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Saturday, July 5, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह के काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की समीक्षा 'आचरण' में

डॉ (सुश्री) शरद सिंह के काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की समीक्षा 'आचरण' में
"आचरण" में मेरे काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की गीतऋषि डॉ. श्याममनोहर सीरोठिया जी द्वारा की गई समीक्षा...
इतनी सारगर्भित समीक्षा हेतु हार्दिक आभार डॉ. सीरोठिया जी 🙏
हार्दिक आभार "आचरण" 🙏

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डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Monday, June 30, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह के काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की डॉ श्याम मनोहर सिरोठिया द्वारा समीक्षा

"गीत ऋषि" की उपाधि से विभूषित देश के वरिष्ठ गीतकार डॉ श्याम मनोहर सिरोठिया जी ने मेरे कविता संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की बहुत गहराई से सुंदर समीक्षा की है। अत्यंत आभारी हूं 🚩🙏🚩
       मेरे अनुरोध पर डॉ. सीरोठिया जी ने मुझे समीक्षा का टेक्स्ट भी प्रेषित किया है जिसे पठन सुविधा के लिए यहां साझा कर रही हूं... साभार... 🙏
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 *त्रासदी की कोख से जन्मी धैर्य, हिम्मत एवं जीवटता  की कविताएँ* 
  कविता संग्रह--- *तीन पर्तों में देवता* 
कवयित्री---डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
प्रकाशक---बुक्स क्लिनिक पब्लिशिंग कुडूडांड, पंचमुखी हनुमान मंदिर के पास बिलासपुर (छ. ग.)495001
मूल्य---200/

समीक्षक ----डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया 

     
 आद सुश्री शरद सिंह जी का नाम हिंदी साहित्य जगत में स्त्री विमर्श को लेकर बेहद सम्मानित एवं चर्चित  है, पिछले पन्ने की औरतें,पचकौड़ी, कस्बाई सिमोन एवं शिखंडी उपन्यासों ने  हिंदी उपन्यास जगत में बड़ी हलचल पैदा की है।हिंदी, अंग्रेजी एवं बुंदेली में गद्य एवं पद्य में समान अधिकार से लेखन करने वाली डॉ शरद सिंह की 60 पुस्तकें प्रकाशित  हो चुकी हैं. कथा, कहानी, गीत, नवगीत, गजल, कविता, नाटक, समीक्षा एवं नियमित स्तंभ लेखन का एक यशश्वी  इतिहास डॉ शरद जी के साथ जुड़ा हुआ है. आपकी रचनाधर्मिता ने हमारे शहर सागर को पूरे देश में गौरवान्वित किया है। आपको पढ़ते हुए पाठक एक नए रचना संसार में विचरण करते हुए चिंतन के ऐसे आयामों का स्पर्श कर आता है जो साधारणतः उसकी कल्पनाओं से परे होते हैं.
         डॉ शरद सिंह का कविता संग्रह *तीन पर्तों में देवता* कोरोना काल की त्रासदी  से गुजरते हुए बेहद अवसाद के क्षणों में गहन मानवीय संवेदना की स्याही से लिखा गया है। यह विडंबना ही है कि कोरोना के दूसरे चरण में डॉ शरद सिंह ने पहले तो  अपनी पूज्य माताजी सुप्रसिद्ध रचनाकार डॉ विद्यावती मलाविका जी को हृदयाघात से खोया और उनकी सेवा करते हुए कोरोना से संक्रमित होने के बाद मात्र तेरह दिनों के अंतराल से सखी जैसी अपनी बड़ी बहन चर्चित गज़लकार  सुश्री डॉ वर्षा सिंह जी को खो दिया। इन दोहरे  वज्राघातों ने डॉ शरद सिंह को बुरी तरह तोड़ दिया था। इस त्रासदी ने डॉ शरद सिंह के अवचेतन में ईश्वर के प्रति अनास्था का भाव पैदा कर दिया था, ऐसे में ईश्वरीय सत्ता को नकारना केवल आक्रोश ही नहीं था वरन ईश्वर के प्रति नाराजी के साथ उपालंभ का उपक्रम भी था। जीवन के ऐसे भयावह, और अनिश्चित दौर में एकाकी मन ने क्या कुछ नहीं सहा होगा? जब दूर- दूर तक कोई अपना नहीं था तब शोक के उस भीषण दौर की पीड़ा की कल्पना मात्र से ही मन द्रवित हो उठता है,तब महाशोक के अथाह सागर में भटकती हुई अपनी इस प्रिय पुत्री को माँ सरस्वती ने अपने आशीष का संबल शब्दों के रुप में दिया और  फिर लिखा गया कविता संग्रह *तीन पर्तों में देवता*, चूँकि उन दिनों कोरोना के प्रोटोकाल को ध्यान में रखते हुए पार्थिव देह को तीन पर्तों में लपेट कर अंतिम संस्कार किया जाता था, अतः डॉ शरद सिंह द्वारा  *तीन पर्तों में देवता* को  लपेटने  का अर्थ उसकी सत्ता से विमुख होने का प्रयास जैसा भी रहा होगा 
वह लिखती हैं---
हाँ मुझसे छिन गया विश्वास 
छिन गई आस्था 
टूट गई देव प्रतिमा
हो गया दीपक औंधा
बह गया तेल
बची हुई, बुझी हुई बाती को 
तीन पर्तों में लपेट दिया है मैंने
अब कोई देवता 
न करे मुझसे
प्रार्थना की उम्मीद 
नहीं दी उसने मुझे 
मेरे अपनों के जीवन की भीख 
अब उसे भी नहीं मिलेगा 
कोई भी चढ़ावा मुझसे.....

     यह ईश्वर के प्रति अनास्था की पराकाष्ठा थी, इस संग्रह की यह कविता और ऐसी अनेक कविताएँ शोक गीत की तरह मार्मिक और हृदय को झकझोर देने वालीं हैं। इस कविता में उनका दर्प नहीं व्यथित हृदय की करुणा झलकती है।
हमारी संस्कृति में 
तीन अंक का बहुत महत्व है, तीन प्रमुख देवता- ब्रह्मा- विष्णु- महेश, तीन काल- भूत काल, वर्तमान काल,भविष्यकाल, तीन गुण- सतो गुण, रजो गुण, तमो गुण, मुख्यतः तीन लोक- स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक, पाताल लोक, जीवन की तीन अवस्थाएँ- बाल अवस्था, युवा अवस्था, वृद्धावस्था,और शिव जी का तीसरा नेत्र, तीन अंक का यह महत्व डॉ शरद सिंह के लेखन में चिंतन के नए स्वरूप में शब्दाकार हुआ है,मुझे लगता है *तीन पर्तों में देवता* कविता संग्रह के सृजन काल में डॉ शरद जी ने गहन शोक के सागर को भाव, भाषा और शिल्प के तीन आचमनों में समेट लिया है.
   *तीन पर्तों में देवता* की कविताएँ छंद मुक्त कविताएँ हैं लेकिन शिल्प कसा हुआ है ये कविताएँ भावों से मुक्त नहीं हैं, मेरा मानना है कि मानसिक प्रताड़ना के बोझिल क्षणों में ये कविताएँ डॉ शरद जी के अन्तःकरण में ऐसे ही बची रही होंगी जैसे अनेक ज्वालामुखियों के बीच भी पृथ्वी बचाकर रखती है अपने भीतर शीतल और मीठा जल।
      *तीन पर्तों में देवता* कविता संग्रह पढ़ते हुए, मैं अनेक बार डॉ शरद सिंह के कल्पना लोक की विराटता का अनुभव करते हुए आश्चर्यचकित हो जाता हूँ।संग्रह की 
प्रथम कविता "सपने" की एक पंक्ति देखिए-- नहीं आते सपने रतजगे में
जैसे अमावस में नहीं आता चाँद 
जैसे काले बादल से नहीं गिरती धूप 
जैसे पहले सा नहीं जुड़ता है
टूटा हुआ काँच / 
     - इस कविता की विंबधर्मिता अद्भुत है, यह दृष्टि मन को जोड़ती है कविता से।आपकी कविताओं में अर्थबोध ऐसे छुपा होता है जैसे पुष्प के भीतर सुगंध।
        *तीन पर्तों में देवता*कविता संग्रह की भूमिका में डॉ सर हरिसिंह गौर केंद्रीय वि. वि. सागर में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी कहते हैं कि-- हमारे समय की मशहूर कथाकार शरद सिंह ने बहुत शिद्दत से अपनी बेचैनियों को  अपनी कविताओं में दर्ज किया है. कवयित्री की आंतरिक छटपटाहट, करुणा, प्रेम और कहीं आक्रोश के रुप में व्यक्त होती है।
 कविता संग्रह की एक कविता प्रेम के उस अलौकिक स्वरूप के खोज की कविता है जिसे सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता है वह लिखती हैं --
उसे नहीं मिला प्रेम 
जेबें खाली करके भी 
आखिर 
सच्चा  साबुत प्रेम 
बाजारू जो नहीं होता

   -प्रेम की ऐसी  शोधपरक  अनमोल व्याख्या डॉ शरद सिंह के आत्म सौंदर्य बोध को उजागर करती है।
       कवयित्री डॉ शरद सिंह प्रेम के मूल तत्व की उपासिका हैं, उनकी यह उपासना *तीन पर्तों में देवता* कविता संग्रह में शब्दाकार हुई है। डॉ शरद सिंह का प्रेम रुमानी नहीं है -
वह रहना चाहता है  
सोनागाछी के तंग कमरों में, 
वह प्रेम छटपटाता है 
धारावी की स्लम बस्ती में रहने के लिए, 
वह प्रेम सीरिया, तंजानिया, 
एवं बुरुडी के 
शरणार्थी शिवरों में 
जीवन का संघर्ष करते हुए 
रहना चाहता है. 

        कविता देखिए --
वह (प्रेम) बोला 
छल करते हैं लोग 
मेरा मुखौटा लगाकर 
मुझे रहने नहीं देते
मेरी मनचाही जगह 
वह देर तक बोलता रहा 
मैं सुनती रही 
फिर रोते रहे 
गले लग कर 
हम दोनों 
नींद खुलने तक 

      डॉ शरद सिंह की कविता *रजस्वला* पाठक को चिंतन का अत्यंत संवेदनशील धरातल देती है यह ऐसा विषय है जिस पर चर्चा करने से लोग बचते हैं इस सामाजिक सच्चाई से आँख चुराते हैं लेकिन डॉ शरद सिंह खुले मन से ऐसे सामाजिक विषय पर चर्चा के लिए समाज का आव्हान करती हैं ----
क्या याद है उस कवि को 
कि कितनी बार ख़रीदा था 
सेनेटरी नेपकिन
अपनी रजस्वला पत्नी के लिए 
कि उसने कितनी बार 
डिस्पोज किया था 
पत्नी का इस्तेमाल किया हुआ 
सेनेटरी नेपकिन
कवि की कविता में मौजूद
स्त्रियों- सी 
क्या पत्नी भी एक स्त्री नहीं होती ...

डॉ शरद सिंह का यह एक प्रश्न समाज के संवेदनहीन गलियारों में भटक रहा है अनंतकाल से अनुत्तरित, और लगता है यह एक और प्रश्नचिन्ह हमारे मनुष्य होने पर।
 *तीन पर्तों में देवता* कविता संग्रह डॉ शरद सिंह की व्यष्टि से लेकर समष्टि तक की यात्रा का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
*टोहता है गिद्ध* कविता युद्ध की विभीषिका से परिचित कराने में समर्थ है --
एक उजाड़ संसार का देवता है युद्ध
युद्ध एक गिद्ध है 
जो टोहता है
विभीषिका को
लाशों को
और बच रहे उन अनाथों को 
जो कहलाते हैं शरणार्थी 
युद्ध नहीं चाहती माँ, पिता, नाना- नानी, दादा- दादी 
युद्ध नहीं चाहते बच्चे 

      जीवन के सत्य की सहज सरल निर्दोष ऐसी अभिव्यक्ति डॉ  शरद सिंह की लेखनी से ही संभव हो सकती है, कविताओं में संवेदनशील कवयित्री डॉ शरद सिंह ने संवेदनाओं की एक ऐसी भाव सलिला को प्रवाहित किया है जिसमें अवगाहन कर कोई भी पाठक मनुष्यता के शाश्वत सत्य का साक्षात्कार कर सकता है। यह कविता भावांजलि है, शब्दांजलि है धीरे -धीरे मरती जा रही सभ्यता, संस्कृति एवं मनुष्यता के लिए साथ ही अपनों के लिए और अपनेपन के लिए भी। कविता संग्रह का भाव पक्ष एवं कला पक्ष अत्यंत सशक्त है, भाषा उत्कृष्ट एवं गंभीर अर्थबोध से भरी है डॉ शरद सिंह ने अपनी बात को पूरी मजबूती से कहने के लिए हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी, उर्दू एवं फ़ारसी के शब्दों को भी सहजता से कविताओं में पिरोया है, कविताओं की संप्रेषणीयता बेजोड़ है, सीधे हृदय से संवाद करने में सिद्ध हैं ये कविताएँ। 
डॉ शरद सिंह शब्दों की महत्ता को जानती हैं वह लिखती हैं--
शब्द जोड़ भी सकते हैं 
शब्द तोड़ भी सकते हैं 
शब्द प्रेम में घुलें तो अमृत 
शब्द बैर में घुलें तो विष
शब्द कभी कह देते हैं बहुत कुछ तो
कभी छुपा लेते हैं सब कुछ 

     - शब्दों की असीम सत्ता को कितनी सहजता से लिख दिया है आपने इस छोटी सी कविता में जैसे समेट लिया हो गागर में अनंत विस्तारित सागर को।
      *तीन पर्तों में देवता*  कविता संग्रह की अनेक कविताएँ जैसे- हैरत, अपराधी, छापमार उदासी, त्वचा का आवरण, निर्लज्जता, रद्दीवाला,मुखौटे, सूखे हुए फूल के साथ, सीने में समुद्र,वस्त्र के भीतर, शाप की एक और किश्त जैसी तमाम कविताएँ केवल वाणी विलास का माध्यम नहीं हैं, ये और  लगभग ऐसी सभी कविताएँ समाज के देखे- अनदेखे,भोगे-अनभोगे यथार्थ की मूक पीड़ाओं को स्वर देती हैं। इन कविताओं में समसामयिक परिवेश की पथरा गई आँखों से छलकते आँसूओं को आत्मीयता के रुमाल से पोंछने का सारस्वत् दायित्व बोध है जिसे डॉ शरद सिंह ने पूरी ईमानदारी से निभाया है. आपकी कविताएँ भावनाओं को, विचारों को, नई दिशा एवं दशा देने में सक्षम हैं, इन कविताओं के माध्यम से डॉ शरद सिंह ने जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना, संरक्षण एवं संवर्धन का अभिनव कार्य किया है. आपकी दृष्टि में मानवता स्वमेव एक धर्म है। आपका यह वैचारिक चिंतन आपकी व्यवहारिकता में भी परिलक्षित होता है।
*तीन पर्तों में देवता* कविता संग्रह में सम्मिलित 53 कविताओं में से प्रत्येक कविता एक पूरी एवं विस्तृत समीक्षा के योग्य है जिन पर फिर कभी किसी अवसर पर यथा ढंग से साहित्य जगत चर्चा करेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
         डॉ शरद सिंह का कविता संग्रह *तीन पर्तों में देवता* : आपकी यश पताका को हिंदी के साहित्याकाश में नई ऊचाईयों तक 
फहराएगा और आपको देश की कवत्रियों की अग्रिम पंक्ति में सादर स्थापित करेगा इन्हीं मंगल कामनाओं एवं अशेष बधाइयों सहित।
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 *डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया*
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, इंडियन मेडिकल एशोसिएसन  मध्य प्रदेश, सागर 
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मेरा यह काव्य संग्रह Amazon पर भी उपलब्ध है

Monday, November 18, 2024

"सांची कै रए सुनो, रामधई !" डॉ ( सुश्री) शरद सिंह के बुंदेली गजल संग्रह की समीक्षा पत्रिका समाचार पत्र में

🚩हार्दिक आभार आदरणीय भाई प्रवेन्द्र सिंह तोमर जी एवं प्रिय रेशू जैन जी #पत्रिका समाचारपत्र में मेरे बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "सांची कै रए सुनो, रामधई" की समीक्षा प्रकाशित करने हेतु 🌹🙏🌹
🚩हार्दिक आभार आदरणीया डॉ. बिन्दुमती त्रिपाठी जी मेरे बुंदेली ग़ज़ल संग्रह की इतनी सारगर्भित समीक्षा करने के लिए 🌹🙏🌹
      🌹आप दोनों द्वारा किया गया यह उत्साहवर्द्धन मेरे भावी लेखन के लिए पथ प्रदर्शक रहेगा 🚩 पुनः आभार 🙏😊🙏
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Sunday, November 17, 2024

डॉ (सुश्री) शरद सिंह के बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "सांची कै रए सुनो, रामधई" की समीक्षा "दैनिक भास्कर" में

🚩हार्दिक आभार आदरणीय राजेन्द्र दुबे जी  #दैनिकभास्कर में मेरे बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "सांची कै रए सुनो, रामधई" की समीक्षा प्रकाशित करने हेतु 🌹🙏🌹
🚩हार्दिक आभार आदरणीय Pro. Anand Prakash Tripathi जी मेरे बुंदेली ग़ज़ल संग्रह की इतनी सुंदर समीक्षा करने के लिए 🌹🙏🌹
      🌹 आप दोनों द्वारा किया गया यह उत्साहवर्द्धन मेरे भावी लेखन के लिए पथ प्रदर्शक रहेगा 🚩 पुनः आभार 🙏😊🙏
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Tuesday, October 17, 2023

डॉ (सुश्री) शरद सिंह के उपन्यास "शिखंडी" की कन्नड़ समाचार पत्र "प्रजावाणी" में समीक्षा

ब्लॉग साथियों, एक सुखद अनुभूति कि कन्नड़ के प्रतिनिधि समाचारपत्र "प्रजावाणी" में मेरे उपन्यास "शिखण्डी" की समीक्षा प्रकाशित हुई है। कन्नड़ में भी मेरे  उपन्यास को पसंद किया जाना तथा सराहा जाना मेरे लिए अत्यंत उत्साह की बात है, जिसके लिए मैं अत्यंत आभारी हूं उपन्यास के कन्नड़ अनुवादक श्री डी.एन. श्रीनाथ जी की, जिन्होंने इस उपन्यास का अनुवाद कर कन्नड़भाषी पाठकों एवं समीक्षकों तक इसे पहुंचाया।
    यहां मैं अखबार में प्रकाशित मूल समीक्षा की ईपेपर कटिंग एवं गूगल ट्रांसलेटर द्वारा किए गए ट्रांसलेशन - दोनों पोस्ट कर रही हूं। यद्यपि संभव है कि ट्रांसलेटर ने हूबहू ट्रांसलेट न कर पाया हो किंतु भावार्थ तो पढ़ा ही जा सकता है। साथ ही श्रीनाथ जी द्वारा भेजे गए अखबार की कटिंग भी पोस्ट कर रही हूं। यह 01 अक्टूबर 2023 को प्रकाशित हुआ था।
     बस, हर खुशी के मौके पर एक दुख सालता है कि काश ! आज दीदी साथ होतीं... तो यह देखकर बहुत खुशी होती... मुझे भी कहीं ज़्यादा....
https://www.prajavani.net/short-story (Prajavani kannada news paper. Sunday dated 01.10.23)

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Saturday, August 5, 2023

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका "गर्भनाल" में व्यंग्य संग्रह "पांचवा स्तम्भ" की डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा समीक्षा

प्रवासी भारतीयों की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका "गर्भनाल" के अगस्त 2023 अंक में व्यंग्यकार एवं पत्रकार जयजीत अकलेचा के व्यंग्य संग्रह "पाचवां स्तम्भ" की मेरे द्वारा की गई समीक्षा का प्रकाशन...


हार्दिक धन्यवाद सुषमा शर्मा जी🌹
हार्दिक धन्यवाद आत्माराम शर्मा जी 🙏
हार्दिक बधाई भाई Jayjeet Jyoti Aklecha


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Friday, June 23, 2023

सुश्री शरद सिंह के काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की समीक्षा - घनीभूत पीड़ा से उपजा प्रतिरोधी स्वर - वीरेंद्र प्रधान

मित्रो, मैं अभीभूत हूं संवेदनशील वरिष्ठ कवि श्री वीरेंद्र प्रधान जी द्वारा मेरे काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की बेहतरीन समीक्षा "आचरण" में पढ़कर... आप भी पढ़िए... पठन सुविधा के लिए आदरणीय वीरेंद्र प्रधान जी द्वारा प्रेषित टेक्स्ट यहां दे रही हूं.....
    मैं अत्यंत आभारी हूं आदरणीय वीरेंद्र प्रधान जी की इस महत्वपूर्ण समीक्षा के लिए 🙏
   बुक्स क्लीनिक से प्रकाशित मेरा यह का संग्रह अमेजॉन तथा किंडल पर उपलब्ध है...
Teen Parton Me Devta https://amzn.eu/d/biUeNKD

मूल्य (प्रिंट एडीशन) रु.200/-
किंडल एडीशन रु.50/-
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समीक्षा
कवयित्री सुश्री शरद सिंह के काव्य संग्रह "तीन पर्तों में देवता" की समीक्षा
घनीभूत पीड़ा से उपजा प्रतिरोधी स्वर
        -वीरेंद्र प्रधान (कवि,लघुकथाकार)
                                            
       एक के बाद एक चार उपन्यासों के माध्यम से बहुचर्चित रही सुश्री शरद सिंह देश भर में एक जाना-पहचाना नाम हैं। विभिन्न विधाओं में विभिन्न विषयों पर लेखन कर उन्होंने साहित्य में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराई है। स्त्री-विमर्श,थर्ड-जेंडर विमर्श , पर्यावरण- संरक्षण जैसे ज्वलंत विषयों पर उन्होंने चिंतन परक पुस्तकों की रचना की है।अपनी विदुषी मां श्रीमती विद्यावती मालविका एवं गजलकारा अग्रजा वर्षा सिंह से मिले साहित्यिक संस्कार उनमें भरपूर समाहित हैं। स्थानीय जनपदीय बोली बुंदेली, हिंदी और अंग्रेजी में विभिन्न अखबारों में  लिखे जा रहे उनके स्तम्भों की लोगों को सदैव तीव्र प्रतीक्षा रहती है।किसी एक पुस्तक पर प्रति मंगलवार उनकी लिखी समीक्षा लोकप्रिय हिंदी दैनिक आचरण में प्रकाशित होती है। इतिहास,विज्ञान और साहित्य की गहरी समझ के कारण उनका लेखन पठनीय और प्रभावी बन जाता है।
            बचपन से ही अध्ययनशील सुश्री शरद सिंह एक मेधावी व प्रतिभावान विद्यार्थी रही हैं। पढ़ाई-लिखाई में सदैव अव्वल रहने वाली शरद सिंह जी ने शोध कार्य को भी बड़ी गंभीरता से लेते हुए खजुराहो की मूर्ति कला पर एक उत्कृष्ट शोध‌ प्रबंध प्रस्तुत किया है।उनके स्वयं के लिखे उपन्यासों और कहानियों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोधार्थी शोध कर रहे हैं। मूलतः इतिहास व साहित्य की विद्यार्थी रही सुश्री शरद सिंह की ख्याति एक उपन्यासकार, कथाकार,समीक्षक और स्तम्भकार के रूप में अधिक है।मगर एक अत्यन्त संवेदनशील रचनाकार होने के नाते वे स्वभाव से ही कवि हैं। अपने प्रथम काव्य-संकलन "आंसू बूंद चुए" (नवगीत संग्रह) के प्रकाशन के साथ उनका कवि रूप सार्वजनिक हुआ। फिर एक खंड काव्य और एक ग़ज़ल संकलन के प्रकाशन के साथ उनका कविता के क्षेत्र में प्रवेश गहराता गया जिसे हिंदी जगत में सहर्ष और सादर स्वीकार किया गया। "तीन पर्तों में देवता" उनका बुक्स क्लीनिक पब्लिशिंग प्रकाशन से प्रकाशित नवीनतम काव्य संकलन है जिसमें तिरेपन छंदमुक्त कविताएं हैं।इस संग्रह की भूमिका कवि प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने लिखी है।अपनी भूमिका में प्रोफेसर त्रिपाठी ने उनसे बेहतर दुनिया के लिए और भी महत्वपूर्ण लिखते ‌रहने की उम्मीद की है।
        रचनाकार का अपना एक खुशहाल परिवार था जिसमें उनकी मां और वे दो‌ बहनें थीं ।काल के क्रूर हाथों ने दो साल पूर्व तेरह दिन के अंदर उनकी मां और बड़ी बहिन दोनों को उनसे छीन लिया।इस प्रकार कोई भी निकटस्थ रक्त संबंधी के अभाव में वे निपट अकेली रह गई।इस अप्रत्याशित एकांत की पीड़ा उनके मन में इतनी घर कर गई कि उससे उबरने में उन्हें महीनों लगे। उन्होंने परिवार की तुलना उस छायादार पेड़ से की है जिसके सभी पत्ते झड़ गये हैं और उसकी छाया से सभी लाभार्थी वंचित हो गये हैं।गौर करें इन पंक्तियों पर-
   "पथरा रही हैं आंखें मोची की
    सूख चली हैं नसें पत्ते की
    दोनों टूटकर भी 
    नहीं टूटे हैं
    पर क्यों?
   वे भी नहीं जानते उत्तर
   सिवा बचे रह जाने की पीड़ा के।"
   ( कविता' बचे रह जाना ' से)

हर कवि प्रेम करता है मानवीय मूल्यों से, प्रकृति से और हर हसीं चीज से ।हर कविता प्रेम कविता ही तो है जो वैयक्तिक अनुभूतियों का व्यापकीकरण कर सर्वजन हिताय लिखी जाती है। कवि के किसी अक्षर,पद या मात्रा में नफ़रत या द्वेष का कोई स्थान नहीं होता। कवयित्री ने प्रेम को एक सड़क के किनारे-किनारे चल रहे दो प्रेमियों के माध्यम से इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है-
 "चाहती हूं तुम्हारी यात्रा
  हर दफा सड़क की लम्बाई को
  जरा और बढ़ाती जाए
  और हम अपनी धुरी में घूमते हुए
   एक दूसरे के अस्तित्व को महसूस कर
   होते रहें ऊर्जावान
   अपने अलौकिक अहसास के साथ
   बहुत छोटा है प्रेम शब्द
   जिसके आगे।"

हमारी संस्कृति में आशीषों में लम्बी उम्र की दुआ की जाती है।यह जानते हुए भी कि परलोकवासी होने पर सब लौकिक इसी लोक में छूट जाता है तमाम लौकिक सुख-समृद्धि से सम्पन्न होने की कामना की जाती है। किसी त्रासदी के बाद बचे हुए लोग लम्बी उम्र के बारे में सोचकर भी सिहर उठते हैं।यह भयभीत हो जाना बड़े ही मार्मिक ढंग  से प्रस्तुत किया गया है एक कविता के इस अंश में-
    "अब कहो
     लहुलुहान आत्मा के साथ
     क्या करूंगी
     लम्बी उम्र का
     अपनी लाचारी के बीच
     यूं भी चुभती है तन्हाई
     हीरोशिमा विध्वंस के बाद के
     सन्नाटे-सी ।"

सभ्यता के विकास में स्त्री की भूमिका सदैव बराबर की रही है मगर इक्कीसवीं सदी में भी उसको समुचित स्थान नहीं मिल पाया है।विमर्श में स्त्री को शामिल तो किया जाता है मगर उसकी दशा में लगातार सुधार की आवश्यकता है। भारतीय सन्दर्भों में समाजवाद के प्रतिपादक डॉ राम मनोहर लोहिया के नर-नारी समता के सूत्र से सहमत शरद जी स्त्री के अस्तित्व व सम्मान के प्रति लगातार चिंतित रहती हैं अपने रचना कर्म में।उनकी चिंता स्पष्ट देखी जा सकती है उन्हीं की कविता के इस अंश में-
   "कवि की कविता में मौजूद
    स्त्रियों-सी
    क्या पत्नी भी एक स्त्री नहीं होती ?"

पिछले वर्षों कोरोना काल बहुत विकराल रहा जिसमें लाखों लोग असमय काल-कवलित हो गये। शुरूआत में संक्रमण जनित इस बीमारी का न तो कोई इलाज था और न ही कोई टीका-वेक्सीन। संक्रमितों को अस्पताल में दाखिल कर सिर्फ उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के प्रयास ही चिकित्सकों के हाथों में थे।सौ साल पहिले फैली एक महामारी की तरह ही इस बीमारी ने भी बहुत कहर बरपाया। परिजनों के वश में पीड़ित के उत्तम स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रार्थनाओं के अलावा कुछ न था। ऐसी अनगिनत प्रार्थनाओं के बावजूद अनेकों कोरोना प्रभावितों के देहांत से लोग बहुत आहत हुए।उनका प्रार्थनाओं और पूजा-पाठ से विश्वास डिग गया।ईश्वर की सत्ता से उनका मोहभंग हो गया।सत्ता से मोहभंग का समय रहा है कोरोना-काल।मैंने भी इस बीमारी से हुई क्षति से दुखी होकर "तुम तो निष्ठुर हो नारायण "शीर्षक कविता लिखी थी।शरद सिंह जी ने ईश्वरीय अस्तित्व के प्रति अपने असंतोष का प्रकटीकरण अपनी" तीन‌ पर्तों में देवता" कविता के माध्यम से कुछ इस प्रकार किया है-
     "आस्था की टूटी                                                              
      किरचों से
      लहुलुहान मन 
      अब नहीं बनेगा 
      याचक
      जो स्वयं भी 
      कैद हो गया था 
      मन्दिरों में
      मोटे-मोटे कपाटों के भीतर
      अब नहीं देखना है मुझे
      उसकी ओर
      हां, मैंने लपेट दिया है
      तीन पर्त्तों में
      देवता को भी।"

कल,आज और कल में समुचित समन्वय बनाकर सफर तय करना अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में बहुत सहायक होता है ।अतीत की सुखद स्मृतियां जहां किताबों में रखे सूखे फूलों की भांति सुकून देती हैं वहीं दुखद स्मृतियां हृदय में शूल की तरह चुभ और आपकर पीड़ा पहुंचाती हैं। कवयित्री अपने भाव कविता "सूखे हुए फूल के साथ" के माध्यम से कुछ इस प्रकार  प्रकट करती है-
   "कितना  मुश्किल है 
    अतीत से बचाना
    वर्तमान को
    और तय करना 
    भविष्य की यात्रा
    किसी सूखे हुए फूल के साथ।"
"कलम की नोंक पर ठहरी कविता " के माध्यम से उन्होंने कविता के समस्त गुण धर्मों की सुंदर व्याख्या की है।अवलोकन करें इस कविता के साथ तत्व को इन पंक्तियों के माध्यम से-
    "यह कविता जाति,धर्म,रंग से परे
     संवाद है 
     मनुष्य से मनुष्य का
     यह कविता दिखा सकती है 
     व्यवस्था की खामियां
     शासन-प्रशासन की लापरवाहियां।"

युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं वरन अपने आप में बहुत सी समस्याओं का जनक होता है।युद्ध की विभीषिका को बड़े सरल शब्दों में व्याख्यायित किया है कवयित्री ने अपनी एक कविता के माध्यम से।' टोहता है गिद्ध 'शीर्षक कविता में वे कहती हैं-
   "युद्ध एक आकांक्षा है
     कपट राजनीतिज्ञों के लिए
     युद्ध एक उन्माद है
     शक्ति सम्पन्नता के लिए।'

षटरस व्यंजनों से भरपूर भोजन की थाली की तरह है सुश्री शरद सिंह जी  का यह काव्य संकलन जिसमेें कुछ भी छोड़े जाने की गुंजाइश नहीं है।इस संकलन की हर कविता महत्वपूर्ण और पठनीय है। सुश्री शरद सिंह एक पूर्णकालिक रचनाकार हैं । साहित्य-जगत को उनसे अपेक्षाएं हरदम बनी रहेंगी ।वे इसी प्रकार नये-नये काव्य संकलन पाठकों को देती रहें।उन पर सिर्फ अपने सपनों को मूर्तरूप करने की जबाबदारी नहीं है वरन‌ अपनी कवि अग्रजा डॉ वर्षा सिंह के अधूरे सपने भी पूरे करना है।अशेष शुभकामनाएं।
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आचरण, 23.06.2023
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Monday, May 8, 2023

पुस्तक समीक्षा | स्त्री पीडा का मार्मिक दस्तावेजः उपन्यास शिखण्डी - टीकाराम त्रिपाठी, विवेचक | आचरण

🚩 सुखद ! अत्यंत सुखद !!! 🚩
मित्रो, जिस "आचरण" समाचार पत्र में मैं हर सप्ताह किसी न किसी रचनाकार की एक पुस्तक की समीक्षा करती हूं उसी "आचरण" में आज अपने उपन्यास "शिखंडी" की समीक्षा देखकर जो सुखद अनुभूति मुझे हुई है, उसे शब्दों में व्यक्त कर पाना कठिन है... क्योंकि यह समीक्षा श्री टीकाराम त्रिपाठी जी ने की है जो हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत पर समान अधिकार रखते हैं तथा पौराणिक ग्रंथों का भी उन्हें पर्याप्त ज्ञान है। उनके द्वारा "शिखंडी" का विवेचन किया जाना मेरे लिए किसी सम्मान या पुरस्कार से कम नहीं है🤗  
      ... तो  हार्दिक आभार सहित यहां साझा कर रही हूं श्री त्रिपाठी जी द्वारा किया गया मेरे उपन्यास का विस्तृत विवेचन (समीक्षा) 🌹🙏🌹....
पुस्तक समीक्षा
स्त्री पीडा का मार्मिक दस्तावेजः उपन्यास शिखण्डी
- टीकाराम त्रिपाठी, विवेचक

डॉ. सुश्री शरद सिंह द्वारा विरचित शिखण्डी उपन्यास ऐतिहासिक पात्र शिखण्डी पर केन्द्रित है इस उपन्यास में काशीनरेश, राजा प्रतीप के पुत्र शान्तनु और गंगा से जन्में उनके आठवें पुत्र देवव्रत भीष्म, योगिराज, राजपुरोहित, शाल्वराज, चित्रांगद, गंधर्वराज चित्रांगद, विचित्रवीर्य, धूम्रपत्र, होतृवाहन (काशी नरेश के श्वसुर) सन्यासी साधु, परशुराम, भीष्म का गुप्तचर सिद्धकूट, पांचालनरेश द्रुपद, भगवान शिव, महर्षि पराशर के सत्यवती से उत्पन्न पुत्र वेदव्यास, धृतराष्ट्र (अंबिका से उत्पन्न), पाण्डु (अम्बालिका से उत्पन्न) दासी से उत्पन्न विदुर, कुछ व्यापारी, गुप्तचर, गांधारनरेश सुबल, कृपाचार्य, शकुनि, दुर्वासा ऋषि, सूर्यदेव, द्रोणाचार्य, राजकुमार कौरव, पाण्डव, कर्ण, धृष्टद्युम्न, एकलव्य, शल्यचिकित्सक यक्ष स्थूणाकर्ण, राजा इल, बुध और उनका इला से उत्पन्न पुत्र पुरूरवा, श्रीकृष्ण, इन्द्र और चित्रसेन पुरूष पात्र है। 
 स्त्रीपात्रों में काशी की महारानी, अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका, दासी कर्कटी, गुप्तचर स्त्रियों की प्रमुख उदुम्बरा, शांतनु की पत्नी निषाद कन्या सत्यवती, प्रथम पत्नी गंगा, शिविका, शिविका की माँ गांधारी, शूरसेन की पुत्री कुन्ती (कुन्तिभोज द्वारा पालित), परा (कुन्ती की दासी, विदुर की पत्नी) द्रौपदी (कृष्णा), द्रुपद पुत्री शिखण्डिनी, सुमंत्रा दासी, दशार्णराज हिरण्यवर्मा की पुत्री हिरण्मयी, वनप्रान्तर में एकवृद्धा, उर्वशी आदि हैं। 
 उपन्यास का नायक शिखण्डी (शिखण्डिनी) है और प्रतिनायक भीष्म पितामह हैं। कथा उपजीव्य काव्य महाभारत के आदि पर्व में 26 वें अध्याय से प्रारंभ होती है जहाँ राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु का गंगा से विवाह हुआ और द्यौ नामक आठवें वसु के रूप में भीष्म का जन्म हुआ। वस्तुतः आठों वसुओं को वशिष्ठ ऋषि ने कामधेनु की पुत्री नंदिनी की चोरी के अपराध में द्यौ की पत्नी के कहने पर शाप दिया था कि अन्य सात वसु तो एक वर्ष में मनुष्य योनि से मुक्त हो जाएँगे किन्तु द्यौ नामक वसु दीर्घकाल तक पृथ्वी पर रहेगा। पिता की प्रसन्नता और भलाई के लिए स्त्री समागम का त्याग करेगा और संतान उत्पन्न नहीं करेगा। 
 इस उपन्यास की विषय वस्तु में जो प्रश्न उठाए गए है वे पौराणिक आख्यानों से वरदान और अभिशाप से संबद्ध हैं किन्तु अनेक स्त्रियां की नियोगकृत अथवा अन्य विधि से संतति प्रसव और जन्म जन्मांतरों की घटनाएँ जिनमें मृत्यु के पश्चात् पुनर्जन्म होना और पुनर्जन्म होने पर पूर्वजन्म के प्रेम और घृणा के बीज विद्यमान होना भी है। साथ ही एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारी समकालीन वैज्ञानिक प्रगति के अंतर्गत व्यक्ति के हार्मोन्स शल्यक्रिया द्वारा परिवर्तित कर लिंग परिवर्तन किया जाना संभव है क्या महाभारत काल जैसे प्रागैतिहासिक युगों में यह संभव था ?  विवेचना के विषय हैं दर्शन के तो हैं ही। कथाकार  ने प्रागैतिहासिक महाभारत कथा से विचलन या विपर्यय किया है जिसमें कि अम्बा के द्वितीय जन्म में शिविका नामकरण मुख्य है गौण परिवर्तन भी सहकारी कथाओं में हैं जो कथा को रोचक और चिंतन प्रक्रिया को सक्रिय करता है। यहाँ यह उल्लेख आवश्यक है कि वियोग से प्रसूत पुत्र क्षेत्रज और वैध पत्नी से उत्पन्न पुत्र औरस कहे जाते थे।
 रसों के परिपाक का जहाँ तक प्रश्न है तो यह तथ्य सर्वविदित है कि सम्पूर्ण कथा में करूण रस व्याप्त है। यह तथ्य वाल्मीकि की रामायण कथा की उत्पत्ति के कारण स्वरूप साम्य रखता है।  वाल्मीकि के क्रौंच युगल में से एक का बहेलिए (निषाद) द्वारा वध कर देने पर एक श्लोक कहा था और निषाद को मानव समाज में सर्वदा तिरस्कृत होने का अभिशाप दिया था। महाभारत कथा में किन्दम नामक तपस्वी मुनि जो मृग के रूप में अभिशप्त जीवन यापन कर रहे थे और किसी मृगी के साथ मैथुनरत थे और जिसे पाण्डु ने शिकार कर मार डाला था तो उस मृग रूपी मुनि ने पाण्डु को शाप दिया कि वह जब भी सहवास करेगा तो उसकी, मृत्यु हो जाएगी और उसकी पत्नी सती हो जाएगी। फिर दुर्वासा ऋषि के वरदान से कुन्ती के यहां धर्मराज से युधिष्ठिर, वायु से भीम, इन्द्र से अर्जुन और अश्विनी कुमारों से माद्री के यहाँ नकुल सहदेव क्षेत्रज पुत्रों के जन्म हुए। 
महर्षि वेदव्यास के नियोग से अंबिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और अंबिका की प्रेरणा से दासी से विदुर का जन्म हुआ। सुबल की पुत्री गांधारी से धृतराष्ट्र के विवाहोपरान्त सौ पुत्र और एक पुत्री दुःशला तथा वैश्य कन्या से विचारशील पुत्र युयुत्सु पैदा हुए। पाण्डु का विवाह यदुवंशी शूरसेन की कन्या पृथा (कुन्ती) से हुआ जिसे शूरसेन की बुआ के लड़के कुंतिभोज ने पालन किया था। दूसरा विवाह मद्र देश के राजा शल्य की पुत्री माद्री से हुआ। विदुर का विवाह राजादेवक की दासी पुत्री से हुआ। आदि पर्व के ही 27 वें अध्याय में शान्तनु को सत्यवती की प्राप्ति हुई। शान्तनु ने विवाह का प्रस्ताव रखा तो निषादराज ने शर्त रखी कि उसकी पुत्री के गर्भ से जो संतान हो वह राज्य का उत्तराधिकारी हो तदनुकूल भीषण प्रतिज्ञा करने से देवव्रत भीष्म कहलाए। सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य का जन्म हुआ। 28 वें अध्याय में यह कथा है कि चित्रांगद बड़े होने पर स्वनामधन्य गंधर्व से युद्ध में मारा गया और विचित्र वीर्य राजा बना। वंश वृद्धि हेतु सत्यवती के कहने पर भीष्म ने काशीराज की तीनों कन्याओं का अपहरण किया और काशीराज के सैनिकों और शाल्वराज को युद्ध में परास्त कर लौटे। भीष्म ने काशीराज की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा की इच्छानुसार उसे शाल्वराज के पास भेजा जिसने अम्बा को अपमानित कर तिरस्कृत कर दिया। अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से हो गया। रूग्ण हो जाने पर विचित्र वीर्य की मृत्यु हो गई। वंशवृद्धि की समस्या पुनः उपस्थित हो गई। निषादराज की कन्या सत्यवती के सौन्दर्य पर मोहित होकर ऋषि पराशर से उत्पन्न पुत्र महर्षि वेदव्यास को नियोग द्वारा संतानोत्पत्ति हेतु सत्यवती ने आमंत्रित किया। 
 इसी तरह महर्षि गौतम के पुत्र शरद्वान जो बाणों सहित जन्मे थे वीर थे और तपस्वी थे। उनकी तपस्या में विघ्न हेतु इन्द्र ने जानपदी नामक देवकन्या भेजी उसके प्रभाव से मोहित होकर अनजाने में ही शुक्रपतन हो गया जो सरकण्डे पर गिरकर दो भागों में विभाजित हो गया उससे कृप बालक और कृपी कन्या का जन्म हुआ। इसी तरह घृताची अप्सरा को गंगा नदी से सधः स्नाता देखकर महर्षि भारद्वाज का भी वीर्य स्खलित हो गया उसे द्रोण नामक यज्ञ पात्र में रखने से द्रोण नामक बालक का जन्म हुआ। भारद्वाज की मृत्यु के बाद द्रोण ने शरद्वान की पुत्री कृपी से विवाह किया जिससे अश्वत्थामा का जन्म हुआ। 
 शारीरिक हार्मोन्स परिवर्तित कर पुंल्लिंग से स्त्रीलिंग और विपर्यय करना वर्तमान विज्ञान में तो संभव है ही प्राचीन एतिहासिक कथाओं से भी यह धारणा पुष्ट होती है यद्यपि यहाँ अभिषेक, आशीर्वादादि की ही अधिसूचना है वैज्ञानिक शल्य क्रिया का उल्लेख नहीं है एक उद्धरण गोस्वामी तुलसीदास के विषय में प्रचलित है। गोस्वामी तुलसीदास भी एक सिद्ध पुरूष थे चित्रकूट जाते समय संभवतः काशी या आसपास किसी क्षेत्र के राजा द्वारा प्रार्थना करने पर एक राजकन्या को राजपुत्र के रूप में अंतरित करने का आशीर्वाद गोस्वामी जी ने अभिव्यक्त किया। दोहावली में प्रक्षिप्त दोहे इसके प्रमाणस्वरूप प्रचलित हैं। कबहुँक दर्शन संत के पारसमनी अतीत। नारि पलट सों नर भयो लेत प्रसादी सीत।। तुलसी रघुवर सेवकहिं मिटिगो कालोकाल। नारि पलट सों नर भयो ऐसे दीनदयाल।। अर्थात् जिस प्रकार पारस मणि का स्पर्श पाकर लोहा भी सोना बन जाता है इसी प्रकार संत के दर्शन और प्रसाद अर्थात् कृपा के कण प्राप्त होने पर स्त्री से पुरूष रूप में परिवर्तन संभव है। आशीर्वाद या कृपा के साथ निश्चित ही तत्कालीन विज्ञान ने इस प्रकार की रासायनिक गवेषणा कर अनुसंधान कर  लिया होगा कि हार्मोन्स परिवर्तन के द्वारा स्त्री देह को पुरूष देह में रूपान्तरण संभव था। चमत्कार की बात इसलिए कि प्रकृति द्वारा निर्मित देह को विज्ञान अपने अनुकूल रूपान्तरित कर सका। यह गोस्वामी तुलसीदास के समय अर्थात पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी की कथा है किन्तु इसके पूर्व महाभारत काल में काशीनरेश की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा के पुनर्जन्म शिविका के रूप में और फिर शिविका के आत्मदाह के उपरान्त शिखण्डिनी (कन्या) रूप में जन्म लेना और फिर राजकुमार के रूप में पालन-पोषण, राजकुमारी से विवाह और स्त्री होने की पुष्टि होने पर वन-वन भटकते हुए स्थूणाकर्ण नामक यक्ष जाति के शल्यज्ञ वैद्य के द्वारा शल्य क्रिया द्वारा पुंसत्व प्रदान किया जाना यह सिद्ध करता है कि पतंजलि, चरक, सुश्रुत, धन्वन्तरि आदि के भेषजीय, तंत्र में हार्मोन्स परिवर्तित कर पुल्लिंग से स्त्रीलिंग और स्त्रीलिंग से पुल्लिंग में मानवीय देह का रूपान्तरण संभव था। संभव है कि उनके पूर्व और कोई भी आयुर्वेद शास्त्र के ज्ञाता रहे हां जिनसे हमारा ज्ञान अभी कोसों दूर है। अभी हमारी बीसवीं शताब्दी का एक दृष्टांत संभवतः भारतवर्ष में प्रथम प्रकरण ही होगा ऐसा देखा, सुना और कहा गया है।
 भोपाल से जुलाई 2015 में प्रकाशित मासिक पत्र नारी युग के प्रथम वर्ष के प्रथम अंक में देश की पहली ट्रांसजैण्डर प्रिंसिपल मनाबी बन्दोपाध्याय की कहानी छपी है। पश्चिम बंगाल के नैहाटी कस्बे में एक मध्यमवर्गीय परिवार में दो बेटियों के बाद एक बेटे का जन्म सन् 1966 में हुआ। परिजन बेटा पाकर प्रसन्न हुए और उसका नामकरण सोमनाथ किया गया। पाँच वर्ष का होने पर उसको स्कूल में दाखिला मिल गया। अन्य लड़कों की तरह मछली पकड़ना, पेड़ पर चढ़ना, फुटबाल खेलना उसके शौक थे। किन्तु मन ही मन कुछ खटकता रहता। उसे लड़कियों के कपड़े पसंद आते वह बहनों की फ्राक पहन लेता या माँ की साड़ी लपेट लेता। बड़े होने पर उसने डांस सीखने की इच्छा जाहिर की। सबने कहा कि डान्स तो लड़कियों का शौक है तुम कुछ और सीखो परंतु वह नहीं माना। वह लड़कियों की तरह डान्स करता तो घर के लोग उसे डाँट देते। उसे समझ में नहीं आता कि वह लड़का है या लड़की ? माता पिता ने उसे मनोचिकित्सक को दिखाया किंतु कोई हल न निकला। तमाम दुविधा के बावजूद उसकी पढ़ाई जारी रही। जाधवपुर यूनिवर्सिटी से प्रथम श्रेणी में एम.ए. करने के बाद उसने कल्याणी यूनिवर्सिटी से थर्ड जेण्डर विषय पर पी-एच.डी. की। माँ बहनों के सहयोग से उसका जीवन आगे बढ़ता गया। पी-एच.डी. करने के बाद झार ग्राम कॉलेज में उसे प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। इस बीच उसके अंदर महिला बनने की इच्छा तीव्र हो गई। वह साड़ी पहनने लगा। क्लास में साड़ी पहनने से स्टाफ को बुरा लगा। उसे झूठे आरोपों मे फंसाने की कोशिश की गई। स्टाफ क्वार्टर से निकाल दिया गया। किराए के मकान में भी कई हमले हुए। अन्ततोगत्वा उसने न्याय पाने के लिए मानवाधिकार आयोग की शरण ली। उसने अबा मनाब नामक पत्रिका शुरू करके ट्रांसजेण्डर लोगों की व्यथा को सार्वजनिक करने का प्रयास किया। सन् 2003 में उसने तय कर लिया कि वह अपना लिंग परिवर्तन कराएगा। सर्जरी और हारमोन्स परिवर्तन की प्रक्रिया लम्बी चली, उसका जीवन बदल गया और अब वह सोमनाथ से मनाबी अर्थात मानवता बन गई। वह कहती है कि मेरी आत्मा स्त्री की थी और शरीर पुरूष का। सर्जरी के बाद खुद को आइने के सामने देखकर वह बहुत खुश हुई, किन्तु कॉलेज में उसकी मुश्किलें बढ़ गई। मनाबी के अनुसार कॉलेज के छात्रों ने उसे बहुत सम्मान और प्यार दिया लेकिन कुछ अध्यापकों की सोच संकुचित थी जो खुद को शिक्षित मानते हैं। 
उपन्यास शिखण्डी की चर्चा करें तो हम पाते हैं कि महाभारत का सारांश भीष्म पितामह का जन्म, अपने पिता के शारीरिक सुख के लिए ब्रह्मचर्य धारण करने की प्रतिज्ञा और उसके चलते शिखण्डी नामक चरित्र के बहाने स्त्री के करूण दारूण दुःख की कथा है। 
यजुर्वेद में एक ऋचा आती है जिससे भगवती गौरी का पूजन किया जाता है तेईसवें अध्याय की 18 वीं ऋचा है। प्राणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा। अम्बेऽम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्। इस ऋचा में अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका देवियों को अग्नि के सुभद्रिकाओं के पास सुरक्षित होने की सूचना है। यहाँ इस ऋचा के अवतरित करने का मेरा उद्देश्य केवल यह है कि महाभारत कथा परवर्ती पौराणिक युग की है और वेद प्रागैतिहासिक संहिताएँ हैं अस्तु काशी नरेश के आचार्य ने तीनों पुत्रियों के नाम वैदिक आधार पर ही निर्धारित कर अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका नामकरण किए होंगे। शास्त्रीय व्याख्या के लिए हम मूल महाभारत कथा से ईषत् प्रयत्न कर लें तो उत्तम होगा। 
 
 महाभारत सहित कुल अठारह पुराणों की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की है। यद्यपि वेदव्यास जी के प्रधान शिष्यों में से एक महर्षि जैमिनि ने भी महाभारत ग्रंथ की रचना की थी जो जैमिनीय महाभारत के नाम से प्रसिद्ध था किन्तु कालान्तर में उसका लोप हो गया वर्तमान में मात्र आश्वमेधिकपर्व ही अवशिष्ट है जो व्यासकृत अश्वमेध पर्व से आकार में बृहत् है और लगभग एक हजार श्लोक अधिक हैं। महाभारत में भी कुल अठारह पर्व हैं। इस महाकाव्य का मूल रस करूण ही है इसमें भरतवंशी ही नायक हैं और प्रतिनायक भी। स्त्री की दुर्दशा ही इस महाकाव्य के अंतर्गत करूणा का उद्रेक जागृत करती है। भरतवंशियों की मूल कथा के साथ-साथ सहकारी कथाएँ भी रस-विपर्यय करते हुए एक नई रस-निष्पत्ति और जीवन की नई परिभाषा गढ़ते हुए उसे नए सिरे से परिभाषित करती है।
 वन में भ्रमण करते हुए द्रोणाचार्य को एकलव्य नामक एक आदिवासी युवक मिला जो उनके द्वारा शिष्यत्व को नकार देने के बाद उनकी मूर्ति बनाकर धनुर्विद्या में अम्यासरत रहा। कौरव पाण्डवों के साथ-साथ एक कुत्ता भी था जिसका भौंकना एकलव्य ने अपने बाणों से बंद कर दिया था। अर्जुन अपने आपको विश्व का एकमात्र धनुर्धर मानता था। द्रोणाचार्य से यह करने पर उन्होंने एकलव्य से गुरू दक्षिणा में दाएँ हाथ का अँगूठा माँगा जो उसने सहर्ष दे दिया। अर्जुन प्रसन्न हुआ और गुरूदक्षिणा देने की बात कही तो द्रोणाचार्य ने राजा दु्रपद से अपने अपमान का प्रतिशोध लेने की बात कही।
 अम्बा नदी है। अम्बिका वन है, अम्बालिका के नाम से कोई स्थान नहीं है। अंबिका वन के विषय में कहा गया कि वह पार्वती द्वारा शापित है इसीलिए वैवस्वत वंशी राजा इल आखेट के लिए एक मृग और मृगी को लक्ष्य संधान कर रहे थे वे दोनों अंबिका वन में पहुँचे वे वास्तव में यक्ष और यक्षिणी थे और मृग-मृगी रूप में क्रीड़ारत थे। राजा इल भी उनके पीछे-पीछे अंबिका वन में प्रवेश कर गया और शाप के प्रभाव से सुदर्शना स्त्री बन गया। बुध ने इल को इला मानकर विवाह कर लिया और उससे पुरूरवा नामक पुत्र को जन्म दिया जो भरतवंशियों का पूर्वज बना। अंबिका वन के ही समीप एक प्रासाद में यक्ष ने शल्यक्रिया द्वारा इला को पुनः राजा इल पुरूष के रूप में परिवर्तित कर दिया।
 एक कथा पांचाल नरेश द्रुपद की दासी कर्कटी की भी है जिसे गंगा में एक ग्राह ने शिकार कर मरणासन्न कर दिया किसी हठयोगी ने उसके प्राण एक बालिका के शव में परकाया प्रवेश कराकर उसे नवजीवन प्रदान कर अंबिका वन के समीप स्थूणाकर्ण यक्ष को सौंप दिया।
 दो स्थानों पर भीष्म पितामह की अपराधबोध की संस्वीकृति है जो यथार्थ या यथार्थ के निकट है। द्रौपदी द्वारा महाबली कर्ण के अपमान पर कर्ण का वक्तव्य भी नेत्रोन्मीलन करता है। कौमार्य में सन्तानोत्पत्ति के सामाजिक भय थे और तत्कालीन समाज में नियोग प्रथा प्रचलित थी और इस प्रकार से जन साधारण की बात तो संभवतः हमें नहीं मिलती किन्तु राज परिवारों में अवश्य रूपेण उपलब्ध होती है।
(1) निषाद कन्या सत्यवती ने अपनी नाव में महर्षि पराशर को गंगा पार कराया था और उसने महर्षि के सम्मोहक व्यक्तित्व को देखकर सन्तानसुख की कामना की जिससे वेदव्यास का जन्म हुआ किंतु कुँवारे में पुत्र होने के कारण वह सदा ़ऋषि के आश्रम में रहा।
(2) यदुवंश के शूर सेन की पुत्री पृथा को राजा कुन्तिभोज ने पाला था इसीलिए उसका नाम कुन्ती हुआ। राज प्रासाद में ऋषि दुर्वासा के आगमन पर कुन्ती ने उनकी अच्छी सेवा सुश्रूषा की फलस्वरूप दुर्वासा ऋषि ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद में एक ऐसा मंत्र दिया कि वह उस मंत्र के उच्चारण से जिस देवता का स्मरण करेगी वह तत्क्षण प्रकट होकर उसकी मनोकामना पूर्ण करेगा। मंत्र के प्रभाव की सत्यता जाँचने के लिए उसने एक दिन सूर्यदेव का आवाहन कर लिया। तत्क्षण सूर्यदेव प्रकट हो गए। सूर्य के तेजोमय स्वरूप को देखकर वह चकित हो गई और देखती ही रही। तब सूर्य आगे बढ़कर कुंती का आलिगंन कर उसे मातृत्व प्रदान कर चले गए। कालान्तर में कुन्ती ने कवच-कुण्डलधारी सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। दासी परा ने कहा कि कौमार्य में इस बालक को जन्म होने के प्रचार-प्रसार से कुन्तिभोज राजा और यदुवंश तो आजीवन अपमानित होगा ही साथ ही अवैध सन्तान के रूप में यह बालक भी।
(3) पाण्डु शापग्रस्त थे अतः पाण्डु पत्नी कुन्ती ने दुर्वासा द्वारा दिये गये मंत्र के प्रभाव से धर्मराज से युधिष्ठिर, वायु से भीष्म, इन्द्र से अर्जुन नामक पुत्रों को जन्म दिया और पाण्डु के कहने से वही मंत्र माद्री को दिया। जिससे माद्री ने अश्विनी कुमारों से नकुल और सहदेव नामक पुत्र पैदा किए।
(4) शान्तनु के सत्यवती से उत्पन्न पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य में से चित्रांगद अपने अहंकार के चलते चित्रांगद नामक गंधर्व से एक युद्ध में मारा गया। विचित्रवीर्य के लिए भीष्म ने अम्बा अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण किया था, अम्बा के चले जाने और विचित्र वीर्य के क्षय रोग से मृत्यु हो जाने के बाद सत्यवती कुरूवंश वृद्धि के लिए िंचतित हुई। भीष्म प्रतिज्ञा के कारण भीष्म ऐसा कर नहीं सकते थे। अकस्मात् स्वप्न में सत्यवती ने एक जटाधारी पुरूष देखा। इसके पश्चात् उन्हें महर्षि पराशर से कौमार्य में उत्पन्न पुत्र व्यास का स्मरण हुआ। महर्षि व्यास को अम्बिका और अम्बालिका से नियोग से संतानोपत्ति का आदेश दिया गया। कुछ शर्तो के साथ महर्षि व्यास संतानोत्पत्ति हेतु तैयार हो गए। अम्बिका ने महर्षि व्यास के स्वरूप को देखते ही नेत्र बंद कर लिए अतः उसका पुत्र अंधा हुआ। छोटी रानी अम्बालिका महर्षि को देखकर भय से पीली पड़ गई अतः उसका पुत्र पाण्डु पीलिया रोग से ग्रस्त हो गया। दोबारा अम्बालिका को व्यास के पास भेजने का आदेश सत्यवती ने दिया तो अम्बालिका ने स्वयं न जाकर अपनी दासी को भेज दिया। दासी के गर्भ से नीतिज्ञ पुत्र विदुर का जन्म हुआ।
(5) पुत्रेष्टि यज्ञ के कुण्ड से धृष्टद्युम्न और यज्ञ वेदी से ही कृष्णा (द्रौपदी) का जन्म हुआ।
 इस महाभारत महाकाव्य पर आधृत उपन्यास  शिखण्डी में अनेक स्थलों पर सूक्तियाँ और कटूक्तियाँ दृष्टव्य हैं जिन्हें मैंने चयन किया है जो अनुच्छेदों को पठनीय और ग्राह्य बनाते हैं। 
बड़प्पन शारीरिक ऊँचाई से नहीं वरन बौद्धिक ऊँचाई से आता है। समय का राजहंस निरन्तर गतिमान रहता है। हम स्त्रियाँ काल और परिस्थिति दोनों का समुचित ध्यान रखती हैं।
 वस्तुतः राजकुमारियों के विवाह दो परिवारों अथवा दो कुलों के मध्य संबंध की स्थापना नहीं करते हैं वरन् वे दो राज्यों के मध्य सम्बन्ध निर्मित करते है। जीवन साथी पाने की ललक हो तो मन की चंचलता कुछ भी करा देती है। उन दिनों सौन्दर्य और लालित्य की सरिता मानों काशी से होकर ही बह रही थी।
 स्वागत ! कैसा स्वागत ! राजमाता ? अपहृत को तो दंडित किया जाता है या फिर दास बना लिया जाता है। और आप सुविज्ञ हैं कि दण्ड के भागी तथा दासों का कभी स्वागत नहीं किया जाता अपितु उनके प्रारब्ध पर अ्ट्टहास किया जाता है। मुझे ज्ञात नहीं था कि हस्तिनापुर में अतिथियों का आना थम चुका और इसीलिए अपहरण करके अतिथि लाए जाते हैं। यमराज भी पहले मानव के जीवनकाल के बारे में पता लगाते है। उसके बाद ही उसे लेने अपने दूत भेजते है। आपने तो न पता लगाया और न किसी और को भेजा। अपनी शक्ति अपनी क्षमताओं का दुरूपयोग करने जा पहुँचें।
 यही तो चिन्ता का विषय है कुरूराज! जिस समाज में इस प्रकार स्त्रियों को उपभोग की वस्तु समझकर अपहरण किया जाता रहेगा उस समाज का भविष्य कितना भयावह होगा।
 मैं अपने प्राण दे सकता हूँ किन्तु किसी की जूठन ग्रहण नहीं कर सकता हूँ आज के उपरान्त मैं तुम्हारा स्मरण यदि करूँगी तो एक भीरू और अन्यायी राजा के रूप में यदि स्मरण करूँगी तो एक कापुरूष के रूप में। यदि स्मरण करूँगी तो उस घृणित मनुष्य के रूप में जिसने अपनी प्रेयसी को मात्र देह के रूप में देखा उसके प्रेम और उसकी आत्मा को नहीं देखा। कर्त्तव्य और अभिलाषा पर जब प्रारब्ध प्रभावी हो जाए तो सब कुछ सुचारू नही चलता है मुनिवर।
 मुनिवर यह कैसा अन्याय है कि एक कन्या को इच्छानुरूप भविष्य चुनने का अवसर दिया जाता है। फिर उससे उसका वह अवसर ही नहीं अपितु उसकी प्रतिष्ठा भी छीन ली जाती है। अपराध करते हैं पुरूष और दण्ड भोगना पड़ता है स्त्री को।
 निःसंदेह पुरूष अत्याचार करते हैं, अन्याय करते हैं किन्तु स्त्री भी तो प्रतिकार नहीं करती है। 
माँ जब बन्धन खुलने जा रहे हों तो चिन्ता नही करनी चाहिए निरपराध स्त्री को किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुॅचाना कापुरूषां का ही तो काम है। अपराध एक ऐसा कृत्य है जो व्यक्ति को दीमक की भाँति भीतर ही भीतर खोखला करता जाता है।
 प्रत्येक प्राचीन ज्ञान को मिथक मानकर उसकी अवहेलना करने लगते हैं और अपने आधे-अधूरे ज्ञान पर इतराते रहते हैं। यह तो मनुष्य की प्रवृत्ति है हम यक्षों को यह प्रवृत्ति कैसे आ गई?
 जब धर्म पर अधर्म का ग्रहण लग जाता है तो इसी तरह के दुर्भाग्य पूर्ण परिणाम सामने आते हैं।
 अर्जुन ! प्रत्येक मनुष्य के जीवन का एक पक्ष उजला होता है तो दूसरा कालिमा युक्त इन दोनों पक्षों को इच्छा अनिच्छा से मनुष्य को जीना ही पड़ता है।
 शरदजी का यह उपन्यास संक्षिप्त महाभारत है और इस दृष्टि से उसकी भाषाशैली व्यास शैली में भी है और यथावश्यक समास शैली में भी। कथाकार द्वारा संवादों के कथोपकथन के माध्यम से जो पात्रों का चरित्र-चित्रण है वह अद्भुत है वहाँ कला और भावपक्ष दोनों समवेत दीर्घा में प्रत्ययान्वित हैं। यह भी पितृऋण से मुक्ति का, त्राण का उद्भट और अनुपम प्रयास है। महाभारत की भाँति इस उपन्यास की जितनी भी विवेचना, टीका की जाए, भाष्य किए जाएँ अपर्याप्त ही रहेंगे ऐसी मेरी मान्यता है।
(08.05.2023)
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एक आयोजन की कुछ तस्वीरें किडनी मेरे साथ उपस्थित है आदरणीय श्री टीकाराम त्रिपाठी जी....
बांए से - श्री टीकाराम त्रिपाठी, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, श्री हरगोविंद विश्व एवं श्री वीरेन्द्र प्रधान।
बांए से - डॉ.नलिन 'निर्मल', श्री टीकाराम त्रिपाठी एवं डॉ (सुश्री) शरद सिंह।

Sunday, March 26, 2023

जब लोकजीवन नाट्यशास्त्र से मिलता है तो बज उठता है रमतूला - कलासमीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

🎭 कल शाम स्थानीय रविंद्र भवन में एक बहुत रोचक नाटक मंचित किया गया... जिसकी मेरे द्वारा की गई समीक्षा आज "आचरण" समाचार पत्र में प्रकाशित हुई है। इसे पढ़कर आप नाटक की विशेषताओं के बारे में जान सकेंगे📣🌷
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🎭 नाट्य समीक्षा
*बुंदेली हास्य नाटक ‘‘ऐरी बऊ...कबे बज हे रमतूला’’ का सफल मंचन*
*जब लोकजीवन नाट्यशास्त्र से मिलता है तो बज उठता है रमतूला*

- कलासमीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

लोक ही जनमानस, जनचिंतन और जनजीवन का असली एवं मौलिक स्वरूप होता है। इस लोकजीवन में सभी नौ रस मौजूद होते हैं। कठिन श्रम करने वाला आमजन जब हास्य में अपनी कठिनाइयों का हल ढूंढता है और इसी प्रक्रिया से जन्म लेते हैं ‘‘ऐरी बऊ... कबे बज हे रमतूला’’। दरअसल रमतूला एक बुंदेली वाद्ययंत्र हैॅ जिसका सीधा संबंध शुभकार्यों से है। आज भी ग्रामीण अंचल में वैवाहिक अवसरों पर रमतूला बजवाया जाता है। इसीलिए इस वाद्य ने विवाह के संदर्भ में एक कहावत का भी रूप ले लिया है। घर में रमतूला बजना अर्थात् विवाह सम्पन्न होना। सागर नगर की अग्रणी नाट्य संस्था अन्वेषण थिएटर ग्रुप द्वारा बुंदेली हास्य नाटक ‘‘ऐरी बऊ... कबे बज हे रमतूला’’ का सफल मंचन किया गया। बुंदेली लोकनाट्य शैली स्वांग पर आधारित इस नाटक का लेखन और निर्देशन किया वरिष्ठ रंगकर्मी जगदीश शर्मा ने, जो नाट्यकला क्षेत्र ही नहीं वरन फिल्मी दुनिया में भी अपनी विशेष पहचान रखते हैं। जहां तक स्वांग का प्रश्न है तो उसका मूलस्वर हास्य और व्यंग्य है।
      इस मूलतः बुंदेली नाटक पर चर्चा करने के पूर्व जरूरी है उल्लेख करना इसके टिकट एवं ब्रोशर का। चूने या छुईमिट्टी नीला रंग मिला कर तैयार किए गए रंग से घर की बाहरी दीवार, गहरे नीले रंग का लकड़ी का पररंपरिक दरवाज़ा, दरवाज़े पर बने आले में स्वस्ति चिन्ह, चिन्ह के साथ लिखा ‘शुभ विवाह’, उसके नीचे आम के पत्तों का तोरण और दरवाज़े की बायीं ओर मंगलकलश- इस सुंदर दृश्य के साथ ठेठ बुंदेली वैवाहिक टिकट एवं ब्रोशर। लेकिन सस्पेंस यह कि ‘कबे बज हे रमतूला?’’ यानी विवाह की तैयारियां पूरी हैं लेकिन कहीं कोई मसला है जिसके कारण रमतूला नहीं बज पा रहा है। ऐसे टिकट एवं ब्रोशर को ‘‘हुकअप इंविटेशन’’ कहते हैं जो थिएटर में पहुंचने से पहले ही दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेता (हुक कर लेता) है। ऐसी गहन दृष्टि रखने वाले नाट्यदल का नाटक सफल होना ही था। नाटक में कन्हैया यानी कल्लू के रोल को कपिल नाहर ने बखूबी निभाया। वैसे सभी कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया।
     कहानी एक ऐसे बुंदेली ग्रामीण परिवार की है जहां विवाह की दृष्टि से प्रौढ़ होते युवक का कई बाधाओं के चलते विवाह नहीं हो पा रहा है, जिससे आकुल होकर वह बार-बार पूछता है कि मेरा रमतूला कब बजेगा यानी मेरा विवाह कब होगा? बाधाओं से दो-चार होते हुए इस परिवार और युवक की छटपटाहट हर पल एक हास्य पैदा करती है और साथ ही सोचने पर विवश करती है। इस नाटक का कथानक मर्मस्पर्शी है,  संदेशप्रद है तथा हास्य रस का संचार करने में भी पूर्ण सक्षम है। सभागार रह-रह कर हंसी और ठहाकों से गूंजता रहा। अभिनय, वस्त्र विन्यास, मंच सज्जा, प्रकाश प्रभाव तथा पार्श्व संगीत के साथ ही बुंदेली लोकगीतों के सटीक उपयोग ने इस नाटक को प्रभावी बनाने में अपना पूरा योगदान दिया । 
       दर्शकों से खचाखच भरा सभागार नाटक की सफलता का प्रमाण प्रस्तुत करता रहा। इस
 नाटक की रोचकता इसे बार-बार देखे जाने का आह्वान करती है। 
      इस नाटक को सफल बनाने में जिन लोगों का योगदान रहा वे थे-  *मंच पर*- संदीप दीक्षित, दीपक राय, देवेंद्र सूर्यवंशी, आयुषी चौरसिया, सुमित दुबे, अमजद खान, मनोज सोनी, अतुल श्रीवास्तव, सतीश साहू, ज्योति रैकवार, ग्राम्या चौबे, आस्था बानो, हर्षिता तिवारी, निधि चौरसिया तथा पांडे महाराज के रोल में स्वयं जगदीश शर्मा ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। वही, *मंच से परे* - मंच प्रबंधन सम्हाला डॉ. अतुल श्रीवास्तवने। गायक संजय साहू एवं मितेंद्र सिंगर, वादक गौरव तिवारी, संजय साहू, अतुल श्रीवास्तव, जगदीश शर्मा ने अपनी आवाजों से रंग भरा तो वहीं समूह गायन में सुमित दुबे, सतीश साहू, मनोज सोनी, अतुल श्रीवास्तव एवं आयुषी चौरसिया का स्वर रहा। लोकगीत पारंपरिक चौकड़िया गीत रचना सतीश साहू की, नृत्य निर्देशन आस्था बानो का, दृश्य परिकल्पना राजीव जाट, सेट निर्माण प्रेम जाट एवं देवेंद्र जाट द्वारा, प्रकाश परिकल्पना संदीप दोहरे की, वस्त्र विन्यास अतुल श्रीवास्तव का, ब्रोशर डिजाइन तरुणय सिंह, ध्वनि प्रभाव संचालन मासूम आलम का रहा तथा सहयोगी रहे रविन्द्र दुबे कक्का, अश्विनी साहू, कृष्ण भाटिया एवं अजय यादव का।
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🚩हार्दिक आभार #आचरण 🙏
🚩हार्दिक बधाई भाई Jagdeesh Sharma  ji एवं भाई Atul Shrivastava   ji🙏 
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Friday, September 2, 2022

मेरी क़िताब Climate Change : We Can Slow The Speed" की समीक्षा "अहा ज़िंदगी" में - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"अहा ! ज़िंदगी" पत्रिका के सितंबर 2022 अंक में मेरी पुस्तक "Climate Change : We Can Slow The Speed" की समीक्षा प्रकाशित हुई है जिसके लिए मैं "अहा ! ज़िंदगी" की हृदय से आभारी हूं 🙏
🌷#thankyou  #AhaZindagi 🌷
शिवना प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को आप मंगा सकते हैं Amazon से -
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Thursday, July 14, 2022

स्त्री-अस्तित्व,स्वाभिमान और गरिमा के सतत संघर्ष की अनुपम गाथा है उपन्यास - 'शिखण्डी : स्त्री देह से परे' - देवेंद्र सोनी

मित्रो, इंदौर से प्रकाशित दैनिक "सुबह सबेरे" में श्री देवेंद्र सोनी जी द्वारा मेरे उपन्यास "शिखण्डी" की  समीक्षा की गई है .....समीक्षा का टैक्ट्स साभार उनकी फेसबुक वॉल से .....👇
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स्त्री-अस्तित्व,स्वाभिमान और गरिमा के सतत संघर्ष की अनुपम गाथा है उपन्यास - 'शिखण्डी : स्त्री देह से परे'

उपन्यास - शिखण्डी : स्त्री देह से परे
लेखिका - शरद सिंह
प्रकाशक - सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली
मूल्य - 300₹
समीक्षक - देवेन्द्र सोनी ,इटारसी

    अपने उपन्यासों के लिए चर्चित देश की ख्यातिप्राप्त साहित्यकार डॉ सुश्री शरद सिंह का उपन्यास "शिखण्डी - स्त्री देह से परे" पढ़ने का अवसर मिला। अब तक पचास से अधिक प्रकाशित पुस्तकों का लेखन करने वालीं लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ शरद सिंह का यह उपन्यास जनमानस में रचे - बसे महाकाव्य 'महाभारत' के एक शक्तिपुंज पात्र 'शिखंडी' पर आधारित है जिसमें लेखिका ने अपनी गहन विचार शक्ति से प्राण फूंक कर पाठकों के मन मस्तिष्क में हमेशा के लिए जीवंत कर दिया है।
       पौराणिक कथानक पर लिखा गया यह उपन्यास स्त्री-अस्तित्व,स्वाभिमान और गरिमा को संरक्षित करने के लिए सतत संघर्ष की अनुपम गाथा है जिसे लेखिका ने अपने संवाद कौशल से साहित्य की चिरकालिक स्मरणीय कृति बना दिया है। 
   यह उपन्यास ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखे जाने के बाबजूद भी युगों - युगों तक अन्याय के विरुद्ध नारी - प्रतिशोध का वह जीवंत दस्तावेज है जो वर्तमान और भविष्य में  स्त्री-विमर्श को नए आयाम देगा तथा उत्पीड़न/शोषण का प्रतिकार कर प्रतिशोध की प्रबलता को प्रवाहित करेगा।
        स्त्री विमर्श की विख्यात लेखिका शरद सिंह के इस उपन्यास-' शिखण्डी : स्त्री देह से परे ' में हमारी इसी ललक की पिपासा को संतुष्टि और समाधान मिलता है । यहां पाठकों को 'महाभारत' के बारे में सारगर्भित जानकारी तो मिलती ही है, साथ ही आदिकाल से चले आ रहे स्त्री - उत्पीड़न और उसके प्रतिकार स्वरूप सशक्त प्रतिशोध की संकल्पित ज्वाला भी धधकती हुई दिखाई देती है जो जन्म-जन्मान्तरों की कठिन तपस्या और शिवजी के वरदान से फलीभूत होती है।
    इस कथात्मक महाकाव्य 'महाभारत' के बारे में लेखिका 'अपनी बात' में लिखती हैं - "महाभारत' में इतिहास एवं युद्ध कथाएं तो हैं ही इसके अतिरिक्त मनोविज्ञान एवं विज्ञान का चमत्कृत कर देने वाला ज्ञान मौजूद है। प्रक्षेपास्त्र,परखनली शिशु तथा शल्य चिकित्सा द्वारा लिंग परिवर्तन का विवरण भी मिलता है। इस वैज्ञानिक ज्ञान ने 'महाभारत' की महत्ता को विश्वव्यापी बना दिया है।' महाभारत' के जितने भी प्राचीनतम लेखबद्ध - स्वरूप उपलब्ध हैं, उनका अध्ययन अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी 'नासा' द्वारा भी किया गया है तथा निरंतर किया जा रहा है। यहां तक कि दुनियाभर के एनशिएंट एलियन रिसर्चर भी 'महाभारत' काल में एलियंस की उपस्थिति की संभावना को जानने के लिए 'महाभारत' ग्रंथ का अध्ययन कर रहे हैं । यह माना जाता है कि 'महाभारत' के श्लोकों में अभी भी बहुत कुछ 'कोडीफाई' है और इसे 'डिकोड' करके प्राचीन काल के सुविकसित ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान के संदर्भ में 'महाभारत' में लौकिक, अलौकिक एवं पारलौकिक ज्ञान का प्रचुर भंडार है। 'श्रीमद्भागवतगीता' जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस आदि ग्रंथ के अभिन्न अंग 'श्रीमद्भागवतगीता' में जीवन मूल्यों को समझने के लिए अकाट्य सूत्र मौजूद हैं ।आधुनिक बाजार वादी युग के मैनेजमेंट गुरु भी अपने मैनेजमेंट की सफलता के लिए 'श्रीमद्भागवतगीता' के श्लोकों का सहारा लेते हैं।"
     उपन्यास  'शिखण्डी : स्त्री देह से परे' के सारांश पर आएं तो हस्तिनापुर राज्य के महाबली भीष्म द्वारा अपने राजा विचित्रवीर्य के परिणय हेतु काशी नरेश की राजकुमारी अम्बा और उसकी दो बहन अम्बिका तथा अम्बालिका को बल पूर्वक स्वयंवर स्थल से अपह्रत कर हस्तिनापुर ले जाया जाता है । यहां राजदरबार में महाराज शाल्वराज की प्रेयसी 'अम्बा'  राजा विचित्रवीर्य की रानी बनने से साफ इंकार कर देती है जबकि उसकी दोनों बहनें अम्बिका और अम्बालिका इस हेतु अपनी सहमति दे देती हैं। 
      राजकुमारी 'अम्बा' के प्रतिकार का कारण जानकर जब 'भीष्म' उसे शाल्वराज के पास वापस भेज देते हैं तो 'कापुरुष शाल्वराज' राजकुमारी 'अम्बा' को किसी और की 'जूठन' कह अस्वीकार कर देता है। अपने इस  अपमान से आहत राजकुमारी 'अम्बा'  बिफरकर पुनः हस्तिनापुर के दरबार में लौटती हैं और भीष्म को अपनी जिंदगी बर्बाद करने का दोषी करार देते हुए कहती है - ' धिक्कार है कुरुवंशियों पर! तुम सभी स्त्री को वस्तु समझते हो। धिक्कार है, तुम्हारी ऐसी सोच पर! ऐ भीष्म, तुमने मेरा जीवन नष्ट किया! तुमने मेरे सपनों को निर्ममता पूर्वक पददलित किया, तुमने मुझे सकल विश्व के समक्ष कलंकिनी घोषित करा दिया! ऐ भीष्म!  तुमने मात्र मेरा नहीं अपितु समस्त स्त्रीजाति का अनादर किया है।' अम्बा बोले जा रही थी और उसके स्वर की भीषणता से वहां उपस्थित सभी के हृदय किसी अनिष्ट की आशंका से कम्पित हो उठे।
  ' ऐ देवव्रत भीष्म! एक भीष्म प्रतिज्ञा करके तुम भीष्म कहलाए, तो सुनो, आज मैं भी एक भीष्म प्रतिज्ञा कर रही हूं कि तुम्हारी मृत्यु का कारण मैं ही बनूंगी ! मैं अम्बा! में भीष्मा ! आज इस कुरु राजसभा में प्रतिज्ञा लेती हुई घोषणा करती हूं कि जब तक मैं तुम्हें दण्डित नहीं कर दूंगी तब तक मेरी आत्मा को मोक्ष नहीं मिलेगा !' यह गर्जना करती हुई अम्बा जो भीष्म प्रतिज्ञा कर 'भीष्मा' बन चुकी थी, राज्यसभा से इस प्रकार चलती हुई चली गई, जैसे कोई सिंहनी हिरणों के झुंड को अपनी गर्जना से प्रकंपित कर प्रस्थानित होती है।
     राज दरबार से निकल कर दृढ़-प्रतिज्ञ अम्बा अपने पिता काशी नरेश के यहां न जाकर वन-प्रांतरों में अनेक मानसिक एवं शारीरिक यातनाओं को सहते हुए कठिन तपस्या करती है तथा अपने तपोबल से भगवान शिव से महाप्रतापी भीष्म की मृत्य का कारण बनने का वरदान प्राप्त करती है किन्तु अम्बा की यह प्रतिज्ञा पुरुष देह में ही पूर्ण हो सकती थी। अतः अम्बा अगले जन्म के लिए नदी में अपनी इहलीला समाप्त कर लेती है। यही नदी बाद में अम्बा नदी के रूप में जानी गई।
        दूसरे जन्म में वह अल्पकाल के लिए शिविका के रूप में जन्म लेती है और अपनी पूर्व जन्म की स्मृति को बरकरार रखते हुए भीष्म से प्रतिशोध की कामना लिए भगवान  शिव के कहने पर अपने शरीर को अग्नि में समर्पित कर देती है। 
...फिर अपने तीसरे जन्म में भी 'अम्बा ' पांचाल नरेज राजा द्रुपद के यहां कन्या रूप में ही जन्म लेती है जिसे राजप्रासाद में बालक के रूप में पाला-पोषा जाता है किन्तु विवाहोपरांत मधुयामिनी की रात्रि को 'शिखण्डी' का भेद खुल जाता है और अचेत अवस्था में उसे शिवजी का वरदान और अपना प्रतिशोध याद आता है। तब वह गुप्त मार्ग द्वारा महल छोड़कर पुनःअपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए निकल पड़ती है, मगर यह स्त्री देह में संभव कहाँ था ? 
     शिवजी के वरदान के बावजूद सशंकित मन से वह पुनः कठिन तपस्या करती है और क्षीण अवस्था में यक्ष चिकित्सक द्वारा शल्य क्रिया के माध्यम से पुरुष देह धारण कर वापस अपने राज्य में शिखण्डी के रूप में प्रवेश कर युद्धस्थल के लिए प्रस्थित होता है। 
     अम्बा के शिखण्डी बनने तक की तीन जन्मों की इस प्रतिशोध यात्रा को लेखिका ने अपनी कल्पनाशक्ति से मानो जीवंत कर दिया है । यहां संवाद-कौशल की जितनी तारीफ की जाए कम है। शिखण्डी के रूप में सहज जिज्ञासा को शांत करते हुए डॉ. शरद सिंह  कहती हैं -
"उसका अस्तित्व कैसा था ?
वह स्त्री था, पुरुष था अथवा तृतीय लिंगी? एक व्यक्ति से जुड़े अनेक प्रश्न... क्योंकि उसका अस्तित्व सामान्य नहीं था। वह शक्तिपुंज पात्र 'महाभारत' महाकाव्य का सबसे दृढ़ निश्चयी चरित्र है, जो अपने जीवन की प्रत्येक परत के साथ न केवल चौंकाता है वरन अपनी ओर चुम्बकीय ढंग से आकर्षित भी करता है । वह पात्र है शिखण्डी जिसका अस्तित्व भ्रान्तियों के संजाल में उलझा हुआ है। वहीं वह इतना प्रभावशाली पात्र है कि महर्षि वेदव्यास ने 'महाभारत' के सबसे इस्पाती पात्र भीष्म से 'अम्बोपख्यान' कहलाया है ,जो शिखण्डी की ही कथा है, जबकि भीष्म और शिखण्डी के मध्य वैमनस्यता का नाता रहा । इस अत्यंत रोचक पात्र की जीवन गाथा अंतस को झकझोरने में सक्षम है। अतः शिखण्डी के संपूर्ण जीवन को नवीन दृष्टिकोण से जांचने ,परखने और प्रस्तुत करने की आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता।  जब शिखण्डी के जीवन की परतें खुलती हैं तो हमारे प्राचीन भारत में सुविकसित ज्ञान के उस पक्ष की भी परतें खुलकर सामने आने लगती है जहाँ शल्य चिकित्सा द्वारा लिंग परिवर्तन किए जाने के तथ्य उजागर होते हैं । इन तथ्यों का ही प्रतिफलन है यह उपन्यास-'शिखण्डी : स्त्री देह से परे'।"
   लेखिका ने इस उपन्यास में समाहित अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों में कल्पना का रंग भरते हुए उन्हें अपनी विशिष्ट शैली में रोचक बना दिया है । संवाद कौशल ने इन प्रसंगों को यादगार बना दिया है जो पाठकों के मन मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ते हुए उन्हें प्रभावित करते हैं। 
'महाभारत' के 18 दिन चले युद्ध में शिखण्डी अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने हेतु भीष्म पितामह की मृत्यु का कारक बनने के लिए अधीर नजर आता है ।
    उसे यह अवसर मिलता है जब - शिखण्डी ने अर्जुन के आगे आकर भीष्म पर बाणों की वर्षा आरंभ कर दी। उसका एक भी बाण भीष्म को आहत नहीं कर पा रहा था क्योंकि शिखण्डी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर नहीं था। भीष्म को तो किसी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के बाण ही चोट पहुंचा सकते थे जबकि शिखण्डी के सामने आते ही भीष्म ने अपना धनुष झुका दिया था। वे अंबा की स्त्री - आत्माधारी स्त्री योनि -जन्मा शिखण्डी पर शर-संधान नहीं करने हेतु विवश थे। कृष्ण ने इस उचित अवसर को पहचाना और अर्जुन को संकेत किया।अर्जुन ने शिखण्डी की ओट से भीष्म पितामह पर बाणों की वर्षा आरंभ कर दी । बाणों का प्रहार इतना तीव्र था कि अर्जुन के बाण भीष्म के कवच को भेदते हुए उसके शरीर को छलनी करने लगे। देखते ही देखते पचासों बाण भीष्म की देह के आर- पार हो गए। दम्भी भीष्म शरशैय्या पर शिथिल पड़ा था,शिखण्डी के ठीक सामने।
      लेखिका ने यहां भीष्म और शिखण्डी की मनो-वार्ता का जो वृहद संवाद लेखन किया है वह अद्भुत है। संक्षिप्त में इसे आप भी देखिये  - "शिखण्डी के नेत्रों में विजय भाव थे तो भीष्म के नेत्रों में पश्चाताप के भाव।
' अब हम दोनों मुक्त हो जाएंगे, इस जन्म- जन्मांतर के बंधन से। मात्र उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा है ,मुझे भी, तुम्हें भी!' भीष्म ने अति मद्धम स्वर में शिखंडी से कहा, जिसे मात्र शिखण्डी ने ही सुना।
'मरणासन्न को क्षमा नहीं करोगी, अंबा?' 
यह भीष्म का शिखण्डी से मानसिक वार्तालाप था ।
'तुमने भी तो नहीं किया था देवव्रत!' शिखण्डी  ने भी उसी प्रकार मानस तरंगों से प्रत्युत्तर दिया।
' मैं प्रणबद्ध था।'
'मैं प्रणयबद्ध थी।'
'मैं अनभिज्ञ था।'
  ' कोई भी कर्म करने के पूर्व तत्सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना भी तो आवश्यक होता है, देवव्रत!' तुम्हें भी हम तीनों बहनों के बारे में ज्ञात करना था। नहीं कर सकते थे तो हम तीनों की इच्छा तो पूछते। क्या तुम्हारी दृष्टि में स्त्री की इच्छा का कोई मोल नहीं था?'
'था न ! महारानी सत्यवती और उनके पिता की इच्छा पर ही तो मैंने भीष्म प्रतिज्ञा ली थी।'
..स्वयं को दोष मुक्त कराने के लिए कुतर्क मत करो ! तुम सुविज्ञ हो और सुविज्ञ थे ! ...उत्तम यही होगा कि तुम अब अपने अंतिम समय में अपने अपराध स्वीकार कर लो! यदि तुम ऐसा करोगे तो सम्भवतः मैं सूर्य के उत्तरायण होने तक तुम्हें क्षमादान दे दूं!' शिखण्डी ने कहा ।
  ' मैं यही करूंगा!' मैं क्षमा मांगूंगा... अपनी स्वयं की आत्मा से भी, मैंने उसका कहना कभी नहीं सुना ...पर अब सुनूंगा... जो भी समय शेष है ,उसमें सुनूंगा!' भीष्म के कथन में पश्चाताप का भाव था।
   इस मानसिक संवाद के मध्य पितामह भीष्म के नेत्रों से अश्रुधाराएं बह निकलीं। इन अश्रुधाराओं को सभी ने देखा, किंतु उस मानसिक संवाद को कोई नहीं सुन सका। परिणामतः सभी को यही प्रतीत हुआ कि पितामह को शारीरिक पीड़ा हो रही है। इन अश्रुओं के मर्म को यदि कोई समझ रहा पा रहा था तो वह था शिखण्डी और कृष्ण ।
  इस तरह अपने तीसरे जन्म में राजकुमारी अम्बा का प्रतिशोध एवं प्रतिज्ञा स्त्री देह से परे शिखण्डी के रूप में पूर्ण होती है। 
   लेखिका कहती हैं - वह अपने पहले जन्म में कन्या के रूप में जन्मीं और स्त्री के रूप में अपने प्रेम सम्बन्धों को जीना चाहती थी मगर ऐसा हो न सका। अपने दूसरे जन्म में वह एक सामान्य कन्या के रूप में जन्मी,किन्तु उसने अद्भुत जीवन जिया। तीसरे जन्म में भी कन्या के रूप में वह जन्मीं और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुष बनी। यही पुरुष शिखण्डी था जिसने स्त्री देह से परे रहते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की।
   जब शिखण्डी का अंत हुआ तो वह अंत नहीं आरम्भ था जो युगों-युगों तक स्त्रियों के अपने स्वाभिमान,अपने अस्तित्व और अपनी गरिमा के संघर्ष के लिए मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। इस सत्य का स्वयं समय साक्षी बना कि अम्बा, शिखण्डी के रूप में जनम्बन्धन से मुक्त हुई और रच गई एक स्त्री की देह से परे एक अदभुत देहगाथा। 
      यह उपन्यास भाषाई संहिता और संवाद कौशल के साथ ही शिखण्डी से जुड़े एक नए दृष्टिकोण को सामने रखता है । सदियों से चली आ रही मान्यता की -' शिखण्डी' थर्ड जेंडर था ! इस उपन्यास को पढ़ने के बाद टूटती दिखाई पड़ती है और यह विदित होता है कि शिखण्डी तो कभी थर्ड जेंडर था ही नहीं। वह स्त्री के रूप में जन्मा और शल्य चिकित्सा द्वारा पुरुष के रूप में परिवर्तित होकर उसने अपना प्रतिशोध लिया। इस दृष्टि से यह उपन्यास बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पुरातन ग्रंथों एवं महाकाव्यों के चरित्रों को एक नए दृष्टिकोण से देखने का आह्वान करता है। स्त्री विमर्श का एक नया आयाम रचने के लिए लेखिका को साधुवाद।

  - देवेन्द्र सोनी
सम्पादक 
युवा प्रवर्तक
इटारसी।
मो.9111460478
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Saturday, June 11, 2022

डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा संपादित "थर्ड जेंडर विमर्श" की समीक्षा "जनसत्ता" में

मेरे  द्वारा संपादित एवं सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक "थर्ड जेंडर विमर्श" की सारगर्भित समीक्षा "जनसत्ता" में ...

हार्दिक धन्यवाद #जनसत्ता 🙏
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Tuesday, March 29, 2022

अथग द्वारा मंचित 'आषाढ़ का एक दिन' की डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा "स्वदेश ज्योति" में समीक्षा

मित्रो, आज "स्वदेश ज्योति" में 'आषाढ़ का एक दिन' के अथग द्वारा नाट्यमंचन का मेरे द्वारा किया गया समीक्षात्मक समाचार...
हार्दिक धन्यवाद #स्वदेशज्योति  🌷🙏🌷 
29.03.2022
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Thursday, March 24, 2022

पियूष मिश्रा लिखित नाटक 'गगन दमामा बाज्यो' का नाट्यमंचन एवं नाट्यलेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा दैनिक भास्कर में समीक्षा

"गगन दमामा बाज्यो" पियूष मिश्रा लिखित इस नाटक का आदित्य निर्मलकर द्वारा निर्देशित तथा स्टूडियो अनश्ते एवं थर्ड आई परफॉर्म्स द्वारा मंचन की  मेरी इस समीक्षा को प्रकाशित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद #दैनिकभास्कर 🌷🙏🌷 

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#thankyouDainikBhaskar 😊
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Wednesday, February 23, 2022

शरद सिंह के उपन्यास "शिखण्डी" की समीक्षा "समकालीन भारतीय साहित्य" पत्रिका में


मित्रो, साहित्य अकादमी, दिल्ली की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' के जनवरी - फरवरी 2022 अंक में मेरे उपन्यास "शिखण्डी" की विस्तृत समीक्षा प्रकाशित हुई है जिसके लिए पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' के संपादक,  मेरे उपन्यास "शिखण्डी"  के समीक्षक आदरणीय डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी जी एवं  इस उपन्यास को प्रकाशित करने वाले सामयिक प्रकाशन के निदेशक महेश भारद्वाज जी का हार्दिक आभार एवं कोटिशः धन्यवाद 🌷💐🌷


      यह उपन्यास Amazon पर उपलब्ध है-
https://www.amazon.in/dp/B084GWRZ1M/ref=cm_sw_r_apan_glt_i_WD3T9JG3ZHN1CN087J45

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Monday, January 3, 2022

शरद सिंह के उपन्यास "शिखण्डी" की समीक्षा "आजकल" पत्रिका में

प्रिय ब्लॉग मित्रो,  मेरे उपन्यास "शिखण्डी" की समीक्षा प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार की लोकप्रिय पत्रिका "आजकल" के जनवरी 2022 अंक में प्रकाशित हुई है। 
आभारी हूं समीक्षक प्रदीप कुमार जी की🙏
हार्दिक धन्यवाद आजकल🌷
हार्दिक धन्यवाद सामयिक प्रकाशन 🌷