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Friday, December 11, 2020

लेख | आंचलिक पत्रकारिता, महिलाएं और हैशटैग मी टू | डॉ शरद सिंह | अक्षरालोक के पत्रकारिता विशेषांक में प्रकाशित

मेरा लेख "आंचलिक पत्रकारिता, महिलाएं और हैशटैग मी टू" शामिल है फर्रुखाबाद (उप्र) की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था अभिव्यंजना द्वारा प्रकाशित अक्षरालोक पत्रिका का "हिंदी पत्रकारिता विशेषांक" में ...  जिसके लिए पत्रिका के प्रधान संपादक भाई भूपेन्द्र प्रताप सिंह का हार्दिक आभार 🙏🌹🙏

बहुत महत्वपूर्ण कलेवर और सुंदर मुद्रण ने इस विशेषांक को पठनीय और संग्रहणीय बना दिया है। अभिव्यंजना परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏💐🙏

यह पूरा लेख आप पढ़ सकते हैं मेरे इसी ब्लॉग "शरदाक्षरा" पर - http://sharadakshara.blogspot.com/2020/12/blog-post_6.html?m=1


Wednesday, October 21, 2020

चर्चा प्लस | राजनीति की अभद्र भाषा के निशाने पर महिलाएं | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
राजनीति की अभद्र भाषा के निशाने पर महिलाएं
   - डाॅ शरद सिंह
      जब दो उजड्ड लोग आपस में लड़ते हैं तो वे जल्दी ही गाली-गलौज पर उतर आते हैं। ऐसे समय मां-बहन की गाली आम बात है। वे गाली के अर्थ को नहीं जानते क्योंकि वे उजड्ड हैं। लेकिन इन दिनों मध्यप्रदेश के उपचुनावी माहौल में जनप्रतिनिधियों द्वारा जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है वह सोचने पर मज़बूर करता है कि इन जनप्रतिनिधियों को किस खांचे में रखा जाए- सभ्रांत या उजड्ड? किसी महिला के सम्मान को निशाना बनाने के बाद कोई तर्क मायने नहीं रखता है कि वह किस निहितार्थ कहा गया। समाज में हर महिला को सम्मान पाने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी कार्य से जुड़ी हो। 
मां ने सुबह अख़बार उठाया और पहले पेज की एकाध ख़बर पढ़ कर अख़बार बंद कर के टेबल पर एक ओर सरका दिया। वे मानो अख़बार की ओर देखना भी नहीं चाह रही थीं। मैं और मेरी दीदी डाॅ. वर्षा सिंह भी वहीं दूसरी मेज पर दूसरा अख़बार ले कर बैठे थे। दीदी का ही ध्यान पहले गया मां की ओर। अख़बार लगभग बिना पढ़े ही एक ओर सरका देना हमें अज़ीब लगा। मेरी मां डाॅ विद्यावती ‘मालविका’ जो स्वयं एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं, बड़े चाव से अख़बार पढ़ती हैं। वे टीवी बहुत कम देखती हैं लेकिन सुबह अख़बार ज़रूर पढ़ती हैं। कोरोनाकाल की शुरुआत में यानी लाॅकडाउन 1.0 के दौरान उन्हीें के कहने पर हमें अख़बार लेना बंद करना पड़ा था लेकिन फिर उन्हीं ने कहा कि अख़बार पढ़े बिना पता ही नहीं चलता है कि दुनिया में क्या हो रहा है। यह बात मैं इसलिए बता रही हूं कि मेरी मां अख़बारों या यूं कहिए कि समाचारों में कितनी अधिक रुचि रखती हैं। उनकी आयु 90 से ऊपर हो चली है लेकिन अपनी क्षमता के अनुरुप पठन-पाठन करती रहती हैं। उन्हें देख कर मैंने हमेशा महसूस किया है कि जीवन का इतना लम्बा अनुभव व्यक्ति में धीरे-धीरे वैचारिक तटस्थता ला देता है। मेरी मां न तो कांग्रेस के पक्ष में रहती हैं और न भाजपा के पक्ष में। जो अच्छे काम करता है उसकी तारीफ़ करती हैं और महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ा देख कर खुश होती हैं।

हमने मां से पूछा कि वे अख़बार क्यों नहीं पढ़ रही हैं? तबीयत तो ठीक है न? इस पर उन्होंने यह उत्तर दिया-‘‘कितनी अभद्र हो गई है हमारे यहां की राजनीति। महिलाओं का सम्मान करना ही भूल गए हैं।’’ तब हमें मामला समझ में आया। उस समय तक हम लोग भी पूर्वमुख्यमंत्री कमलनाथ की टिप्पणी पढ़ चुके थे। एक ऐसी महिला जिसने गांधीयुग देखा हो उनका ऐसी टिप्पणी पढ़ कर आहत होना स्वाभाविक था। अख़बार कमलनाथ की टिप्पणी से गरमाए हुए माहौल से भरा हुआ था।

माहौल तो गर्म होना ही था। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमल नाथ ने वह कह दिया जो उन्हें नहीं कहना चाहिए था। भाजपा से उम्मीदवार इमरती देवी के लिए ‘आईटम’ शब्द का प्रयोग कर के कमलनाथ ने सुर्खियां भले ही बटोर ली हों लेकिन चुनाव के संवेदनशील वातावरण में अपनी ही पार्टी पर अप्रत्यक्ष चोट कर बैठे। इसके विरोध में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने दो घंटे का मौन रखा और कांग्रेस की महिलाओं के प्रति असम्मान की भावना पर विरोध जताया। बात यहीं तक थमी नहीं रही। कमलनाथ ने ‘आईटम’ शब्द को सही ठहराने के लिए जो तर्क दिए वह गैर राजनीतिक व्यक्तियों के गले भी नहीं उतरे। किसी महिला को ‘आईटम’ कहा जाना अभद्रता की श्रेणी में ही आएगा। भले ही वह महिला राजनीति से जुड़ी हो।

मंा इमरती देवी को सिर्फ़ समाचारों से ही जानती हैं। व्यक्तिगततौर उन्हें इमरती देवी से कोेई लेना-देना नहीं है लेकिन वे पहले भी इसी प्रकार व्यथित हो चुकी हैं जब जनप्रतिनिधयों ने राजनीति में मौजूद महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया। वे तब भी दुखी हुई थीं जब एक महिला राजनेता को ‘‘दारूवाली बाई’’ कहा गया था। वे हेमा मालिनी और जयाप्रदा के लिए भी दुखी हुई थीं जब उन्हें ‘‘नचनिया’’ कहा गया था और वे तब भी दुखी होती हैं जब सोनिया गांधी को अपशब्द कहे जाते हैं। कमलनाथ की टिप्पणी के बाद वे फिर क्षुब्ध हो उठीं जब उन्होंने बिसाहूलाल सिंह की टिप्पणी पढ ली। शिवराज सिंह चौहान सरकार के मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार की पत्नी को ‘रखैल’ कह दिया। मंा की यही प्रतिक्रिया थी कि ‘‘अब और कितना गिरेंगे ये लोग?’’

उनके इस प्रश्न का उत्तर हम दोनों बहनों के पास नहीं था। हम अनुत्तरित रह गए। वर्तमान राजनीतिक माहौल पर उनकी क्षुब्धता देख कर हमें एकबारगी लगा कि हम एक बार फिर अख़बार मंगाना बंद कर दें। फिर दूसरे ही पल विचार आया कि यह कटुसत्य उनसे छिपाने से क्या होगा? अख़बार में बहुत-सी, सकारात्मक बातें होती हैं, उनसे मां को वंचित करना ठीक नहीं है।   

वैसे मां का दुखी होना स्वाभाविक है। हर महिला ऐसी बातें पढ़-सुन कर दुखी होती है। राजनीति में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी। ऊपर से नीचे तक सड़कछाप भाषा ने अपनी बड़ी जगह बना ली है। चाहे मंच हो या टेलीविज़न पर डिबेट का कार्यक्रम हो, चुभती हुई निर्लज्ज भाषा का प्रयोग आम हो गया है। भारतीय राजनीति में आज किसी भी पार्टी के लिए यह नहीं कहा जा सकता है इस पार्टी ने भाषा की गरिमा को बनाए रखा है। समय-समय पर और चुनाव के समय देश की सभी पार्टियों ने भाषा की गिरावट के नए-नए कीर्तिमान रचे हैं। राजनीति में मौजूद महिलाएं सबसे पहले इसका शिकार बनती हैं। उन पर अभद्र बोल बोलने वाले प्रतिद्वंद्वी उस समय यह भूल जाते हैं कि वह महिला उस समाज का अभिन्न हिस्सा है जिसमें वह स्वयं रहता है। सवाल यह भी है कि क्या भारतीय राजनीति इतनी दूषित हो गई है कि वोट की खातिर नैतिक मूल्यों को भी ताक पर रख दिया जाए? देश की राजनीति अगर इतनी गंदी हो गई तो लोकतंत्र की बात करने वाले सफेदपोश नेताओं को व्यक्तिगत छींटाकशी करने की स्वतंत्रता किस ने दे दी? इसके लिए उत्तरदायी कौन है, आम जनता या फिर वे शीर्ष नेता जिन पर दायित्व है अपने दल के नेताओं को दल के सिद्धांतों पर चलाने का।

मध्य प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव के लिए चल रहे प्रचार अभियान के दौरान बयानों का स्तर गिरता ही जा रहा है। पहले पूर्वमुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक महिलानेत्री को ‘‘आईटम’’ कहा और अपने इस शब्द को शालीन ठहराने के लिए तर्क दे डाले। फिर मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार की पत्नी को ‘रखैल’ कहा जिसका वीडियो सोशल मीडिया में जारी हो गया। वीडियो में बिसाहूलाल सिंह अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार विश्वनाथ सिंह के नामांकन में दिए गए ब्यौरे पर टिप्पणी करते हुए कह रहे थे कि ‘‘विश्वनाथ ने अपनी पहली पत्नी का नहीं, बल्कि रखैल का ब्यौरा दिया है।’’ 

कमलनाथ द्वारा फैलाए गए रायते को समेटने में जुटी कांग्रेस को एक धमाकेदार मुद्दा हाथ लग गया। कांग्रेस प्रवक्ता सैयद जाफर ने ट्वीट कर इस पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि ‘‘इसे कहते हैं महिला का अपमान। भाजपा के मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी की पत्नी को कहा रखैल, क्या महिलाओं के लिए ऐसे ही शब्दों का इस्तेमाल करती है भाजपा? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान तत्काल इस पर संज्ञान लेते हुए मंत्री को पद से हटाएं और प्रदेश की महिलाओं से माफी मांगें।’’ उल्लेखनीय है कि बिसाहूलाल सिंह उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था और कमलनाथ की सरकार गिराई थी। बिसाहूलाल अनूपपुर से विधानसभा उपचुनाव लड़ रहे हैं। 

सच तो यह है कि न तो ‘‘आईटम’’ शब्द उचित है और न ‘‘रखैल’’। ये दोनों ही शब्द महिला के सम्मान को चोट पहुंचाने वाले हैं। क्या महिला कोई वस्तु है जिसे आईटम कहा जाए? याद आता है कि इसी तरह कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी की शालीन और प्रबुद्ध महिला सांसद को  ‘‘टंचमाल’’ कह दिया था। दिग्विजय सिंह ने मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त अपनी ही पार्टी की एक महिला सांसद को ‘‘100 टंच माल’’ कह दिया था। बयान पर बवाल हुआ तो, दिग्विजय ने मानहानि का केस करने की चेतावनी देते हुए कहा कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया। दिग्विजय सिंह ने यह बयान जुलाई 2013 में मंदसौर में दिया था। मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त वह इलाके की सांसद मीनाक्षी नटराजन पर ‘‘100 प्रतिशत टंच माल’’ की टिप्पणी कर डाली थी। सभा में दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ‘‘मैं अंत में आपसे इतना ही कहूंगा मीनाक्षी नटराजन आपकी लोकसभा की सदस्य हैं। गांधीवादी हैं, सरल हैं, ईमानदार हैं। सबके पास जाती हैं, गांव-गांव जाती हैं। मैं अभी कल से इनके इलाके में देख रहा हूं। मुझे भी 40-42 साल का अनुभव है। मैं भी पुराना जौहरी हूं। राजनीतिज्ञों को थोड़ी सी बात में पता चल जाता है कि कौन फर्जी है और कौन सही है। यह 100 प्रतिशत टंच माल हैं और गरीबों की लड़ाई लड़ती हैं। मंदसौर जैसे जिले की गुटबाजी में नहीं पड़तीं, सबको साथ लेकर चलती हैं। दिल्ली में भी इन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। लोकसभा के अंदर भी और पार्टी में भी। सोनिया और राहुल इनको बहुत मानते हैं। साथियो ये आपकी संसद सदस्य हैं, इनको पूरा सपोर्ट करिए, समर्थन करिए।’’

क्या महिलाएं ‘‘माल’’ हैं? क्या महिलाएं ‘‘आईटम’’ हैं? क्या विवाहित महिलाएं ‘‘रखैल’’ हैं? जिम्मेदार और प्रतिष्ठित राजनेताओं द्वारा जब इस तरह की महिला विरोधी टिप्पणी की जाती है तो आश्चर्य होता है राजनीतिक चरित्र की गिरावट पर। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर के लिए ‘‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’’ शब्द का इस्तेमाल किया था। बीजेपी के नेताओं ने सोनिया गांधी के लिए ‘‘जर्सी गाय’’ जैसे घोर आपत्तिजनक बयान तक दिए हैं। कांग्रेस, बीजेपी के अलावा भी तमाम पार्टियों के नेताओं ने समय-समय पर महिलाओं के खिलाफ विवादित बयान दिए हैं। गोया राजनीति को विकास के मूलमुद्दों से भटकाए रखने के लिए महिलाओं के सम्मान पर भी चोट पहुंचानी पड़े तो वह भी सही माना जाए। यही तो चाहते हैं हमारे आज के जनप्रतिनिधि। लिहाज़ा अब समय है इस पर विचार करने का कि हम मतदाता एवं आमनागरिक क्या चाहते हैं? शायद मतदाताओं के सामने दुविधा का पहाड़ खड़ा है। जब सभी पक्ष अभद्रता पर उतारू हों तो आमनागरिक नहीं बल्कि चुनाव आयोग और सुप्रीमकोर्ट की तत्काल लगाम कस सकती है। वरना राजनीति में भाषाई गिरावट का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। 

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(दैनिक सागर दिनकर में 21.10.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, November 22, 2018

चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं
- डॉ. शरद सिंह 

बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही ह
ैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
चुनावों की टिकट वितरण के पूर्व मैंने अपने इसी कॉलम में विगत 08 अगस्त 2018 को लिखा था -‘‘चुनावों के निकट आते ही सबसे पहले प्रश्न उठते हैं, किसको टिकट मिलेगी और किसको नहीं? कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? लेकिन क्या महिला उम्मीदवारों के आंकड़े बढ़ने से ही राजनीति में महिलाओं की पकड़ बढ़ जाएगी? सच तो यह है कि चुनाव निकट आते ही महिलाओं की तरफ़दारी करने वाले बयानों की बाढ़ आ जाती है किन्तु चुनाव होते ही किए गए वादे ठंडे बस्तों में बंधने लगते हैं, विशेषरूप से राजनीति में महिलाओं के प्रतिशत को ले कर। बुंदेलखंड के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत ही विचित्र स्थिति दिखाई देती है। बुंदेलखंड जो दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है, दोनों की एक साथ बात की जाए तो आंकड़ों के अनुसार राजनीति में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर दिखाई देती है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों के परिदृश्य से अलग ही तस्वीर दिखाती है। .... इस बार आमसभा चुनावों में कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? यह एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर सूची जारी होने पर ही मिलेगा।’’
जब टिकटों की घोषणा हुई तो यह देख कर अत्यंत निराशा हुई कि किसी भी राजनीतिक दल ने महिला उम्मींदवारों पर विश्वास नहीं किया। उनकी संख्या आश्चर्यजनक आंकड़ों तक सीमित है। अतीत में झांक कर देखें तो 1957 से लेकर 2012 तक हुए पन्द्रह विधान सभा चुनावों में बुंदेलखण्ड के उत्तरप्रदेश वाले भाग में से लगभग 15 महिलाएं विधायक रही हैं। इनमें भी 11 दलित वर्ग से, 3 पिछड़े वर्ग से और एक सामान्य वर्ग से। यह आंकड़ा उस प्रदेश के बुंदेली भू-भाग का है जहां की मायावती के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री के पद पर रह चुकी है और साबित कर चुकी है कि महिलाएं राजनीति में अपना सिकका जमा सकती हैं। सन् 1957 में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस की बेनीबाई झांसी जिले की मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित) सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में अपनी आमद दर्ज कराई थी। इसके बाद 1962 में इसी दल की सियादुलारी ने बांदा जिले की मऊ-मानिकपुर (अब चित्रकूट जिला) सीट से और बेनीबाई दोबारा मऊरानीपुर से विधायक बनी थीं। सन् 1967 में बेनीबाई तीसरी बार चुनी गईं और 1969 के चुनाव में कांग्रेस की ही सियादुलारी दोबारा अपनी सीट से विधायक चुनी गईं.। 1974 के चुनाव में जहां बेनीबाई चौथी बार चुनाव जीतीं। वहीं जेपी आंदोलन के चलते उन्हें 1977 में हार का सामना भी करना पड़ा। वर्ष 1980 के चुनाव में बेनीबाई झांसी की बबीना सीट से जीत दर्ज की और छठीं बार वह इसी सीट से 1985 के चुनाव में विधायक बनीं। इस प्रकार कांग्रेस के टिकट पर वह छह बार विधायक बनीं। वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सियादुलारी मऊ-मानिकपुर सीट से तीसरी बार विधायक चुनी गईं। साल 2002 के चुनाव में अंब्रेस कुमारी समाजवादी पार्टी के टिकट पर महोबा जिले की चरखारी सुरक्षित सीट से विधायक चुनी गईं थी और 2012 के चुनाव में झांसी के मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति सुरक्षित) सीट से सपा की डॉ. रश्मि आर्या चुनी गईं थी। वर्ष 1977 में जेएनपी के टिकट पर सूर्यमुखी शर्मा झांसी सीट से चुनाव जीता था और 2012 के चुनाव में भाजपा की उमा भारती चरखारी सीट और हमीरपुर सीट से भाजपा की ही साध्वी निरंजन ज्योति ने चुनाव जीता था। वर्ष 2015 में चरखारी सीट में हुए उप चुनाव में सपा की उर्मिला राजपूत ने जीत हासिल कर के अपने राजनीतिक दखल को साबित किया था। ये आंकड़े और इतिहास था बुंदेलखण्ड के उत्तर प्रदेश के भू-भाग का। मध्यप्रदेश के बुंदेली भू-भाग की दशा इससे अलग नहीं है।
बुंदेलखंड के संदर्भ में कहा जाता है कि मंच पर महिलाओं को लुभाने की बातें करना, योजनाएं बनाना अलग बात है और चुनाव जीतकर सत्ता पाना अलग। महिलाओं को पर्याप्त संख्या में चुनाव में उम्मीदवार न बनाया जाना अपने आप में राजनीतिक दलों के महिला हितों के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगता है। मध्यप्रदेश में भी टीकमगढ़ ऐसा क्षेत्र है जहां से उमा भारती के रूप में महिला मुख्यमंत्री प्रदेश को मिली। उनका अल्पकालिक कार्यकाल भी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनके कार्यकाल में ‘पंचज’ योजना (जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर) पर ध्यान दिया गया। इसके बावजूद किसी भी राजनीतिक दल ने राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विधानसभा चुनावों में महिला उम्मींदवार नहीं बढ़ाए। वर्तमान में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और चंबल संभाग में दतिया एवं शिवपुरी की 30 विधानसभा सीटों में से भाजपा के पास 22 और कांग्रेस के पास आठ सीटें हैं।
पिछले चुनाव में पन्ना से कुसुम सिंह मेहदेले चुनाव जीतीं और मंत्री पद भी उन्हें प्रदान किया गया। जहां तक बुंदेलखण्ड के मध्यप्रदेशीय सम्भागीय मुख्यालय सागर का प्रश्न है तो यहां का इतिहास महिलाओं की दृष्टि से गौरवपूर्ण रहा है। केंद्र में बनीं अंतरिम सरकार में सागर की विदुषी कलावती दीक्षित को सदस्य मनोनीत किया गया था। केंद्र की अंतरिम सरकार में सागर सपूत डा. हरीसिंह गौर सदस्य थे। 25 दिसंबर 1948 को उनके आकस्मिक निधन के बाद कलावती दीक्षित को संविद सरकार में सदस्य बनाया गया था। इस तरह सागर से सांसद बनने वाली वे पहली महिला थीं। इसके बाद गोवा क्रांति में गोली खाकर भी तिरंगा थामने वाली सहोद्राबाई राय सागर से 1957 में पहली बार सांसद बनीं। वे सागर से तीन बार सांसद चुनी गईं। बुंदेलखंड से उमा भारती ने 2003 में मुख्यमंत्री का पद संभाला। वे इस क्षेत्र से मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने वाली पहली महिला थीं। 1993 में सागर से सुधा जैन विधायक निर्वाचित हुईं। वे भी 1998 और 2003 में लगातार सागर से विधायक चुनी गईं।
विगत चुनाव में भाजपा टिकट से पारुल साहू ने सुरखी विधान सभा से चुनाव जीता था किन्तु इस बार उन्होंने स्वयं ही चुनाव न लड़ने का फैसला किया। सवाल इस बात का नहीं है वे किस पार्टी से संबंद्ध हैं, सवाल यह है कि एक तो महिलाओं को राजनीति में यूं भी कम स्थान दिया जाता है उस पर एक सुशिक्षित, कर्मठ महिला का चुनाव से पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। पिछले चुनाव में पृथ्वीपुर विधान सभा की अनितानायक चुनाव जीत कर विधायक बनीं। छतरपुर की ललिता यादव को इस बार उनका पिछला क्षेत्र बदल कर बड़ामलहरा क्षेत्र दे दिया गया। ज़मीनी तौर पर देखा जाए तो अकेले सागर में कई ऐसी महिलाएं हैं जो विभिन्न दलों में रहती हुई निरंतर सक्रिय रहती हैं फिर भी टिकट के समय उन्हें समीकरण से बाहर ही रखा गया। रेखा चौधरी, इन्दु चौधरी, लता वानखेड़े, शारदा खटीक, कुसुम सुरभि, रंजीता राणा आदि ऐसी कई महिलाएं हैं जिनकी राजनीतिक सक्रियता अख़बारों की सुर्खियों में रहती है और इनमें से कुछ तो राजनीतिक परिवारों से भी हैं। राजनीतिकदल चाहते तो इन महिलाओं को ले कर भी चुनावी समर लड़ सकते थे, क्यों कि जीत का शत प्रतिशत दावा तो कोई भी उम्मीदवार नहीं कर सकता है। यही तो लोकतंत्र की विशेषता है।
चुनाव आते ही स्टारप्रचारक और राष्ट्रीय स्तर के नेता बड़ी-बड़ी बातें ले कर हाजिर होने लगते हैं। फिर बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही हैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 21.11.2018)

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Friday, August 10, 2018

बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी
- डॉ. शरद सिंह
इस बार आमसभा चुनावों में कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? यह एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर सूची जारी होने पर ही मिलेगा। किन्तु क्या सूची में दर्ज़ किया जाना ही पर्याप्त होगा महिलाओं के लिए या फिर उन्हें उनके असली राजनीतिक अधिकार भी दिए जाएंगे? क्या एक बार फिर ‘रबर स्टैम्प’ म
हिला उम्मीदवार रहेंगी जो पति के निर्णय की उंगली पकड़ कर चलती रहेंगी अथवा इस बार वास्तविक योग्य महिला उम्मीदवारों को सूची में स्थान दिया जाएगा? यह ध्यान रखना जरूरी है कि बुंदेलखंड की महिलाएं अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिए आज भी सच्चे राजनीतिक अधिकारों की राह देख रही हैं।
बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह ... चर्चा प्लस...Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
आमसभा चुनावों के निकट आते ही सबसे पहले प्रश्न उठते हैं, किसको टिकट मिलेगी और किसको नहीं? कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? लेकिन क्या महिला उम्मीदवारों के आंकड़े बढ़ने से ही राजनीति में महिलाओं की पकड़ बढ़ जाएगी? सच तो यह है कि चुनाव निकट आते ही महिलाओं की तरफ़दारी करने वाले बयानों की बाढ़ आ जाती है किन्तु चुनाव होते ही किए गए वादे ठंडे बस्तों में बंधने लगते हैं, विशेषरूप से राजनीति में महिलाओं के प्रतिशत को ले कर। बुंदेलखंड के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत ही विचित्र स्थिति दिखाई देती है। बुंदेलखंड जो दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है, दोनों की एक साथ बात की जाए तो आंकड़ों के अनुसार राजनीति में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर दिखाई देती है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों के परिदृश्य से अलग ही तस्वीर दिखाती है।
यदि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की बात की जाए तो उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में अब तक हुए 15 विधानसभा चुनावों में 15 महिलाएं विधायक चुनी जा चुकी हैं। इनमें सबसे ज्यादा 11 दलित महिलाएं हैं और तीन पिछड़े और एक सामान्य वर्ग से हैं। इनमें से एक महिला छह बार विधायक चुनी जा चुकी है। मध्यप्रदेश में भी महिला विधायकों की गिनती अधिक तो नहीं लेकिन संतोषजनक है। समूचे बुंदेलखण्ड में सांसदों, विधायकों, सरपंचों, पंचों, नगरपालिका अध्यक्षों एवं पार्षदों के रूप में महिलाओं ने बेहतर उपस्थिति दर्ज़ कराई है। इन सारी राजनीतिक पदाधिकारी महिलाओं की यदि गिनती की जाए तो ऐसा प्रतीत होगा मानो बुंदेलखंड की महिलाएं पूर्णतः सशक्त हो गई हैं। मगर इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो इस प्रगति के गुब्बारे की हवा निकालने के लिए काफी है। जनसेवा के पदों पर चुनी गई महिलाओं में अधिकांश ऐसी हैं जो प्रचार-प्रसार तक में स्वतंत्र रूप से अपने नाम का उपयोग नहीं कर पाती हैं। उनके नाम के साथ उनके पति का नाम जुड़ा रहता है जो कि उनकी असली पहचान पर भारी पड़ता है। इससे सभी के मन में यह बात घर कर जाती है कि निर्णय लेने के सारे काम तो ‘भैयाजी’ करते हैं। ‘भौजी’ तो नाम भर की हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी को किसी महिला सरपंच से काम है तो वह महिला सरपंच के पास जाने के बजाए ‘सरपंचपति’ को ढूंढेगा जिससे उसका काम बन सके। कई पंचायतें ऐसी हैं जहां महिला सरपंच के स्थान पर सरपंचपति बैठकें आयोजित करते हैं तथा पत्नी की ओर से सारे निर्णय लेते हैं। यानी ऐसी महिला सरपंच होती हैं खालिस रबर-स्टैम्प। यदि इस व्यवस्था के तह में पहुंचा जाए तो पता चलता है कि वह महिला जिसे सरपंच की सीट के लिए चुनाव लड़वाया गया और जिता कर सरपंच बनवाया गया, वह न तो अधिक पढ़ी-लिखी है और न उसमें कभी कोई राजनीतिक रुझान रहा। चूंकि कतिपय कारणों से पति को टिकट नहीं मिल सकता था इसलिए पत्नी के लिए टिकट जुगाड़ लिया गया और पत्नी के नाम पर पति का शासन स्थापित हो गया।
महिला पार्षदों के पतियों द्वारा पत्नी के बदले बैठकों में भाग लेने पर कई बार आपत्तियां भी उठाई जाती हैं किन्तु इससे कोई दीर्घकालिक फर्क नहीं पड़ता है। ऐसी पहलकदमी कभी-कभी ही होती है। अधिकांश महिला सरपंच और पंच जिस सामाजिक माहौल से आती हैं उनमें उनका स्वतंत्र अस्तित्व बहुत कम होता है। पतियों की राजनीतिक लालसा उन्हें वैचारिकदृष्टि से अपाहिज बनाए रखती है। वे पति से पूछे बिना एक भी निर्णय नहीं ले पाती हैं। ऐसे उदाहरण देश के प्रत्येक हिससे में मिल जाएंगे किन्तु बुंदेलखंड सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक क्षेत्र में आज भी पिछड़ा हुआ है इसलिए इस क्षेत्र की महिलाओं का राजनीतिक अधिकार का स्वप्न आज भी दिवास्वप्न बना हुआ है।
यदि पंचायतों, पालिकाओं, निगमों, विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित न कर दी जातीं तो वह आंकड़ा भी शायद देखने को न मिल पाता जो आज कम से कम कुछ ढाढस तो बंधाता है। फिर भी यह मलाल तो रहता ही है कि राष्ट्रीय राजनीतिक दल भी 10-15 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देते हैं। भारतीय राजनीति में अभी भी पुरुषवादी सोच ही हावी है। राजनीतिक दलों के एजेंडे में महिला और महिलाओं के मुद्दे काफी पीछे आते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि महिलाओं को देश में कोई भी राजनीतिक दल वोट बैंक के तौर पर नहीं मानता है। अमूमन सभी दल मानते हैं कि महिलाएं अपने घर के पुरुषों के मुताबिक ही मतदान करती हैं। कुछ जमीनी नेता ही ऐसे हैं जो महिलाओं के हित में ठोस कदम उठाने का प्रयास करते रहते हैं। लेकिन इससे परिवारों को आर्थिक लाभ तो मिलता है लेकिन उन परिवारों की महिलाओं को निर्णय की आजादी फिर भी नहीं दी जाती है। इस सामाजिक विडंबना के चलते बुंदेलखंड की विशेषरूप से ग्रामीण अंचल की महिलाएं आज भी शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जरूरी ज्ञान से भी वंचित हैं। उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की भी समुचित जानकारी नहीं है। वे स्वसहायता समूह से तो जुड़ जाती हैं किन्तु भुगतान के समय या तो अंगूठा लगाने की अथवा टेढ़े-मेढ़े हस्ताक्षर करने की स्थिति रहती है। उन्हें भुगतान के ब्यौरे का ज्ञान नहीं रहता है अतः वे पूरी तरह से समूह की मुखिया की ईमानदारी पर आश्रित होती हैं। बुंदेलखंड की ग्रामीण औरतें आज भी जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रही हैं। कई गांव ऐसे हैं जहां की महिलाओं को पीने का पानी लाने के लिए आठ-दस किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता है। स्थिति बिगड़ने पर यदि जननी सुरक्षा वाहन अथवा 108 वाहन उपलब्ध न हो तो प्रसव पीड़ा से तड़पते हुए अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों एवं घरेलूहिंसा के मामले में भी बुंदेलखंड पीछे नहीं है।
ये स्थितियां बदल सकती हैं यदि राजनीति में महिलाओं को ईमानदारी भरा प्रतिनिधित्व दिया जाए। अब आगामी लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दल महिलाओं को उनकी योग्यता के आधार पर कितने प्रतिशत टिकट देते हैं, यह देखने का विषय रहेगा क्योंकि यही तय करेगा बुंदेलखंड में महिलाओं के विकास और उनके भविष्य को। यह सच है कि समूचा बुंदेलखंड ही अपने विकास की बाट जोह रहा है लेकिन उतना ही सच यह भी है कि इस क्षेत्र की महिलाएं अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिए राजनीतिक अधिकारों की राह देख रही हैं।

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Wednesday, July 5, 2017

चर्चा प्लस ... महिलाएं, मासिकधर्म और जीएसटी ... डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
"जीएसटी के तहत सैनिटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत कर लगाया गया है। अतः महिलाजगत में विरोध के स्वर उभरने स्वाभाविक था। वस्तुतः जीएसटी लागू होने के बाद सेनेटरी नैपकीन्स पर देशव्यापी विस्तृत चर्चा और भी जरूरी है। आखिर यह महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी ज़रूरत है।"   ...   #महिलाएं, #मासिकधर्म और #जीएसटी की #चुनौतियां  ...  मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 05.07. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper...

चर्चा प्लस
  महिलाएं, मासिकधर्म और जीएसटी
   - डॉ. शरद सिंह
                                                                जीएसटी में सेनेटरी नैपकीन्स पर 12 प्रतिशत टैक्स लगाए जाने पर महिलाजगत में विरोध के स्वर उभरे। विशेष बात तो यह है कि इस विरोध को सशक्त स्वर दिया बॉलीवुड की अभिनेत्रियों ने। सोशल मीडिया पर यह विरोध जबर्दस्त ‘ट्रेंड’ करता रहा।  तेंदू पत्ता बीनने वाली एवं बीड़ी बनाने वाली महिलाओं के जीवन पर ‘‘पत्तों में क़ैद औरतें’’ किताब लिखने के दौरान मैंने स्वयं यह पाया था कि अधिकांश ग्रामीण महिलाएं सेनेटरी नैपकीन्स से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर वह उनकी आर्थिक पहुंच से बाहर है। वस्तुतः जीएसटी लागू होने के बाद बिना किसी झिझक के सेनेटरी नैपकीन्स पर देशव्यापी विस्तृत चर्चा और भी जरूरी है।
Charcha Plus ..  Dr (Miss) Sharad Singh

हाल ही में आफ्रिकी देश केन्या में एक बड़ा कदम उठाया गया। वहां की सरकार ने अपना बजट  जारी करते हुए घोषित किया कि सभी स्कूली छात्राओं को सरकार की ओर से मुफ्त सेनेटरी नैपकीन्स दिए जाएंगे। जब कि वहीं हमारे देश में सेनेटरी नैपकीन्स पर जीएसटी बवाल मचा रहा। बॉलिवुड अभिनेत्रियों ने देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली को टैग कर उनसे सैनिटरी नैपकीन को टैक्स के दायरे से बाहर रखने की अपील की। अभिनेत्री अदिति राव हैदरी ने ट्वीट किया, ‘’अरुण जेटली जी, सैनिटरी नैपकीन हमारी जरूरत है, लग्जरी नहीं। कृपया इन्हें जीएसटी से बाहर कर दीजिए, ताकि और ज्यादा महिलाएं इनका इस्तेमाल कर सकें।’’
अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने भी इस तरह के टैक्स का विरोध किया है। इस बारे में स्वरा ने कहा, ’मैं अदिति राव हैदरी से पूरी तरह सहमत हूं। सरकार को सैनिटरी नैपकीन पर किसी तरह का टैक्स नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि यह हमारी जरूरत है, किसी तरह की विलासिता नहीं।’
वहीं बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने इस मामले में हैरानी जताते हुए ट्वीट किया, ’’मिस्टर अरुण जेटली यह बेहद आश्चर्यजनक है। मुझे कभी भी नहीं पता था कि सैनिटरी नैपकीन का इस्तेमाल करना लग्जरी है। मैं हैरान हूं। इसलिए मैं आपसे रिक्वेस्ट करती हूं कि सैनिटरी नैपकीन पर टैक्स न लगाया जाए, ताकि यह हमारे देश की महिलाओं के लिए उपलब्ध हो सके। लहू का लगान को ‘नो’ कहिए।’’
बॉलिवुड एक्ट्रेस लीजा रे ने फाइनैंस मिनिस्टर से सैनिटरी नैपकीन पर टैक्स नहीं लगाने की अपील की। उन्होंने लिखा, ’‘अरुण जेटली क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में 88 फीसदी महिलाएं अब भी सैनिटरी नैपकीन की बजाय कपड़े के टुकड़े, राख, लकड़ी की छीलन और फूस इस्तेमाल करती हैं। फिर इन पर भी टैक्स लगा दीजिए?’’
कवन दवे ने ट्वीट किया, ’सैनिटरी नैपकीन पर तो हम पहले ही स्वच्छ भारत सेस के तौर पर टैक्स दे रहे हैं? तो आप लहू के लगान पर डबल चार्ज लेंगे।’ वहीं लेखिका अद्वैता काला ने ट्विटर पर लिखा, ’मासिक धर्म शुरू होने पर 23 फीसदी लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। आपको सैनिटरी नैपकीन को इतना सस्ता करना चाहिए कि सभी उसका इस्तेमाल कर सकें।’
सैनिटरी नैपकीन पर लगने वाले टैक्स के विरोध में 28 जून, बुधवार सुबह से ही ट्विटर पर ‘‘लहू का लगान’’ ट्रेंड करता रहा। बॉलीवुड अभिनेत्रियों के अलावा कई दूसरे क्षेत्र की महिलाओं ने भी वित्त मंत्री अरुण जेटली से इस टैक्स को खत्म करने की मांग की। बॉलिवुड हीरोइनों समेत तमाम महिलाओं ने सरकार से अपील किया कि हमारे देश में आज भी बहुत कम महिलाएं कीमत ज्यादा होने की वजह से सैनिटरी नैपकीन इस्तेमाल नहीं कर पाती। ऐसे में इसे जीएसटी टैक्स के दायरे में लाकर आम लोगों की पहुंच से बाहर न किया जाए।
इसके बाद एक जून 2017 को महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे ने राज्य की स्कूली छात्राओं को 5 रुपये में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि राज्य में अस्मिता योजना के तहत यह सैनिटरी नैपकिन छात्राओं को उपलब्ध कराई जाएगी। नैपकिन देने के लिए सरकार जिला परिषद के स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को ‘अस्मिता कार्ड’ देगी। इससे पहले मई माह में ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को और जिला परिषद स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन मुहैया कराने के लिए फडणवीस सरकार विशेष योजना शुरू करने की बात कही थी। राज्य सरकार ने कहा था कि  अस्मिता योजना के तहत महिलाओं को माहवारी के दिनों में रियायती कीमतों पर सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराएगी। इसके लिए सरकार ने चालू वर्ष के बजट में करीब 25 करोड़ रुपये का प्रावधान की घोषणा की थी। कोयम्बटूर के श्री अरुणाचलम मुरुगनाथन ने कम लागत में सेनेटरी पैड्स बनाने की सस्ती मशीन का निर्माण किया। एक इंटरव्यू में अरुणाचलम ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छ्ता के लिए सैनिटरी पैड बनाने के लिए  बड़ी-बड़ी मशीनें न होकर छोटी-छोटी मशीनें होनी चाहिए ताकि उन्हें गाँव या ब्लॉक स्तर पर कुटीर उद्योग की तरह महिलाओं द्वारा चलाया जाय. इससे न केवल काम दाम में पैड उपलब्ध हो सकेंगे वरन महिलाओं के लिए रोज़गार का साधन भी उपलब्ध हो जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार की 2017 तक 10000 मेन्स्ट्रुअल हाइजीन लाने की योजना को सफल बनाने में सहायक हो सकती थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने उन्हें ये मशीनें यू पी  ब्लॉक स्तर पर लगाने के लिए आमंत्रित भी किया जो एक अच्छी पहल थी।
सन् 2009 में तेंदू पत्ता बीनने वानी एवं बीड़ी बनाने वाली महिलाओं के जीवन पर मैंने एक किताब लिखी, जिसका नाम है ‘‘पत्तों में क़ैद औरतें’’। यह किताब सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली से सन् 2010 में प्रकाशित हुई। इस किताब को लिखते समय मुझे अनेक महिलाओं से मिल कर उनकी निजी समस्याओं को जानने का अवसर मिला। इस दौरान एक बहुत गंभीर समस्या की ओर मेरा ध्यान गया कि अधिकांश ग्रामीण महिलाएं अपने स्वास्थ्य के प्रति परम्परागत तरीकों का प्रयोग करती हैं जो स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की दृष्टि से उचित नहीं है। लेकिन इसके साथ ही मुझे अहसास हुआ कि वे आर्थिक रूप् से इतनी सक्षम नहीं हैं कि वे आधुनिक सुविधाओं को अपना सकें। जैसे मासिकधर्म के दौरान वे सेनेटरी नैपकीन्स काम में नहीं ला सकती थीं क्यों कि एक तो वे उससे अनजान थीं और यदि उसके बारे में जान भी लेतीं तो उसे खरीदने की क्षमता उनमें नहीं थी। मैंने अपनी किताब के पहले अध्याय में ही एक केस स्टडी के अंतर्गत इस मुद्दे का उल्लेख किया - ‘‘माला ने एक स्त्री के जीवन की आरम्भिक अवस्था का परिचय जाना, तेंदू पत्ते की तुड़ाई के दौरान। उसने घने जंगल के बीच युवावस्था में पांव रखा। वह एक बात फिर भी नहीं जान सकी कि उसकी बुआ ने जिस सहजता से उसे कपड़े का टुकड़ा फाड़ कर पहना दिया था वह धूल-मिट्टी के लगातार सम्पर्क में रहा था। यदि उसमें किसी प्रकार के कीटाणुओं की उपस्थिति भी रही हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस अवस्था में स्वच्छता सबसे अधिक आवश्यक हो जाती है उस अवस्था में माला को एक गंदा-सा कपड़ा धारण करना पड़ा। उस गंदे कपड़े के कारण उसे किसी प्रकार की छूत (इन्फेक्शन) भी लग सकती थी या कोई अन्य परेशानी हो सकती थी। किन्तु इस बात की चेतना जब माला की मां और बुआ को नहीं थी तो भला, माला को कहां से होती?
माला जैसी न जाने कितनी बालिकाएं मई-जून की भीषण गर्मी में घने जंगल में तेंदू पत्ते तोड़ती हुई युवती बन जाती हैं जबकि न तो उन्हें चिकित्सक से परामर्श लेने का ज्ञान होता है और न स्वच्छता का भान होता है। तेंदू पत्ते तोड़ने वाली लड़किएं और औरतें चिलचिलाती धूप में भी वे अपनी स्त्रीगत समस्याओं से जूझती रहती हैं, फिर भी जंगलों में भटकती रहती हैं, मात्र इसलिए कि बीस-पच्चीस दिनों में चार पैसे कमा कर अपने परिवार को आर्थिक सहायता दे सकें या फिर अपने परिवार में अपना महत्व स्थापित कर सकें। वे यह जता सकें कि वे स्त्री हैं तो क्या हुआ, वे पढ़ी-लिखी नहीं हैं तो क्या हुआ, वे घर-गृहस्थी सम्हालती हैं तो क्या हुआ, वे बच्चे पैदा करती और उन्हें पालती हैं तो क्या हुआ - वे भी चार पैसे कमा सकती हैं।’’
हमारे देश में ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर घरों की स्कूली छात्राओं की समस्या भी ठीक यही है। उनमें से अनेक ऐसी हैं जो मासिकधर्म के दौरान परम्परागत किन्तु अस्वास्थ्यकर तरीकों का इस्तेमाल करती हैं। अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनीसेफ ने तो मासिकधर्म के दौरान स्वच्छता किस प्रकार रखी जाए एवं सेनेटरी नैपकीन्स का उपयोग कैसे किया जाए, इस विषय पर बाकायदा गाईडलाईन बुकलेट प्रकाशित की हुई है। लेकिन किसी बुकलेट में छपी उपयोगी सामग्री का लाभ भी तभी मिल सकता है जब महिलाओं को उनकी समस्याओं के अनुरूप उन्हीं की बोली-भाषा में जानकारी दे कर प्रेरित किया जाए। जहां तक घोषणाओं का प्रश्न है तो हमारे देश के विभिन्न राज्यों में हर जगह और मुख्यरूप से हर स्कूल में सेनेटरी पैड्स के लिए एटीएम की तरह वेन्डर लगाए जाने घोषणा भी की गई थी। अप्रैल 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि सरकारी स्कूलों में लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन्स बांटे जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि इस योजना के लिए हर साल 30-40 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। यद्यपि कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी अच्छी क्वालिटी के पैड्स बनाने के लिए आगे आ रही हैं। निसंदेह कुछ राज्य सरकारों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं ने ‘मेस्ट्रुअल हाईजीन’ को ले कर कमरकसा हुआ है लेकिन कई राज्यों में ये घोषणाएं एक दिखावा बन कर रह गई हैं। उस पर जीएसटी के तहत सैनिटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत कर लगाया गया है। अतः महिलाजगत में विरोध के स्वर उभरने स्वाभाविक था। वस्तुतः जीएसटी लागू होने के बाद सेनेटरी नैपकीन्स पर देशव्यापी विस्तृत चर्चा और भी जरूरी है। आखिर यह महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी ज़रूरत है।  
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