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Tuesday, February 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरणपुस्तक समीक्षा

व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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स्मारिका  - महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक
संपादक   - मुकेश तिवारी
प्रकाशक  - प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई
मूल्य - उल्लेख नहीं।
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यदि स्व. महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व की व्याख्या की जाए तो भगवद्गीता (12.13-14) का यह श्लोक सटीक बैठता है कि-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च,
निर्ममो निरहंकारः समदुखसुखः क्षमी।। 
- अर्थात जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, दयालु है, अहंकार रहित है और सुख-दुख में समान रहता है, वही वास्तव में सुसंस्कृत है। महेंद्र फुसकेले जी में सकल मानवता के प्रति दया, ममता, करुणा, धैर्य आदि सभी गुण थे। इस पर भी सबसे बड़ा गुण उनमें था सत्य की पक्षधरता का। प्रोफेशन से वे अधिवक्ता थे। श्रमिकों के प्रबल समर्थक थे तथा स्त्रियों के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर हिमायती थे। ऐसे ही व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मारिका का कोई औचित्य होता है।
महेंद्र फुसकेले जी के निधन (1फरवरी 2021) के उपरांत से प्रगतिशील लेखक संघ के सौजन्य से प्रतिवर्ष एक स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। महेन्द्र फुसकेले जी का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी रहा। उन्होंने उपन्यास के माध्यम से स्त्री जीवन को जितनी सूक्ष्मता से सामने रखा, उतनी ही बारीकी से कविताओं के द्वारा स्त्री की दशा को अभिव्यक्ति दी। ‘‘आचरण’’ के इसी काॅलम के अंतर्गत स्व. डाॅ. वर्षा सिंह ने लिखा था कि ‘‘हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्मे, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उन कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। ‘तेंदू के पत्ता में देवता’, ‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’, ‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइओ’ नामक अपने उपन्यासों में स्त्री पक्ष को जिस गम्भीरता से प्रस्तुत किया है, वही गम्भीरता उनकी कविताओं में भी दृष्टिगत होती है। कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ उनके काव्यात्मक स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उपन्यासकार फुसकेले स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और महत्ता को भावात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कविता का मार्ग चुनते हैं। .... महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री पर विमर्श नारा बन कर नहीं अपितु सहज प्रवाह बन कर बहता है। उनकी कविताओं में स्त्री चिंतन बहुत ही व्यावहारिक और सुंदर ढ़ंग से प्रकट हुआ है।’’
इस वर्ष की स्मारिका और अधिक विशिष्ट है क्योंकि इसमें महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह और श्री लाल शुक्ल की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनका भी स्मरण किया गया है तथा प्रेमचंद एवं कबीर के साहित्य पर भी लेख सहेजे गए हैं। कबीर वे कवि थे जिनके सामाजिक सरोकार अत्यंत विस्तृत थे। उनकी साखियां आज भी बेजोड़ हैं। साथ ही, उनकी ललकार की क्षमता का आज भी कोई सानी नहीं है। जहां तक प्रेमचंद का प्रश्न है तो वे हिन्दी साहित्य के वे बिन्दु थे जहां से हिन्दी कथा साहित्य ने सच्चे अर्थ में आधुनिक कथानक में प्रवेश किया तथा उस तबके से नाता जोड़ा जिसकी ओर साहित्यकारों की कलम का ध्यान कम ही जाता था।
श्रीलाल शुक्ल की पहचान उनकी स्पष्टवादिता से रही। उन्हें कालजयी बनाया उनकी रचना ‘‘राग दरबारी’’ ने। ‘‘राग दरबारी’’ हिंदी साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक रचना है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने 1968 में लिखा था। यह उपन्यास भारत के ग्रामीण और अर्द्धदृशहरी जीवन की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक गिरावट का आईना है। इसकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और तीखे व्यंग्य से परिपूर्ण है। वहीं, नामवर सिंह हिंदी साहित्यिक आलोचना के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। वह प्रगतिवादी आलोचक होने के साथ-साथ नए आलोचकों में भी अपना अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य में आलोचना, संपादन, शोध, व्याख्यान और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी कारण उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचना के ‘रचना पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध करने वाले नामवर सिंह को उनकी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए वर्ष 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
चाहे कबीर या प्रेमचंद हों, नामवर सिंह या श्रीलाल शुक्ल हों या फिर महेंद्र फुसकेले जी हों, इनका स्मरण इनके गम और कृतित्व के आधार पर ही किया जाता है, वस्तुतः व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी स्मृतियां रचता है तथा उसे कालजयी बनता है। जब व्यक्ति निज की चिंता को हाशिए पर रखकर सकल मानवता तथा विशेष रूप से उन लोगों के बारे में मनन चिंतन करता है जिन्हें समाज ने ही गौण बना दिया है तथा उनकी सदा उपेक्षा की है, तब चिंतन करने वाला व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतः विस्तार लेने लगता है। प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई की इस स्मारिका में प्रस्तुत गद्य एवं पद्य सामग्री को पढ़कर इस तथ्य का प्रमाण हासिल किया जा सकता है। स्मारिका में महेंद्र फुसकेले जी पर पंद्रह लेख हैं- एडवोकेट के.के. सिलाकारी ने फुसकेले जीक्ष के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है “सागर के महान व्यक्तित्व श्री महेन्द्र फुसकेले”, गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख है  “मार्क्सवाद के प्रति सारा जीवन प्रतिबद्ध रहे कामरेड”, एडवोकेट अरविंद श्रीवास्तव ने लिखा है “कामरेड फुसकेले राजनैतिक घटनाक्रम से”। इनके साथ ही एडवोकेट ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने “श्रद्धांजलि: एक कम्युनिस्ट योद्धा”, वीरेंद्र प्रधान ने “नव लेखकों के प्रेरणास्रोत महेंद्र फुसकेले”, डॉ. मनोज श्रीवास्तव ने “स्मृतियां जो धरोहर हैं”, प्रो. एन.के. जैन ने “संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी-फुसकेले जी”, एडवोकेट राजेश पाण्डेय ने “सत्यता के प्रतीक श्री महेंद्र फुसकेले जी” संजय गुप्ता ने “यादगार पल”, डॉ. बहादुर सिंह परमार ने “फुसकेले जी थे सर्वहारा वर्ग के मसीहा”, शैलेंद्र शैली ने “हमारे आदर्श और प्रेरक कॉमरेड”, डॉ राजेंद्र पटोरिया ने “सिद्धान्तवादी श्री महेन्द्र फुसकेले जी”, कामरेड चंद्रकुमार ने “स्मृति दिवस”, देवेंद्र सिंघई ने “बहुमुखी प्रतिभा संपन्न श्री फुसकेले जी” तथा अजित कुमार जैन ने “कॉमरेड महेन्द्र कुमार फुसकेले” अपने लेख के रूप में महेंद्र फुसकेले जी का स्मरण किया है।
नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए जो लेख स्मारिका में प्रकाशित किए गए हैं वे हैं - “नामवरसिंह: एक साथी, एक आलोचक”(नमृता फुसकेले), “नामवर जी को मैंने देखा है” (टीकाराम त्रिपाठी)। श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित लेख है डॉ. नमृता फुसकेले का “श्रीलाल शुक्ल जन्म शताब्दी स्मरण”।
कबीर पर लेख हैं - “मोकूँ रोए सोई जन, जो सबद विवेकी होए” (कैलाश तिवारी ‘विकल’), “कबीर के कथित स्त्री-विरोधी दोहों का सच” (डॉ सुश्री शरद सिंह), “कबीर और वर्तमान में उनकी बढ़ती प्रासंगिकता” (सतीशचंद्र पाण्डे), “क्रान्तिकारी कवि कबीर” (टीकाराम त्रिपाठी), “कबीर का दर्शन” (पेट्रिस फुसकेले)  तथा “कबीर और किसान” (कैलाश तिवारी ‘विकल’) तथा  कबीर: एक दृष्टि निक्षेप (पी.आर. मलैया)।
प्रेमचंद पर लेख इस प्रकार हैं- “प्रेमचंद की दृष्टि में प्रेम वाया - प्रेम की वेदी’’ (डॉ सुश्री शरद सिंह), “प्रेमचंद के साहित्य में मानव प्रेम एवं राष्ट्रधर्म” (डॉ. महेंद्र खरे), “प्रेमचंद वर्तमान परिदृश्य और साहित्य में प्रासंगिक है” (एडवोकेट पेट्रिस फुसकेले), “प्रेमचंद कल आज और कल”(कैलाश तिवारी ‘विकल’)।
इन सामग्रियों के अतिरिक्त दोहे, गजल, संस्मरण, कहानी, चौकड़िया, गीत, अठवाई आदि अन्य गद्य-पद्य रचनाएं समाहित हैं।
महेंद्र फुसकेले जी की जयंती पर प्रकाशित इस स्मारिका की विशेषता यह है कि इसका प्रकाशन व्यय मुख्य रूप से  फुसकेले परिवार तथा प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई के कुछ सदस्य मिलकर वहन करते हैं। स्मारिका का मुद्रण निमिष आर्ट एंड पब्लिकेशन ने किया है जो कि नयनाभिराम है। कव्हर के अंतिम भीतरी पृष्ठ पर प्रगति लेखक संघ की सागर इकाई की गतिविधियों की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। कलेवर की दृष्टि से यह स्मारिका प्रकाशित कर प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई ने एक नया प्रतिमान गढ़ा है तथा एक पठनीय एवं संग्रहणीय स्मारिका प्रकाशित की है।
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Friday, October 31, 2025

शून्यकाल | प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | नई शिक्षा नीति में भाषाई प्रावधान का प्रश्नचिन्ह | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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शून्यकाल 
जन्मदिन विशेष 
प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लभ भाई पटेल का व्यक्तित्व
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

      स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। ‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल एक सच्चे देशभक्त थे। आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में उन्होंने भारतीय गणराज्य में रियासतों के एकीकरण का दुरूह कार्य जिस कुशलता से कर दिखाया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा। स्वभाव से वे निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासनप्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय गुण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था तथा देश सेवा उनकी साधना थी। उनका राजनैतिक योगदान देश के व्यापक हित से जुड़ा हुआ होने के कारण ही उन्हें ‘भारतीय बिस्मार्क’ भी कहा जाता है।


   वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते।
       सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। करमसाड गांव के आस-पास दो उपजातियों का निवास था- लेवा और कहवा। इन दोनों उपजातियों की उत्पत्ति भगवान रामचन्द्र के पुत्रों लव और कुश से मानी जाती है। वल्लभ भाई पटेल का परिवार लव से उत्पन्न लेवा उपजाति का था जो पटेल उपनाम का प्रयोग करते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्रा नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े। नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
        बचपन से ही संषर्घमय जीवन व्यतीत करने के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल के स्वभाव में कठोरता तो आई ही थी, साथ ही साथ कठिन से कठिन समस्याओं को सहज ढंग से सुलझाने की क्षमता का भी विकास उनमें हुआ था। उनके स्वभाव में गम्भीरता थी और इच्छाशक्ति में लोहे जैसी मजबूती। वल्लभ भाई बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे किन्तु उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे इंग्लैंड जा सकें। उन्होंने वकालत करके धन जोड़ा और जब इंग्लैंड जाने का समय आया तो उनके बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें पहले इंग्लैंड जाने दें। अनुपम त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वल्लभ भाई ने अपने बड़े भाई को अपने बदले इंग्लैंड जाने दिया और स्वयं उनके लौटने के कुछ समय बाद इंग्लैंड गये।
         इंग्लैंड जा कर उन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई अच्छे अंकों से पूरी की। भारत वापस आ कर एक बार फिर वकालत आरम्भ की और वकालत के क्षेत्र में ख्याति एवं प्रतिष्ठा अर्जित की। आरम्भ में वल्लभ भाई महात्मा गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे किन्तु जब वे गांधी जी के निकट सम्पर्क में आए तो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने न केवल अहिंसा एवं सत्याग्रह को अपनाया अपितु पाश्चात्य वस्त्रों को सदा के लिए त्याग कर धोती-कुर्ता की विशुद्ध भारतीय वेश-भूषा अपना ली।
         स्वतंत्रता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार  का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
        महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे।
        वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू के बीच संबंध


सरदार पटेल और नेहरू की प्रकृति में असमानता थी, एक ओर पटेल एक साधारण किसान परिवार से ग्रामीण परिवेश में पले बड़े हुए, वहीं नेहरू को पारिवारिक विरासत का धनी कहा जा सकता है। व्यक्ति अपनी प्रकृति का अनुसरण करके ही कार्य कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है पटेल और नेहरू दोनों के लिए मार्गदर्शी महात्मा गाँधी ही थे और जो कुछ सामंजस्य या वैचारिकता का आदान-प्रदान रहता उसमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी, क्योंकि महात्मा गाँधी समय की नजाकत को पहले ही भांप लेते थे। सरदार पटेल भी ऐसा कोई कार्य नहीं करते थे जिससे गाँधीजी को ठेस पहुँचे परन्तु जब मामला राष्ट्रहित का होता या भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए मत भिन्न होता तो वे गाँधीजी को इससे सचेत करते थे और आव यकता होने पर विरोध भी जताते थे। पटेल और नेहरू दोनों को ही आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है और दोनों में अनेक समानताओं के होते हुए भी वैचारिक भिन्नता थी। दोनों में ही राष्ट्र भक्ति, नेतृत्व क्षमता, आदर्शों के प्रति आस्था थी। डॉ. बी.के. केसकर ने कहा था- नेहरू और पटेल दो विरोधी तत्वों का एक ऐसा मिश्रण थे, जो एक-दूसरे के पूरक थे। नेहरू की विचारधारा साम्यवाद से प्रभावित थी जबकि पटेल ने किसी भी विचारधारा को अपने पर हावी नहीं होने दिया। इन विपरीत स्वभावों से जुड़ी दोनों धुरियों को महात्मा गाँधी ने एक साथ बांधे रखने का कार्य किया था। हालाकि सरदार पटेल और नेहरू दोनों का सपना एक मजबूत भारत का निर्माण करना था परन्तु पटेल वास्तविक  एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण से समस्या पर विचार करते थे और प्रत्येक समस्या के भविष्य के परिणामों का अंदाजा लगा लेते थे। उदाहरण के तौर पर जूनागढ़ और हैदराबाद के मामले में पटेल ने नेहरू की इच्छा के विरूद्ध जाकर कार्यवाही की और भारत में मिला लिया। क मीर के मामले में नेहरू ने अपनी अन्तर्राष्ट्रीय नीति के कारण बिना पटेल से विचार विमर्श किए समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए जिसके पटेल सख्त विरोधी रहे और समस्या आज तक बनी हुई है। इसी प्रकार चीन की मित्रता पर भी पटेल ने कभी विश्वास नहीं किया बल्कि संभावित खतरों की ओर पहले ही ईशारा कर दिया था। नेहरू ने 1 अगस्त 1947 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लिखा कि मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ। इस पत्र का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तम्भ हैं। इसी के उत्तर में पटेल ने नेहरू को लिखा कि एक अगस्त के पत्र के लिए धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग व प्रेम रहा है तथा 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आ है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको इस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी ने नहीं किया है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए में आपका कृतज्ञ हूँ।”
      सरदार पटेल वचन के पक्के तथा सहयोग से काम करने वाले व्यक्ति थे जबकि जवाहरलाल नेहरू महत्वाकांक्षी अधिक थे लेकिन महत्वाकांक्षी होते हुए भी पटेल की योग्यता पर पूर्ण वि वासी थे। गाँधीजी की मृत्यु उपरांत 3 फरवरी 1948 को पं. नेहरू ने पटेल को लिखा-"बापू की अन्तिम अभिलाषा यह थी हम दोनों ने अब तक जिस तरह कन्धे से कन्धा मिलाकर काम किया है, उसी तरह आगे भी करते रहें। हमारे मतभेदों में से भी हमारे बीच महत्व के विषयों में जो मतैक्य है, वह स्पष्ट रूप से सामने आ चुका है और उसी में से एक दूसरे के प्रति हमारा आदर भाव भी प्रकट हुआ है।"
          वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते। वस्तुतः वल्लभ भाई पटेल के जीवन के बारे में पढ़ना भारतीय संस्कृति एवं भारतीय मूल्यों को पढ़ने के समान है।  
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Wednesday, October 30, 2019

चर्चा प्लस …प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लाभ भाई पटेल का व्यक्तित्व - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …
 प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लाभ भाई पटेल का व्यक्तित्व
     - डाॅ. शरद सिंह                                                                            
       ‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल एक सच्चे देशभक्त थे। आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में उन्होंने भारतीय गणराज्य में रियासतों के एकीकरण का दुरूह कार्य जिस कुशलता से कर दिखाया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा। स्वभाव से वे निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासनप्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय गुण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था तथा देश सेवा उनकी साधना थी। उनका राजनैतिक योगदान देश के व्यापक हित से जुड़ा हुआ होने के कारण ही उन्हें ‘भारतीय बिस्मार्क’ भी कहा जाता है।
Charcha plus a column of Dr (Miss)Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily, चर्चा प्लस …प्रेरणा देता रहेगा सरदार वल्लाभ भाई पटेल का व्यक्तित्व - डाॅ. शरद सिंह
       वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते।
       सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। करमसाड गांव के आस-पास दो उपजातियों का निवास था- लेवा और कहवा। इन दोनों उपजातियों की उत्पत्ति भगवान रामचन्द्र के पुत्रों लव और कुश से मानी जाती है। वल्लभ भाई पटेल का परिवार लव से उत्पन्न लेवा उपजाति का था जो पटेल उपनाम का प्रयोग करते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्रा नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े। नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
        बचपन से ही संषर्घमय जीवन व्यतीत करने के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल के स्वभाव में कठोरता तो आई ही थी, साथ ही साथ कठिन से कठिन समस्याओं को सहज ढंग से सुलझाने की क्षमता का भी विकास उनमें हुआ था। उनके स्वभाव में गम्भीरता थी और इच्छाशक्ति में लोहे जैसी मजबूती। वल्लभ भाई बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे किन्तु उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे इंग्लैंड जा सकें। उन्होंने वकालत करके धन जोड़ा और जब इंग्लैंड जाने का समय आया तो उनके बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल ने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें पहले इंग्लैंड जाने दें। अनुपम त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वल्लभ भाई ने अपने बड़े भाई को अपने बदले इंग्लैंड जाने दिया और स्वयं उनके लौटने के कुछ समय बाद इंग्लैंड गये।
         इंग्लैंड जा कर उन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई अच्छे अंकों से पूरी की। भारत वापस आ कर एक बार फिर वकालत आरम्भ की और वकालत के क्षेत्र में ख्याति एवं प्रतिष्ठा अर्जित की। आरम्भ में वल्लभ भाई महात्मा गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे किन्तु जब वे गांधी जी के निकट सम्पर्क में आए तो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने न केवल अहिंसा एवं सत्याग्रह को अपनाया अपितु पाश्चात्य वस्त्रों को सदा के लिए त्याग कर धोती-कुर्ता की विशुद्ध भारतीय वेश-भूषा अपना ली।
         स्वतंत्राता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार  का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
        महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे।
      वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने रियासतों के एकीकरण जैसे असम्भव दिखने वाले कार्य को उस समय अन्जाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे। अगर सरदार पटेल निरन्तर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी बने रहते। दुर्भाग्यवश, कश्मीर की रियासत का मामला जवाहरलाल नेहरू ने अपने लिए रख लिया था, जो आज तक नहीं सुलझ सका जबकि डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि राष्ट्रवादी नेता चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के प्रश्न को हल करने का दायित्व सरदार वल्लभ भाई पटेल को सौंपा जाना चाहिए किन्तु जवाहरलाल नेहरू इस पक्ष में नहीं थे। जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का मामला अपने हाथ में ही रखा। यदि जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर की रियासत को भी वल्लभ भाई के हवाले कर दिया होता तो कश्मीर की समस्या 21वीं सदी का मुंह कभी नहीं देख पाती। वस्तुतः वल्लभ भाई पटेल के जीवन के बारे में पढ़ना भारतीय संस्कृति एवं भारतीय मूल्यों को पढ़ने के समान है।  
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 30.10.2019)
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