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Thursday, January 29, 2026

बतकाव बिन्ना की | भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
 भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

आज मोरो मूड भौतई खराब चल रओ। सो आज कोनऊं के संगे बतकाव करे को जी नई चा रओ। अब आप आरें पूछहो के काय भैयाजी के संगे बी बतकाव नई करने? 
हऔ उनके संगे बी नई करने। बाकी आप ओरें चाओ तो आप ओरन के संगे डायरेक्ट बतकाव कर लई जाए। काए से के जोन के कारन मेरो जी दुखा रओ ऊपे कोनऊं से कोऊं डिबेट नई करने मोए। ई टाॅपिक को पक्ष तो हो सकत आए मनो विपक्ष हरगिज नइयां। जो ईपे उल्टो बोले, मैं तो ऊको इंसान को दुस्मन कऊं। मनो, भैयाजी औ भौजी बी कभऊं ईके बारे मे उल्टो ने बोलहें, मोए पतो आए। 
‘‘का बर्राया रईं बिन्ना? कल संकारे से तुमने अपनी सकल ने दिखाई। हमें लगो के तुम कछू पढ़बे, लिखबे में लगी हुइयो। फेर पूरो दिन कढ़ गओ, तुमाओ पतो ने परो। संझा लौं ने आईं। आज बी संकारे से तुमाई बाट देखत देखत हम ओरे थक गए, सो तुमाई भौजी ने कई के जा के देखो के बिन्ना काय ने आईं? काय का हो गओ? बे ने आईं, ने फोन करो। ने सोसल मिडिया पे कोनऊं पोस्ट डारी। हमें फिकर सी होन लगी। सब ठीक तो आए ना?’’ भैयाजी मोरे घर में घुसत साथ गोलियन से सवाल दागन लगे।
‘‘कछू नईं, सब ठीक आए।’’ मैंने कई। मैं समझ गई के अब आप ओरन से सूदी बात ने हो सकहे, काय से के भैयाजी बतकाव करे बिगैर ने जाहें।
‘‘का सोचन लगीं? का हो गओ?’’ भैयाजी बोले। फेर बोले, ‘‘देखों बिन्ना, कभऊं खुद को अकेली ने समझियो। हम ओरें आएं ने तुमाए लाने। औ सई कई जाए तो हम ओरन को बी जी तुमई से लगो रैत आए। तुमसे दो बतकाव कर लेओ तो जी सो हल्को हो जात आए।’’ 
‘‘आप ओरन की कोनऊं बात नोंई।’’ मैंने कई।
‘‘सो का बात हो गई?’’ भैयाजी ने फेर के पूछी।
‘‘भैयाजी, जा सोच के जी दुखात आए के आजकाल लोग कित्ते पथरा घांईं भए जा रए।’’ मैंने कई।
‘‘सो तो आए, पर भओ का?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आपने सोई पढ़ो हुइए। बाकी ऊकी वीडियो क्लिप सोई एक ने मोए फार्वड करी। बा देख के ऐसो लगो के जे अपनो देस को सीन आए के कोनऊं औ देस को? इत्ते निठुर तो कभऊं नईं रए अपने इते।’’ मैंने कई।
‘‘कोन की बात कर रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘बा ऊ गरीब गुरबा की। जोन अपने ई सागर में ई अपनी बेमार लुगाई खों हाथ ठेला पे ले के अस्पतालें जाने के लाने सड़कन पे भगत रओ औ संगे मदद के लाने गुहार बी लगात रओ। कइयों ने ऊकी ई दसा की रीलें बनाईं मनो ऊकी मदद करबे की ने सोची। जेई-जेई में ऊकी लुगाई रस्ता में ई चल बसी। ऊ गरीब खाों तो कछु समझ ने पर रई हती के बा का करे? बा तो जा ठीक रओ के ऐ पार्षद जू खों खबर लगी औ बे तुरतईं ऊके लिंगे पौंचे औ उन्ने ऊ आदमी खों सम्हारो। संगे ऊकी लुगाई को किरया-करम बी कराओ। ने तो जोन के पास लुगाई खों आटो से अस्पतालें ले जाबे को पइसा ने हते, बा अपनी लुगाई को किरया-करम कां से करतो?’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘अरे, जे हमें खबर ने लगी? हमाए इते बी तो एक अखबार आऊत आए मनो ऊमें जे खबर ने हती।’’ भैयाजी अचरज करत भए बोले।
‘‘नईं कछू अखबार वालन ने तो जा खबर छापी रई औ एक के तो संपादक जू ने स्पेसल संपादकीय सोई लिखी रई। उन्ने तो नेता हरों खों धिक्कारो बी रओ के फीता काटबे औ फोटू खिचाबे से फुरसत होय तो उने पता परे के उनके शहर में का हो रओ औ का दसा आए। पर आप सई कए रए, कछू ने ई खबर को ढापो बी नईं, काय से खबर छापबे के लाने ऊ गरीब से पइसा थोड़े मिलने हते।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, चाए नेता होएं चाए बड़े अधिकारी होंए, सबकी एकई दसा आए। नेता हरों खों अपनी जयकारे लगवाबे से फुरसत नइयां औ अधिकारियां खों नेताओं के आंगू-पीछूं दुम हिलाबे से फूरसत नइयां। काय से उने पतो आए के नेता खुस रैहें तो उने मलाई खाबे वारी सीट मिलहे ने तो कऊं लूप लाइन में बिसुरत परो रैने परहे। बाकी जे जो घटी घटना तुम बता रईं, जे कोनऊं आज को भर घटो नईं कहो जा सकत। काए से के तुमने सायद ने देखी हुइए, मनो हमने एक फिलम देखी हती ऊमें जां तेक दिलीप कुमार रओ जो अपनी लुगाई खों अस्पतालें ले जाबे को फड़फड़ात रैत आए, पर कोनऊं ऊकी मदद नई करत। ऊपे से सड़क पे लगो जाम बी नईं खुलत। सो ऐसी बुरई दसा पैले बी होत रई, बाकी बा पैले बड़े शहरन में होत्ती औ अब सागर जैसे छोटे शहरन में होन लगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जा तो सई कई आपने भैयाजी, बाकी अपनी पब्लिक बी कोनऊं कम नोईं। जीको पेट भरो कहानों ऊको कोनऊं की फिकर नोईं। दूसरो चाए जिए के मरे। ऊको जे नई लगत के जोन ऊ गरीब पे गुजरी, कभऊं कोनऊं टाईप से उनपे सोई गुजर सकत आए। उने तो रील बनाबे से फुरसत नोईं। मोए तो ऐसी रील बनाबे वारों से नफरत सी होन लगी। कोनऊं की लाचारी खों देख के ऊकी मदद करबे के जांगा अपनो लाईक, कमेंट बटोरबे के लाने मरे जा रए। का कई जाए ऐसे लोगन खों।’’ मैंने कई। मोरो जी कर रओ तो के उन ओरन खों दुनिया भरे की गारियां दे डारी जाए।
‘‘जा तो सई आए बिन्ना। कभऊं-कभऊं हम देखत आएं ने के एक मरो सो मोड़ा खों पचासेक लोग मार रए, कूट रए औ ऊको बचाबे के बदले बा पूरे सीन की रीलें बना के सोसल मिडिया पे डारी जा रई। कछू कांड तो जेई के लाने होत रैत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! बड़े बुरए दिन आ गए। पैले तो सबरे एक-दूसरे की मदद के लाने ठाड़े रैत्ते, अब तो उने मोबाईल से फुर्सत नोंईं। बे बोई की सबरी बातन खों सच मान के चलत रैत आएं।’’ मैंने कई।
‘‘अरे, अब हम तुमें का बताएं। पर की साल हमाएं संगे भौत बड़ो वारो मजाक सो हो गओै रऔ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का हो गओ रओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘का भओ के पर की साल जब हमें मलेरिया भओ रओ सो हम बिस्तरा पे डरे-डरे अपनी पुरानी फोटुअन खों अपने सोसल मिडिया पे डारत रैत्ते। हमाए एक दोस्त ऊपे कमेंट करत रैत्ते। जब हम ठीक हो गए औ एक दिन बजरिया गए तो उते हमाए बेई दोस्त हमें मिले। हमने ऊसे कई के काय, हम इत्ते बिमार रए औ तुम हमें देखबे, मिलबे लौं नईं आए? सो ऊने कई के तुम कां बिमार रए? तुम तो इते उते फिर रए हते और अपनी फोटू खींच-खींच के उार रए हते। हमें काय बना रए? ऊकी बात सुन के हमें भौतई गुस्सा आई। हमने ऊसे कई के तुमाई नास पिटे, हम इत्ते बिमार रए, तब तो तुमसे बनो नईं के हमें आ के देख लेते। औ रई बा फोटुअन की सो हम तो बा पुरानी फोटुएं टाईम पास के लाने पोस्ट करत रए। सोसल मीडिया पे देख के जो तुम चलहो तो फेर तो हो गई दुनियादारी। ऊंसे बायरे निकर के सांची की दुनिया सोई देख लओ करो। मनो ऊपे डरी फोटू देख के ऊने मान लओ के हमाए संगे सब ठीक आए। मनो जो हम बिमार परें सो हमें बीमारी की हालत की फोटू डार के मुनादी कराओ चाहिए के हम बीमार आएं। तब उने लगहे के ईके लाने ‘गेटवैल सून’ को एक ठइयां कमेंट डार देओ। सो, जे तो दसा होत जा रईै।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जेई तो मैं सोच रई भैयाजी के लोग कित्ती स्वारथपना में जी रए। दूसरन की फिकर कोनऊं खों नइयां। बा तो कओ के सौ में दस जने ऊ पार्षद घाईं अबे बी आएं, ने तो जाने का हुइए ई समाज को। माए तो जेई जी करत आए के ऐसे लोगन से कओं के भैया हरों, ऊपर वारे से डराओ तनक!’’ मैंने कई।
‘‘हऔ!’’ भैयाजी ने हामी में मुंडी हलाई।          
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे जरूर सोच के सोचियों के जे दसा हमें कां लौं ले जाहे? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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