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Wednesday, June 5, 2024

चर्चा प्लस | रामकथा में है पर्यावरण की अतुलनीय चेतना | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
रामकथा में है पर्यावरण की अतुलनीय चेतना
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      रामकथा एक ऐसी कथा है जो अनेक काव्यों एवं महाकाव्यों में प्रस्तुत की गई है। वाल्मीकि कृत ‘‘रामायण’’ सबसे अधिक लोकप्रिय है और उत्तर भारत में तुलसीदास कृत ‘‘रामचरित मानस’’। विभिन्न भाषाओं एवं विभिन्न देशों में भी रामकथा लिखी गई है। क्योंकि यह कथा सभी के लिए श्रद्धा की पात्र है। लेकिन रामकथा के उन पहलुओं पर गौर नहीं किया जाता है, जिन्हें अगर हम समझ लें, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। रामकथा सिर्फ एक धार्मिक कथा नहीं है वरन यह एक जीवनशैली है जिसमें हर कदम पर प्राकृतिक तत्वों का महत्व स्थापित किया गया है। एक बार इस दृष्टि से भी रामकथा पढ़ कर देखिए, पर्यावरण के प्रति चेतना जाग उठेगी।
रामकथा में प्रत्येक जड़-चेतन की पारस्परिक महत्ता और उसमें निहित संतुलन को पात्रों के रूप में सामने रखा गया है। तुलसीदास के ‘‘रामचरित मानस’’ की चैपाइयों और दोहों को याद करें तो मनुष्य का समस्त जड़-चेतन से अंतर्सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है। पत्थर की बनी अहिल्या, वनवासी मानव, बंदर, जटायु जैसे पक्षी आदि प्रसंग यूं ही नहीं है, बल्कि इनके माध्यम से प्रकृति के महत्व को समझने का संदेश दिया गया है। आज जब हम ग्लोबल वार्मिंग से भयभीत हो कर पर्यावरण चेतना को बढ़ावा देने की बात करते हैं, तो उस समय याद रखना खहिए कि पर्यावरण संतुलन का संदेश हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों और महाकाव्यों में समाहित है। जो हमारे पूर्वज सैंकड़ों, हजारों वर्ष पूर्व हमारे लिए लिख कर छोड़ गए हैं।
‘‘रामायण’’ और ‘‘रामचरित मानस’’ में वर्णित रामकथा पर्यावरण के प्रत्येक तत्व की महत्ता को प्रस्तुत करती है। वस्तुतः रामकथा केवल धर्म और आस्था से जुड़ी कथा ही नहीं है, बल्कि इसमें पर्यावरण चेतना का अद्भुत रूप देखने को मिलता है। जिसका प्रमाण है कि रामकथा में जीव, आर्जव अर्थात जड़ और चेतन सभी तत्वों को मानवीय दृष्टिकोण से देखा गया है। रामकथा में बंदर, हिरण, हाथी, घोड़े आदि पशुओं का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार मोर, चकोर, तोता, कबूतर, सारस, हंस, कौआ, गिद्ध, चील आदि पक्षियों का महत्वपूर्ण स्थान है। जहां मृग का पत्ते पर विचरण करने का वर्णन और स्वर्ण मृग का वर्णन जंगली पशुओं की उपस्थिति को दर्शाता है, वहीं स्वर्ण मृग की घटना मृग शिकार के दुष्परिणामों को सामने रखती है। जब रावण द्वारा सीता का हरण कर लिया जाता है, तब श्रीराम व्याकुल होकर प्रत्येक प्राकृतिक तत्वों से सीता का पता पूछते हैं। श्रीराम लताओं और वृक्षों से पूछते हैं कि-‘‘हे पक्षी! हे पशु-पक्षियों! हे भौंरों! क्या तुमने मृगनयनी सीता को कहीं देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, मृग, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल तुम बताओ क्या तुमने सीता को देखा है?’’
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीन।।

  रामकथा में कौए और गरुड़ को विशेष स्थान दिया गया है। ये दोनों जंगली और शहरी पक्षियों के प्रतिनिधि समान हैं। कागभुशुंडि, जटायु, सम्पाती और गरुड़ के रूप में पक्षियों का महत्व दर्शाया गया है। कागभुशुंडि वह पात्र हैं, जिन्होंने पक्षीराज गरुड़ को उनकी शंका दूर करने के लिए रामकथा सुनाई थी। जयंत की कथा में जयंत को जीवनदान इसीलिए मिला क्यों कि वह कौए का रूप धर कर पहुंचा था। ‘‘रामचरित मानस’’ में तुलसीदास ने इस कथा का विस्तार से वर्णन किया है। कथा के अनुसार एक बार देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने श्रीराम की परीक्षा लेने की ठानी। उसने कौए का रूप धारण किया और सीता के पास पहुंच गया। उसने सीता के पांव को अपनी चोंच से घायल कर दिया।
सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।
यह देख कर श्रीराम क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपने कोदंड नाम के धनुष पर सरकंडे को चढ़ाकर उस कौए पर निशाना साधा। यह देख कर कौए के रूप में आया जयंत भयभीत हो उठा। वह भाग कर  अपने पिता देवराज इन्द्र के पास पहुंचा। इन्द्र सहित सभी देवताओं ने उसकी रक्षा करने से मना कर दिया। तब नारद ने उसे सलाह दी कि ‘‘श्रीराम के बाण से कोई तुम्हें नहीं बचा सकता है। उनके बाण से तुम्हारी रक्षा सिर्फ स्वयं श्रीराम ही कर सकते हैं। तुम उन्हीं के शरण में जाओ।’’
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।
नारद की सलाह मान कर जयंत श्रीराम के पास पहुंच कर उनके चरणों में गिर पड़ा। तब श्रीराम ने कहा कि वे अपने बाण को वापस तो नहीं ले सकते हैं, लेकिन फिर भी जीवनदान दे सकते हैं। तब श्रीराम ने अपने उस बाण से कौए के रूप में मौजूद जयंत की एक आंख फोड़ दी। उसी दिन से कौए को एक आंख वाला माना जाने लगा। यदि यह कुकर्म जयंत ने अपने वास्तविक रूप में किया होता तो संभवतः श्रीराम उसे जीवनदान नहीं देते, किन्तु कौए के रूप में होने के कारण उन्होंने उसे एक उद्दंड पक्षी मानते हुए मात्र दंड दिया, उसके प्राण नहीं लिए।
पक्षीराज जटायु ने सीता को रावण से छुड़ाने के लिए अपने प्राण तक दांव पर लगा दिए थे। यह भी मानव जीवन में पक्षियों के महत्व को सिद्ध करने वाला प्रसंग है। जब रावण सीता का हरण कर लंका ले जा रहा था, तब जटायु ने सीता को रावण से छुड़ाने का प्रयास किया था। इससे क्रोधित होकर रावण ने उसके पंख काट दिए जिससे वह जमीन पर गिर पड़ा। जब राम और लक्ष्मण सीता को खोजते हुए वहां पहुंचे, तो उन्हें सीता हरण का पूरा विवरण जटायु से ही पता चला।
तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा।।
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही।।

स्मरण रहे कि जटायु गिद्ध प्रजाति का था। अर्थात रामकथा हमें बताती है कि जिस पक्षी को हम मरे हुए जानवरों का मांस खाने वाला पक्षी कहकर नीची नजर से देखते हैं, वह भी मानव जीवन के लिए लाभकारी है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो गिद्ध उच्च कोटि का सफाईकर्मी है।
रामकथा में अहिल्या की कथा जड़ तत्व के रूप में पत्थर की महत्ता को उजागर करती है। ‘‘रामचरित मानस’’ में अहिल्या को शिला कहा गया है जबकि वाल्मीकि कृत रामायण के बालकाण्ड, सर्ग 48, श्लोक 30 में उसे भस्म अर्थात राख में पड़ी हुई कहा गया है-
वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी।
अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् वसिष्यसि।।
अर्थात ऋषि गौतम ने अहिल्या को शाप देते हुए कहा कि- ‘‘दुराचारिणी! तू भी यहां कई हजार वर्षों तक केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राख में पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर इस आश्रम में निवास करेगी।’’
 चाहे राख में दबा पाषाण हो या उजागर शिला, बात एक ही है। वस्तुतः अहिल्या की कथा को वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पृथ्वी के अकार्बनिक घटकों के निर्माण में कार्बनिक घटकों के मिलने की प्रक्रिया पाई जाती है। विशालकाय वृक्ष जब गिरकर जमीन में दब जाते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्षों में पत्थर में बदल जाते हैं। अहिल्या भी पहली जीवित स्त्री थीं, जिसे श्राप देकर चट्टान बना दिया गया था। श्रीराम के चरणों का स्पर्श पाकर वह पुनः जीवित हो उठी। ठीक वैसे ही जैसे वातावरण की अनुकूलता पाकर चट्टानों से अंकुर फूट पड़ते हैं।
रामकथा में जिन जलाशयों जैसे कुएं, नदी, झील और समुद्र आदि का उल्लेख किया गया है, वे सभी जल से भरे हुए हैं, इनमें से किसी में भी जल की कमी का कोई चिन्ह नहीं है। इन जलाशयों का वातावरण स्वच्छ और जलीय जंतुओं से भरा हुआ है। अर्थात त्रेतायुग में जल संरक्षण जीवनशैली का अभिन्न अंग था। किसी को भी जल की कमी का दंश नहीं झेलना पड़ता था। राम कथा में एक मनोरम प्रसंग है जिसमें सीता पहली बार श्री राम को देखती हैं। ऐसा बगीचा जहां सरोवर भी है, कमल भी है, पक्षी कल-कल कह रहे हैं और भौंरे गुनगुना रहे हैं।
मध्य बाग सरु साह सुहावा। मनि सोपान विचित्र बनावा।।
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कुजत गुंजत भृंगा।।

आज वनों का उत्पादन तेजी से घट रहा है। जब वन ही कम होते जा रहे हैं तो वनों का उत्पादन कहां से अधिक होगा? शहरों के विस्तार ने भी पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचाई है। लेकिन रामकथा में शहरों के साथ-साथ गांवों और वनवासियों का भी समान रूप से वर्णन किया गया है। आज हम समुद्र के किनारों को सुखाकर अपनी बस्तियां फैला रहे हैं। यह समुद्र के जल और भूमि पर अतिक्रमण है। इस संदर्भ में उस घटना को याद करना आवश्यक है जब श्रीराम तीन दिनों तक समुद्र की स्तुति करते हैं लेकिन समुद्र पार जाने का रास्ता नहीं देता। तब श्रीराम मानव अवतार के वश में होकर समुद्र पर क्रोधित होते हैं और उसे सुखाने के लिए धनुष पर बाण चढ़ाते हैं। तब समुद्र प्रकट होकर श्रीराम से कहता है कि आप सर्वशक्तिमान हैं, आप चाहें तो मुझे क्षण भर में सुखा सकते हैं लेकिन सूखना मेरा स्वभाव नहीं है। इसलिए आप इसमें सफल नहीं होंगे।
तत्स्वभावो ममाप्येष यदगाधोहमप्लवहः
विकारस्तु भवेद् गाध एतत ते प्रवदाम्यहम।
तब श्रीराम समुद्र से कहते हैं कि आप कोई उपाय बताएं। इस पर समुद्र रामनाम की चट्टानों को जल में तैराने का उपाय बताता है। जिस पर अमल करते हुए वानरों और भालुओं की सेना चट्टानों पर श्रीराम का नाम लिखकर ‘‘रामसेतु’’ बना देती है। अर्थात रामकथा कहती है कि समुद्र हो या नदी, प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना विकास का रास्ता खोजना चाहिए। लकिन आज हम मनुष्य समुद्र अथवा नदियों के मूल स्वभाव की परवाह किए बिना उस पर अतिक्रमण करते जा रहे हैं, उन्हें गंदा कर रहे हैं।
रामकथा में कहीं भी पर्यावरण असंतुलन या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का जिक्र नहीं है। जब लक्ष्मण क्रोध में आकर अपने बाण से जल में आग लगाने को तैयार हो जाते हैं, तो वहां भी जल देवता हमें जल जीवों की रक्षा करने की याद दिलाते हैं और जल जीवों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। रामकथा में पर्यावरण के हर तत्व को महत्व दिया गया है। इसलिए यदि रामकथा के पर्यावरणीय सार को आत्मसात कर लिया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को आसानी से दूर किया जा सकता है और पर्यावरण चेतना को आम जनमानस तक बहुत आसानी से पहुंचाया जा सकता है।
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Tuesday, July 25, 2023

पुस्तक समीक्षा | समसामयिक पीड़ा के प्रति चेतना का आह्वान करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 25.07.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  बद्रीलाल ‘दिव्य’ के काव्य संग्रह "दिनकर कैसे करे उजाला?" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
समसामयिक पीड़ा के प्रति चेतना का आह्वान करती कविताएं
     - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - दिनकर कैसे करे उजाला?
कवि       - बद्रीलाल ‘दिव्य’
प्रकाशक    - साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर
मूल्य       - 250/-
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बद्रीलाल ‘दिव्य’ एक संवेदनशील कवि हैं। इनका कविता संग्रह ‘‘मेरी उड़ान’’ भी मैंने पढ़ा है तथा उसकी इसी काॅलम में समीक्षा कर चुकी हूं। कवि ‘दिव्य’ का यह काव्य संग्रह ‘‘दिनकर कैसे करे उजाला?’’ समसामयिक परिस्थियों में व्याप्त विसंगतियों की ओर सटीक संकेत करता है। इस संग्रह की कविताएं कवि के लोकोपकारी सरोकार एवं देश के प्रति सजगतापूर्ण चिन्तन को सामने रखती हैं। 

इस संग्रह की रचनाओं के संबंध में जिन लोगों ने भूमिका के रूप में अपने विचार लेखबद्ध किए हैं उनमें बेंगलुरु निवासी प्रतिष्ठित कवि, लेखक, संपादक ज्ञानचन्द ‘‘मर्मज्ञ’’ ने लिखा है कि - ‘‘बद्रीलाल ‘दिव्य’ एक संवेदनशील कवि है जो समय की प्रतिध्वनियों की अकुलाहट को अपने शब्दों में बखूबी पिरोते है। वे समय की पड़ताल सूक्ष्मता से करते हैं। उजालों का भ्रम उन्हें अंधेरों के चौपाल तक लेकर जाता है जहाँ त्रासदी, पीड़ा और विदुषताएं चीख रही होती है। कविता समय की धमनियों में बहने वाली संवेदना है जो कवि दिव्य के अंतर्मन को उद्वेलित करती है। जिस कविता में समय की उपस्थिति नहीं होती, वह शब्दों के वीरान जंगल के अलावा कुछ भी नहीं है। कवि दिव्य ने समय की चेतना को केवल महसूस ही नहीं किया अपितु अपनी रचनाओं में ढाला भी है।’’

वहीं वरिष्ठ कवि, कथाकार व समीक्षक हरदान ‘‘हर्ष’’ के अनुसार - ‘‘दिनकर कैसे करे उजाला काव्य कृति में कवि दिव्य ने अपने अंतद्र्वन्द्व और सामाजिक सरोकारों को सुमधुर स्वर दिया है। कवि दिव्य अपनी जड़ों से जुड़ा है। अपनी परम्पराओं से जुड़ा कवि सत्य, अहिंसा, अद्धा, प्रेम, अनुराग, सद्भाव, शान्ति, शुचिता के गीत गाता है। वह समाज में हो रहे अन्याय और उत्पीड़न, समाज में बढ़ती घृणा, कटुता से व्यथित है। जाति और धर्म के नाम समाज के बंटवारे से कवि खिन्न है।’’

वरिष्ठ साहित्यकार एवं सदस्य पं. जवाहर लाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी (राजस्थान) भगवती प्रसाद गौतम लिखते हैं कि - ‘‘बद्रीलाल ‘दिव्य’ हिन्दी व राजस्थानी भाषा में समान ऊर्जा के साथ हस्तक्षेप करते है। कवि दिव्य की रचनाओं में समर्पण, उसका विशेष श्रमशील उपक्रम बरबस ही पाठक के दिल में जुम्बिश पैदा करता है। ‘‘दिनकर कैसे करे उजाला’’ काव्य-संग्रह का फलक व्यापक है। इसमें घर-परिवार है, रिश्तों की मौजूदगी है, नैसर्गिक रंगों की छटाएँ है, नैतिक मूल्यों की गंध है तथा राष्ट्रीय चेतना स्वर विद्यमान है। कवि दिव्य की कविताओं का विशेष पक्ष यही है कि वे नित्य प्रति के जीवन से गुजरते हुए सीधे-सीधे लोगों के दिल में उतरती है। तथा लोक सरोकारों के भीतर तक की टोह लेती है।’’

आरम्भ में ही इन तीन विद्वानों के कथन पढ़ कर संग्रह की कविताओं के प्रति विश्वास जागृत हो जाता है।   यह महसूस होने लगता है कि संग्रह के नाम से जो भावनाएं प्रतिध्वनित हो रही हैं, उसी के अनुरूप इसमें कविताएं संग्रहीत होंगी। कवि बद्रीलाल ‘‘दिव्य’’ ने ‘‘मेरी बात’’ के तहत अपने मन की बात में कविता के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि -‘‘साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्य ने ही समाज को सही दिशा प्रदान की है। साहित्य वह है जो सभी के हितार्थ लिखा जाता है। साहित्य लेखन की विधा कोई भी हो, चाहे कविता हो, गीत हो, गजल हो, चाहे दोहे हो। इन विधाओं के भावों और विचारों को सुन्दर तरीके से अभिव्यक्ति देना ही साहित्य है। काव्य लेखन सरल नहीं है फिर भी आजकल आपको कविता लिखने वालों की एक लम्बी कतार दिखाई देगी। काव्य लिखने से पूर्व कवि का उसकी उपयोगिता पर ध्यान दृष्टिगोचर होना चाहिए। कविता की उपयोगिता को कभी भी शब्दों की परिधि में नहीं बांधा जा सकता। कविता अपने आप में जितनी व्यापक होगी, उतनी ही वह हमारे लिए, हमारे भीतर की शिथिल भावनाओं को ऊर्जा प्रदान करने के लिए, समाज को नई दिशा देने के लिए, यहाँ तक कि पाठकों के लिए भी सागर की गहराई और सागर के विस्तार से भी अधिक महत्वपूर्ण होती है। इन सब बातों को अपनी गोद में समेटने वाला काव्य ही समाज में जिन्दा रहता है और वही काव्य-सृजन जीवन में सार्थक माना जाता है।’’
वहीं वे ‘‘मेरी बात’’ के दूसरे पैरा में कविता को प्रतिस्पर्धा की वस्तु बता कर चौंकाते हैं। उनके अनुसार-‘‘काव्य लेखन भी एक प्रतिस्पर्धा है और मैं भी उसका एक हिस्सा हूं। हर कवि एक-दूसरे से अधिक अच्छी कविता लिखने की कोशिश करता है।  मैं मूलतः राजस्थानी भाषा का कवि हूं लेकिन काव्य लेखन के लिए किसी भी रचनाकार को भाषा की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। वह किसी भी भाषा में काव्य लेखन कर सकता है। धीरे-धीरे मेरा रुझान हिन्दी कविता लेखन की ओर अग्रसर होने लगा।’’
काव्य मन से उपजी भावनाएं होती हैं। अतः मन की मौलिकता ही मौलिक काव्य का सृजन कराती है। अन्यथा दूसरे से प्रभावित हो कर अथवा दूसरे को अपने से कमतर साबित करने की ‘‘प्रतिस्पद्र्धा’’ उस मौलिकता को शनैः शनैः समाप्त करती जाती है। इसलिए मेरा तो व्यक्तिगत रूप से मानना है कि अच्छा से अच्छा लिखने की प्रवृत्ति अपने भीतर जगाए रखना चाहिए किन्तु ‘‘उसकी कमीज मेरी कमीज से उजली क्यों?’’ की भावना को परे रख कर। बहरहाल, सृजन की श्रेष्ठता को बनाने के तारतम्य में कवि ‘दिव्य’ ने यह उद्गार व्यक्त किया है। स्वयं कवि ‘दिव्य’ की कविताओं में मौलिकता विद्यमान है। ‘‘दिनकर कैसे करे उजाला?’’ की कविताएं समसामयिक पीड़ा के प्रति चेतना का आह्वान करती हैं। इन कविताओं में आतंकवाद, अव्यवस्था एवं अमानुषीय प्रवृत्तियों के प्रति रोष है, तो वहीं इनमें सब कुछ ठीक हो जाने की आशा का आह्वान भी है। यह सब कुछ कैसे ठीक होगा? इसका हल भी वे अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करते हैं। उनका एक गीत है ‘‘कैसे गायें गीत धरा के’’। निःसंदेह, जब सबकुछ सामान्य हो, सुंदर हो शांत हो तभी धरा के सुखद गीत गाए जा सकते हैं। इसीलिए अपने इस गीत में कवि ने धरा पर व्याप्त अशांति की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखा है-
कैसे गायें गीत धरा के मर चुकी मानवता ।
चहुं ओर हाहाकार मचा है, फैल रही दानवता ।।
सत्यवादी हरिश्चंद्र यहाँ,
बने हुए हैं सारे ।
बातों में कटुता है गहरी,
भाषा में सब खारे ।।
कहते क्या हैं करते क्या हैं, नहीं रही पावनता ।
कैसे गायें गीत धरा के, मर चुकी मानवता ।।
माँ बेटियां नहीं सुरक्षित,
उन पर नजर गढ़ाते ।
स्वयं बने हैं यहां भेड़िये,
हम को पाठ पढ़ाते ।।
लंका ढही रावण ढह गया, मन में लो कर्मण्यता ।
कैसे गायें गीत धरा के, मर चुकी मानवता ।।

कवि देश में बढ़ती जा रही अशांति से भी विचलित है। कवि मानता है कि यदि आपसी लड़ाई-झगड़े, राजनीतिक विवाद आदि समाप्त हो जाएंगे तो देश में शांति की स्थापना हो सकेगी। कवि ‘दिव्य’ आमजन का आह्वान करते हुए ‘‘चमक उठे शमशीर’’ शीर्षक गीत में कहते हैं-
धरती के आँगन में आओ, मानवता के फूल खिलायें।
मिलकर सारे भारतवासी, एक दूजे को गले लगायें ।।
आजादी दी जिन लोगों ने, जिनको फिर से याद करें।
समय रहा नहीं सोने का, थोड़ा तो हम ध्यान धरें ।।
शहीदों के आगे आओ, हम सब शीश नवायें ।
धरती के आँगन में आओ, मानवता के फूल खिलायें ।।
मिट जाओ धरनी के खातिर, लेकिन पीछे मत हटना ।
बूंद - बूंद खूं की देकर के, सीखा हमने मर मिटना ।
मिलकर करें विकास देश का, हम सब जान लगायें ।
धरती के आँगन में आओ, मानवता के फूल खिलायें ।

यदि वर्तमान प्रसंग देखें तो हर ठौर में आतंक, असुरक्षा एवं अपराध की कालिमा दिखाई देती है। कवि ‘दिव्य’ कहते हैं कि यदि धरती पर रावणराज रहेगा तथा स्थितियां इस कदर कलुषित हो जाएंगी कि पुत्र ही पिता का शत्रु बन जाएगा तो सूर्य भी धरती पर अपनी रश्मियां बिखेरने से हिचकेगा। इसी स्थिति को लक्ष्यित करके कवि ने प्रश्न उठाया है कि - ‘‘दिनकर कैसे करे उजाला?’’ कविता का प्रथम बंद देखिए-
जहां ठौर-ठौर हो काला ।
कैसे करे उजाला ।।
धरती पर रावण राज ।
बना है मनुज दगा - बाज ।।
बाप को बेटा दिखाता आँख ।
भले ही करो जतन तुम लाख ।।
मिटा सके तो मिटा रे युवा ।
दिनकर सृष्टि के लगा है काला ।।

   इसी कविता के अंतिम दो बंद देखिए जिसमें कवि का आक्रोश और आकुलता खुल कर मुखर हुई है-
अलपते सच्चाई का राग ।
सभी के लगा है काला दाग ।।
शकुनी चले यहां पर चाल ।
दुर्योधन हो रहा माला- माल ।।  
निःसहाय हो गये योद्धा सारे,
मार गया है पाला ।
दिनकर कैसे करे उजाला ।।
आजाद हो गये हम
हमारा निकल रहा है दम ।।
यहाँ आतंकी फैला जाल ।
झुक रहा माता का अब भाल ।
गहरी नींद में डूब रहा है,
सत्ता का रखवाला ।
दिनकर कैसे करे उजाला ।।

कवि बद्रीलाल दिव्य के इस संग्रह ‘‘दिनकर कैसे करे उजाला?’’ की सभी गीतात्मक कविताएं उच्चकोटि की हैं। इन कविताओं में लयात्मकता है, भाषाई पकड़ है, आह्वान है, ललकार है, पीड़ा है और भविष्य के प्रति आशाएं भी हैं। इस संग्रह की रचनाएं मन और विचारों को आंदोलित करने में पूरी तरह सक्षम हैं। कवि को अपना यह तेवर आगे भी बनाए रखना चाहिए। अंत में कवि दिव्य की दो और पंक्तियां देखिए जो समय की पुकार की भांति है-

धर्म  बेचने  वाले  लोगों,  कब  तक  खून बहाओगे?
भागीरथी के पावन जल में, कब तक जहर मिलाओगे?  
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #BookReviewer #DrMissSharadSingh

Tuesday, July 18, 2023

पुस्तक समीक्षा | प्रकृति और चेतना के तादात्म्य को व्यक्त करती काव्यांजलि | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 18.07.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  डॉ अंजलि झा एवं डॉ गरिमा झा के काव्य संग्रह "सागर किनारे" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
प्रकृति और चेतना के तादात्म्य को व्यक्त करती काव्यांजलि
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - सागर किनारे
रचनाकार - डाॅ अंजलि झा, डाॅ गरिमा झा
प्रकाशक   - स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21, अंसारी रोड दरियागंज, नई दिल्ली-2
मूल्य       - 160/-
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    कविता साहित्यिक अभिव्यक्ति की वह विधा है जिसमें भावना प्रथम आधारभूत तत्व होता है। किसी का मिलन, किसी का विछोह या फिर रोज़मर्रा की ज़िन्दगी व्यक्ति के मन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। व्याकुल मन को उस समय चैन मिलता है जब वह प्रकृति में अपनी पीड़ा का निदान पाता है तथा काव्य को उपचार का माध्यम बना लेता है। ‘‘सागर किनारे’’ एक काव्यांजलि कृति है। इसमें दो कवयित्रियों डाॅ. अंजलि झा तथा डाॅ. गरिमा झा ने अपनी कविताओं को सहेजा है। इसे समर्पित किया गया है पुत्र विधु और पिता प्रोफेसर विवेकदत्त झा की स्मृतियों को। इस कृति में मां और बेटी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति का उल्लेखनीय सामंजस्य है, जो इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी खूबी है। मां डाॅ. अंजलि झा जो प्रोे. विवेकदत्त झा की अद्र्धांगिनी हैं और डाॅ. गरिमा झा उनकी पुत्री हैं। डाॅ. विवेकदत्त झा ने सागर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में अपनी सेवाएं दीं। वे उच्चकोटि के पुराविद, इतिहासकार, रंगकर्मी, कुशल प्रशासक एवं साहित्य की गहरी समझ रखने वाले व्यक्ति थे। जब काव्य संग्रह ‘‘सागर किनारे’’ मेरे हाथो में आया तो मुझे यह देख कर सुूखद लगा कि डाॅ. अंजलि झा तथा डाॅ. गरिमा झा ने काव्यांजलि के रूप में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है।

संग्रह की कविताओं में माता और पुत्री दोनों की कविताएं हैं जिन्हें अलग-अलग दो भागों में न बांटते हुए अक्रमित (रेंडम) रूप से रखा गया है। यह तथ्य स्मरण कराता है कि मां और पुत्री एक-सी होती हैं। पुत्री में मां का अंश और मां में पुत्री का व्यक्तित्व उपस्थित होता है। अतः दोनों कवयित्रियों की कविताओं को अक्रमित रूप में पढ़ते हुए भी कहीं बाधा या विचारों के स्तर का बदलाव अनुभव नहीं होता है। एक प्रवाह में पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानों ये सभी कविताएं किसी एक ही रचनाकार की लिखी हुई हैं। दोनों ही कवयित्रियों ने जीवन को गहराई से समझा है, प्रकृति के आनन्द को अनुभव किया है, वे आशा और निराशा की पगडंडियों से हो कर गुज़री हैं और दोनों के पास अभिव्यक्ति की उत्तम क्षमता है। वे इस बात को ले कर स्पष्ट हैं कि वे क्या कहना चाहती हैं। वे अपने अतीत में झांकती हैं, सुखद पलों का स्मरण करती हैं, दुखद पलों पर सिहरती हैं तथा वर्तमान स्थितियों एवं परिस्थितियों पर सटीक टिप्पणियां करती हैं।

संग्रह की भूमिका भी दोनों कवयित्रियों ने संयुक्त रूप से लिखी है। वे लिखती हैं कि -‘‘प्रकृति और मानव का अन्योन्याश्रित संबंध है। हम कह सकते हैं दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । एक के बिना दूसरे की गति नहीं है। जीवनदायिनी, पालनहारिणी प्रकृति हमारी माँ -स्वरूपा है, साथ ही वो हमारी प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक भी है। कवि, कविता, मानव-जीवन और प्रकृति का संबंध परस्पर वैसा ही है जैसा कि आत्मा का परमात्मा से, सुर का ताल से । कवि अपने मन में उपजे विभिन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रकृति की ओर निहारता है। कविता हमारे विचारों का प्रतिबिंब है। काव्य के माध्यम से कवि जीवन व विचारों के बीच एक सेतु बाँधता है। जीवन के कहे अनकहे पहलुओं को, खट्टे-मीठे अनुभवों को, बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को काव्य में पिरोकर, समाज को जागरूक करने, उसकी चेतना जगाने का प्रयास करता है। हमने जिन पलों को जिया, समझा, महसूस किया, उन्हें काव्य का रूप देकर इस काव्यांजलि में पिरोया है।’’

भूमिका पढ़ने के बाद जब पाठक संग्रह की तिरसठ कविताओं से हो कर गुज़रेगा तो पाएगा कि ये कविताएं काव्यांजलि ही नहीं अपितु श्रद्धांजलि एवं भावांजलि भी हैं। यद्यपि इन कविताओं में श्रद्धांजलि एवं भावांजलि व्यक्तिपरक न हो कर प्रकृति एवं चेतनापरक हैं। संग्रह की पहली कविता डाॅ. गरिमा झा की है, जिसका शीर्षक है ‘‘प्रकृति तुम’’। इस कविता में प्रकृति की सम्पूर्ण शक्तियों के प्रति कवयित्री की श्रद्धा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-
प्रकृति तुम विशाल, विपुल, जलधर
मैं बारिश की नन्ही बूँद
विस्तृत, उर्वर वसुंधरा तुम
मैं मुट्ठी भर धूल
तुम सागर अथाह, अपरिमित
मैं नदिया की विरल धार
मैं नश्वर, तुम अचल, अमिट, अपार
तुम पृथ्वी, जल, आकाश
तुम रौद्ररूपा, विनाशकारी,
तुम आनंनदमयी, तुम्ही जीवनदायिनी
तुम प्रकृति, तुम प्राण
मैं मनुज अज्ञानी।

डाॅ. गरिमा प्रकृति के अहम तत्व ऋतुओं पर भी चिंतन करती हैं और जीवन पर उनके प्रभाव को सरलतापूर्वक व्यक्त करती हैं अपनी कविता ‘‘नन्ही बूँदें’’ में-
नन्ही बूँदों ने कर दी देखो
कैसी हँसी ठिठोली
खेल गईं आँगन में आज हमारे होली,
पुलकित पुष्पों ने खाए हिचकोले
लचीली लताएँ झूम रहीं हौले-हौले
नीली छतरी, पीली बरसाती
चहुं ओर इतराती, रंग-बिरंगी
किश्ती की कतार
हुल्लड़ी बालक को लुभाती।

जहां ‘हुल्लड़ी बालकों’ के रूप में जीवन के उल्लास को सामने रखा गया है वहीं, अवसाद के रंग को भी उसके पूरे शेड्स के साथ ‘‘निशान’’ कविता में डाॅ. गरिमा ने बखूबी शब्दांकित किया है-
शाख से पत्ते झड़ जाते हैं
खिलकर गुल मुस्काते हैं
दिन उगकर ढल जाते हैं
मौसम आते-जाते हैं ।
फिर क्यों कुछ पल कुछ लम्हे रुक जाते हैं?
वो गम जो सह नहीं पाते
वो दर्द जो दिल की सतह पर जम जाते हैं
कुछ बातें, कुछ यादें
भीगी पलकों पर ओस-से ठहर जाते हैं।

जो भावप्रवणता डाॅ. गरिमा की कविताओं में परिलक्षित होती हैं, ठीक वही संवेदनात्मक गहराई डाॅ. अंजलि की कविताओं में भी उपस्थित है। उनकी कविताओं में जीवन की नमी और शुष्कता दोनों मुखर हैं। ‘‘चाहती थी लिखना’’ कविता में डाॅ. अंजलि ने जीवन और मन की उलझन को बड़े सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है-
चाहती थी लिखना/लिख न पाई कभी
विचार आते रहे-जाते रहे/भाव उमड़ते-घुमड़ते रहे
द्वंद्व-प्रतिद्वंद्व चलता रहा/इसी उलझन में
मन उलझा रहा/विचार आये तो/शब्द नहीं मिले,
शब्द मिले तो/भाव गुम/इसी कश्मकश में
दिन गुजरते गए/मेज पर रखी लेखनी
राह तकती रही/काश कि मैं हाथों में
कागज-कलम/थाम लेती।

डाॅ अंजलि वेदना के उस आयाम की याद दिलाती हैं जिसका सामना हर व्यक्ति को कभी न कभी, किसी न किसी रूप में करना पड़ता है, एक शाश्वत सत्य की तरह। ‘‘मुंडेर’’ कविता की पंक्तियां देखिए-
साल दर साल बीते
कहाँ से कहाँ /आ गये हम,
और यादें हैं कि
आज भी उसी मुंडेर /पर बैठी
न जाने किस ऊर्जा से
सिंचित, पोषित, किस झूठी
आस की डोर से बँधी,
अविचल, अनवरत, अथक,
अविराम, अपलक, उस पथ को
निहारती, जिसका पथिक
लौटकर कभी आता नहीं।
संग्रह में डाॅ. अंजलि की कविताओं में एक कविता है ‘‘माॅर्निंग वाॅक’’ जिसमें उन्होंने प्रातः के सुरम्य वातावरण को भी मोबाईल फोन की भेंट चढ़ते देख कर कटाक्ष किया है तथा एक अन्य कविता है ‘‘आपाधापी’’ जो नैराश्य गढ़ती हुई प्रतीत होती हुई भी सत्य का अवगाहन करती है और मन को गहरे तक छूती है। पंक्तियां देखिए-
चाहतें अब बुढ़ाने
लगीं हैं, जिंदगी की आपाधापी में,
दायित्वों के निर्वहन में
चुनौतियों से
जूझती, संघर्ष करती
थक के चूर आ पहुँची हैं
उस मकाम पर,
जहाँ अर्थहीन है,
उनका पूरा होना न होना।

‘‘सागर किनारे’’ स्मृतियों एवं अनुभवों के सागर तट पर खड़े हो कर अंतर्मन को टटोलते हुए, प्रकृति में भावनाओं को अनुभव करते हुए लिखी गई कविताएं हैं। वस्तुतः यह कृति प्रकृति एवं चेतना के तादात्म्य को व्यक्ति करती काव्यांजलि है। इन कविताओं की भाषा सरज, सहज है तथा इनमें भरपूर सम्प्रेषणीयता है। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ना निश्चित रूप से एक विशिष्ट अनुभूति देगा।
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