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Thursday, June 27, 2024

बतकाव बिन्ना की | बाप-मताई तनक अपनों सोई खयाल राखियो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | 'प्रवीण प्रभात' में
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बतकाव बिन्ना की

बाप-मताई तनक अपनों सोई खयाल राखियो !
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘रामधई बिन्ना, जो का होन लगो आजकाल?’’ भैया मोय देखतई साथ बोल परे।
‘‘का हो गओ भैयाजी?’’ मैंने पूछी।
‘‘अब का बताए तुमें? खबरें पढ़-पढ़ के तो हमाओ करेजा मों को आ रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘भओ का? कछू तो बताओ आप!’’ अब मोए भैयाजी की चिंता-सी होन लगी। तभई उते भौजी आ गईं, सो मैंने उनसे पूछी,‘‘काए भौजी? जे भैयाजी खों का हो गओ? आज अजब-सी बातें कर रए?’’
‘‘अरे इनकी ने कओ! बाकी हमाओ सोई जी खराब हो रओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो, ऐसो हो का गओ? अब आप ओरें बुझव्वल ने बुझाओ, जल्दी बताओ के का हो गओ?’’ अब मोए औरई चिंता होन लगी।
‘‘बिन्ना, अपन ओरे लरकोरे से पढ़त आ रए के बाप-मताई देवी-देवता घांई होत आएं। सो, उनकी सेवा करो चाहिए। अपने इते तो मुतकी किसां आएं ई टाईप की जीमें चाए बेटा हो, चाए बेटी होय चाए बहू होय, सबई बाप-मताई की सेवा करत्ते औ उनको कैना मानत्ते।’’ भौयाजी बोले।
‘‘हऔ बा सरवन कुमार नोईं रओ जोन के बाप-माई अंधरा हते, औ बे तीरथ के लाने जाओ चात्ते। सो, सरवन कुमार ने दोई जनों खों टुकनिया में बिठा के कांवर घांई अपने कंधा पे लाद के तीरथ यात्रा कराई हती। बा तो राजा दशरथ ने सरवन कुमार खों तीर ने मारो होतो तो बा अपने बाप-मताई की औरई सेवा करतो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, सरवन कुमार खों मारबेई के कारण तो ऊके बाप-मताई ने राजा दशरथ खों शाप दे दओ रओ के तुमने हम अंधरन को मोड़ा मार डारो, सो तुमे सोई अपने सबसे लाड़ले बेटा की जुदाई झेलने परहे। जेई से तो रामजी खों बनवास जाने परो औ दशरथ खों उने याद कर-कर के अपने प्रान त्यागने परे।’’ भैयाजी ने अपने स्टाईल में आगे की किसां सुना दई।
‘‘हऔ सो, रामजी सोई इत्ते आज्ञाकारी हते के उन्ने बिगैर कोनऊं बहस करे बनवास एक्सेप्ट कर लओ हतो। जो आजकाल को कोनऊं मोड़ा होतो तो जेई कैतो, के हारे जाने तो तुम ओरें जाओ, हम तो इतई राज करबी। ऊंसई आप ओरन को रियाटरमेंट को समै आ गओ आए।’’ भौजी बोलीं।
भौजी की किसां सुनाबे की स्टाईल पे मोय हंसी आ गई।
‘‘तुमे हंसी आ रई? तुमाई भौजी सांची कै रईं। जो आजकाल के मोड़ा होंय तो घर से निकरबे की कैने पे मताई-बाप खों लुघरिया छुबा दें। औ ऊपे बहू बोलहे के पैले हमाओ हींसा दे देओ फेर हम ओरें तो ख्ुादई चले जाबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ का, सीता मैया घांई थोड़े, के बिगैर कछू बोले मूंड़ झुकाए रामजी के संगे महल से कढ़ गईं। जै हो सीता मैया की!’’ भौजी अपने दोई हाथ जोरत भई बोलीं।
‘‘जे आप ओरें आज कोन टाईप की बतकाव कर रए? मोय तो जेई समझ ने आ रई के सरवन कुमार औ रामजी के बनवास से आप ओरन के टेंशन को का लेबो-देबो?’’ मैंने दोई से पूछी।
‘‘अरे तुमने अखबार में पढ़ी नईं का, के आजकाल कित्ती खबरे जेई टाईप की आ रईं के कऊं मोड़ा ने बाप-मताई खों लठिया मार डारो, सो कऊं बहू ने दोई खों कैद कर दओ। को जाने कोन सो जमानो आ गओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, जे सोचो के पैले तो जेई होत्तो की कोनऊं दारूखोर मोड़ा अपने बाप खों, ने तो मताई खों कूटत-पीटत्तो, वा बी दारू के पइसा के लाने। पर बे सबरे अनपढ़ गंवार दारूखोर होत्ते। अब देखो, अब तो अच्छे पढ़े-लिखे मोड़ा, बहू अपने बाप-मताई औ सास-ससुर के लाने जमराज बने जा रए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, मैं समझ गई के आप बा लुगाई के बारे में कै रई न जोन ने अपने सास-ससुर के कमरा के आगे दीवार बनवा दई। जींसे कोऊं ने उनसे मिल सके औ ने बे कऊं निकर सकें। औ बा लुगाई अच्छी पढ़ी-लिखी आए। अपनो स्कूल सोई चलात आए। अब तनक सोचो के ऊके स्कूल में मोड़ा-मोड़ी का सीख-पढ़ रए हुइएं?’’ मैंने कई। काए से के बा खबर मैंने सोई पढ़ी रई। बा तो सासबाई ने कैसऊं बी कर के मोबाईल पे अपनो वीडियो बनाके रिस्तेदारन खों भेज दओ। सो रिस्तेदारन ने कलेक्टर से शिकायत करी औ कलेक्टर ने उन ओरन की खोज-खबर लई।
‘‘देख तो बिन्ना, जेई तो मोय लगो के बा कैसी लुगाई हती? औ चलो मान लओ के बा बुरई लुगाई हती, मनो ऊको बेटा भले बाहरे रैत्तो, पर का ऊको अपने बाप-मताई की तनकऊं सुध ने हती? औ बा उन ओरन को पोता? बा सोई अपनी मताई के करम ने देख पा रओ हतो? औ बा दीवार जादू की छड़ी घुमाए से तो ने बन गई हुइए? ऊको बनत में कछू तो टेम लगो हुइए। औ बने के बाद का ऊने ने देखो? का जाने कोन टाईप के लोग आएं बे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, औ दूसरे दिनां एक खबर पढी के पइसा के लाने मोड़ा ने अपनी बुड्ढी मताई खों लठिया से पीट-पीट के मार डारो। तीसरे दिना फेर जेई टाईप की एक औ खबर पढ़ी। रामधई मोरो तो जी घबड़ान लगो आए के जो हो का रओ? का मोड़ा-मोड़ी खों अपने बाप-मताई से तनकऊ मोह ने बचो?’’ भैयाजी उदास होत भए बोले।
‘‘अपनो जी छोटो ने करो भैयाजी! सबरे मोड़ा ऐसे नईं होत आएं। कोनऊं-कोनऊं ऐसे राच्छस होत आएं, ने तो बाकी तो अपने बाप-मताई की खूब सेवा करत आएं।’’ मैंने भैयाजी खों समझाई।
‘‘काय की सेवा? बे अपनो कैरियर बनाबे में जुटे रैत आएं। बस, इत्तो रैत आए के पैले उनके लाने बाप-मताई पइसा भेजत रैत आएं औ बाद में बे ओरें अपने बाप-मताई के लाने पइसा भेजत आएं। संगे रै के सेवा को कर रओ?’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ का! संगे रैने की का, संगे राखत लौं नईयां। हंा, बाकी ब्याओ हो जाए औ डिलेवरी होबे वाली रए सो मताई की, ने तो सासूबाई कों संगे राखबे की जरूरत पर जात आए। औ बच्चा जो तनक आया के पालबे जोग हो जात आए सो मताई खों दूध की मक्खी घांई मेंक दओ जात आए।’’ भौजी बोलीं।
‘अब सबई इत्ते निठुर नईं रैत आएं।’’ मैंने कई। बाकी भौजी औ भैयाजी की बात में दम तो हती। सो मैंने आगे कई, ‘‘भौजी, जेई से तो सरकार ने मताई-बाप के लाने कानून बनाए आएं, के जो चाए मोड़ा होय, चाए बहू होए, जो कोनऊं बाप-मताई खों ठीक से ने राखे तो थाना से ले के कचहरी लौं खटखटाओ जा सकत आए। मनो, होत का आए के बाप-मताई जेई से डरात रैत आएं के जो हम अपनईं बच्चा हरों की शिकायत ले के कऊं जैहें तो उनके बच्चा हरों की समाज में बदनामी हुइए। अरे, जे सोचो चाइए के जोन बच्चा हरों की बे इत्ती फिकर कर रए, बेई उनके प्रान लेबे खों उधारे फिर रए। मैं सब की नईं कै रई। मनो जोन के इते ऐसी समस्या होय, सो ऊको समाज से, थाना, कचहरी से मदद मांगबे में देर नईं करो चाइए। बा सासू बाई ने सई करी, के अपने रिस्तेदारन खों बताओ के उनकी बहू ने उने कैद कर दओ आए। ने तो बे उतई पिड़े-पिड़े देाई रामजी के इते चले जाते औ कोनऊं खों खबरई ने होती।’’ मैंने भैयाजी औ भौजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना! अब तो बाप-मताई से जेई कैबो को जी करत आए के ‘बाप-मताई तनक अपनों सोई खयाल राखियोे!’ बच्चों की फिकर करबो ठीक आए, पर अपने बुढ़ापा की फिकर सोई कर लेओ। जो आंगू चल के बच्चा हरों ने संगे ने राखो तो रहबे-खाबे को अपनो इंतजाम सो होनो चाइए। काय सई कई के नईं?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘आपने बिलकुल सई कई भैयाजी! जो बाप-मताई अपने लाने कछू इंतजाम कर के राखहें तो उनकी जिनगी में उनके काम आहे औ उनके बाद उनके मोड़ा-मोड़ी खों तो बा मिलई जैहे। औ जो बाप-मताई बच्चन पे ने लदहें तो बे ओरें कछू ज्यादई खयाल राखहें। मोय तो जेई लगत आए।’’मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना जमानो खराब चल रओ। बाप-मताई खों सोई जमाना के हिसाब से चलो चाइए।’’ भौजी बोलीं।    
मनो आप ओरें कोनऊं बेफालतू की चिंता में ने परियो, काय से के सबई बच्चा बुरे नईं होत आएं। हां, सावधानी राखें में कोनऊं हरजा नोंईं। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Thursday, February 16, 2023

बतकाव बिन्ना की | जे ओरें बाप-मताई लो काय जान लगत? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"जे ओरें बाप-मताई लो काय जान लगत?"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
बतकाव बिन्ना की
जे ओरें बाप-मताई लो काय जान लगत?                                                     
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        ‘‘काय भैयाजी, अपन ओरन की गली में अबलौं विकास यात्रा ने आई। काय से के इते आती सो अपन ओरन खों सोई पतो पर जातो के कित्तो विकास भओ।’’ मैंने भैयाजी से कही। बे अपने घर के दुआरे में बैठ के अखबार पढ़ रए हते।
‘‘तुम सोई, कां की बात कर रईं! विकास सब ओरन खों नई दिखाओ जात। जिते दिखाने होत आए, उतई दिखाओ जात आए। उने सोई पता के अपन ओरन ऊंसई जानत के कित्तो विकास हो रओ, औ कित्तो हो गओ। अब तुमाए लाने अलग से बताबे काए आएं बे ओरें?’’ भैयाजी अखबार एक तरफी धरत भए बोले।
‘‘काए, अपन ओरन खों काए नई दिखाओ चाइए? का अपन ओरें वोट नईं देत का?’’ मैंने भैयाजी से कही। मोय उनकी जे बात ने पोसाई।
‘‘अब जेई तो सल्ल आए के तुमाए घांई वोटर तनक-तनक में अहसान सो फेरन लगत आएं के हमने वोट दओ रओ... हमने वोट दओ रओ! अरे, तुमाई अटकी हती सो तुमने वोट दओ रओ। इत्ती तकलीफ हो रई हती सो नई देने हतो।’’ भैयाजी सोई तिन्ना गए।
‘‘मोरी काय अटकी रई? बा तो सबई जने खों वोट दओ चाइए, सो मैंने बी दओ रओ। जो कोनऊं वोट ने देहे सो चुनाव को मतलबई का रैहे? बाकी आप काय के लाने मोय ठेन कर रए के मोरी अटकी हती सो मैंने वोट दओ रओ।’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हम ठेन नई कर रए, मनो याद करा रए के ऊ टेम पे वोट देबे से कऊं ज्यादा वोट देत भए सेल्फी लेबे की परी रैत आए। को जाने देख के बटन दबाओ रओ के ऊंसई दबा दओ।’’ भेयाजी बोले।
‘‘जे सो ज्यादा हो रई भैयाजी! पैलऊं बात तो जे के वोट देत भए अपन ओरें फोटू ने तो खींच सकत आएं औ ने खिंचा सकत आएं। उते से बाहरे आ के वोटिंग सेंटर की तख्ती के आगूं ठाड़े हो के फोटू खींच-खिंचा सकत आएं। सो आपको पैलऔ आरोप सो जे कट्टस हो गओ। रई उते बटन दबाबे की, सो का जे सरकार ऊंसई-ऊंसई बन गई? सो, आप बेफालतू की गिचड़ ने करो। आपखों विकास यात्रा देखबे को मन नई कर रओ, सो ने देखों, मनो मोरो सो खूबई मन हो रओ।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘सो जाओ देख आओ, जिते निकर रई होय, उतई हो आओ।’’ भैयाजी कुढ़त भए बोले।
‘‘जो का भैयाजी? आज मनो आपको मूड ठीक नईं दिखा रओ। का हो गओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘कछू नई भओ!’’ जो एक बेरा में बता दें सो भैयाजी काय के?
‘‘कछू तो आए? अब बताई देओ!’’ मैंने फेर के पूछी।
‘‘अरे, जे तुमाई भौजी आएं न....।’’ भैयाजी कैत भए चुप हो गए।
‘‘का करो भौजी ने? आपको मूंड़ सांे नईं फोड़ दओ? नईं बाकी मूंड फोड़ो होतो, तो पट्टी बंधती दिखाती।’’ मैंने भेयाजी खों टुंची करी।
‘‘बे मोरो मूंड़ फोड़ देतीं सो कोनऊं बात ने रैती, मनो उन्ने हमें हमाए बापराम की गाली दई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे नईं हो सकत! बे ऐसो-वैसो कछूं नईं कै सकत। आपके लाने कछू गलतफैमी हो गई हुइए।’’ मैंने कही।
‘‘कछू गलतफैमी नईं भई! उन्ने सूदे-सूदे हमसे कई के तुम उल्लू के पट्टा आओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो ईमें का हो गओ?’’ मोय कछू समझ में ने आई।
‘‘का कही? के ईमें का हो गओ? काय तुम पढ़ी-लिखी नोईं? काय तुमें पतो नईं के उल्लू के पट्टा को मतलब का होत आए?’’ भैयाजी सो बमक परे और कैन लगे-‘‘तुमें सो बस अपनी भौजी के संगे ठाड़ी रैने, चाय बे हमें गाली देबें चाय हमपे लट्ठ चलाएं।’’
‘‘नई, मोरो मतलब जा नई रओ! मनो उन्ने कओ नई चाउने रओ हुइए, पर कै आई हुइए। सो कै आई, सो कै आई। अब ईको आप दिल पे ने लो। काय से के ऊंसई जे वारी गारी को मौसम चल रओ। अपने इते के एक पुराने मंत्री आएं उन्ने कलेक्टर के लाने उल्लू को पट्ठा कै दओ। जबके बे मंत्रीजी सोई अच्छे-खासे पढ़े-लिखे आएं। सो, जे सब चलत रैत आए। हो सकत आए के भौजी ने जे बात कऊं सुन लई होय औ उन्ने आपके लाने कै आई होय।’’ मैंने भैयाजी खों सहूरी बांधबे को कोसिस करी।
‘‘जेई सो हमें समझ में नईं आत के जे ओरें बाप-मताई लों काय जान लगत? अब देखो तुमाई भौजी ने हमें उल्लू को पट्ठा कओ सो जे मतलब के उन्ने हमाए बापराम खों उल्लू कै दओ। मने अपने ससुर बाबा खों उल्लू बोल दओ। अरे कैने रओ सो हमें उल्लू बोल देतीं। हमाए बापराम खों कैबे की का जरूरत हती?’’ भैयाजी बिगरत भए बोले।
‘‘कै सो आप ठीक रए, मनो जे सो कहनात आए। अब आपई सोचो के जोन लुगाई खों अच्छो सासरो नईं मिलत ऊके लाने रोज ठेन करो जात आए के- काय तुमए मताई-बाप ने तुमें कछू नईं सिखाओ का? - अब आपई सोचो के कोन बाप-मताई अपनी मोड़ी खों सबई कछू नईं सिखात के ऊको सासरे में कोनऊं ठेन ने कर पाए। पर मोड़ी सो मोड़ी आएं, मनो कछू ने सीख पाई, मनो ऊसे कछू गलती होई गई, सो ऊके लाने ऊके बाप-मताई लो कोसो जात आए। मनो मोरो जे कैबे के मतलब नोंई के बापराम खों उल्लू कैबो ठीक आए। बिलकुल गलत आए। मनो, भौजी ने सोशल मीडिया पे हजार दइयां जेई बोल पढे हुंइए, सो बे सोई गुस्सा में बोल बैठीं।’’ मैंने भैयाजी खों समझबे की कोसिस करी।
‘‘ऐसे कैसे बोल बैठीं। हमने सो कभऊं उने उल्लू की पट्ठी ने बोली, फेर उन्ने हमें उल्लू को पट्ठा काय बोल दओ?’’ भैयाजी के मुंडी में मनो उल्लू घुस गओ रओ। बे कछू सुनबे के लाने तैयारई नईं हते। बे बड़बड़ात भए बोले-‘‘हऔ, हमने जब उनसे कई के तुम हमाए बापराम लों काय पोंच रईं? सो बे कैन लगीं के बे मंत्री हरें बोलें सो कछू नईं औ हमने कै दई सो टुनना रए। तुम ठीक कै रईं तुमाई भौजी ने बोई बात पढ़ लई हुइए। बाकी पढ़ लई सो पढ़ लई, मनो उने हमसे ऐसो नई कओ चाइए। बे का कोनऊं कहूं की मंत्री-मिनिस्टर आएं? मंत्री-मिनिस्टर सो कछू कहें, उनको सो नांव होने। बो का कहाउत आए के बदनाम भए सो का भओ, नांव सो भओ। मनें उनखें सो नांव मिल गओ मनो तुमाई भौजी को का मिलो हमाओ जी दुखा के?’’
‘‘चलो, आप अब जे सब मेईं खों मैंकों। बुरई बात याद नई रखो चाइए। उन्ने कछू सोच के नई बोली हुइए। जे कओ के ई टेम पे कोनऊं विधानसभा या संसद में मार-कुट्टव्वल नईं चल रई, ने तों आपखों दो-चार घलई गई होती।’’ मैंने हंस के कई।      
‘‘हऔ, सही कई। मनो मोय जे समझ में नई आत के जे नेता हरें कोनऊं के बाप-मताई लों काय जान लगत आएं? उन ओरन खों ऐसो नई कओ चाइए। मनो सोचो के उनके ऐसऊं बिगड़े बोल सुन के तुमाई भौजी के बोल बिगड़ गए, सो मोड़-मोड़ी की जुबान को का हुइए? उनपे का असर हुइए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप एकदम सही कै रए भैयाजी! बड्डे हरों खों बड्डन घांईं रैबो चाइए। काय से के उनके बोल सो छिन भर के लाने बिगड़े मनो मीडिया ऊको रट्टा लगवा देत आए। बाकी जे सब छोड़ो औ मोय सो आप जे बताओ के अपने इते विकास यात्रा वारे अबलों काय नईं आए?’’मैंने भैयाजी से पूछी। मोरी बात सुन के बे सोई हंस परे। मनो उनको मूड ठीक हो गओ कहानो।

मोय पतो आए के भौजी सोई पछता रई हुइएं के उन्ने का बोल दओ। मनों आप ओरें सोई बाप-मताई लों ने जइयो, अच्छो नईं लगत। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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