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Tuesday, July 15, 2025

पुस्तक समीक्षा | भावनाओं की गहराई से उलीची गईं कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज'आचरण' में पुस्तक समीक्षा
भावनाओं की गहराई से उलीची गईं कविताएं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - बंजारा मन पथरीली आंखें
कवयित्री     - श्रीमती विमल बुन्देला
प्रकाशक     - जे.टी.एस. प्रकाशन, वी-508, गली नं.17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य        - 500/-
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कविताएं भावनाओं के प्रस्तुतिकरण का सबसे कोमल एवं सटीक माध्यम होती हैं। जयशंकर प्रसाद ने काव्य को ‘‘आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति’’ कहा है। वहीं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘‘कविता क्या है?’’ इस विषय पर पूरा एक विस्तृत निबंध लिखा है, जिसमें वे लिखते हैं कि-‘‘कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती। कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं। कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है। हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है।’’
कवयित्री विमल बुन्देला की कविताओं से गुज़रते हुए जयशंकर प्रसाद एवं आचार्य रामचंद्र शुक्ल दोनों के विचार प्रतिध्वनित होते सुनाई पड़ते हैं। विमल बुन्देला ठहराव की कवयित्री हैं, उनकी कविताओं में उद्विग्नता का भाव तीव्र आवेग के साथ नहीं वरन शनैः-शनैः उभरता है। वे अपने भावों को व्यक्त करने में कोई शीघ्रता नहीं बरतती हैं अपितु अपने भीतर उनका मंथन करती हैं फिर उन्हें कविता के रूप में उद्घाटित कर देती हैं। विमल बुन्देला के काव्य की ये विशेषताएं उनके नवीनतम काव्य संग्रह ‘‘बंजारा मन पथरीली आंखें’’ में अनुभव की जा सकती हैं। वरिष्ठ कवि सुरेंद्र शर्मा ‘‘शिरीष’’ ने सटीक टिप्पणी की है कि ‘‘उनका (विमल बुन्देला का) भाव-संसार एवं शिल्प परम्परा सम्मत एवं नवीनता के प्रति सम्मोहित है। उनकी रचनायें परम्परा व आधुनिकता के मध्य सेतु समान है। उनका रचना संसार पर्याप्त विस्तार लिए हुए हैं। उनकी अभिव्यक्ति का फलक विस्तृत है।’’
विमल बुन्देला की कविताओं में नारी जीवन के विविध आयाम अपनी सूक्ष्मता के साथ प्रस्तुत हुए हैं। वे अपने अनुभवों को जग के अनुभवों में ढाल कर व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाती हैं। इसीलिए संग्रह की कविताओं पर ‘‘एक दृष्टि’’ शीर्षक से लिखते हुए संस्कृतिविद साहित्यकार डाॅ. बहादुर सिंह परमार ने लिखा है कि ‘‘नारी जीवन की पीड़ा, विवशता और संघर्ष की गाथा तो प्रत्येक रचना में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से झांकती मिल जाएगी। इनकी रचनाएं नारी मन को कोमल सूक्ष्म भावनाओं के साथ संवेदना से सराबोर है। प्रेम के विविध रूपों के साथ पिता के प्रति भावनात्मक जुड़ाव इनकी कविताओं में है, जो विमल जी की कविताओं में मिलता है। उनके पात्र निराश नहीं बल्कि संघर्ष में संपृक्त आशा से भरे हैं।’’
वहीं कथाकार आभा श्रीवास्तव ने विमल बुन्देला की कविताओं के विविध पक्षों पर दृष्टिपात करते हुए लिखा है कि कवयित्री की ‘‘प्रत्येक रचना विभिन्न पहलुओं को स्पर्श करती हुयी मानवीय धरातल को अभिव्यक्त करती है। सरल शब्दों में धरा प्रवाहित है। भाषा परिष्कृत है। कहीं-कहीं नये उपमान के माध्यम से भी अपनी बात कुशलता से कहीं है। अपने काव्य ग्रन्थ को अनमोल बनाया है। कवितायें नीतिगत तथ्यों को इंगित करती हैं। साथ ही अन्याय के प्रति भी स्वर मुखरित हुआ है। जीवन को काव्य में व्यापक रूप में प्रस्तुत किया गया है। सामाजिक जीवन की विषमतायें नूतन सौंदर्य बोध के साथ आयी हैं। सरल सरल व स्वाभाविक प्रस्तुति काव्य संग्रह की विशेषता है। प्रतीक और बिम्ब लोक-जीवन से ही लिये गये हैं।’’
वरिष्ठ कवयित्री मालती श्रीवास्तव ने विमल बुन्देला के काव्य में सामाजिक चेतना के साथ आध्यात्मिक अनुभूतियों को भी महसूस किया है। वे लिखती हैं कि ‘‘जीवन चेतना सामाजिक चिन्तन, आध्यात्मिक अनुभूतियां मूल प्रवृत्तियां, उनकी रचनाओं में सहजता, सरलता, भव्यता से परिलक्षित होती है। संसार और जीवन के सत्य की अनन्यता की झांकी सौंदर्य में लपेट कर उनका प्रस्तुतिकरण आनंद से ओतप्रोत होता है।’’
संग्रह में विविध भाव धरातल की 82 कविताएं हैं जिनमें अंतिम रचना में कई मुक्तक समाहित हैं। संग्रह को आद्योपांत पढ़ने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि कवयित्री विमल बुन्देला अपने पिता के अधिक करीब थीं। उन्होंने अपना यह संग्रह अपने पिताश्री को समर्पित किया है तथा संग्रह में पिता पर एक कविता भी है-‘‘पिता के लिए’’। इस कविता की कुछ पंक्तियों देखिए-
आज हाथ जो कँपकँपा रहे हैं, 
इन्हीं को थामे कभी चली थी मैं, 
इन्ही उँगलियों को थामे, 
जीवन संघर्ष में बढ़ी थी मैं, 
वो बुलन्द आवाज, वो निर्भीक आँखें,
वो दृढ़ चेहरा, वो सदी हुई साँसें, 
वो उठे हुए कदम, जो मंजिल तक पहुँचे, 
आज बुढापे ने छीन ली,
उनके नीचे की जमीन और ऊपर की छत, 
ऊपर वाले, क्या यही है तुम्हारा न्याय ?
क्या यही हैं, बचपन और यौवन की अंतिम परिणति ? 
क्या यही हैं जीवन की नियति ?
- यह कविता पिता के प्रति पुत्री की संवेदनाओं को बड़े मार्मिक ढंग से मुखर करती है। किन्तु मीराबाई का स्मरण करते ही कवयित्री अकुलाकर पुरुष समाज की उस दूषित मानसिकता को रेखांकित करती है जहां स्त्री को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। वे राणा से प्रश्न करती हैं अपनी कविता के रूप में-‘‘राणाजी तेरा क्या बिगाड़ गई मीरा?’’ वे लिखती हैं-
राणाजी तेरा क्या बिगाड़ गई मीरा?
हर पल श्यामल मूरत देखी, 
जीवन उन पर वारा, मन दर्पण में मनमोहन को, 
धारण किया निहारा, जब भी व्याकुल हुई 
दुखों से तारणहार पुकारा। 
राणाजी तेरा क्या.....
किन्तु कवयित्री जानती है कि दुनिया में सब एक समान नहीं हैं। कोई अच्छा है तो कोई बुरा है। सत और असत दोनों इसी संसार के दो पहलू हैं। इसीलिए वे आग्रह करती हैं कि असत से घबराने की आवश्यकता नहीं है, बस, सतर्कता जरूरी है। अपनी कविता ‘‘दुनिया का खेल’’ में वे लिखती हैं-
एक टीम और एक हाथ में, कभी बाल न रह पाती, 
चूक ना हो जाए गफलत में, गोल सम्भलकर करना रे।
गलत बात और गलत साथ से, समझौता क्या करना रे, 
जाना तो सबको है एक दिन, डर डर क्या रहना रे।
दृढ़ संकल्पों के बल पर ही, जीवन खेल निकलना रे, 
फिसलन-फिसलन सभी जगह है, गिरना नहीं सम्भलना रे।
जीवन के उतार-चढ़ाव की बारीकियों को समझने की सीख देने के साथ ही विमल बुन्देला ने ‘‘बीज का विश्वास’’ कविता में आशावादिता का प्रबलता से पक्ष लिया है। यदि व्यक्ति में आत्मविश्वास हो तो जीवन का कोई भी झंझावात उसे डिगा नहीं सकता है अपितु वह स्वयं दूसरे के लिए उदाहरण बन सकता है। यही तथ्य सामने रखा है इस कविता में- 
और एक दिन अमावस के एक प्रहर ने, 
सूरज से कहा, कहाँ है तुम्हारी किरणें,
और कहाँ है तुम्हारा आकार, 
कौन कहता है कि तुम सृष्टि के नायक हो, 
मेरा अन्धकार जब आता है, पूरे जड़ चेतन पर छा जाता है।
तब एक दिन एक नन्हें से बीज ने, सर उठाकर कहा, 
सूरज के प्रकाश व उष्णता का, अर्थ मैं बताता हूँ, 
जब मैं धरती का सीना चीर कर, लहलहाता हूँ 
तब सूरज क्या है, उसका अर्थ बताता हूँ।
मध्यप्रदेश के छतरपुर की निवासी विमल बुन्देला की अब तक कुल तीन कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। वे भीड़ की कविता नहीं, वरन एकान्त की कविता लिखती हैं एवं सतत सृजनशील हैं। उनका यह संग्रह ‘‘‘‘बंजारा मन पथरीली आंखें’’ भले ही हौले से दस्तक देता लगे किन्तु इसकी थाप की अनुगूंज देर तक मन-मस्तिष्क पर प्रभावी रहती है। इनमें अलंकारिकता की गहरी छाप भले ही न हो किन्तु रस है, प्रवाह है और लयात्मक शब्द विन्यास है। यह विश्वास किया जा सकता है कि भावनाओं की गहराई से उलीची गई इस संग्रह की कविताएं पाठकों को पसंद आएंगी।   
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(15.07.2025)
#पुस्तकसमीक्षा   #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण #DrMissSharadSingh

Tuesday, September 26, 2023

पुस्तक समीक्षा | कविताएं जिनमें भावनाओं का नादस्वर है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 26.09.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई श्री सिद्धार्थ बाजपेयी के काव्य संग्रह "आसान सी बातें" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
कविताएं जिनमें भावनाओं का नादस्वर है
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - आसान सी बातें
कवि        - सिद्धार्थ बाजपेयी
प्रकाशक    - डब्ल्यू डब्ल्यू नोशन प्रेस डाॅट काम
मूल्य       - 180/-
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महाकवि निराला ने एक बार कहा था कि ‘‘कविता नितान्त निजी भावनाएं होते हुए भी सार्वभौमिक होती हैं। उनमें चाहे तो ब्रह्माण्ड समा सकता है।’’ बात एकदम सही है। कविता चाहे पीड़ा से उपजे या प्रेम से, रणभूमि के तुमुल कोलाहल से उपजे अथवा चिड़ियों के कलरव से, कवि की भावना में सम्पूर्ण जगत की भावना समाई रहती है। भले ही कवि कहे कि ‘‘मैं कवि नहीं हूं’’, किन्तु उसकी कविताओं में यदि काव्यात्मक भावनाओं का नादस्वर है तो उसे निर्विवाद रूप से कवि कहा जा सकता है। सिद्धार्थ बाजपेयी एक ऐसे ही कवि हैं जो स्वयं को कवि कहने से हिचकते हैं किन्तु उनकी कविताएं उनके कवित्व को पूरी तरह मुखर करती हैं।
‘‘आसान सी बातें’’ सिद्धार्थ बाजपेयी का प्रथम काव्य संग्रह है जिसमें उनकी कुल 59 कविताएं संग्रहीत हैं। 1957 में जन्में, भौतिक शास्त्र में स्नात्कोत्तर, भारतीय स्टेट बैंक से उप महाप्रबंधक के पद से सेवा निवृत। अंग्रेजी में भी उनकी एक पुस्तक प्रकाशित है ‘‘पेपर बोट राईड’’। हिन्दी में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। अब हिन्दी में उनका यह प्रथम काव्य संग्रह है। वस्तुतः प्रथम काव्य संग्रह का अर्थ हमेशा यह नहीं होता है कि उसमें आरंभिक अथवा कुछ-कुछ कच्ची कविताएं होंगी। कई बार प्रथम काव्य संग्रह में वे कविताएं होती हैं जिन्होंने अनुभव, आकलन एवं चिंतन-मनन का एक लंबा सफर तय किया हुआ होता है। सिद्धार्थ बाजपेयी के इस प्रथम संग्रह की कविताएं भी इसी श्रेणी की कविताएं हैं। इनमें प्रकृति को आधार बना कर संवेदना के व्यापक संसार की यात्रा की गई है। संग्रह की पहली कविता की पंक्तियां देखिए जिसका शीर्षक है ‘‘बरगद देखता है’’-
बरगद देखता है एकटक
बादलों को
झूलती जटाएं हटाकर
पत्तों की हजार हजार आँखों से
पूरा आकाश देखता है
अपलक अहर्निश
पूरी पूरी पृथ्वी को
अकुला कर/अपने प्राणों में
चिड़या देखती है
घोंसले में चीखती भूख को
घास का हरा तिनका/यकायक
सुधबुध खो देखता है
पूरी देह से/हवा को
मैंने तुमको देखा/ऐसे देखा,/ऐसे देखा।

बरगद की जटाएं चेहरे पर लटकती लटों की कल्पना के साथ पत्तों को बरगद की आंखें मान कर कवि ने भावनाओं का जो ताना-बाना बुना है, वह सहसा आकर्षित करता है तथा एक दृश्य रच देता है पढ़ने वाले की आंखों के सामने। इसी तरह एक कविता है ‘‘शब्दार्थ’’। यह कविता प्रेम का सात्विक एवं आत्मिक स्वरूप प्रस्तृत करती है। इसमें भी आधार है प्रकृति जिसके द्वारा कवि ने प्रेम के स्वरूप को व्याख्यायित किया है।-
प्रेम साफ पानी का झरना है
हरे जंगल की ऊँची एकांत पहाड़ी पर
गिरता हुआ/पत्थरों पर बह कर
बदलता हुआ नए पत्तों और सफेद फूलों में
प्रेम एक उदास रेल लाइन है
जो गुजरती है दूर तक
दोपहर की सांय सांय में
सुरंगों और जंगलों को पार कर/देर रात
नालों और पुलों पर चलती है
प्रेम तेज बारिश से धुंधली हुई शाम में
आल्हा का बिखरता आलाप है
जो कोष्टापारा के थके जुलाहे के
गले से निकल कर /तिर जाता है हवा में
सुनसान आकाश की चांदनी में
झुन्ड से बिछुडे
अकेले पाखी की निशब्द यात्रा,
दिसंबर की सर्द रात खाली से बस स्टैंड पर
ठिठुरते यात्री की हठी प्रतीक्षा,
और बार बार दिखना बंद आँखों को भी
एक खिला खिला अमलतास
अरे, वह भी प्रेम है!

सिद्धार्थ बाजपेयी स्वयं को कवि बनने की दौड़ में नहीं पाते हैं, यही कारण है कि उनकी कविताएं हड़बड़ी में नहीं वरन, तसल्ली से लिखी गई कविताएं हैं जिनमें उनका कहन पूरी तरह स्पष्ट है। सिद्धार्थ बाजपेयी की कविताओं में कथ्य की विविधता है। वे निज के साथ सर्व की बात कहते हैं। वे सांसारिकता के साथ अलौकिक ईश्वरीय बात करते हैं जिससे उनका ‘ईश्वर’ प्रकृति के कण-कण में रूपायित दिखाई देता है। कविता देखिए ‘‘ईश्वर की हंसी’’, कुछ पंक्तियां-
एक छोटी हरी पत्ती में
छुपा होता है आदिम जंगल का अट्टहास
नदी की बूंदों में चमकता है
हिमालय से बहते
पुराने ग्लेशियर का बर्फीला स्पर्श
सड़क पर पड़े पत्थरों में कैद है
पिघलती विशाल चट्टानों का
सदियों पुराना ताप
अनंत आकाश हिलोरें लेता है
तुम्हारी आँख की पुतली में
घास के फूलों में झलक आती है
यकायक ईश्वर की हंसी!

‘‘आसान सी बात’’ कविता संग्रह की कविताओं में एक ऐसा ताज़ापन है जो मन को शीतलता प्रदान करता है। संग्रह में प्रकृति और नैसर्गिक वातावरण को साधारण से शब्दों के माध्यम से संप्रेषित करते हुए भी ऐंद्रजालिक अहसास पिरो दिए गए हैं। साथ ही, रिश्तों के महत्व को दर्शाती हुई कई कविताएं हैं, जो चेतना को आंदोलित करती हैं। फिर भी इन कविताओं में कोई नारेबाजी नहीं, वरन विनम्र आग्रह है अपनी भावनाओं एवं संवेदनाओं को टटोलने का। उदाहरण के लिए ‘‘मेरे देखने से’’ शीर्षक कविता देखिए-
मैंने देखा
तो नीला हो गया आकाश,
झूमने लगे पीपल के चमकते हरे पत्ते
मैंने देखा
तो सफेद बर्फ से ढंका भव्य पहाड़
एकदम से उग आया/क्षितिज पर
मैंने देखा/तो चमकने लगी/तुम्हारी हंसी
मैंने देखा/तो उसी क्षण
दुनिया सुंदर हुई
मैंने देखा/तो उसी क्षण
मैं सुंदर हुआ !
दूसरे को देख कर स्वयं के सुन्दर हो जाने का अहसास कवि ने जिस सुन्दरता से रचा है वह कवि की काव्य-चेतना के प्रति आश्वस्त करता है। किन्तु जैसाकि मैंने पहले ही लिखा है कि सिद्धार्थ बाजपेयी की कविताओं में कहन की विविधता है। वे वर्तमान सांसारिक स्थितियों से भलीभांति परिचित हैं और इसीलिए उस पिता की चिन्ता को रेखांकित करते हैं जिसका बेटा अभी अबोध है, नन्हा है तथा मात्र रोना और हंसना जानता है। ऐसा अबोधपुत्र क्या इस निष्ठुर, छल-कपट से भरे संसार में सुरक्षित रह सकेगा? एक पिता की चिन्ता है कविता ‘‘बेटे के लिए’’ में। एक अंश देखिए -
बहुत डर लगता है मुझे बेटे के लिए
छोटा है/अभी देख नहीं पाता दुनिया
बावजूद खुली आँखों के।
समझता नहीं है फर्क
आग और पानी में
दोस्त और दुश्मन में
सुन कर भी नहीं जान पाता
मीठे शब्दों का जहर।
सिद्धार्थ बाजपेयी ने अपनी कविताओं को सरल, सहज शब्दों में बांधा है। कविता संग्रह ‘‘आसान सी बातें’’ में शाब्दिक सुगमता भले ही हो किन्तु भावार्थ गहन गूढ़ अर्थ समाए हुए है। इस प्रथम संग्रह की कविताओं की परिपक्वता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कवि को अपना सृजन सतत जारी रखना चाहिए।  
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Wednesday, March 17, 2021

चर्चा प्लस | भावनाओं की मछली और इंटरनेट के मछुवारे | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस 
भावनाओं की मछली और इंटरनेट के मछुआरे 
- डाॅ. शरद सिंह
        यदि दुनिया में ‘पाप’ की कोई अवधारणा है तो सबसे बड़ा पाप है - किसी की भावनाओं से खेलना। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे पापियों की कोई कमी नहीं है जो दूसरों की भावनाओं को हथियार बना कर उन्हीं पर वार करते हैं। इंटरनेट की आभासीय दुनिया में सच और झूठ के बीच फ़र्क़ करना बहुत कठिन है। प्रेम और विश्वास के नाम पर छलावा इंटरनेट पर हमेशा सबसे ऊपर ट्रेंड करता रहता है।
कोरोना वायरस आपदा से जब दुनिया अचानक थम-सी गई तो इंटरनेट की दुनिया ने लोगों के बीच की पारस्परिक दूरियों को मिटाया। उन्हें एक-दूसरे से जुड़े रहने में मदद की। लेकिन इंटरनेट ने जीवन को जितना सुविधाजनक बनाया है, इस इंटरनेट से उतने ही ख़तरे बढ़े हैं। आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने वाले लोगों ने इसका इसका प्रयोग अपराध के हथियार के रूप में करने से बाज नहीं आते हैं। भारत इससे अछूता नहीं है। एक मां सोचती रही कि उसका लाड़ला बेटा घंटों अपने कमरे में बैठा पढ़ाई करता रहता है। उसने अपने पढ़ाकू बेटे के खाने-पीने का पूरा ध्यान रखा। ‘‘मुझे डिस्टर्ब मत करो’’ जैसी झिड़कियां भी झेला। मगर जब भयावह सच्चाई सामने आई तो मां स्तब्ध रह गई। वह अपने जिस बेटे को पढ़ाकू समझती थी। जिसके लिए वह गवर्् से कहती फिरती थी कि मेरा बेटा दिन-रात पढ़ाई में जुटा रहता है, वही बेटा इंटरनेट जुआरी और शराबी निकला।  घटना छत्तीसगढ़ की है। वैसे इस तरह की घटना किसी भी राज्य, किसी भी जिले की हो सकती है। रायगढ़ में 17 साल के एक लड़के ने ऑनलाइन गेम के चक्कर में फंसकर 75 हजार रुपये का कर्ज़ ले लिया और इसी के चलते उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। उसने अपने दोस्त से ‘फ्री फायर’ गेम में गन के अपडेट और बाकी फीचर्स खरीदने के लिए पैसे लिए थे और जिसे वह लौटा नहीं पाया। इससे नाराज होकर उसके दोस्त ने उसे शराब पिलाकर उसका गला काट दिया। इंटरनेट पर ‘पब्जी’, ‘ब्लूव्हेल’ और ‘मोमो’ जैसे आत्मघाती गेमिंग ने कुछ साल पहले ही चेतावनी दे दी थी कि इस तरह के गेम एक नशे की तरह होते हैं और खेलने वाले के मन में चुनौती का जुनून जगा कर उन्हें आत्महत्या या हत्या करने तक को विवश कर देते हैं। युवाओं के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन कर सामने आई है इस तरह की गेमिंग।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डाटा के मुताबिक वर्ष 2017 में 21796 मामले आए, वर्ष 2018 में 27248 मामले आए और वर्ष 2019 में 44546 मामले सामने आए। आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि प्रति वर्ष साइबर क्राइम में वृद्धि होती जा रहा है। सरकार ने इनसे निपटने के लिए साइबर पुलिस स्टेशन, सूचना प्रौद्यिगिकी अधिनियम 2000 में साइबर क्राइम को खत्म करने के लिए कई प्रावाधान जोड़े हैं। लेकिन हमेशा की तरह सिर्फ़ कानून बन जाने से सबकुछ नहीं हो जाता है। महज़ सावधानी ही है जो किसी भी अपराधी से बचाए रखती है। इंटरनेट की दुनिया में अपराध का कोई एक चेहरा नहीं है। किसी भी उम्र, किसी भी लिंग का व्यक्ति इसका शिकार बन सकता है।  
एक युवती सोशल मीडिया एक युवक से दोस्ती कर बैठी। दोनों को परस्पर प्रेम हो गया। युवक ने मीठी और अपनेपन की बातों से लड़की का विश्वास जीता और उसे उकसा कर उसकी कुछ न्यूड फोटो हासिल कर लीं। इसके बाद ही युवती के उस कथित प्रेमी ने अपना असली चेहरा दिखा दिया। उसने युवती को धमकी दी कि अगर वह पैसे नहीं देगी तो तो वह उन न्यूड फोटो को सोशल मीडिया पर अपलोड कर देगा। युवती घबरा गई। आरोपी युवती को लगातार ब्लैकमेल करता रहा और रुपए ऐंठता रहा। उसने लगभग ढाई लाख रुपए ऐंठ लिए। उसके बाद जब युवती ने रुपए दे पाने में असमर्थता जताई तो उस युवक ने कुछ आपत्तिजनक काम कर के रुपए जुटाने के लिए दबाव डाला। जिसके लिए युवती तैयार नहीं हुई और उसने साहस का परिचय देते हुए पुलिस में इसकी शिकायत कर दी। पुलिस ने साईबर क्राईम शाखा की मदद से आरोपी को धर दबोचा। आरोपी को उसके किए की सज़ा तो जरूर मिलेगी लेकिन युवती के विश्वास और सम्मान को जो ठेस पहुंची, उससे उबर पाना उस युवती के लिए बहुत कठिन साबित होगा। लेकिन उसे यह सीख अवश्य मिल गई कि इंटरनेट पर सबकुछ अच्छा या सबकुछ सुरक्षित नहीं होता है। इंटरनेट पर अनेक फ्रेंडशिप साईट्स हैं जहां अपराधियों फ़र्ज़ी परिचय, फ़र्ज़ी तस्वीरें लगा कर अकाउंट खोल लिए जाते हैं। उनके निशाने पर युवक, युवती, बच्चे, बूढ़े सभी होते हैं। इन सबके साथ तरीका एक ही अपनाया जाता है- भावनाओं को भड़का कर अपने प्रभाव में ले लेना और अपने अनुसार चलने को उन्हें विवश करना। बच्चों को गेमिंग के लिए, युवक-युवतियों को प्रेम के नाम पर और बड़े उम्र के व्यक्तियों को उनके एकाकीपन में भावनात्मक सहारा देने का ढोंग कर के उनके साथ छल किया जाता है।  

जहां तक भावनाओं को भड़का कर छल करने का अपराध है तो अभी पिछले दिनों इसी प्रकार की घटना सामने आई जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया। इस घटना में एक पाकिस्तानी महिला एजेंट के हनीट्रैप में भारतीय सेना का एक जवान फंस गया। वह महिला एजेंट वीडियो कॉल पर न्यूड होकर उस जवान से अश्लील बातें किया करती थी। साईबर सुरक्षा के सामने यह तथ्य आने पर उस जवान को सेना की खुफिया जानकारी विदेशी मुल्क को देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। अब इस बात की जांच की जा रही है कि उस महिला ने उस जवान से कहीं कोई खुफ़िया बातें तो नहीं जान ली हैं। जाहिर है कि वह पाकिस्तानी महिला ऐजेंट ने सेना के जवान की कमजोर मनोवृत्ति का फ़ायदा उठाया।

इंटरनेट पर सोशल मीडिया तो भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का गढ़ बना हुआ है। जिसके कारण कई बार माहौल गरमाने लगता है और पुलिस व्यवस्था को यथार्थ के बदले आभासीय दुनिया से उपजे खतरों के पीछे दौड़ना पड़ता है। महिलाओं और उसमें भी विशेषरूप से स्कूल-काॅलेज जाने वाली लड़कियों को इससे विशेष खतरा रहता है। बदनीयत लड़के पहले मित्र बनते हैं फिर अवसर पाते ही विशेष ऐंगल से ली गई सेल्फी या फिर मित्रता प्रेम में बदल चुकी हो तो भावुक पलों का मोबाईल-वीडियो बना लेते हैं और फिर उसे इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर लड़की को ब्लैकमेल करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे अपराध पहले नहीं होते थे। लेकिन एक पीढ़ी पहले तक ऐसे अपराधों को उंगलियों पर गिना जा सकता था। तब लड़की द्वारा लिखे गए प्रेमपत्र बदनीयत लड़कों के हथियार होते थे लेकिन वह उन्हें लड़की के माता-पिता या रिश्तेदारों तक ही भेजने की क्षमता रखता था। लेकिन आज एक अपलोड लड़की की गोपनीयता को पल भर में पूरी दुनिया के सामने सार्वजनिक कर सकता है। यह अपराध भावनाओं के साथ किया गया ऐसा अपराध है जो हत्या से भी अधिक जघन्य है। सिर्फ लड़की नहीं वरन किसी सभ्रांत पुरुष या लड़के की आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर उसका जीना हराम करने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। यहां तक कि कभी कोई प्रोफेसर इस अपराध की चपेट में आता है तो कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता।

आज का युग कम्प्यूटर, मोबाईल और इंटरनेट का युग है। इंटरनेट की मदद के बिना किसी बड़े काम की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में अपराधी भी तकनीक के सहारे हाईटेक हो रहे हैं। वे अपराध करने के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइसेज और वल्र्ड वाइड वेब आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑनलाइन ठगी या चोरी भी इसी श्रेणी का अहम अपराध होता है। किसी की वेबसाइट को हैक करना या सिस्टम डेटा को चुराना ये सभी तरीके साइबर क्राइम की श्रेणी में आते हैं। साइबर क्राइम दुनिया भर में सुरक्षा और जांच एजेंसियां के लिए परेशानी का कारण साबित हो रहा है। लेकिन कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाईल का प्रयोग करने वालों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि कहीं उनसे भी जाने-अनजाने में कोई साइबर क्राइम तो नहीं हो रहा है। जहां तक संभव हो आपत्तिजनक संदेशों को फार्वर्ड करने से बचने में ही भलाई है। साथ ही, संदिग्ध-संवेदनशील संदेशों को कुछ पल ठहर कर परखना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जाने-अनजाने हम अपनी भावुकता के हाथों ही ठगे जाएं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सोशल मीडिया के अपराधी दूसरों के दिमाग पर कब्जा कर के अपने अपराधों को अंजाम देते हैं। इसी लिए सतर्क रहते हुए सोशल मीडिया में मौजूद अपराधियों से अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को बचाए रखना जरूरी है। वरना हर साईबर अपराधी ऐसा मछुआरा के जिसके लिए हर इंटरनेट सर्फर जाल में फंसाने योग्य एक मछली है।
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(दैनिक सागर दिनकर 17.03.2021 को प्रकाशित)
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