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Wednesday, March 21, 2018

चर्चा प्लस ... विश्व जल दिवस (22 मार्च) पर विशेष : जल रहेगा तो जीवन रहेगा - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
विश्व जल दिवस (22 मार्च) पर विशेष :
जल रहेगा तो जीवन रहेगा
- डॉ. शरद सिंह

जल ही जीवन है वर्ष 2018 के लिए जल दिवस की थीम रखी गई है -‘नेचर फॉर वाटर’’ यानी ‘‘जल के लिए प्रकृति’’। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी और प्राकृतिक तत्वों में संतुलन बना रहेगा तो जल भी बचा रहेगा। हमें याद रखना होगा कि दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर में आगामी अप्रैल माह से 4 लाख लोगों को नल बंद करने की योजना बना रहा है। और वह दिन होगा -‘जीरो डे’। कहीं हम भी इसी भविष्य की ओर तो नहीं बढ़ रहे? जो जल रहेगा तो जीवन रहेगा, वरना बिन पानी सब सून.....
विश्व जल दिवस (22 मार्च) पर विशेष : जल रहेगा तो जीवन रहेगा - डॉ. शरद सिंह - चर्चा प्लस  - Lekh for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

वर्ष 2018 के लिए जल दिवस की थीम रखी गई है -‘नेचर फॉर वाटर’’ यानी ‘‘जल के लिए प्रकृति’’। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी और प्राकृतिक तत्वों में संतुलन बना रहेगा तो जल भी बचा रहेगा। हमें याद रखना होगा कि दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर में आगामी अप्रैल माह से 4 लाख लोगों को नल बंद करने की योजना बना रहा है। और वह दिन होगा -‘जीरो डे’। मेरी पीढ़ी तक के वे लोग जिन्होंने हिन्दी माध्यम सरकारी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा पाई होगी उन्होंने ककहरा के अभ्यास में यह पाठ अवश्य पढ़ा होगा-‘घर चल, जल भर‘। हमें जल का महत्व हर कदम पर सिखाया और समझाया गया लेकिन मानो हमने अपने तमाम पाठ बहुत जल्दी भुला दिए। हमारी लापरवाहियों के कारण जल का संकट आज एक वैश्विक संकट का रूप लेता जा रहा है। इस संकट को महसूस करते ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने जल संरक्षण की ओर सारी दुनिया का ध्यान आकृष्ट करने का निश्चय किया और वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को विश्व जल संरक्षण दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। वर्ष 2017 के लिए थीम थी “अपशिष्ट जल प्रबंधन“। जिसे हम आत्मसात नहीं कर सके। सच तो यह है कि हमारी योजनाओं और उन योजनाओं के अमल होने में दो ध्रुवों जितनी दूरी होती है। केन्द्र, राज्य, निकाय आदि हर स्तर पर बड़ी-बड़ी बातें करते हुए हमने अपशिष्ट जल के प्रबंधन की योजनाओं पर हवाई मंथन किया। क्रियान्वयन के मामले में हमेशा की तरह फिसड्डी रहे। जबकि देश के लगभग हर शहर और हर गांव में पेयजल का संकट गहराता जा रहा है। किसान नहरों और बांधों से, यहां तक कि पेयजल की सप्लाई लाईनों को तोड़ कर, पंक्चर कर के पानी चुराने को विवश हैं। जो पानी पीने के लिए काम में लाया जाना चाहिए उससे खेत सिंचते हैं या फिर उसका अपव्यय कर के उसे नालियों में बहा दिया जाता है। यह सारी अव्यवस्थाएं और अपव्यय इसलिए है कि हम जल प्रबंधन की बातें करना भर जानते हैं, जल प्रबंधन करना नहीं।
हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए जल के अनेक स्रोत कुओं, बावड़ियों और तालाबों के रूप में हमारे लिए छोड़े लेकिन हम इतने लापरवाह निकले कि उन्हें ढंग से सहेज भी नहीं पा रहे हैं। देश भर में हज़ारों कुए, तालाब और बावड़ियां सूख गईं सिर्फ़ हमारी लापरवाही के कारण। आज भी अनेक कुए ऐसे हैं जो तिल-तिल कर मर रहे हैं। उनका पानी प्रदूषित हो चुका है। हम उस पानी का प्रदूषण दूर कर उसे उपयोगी बना सकें इसके बदले मानो प्रतीक्षा करते हैं कि कब वह कुआ मर जाए और उस ज़मीन पर कोई रिहाइशी बिल्डिंग या शॅापिंग काम्प्लेक्स बना सकें। दुख की बात है कि हम अपनी भावी पीढी के लिए कितने और कैसे जलस्रोत छोड़ जाएंगे, यह भी नहीं सोच रहे हैं। मुझे आज के इस हालात पर राजा मिडास की कहानी याद आती है। यूनानी राजा मिडास को धन-संपत्ति की इतनी अधिक भूख थी कि उसने देवताओं से यह वरदान मांग लिया कि वह जो भी छुए वह सोने में बदल जाए। मिडास वरदान पा कर बेहद खुश हुआ। उसका महल, उसका बिस्तर, उसकी सारी वस्तुएं उसके छूते ही सोने की बन गईं। लेकिन जल्दी ही उसे परेशानियों का सामना करना पड़ा। क्यों कि उसका भोजन-पानी भी उसके छूते ही सोने में बदल गया। यहां तक कि जब उसने अपनी बेटी को दुआ तो वह भी सोने की गुड़िया में बदल गई। तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह रो-रो कर देवताओं से माफी मांगने लगा। काल्पनिक कथाओं में देवता प्रसन्न हो कर माफ कर देते हैं लेकिन यदि हम जलस्रोतों को सुखा कर पर्यावरण से खिलवाड़ करते रहेंगे तो हम स्वयं को माफ करने के योग्य भी नहीं रहेंगे। आखिर प्रत्येक प्राणी के लिए जल का होना जरूरी है। पानी के बिना कोई भी प्राणी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता है। अब तो इस बात की भी संभावना व्यक्त की जाने लगी है कि यदि तृतीय विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी के लिए ही होगा। दरअसल, पानी किसी भी प्राणधारी की बुनियादी आवयकता होती है।
क्या कभी किसी ने सोचा था कि एक दिन देश ऐसी भी स्थिति आएगी कि पानी के लिए धारा 144 लगाई जाएगी अथवा पेयजल के स्रोतों पर बंदूक ले कर चौबीसों घंटे का पहरा बिठाया जाएगा? किसी ने नहीं सोचा। लेकिन वर्ष 2016 की गर्मियों में ऐसा ही हुआ। पिछले दशकों में पानी की किल्लत पर गंभीरता से नहीं सोचे जाने का ही यह परिणाम है कि शहर, गांव, कस्बे सभी पानी की कमी से जूझते दिखाई पड़े। देश के कई हिस्सों में पानी की समस्या अत्यंत भयावह रही। विगत वर्ष महाराष्ट्र में कृषि के लिए पानी तो दूर, पीने के पानी के लाले पड़ गए थे। जलस्रोत सूख गए थे। जो थे भी उन पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव था। सबसे शोचनीय स्थिति लातूर की थी। पीने के पानी के लिए हिंसा और मार-पीट की इतनी अधिक घटनाएं सामने आईं। कलेक्टर ने लातूर में 20 पानी की टंकियों के पास प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़ी। मध्यप्रदेश में भी पानी का भीषण संकट मुंह बाए खड़ा रहा। प्रदेश की करीब 200 तहसीलों सूखाग्रस्त और 82 नगरीय निकायों में भी गम्भीर पेयजल संकट का सामना करते रहे। मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में और भी अजीब स्थिति रही। वहां की नगर पालिका के चेयरमैन के अनुसार किसान पानी न चुरा पाएं, इसलिए नगरपालिका की ओर से लाइसेंसी हथियार शुदा 10 गार्ड तैनात किए। गर्मी का मौसम फिर दस्तक दे रहा है और यह दौर फिर आने वाला है।
इंसान जल की महत्ता को लगातार भूलता गया और उसे बर्बाद करता रहा, जिसके फलस्वरूप आज जल संकट सबके सामने है। आंकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। प्रकृति इंसान को जीवनदायी संपदा जल एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, इंसान भी इस चक्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना प्रत्येक व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है। इस चक्र के थमने का अर्थ है, जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से जितना पानी हम लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। धरातल पर तीन चौथाई पानी होने के बाद भी पीने योग्य पानी एक सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है। उस सीमित मात्रा के पानी का इंसान ने अंधाधुध दोहन किया है। पेयजल की अनुपलब्धता वाले क्षेत्रों में पीने के पानी के लिए प्रत्येक महिला को लगभग औसतन 6 कि.मी. की पदयात्रा करनी पड़ती है।
प्रत्येक क्षेत्रीय संस्कृति में प्रकृति के महत्व को जीवन से बड़ी सहजता और सुंदरता से जोड़ा गया है। बुन्देली संस्कृति में ही देखें तो हम पाएंगे कि प्रकृति के प्रत्येक तत्वों से किस प्रकार मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। मकरसंक्रांति के अवसर पर गाए जाने वाले ‘बाम्बुलिया’ नामक लोकगीतों में नर्मदा तथा अन्य नदियों से जिस प्रकार रिश्तों को जताया जाता है वह उल्लेखनीय है। नर्मदा नदी के दर्शन करने पहुंचने वाली टोली नर्मदा के पास पहुंचती है तो गा उठती है-
नरमदा मैया ऐसे तौ मिलीं रे
ऐसे तौ मिलीं के जैसे मिले मताई औ बाप रे
नरबदा मैया हो.....
नरबदा मोरी माता लगें रे
अरे, माता तौ लगें रे, तिरबेनी लगें मोरी बैन रे
नरबदा मैया हो.....
हमने अपने अतीत में प्रकृति को अपने जीवन के हर सुख-दुख से जोड़ा और उसे अपने संस्कारों को साथी बनाया। जैसे, विवाह के अवसर पर विभिन्न पूजा-संस्कारों के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है। यह जल नदी, तालाब अथवा कुए से लाया जाता है। अनेक क्षेत्रों में प्रसव के बाद प्रसवा के दूध की कुछ बूंदें कुए के जल में डाली जाती हैं जो एक जननी का दूसरी जननी के प्रति आभार प्रदर्शन और बहनापे का प्रतीक होता है। सरकारी योजनाओं से कहीं अधिक हमें जरूरत है अपने जल स्रोतों से इसी प्रकार के आत्मिक संबंधों को पुनर्जीवित करने की। जब हम प्रकृति के तत्वों को अपना सगा-संबंधी समझेंगे तभी हम उनके क्षरण को रोक सकेंगे और प्रकृतिक तत्वों के क्षरण को रोक कर जल की उपलब्धता भी बढ़ा सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जल संरक्षण के लिए जरुरत है उस जागरुकता की, जिसमें हर आयुवर्ग का व्यक्ति पानी को बचाना अपना धर्म या अपना बुनियादी कर्त्तव्य समझे।
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(दैनिक सागर दिनकर, 21.03.2018 )
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Wednesday, March 22, 2017

विश्व जल दिवस ... जल है तो कल है - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
22 मार्च : #विश्व_जल_दिवस पर विशेष लेख
"#जल_है_तो_कल_है" मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 22.03. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस
 



22 मार्च : #विश्व_जल_दिवस पर विशेष
जल है तो कल है
- डॉ. शरद सिंह 


विश्व के लोगों द्वारा हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा इस दिन को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय किया गया। जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। वर्ष 2017 के लिए थीम है “अपशिष्ट जल प्रबंधन“ ।

गर्मी का मौसम आते ही पानी की किल्लत सिर चढ़कर बोलने लगती है। जल ही तो जीवन हैं। यदि जल नही ंतो जीवन कहां? स्वतंत्र भारत में अनेक बांधों के निर्माण के बाद भी लापरवाही, अव्यवस्था और सजगता के अभाव के कारण जल-संकट निरन्तर बढ़ता गया है। जिन ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के स्रोत कम होते हैं तथा जल स्तर गिर जाता है, उन क्षेत्रों की औरतों को कई किलोमीटर पैदल चल कर अपने परिवार के लिए पीने का पानी जुटाना पड़ता है। छोटी बालिकाओं से लेकर प्रौढ़ाओं तक को पानी ढोते देखा जा सकता है। स्कूली आयु की अनेक बालिकाएं अपनी साइकिल के कैरियर तथा हैंडल पर प्लास्टिक के ‘कुप्पे’ (पानी भरने के लिए काम में लाए जाने वाले डिब्बे) की कई खेप जलास्रोत से अपने घर तक ढोती, पहुंचाती हैं। भारत में हर साल 1 लाख से भी ज्यादा लोगों की जलप्रसारित बीमारियों की वजह से मौत होती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल रोगियों में 77 फीसदी हैजा, पीलिया, दस्त, मियादी बुखार (टाइफाइड) जैसी जलप्रसारित बीमारियों से पीड़ित होते हैं। जल प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि इससे देश के 70 फीसदी घरों पर असर होता है। योग्य शौचालयों और आरोग्य व्यवस्था का अभाव जल प्रदूषण की बड़ी वजह है। साफ न किया गया गंदा पानी जल स्रोत्रों में जाकर मिलता है, जिससे बीमारियां फैलती हैं। जलप्रसारित बीमारियों में सबसे गंभीर रोग दस्त है, जिससे सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के आंकड़ों के मुताबिक हर साल भारत में दस्त की वजह से 98,000 बच्चे जान गंवाते हैं। अगर इस स्थिति में सुधार लाना है तो शहरी विकास में अपशिष्ट जल प्रशोधन को प्राथमिकता देना जरूरी है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

पूरे विश्व के लोगों द्वारा हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा इस दिन को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय किया गया। लोगों के बीच जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रुप में मनाने के लिये इस अभियान की घोषणा की गयी थी। इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और पूरे दिन के लिये अपने नल के गलत उपयोग को रोकने के द्वारा जल संरक्षण में उनकी सहायता प्राप्त करने के साथ ही प्रोत्साहित करने के लिये वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। यह अभियान यूएन अनुशंसा को लागू करने के साथ ही वैश्विक जल संरक्षण के वास्तविक क्रियाकलापों को प्रोत्साहन देने के लिये सदस्य राष्ट्र सहित संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता हैं। इस अभियान को प्रति वर्ष यूएन एजेंसी की एक इकाई के द्वारा विशेष तौर से बढ़ावा दिया जाता है जिसमें लोगों को जल मुद्दों के बारे में सुनने व समझाने के लिये प्रोत्साहित करने के साथ ही विश्व जल दिवस के लिये अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का समायोजन शामिल है। वर्ष 2017 के विश्व जल दिवस उत्सव के लिए विषय “अपशिष्ट जल“ रखा गया है।
क्या कभी किसी ने सोचा था कि एक दिन देश ऐसी भी स्थिति आएगी कि पानी के लिए धारा 144 लगाई जाएगी अथवा पेयजल के स्रोतों पर बंदूक ले कर चौबीसों घंटे का पहरा बिठाया जाएगा? किसी ने नहीं सोचा। लेकिन वर्ष 2016 की गर्मियों में ऐसा ही हुआ। पिछले दशकों में पानी की किल्लत पर गंभीरता से नहीं सोचे जाने का ही यह परिणाम है कि शहर, गांव, कस्बे सभी पानी की कमी से जूझते दिखाई पड़े। देश के कई हिस्सों में पानी की समस्या अत्यंत भयावह रही। विगत वर्ष महाराष्ट्र में कृषि के लिए पानी तो दूर, पीने के पानी के लाले पड़ गए थे। जलस्रोत सूख गए थे। जो थे भी उन पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव था। सबसे शोचनीय स्थिति लातूर की थी। पीने के पानी के लिए हिंसा और मार-पीट की इतनी अधिक घटनाएं सामने आईं। कलेक्टर ने लातूर में 20 पानी की टंकियों के पास प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़ी।
मध्यप्रदेश में भी पानी का भीषण संकट मुंह बाए खड़ा रहा। मध्यप्रदेश में 32 हजार हैंडपम्प बंद हो गए थे। 12 हजार से अधिक नल-जल योजनाएं सीधे तौर पर बंद हो गई थीं। प्रदेश की करीब 200 तहसीलों सूखाग्रस्त और 82 नगरीय निकायों में भी गम्भीर पेयजल संकट का सामना करते रहे। मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में और भी अजीब स्थिति रही। वहां की नगर पालिका के चेयरमैन के अनुसार किसान पानी न चुरा पाएं, इसलिए नगरपालिका की ओर से लाइसेंसी हथियार शुदा 10 गार्ड तैनात किए। वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में सूखे पर केंद्र से जवाब-तलब किया। स्वराज अभियान की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 9 राज्य सूखे की चपेट में हैं और केंद्र कुछ नहीं कर रहा। साथ ही कोर्ट ने मनरेगा फंड में देरी पर फटकार लगाई थी। मनरेगा पर सुप्रीम कोर्ट ने की केंद्र की खिंचाई करते हुए कहा था कि मनरेगा के तहत 150 दिन की जगह सिर्फ 25 दिन रोजगार मिल रहा है। केंद्र की वजह से राज्यों को फंड में देरी हो रही है। आदालत का कहना था कि राहत में 6 से 7 महीने की देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
हमें धरती पर स्वच्छ जल के महत्व को समझना होगा और अपनी पूरी कोशिश करनी होगी कि हम पानी की बर्बादी करने के बजाए उसे बचाएं। हमें अपने स्वच्छ जल को औद्योगिक कचरे, सीवेज़, खतरनाक रसायनों और दूसरे गंदगियों से गंदा होने और प्रदूषित होने से बचाना ही होगा। यह सच है कि पानी की कमी और जल प्रदूषण का मुख्य कारण हमेशा बढ़ती जनसंख्या और तेजी से बढ़ता औद्योगिकीकरण और शहरीकरण है। स्वच्छ जल की कमी के कारण, निकट भविष्य में लोग अपनी मूल जरुरतों को भी पूरा नहीं कर पाएंगे। हाल ही में हुए अध्ययनों के अनुसार, ऐसा पाया गया कि लगभग 25 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को साफ पानी मिल ही नहीं पाता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत की कुल 445 नदियों में से आधी नदियों का पानी पीने के योग्य नहीं है। अपशिष्ट जल को साफ करके ये सुनिश्चित किया जा सकता है कि गंदे पानी से जल स्रोत्र प्रदूषित नहीं होंगे। जल संसाधनों का प्रबंधन किसी भी देश के विकास का एक अहम संकेतक होता है। अगर इस मापदंड पर भारत खरा उतरना है तो देश को ताजा पानी पर निर्भरता घटानी होगी और अपशिष्ट जल के प्रशोधन को बढ़ावा देना होगा। भविष्य में जल की कमी की समस्या को सुलझाने के लिये जल संरक्षण ही जल बचाना है। भारत और दुनिया के दूसरे देशों में जल की भारी कमी है जिसकी वजह से आम लोगों को पीने और खाना बनाने के साथ ही रोजमर्रा के कार्यों को पूरा करने के लिये जरूरी पानी के लिये लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। जबकि दूसरी ओर, पर्याप्त जल के क्षेत्रों में अपने दैनिक जरुरतों से ज्यादा पानी लोग बर्बाद कर रहें हैं। हम सभी को जल के महत्व और भविष्य में जल की कमी से संबंधित समस्याओं को समझना ही होगा।
2011 की जनगणना के मुताबिक सिर्फ 32.7 फीसदी शहरी निवासी नाली व्यवस्था से जुड़े हैं और शहरी इलाकों में रहने वाले 12.6 फीसदी लोग खुले में शौच करते हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सभी नागरिकों के लिए योग्य शौचायल व्यवस्था करना देश के लिए अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। शहरों में अवैध इमारतें और झुग्गियों के निर्माण से ये दिक्कत और भी बढ़ गई है। इन इमारतों और झुग्गियों से निकला गंदा पानी के उन जल स्रोत्रों में जाकर मिल जाता है जहां से नगरपालिकाएं पानी की आपूर्ति करती हैं। इसलिए जरूरी है कि अपशिष्ट जल को साफ किया जाए, ताकि प्रदूषण पर काबू पाया जा सके। पानी की किल्लत दूर करने और जलप्रसारित बीमारियों पर काबू पाने के लिए अपशिष्ट जल को सही तरीके से साफ करने की जरूरत है। अपशिष्ट जल के प्रशोधन के बाद उसे शहरों में सिंचाई, हीटिंग एंड वेंटलेशन, धुलाई और शौचालयों में इस्तेमाल किया जा सकता है। कई बड़े शहरों में कैंपस, रिहायशी प्रोजेक्ट ने अपने परिसर में ही साफ किए गए पानी का पुनर्प्रयोग करना शुरू भी कर दिया है। लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में पेयजल की कमी आज भी मुंहबाए खड़ी है।
चिंता की बात यह है कि जब हम स्वच्छ पानी के संरक्षण और संवर्द्धन के प्रति जागरूक नहीं हो पाए हैं तो अपशिष्ट जल का दोहन कैसे कर सकेंगे? हमें इस सच्चाई को हमेशा याद रखना होगा कि जल है तो कल है।
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