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Thursday, August 18, 2022

समसामयिक लेख | बधाई ! बच्चे रातोंरात बड़े हो गए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | युवा प्रवर्तक

मित्रो,  दूध की कीमतें लगातार बढ़ने और रेल में 1 साल से अधिक आयु वाले बच्चे की टिकट लगने की न्यूज़ वायरल होने के डायरेक्ट इफेक्ट को आप अनुभव करें मेरे इस लेख में जिसे प्रकाशित किया है वेब मैगजीन "युवा प्रवर्तक" ने....
https://yuvapravartak.com/68277/
हार्दिक धन्यवाद #युवाप्रवर्तक 🙏

आप युवा प्रवर्तक की साइट पर जाकर इसे पढ़ सकते हैं। वैसे मित्रो आपके लिए यहां भी अपने लेख का टेक्स्ट साझा कर रही हूं...👇
समसामयिक लेख
बधाई ! बच्चे रातोंरात बड़े हो गए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     यदि मैं कहूं कि इन दिनों बच्चे रातोंरात बड़े हो रहे हैं, तो लोग समर्थन में मुंडी  हिलाएंगे और कहेंगे, "बिलकुल यह सब इंटरनेट की कृपा है।" लेकिन मैं अगर यह कहूं की बच्चे रातों-रात बड़े हो गए, तो लोग चौंकेंगे और यही कहेंगे कि 'यह कैसे संभव है? इंटरनेट से भी प्रभावित होकर बड़े होने की प्रक्रिया में समय लगता है, आप लगता है पगला गई हैं।"
      क़ायदे से तो मुझे पगला ही जाना चाहिए, बल्कि सबको पगला जाना चाहिए, यह सब देखकर लेकिन अफ़सोस  है कि अकल अभी भी साथ दे रही है और महसूस कर रही है कि रातोंरात बच्चों को कैसे बड़ा किया जा रहा है। जो विज्ञान से भी फिलहाल संभव नहीं है वह सरकारी व्यवस्थाओं के चलते संभव हो रहा है। बेशक़, सरकारी व्यवस्था चाहे तो उसके पास ऐसी जादू की छड़ी है कि वह रातों-रात बच्चों को बड़ा कर सकती है। सरकार अर्थात शासन व्यवस्था। किसी एक राज्य की सरकार नहीं, अकेली केंद्र सरकार नहीं, बल्कि कई राज्यों की सरकारें और केंद्र सरकार सब मिलकर इस जुगत में लगे हुए हैं कि एक रात में बच्चों को कैसे बड़ा कर दिया जाए और उन्होंने यह कर दिखाया है। मेरी बात पर विश्वास न हो रहा हो तो ठोस आंकड़े देखे जा सकते हैं।
       एक छोटे बच्चे को कितने वर्ष की आयु तक दूध पीना आवश्यक रहता है। इस प्रश्न का उत्तर हर माता-पिता बड़ी आसानी से दे सकता है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन कहता है कि  6 माह तक ही शिशु को मां का दूध पिलाना चाहिए और इसके बाद दो साल की उम्र तक उसे धीरे-धीरे ठोस आहार देना शुरू करना चाहिए जिसमें बाहरी दूध (गाय, भैंस, बकरी इदि का) भी शामिल है। कुछ शिशु विशेषज्ञ मानते हैं कि शिशु के एक साल के होने के बाद ही उसे गाय का दूध पिलाना चाहिए। दरअसल, दूध को संपूर्ण आहार कहा जाता है, क्योंकि इसमें लगभग वे सभी पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी होते हैं। यही कारण है कि छोटे बच्चों के लिए दूध बेहद जरूरी होता है। छोटे बच्चों का शरीर विकसित हो रहा होता है, जिसके लिए उन्हें पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है। जिन बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है, तो उनकि सामान्य शारीरिक विकास रुक जाता है और कुछ गंभीर स्थितियों में बच्चे कुपोषण का शिकार भी हो जाते हैं। इसलिए डॉक्टर बच्चों को पर्याप्त मात्रा में दूध पिलाने का सुझाव देते हैं।
     हर माता-पिता पूरी कोशिश करता है कि अपने बच्चे को दूध की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध करा सके किंतु दूध की बढ़ती हुई कीमतें माता-पिता की इच्छाओं का घर गला घोंट रही है। यह जानते हुए भी कि दूध युवाओं और वयस्कों के लिए भी आवश्यक है लेकिन महंगाई के चलते उसे गैर जरूरी श्रेणी में रखकर वयस्क समझौता कर लेते हैं और यह सोचते हैं कि उनके घर के बच्चों को दूध मिल सके यही बहुत है, वयस्क तो चाय से भी काम चला सकते हैं। जबकि आज स्थिति यह है कि चाय में भी दूध की मात्रा घटती जा रही है। अब यदि एक वर्ष में दूध की कीमत कई बार बढ़े तो एक मध्यम वर्गीय परिवार या आर्थिक स्तर से कमजोर परिवार के वयस्क न तो स्वयं दूध पी सकते हैं और न अपने बच्चों के लिए दूध का जुगाड़ कर सकते हैं। व्यक्ति जब सुबह सो कर उठता है और अखबार की खबरों के बीच दूध की बढ़ी हुई नई कीमत का पता चलता है तो उसे पहले अपने बजट याद आता है और फिर उसे लगता है कि अब का बच्चा बड़ा हो गया है, अब उसे दूध की इतनी जरूरत नहीं है, उसके दूध में कटौती की जा सकती है या फिर उसे चाय के सहारे जिंदा रखा जा सकता है। यानी रात को सोते समय तक जो बच्चा, बच्चा ही था वह सुबह उठते ही वयस्कों की श्रेणी में खड़ा मिलता है ताकि उसके द्वारा पिए जाने वाले दूध को या तो बंद कर दिया जाए या उस में कटौती कर दी जाए क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है घर के संपूर्ण बजट को संतुलित करने का।
      आंकड़ों पर जाएं तो  पीछे बहुत दूर तक लौटने की जरूरत नहीं है । 15 अगस्त 2022 को हमने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया और 16 अगस्त को दूध की बढ़ी हुई कीमत का उपहार मिल गया। देशवासियों को महंगाई का एक और झटका लगा। मदर डेयरी और अमूल दोनो ने ही दूध के दामों में 2-2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी। यह 6 महीने के अंदर ये दूध की कीमतों में लगातर दूसरी बढ़त रही। इससे पहले 6 मार्च को ही मदर डेयरी, अमूल और पराग मिल्क ने भी अपने अपने दूध उत्पादों की कीमतों को 2 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया था। यानि 6 महीने के अंदर पराग और मदर डेयरी के उत्पाद 4 रुपये प्रति लीटर महंगे हो चुके हैं। वहीं एक साल से कुछ ज्यादा वक्त यानि 13 महीने में कीमतें 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ी हैं। पिछले साल पहली जुलाई से अब तक 3 बार में 2-2 रुपये दूध महंगा हो चुका है। इस डर को देखते हुए बच्चों का एक झटके में बड़ों की श्रेणी में आ जाना स्वाभाविक है क्योंकि अब उनके माता-पिता की क्षमता से यह बाहर होता जा रहा है कि वह अपने बच्चों को दूध खरीद कर पिला सकें। 
     बच्चों को रातों-रात बड़ा करने में अगर कोई कसर बाकी थी तो वह भी एक अदद ख़बर ने पूरी कर दी । खबर वायरल हुई कि भारतीय रेलवे ने ट्रेन में यात्रा करने वाले बच्चों के लिए टिकट बुकिंग के संबंध में नियम बदल दिया है। एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अब एक से चार साल की उम्र के बच्चों को ट्रेन में सफर करने के लिए टिकट लेना होगा। जब इस ख़बर ने सबको परेशान कर दिया, तब रेलवे ने इस रिपोर्ट का खंडन किया। उसने कहा कि ट्रेन में यात्रा करने वाले बच्चों के लिए टिकट बुकिंग संबंधी नियम में कोई बदलाव नहीं किया गया है। रेल मंत्रालय ने एक बयान जारी किया कि यह समाचार सामग्री और मीडिया रिपोर्ट भ्रामक हैं। रेल मंत्रालय ने कि भारतीय रेलवे ने ट्रेन में यात्रा करने वाले बच्चों के लिए टिकटों की बुकिंग के संबंध में कोई बदलाव नहीं किया है। यात्रियों की मांग पर उन्हें टिकट खरीदने और अपने 5 साल से कम उम्र के बच्चे के लिए बर्थ बुक करने का विकल्प दिया गया है। यदि वे बच्चे के लिए अलग बर्थ नहीं चाहते हैं, तो यह सुविधा निशुल्क है, जैसे पहले हुआ करती थी। मगर सवाल उठता है कि अगर यह ख़बर भ्रामक थी तो इसे मीडिया में वायरल करने से किसका भला होने वाला था? कहीं यह "माइंड मेकअप" जैसी कोई बात तो नहीं कि निकट भविष्य में इसे लागू करने की ज़मीन तैयार की जा रही हो। यदि ऐसा होता है और इस तरह के नियम लागू किए जाते हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि अब जब बच्चे दुधमुंहे नहीं रहेंगे, 1 साल की उम्र के बाद उनका दूध पीना वैसे ही कम हो जाएगा या छूट जाएगा और वे खानपान के मामलों में बड़ों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे तो रेल विभाग यदि उनके भी टिकट के पैसे वसूलने लगे तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।
      हमें तो खुश होना चाहिए कि अब अपने बच्चों को बड़ा करने की चिंता उनके माता-पिता को नहीं करनी पड़ेगी बल्कि यह सब काम सरकार और सरकार की निगरानी में काम कर रही एजेंसियां बखूबी निभाने लगी हैं। यदि साल भर में 4 बार दूध के दाम बढ़ें और 1 साल की आयु से अधिक बच्चे के फुल टिकट लगने की संभावना बनने लगे तो यह मान लेना चाहिए कि अब बच्चे रातोंरात बड़े हो गए हैं।
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(18.08.2022)
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #yuvapravartak

#दूधकीकीमतें #रेलकिराया #लेख
#मंहगाई #मंहगाईडायन #व्यंग्य

Tuesday, June 21, 2022

विविध | 21 जून विश्व संगीत दिवस |आइए चले चौराहों पर अपने संगीत के साथ | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | युवा प्रवर्तक

आज 21 जून को योग दिवस के साथ ही विश्व संगीत दिवस भी है और इस पर है मेरा यह लेख जो "युवा प्रवर्तक" ने प्रकाशित किया है... पढ़िए इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं 👇

21 जून विश्व संगीत दिवस:
आइए चले चौराहों पर अपने संगीत के साथ

- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

जिस दिन हम विश्व योग दिवस मनाते हैं ठीक उसी दिन अर्थात् 21 जून को विश्व संगीत दिवस भी मनाया जाता है। संगीत का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। आज तो विज्ञान भी इस बात को मान चुका है कि संगीत चिकित्सा के क्षेत्र में भी कारगर है। यह मरीज को आत्मबल बढ़ाने और बीमारी से जूझने में मदद करता है। अनेक मनोवैज्ञानिक चिकित्सक मनोरोगों का ईलाज़ करने में संगीत का सहारा लेते हैं। यह अवसाद, अल्जाइमर और अनिद्रा जैसी चिकित्सा स्थितियों में मदद कर सकता है। यह हमें फिर से जीवंत बनाने और खुद के साथ-साथ हमारे आसपास के लोगों से जुड़ने में भी मदद करता है।

विश्व संगीत दिवस मनाने की शुरुआत फ्रांस से हुई। साल 1982 में पहली बार विश्व संगीत दिवस मनाया गया। उस समय के फ्रांस के तत्कालीन सांस्कृतिक मंत्री जैक लैंग ने देश के लोगों की संगीत के प्रति दीवानगी को देखते हुए संगीत दिवस मनाने की घोषणा कर दी। इस दिन को 'फेटे ला म्यूजिक' कहा गया। फ्रांस में 1982 में जब पहला संगीत दिवस मनाया गया तो इसे 32 से ज्यादा देशों का समर्थन मिला। इस दौरान कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। पूरी राज जश्न मनाया गया। उसके बाद से अब भारत समेत इटली, ग्रीस, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, पेरू, ब्राजील, इक्वाडोर, मैक्सिको, कनाडा, जापान, चीन, मलेशिया और दुनिया के तमाम देश विश्व संगीत दिवस हर साल 21 जून को मनाते हैं। वर्ल्ड म्यूजिक डे के दिन संगीत के क्षेत्र से जुड़े बड़े-बड़े गायकों और संगीतकारों को सम्मान दिया जाता है। ऐसे में दुनिया भर में जगह-जगह पर संगीत से जुड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है जिन्हें संगीतकारों और गायकों को सम्मानित किया जाता है. हर वर्ष इस दिवस की थीम तय की जाती है. इस बार की थीम है “चौराहों पर संगीत” यानी “म्यूजिक एट इंटरसेक्संश”।

शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसे संगीत पसंद ना हो. संगीत ऐसी चीज है, जो लोगों के दिल और दिमाग पर गहरा प्रभाव डालती है। इसी वजह से दुनिया भर के गायकों और संगीतकारों को म्यूजिक के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मान देने के उद्देश्य से आज (21 जून) विश्व भर में ‘वर्ल्ड म्यूजिक डे’ सेलिब्रेट किया जाता है। इस दिवस का आयोजन शांति को बढ़ावा देने और संगीत के प्रति लोगों की रुचि बढ़ाने के लिए किया जाता है, क्योंकि म्यूजिक जीवन में शांति और मन को सुख देता है। इसी वजह से ज्यादातर लोग म्यूजिक सुनना पसंद करते हैं. किसी को दुख कम करने के लिए संगीत सुनना अच्छा लगता है, तो कोई खुशी में म्यूजिक सुनने को महत्त्व देता है। 

संगीत प्राचीन काल से मनोरंजन के मुख्य स्रोतों में से एक रहा है। प्राचीन काल में राजा महाराजा संगीत सुनते थे वह संगीत सुनकर अपना मनोरंजन करते थे वही आज के इस जमाने में लोग संगीत सुनकर अपना मनोरंजन भी करते हैं और अच्छे से अपना समय बिताते हैं। पहले के समय में, जब कोई टेलीविज़न, इंटरनेट कनेक्शन, वीडियो गेम या किसी अन्य तरीके से अपने आप को मनोरंजन करने के लिए नहीं था, तो संगीत ने लोगों को बोरियत से निपटने में मदद की। इससे उन्हें एक-दूसरे से बेहतर जुड़ने में मदद मिली। लोगों ने लोकगीत गाए और अपनी धुनों पर नृत्य किया। संगीत सीधी हमारी मानसिक स्थिति पर प्रभाव डालता है। संगीत के कई रंग होते हैं जिसमें गाना, बजाना, सुनना, सुनाना, गुनगुनाना, जो हमारे मस्तिष्क को ऊर्जा देते हैं, जो मस्तिष्क पर काफी प्रभाव छोड़ते हैं और जिससे हम खुशी महसूस करते हैं।

संगीत में प्रकृति को भी प्रभावित करने की क्षमता होती है। यह माना जाता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ ऐसी राग-रागिनियां थीं जिनसे आग प्रज्ज्वलित की जा सकती थी अथवा पानी बरसाया जा सकता था। मानव पर ही नहीं पशु, पक्षियों और वनस्पतियों पर भी संगीत का गहरा प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि यदि अच्छा संगीत बजाया जाए तो पौधों की वृद्धि अपेक्षाकृत तेजी से होती है और वे स्वस्थ रहते हैं।

इस दुनिया में संगीत के अनेक प्रकार हैं। लेकिन सबसे प्रमुख और आधारभूत प्रकार हैं- क्लासिकल म्यूजिक और लाईट म्यूजिक। वैसे तो यह विशद विषय है किन्तु अत्यंत संक्षेप में इस पर चर्चा करते हुए पं. शारंगदेव द्वारा ‘‘संगीत रत्नाकर’’ लिखी गई परिभाषा का स्मरण किया जा सकता है कि ‘‘गीत, वाद्य तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते’’ अर्थात गाना, बजाना तथा नृत्य इन तीनो का सम्मिलित रूप संगीत कहलाता है।   यद्यपि पश्चिमी देशों में संगीत से आशय केवल गायन और वादन से समझा जाता है। वहां नृत्य को संगीत के अंतर्गत नहीं रखा जाता है। वैसे गायन, वादन और नृत्य को परस्पर एक-दूसरे का पूरक मानना उचित है। भले ही  परन्तु इन तीनो विधाओं का स्वतंत्र रूप से भी प्रदर्शन किया जाता है किन्तु गाते -बजाते समय भाव-प्रदर्शन के लिए थोड़ा बहुत हाथ चलाना, गाते समय मुखाकृत बनाना अर्थात शरीर की भाव - भंगिमाए आदि स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस तरह तीनों कलाओं को संगीत के अंर्तगत माना जाना गलत नहीं है।

आजकल इंसान भौतिकवाद की दौड़ में जिस प्रकार बंधी-बंधाई ज़िन्दगी जी रहा है उसमें संगीत की यह ‘‘चौराहों पर संगीत’’ थीम रखा जाना उचित है। विगत कोरोना काल ने समूचे विश्व को जिस तरह घरों में कैद कर दिया था उस दृष्टि से भी ‘‘चौराहों  पर संगीत’’ विशेष महत्व रखता है। यूं भी आजकल विश्व में जो आतंक और अपराध का वातावरण व्याप्त है उसमें भी ‘‘चौराहों  पर संगीत’’ मानवता को एकजुट होने का संदेश देता है। देखा जाए तो ऐसी थीम और ऐसे दिवसों की सारे विश्व को बहुत जरूरत है जिसमें मनुष्य अपनी मनुष्यता को बचाए रखते हुए परस्पर एक-दूसरे का सहयोगी बने और अपनी शारीरिक मानसिक सेहत का पूरा-पूरा ध्यान रख सके।
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सागर (म.प्र.)


#विश्वसंगीतदिवस 
#WorldMusicDay 
#worldmusicday2022 
#musicontheintersections 
#डॉसुश्रीशरदसिंह 
#DrMissSharadSingh

Thursday, April 30, 2020

ऋषि कपूर के निधन पर त्वरित टिप्पणी- बहुमुखी अभिनेता एवं साहसी व्यक्तित्व को विनम्र श्रद्धांजलि! - डॉ (सुश्री) शरद सिंह,

Dr. Sharad Singh
 कल इरफान खान और आज ऋषि कपूर...😢 ऋषि कपूर के निधन पर मेरी त्वरित टिप्पणी वेब मैगजीन 'युवा प्रवर्तक' ने प्रकाशित की है... लिंक है..
http://yuvapravartak.com/?p=30896

हार्दिक आभार 'युवा प्रवर्तक' 🙏

ऋषि कपूर के निधन पर त्वरित टिप्पणी-

       बहुमुखी अभिनेता एवं साहसी व्यक्तित्व को विनम्र श्रद्धांजलि!
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार

     विश्वास करना कठिन है कि हमने ऋषि कपूर को खो दिया। कल ही तो इरफान खान को अंतिम विदाई दी और आज ऋषि कपूर के जाने का समाचार.....धैर्य की परीक्षा कठिन से कठिनतर होती जा रही है।
       ऋषि कपूर एक वर्सेटाईल अभिनेता थे। कपूर खानदान की कसावट में पले-बढ़े होने के बावजूद उन्होंने जिन्दगी को अपने ढंग से जिया। ‘श्री 420’ में चाईल्ड आर्टिस्ट के रूप में रूपहले पर्दे पर पहली बार आने वाले ऋषि कपूर जब ‘बॉबी’ में ‘राजा’ के रोल में पहली बार हीरो बने तो वे सही मायने में यूथ आईकॉन बन गए। भला कौन भुला सकता है ‘अमर, अकबर, एंथोनी’ के ‘अकबर इलाहाबादी’ को या ‘कर्ज’ के ‘मोण्टी’ या ‘प्रेमरोग’ के ‘देवधर देव’ को। फिल्म ‘मंटो’ के ‘प्रोड्यूसर’ और ‘मुल्क’ के ‘मुराद अली मोहम्मद’ को भी भुलाया नहीं जा सकता है। ऋषि कपूर द्वारा अभिनीत पात्र इस तरह अमर हो गए हैं कि स्वयं ऋषि कपूर भी सदा बसे रहेंगे हमेशा अपने प्रशंसकों के दिलों में। उनके अभिनय की ही नहीं बल्कि उनकी बुद्धिजीविता का लोहा भी सभी मानते थे। ट्विटर पर उनकी राजनीतिक टिप्पणियां खलबली मचा दिया करती थीं। वे अपनी मन की कहने से कभी हिचकते नहीं थे। बॉलीवुड को विविधतापूर्ण अभिनय और राजनीतिक टिप्पणियां करने का साहस देने वाले अभिनेता ऋषि कपूर को विनम्र श्रद्धांजलि!
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सागर (मध्यप्रदेश)



Wednesday, April 22, 2020

लेख - कोरोना के इस दौर में प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना - डाॅ शरद सिंह - युवा प्रवर्तक में प्रकाशित

web magazine युवा प्रवर्तक ने मेरा लेख अपने  दिनांक 22.04. 2020 के अंक में प्रकाशित किया है। 
🚩युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
आप इस Link पर भी मेरे इस लेख को पढ़ सकते हैं ... 
http://yuvapravartak.com/?p=29967

*लेख*
*कोरोना के इस दौर में प्राणघातक हो सकता है ढीठ बनना*
*- डाॅ शरद सिंह*
         
*‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हक़ीकत में यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए।*

         कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव व सुरक्षा के लिए लॉकडाउन-टू लागू है। संक्रमित जिलों में कर्फ्यू की स्थिति बनी हुई है, लेकिन अनेक गांव, शहर, तहसीलें ऐसी हैं, जहां लॉकडाउन लागू होने के बाद भी लोगों की चहलकदमी थमी नहीं है। जब भी लाॅकडाउन में रियायात बरती जाती है कुछ लोग अपना आपा खो बैठते हैं और वहीं किराना, फल व अन्य दुकानों में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करना भूल जाते हैं। जब कि यह सभी को पता है कि कोरोना अति संक्रामक वायरस है। इसके चपेट में जो भी आएगा वह स्वयं तो मौत से टकराएगा ही, साथ ही अपने मित्र, रिश्तेदारों और परिचितों के अलावा अपना ईलाज करने वालों के प्राणों के लिए भी खतरा बन बैठेगा। लेकिन ऐसे ढीठ किस्म के लोग स्थिति की गंभीरता को गोया समझना ही नहीं चाहते हैं। गोया उन्हें दो ही बातों की प्रतीक्षा रहती है कि या तो संक्रमण लग जाए या फिर पुलिस का डंडा पड़ जाए।
            सागर नगर का ही उदाहरण लें तो यह शहर 10 अप्रैल के पहले तक कोरोना से मुक्त था लेकिन 10 अप्रैल के बाद पूरा शहर सकते में आ गया जब पहला कोरोना पाॅजिटिव पाया गया। नगर के शनिचरी क्षेत्र से पाया गया पहला कोरोना पाॅजिटिव मरीज दो दिन पहले बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया था। संदेह के आधार पर उसका जांच सैंपल लिया गया और जांच में वह पाॅजिटिव निकला। कोरोना पाॅजिटिव मिलने की पुष्टि होते ही उसके निवास क्षेत्र के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया गया। उसके परिवार के कुल पांच सदस्यों को भी क्वारंटीन किया गया। उसके आस-पड़ोस के व्यक्तियों की भी जांच की गई। मरीज की काॅन्टेक्ट हिस्ट्री भी खंगाली गई जिससे उसके ऐसे दोस्त का भी पता चला जो संक्रमित था। यह जानते हुए भी कि कोरोना संक्रमण की श्रृंखला से फैलता है, लाॅकडाउन लागू होने पर भी उन युवकों द्वारा लापरवाही बरती गई और अनेक लोगों के जान से खिलवाड़ की गई। ‘सोशल मीडिया स्कूल’ के छात्र कानून तोड़ना ‘डेयरिंग’ यानी दुस्साहस या रोमांच का काम समझते हैं जबकि हकीकत में यह सिर्फ और सिर्फ अपराध होता है। कोई भी कानून नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है और आपदा की स्थिति में यह और अधिक जरूरी हो जाता है कि कानून का गंभीरता से पालन किया जाए। सरकार जानती है कि लाॅकडाउन लागू करने से किस-किस तरह के नुकसान हो सकते हैं। मिल, कारखाने, दूकानें सभी बंद हैं। उत्पादन थम-सा गया है। बिक्री के लिए सामानों की उपलब्धता लड़खडाने लगी है। कुटीर उद्योग और लघु उद्योग पूरी तरह बैठ चुके हैं। आपदा खत्म होने के बाद उन्हें उन्हें एक तगड़े स्टार्टअप की जरूरत पड़ेगी। किसान चिंतित हैं, दूकानदार चिंतित हैं, बेघर-बेरोजगार मजदूर चिंतित हैं और इन सब के लिए चिंतित है सरकार। मगर किसी भी आपदा के लिए कभी कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती है। आपदा का मतलब ही है कि अचानक कोई बड़ा संकट आ खड़ा होना। हमारा देश समूचे विश्व की भांति आपदा के दौर से गुज़र रहा है। मगर अन्य देशों की तुलना में हमारे देश में स्थिति कई गुना बेहतर है क्योंकि यहां समय रहते आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री ने स्वयं लगातार देश की आमजनता से संवाद बनाए रखा। इस सकारात्मकता ने ही हौसला दे रखा है कोरोना वारियर्स को। फिर भी जो ढीठ किस्म के लोग इन सब बातों को अनदेखा करते रहते हैं और लाॅकडाउन के नियमों को धता बताने की ताक में रहते हैं उन्हें आपदा प्रबंधन अधिनियम के बारे में जरूर जान लेना चाहिए यानी जो बातों से नहीं मानेंगे उनके ऊपर डंडे चलाने का अधिकार रखता है प्रत्येक स्थानीय प्रशासन। जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के डंडे भी जरूरी होते हैं।  
               इस वर्ष मार्च महीने के आरम्भ में भारत सरकार ने 123 साल पुराने ब्रिटिश सरकार में बनाए गए एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 लागू किया था। इस कानून को अंग्रेजों ने फरवरी 1897 में तब के मुंबई शहर में फैल रहे प्लेग महामारी को कंट्रोल करने के लिए बनाया था। इसमें ब्रिटिश सरकार के पास शक्ति थी कि वो देश में कहीं भी ज्यादा लोगों के जुटने पर रोक लगा सकती थी। चूंकि ये कानून राज्य सरकारों को महामारी की प्रकृति को देखते हुए नए नियम बनाने की सहूलियत देता है ऐसे में ये फैसला राज्य सरकारों को लेना होता है कि वह अपने राज्य में क्या नए नियम-कायदे महामारी के प्रकोप को रोकने के लिए बनाना चाहती है। यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि यह कानून किसी भी प्रकार के आपदा के लिए है जबकि इसके साथ ही एक और कानून है जो एपिडेमिक डिजिज एक्ट 1897 कहलाता है लेकिन इन दोनों कानूनों में परस्पर थोड़ा अंतर है।
            आपदा प्रबंधन अधिनियम को दिसंबर, 2005 में लागू किया गया था। ये एक राष्ट्रीय कानून है जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकार करती है ताकि किसी आपदा से निपटने के लिए एक देशव्यापी योजना बनाई जा सके। इस एक्ट के दूसरे भाग के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के गठन का प्रवधान है. जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। इसके अलावा इसके अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं जिसका चुनाव प्रधानमंत्री के सुझाव पर होता हैं। इसके तहत केंद्र सरकार के पास अधिकार होता है कि वह दिए गए निर्देशों का पालन ना करने वाले पर कार्रवाई कर सकती है। इस कानून के तहत राज्य सरकारों को केंद्र की बनायी योजना का पालन करना होता है। इस कानून की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण आदेशों का पालन नहीं करने पर किसी भी राज्य के अधिकारी के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों के अधिकारी पर भी कार्रवाई कर सकती है। ये कानून किसी प्राकृतिक आपदा और मानव-जनित आपदा की परिस्थिति पैदा होने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
             लाॅकडाउन के नियमों का पालन करते हुए जिस संकट से बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है, उसे नियमों को तोड़ कर बढ़ावा देना स्वयं को हत्यारा बनाने के समान है। धैर्य, सुरक्षा और शांति से ही टल सकता है यह संकट। यह समझना ही होगा कि ढीठ बनना कोई बुद्धिमानी नहीं है।  
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सागर, मध्यप्रदेश