख कर नहीं किया जा सकता है। इस बीमारी को दूर करने की औषधि भी आपके औषधि विज्ञान के पास नहीं है।' गुरु नानक देव ने कहा।

वैद्य उनकी तरफ देखने लगे। गुरु नानक ने वैद्य से कहा, 'मन स्वस्थ हो, तो तन की बीमारी शीघ्र दूर हो सकती है, किंतु यदि मन अस्वस्थ है, तो तन की बीमारी लाख उपाय करने पर भी दूर नहीं की जा सकती। मन की बीमारी मृत्यु के भय से पैदा होती है और मृत्यु होने के भय से ही बढ़ती जाती है। यह भय ईश्वर रूपी चिकित्सक की शरण में जाने पर ही दूर हो सकता है।'

गुरु नानक देव की बात सुन कर वैद्य हरिदास की आंखें खुल गईं। उसे अपनी नासमझी पर लज्जा आई। उन्होंने उनके पिता से कहा, 'भाई मेहता कालू, आपका पुत्र सच कह रहा है कि मुझे तन की बीमारी दूर करने का ज्ञान तो है, किंतु मन की बीमारी दूर करने का ज्ञान नहीं है। आपको अपने पुत्र के विषय में चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह बीमार नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रेम में डूबा हुआ है। यह तन और मन दोनों की बीमारी का इलाज है।' इसके बाद पिता मेहता कालूराय अपने पुत्र गुरु नानक देव के भक्तिपूर्ण व्यवहार के प्रति चिंतित होने के बदले गर्व का अनुभव करने लगे।

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(साभारः 'श्रेष्ठ सिख कथाएं', सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली)


पुस्तक समीक्षा | नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
नैराश्य के अंधेरे में आशा का दीप जलाने का आह्वान 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - एक दीप और जलाना
कवि      - बद्रीलाल ‘दिव्य’
प्रकाशक - साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर
मूल्य - 200/- 
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आज मानव समाज के सामने सबसे बड़ा संकट है बाजारवाद का और बाजारवाद की मूल प्रवृत्ति होती है मनुष्य के भीतर भौतिक वस्तुओं को पाने की अदम्य में लालसा को जगा देना। जब मनुष्य ‘‘और-और-और’’ पाने की लालसा के शिकंजे में फंस जाता है तो फिर उसे गलत और सही में अंतर दिखाई देना बंद हो जाता है। फिर ठीक यहीं से भ्रष्टाचार का आरंभ होता है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति ने व्यवस्थाओं को दीमक की तरह धीरे-धीरे खोखला कर दिया है। यदि एक स्थान से भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास किया जाए तो दूसरे स्थान पर उसकी लकीरें दिखाई देने लगते हैं। आज लगभग हर व्यक्ति अपनी सीमाओं को भूलकर दूसरे के हिस्से का सब कुछ हड़प कर जाना चाहता है। देखा जाए तो यह एक निराशाजनक स्थिति है। घोर निराशा के अंधकार में हर संवेदनशील व्यक्ति आशा की किरण देखना चाहता है। साहित्य की किसी भी विद्या से जुड़ा व्यक्ति संवेदनाओं से सरोकार रखता है और जो संवेदनाओं से सरोकार रखता है वह सदा मानव हित, जनकल्याण और देश की प्रगति के बारे में चिंतन मनन करता है। इसीलिए कवि अटल बिहारी वाजपेई ने तत्कालीन व्यवस्थाओं को चुनौती देते हुए ये पंक्तियां कही थीं-
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, 
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, 
गीत नया गाता हूं।

विपरीत परिस्थितियों में नए गीत गाने का हौसला उस कवि में बखूबी पाया जाता है जो दूसरों की पीड़ा से द्रवित होता है और देश में खुशहाली लाने की प्रबल इच्छा रखता है। कोटा राजस्थान के कवि बद्रीलाल मेहरा ‘दिव्य’ इसी प्रकार के कवि हैं जो अंधकार में आशा का दीप जलाकर प्रकाश बिखरने की अभिलाषा रखते हैं। उनका काव्य संग्रह “एक दीप और जलाना” निराशा से उपजी आशावादी कविताओं का संग्रह है। कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ मूलत: राजस्थानी उपभाषा के कवि हैं। किंतु हिंदी में भी उनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 

“एक दीप और जलाना” काव्य संग्रह में कुल 41 कविताएं हैं। संग्रह की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. (डॉ.) अनिता वर्मा ने लिखा है कि “कवि बद्री लाल ‘दिव्य’ ने अपनी अनुभूतियों के साथ जीवन के विविध रंग महसूस किए हैं, देखें है। उसकी चेतना का संसार अब व्यक्तिगत न होकर संसार का है। वह अपनी संवेदनाओं, दृष्टि की व्यापकता में सबको समाहित कर लेता है। यही सृजन की सार्थकता और सृजन का उद्देश्य है। प्रस्तुत कविताओं में जीवन के विविध रंग बिखरे पडे हुए हैं। जिनमें प्रेम, आत्ममंथन, द्वन्द्व, प्रकृति, पर्यावरण, आमजन, सभी को केन्द्र में रखकर कवि की चेतना का विस्तार विविध स्वरूपों व मनोभाव के साथ उद्घाटित हुआ है।”

   वहीं कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ ने अपने संग्रह की कविताओं के बारे में लिखा है कि ‘‘एक दीप और जलाना’’ मेरा आठवाँ काव्य संग्रह है। हम दीपावली पर लाखों दीप जलाते है लेकिन कभी-कभी एक छोटा-सा दीप उन दीपों की महत्ता में चार चांद लगा देता है। इस काव्यं संग्रह के लेखन के पीछे मेरा मूल उद्देश्य यही है कि देश में शान्ति और सद्भावना रूपी दीप जले ताकि देश में एकता स्थापित हो सके। भले ही देश में सत्य अहिंसा, भाईचारा, मानवता, आदि के लाखों दीप सजे हो, उनमें शान्ति और सद्भावों का एक दीप भी जरूरी है।” कवि की यह सद्भाव पूर्ण आकांक्षा उनके इस संग्रह का मूल तत्व है। संग्रह की पहली कविता ही इस बात का साक्क्ष्य प्रस्तुत करती है जिसका शीर्षक है “हम दीपक जलाएं”। यह कविता यद्यपि श्रीराम के आगमन की प्रसन्नता में दीपक जलाने का आह्वान करती है किंतु श्री राम का आगमन भी तो अंधकार में प्रकाश की उज्जवल किरणों के समान है। श्री राम भारतीय संस्कृति में आस्था विश्वास और दृढ़ निश्चय के प्रतीक है अन्याय के विरुद्ध न्याय की स्थापना के संवाहक हैं इसीलिए श्री राम के आगमन को सदा सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह के रूप में लिया जाता है। कवि ने लिखा है-
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ।
दीपक जलायें हम, गृह-मंदिर सजाएँ।।
राम जी का स्वागत, दौड़-दौड़ करेगें।
राम जी कृपालु भय, पीर सबकी हरेगें।।
भैया भरत मिलने को, रूदन मचाएँ।
मेरे राम आ रहे है, हम दीपक जलाएँ ।।

असत्य पर सत्य की विजय को स्थापित करके अयोध्या लौटने वाले श्रीराम, लक्ष्मण और सीता माता के स्वागत में आमजन द्वारा दीप जलने के क्रम में कवि ने कहा है कि “एक दीप और जलाना”। यह दीप उन सभी मूल्यों को स्थायित्व प्रदान करने की भावना का है जिससे मानव जीवन को उच्चता मिलती है। श्रेष्ठ मानव जीवन वही है जिसमें सहजता हो, सरलता हो, जीवन मूल्य हो और असीम संवेदनाएं हों। “एक दीप और जलाना” कविता में कवि दिव्य’ ने लिखा है कि-
सत्य, अहिंसा, मानवता के, 
चाहे लाखों दीप सजाना। 
मगर शान्ति-सद्भावों का, 
एक दीप और जलाना ।।

जिस प्रकार श्रीराम अन्याय के विरुद्ध न्याय की विजय का घोष करते हैं इस प्रकार पक्षियों का जीवन दासता से रहित उन्मुक्त जीवन का प्रतीक है। यदि मनुष्य स्वतंत्रता की अभिलाषा रखता है तो उसे सबसे पहले पक्षी का जीवन ही याद आता है। मनुष्य भी एक स्वतंत्र प्राणी है जिसने स्वयं के लिए अनंत श्रृंखलाओं की संरचना कर डाली। सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक जीन-जैक्स रूसो ने कहा था कि “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, लेकिन वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा रहता है।’’ यह जंजीरें मनुष्य ने स्वयं गढ़ी हैं और जब इन जंजीरों का कसाव बढ़ जाता है तो उससे मुक्त होने के लिए व्यक्ति छटपटाने लगता है क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्ति भी पक्षियों के सम्मान उन्मुक्तता की प्रवृत्ति है। “हम पंछी उन्मुक्त” शीर्षक कविता में कवि ने लिखा है-
प्राचीरों को तोड़ चले, 
हम पंछी उन्मुक्त है।
पिंजरे में कैद सभी हम, 
क्यों मानवता सुषुप्त है।।

व्यक्ति तभी स्वतंत्र रह सकता है जब वह अनुकूल वातावरण में जीवन जी रहा हो। ऐसा वातावरण जिसमें महंगाई की मार न हो, पूंजीपतियों के द्वारा लूट न हो, राजनीतिक छल कपट न हो और सामाजिक समानता हो तभी व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह पाती है। इसीलिए वर्तमान पर दृश्य को देखते हुए कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘यह कैसी आजादी’ में तर्जनी उठाई है-
नियम कानून सब टांगे खूंटी। 
जनता मंहगाई से रूठी ।।
पूँजीपतियों की हो रही मस्ती।
हत्या लूट कितनी है सस्ती ।।

भारतीय जीवन दर्शन की सनातन संस्कृति के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य जन्म के साथ ही कुछ प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक ऋणों (कर्तव्यों) से बंधा होता है। इन ऋणों से मुक्त होने के लिए जीवन में सदाचार, त्याग और सेवा का मार्ग अपनाना आवश्यक माना गया है। ये तीन ऋण देव, ऋषि तथा पितृ ऋण के नाम से जाने जाते हैं । इसमें पितृ ऋण का आशय मात्र पिता के ऋण से नहीं अपितु माता और पिता दोनों के ऋण से उऋण होना है। जो इन ऋणों का महत्व समझता है, वही देश और समाज के लिए विशेष कार्य कर सकता है। कवि ‘दिव्य’ ने अपनी कविता ‘कैसे तेरा ऋण उतारूँ’ मैं मां के ऋण को वर्णित किया है-
सौ-सौ जीवन, मैं तुझ पर वारूँ।
हे माँ! कैसे तेरा ऋण उतारूँ।।
तूने मुझको जन्म दिया है, 
तेरा मैंने दुग्ध पिया है।
तेरा अमृत-सम दुग्ध पीकर, 
कौन नहीं यहाँ जीवन जीया है।।

कवि बद्रीलाल ‘दिव्य’ की कविताओं में जहां व्यवस्थाओं के प्रति उलाहना है, वहीं उनका समाधान भी  सुझाया गया है। यही बात संग्रह की कविताओं को विशिष्ट बनाती है। इन कविताओं में भाव सौंदर्य के साथ भाषाई सौंदर्य भी है जो कविता के प्रवाह को बांधे रखता है। ‘एक दीप और जालना’ कविता संग्रह विपरीत समय में आशा का संचार करने वाली कविताओं का संग्रह है इस दृष्टि से इन कविताओं को कम से कम एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए। 
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Thursday, May 14, 2026

बतकाव बिन्ना की | जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘आज मोए जे कहनात खींबई याद आ रई के- जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने भैयाजी से कई।
मोरी बात सुन के भैयाजी हंसन लगे। जा देख के मोए अचरज बी भओ औ गुस्सा बी आओ। भला ईमें हंसबे वारी बात का आए?
‘‘आप काए हंस रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बुरौ ने मानियो मगर मोए हंसी जा बात पे आई के जे कहनात तुमें कछू ज्यादई पुसात आए। जब देखो जेई कहनात कैत रैत हो।’’ भैयाजी ऊंसई हंसत भए बोले।
‘‘अब का करो जाए भैयाजी! जब दसई नईं बदलत तो कहनात कां से बदल जैहे?’’ मैंने कई।
‘‘का मतलब? कोन सी दसा? का कैबो चा रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘देख नईं रै के कैसो दोंदरा मचो आए।’’ मैंने कई।
‘‘का हो गओ?’’ भैयाजी ने तनक गंभीर होत भए पूछी।
‘‘होने का आए? मोए कछू नई भओ।’’ मैंने कई।
‘‘तुमें नईं कछू भओ, सो कोन की कै रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आप अखबार नईं पढ़त का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काए नईं पढ़त? संकारे से सबसे पैले अखबारई बांचत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ऊमें पढ़ो नईं के जनगणना वारों में से कछू को फटकारो गओ के काम धीमो काय चल रओ।’’ मैंने कई।
‘‘सो, ईमें का खास आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘ईमें आपके लाने कछू खास नई दिखा रओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुमई बता देओ के ईमें का खास आए? अरे, बे ओरें समै पे काम पूरो नईं कर पाए हुइएं सो उने फटकारो गओ। कओ चिट्ठी पकरा दी गई होए। जे तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी तनक लापरवाई से बोले।
‘‘भैयाजी आप मोए एक बात बताओ।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ पूछो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें जे बताओ आप के जो कऊं अपनी भौजी कऊं टीचर होतीं औ उनकी ड्यूटी ई काम में लग जाती तो आप का करते?’’ मैंने पूछी।
‘‘करते का? सूदे कलक्टर आफिस जाते औ तुमाई भौजी की ड्यूटी कटवा के आते।’’ भैयाजी तुरतईं बोले।
‘‘काए? उने ड्यूटी काए नईं करन देते?’’ मैंने पूछी।
‘‘अरे, इत्ती घाम में बे कां फिरतीं? चाए कछू हो जातो, हम तो जान नईं देते।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जे का बात भई भैयाजी? अपनी भौजी, भौजी औ दूसरी लुगाई कछू नईं? औ लुगाई की तो छोड़ो लुगवा हरों की बी कछू नईं?’’ मैंने भैयाजी खों आड़े हाथो लओ।
‘‘तुम मनो कैबो का चा रईं?’’ भैयाजी तनक झेंपत भए बोले।
‘‘मैं जे कै रई भैयाजी के इत्ती गरमी पर रई, घाम चटक रओ औ सरकार को गिनती कराबे की परी। अरे करा लइयो तनक साजे मोसम में। मनो नईं उने तो ई गरमी में ई कराने।’’ मोए बोलत-बोलत गुस्सा सी आन लगी।
‘‘तुम काए खिजियां रई? अब राजकाज में जा सब तो चलत रैत आए।’’ भैयाजी ने मोए समझाबे की कोसिस करी।
‘‘खिजियाबे वारी बातई आए भैयाजी! अब आपई सोचो के अपन ओरें जो घरै रैत आएं तो  दुफारी को दोरे बंद कर के, कूलर चला के पर जात आएं। फेर कोनऊं दोरे की घंटी टनटनाए उठ के दोरे खोलबे को जी नईं करत। फेर ई गरमी में गली-मोहल्ला इत्तो सूनो हो जात आए के कोनऊं अनजाने के लाने दोरे खोलबे में डर लगत आए। उनके मों पे थोड़े लिखो रैत आए के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं औ। अबई चार दिनां पैले की घटना मैंने आपके लाने सुनाई हती के दो जने एक फटफटिया पे चढ़ के आए रए। उन्ने मोरे घर के दोरे की घंटिया बजाई। मैंने खिरकी से तनक झांक के देखो सो मोए लगो के यां तो पोस्टमेन, ने तो कूरिया वारो हुइए। मैंने बैठक को दोरो खोलो औ बरांडे में पौंची तो मोए तनक डाउट भओ। मैंने उन ओरन से पूछी के का काम आए? सो उनमें से एक बोलो जोन फटफटिया से उतर के ठाड़ो हतो, ‘‘नमस्ते! आप कैसी हो? जब आपकी जिज्जी हतीं तो हम आपके इते आत रए।’ इत्तो बोल के बा सोचो के हम ऊकी बातन में आ जाहें औ बरांडे को गेट खोल दैहें। लेकन मैंने ऊसे साफ-साफ कई के भैया, हमने आपको पैचानों नईं। तो बा बोलो के अरे, आपकी जिज्जी हमें पैचानत्तीं, आप सोई पैचानत्तीं। फेर बा पलट के अपने संगवारे से कछू बोलो औ फेर मोरी तरफी देखन लगो। सो मैंने कई के भैया, हमने आपको खों पैचानो नईयां। आप जो जिज्जी के समै पे आत रए तो जिज्जी के गए पे काए नईं आए रए? जा सुन के बा बोलो के हम काम के लाने बायरे चले गए रए। बाकी हमने जिज्जी के बारे में सुनी रई। औ आज इते से निकरे तो सोची के आपसे मिलत चलें। मैंने कई के मगर मैंने आप ओरन खों नईं चीन्हों आए सो आप ओरें फेर आइयो। इत्तो कै के मैंने दोरे बंद कर लए। मैंने खींब देर सोची मनो मोए तनक बी याद ने आई के बे ओरें कौन हते? मैंने ई बारे में जोन के बी बताओ बे सबई बोले के अच्छो करो के दोरे नईं खोले, को जाने को हते बे ओरें। बा बी दुफारी के सन्नाटा में। अब ऐसे में को आ चीन्ह पा रओ के बे गिनती करबे वारे आएं के कोनऊं ऊंसई चोर-उचक्का आएं। सो, अब आपई बताओ के ऐसे में बा गिनती करबे वारों के लाने घरों के दोरे नईं खुल रए तो ईमें उन ओरन को का दोस? औ ने ना खोलबे वारन को कोनऊं दोस। काए से दुफारी में घरे लुगाइयां, बच्चा औ बुड्ढा हरें रैत आएं। अरे अच्छो मोसम रए तो मोहल्ला में मुतके जने घूमत रैत आएं, ऐसे घाम में को आ मूंड चटकात फिरहे? पूरो सूनो डरो रैत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! ऐसे में उनको काम धीमो सो चलहेई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो मैं कै रई के एक तो ऐसे बुरए मोसम में जो काम करा रए औ जो काम ठीक से हो नई पा रओ तो खटिया खड़ी कर रए। अब जे दसा देख के जेई कहनात सो याद आहे के जबरा मारे रोन न दे, अंसुवा बी लौं बोन न दे।’’ मैंने कई।
‘‘हम समझ गए के तुम सोई एक जमाना में टीचर रईं, जेई से तुमें उनके लाने दुख हो रओ।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘मैं तो कच्ची वारी टीचर रई औ मोरी कभऊं ऐसी ड्यूटी नई लगी। मनों, जे इंसानियत की बात आए।’’ मैंने कई। 
‘‘बा तो ठीक आए बिन्ना, मनो नौकरी मने नौकर घांई जिनगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, नौकर बनाओ, जे तो गुलामी घांईं कहानो।’’ मैंने चिढ़ के कई।
‘‘अच्छा चलो, ने तिन्नाओ। हमाए-तुमाए सोचे से कछू ने हुइए, बोलने तो उनई को परहे। भैयाजी बोले।
‘‘सई कै रए आप।’’ मैंने भैयाजी से कई।        
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के पक्को करबे, पईसा बढ़ाबे के लाने तो सबई कट्ठे ठाड़ें हो जात आएं, सो ईके लाने काए नईं बोलत कोऊ?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
नदियों को बचा कर ही पार हो सकती है दोनों लोकों की वैतरिणी      
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                  
     वेदों में यह माना जाता है कि हमें ब्रह्मांड में मौजूद सभी प्रकार के जल की रक्षा करनी चाहिए। नदियों के जल को सबसे अधिक संरक्षित माना गया है, क्योंकि उससे खेतों की सिंचाई होती है, जिसके कारण जीवों का जीवन चलता रहता है। नदियों का बहता हुआ जल पवित्र माना जाता है। इसीलिए वेदों में कहा गया है कि नदियों को प्रदूषित नहीं करना चाहिए। वैदिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद आने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। इसी संदर्भ में माना गया है कि स्वर्ग तक केवल वैतरणी को पार करने के बाद ही पहुंचा जा सकता है, इसलिए यदि जो वैतरणी को पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता और उसकी आत्मा प्यासी भटकती रहती है।


   हिंदू वैदिक, पौराणिक कथाओं के अनुसार, वैतरणी नदी (स्टिक्स नदी) में भयानक कीड़े, मगरमच्छ और वज्र जैसी चोंच वाले गिद्ध रहते हैं। मृत्यु के बाद, जब यमदूत पापी आत्मा को लेकर वैतरणी नदी से गुज़रते हैं, तो नदी का पानी उबलने लगता है। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाता है यानी जो जीवन में बुरे कर्म करता है, धार्मिक कार्य, दान-पुण्य नहीं करता, उस पापी आत्मा को वैतरणी नदी पार करने में बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। जो व्यक्ति नदी के जल को हानि पहुंचाता है, वह मृत्यु के बाद मिलने वाली वैतरणी नदी को कभी पार नहीं कर पाता। चूंकि स्वर्ग तक पहुंचने के लिए वैतरणी नदी को पार करना अनिवार्य है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति वैतरणी पार नहीं कर पाता, तो उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। गरुड़ पुराण के अनुसार, यह नदी पृथ्वी के अलावा कई अन्य स्थानों पर भी प्रवाहित होती है। जिस नदी की यहां बात की जा रही है, वह यमलोक से नरक तक बहती है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस नदी का नाम वैतरणी नदी है। यह 100 योजन अर्थात् 120 किलोमीटर लंबी है और रक्त (खून) से भरी हुई है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इस नदी का एक हिस्सा पृथ्वी से होकर यमलोक तक जाता है, और वहां से नरक के द्वार तक पहुंचता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा को यमलोक में यमराज के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। यदि उसके कर्मों के अनुसार उसे नरक की प्राप्ति होती है, तो यमदूत उस पापी आत्मा को इस नदी के पास ले जाते हैं। किसी भी पापी आत्मा को देखते ही नदी का रक्त उबलने लगता है और नदी से एक भयानक गर्जना उठने लगती है। वहीं, जो व्यक्ति अपने जीवन में दान-पुण्य करता है, तथा प्रकृति और नदी के जल को कोई हानि नहीं पहुंचाता, वैतरणी नदी उसकी आत्मा की रक्षा करती है। हमारे विद्वान पूर्वजों ने नदीजल संरक्षण को पारलौकिक जीवन से जोड़ कर जो भय पैदा किया वह नदीजल संरक्षण में सहायक रहा। किन्तु आधुनिकता ने इन प्राचीन संदेशों की अनदेखी की है और नदियों को गंभीर क्षति पहुंचाया है। हमारे पूर्वजों ने संभवतः इसी कारणवश धार्मिक ग्रंथों में वैतरणी नदी के अस्तित्व का उल्लेख किया गया है, ताकि मनुष्य प्रकृति और नदी के जल को नुकसान पहुंचाने से भयभीत हों; वे अच्छे कर्म करें, प्रकृति का संरक्षण करें, जल बचाए और जैव विविधता की रक्षा करें।

जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय नदियों की जलवायु की स्थिति लगातार खराब हो रही है, जिसमें अनिश्चितकालीन वृद्धि, अत्यधिक वृद्धि, ज्वालामुखी का पिघलना और पानी की कमी मुख्य चुनौतियाँ हैं। बढ़ते तापमान के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे नदियां समय से पहले सूख रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 2070-2100 तक मानसून में नदियों का तापमान 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को पानी देने वाले हिमालयी ग्लेशियर्स का तेजी से पिघलना इन नदियों का प्रवाह प्रभावित कर रहा है।  बारिश के पैटर्न में बदलाव से बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है। भारत में बाढ़ की दर बढ़ी है। वहीं अनियमित बारिश से सूखा और बंजरपन भी बढ़ रहा है। पृथ्वी की सतह का 71 प्रतिशत भाग जल से ढंका हुआ है, लेकिन मात्र 1 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। गंगा, यमुना और साबरमती जैसी नदियां पूरे भारत में पूजनीय हैं। नदी का जल वाणिज्यिक और औद्योगिक विकास, जलविद्युत उत्पादन, कृषि, नए बहुउद्देशीय बांधों और पर्यटन स्थलों के लिए महत्वपूर्ण है। यद्यपि कीटनाशकों, भारी धातुओं, जैविक अपशिष्ट, रासायनिक अपशिष्ट और सीधे सीवेज के निर्वहन जैसे विभिन्न प्रदूषकों की उपस्थिति ने नदी के जल की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाया है। भारत में, नदी जल प्रदूषण एक प्रमुख समस्या है जिसने न केवल मानव और पशु स्वास्थ्य को, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया है।

सन 2023 में अमेरिका के न्यूयॉर्क में पांच दशकों के बाद शुद्ध और मीठे (ताज़े) पानी के लिए जल सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में हिमालय से निकलने वाली गंगा समेत दस प्रमुख नदियों के भविष्य में सूख जाने की गंभीर चिंता जताई गई थी। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने आगाह किया था कि ‘आने वाले दशकों में जलवायु संकट के कारण हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटने से भारत की सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां जल-प्रवाह घट जाने से सूख सकती हैं। दरअसल, हिमनद यानी ग्लेसियर्स पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक हैं। दुनिया के 10 प्रतिशत हिस्से में हिमनद हैं, जो दुनिया के लिए शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हैं। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि मानवीय गतिविधियां पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक ले जा रही हैं, जो हिमनदों के निरंतर पिघलने का कारण बन रहा है।’’
इस आयोजन में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक आने वाले जल संकट से प्रभावित होने वाले देशों में भारत प्रमुख होगा। गंगा, ब्रह्मपुत्र समेत एशिया की दस नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। अन्य नदियां झेलम, चिनाब, व्यास, रावी, सरस्वती और यमुना हैं। ये नदियां सामूहिक रूप से 1.3 अरब लोगों को ताज़ा (मीठा) पानी उपलब्ध कराती हैं। पानी की समस्या से प्रभावित लोगों में से अस्सी प्रतिशत एशिया में हैं। रिपोर्ट 2023 के अनुसार देश में 2031 में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत उपलब्धता 1367 घन मीटर रह जाएगी जो 1950 में 3000-4000 घन मीटर थी। विडंबना है कि जहां पानी की उपलब्धता घट रही है, वहीं पानी की खपत बढ़ रही है।

हमारे पूर्वज नदी जल के महत्व को हमसे कहीं अधिक समझते थे। ‘‘जलमेव जीवनं’’ भारतीय संस्कृति में जल और जलाशयों के महत्व को प्राचीन काल से ही स्वीकार किया गया है। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे वैदिक साहित्य में जल के स्रोतों, सभी जीवों के लिए जल के महत्व, जल की गुणवत्ता और उसके संरक्षण पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है। वेदों में जल को ‘‘विश्वभेषजं’’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि सभी औषधियां जल में ही समाहित हैं (अर्थात् शुद्ध जल सभी जीवों के लिए अत्यंत लाभकारी, हितकारी और महत्वपूर्ण है)। वर्तमान में भी जल चिकित्सा के महत्व को स्वीकार किया जाता है। ऋग्वेद में जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-‘‘अप्सवमृतमप्सु भेषजं।’’

- इसका अर्थ है कि जल में अमृत है, जल में औषधि है। वास्तव में, आर्य संस्कृति नदियों के किनारों पर ही फली-फूली और विकसित हुई। बड़े-बड़े प्राचीन नगर नदियों के किनारों पर ही समृद्ध हुए। जैसे सरयू के तट पर अयोध्या, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जयिनी, त्रिवेणी के तट पर प्रयाग, यमुना के तट पर मथुरा आदि। पंजाब को ‘‘सप्तसिंधु’’ प्रदेश कहा जाता है। वैदिक काल में, सरस्वती नदी के तट के समीप रहते हुए और इस नदी के जल का सेवन करते हुए, ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया।
पवित्र नदियों की महिमा का गान हजारों नामों से किया जाता है। ऋग्वेद के दशम मंडल के ‘‘नदी सूक्त’’ में भारत की नदियों की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है-
गंगे च यमुने चौव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
- इसका अर्थ है, हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी नदियों! आप सभी मेरे स्नान के लिए इस जल में पधारें।
गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा।
कावेरी सरयू महेन्द्रतनया चर्मण्वती वेदिका।।
क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी।
पूर्णाः पूर्णजलैः समुद्रसहिताः कुर्वन्तु मे मङ्गलं।।

आदिग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित वेदों में, जल को एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व मानते हुए उसकी स्तुति की गई है। अथर्ववेद में जल को लाभकारी बताते हुए कहा गया है कि ‘‘जो जल मरुस्थल में है, जो जल तालाब में है, जो जल घड़े में लाया जाता है, जो जल वर्षा से प्राप्त होता है, ये सभी जल हमारे लिए कल्याणकारी हों। कुओं का जल हमें समृद्धि प्रदान करे। संचित जल हमें समृद्धि दे, वर्षा का जल हमें समृद्धि दे।’’ औषधि के रूप में जल का स्थान चिकित्सा विज्ञान, औषध-शास्त्र और विभिन्न देशों की चिकित्सा पद्धतियों में सर्वाेच्च है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के साथ-साथ, सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी इसके दर्शन का विस्तार से वर्णन किया गया है। जल समस्त रोगों की औषधि है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जो जल स्वर्ण के समान कांतिमान है, अत्यंत सुंदर है, जो पवित्रता प्रदान करता है, जिससे सवितादेव और अग्निदेव का जन्म हुआ, जो सर्वाेत्तम वर्ण वाला और ‘‘अग्निगर्भ’’ है, वह जल हमारे रोगों को दूर करने में सक्षम है; सभी को सुख और शांति की प्राप्ति हो। ऋग्वेद में जल-संस्कृति का निरंतर प्रवाह देखने को मिलता है। ऋग्वेद की जल-संस्कृति और परंपरा का विकास अथर्ववेद में भी परिलक्षित होता है। जल ही एक सुखी और समृद्ध जीवन का आधार है। शतपथ ब्राह्मण में जल को ‘‘आपो वै प्राणाः’’ (जल ही प्राण है) कहकर जीवन के रूप में वर्णित किया गया है। समस्त देवता जल में ही प्रतिष्ठित हैं। देवताओं तक हमारी स्तुतियों को पहुँचाने का माध्यम भी जल ही है।
वस्तुतः, प्रवाहित जल अर्थात् नदी के जल को सर्वाधिक पवित्र मानते हुए, वेदों में नदी जल के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है; क्योंकि नदी ही वह एकमात्र तत्व है जो जीवन के इस पार और उस पार ‘‘दोनों लोकों में’’ विद्यमान रहती है, और मनुष्य को सुख तथा स्वर्ग की प्राप्ति कराती है। यही कारण है कि शास्त्रों में नदी जल को बचाने का आह्वान किया गया है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 14.05.2026 को प्रकाशित) 
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