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Tuesday, May 19, 2026

बोध कथा | पहले मन को करो चंगा - शरद सिंह | नया हिन्दुस्तान


आज "नया हिन्दुस्तान" समाचारपत्र में ...

हार्दिक आभार नया हिन्दुस्तान एवं सामयिक प्रकाशन 🙏

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बोध कथा | पहले मन को करो चंगा

- शरद सिंह

गुरु नानक देव किशोरावस्था में संतों की सेवा करते समय खाना-पीना तक भूल जाते थे। इससे उनकी सेहत गिरने लगी। वे दुबले हो गए। पुत्र की ऐसी दशा देख कर उनके पिता ने गांव के सबसे योग्य वैद्य हरिदास को बुलाया।

     वैद्य गुरु नानक देव की नाड़ी देखने लगे। जब उन्होंने वैद्य से पूछा कि वह क्या कर रहे हैं, तो वैद्य ने जवाब दिया कि वे उनकी नाड़ी की गति से उनके रोग का पता लगा लगा रहे हैं। इससे उनका सही इलाज हो सकेगा। नानक साहब ने वैद्य से कहा कि उनका शरीर बीमार नहीं है। हां, अगर उनका मन बीमार हो, तो क्या वे उसका इलाज कर देंगे? वैद्य उनकी बात समझ नहीं पाया और उन्हें फटी हुई आंखों से देखने लगा। यह देख गुरु नानक ने वैद्य से कहा कि पहले वे अपने तन-मन का इलाज करें।

     यह सुन कर वैद्य ने गुरु नानक से कहा कि वे यह क्या कह रहे हैं। उन्हें तो कोई बीमारी नहीं है। वे तो एकदम स्वस्थ और प्रसन्न हैं। उन्हें लगा कि ऐसा कहकर बालक नानक उनका अपमान कर रहे हैं।

     गुरु नानक देव ने शांत स्वर में फिर कहा, 'वैद्यजी, आप अत्यंत गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं।'

बताओ 'मैं, और गंभीर बीमारी से पीड़ित हूं? यह तुम क्या कह रहे हो?' वैद्य को क्रोध आ गया। 'मैं सच कह रहा हूं।' गुरु नानक देव ने कहा। 'ऐसा है, तो कि मुझे कौन-सी बीमारी है?' वैद्य ने पूछा।

'वैद्यजी, आपको जन्म और मृत्यु की चिंता की बीमारी है। जन्म और मृत्यु की चिंता से बड़ी बीमारी इस दुनिया में दूसरी नहीं है। इस बीमारी का इलाज नब्ज देख कर नहीं किया जा सकता है। इस बीमारी को दूर करने की औषधि भी आपके औषधि विज्ञान के पास नहीं है।' गुरु नानक देव ने कहा।

वैद्य उनकी तरफ देखने लगे। गुरु नानक ने वैद्य से कहा, 'मन स्वस्थ हो, तो तन की बीमारी शीघ्र दूर हो सकती है, किंतु यदि मन अस्वस्थ है, तो तन की बीमारी लाख उपाय करने पर भी दूर नहीं की जा सकती। मन की बीमारी मृत्यु के भय से पैदा होती है और मृत्यु होने के भय से ही बढ़ती जाती है। यह भय ईश्वर रूपी चिकित्सक की शरण में जाने पर ही दूर हो सकता है।'

गुरु नानक देव की बात सुन कर वैद्य हरिदास की आंखें खुल गईं। उसे अपनी नासमझी पर लज्जा आई। उन्होंने उनके पिता से कहा, 'भाई मेहता कालू, आपका पुत्र सच कह रहा है कि मुझे तन की बीमारी दूर करने का ज्ञान तो है, किंतु मन की बीमारी दूर करने का ज्ञान नहीं है। आपको अपने पुत्र के विषय में चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह बीमार नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रेम में डूबा हुआ है। यह तन और मन दोनों की बीमारी का इलाज है।' इसके बाद पिता मेहता कालूराय अपने पुत्र गुरु नानक देव के भक्तिपूर्ण व्यवहार के प्रति चिंतित होने के बदले गर्व का अनुभव करने लगे।

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(साभारः 'श्रेष्ठ सिख कथाएं', सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली)


Wednesday, January 1, 2025

साहित्य की उपलब्धियां विश्वास दिलाती हैं कि उम्मीद अभी बाकी - शरद सिंह

साहित्य की उपलब्धियां विश्वास दिलाती हैं कि उम्मीद अभी बाकी हैः शरद सिंह

हार्दिक आभार प्रलेस सागर 🌹🙏🌹
हार्दिक धन्यवाद पत्रिका 🙏🚩

#डॉसुश्रीशरदसिंह  #DrMissSharadSingh #प्रलेस  #PWA #प्रगतिशीललेखकसंघ

Sunday, May 29, 2022

पुस्तक समीक्षा | स्त्री स्वाभिमान की अद्भुत गाथा | समीक्षक देवेंद्र सोनी | उपन्यास - शरद सिंह

मेरे उपन्यास "शिखंडी" की समीक्षक देवेंद्र सोनी जी द्वारा की गई समीक्षा नई दिल्ली के दैनिक "नेशनल एक्सप्रेस" के साहित्यिक परिशिष्ट में प्रकाशित हुई है। 
मैं आभारी हूं आदरणीय गिरीश पंकज जी की तथा भाई Devendra Soni जी की🙏

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Monday, January 6, 2020

महेश भारद्वाज एवं ज्योतिष जोशी विश्व पुस्तक मेला 2020 में शरद सिंह के नए उपन्यास "शिखण्डी" के साथ

महेश भारद्वाज एवं ज्योतिष जोशी विश्व पुस्तक मेला 2020 में शरद सिह के नए उपन्यास "शिखण्डी" के साथ

साहित्य, कला एवं संस्कृति के  ख्याति प्राप्त आलोचक ज्योतिष जोशी जी के हाथों में मेरा नया उपन्यास "शिखण्डी" ...मेरा सौभाग्य 😊 🤗🙏
साथ हैं महेश भारद्वाज जी इस उपन्यास के प्रकाशक 🙏
@WorldBookFair2020, Delhi in Samayik Prakashan Stall

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Tuesday, August 27, 2019

जीवन प्रबंधन की प्रेरणा देते विघ्नहर्ता गणेश - डाॅ. शरद सिंह .. ‘‘दैनिक जागरण’’ के सभी संस्करणों में प्रकाशित

‘‘दैनिक जागरण’’ के सभी संस्करणों में प्रकाशित सप्तरंग परिशिष्टि में मेरा लेख ‘‘जीवन प्रबंधन की प्रेरणा देते विघ्नहर्ता गणेश’’ प्रकाशित हुआ है। इसे आप भी पढ़िए... - डाॅ. शरद सिंह
🙏हार्दिक धन्यवाद ‘‘दैनिेक जागरण’’ 🙏
https://epaper.jagran.com/epaper/27-aug-2019-4-delhi-city-edition-delhi-city-page-23.html
 
Dr Sharad Singh article on Lord Ganesh - Saptrang, Dainik Jagaran in all edition , 27 Augast 2019

Friday, March 29, 2019

कोमल कंधों पर भारी बोझ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Published in Navbharat

Dr (Miss) Sharad Singh
आज 29.03.2019 को नवभारत में प्रकाशित स्कूल बैग के भारी बोझ के मुद्दे पर मेरा लेख....इसे आप भी पढ़िए ! हार्दिक धन्यवाद नवभारत

कोमल कंधों पर भारी बोझ
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
एक बच्चा सुबह उठता है। जल्दी-जल्दी तैयार होता है कि कहीं स्कूलबस न छूट जाए। जैसे-तैसे मुंह में नाश्ता भरता है और नश्ता गले से पेट तक पहुंचने से पहले 8-10 किलो का बस्ता उठा कर दौड़ पड़ता है घर से स्कूलबस-स्टॉप की ओर। घर से बस तक की यह दूरी पचास मीटर से कहीं कम तो ज्यादा भी होती है। स्कूलबस आने तक बस्ता बच्चे के कोमल कंधों पर लदा रहता है। कंधे थक जाते हैं तो पीठ पर वज़न अधिक महसूस होता है जिसे साधने के लिए कमर अपने-आप झुकने लगती है। जबकि स्वास्थ्य के नियम कहते हैं कि शरीर हमेशा सही पाश्चर में होना चाहिए। चिकित्सक तो यहां तक कहते हैं कि कक्षा 1 से 2 के बच्चों को मात्र 1 किलो तक तो कक्षा 8 से ऊपर कक्षा में पढ़नेवाले बच्चों को 5 किलो वजन तक का ही बस्ता होना चाहिए। भारी बैग के चलते बच्चों की रीढ़ की हड्डी को नुकसान, फेफड़ों की समस्या होने की संभावनाएं होती है। और सांस लेने में दिक्कत जैसे कई समस्याओँ उठानी पड़ सकती है। 


Navbharat - Komal Kandhon pr Bhari Bojha - Dr Sharad Singh, 29.03.2019

बच्चों के बस्ते के बढ़ते वज़न को नियंत्रित करने के लिए आज से लगभग 27 साल पहले वर्ष 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने बच्चों के बस्ते के बढ़ते बोझ और उनके कमजोर कंधों का गंभीरता से अध्ययन किया। इसके बाद यशपाल कमेटी ने जुलाई 1993 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में होमवर्क से लेकर स्कूल बैग तक के लिए कई सुधार सुझाए गए थे। जिनका भरपूर स्वागत भी हुआ लेकिन अफ़सोस कि सुधार ईमानदारी से अमल में नहीं लाया गया। उस समय यह राय भी दी गई थी कि नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए होने वाले टेस्ट व इंटरव्यू बंद होने चाहिए। आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के आतंक में दबे पड़े हैं, जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी क्लासों में बच्चों को गृहकार्य इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। मिडिल व उससे ऊपर की कक्षाओं में होमवर्क जहां जरूरी हो, वहां भी पाठय़ पुस्तक से नहीं हो। पर आज तो होमवर्क का मतलब ही पाठय़ पुस्तक के सवाल-जवाबों को कापी पर उतारना या उसे रटना रह गया है। कक्षा में 40 बच्चों पर एक टीचर, विशेष रूप से प्राइमरी में 30 बच्चों पर एक टीचर होने की सिफारिश खुद सरकारी स्कूलों में भी लागू नहीं हो पाई है।
यशपाल कमेटी के लगभग 14 साल बाद वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने क़ानून बनाकर बच्चों के स्कूल का वज़न तय किया, लेकिन यह क़ानून भी लागू नहीं हो सका। जबकि अस्थिरोग विशेषज्ञों ने भी इसके पक्ष में अपनी राय देते हुए बस्ते के भारी बोझ के खतरों से आगाह करते हुए कहा चेताया था कि-‘‘भारी बस्ते ढोने से बच्चे की रीढ़ की हड्डी पर तो असर होता है ही, उनका पोश्चर भी ग़लत हो जाता है।’’ बच्चों की हड्डी मुलायम होती है। ऐसे में ज़्यादा वज़न से उन्हें गर्दन, कंधे और कमर दर्द की शिकायत हो जाती है। कई बार हड्डी चोटिल भी हो सकती है। भारी बैग उठाकर चलने से बच्चे आगे की ओर झुक जाते हैं जिससे बॉडी पॉश्चर पर असर पड़ता है। क्षमता से अधिक वज़न उठाने से बच्चों में कमज़ोरी और थकान रहने लगती है।’’
इसके बाद स्कूली बच्चों की पीठ से बस्ते का बोझ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किया। इसमें साफ तौर पर कहा गया कि किस कक्षा के बच्चों के बैग का वजन कितना होना चाहिए। इसी आधार पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने इस संबंध में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी किए। इसमें राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया कि वे स्कूलों में विभिन्न विषयों की पढ़ाई और स्कूल बैग के वजन को लेकर भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार नियम बनाएं। इसमें कहा गया कि पहली से दूसरी कक्षा के छात्रों के बैग का वजन डेढ़ किग्रा से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी तरह तीसरी से 5वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के बैग का वजन 2-3 किग्रा, छठी से 7वीं के बच्चों के बैग का वजन 4 किग्रा, 8वीं तथा 9वीं के छात्रों के बस्ते का वजन साढ़े चार किग्रा और 10वीं के छात्र के बस्ते का वजन 5 किलोग्राम होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट, 2006 के तहत बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। मगर सवाल वहीं है कि यह वज़न भी शारीरिक रूप से मजबूत बच्चे के लिए सही हो सकता है, कमजोर बच्चे के लिए नहीं। एक सर्वे के अनुसार, दिमाग़ से तेज लेकिन शरीर से कमजोर बच्चे सिर्फ़ बस्ते के बोझ के दबाव से पढ़ाई में पिछड़ने लगते हैं। ध्यान देने की बात है कि बच्चे के वजन के दस प्रतिशत का निर्धारण हर बच्चे के लिए अलग-अलग नहीं किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर एक औसत मानक हर बच्चे के लिए उपयुक्त भी नहीं हो सकता है।
इस समस्या का एक पक्ष और भी है। मंहगें प्राईवेट स्कूलों में बच्चों को डिज़िटल पुस्तकें और स्कूल में लॉकर्स भी उपलब्ध कराए जाते हैं जिससे वे बोझमुक्त रह सकें। लेकिन सामान्य स्कूलों में यह सुविधा बच्चों को नहीं मिल पाती है। ग्रामीण बच्चे जो बिजली की लुकाछिपी से जूझते रहते हैं वे डिज़िटल किताबों की सुविधा का लाभ ठीक से उठा भी नहीं सकते हैं। जिन बच्चों को स्कूलबस नसीब हो जाती है वे तो फिर भी खुशनसीब हैं लेकिन जिन बच्चों को पीठ पर बस्ते का भारी बोझ लाद कर चार-पांच कि.मी. या उससे भी अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है या फिर रस्सी बांध कर बनाए गए पुलों से हो कर गुज़रना पड़ता है, उन पर उनके वज़न के दस प्रतिशत बोझ को लागू करना भला कैसे न्यायसंगत हो सकता है? वस्तुतः हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता का अभाव है और अभाव है बच्चों की सेहत की सुरक्षा का। इलेक्ट्रॉनिक क्रांति के बावजूद आज भी करोड़ों बच्चे बस्ते का भारी बोझ उठाने को विवश है। आज भी देश में अनेक स्कूल ऐसे हैं जहां बच्चों के कंधों पर बस्ते का भारी बोझ तो है मगर बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। शिक्षा नीति और शिक्षा योजनाओं के व्यवहारिक निर्माण और उसके अनुपालन की अभी भी कमी है। जबकि देश के हर बच्चे तक डिज़िटल पढ़ाई की सुविधा पहुंचा कर इस समस्या का हल निकल सकता है।
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( नवभारत, 29.03.2019 )

Thursday, February 21, 2019

नामवर सिंह ने अपने मानक स्वयं गढ़े - डॉ शरद सिंह

Tribute to Nambar Singh by Dr Sharad Singh
            विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
"श्रद्धेय नामवर सिंह वे विरले साहित्यालोचक थे जिन्होंने अपना मानक स्वयं गढ़ा। उन्होंने  दूसरी परंपरा की खोज करके हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा दी। नामवर जी का जाना हिन्दी साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि !" - डॉ शरद सिंह

"आलोचकों की प्रथम पंक्ति में जिनका नाम आता है उनमें से एक हैं नामवर सिंह। हिन्दी साहित्य में नामवर सिंह होने का अर्थ क्या है? इस पर बड़ी सजगता से कलम चलाई है सदानंद शाही ने।"
- ‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के जुलाई-सितम्बर 2016 अंक में मेरे संपादकीय से...डॉ शरद सिंह

"वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अपनी आलोचनात्मक क्षमता के द्वारा मुक्तिबोध ने प्रमाणित कर दिया कि कोई भी चीज तभी स्पष्ट होती है जब कम-से-कम एक ईमानदार व्यक्ति मौजूद हो।’’" - ‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के अप्रैल-जून 2017 अंक में मेरे संपादकीय से...डॉ शरद सिंह

Thursday, February 14, 2019

चर्चा प्लस ... राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ. शरद सिंह

यूं तो वेलेंटाइन के दिन तलाक की चर्चा अटपटी लगती है लेकिन बात स्त्री के अधिकारों की हो तो मुझे हर दिन उचित लगता है...
      चर्चा प्लस ...
      राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़
        - डॉ. शरद सिंह
Dr (Miss) Sharad Singh
                                 राजनीतिज्ञ महिलाओं का सचमुच हित चाहते हैं या फिर सिर्फ़ दिखावा करते हैं, इनदिनों यह यक्षप्रश्न मुंह बाए खड़ा है। एक दल ने ट्रिपल तलाक के विरोध में आवाज़ उठाई तो दूसरा दल कह रहा है कि वह सत्ता पर आया तो ट्रिपल तलाक से संबंधित कानून को रद्द कर देगा। न पहले मुस्लिम महिलाओं से बहुमत लिया गया और न अब महिलाओं से पूछा जा रहा है। ट्रिपल तलाक का मुद्दा सफलता की पींगें भरेगा या औंधेमुंह गिरेगा, यह कहना अभी कठिन है लेकिन यह तो तय है कि इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीति के झूले में जिस तरह झुलाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है।       
 चर्चा प्लस .. राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ शरद सिंह ... Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily
     23 अगस्त 2017 ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘आखिर मिल ही गया तीन तलाक से तलाक’’। जिसमें मैंने लिखा था कि -‘‘ 22 अगस्त 2017 का दिन भारतीय न्यायायिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यह तारीख गवाह रहेगी भारतीय मुस्लिम महिलाओं की उस जीत की जो उन्होंने अपने मानवीय अधिकारों पक्ष में हासिल की। यही वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया। यह निर्णय उस मार्ग को भी प्रशस्त करता है जो एक दिन सभी भारतीय मुस्लिम महिलाएं को दुनिया की सभी प्रगतिशील महिलाओं की पंक्ति में ला खड़ा करेगा। ‘तीन तलाक’ की प्रथा के विरोध ने भले ही कड़ा संघर्ष झेला लेकिन अनेक चौंकाने वाली सच्चाइयां भी सामने आईं जिनसे स्वयं अधिकांश भारतीय मुस्लिम महिलाएं अनभिज्ञ थीं।

इससे पहले 30 मार्च 2016 को ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘मुस्लिम महिलाओं का भविष्य’’। इस लेख में मैंने एक सर्वे के हवाले से आंकड़े देते हुए लिखा था कि -‘‘सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ।’’ इसी लेख में मैंने आगे जानकारी दी थी कि ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और विषेषरुप से मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है। यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है। यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और ‘कुरआन’ के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिलाएं सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी।’’

आज स्थितियां इतनी अधिक राजनीतिक हो गई हैं कि महिलाओं के हित के बजाएं ‘ट्रिपल तलाक कानून’ पुरुषों के विरुद्ध दिखाई देने लगा है। इस कानून में यदि कोई विसंगति है तो इसमें संशोधन किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बेहतर होगा कि संशोधन से पहले मुस्लिम महिलाओं से उस पर बहुमत लिया जाए। जिस राजनीतिक दल की पहचान सेक्यूलर के रूप में हमेशा रही हो, उसके तरफ से ऐसे बयान चौंकाने के लिए पर्याप्त हैं, वह भी लोक सभा चुनाव के ठीक पहले। जबकि एक साथ तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच में से तीन जजों ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक माना। कोर्ट ने सरकार को इस पर कानून बनाने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि सरकार संसद में इस पर कानून बनाए।
ट्रिपल तलाक कानून को लेकर कांग्रेस की तरफ से बड़ा बयान उस समय सामने आया जब कांग्रेस के अल्पसंख्यक महाधिवेशन में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने कहा, ’अगर हमारी सरकार आई, तो नरेंद्र मोदी सरकार के लाए ट्रिपल तलाक कानून को खत्म कर देंगे।“ उन्होंने यह भी कहा कि ये कानून मुस्लिम पुरुषों को जेल में भेजने की एक साजिश है। उस समय वे विगत 07 फरवरी 2019 को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। उल्लेखनीय है कि इस सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत अन्यम कार्यकर्ता भी मौजूद थे। जबकि 30 जनवरी 2019 की घटना है कि एटा की महिला को कथित तौर पर घर समय पर नहीं आने की वजह से उसके पति ने फोन पर ही तीन तलाक दे दिया। पीड़ित महिला ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि उसने अपने पति से वादा किया था कि वह तीस मिनट के भीतर लौट आएगी, मगर ऐसा नहीं करने पर उसे तुंरत तलाक दे दिया गया। महिला ने कहा कि ’मैं अपनी दादी मां को देखने अपने मायके गई थी. मेरे पति ने आधे घंटे के भीतर आने को कहा था। मैं दस मिनट लेट हो गई. उसके बाद उन्होंने मेरे भाई के मोबाइल पर फोन किया और तीन बार ’तलाक-तलाक-तलाक’ कहा. उनकी इस हरकत से मैं पूरी तरह से टूट गई।’

एक ओर महिला नेतृत्व प्रदान करती प्रियंका गांधी आपनी पूरी ताकत आगामी चुनाव में झोंक देने को दृढ़संकल्प हैं और इधर सुष्मिता देव अपने बयान पर अडिग हैं। कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव  ने कहा है कि वह तीन तलाक विधेयक पर दिए अपने बयान पर कायम हैं। देव ने कहा था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो पार्टी मुस्लिम समुदाय के भीतर चर्चा से निकले विकल्पों पर जाने के बजाए तीन तलाक विधेयक  को रद्द करेगी। सांसद देव ने बताया, “जो मैंने उस दिन (गुरुवार) बैठक में कहा था, वहीं मैंने संसद के अंदर भी कहा है। तीन तलाक को अपराध करार देने वाले सभी कानूनों को कांग्रेस बदार्श्त नहीं करेगी।” उन्होंने कहा, “और उसके बाद मैंने यह भी कहा था कि जो भी कानून महिला सशक्तिकरण के लिए हैं, हम उन कानून का समर्थन करेंगे। लेकिन हम (तलाक के) अपराधीकरण का समर्थन नहीं करेंगे।”
यह हठधर्मिता है या एक ऐसा तुष्टिकरण वाला कदम जो कम से कम मुस्लिम महिलाओं के हित में तो दिखाई नहीं दे रहा हैं। देखा जाए तो यह मुद्दा समान नागरिक संहिता से जुड़ा हुआ है। यदि इतिहास के पन्ने पलटे जाएं सन् 1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। देखा जाए तो संशोधन की शुरुआत सन् 1772 की हैस्टिंग्स योजना से हुई और अंत शरिअत कानून के लागू होने से हुआ। यद्यपि सन् 1929 में, जमियत-अल-उलेमा ने बाल विवाह रोकने के खिलाफ मुसलमानों को अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की। इस बड़े अवज्ञा आंदोलन का अंत उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गई थी।
सन् 1985 में मध्य प्रदेश की रहने वाली शाह बानो को पति द्वारा तलाक़ दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला किया कि उन्हें आजीवन गुजारा भत्ता दिया जाए। शाहबानो के मामले पर जमकर हंगामा हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने संसद में ’मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स आफ डाइवोर्स) एक्ट पास कराया जिसने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो के मामले में दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया और निर्वाह भत्ते को आजीवन न रखते हुए तलाक के बाद के 90 दिन तक सीमित रख दिया गया।
कुर्सी का लालच और मीडिया में बने रहने की चाह में डूबे कथित राजनीतिज्ञों को कम से कम एक बार उन तीन महिलाओं के संघर्ष को याद कर लेना चाहिए जो निरंतर जूझती रहीं तीन तलाक के विरुद्ध। पहली महिला - जयपुर की आफ़रीन रहमान जिन्हें एक चिट्ठी में तीन बार तलाक लिख कर तलाक दे दिया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया लेकिन स्वयं के लिए नहीं बल्कि इस बात को ध्यान में रख कर कि “अपने पति पर निर्भर अन्य औरतों को ऐसी नाइंसाफ़ी का सामना ना करना पड़े।’’ दूसरी महिला - सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की अतिया साबरी जिनके पति ने दस रुपए के स्टैम्पपे पर तीन तलाक लिख कर उनके मायके भेज कर उन्हें तलाक दे दिया था। निराश हो कर अतिया ने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रथा को असंवैधानिक क़रार देने की अपील की। इसके साथ मांग की कि ऐसा क़ानून बनाया जाए जो मुसलमान महिलाओं को तलाक़ से जुड़े फ़ैसले लेने के समान अधिकार दे। तीसरी महिला - काशीपुर, उत्तराखंड की शायरा बानो जो अपने पति के तीन तलाक के निर्णय से आहत् हो कर सुप्रीम कोर्ट की शरण में गईं। अक्तूबर 2015 में जब पति ने शायरा  के पास तलाक़ वाली चिट्ठी भेजी तब उनका बेटा और बेटी उनके पति के पास ही थे जिनसे वे दोबारा कभी नहीं मिल सकती थीं। एक मां की तड़प के साथ उन्होंने कोर्ट से अपील की कि “मैं तो इस प्रथा का शिकार हुई लेकिन ये नहीं चाहती कि आने वाली पुश्तें भी इसे झेलें, इसीलिए मैंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इसे असंवैधानिक क़रार दिया जाए।“
समान नागरिक अधिकार के मुद्दों को इस तरह राजनीतिक झूले पर झुलाते रहना जहां एक ओर लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर यह महिला अधिकारों का भी हनन करता है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 14.02.2019)
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Friday, January 18, 2019

चर्चा प्लस ... संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़ - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़
- डॉ. शरद सिंह


मुद्दा राष्ट्र के मान और अपमान का करार दिया जाए और फिर भी चार्जशीट दायर करने में देरी हो तो सवाल उठेंगे ही। इधर संक्रांति के लड्डुओं की मिठास मुंह में घुल ही रही थी कि जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत 10 आरोपियों पर राजद्रोह के आरोप में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष चार्जशीट दाखिल कर दी गई। चार्जशीट दाखिले में तीन साल लग गए और दाखिल किया गया तो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले। लिहाजा, इस बार लोकसभा चुनाव के पहले बांधे जा रहे राजनीतिक लड्डुआें में ‘जेएनयू राजद्रोह’ मामले की चार्जशीट दाखिल किया जाना मेवे का काम करेगा या कंकड़ का यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

चर्चा प्लस ... संक्रांति के राजनीतिक लड्डुओं में चार्जशीट का कंकड़ - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus - Sankranti Ke Rajnitik Ladduon Me Charge Sheet Ka Kankar  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
 तीन साल पहले का वह दृश्य जो टेलीविजन के पर्दे पर दिखा था, आज भी भूलता नहीं है। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी पर लटकाए जाने के विरोध में वर्ष 2016 में जेएनयू कैंपस में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से देश विरोधी नारे लगाए गए थे। इसके बाद बीजेपी सांसद महेश गिरी और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की शिकायत पर वसंत कुंज (उत्तर) पुलिस थाने में 11 फरवरी 2016 को अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए तथा 120बी के तहत एक मामला दर्ज किया गया था। राजद्रोह एक गंभीर अपराध है और इसके लिए अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।
जब सभी मकर संक्रांति मनाने में मग्न थे उसी दौर में जेएनयू राजद्रोह केस का जिन्न उठ खड़ा हुआ। वैसे मकर संक्रांति देश के प्रमुख पर्वो में से एक है। अलग-अलग राज्यों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार इसे मनाया जाता है। इसी दिन से गंगा नदी के किनारे माघ मेला या गंगा स्नान का आयोजन किया जाता है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। मकर संक्रांति त्योहार विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है. सूर्य की पूजा की जाती है। चावल और दाल की खिचड़ी खाई और दान की जाती है। गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। पतंग उत्सव का आयोजन किया जाता है। आंध्रप्रदेश में संक्रांति के नाम से तीन दिन का पर्व मनाया जाता है। तमिलनाडु में किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में लोग गजक और तिल के लड्डू खाते हैं और एक दूसरे को भेंट देकर शुभकामनाएं देते हैं। पश्चिम बंगाल में हुगली नदी पर गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है। असम में भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है। पंजाब में एक दिन पूर्व लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं। संक्रांति में दाल-चावल की खिचड़ी पकाई और खिलाई जाती है। इस बार लोकसभा चुनाव के पहले बांधे जा रहे राजनीतिक लड्डुआें में ‘जेएनयू राजद्रोह’ मामले की चार्जशीट दाखिल किया जाना मेवे का काम करेगा या कंकड़ का यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
यह किसी से छिपा नहीं है। छोटे-छोटे विवादों और मामूली अपराधों के मामलों की सुनवाई में अरसा लग जाता है। देश में निचली अदालतों का कमोबेश यही हाल है, जहां मुकदमे बरसों-बरस घिसटते रहते हैं। दीवानी मुकदमे तो पीढ़ियों तक भी खिंच जाते हैं। न्याय में देरी के मामले न्याय प्रणाली में मौजूद विसंगतियों और गंभीर खामियों की तरफ ही इशारा करते हैं। अदालतों की कार्यप्रणाली कछुआ चाल वाली है। पर केवल अदालतों को दोष क्यों दें, कार्यपालिका भी कम दोषी नहीं है, क्योंकि न्यायिक ढांचे के पर्याप्त विस्तार के लिए संसाधन मुहैया कराना उसी की जिम्मेवारी है। पर सरकारें इस तरफ से उदासीन ही रही हैं। निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च अदालत तक, कुल मिलाकर तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। लेकिन राजद्रोह के मामले में चार्जशीट दाखिल करने में तीन साल का समय लग जाना शायद किसी और देश में संभव नहीं है।

तीन साल बाद दाखिल की गई चार्जशीट में कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बन समेत 10 आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह), 323 (किसी को चोट पहुंचाने के लिए सजा), 465 (जालसाजी के लिए सजा), 471 (फर्जी दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को वास्तविक के तौर पर इस्तेमाल करना), 143 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होने के लिए सजा), 149 (गैरकानूनी तरीके से एकत्र समूह का सदस्य होना), 147 (दंगा फैलाने के लिए सजा) और 120बी (आपराधिक षडयंत्र) के तहत आरोप लगाए गए हैं। पुलिस ने दावा किया कि उसके पास अपराध को साबित करने के लिये वीडियो क्लिप है, जिसकी गवाहों के बयानों से पुष्टि हुई है। पुलिस का कहना है कि कन्हैया कुमार जुलूस की अगुवाई कर रहे थे और उन्होंने जेएनयू परिसर में फरवरी 2016 में देश विरोधी नारे लगाए जाने का कथित तौर पर समर्थन किया था। पुलिस ने यह भी बताया कि आरोपपत्र में भाकपा नेता डी राजा की पुत्री अपराजिता, जेएनयूएसयू की तत्कालीन उपाध्यक्ष शहला राशिद, राम नागा, आशुतोष कुमार और बनोज्योत्सना लाहिरी सहित 36 अन्य लोगों के नाम हैं क्योंकि इन लोगों के खिलाफ सबूत अपर्याप्त हैं।
घटना के दौरान कन्हैया कुमार अखिल भारतीय छात्र परिषद को नेता था। यह अखिल भारतीय छात्र परिषद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्टूडैंट विंग है। कन्हैया कुमार को सन् 2015 में जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) छात्रसंघ के अध्यक्ष पद के लिए चुना गया था। फरवरी 2016 में जेएनयू में एक कश्मीरी अलगाववादी, 2001 में भारतीय संसद पर हमले के दोषी, मोहम्मद अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के खिलाफ एक छात्र रैली में राष्ट्रविरोधी नारे लगाने के आरोप में देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था। कन्हैया कुमार को तब दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। फिर 2 मार्च 2016 में अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया था, क्योंकि राष्ट्र विरोधी नारों में भाग लेने का पुलिस द्वारा कन्हैया कुमार का कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि जेएनयू के कुलपति द्वारा गठित एक अनुशासन समिति ने भी विवादास्पद घटना की जांच की। वहीं, प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर, कन्हैया कुमार और सात अन्य छात्रों को अकादमिक तौर पर वंचित कर दिया गया। कन्हैया कुमार पर राजद्रोह का मुकादमा चलाया गया। इस बीच कन्हैया कुमार की आटोबायोग्राफिक किताब भी छपी जिसका नाम है- ‘बिहार टू तिहार’।

जहां एक ओर राजनीति में अपराध की घुटपैंठ को रोकने की बात की जाती है वहीं संदिग्ध आरोपी को राजनीतिक प्रचार करने की छूट दी जाती है। या तो पहले क्लीनचिट दी जाती फिर चुनाव प्रचार से रोका जाना चाहिए था। क्योंकि मामला मामूली नहीं देश के मान-सम्मान का था। दूसरी ओर यदि कन्हैया कुमार राजनीति करने की आजादी थी तो शेष आजादी से उसे क्यों वंचित रखा गया? स्वाभाविक है कि इस तरह के प्रश्न प्रकरण को कमजोर बना सकते हैं। चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद कन्हैया कुमार ने आरोप पत्र को ’राजनीति से प्रेरित’ बताते हुए लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इसे दायर किए जाने पर इसके समय को लेकर सवाल उठाया। कन्हैया कुमार ने मीडिया से यह भी कहा, ’मुझे कोई समन या अदालत से कोई सूचना नहीं मिली है। लेकिन अगर यह सही है तो हम पुलिस और प्रधानमंत्री मोदी के शुक्रगुजार हैं कि आखिरकार तीन साल बाद जब उनके और उनकी सरकार के जाने का वक्त आ गया है तो आरोपपत्र दायर किया गया है। लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आरोपपत्र का दायर किया जाना प्रासंगिक है।’’ कन्हैया कुमार ने यह भी कहा कि ‘‘इस मामले में सनी देओल की फिल्म की तरह तारीख पर तारीख न दी जाए। उन्होंने कहा कि कोर्ट में स्पीडी ट्रायल चलाया जाए और फैसला सुनाया जाए। उन्होंने कहा कि मैं निर्दोष हूं, मुझे देश की न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है। कन्हैया ने बेगूसराय में कहा कि सरकार के पास कोई मुद्दा ही नहीं बचा है इसलिए वो ऐसे मामले को तूल दे रही है। केंद्र सरकार सिर्फ पाकिस्तान, मंदिर और हिंदू-मुसलमान की बात कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार पूरी तरह डिप्रेशन के दौर में आ गई है और दोबारा सत्ता पाने के लिए वह किसी भी हद से गुजरने को तैयार है।’’
वहीं, उमर खालिद ने बेंगलुरू में सेंट जोसेफ कॉलेज में छात्रों के एक समूह को ‘संविधान की रक्षा में युवकों की भूमिका’ विषय पर संबोधित किया। खालिद ने कहा कि हम आरोपों को खारिज करते हैं। कथित घटना के तीन साल बाद आरोपपत्र दाखिल करने का कदम चुनावों के ठीक पहले ध्यान भटकाने का एक प्रयास है। शहला राशिद ने कहा कि यह पूरी तरह से एक फर्जी मामला है जिसमें अंततः हर कोई बरी हो जाएगा। चुनावों के ठीक पहले आरोपपत्र दाखिल किया जाना दर्शाता है कि किस प्रकार भाजपा इससे चुनावी फायदा उठानी चाहती है। मैं घटना के दिन परिसर में भी नहीं थी। वहीं, भाकपा नेता डी राजा ने कहा कि यह राजनीति से प्रेरित है। तीन साल बाद दिल्ली पुलिस इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर रही है। हम इसे अदालत में और अदालत के बाहर राजनीतिक रूप से लड़ेंगे।

राजनीति में स्वार्थ साधने की कला में सभी माहिर होते हैं। हर दल अपने-अपने ढंग से मामले का व्याख्याकार बन बैठता है। कन्हैया के समर्थन में तेजस्वी भी आ गए। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी के खिलाफ मुंह खोलने वालों को सीबीआई, इडी, इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों से डराया जाता है। इसके अलावा उन्होंने यूपी की राजनीति पर कहा कि हम चाहते हैं कि बीजेपी के खिलाफ पूरे देश में गठबंधन बने। कुल मिला कर राजद्रोह मामले की रेलगाड़ी को एक बार फिर राजनीति की पटरी पर चलाने की जोड़-तोड़ गरमाने लगी है। बहरहाल, जेएनयू राजद्रोह मामले में आरोपपत्र का संज्ञान लेना या नहीं लेना मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पर निर्भर करेगा। लेकिन संक्रांति के लड्डुओं के बीच चार्जशीट का कंकड़ तो आ ही गया है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 17.01.2019)
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Thursday, December 20, 2018

चर्चा प्लस ... बड़ी कठिन है डगर ( एम.पी. में ) सी.एम. की - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
बड़ी कठिन है डगर ( एम.पी. में ) सी.एम. की
- डॉ. शरद सिंह
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ द्वारा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही कांग्रेस को एक बार फिर प्रदेश की सत्ता सम्हालने का अवसर मिला है । कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के पूर्व ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों ने अपने हठ का प्रदर्शन किया किन्तु समझाइश के बाद वे मान भी गए। यूं तो, अंत भला सो सब भला। लेकिन क्या सचमुच सब कुछ भला ही भला है? सरकारी खजाना संकटग्रस्त है, विरोधी कमर कसे हुए हैं, साथी भी छींटाकशी से बाज नहीं आ रहे हैं और उस पर 10 दिन में किसानों का कर्जमाफ करने की घोषणा का दबाव। बड़ी कठिन है डगर सी.एम. की। 

चर्चा प्लस ... बड़ी कठिन है डगर ( एम.पी. में ) सी.एम. की - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus column of Dr (Miss) Sharad Singh
 मध्यप्रदेश में नई सरकार ने शपथग्रहण कर लिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के पूर्व ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों ने अपने हठ का प्रदर्शन किया किन्तु समझाइश के बाद वे मान भी गए। अंत भला सो सब भला। कांग्रेस नेताओं की उपस्थिति में कमलनाथ ने ली मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। लेकिन क्या सचमुच सब कुछ भला ही भला है? कदापि नहीं। नए मुख्यमंत्री के लिए मध्यप्रदेश यानी एम. पी. की डगर आसान नहीं होने वाली है। नमूना शपथग्रहण समारोह के दौरान ही दिखाई दे गया। भारतीय जनता पार्टी ने 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के मामले में सज्जन कुमार को सोमवार को सुनाई गई। उम्रकैद की सजा को कांग्रेस के लिए बड़ा झटका बताते हुए कहा कि इस पार्टी को इसी नरसंहार के आरोपी कमलनाथ के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए। सिख विरोधी दंगों पर आए फैसले से जुड़ी एक प्रतिक्रिया में आम आदमी पार्टी का कहना है कि कमलनाथ को मध्य प्रदेश का सीएम नहीं बनाया जाना चाहिए। खैर इस राजनीतिक जुमलेबाजी को एक तरफ रख दिया जाए तो सबसे गंभीर मसला है कांग्रेस द्वारा की गई घोषणाओं के पूरा किए जाने का। विपक्ष ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि वे ‘दस दिन’ अपनी उंगलियों पर गिनते रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद 11 दिसंबर को प्रेस से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस राज्य के किसानों की कर्जमाफी की घोषणा 10 दिन के अंदर करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस हिसाब से मध्यप्रदेश में हालत इतनी सुगम नहीं है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 41 लाख किसानों ने 56,377 करोड़ रुपए का कर्ज ले रखा है। इनमें भी 21 लाख ऐसे किसान हैं जिहोंने 14,300 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है और उनकी कर्ज अदा करने वाली तारीख भी निकल चुकी है। वहीं दूसरी ओर किसान कर्ज माफी को उचित नहीं इहराते हुए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल समेत डिप्टी गवर्नर एस.एस. मूंदड़ा ने कहा था कि इससे कर्ज लेने और देने वाले के बीच अनुशासन बिगड़ता है। इतना ही नहीं, स्अेट बैंक ऑफ इंडिया की 2017 में चेयरपर्सन रहीं अरुंधति भट्टाचार्य ने भी किसान कर्जमाफी का विरोध किया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कर्ज लेने वाले कर्ज चुकाने के बजाय अगले चुनाव का इंतजार करने लगते हैं।
बैंक के कड़े रवैये के कारण राज्य सरकार को किसान कर्जमाफी के लिए आरबीआई से लोन लेना कठिन होगा। बैंक के कड़े दिशा-निर्देशों के कारण राज्य सरकार बहुत अधिक लोन नहीं ले पाएगी। नए नियमों के अनुसार कर्ज की सीमा एक हजार करोड़ रुपये अधिकतम कर दी गई है। उस मुसीबत यह कि रिजर्व बैंक एवं स्टेट बैंक की आपत्तियों के बावजूद मध्यप्रदेश की पिछली सरकार ने 5 अक्टूबर, 12 अक्टूबर और 9 नवंबर को क्रमशः 500 करोड़, 600 करोड़ और 800 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। इसके बाद 4 दिसंबर को भी लोन लिया गया था। जहां प्रदेश सरकार के पास खुद के कर्ज चुकाने के लाले पड़ने वाले हों, वहां किसानों की कर्जमाफी कैसे हो सकेगी, यह देखने का विषय रहेगा।
यह तो तय है कि कांग्रेस सरकार खजाने की हालत जनता को बताने के लिए श्वेतपत्र लाएगी। नए मुख्यमंत्री के लिए वित्तीय स्थिति को आमजनता के सामने रखना जरूरी है। इसके लिए सभी विभागों को अपनी-अपनी स्थिति को लेकर रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश पहले ही दे दिए गए हैं।
यहां समाचार न्यूज चैनल एनडीटीवी की 10 जुलाई 2018 की उस रिपोर्ट को याद करना जरूरी है जिसमें खुलासा किया था कि -‘‘ओवरड्राफ्ट की स्थिति के बावजूद चुनावी साल में शिवराज लगा रहे घोषणाओं की झड़ी । वित्तमंत्री बेफिक्र होकर कहते हैं कि चुनावी साल में घोषणाएं कौन सी सरकार नहीं करती. कांग्रेस कह रही है सरकार घबराहट में ऐलान कर रही है। 30 मई को मंदसौर में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने गरीबों को घर, तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिये चप्पल-साड़ी का ऐलान किया, कहा कि सरकार ने अभी तक गरीबों में 20000 करोड़ बांट दिये. तो वहीं 14 मई को भोपाल में बच्चों से कहा कि 12वीं के बाद सारी फीस उनके मामा भरेंगे, 75 फीसद लाने पर लैपटाप मिलेगा।’’ एनडीटीवी की इसी रिपोर्ट में कहा गया था कि-‘‘ 12 फरवरी को भोपाल के जंबूरी मैदान में धड़ाधड़ ऐलान करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ’सरकार 5 साल में खेती पर 38,000 करोड़ रुपये खर्चेगी। चुनावी साल में गरीबों के बिजली के पुराने बिल माफ करने के लिए बिजली बिल समाधान योजना तो मजदूरों के लिये संबल योजना, किसानों के लिये किसान समृद्धि योजना जैसे कई ऐलान ताब़ड़तोड़ कर डाले, ये भूलकर कि इन योजनाओं ने सरकार की आर्थिक हालत खराब कर दी है। राज्य पर एक लाख 82000 करोड़ का कर्ज है, 15 साल बाद ओवर ड्राफ्ट के हालात हैं लेकिन वित्त मंत्री निश्चिंत हैं। वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कहा, “हम संवदेनशील हैं, खजाने में कुछ दे दें तो क्या दिक्कत है, साढ़े 14 साल रेवेन्यू सरप्लस रहा है हमें कोई दिक्कत नहीं है, खजाना भले खाली हो जाए, गरीब की आंखों में आंसू नहीं देख सकते, क्या फर्क पड़ता है ओवरड्राफ्ट से।’’ तो, इस तरह भावुकता भरे बयान तत्कालीन सरकार की ओर से आते रहे।
एनडीटीवी ने जो आंकड़े दिए थे उन पर भी नज़र डालना जरूरी है- पिछली सरकार ने संबल योजना में 2500 करोड़ रुपए, बिजली बिल समाधान योजना में 3000 करोड़ रुपए, सरकारी कर्मचारियों को दिये गये सातवें वेतनमान में 1500 करोड़ रुपए, किसानों को पुराने साल की खरीद के बोनस में 2050 करोड़ रुपए, कृषक समृद्धि योजना में 4000 करोड़ रुपए और शिक्षकों को एक विभाग में समायोजित करने में 2000 करोड़ रुपए का खर्चा सरकारी खजाने पर पड़ा। सरकार ने 11 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट लाकर हालत सुधारने की सोचा किन्तु मात्र 5000 हजार करोड़ रुपयों की ही व्यवस्था हो पाई।
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस ने समर्थन के आधार पर बहुमत पा कर अपनी सरकार बना ली है लेकिन कर्ज में डूबा मध्यप्रदेश का सरकारी खजाना कांग्रेस सरकार के लिए कांटों भरा रास्ता है नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खराब वित्तीय हालात हैं। प्रदेश के ऊपर पौने दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है। कर्मचारियों को सातवां वेतनमान और एरियर देने, अध्यापकों के संविलियन, भावांतर भुगतान, किसानों को प्रोत्साहन राशि देने, संबल योजना सहित अन्य योजनाओं के चलते सरकार का खर्च बहुत बढ़ गया है। जीएसटी लागू होने और पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करने से आय घटी है। विकास योजनाओं के खर्च की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक के जरिए बाजार से लगातार कर्ज लिया गया है। जीएसटी के कारण टैक्स लगाने के क्षेत्र बेहद सीमित हो गए हैं। पिछली सरकार के द्वारा दी जाने वाली वित्तीय छूटों के विरुद्ध समय-समय पर विरोध भी किए जाते रहे किन्तु जयकारों के स्वर में विरोध के स्वर दबते चले गए। अंततः यही विरोध भाजपा को हार के रूप में झेलना पड़ा। भाजपा सरकार चली गई और प्रदेश की कर्ज तले दबी वित्तीय स्थिति कांग्रेस के रास्ते का रोड़ा बन गई है। फिर भी यह प्रश्न उभरता है कि यदि पिछली सरकार फिर सत्ता पर आती तो इस प्रदेशिक सरकारी कर्ज से कैसे कांग्रेस सरकार को अपने वचन पूरा करने के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन की जरूरत होगी। ऐसे में एक पार पाती? जनता को दिखाए गए सारे सपने क्या 2019 के चुनाव के बाद सरकार द्वारा खुद ही छीन लिए जाते ताकि वह सरकारी खजाने को बचा सके या फिर कर्ज का सिलसिला अनवरत चलता रहता जो कि अर्थशास्त्रियों के अनुसार घातक सिद्ध होता। बहरहाल, नई सरकार खजाने के लिए धन जुगाड़ने को एक कदम यह भी उठा सकती है कि सरकार खर्चों में कटौती की जाए।
राहुल गांधी द्वारा किए गए किसानों की कर्जमाफी के वादे को मध्यप्रदेश सरकार हर संभव पूरा करने के लिए कटिबद्ध है और अब कर्जमाफी के आदेश पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। इससे बढ़ने वाले आर्थिक भार के संदर्भ में यह मानना चाहिए कि इसके लिए कांग्रेस ने कोई न कोई बैकअप प्लान तय कर रखा होगा क्योंकि राहुल गांधी इस तरह की लुभावनी घोषणा नहीं करते। वह भी ऐसे समय में जब मध्यप्रदेश में विपक्ष बलशाली है और 2019 का चुनाव बाट जोह रहा है और प्रदेश की वित्तीय दशा अत्यंत कमजोर है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 20.12.2018)
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Monday, March 26, 2018

अमूल्य चित्र कथाक्रम-2012 लखनऊ के ... डॉ शरद सिंह

Kathakram 2012 -Lucknow- Dr (Miss) Sharad Singh

Kathakram 2012 -Lucknow- Khashi Nath Singh ji - Photo Click by Dr (Miss) Sharad Singh

प्रिय मित्रो, आज वो तस्वीरें शेयर कर रही हूं जो लखनऊ के कथाक्रम-2012 आयोजन के दौरान स्टेट गेस्ट हाऊस में सुबह के नाश्ते के पहले मेरे मोबाईल कैमरे से हमने खींची थीं। उस दौरान श्रद्धेय काशीनाथ सिंह जी और मैंने अमरीक सिंह दीप जी की पगड़ी अपने सिर पर धारण की थी.... और वह पल कम से कम मेरे लिए हमेशा अविस्मरणीय रहेगा। क्योंकि एक पवित्र पगड़ी को अपने सिर पर धारण करने के बाद जो मुझे सुखद अनुभूति हुई वह शब्दों में बयान कर पाना संभव नहीं है।
इनमें से श्रद्धेय काशीनाथ सिंह जी की तस्वीर मैंने क्लिक थी तथा शेष वहीं के एक अटैडेट ने क्लिक की थीं। तस्वीरों में हैं - श्रद्धेय काशीनाथ सिंह जी, परमानंद श्रीवास्तव जी, अमरीक सिंह दीप जी, दादा भाई दिनेश कुशवाहा जी, भाई अशोक मिश्रा जी और मैं डॉ. (सुश्री) शरद सिंह।
उन दिनों मेरे पास Nokia N73 मोबाईल हुआ करता था। ये फोटो उसी से क्लिक की गई थीं। 
 
Kathakram 2012 -Lucknow- From Left - Dr Sharad Singh, Khashi Nath Singh ji, Parmanand Shrivastav and Amrik singh Deep

Kathakram 2012 -Lucknow - Parmanand Shrivastav and Dr Sharad Singh
Kathakram 2012 -Lucknow- From Left - Amrik singh Deep , Dinesh Kushawah, Dr Sharad Singh, Ashok Mishra and Parmanand Shrivastav

Kathakram 2012 -Lucknow- From Left - Kashi Nath Singh ji , Dr Sharad Singh, Parmanand Shrivastav and Amrik singh Deep
Kathakram 2012 -Lucknow- From Left -Dinesh Kushawah, Dr Sharad Singh, Ashok Mishra and Parmanand Shrivastav

Dear Friends, Today I am sharing pictures which were taken from my mobile camera before breakfast in state guest house during the Kathakram-2012, Lucknow. At that time, the Respected Kashinath Singh ji and I used to wear on our head the 'Pagari' (Turban) of Amrik Singh Deep ji .... and that moment will always be unforgettable for me at least. Because after holding a Sacred Turban on my head, it is not possible to make a statement in the words which I have experienced.
The picture of Kashinath Singh ji was a click by me and the rest of the an attendant.
In the photographs - Respected Kashinath Singh ji, Parmanand Shrivastav ji, Amrik Singh Deep ji, Dada Bhai Dinesh Kushwaha ji, Bhai Ashok Mishra ji and I Dr. (Miss) Sharad Singh.
In those days I used to have a Nokia N73 mobile. These photos were clicked from the same.

Thursday, April 6, 2017

शरद सिंह भारत भवन में कहानीपाठ हेतु आमंत्रित

Bharat Bhavan calling me and my story ....
... In the glance of my Sagar city news papers
Affinity of My Sagar City News Papers ...


Thanks to all Media Friends & News Papers !!!

Aacharan, Sagar Edition, 06.04.2017 Sharad Singh ka kahani paath Bharat Bhavan me
Patrika, Sagar Edition, 06.04.2017 Sharad Singh ka kahani paath Bharat Bhavan me
Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 06.04.2017 Sharad Singh ka kahani paath Bharat Bhavan me

Nav Dunia, Sagar Edition, 06.04.2017 Sharad Singh ka kahani paath Bharat Bhavan me

Saturday, July 2, 2016

चर्चा प्लस ... क्या हुआ था ‪‎श्यामा प्रसाद मुखर्जी‬ के साथ? ... - डॉ. ‪शरद सिंह‬

मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस" "दैनिक सागर दिनकर" में (30. 06. 2016) .....
 

My Column Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....








चर्चा प्लस 

        क्या हुआ था ‪‎श्यामा प्रसाद मुखर्जी‬ के साथ?

                                             - डॉ. शरद सिंह‬ 

डाॅ. अली मोहम्मद अैर डाॅ रामनाथ परिहार, एम डी की रिपोर्ट के आधार पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु की सूचना 23 जून को कश्मीर सरकार द्वारा जारी की गई। इस सूचना के विपरीत नर्सिंगहोम में कार्यरत स्वास्थ्य कर्मियों एवं अस्पताल में भर्ती अन्य मरीजों के अनुसार श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हालत बिगड़ने पर उन्हें एक इंजेक्शन लगाया गया था। जिसके बाद 2 बज कर 30 मिनट पर श्यामा प्रसाद जी की मृत्यु हो गई थी। जबकि शासकीय सूचना में मृत्यु का समय 3 बजकर 40 मिनट बताया गया था। इस तरह के तथ्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु को ले कर अनेक संदेहों को जन्म देते हैं।
 
सन् 1901 की 06 जुलाई को जन्मे डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने अध्ययनकाल से ही तत्कालीन शासन व्यवस्था में सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों के विशद् जानकार के रूप में समाज में अपना विशिष्ट स्थान अर्जित कर लिया था। डाॅ. मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे। इसलिए उन्होंने सक्रिय राजनीति कुछ आदर्शों और सिद्धान्तों के साथ प्रारम्भ की। सार्वजनिक जीवन में पदार्पण करने के पश्चात् उन्होंने अपनी प्रखर विचारधारा से, सम्मेलनों, जनसमपर्क एवं सभाओं के माध्यम से, अपने ज्वलन्त उद्बोधनों से, जनता के मन में एक नयी ऊर्जा व नये प्राण का संचार किया। उनकी लोकप्रियता और उनकी ख्याति प्रतिदिन बढ़ती गयी। 

डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहां का मुख्यमन्त्री वजीरे-आजम अर्थात् प्रधानमंत्री कहलाता था। संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डाॅ. मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। वे जानते थे कि यदि आज एक राज्य पृथक्करण का रास्ता थाम लेगा तो अन्य प्रांतों में भी अलगाव की आग धधक उठेगी और देश का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि ‘‘या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’’
उन्होंने तात्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ़्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।
यहां प्रस्तुत है मेरी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व: श्यामा प्रसाद मुखर्जी’’ के कुछ महत्वपूर्ण अंश।
  मृत्यु से जुड़े प्रश्न
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने साथियों सहित स्वयं जम्मू-कश्मीर जाने का निर्णय लिया। इसके साथ ही उन्होंने पंडित दीन दयाल उपाध्याय, वैद्य गुरूदत्त, प्रो. बलराज मधोक तथा अन्य सहयोगियों से विचार विमर्श करने के उपरान्त 5 मार्च 1953 को पूरे देश में जम्मू-कश्मीर दिवस मनाने का आह्वान किया। जम्मू-कश्मीर की स्थिति का सही आकलन कर पाना कठिन था इसलिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तय कर लिया कि वे स्वयं जम्मू जाएंगे और स्वयं वहां की स्थिति का जायजा ले कर शेख अब्दुल्ला की अलगाववादी नीति को समूचे देश के समक्ष उजागर करेंगे। उन्होंने जनसभाएं करते हुए अपनी यात्रा आरम्भ की। उन्हें भरपूर समर्थन मिलने लगा। जिससे घबरा कर उन्हें जम्मू से पहले ही रावी नदी के पुल पर गिरफ्तार कर 12 मई 1953 को लिया गया। 12 मई 1953 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रीनगर में निशातबाग के समीप स्थित एक छोटे से बंगले में नज़रबंद कर दिया गया। नज़रबंदी के दौरान उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया जाता था। 18 मई 1953 को उनके दाएं पैर में दर्द और हल्के ज्वर की अनुभूति उन्हें हुई। इसके बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता ही गया। 22 जून को चार बजे सुबह श्यामा प्रसाद मुखर्जी को दिल का तेज दौरा पड़ा। वैद्य गुरुदत्त ने देखभाल की जिससे स्वास्थ्य में सुधार हुआ। किन्तु 23 जून की सुबह 4 बज कर 30 मिनट पर वैद्य गुरुदत्त को सूचना दी गई कि डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का प्रातः 3 बजकर 40 मिनट पर निधन हो चुका है। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

डाॅ. अली मोहम्मद अैर डाॅ रामनाथ परिहार, एम डी की रिपोर्ट के आधार पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु की सूचना 23 जून को कश्मीर सरकार द्वारा जारी की गई। इस सूचना के विपरीत नर्सिंगहोम में कार्यरत स्वास्थ्य कर्मियों एवं अस्पताल में भर्ती अन्य मरीजों के अनुसार श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हालत बिगड़ने पर उन्हें एक इंजेक्शन लगाया गया था। जिसके बाद 2 बज कर 30 मिनट पर श्यामा प्रसाद जी की मृत्यु हो गई थी। जबकि शासकीय सूचना में मृत्यु का समय 3 बजकर 40 मिनट बताया गया था। इस तरह के तथ्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु को ले कर अनेक संदेहों को जन्म देते हैं।


वैद्य गुरुदत्त का संदेह
वैद्य गुरुदत्त जम्मू-कश्मीर की यात्रा में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ रहे। माधवपुर पोस्ट पर गिरफ़्तारी के समय उन्हें भी श्यामा प्रसाद जी के साथ नज़रबंद कर श्रीनगर में निशातबाग स्थित छोटे से काॅटेज में बनाई गई अस्थाई जेल के एक छोटे से कमरे में बंदी के रूप में रखा गया था। वैद्य गुरुदत्त सुविख्यात साहित्य साधक तथा आयुर्वेद के निष्णात वैद्य थे। वैद्य गुरुदत्त ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा था -‘‘जहां डाॅ. मुखर्जी को नज़रबंद रखा गया था, वहां डाॅ. मुखर्जी की स्थिति बिगड़ने के बावजूद उन्हें कोई डाॅक्टरी सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई थी। डाॅ. मुखर्जी द्वारा यह इच्छा प्रकट करने के बाद भी कि नज़रबंद साथियों को अस्पताल लाया जाए, उनके साथियों को तब तक कोई सूचना नहीं दी गई जब तक कि उनकी मृत्यु नहीं हो गई।’’
बैरिस्टर उमाशंकर त्रिवेदी का आरोप
बैरिस्टर उमाशंकर त्रिवेदी विधिवेत्ता एवं संसद सदस्य थे। उन्होंने डाॅ. मुखर्जी की नज़रबंदी को अवैध बताते हुए जम्मू-कश्मीर उच्चन्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण का मुकद्दमा दायर किया था। बैरिस्टर त्रिवेदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के एक दिन पूर्व 22 जून 1953 को अस्पताल में डाॅ. मुखर्जी से मुलाकात की थी। तब वे कमजोर होने के बावजूद प्रसन्नचित्त दिखाई दिए थे। श्यामा प्रसाद जी की मृत्यु के प्रति संदेहास्पद परिस्थितियों को लेकर उपजे संदेहों को लेकर अपने वक्तव्य में बैरिस्टर त्रिवेदी ने निम्नलिखित आरोप लगाए थे- ‘‘22 जून को प्रातः काल 4 बजे जब डाॅ. मुखर्जी को पहली बार हृदय पीड़ा हुई तब डाॅक्टरों द्वारा उन्हें पूर्णतया विश्राम करने का परामर्श नहीं दिया गया। उनकी बिगड़ती हालत को देखते हुए उनको सहयोगियों के आग्रह के बावजूद तत्काल अस्पताल नहीं ले जाया गया और सात घंटे का बहुमूल्य समय नष्ट कर दिया गया। उनको एम्बुलेंस गाड़ी में नहीं बल्कि एक छोटी टैक्सी में बड़ी असुविधा के साथ अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में दाखिल होने के बाद भी उनका तात्कालिक उपचार नहीं किया गया। बीमारी की गंभीरता पर ध्यान नहीं दिया गया। जेल सुपरिंटेंडेंट से सुबह के समय ही डाॅ. मुखर्जी को अस्पताल पहुंचाए जाने हेतु आग्रह किया गया था किन्तु उन्होंने समय बरबाद कर दिया और सवा घंटे तक डाॅ. रैना से बातें करते रहे। डाॅ. मुखर्जी ने अपने दांए पैर के दर्द और ज्वर के समय कोलकाता के सुयोग्य डाॅक्टरों द्वारा दिए गए परामर्श के आधार पर उन्हें स्ट्रेप्टो माईसिन का इंजेक्शन नहीं लगाए जाने हेतु डाॅ. अली मोहम्मद से अनुरोध किया था। उनके अनुरोध एवं स्पष्ट विरोध के बावजूद उनके शारीरिक स्थिति की जांच किए बिना डाॅ. अली मोहम्मद ने उन्हें स्ट्रेप्टो माईसिन का इंजेक्शन लगा दिया था।’’
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संदेहास्पद मृत्यु पर प्रश्न उठाते हुए जयप्रकाश नारायण ने मांग की थी कि - ‘‘मैं नहीं जानता कि प्रधानमंत्री के सामने कौन-से तथ्य पेश किए गए, जो कुछ तथ्य मेरी जानकारी में आए हैं, उनसे तो कुछ और ही निष्कर्ष निकलता है। मुझे ऐसा लगता है कि ऐसी राष्ट्रीय शोक की घटना के बाद भारत सरकार को चाहिए कि कम से कम इस सारे मामले की उचित एवं निष्पक्ष जांच की व्यवस्था करे। ’’ अटलबिहारी वाजपेयी ने भी शोक संतप्त हो कर कहा था कि -‘‘ डाॅ. मुखर्जी ने देश की अखण्डता की रक्षा के लिए भारत के मुकुट कश्मीर को भारत से अलग करने के षडयंत्र का पर्दाफाश करते हुए अपना बलिदान दिया। उनकी मृत्यु निश्चित ही संदिग्ध अवस्था में हुई है। इसकी जांच अवश्य ही कराई जानी चाहिए।’’ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु किसी को भी स्वाभाविक प्रतीत नहीं हो रही थी। हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता, सांसद तथा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अनन्य सहयोगी निमर्लचंद्र चटर्जी ने 18 सिम्बर 1953 को लोकसभा के सत्र में जांच की मांग रखी थी।

अविस्मरणीय योगदान
डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी यदि चाहते तो बैरिस्टर अथवा किसी विश्वविद्यालय का कुलपति बन कर सुख-संपदा के साथ जीवन व्यतीत कर सकते थे। यदि वे चाहते तो जीवन संगिनी की मृत्यु होने पर दूसरा विवाह कर के सांसारिक सुखों का आनन्द ले सकते थे किन्तु वे संभवतः सुख और सम्पदा के उपभोग के लिए बने ही नहीं थे। सुख का अर्थ उनके लिए भौतिक सुख नहीं वरन् राष्ट्रप्रेम था। उन्होंने अखण्ड भारत का स्वप्न देखा और उसी स्वप्न को पूरा करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह उन्हीं का प्रयास था कि समूचा बंगाल भारत से अलग नहीं हुआ। जम्मू-कश्मीर जो पृथक्करण के द्वार पर जा खड़ा हुआ था, डाॅ. मुखर्जी के आत्मोत्सर्ग से देश का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।