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Saturday, August 8, 2020

स्त्री-अध्ययन : एक गंभीर कार्य | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

व्याख्यान-आलेख

                   स्त्री-अध्ययन: एक गंभीर कार्य

   - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

स्त्रीविमर्श लेखिका एवं उपन्यासकार

drsharadsingh@gmail.com

मोबाईल - 09425192542



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Thursday, December 19, 2019

इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में डॉ शरद सिंह आमंत्रित

Raj Express, 19.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Dainik Bhaskar, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
"इन्दौर मध्यप्रदेश में 21- 23 दिसंबर 2019 को आयोजित होने जा रहे ‘इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल-2019’ में हिन्दी साहित्य पर चर्चा के लिए सागर नगर की वरिष्ठ लेखिका एवं ‘पिछले पन्ने की औरतें’, ‘कस्बाई सिमोन’ आदि अपने उपन्यासों के लिए देश-विदेश में चर्चित कथाकार डॉ (सुश्री) शरद सिंह को स्पीकर के रूप में आमंत्रित किया गया है। जहां वे विभिन्न सत्रों में ‘हिन्दी उपन्यास: ज़मीनी वास्तविकता के कितने क़रीब’ तथा साहित्यकार पाठक संबंधों में सूखा क्यों?’ तथा ‘हिन्दी में बेस्टसेलर मारीचिका’ जैसे विषयों पर अपने विचार साझा करेंगी। 
      उल्लेखनीय है कि डॉ शरद अब तक चंडीगढ़, अजमेर, लखनऊ आदि लिटरेचर फेस्टिवल्स सहित दिल्ली में आयोजित ‘‘साहित्य आजतक’’ लिटरेचर फेस्टिवल में बतौर स्पीकर साहित्य पर महत्वपूर्ण चर्चाएं कर चुकी हैं।
       हैलो हिन्दुस्तान द्वारा इन्दौर में आयोजित इस प्रतिष्ठित तीन दिवसीय आयोजन में हिंदी साहित्य जगत की चर्चित हस्तियों सहित रस्किन बाण्ड, नादिरा बब्बर, प्रयाग शुक्ल, लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी जैसी देश-विदेश की साहित्य और संस्कृति से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की अनेक शख्सियतें शामिल होंगी।" - साभार मीडिया, 18-19.12.2019
Aacharan, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Dainik Jagaran, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Deshbandhu, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Navdunia, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Patrika, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Rashtriya Hindi Mail, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Sagar Dinkar, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Teen Batti News.com - 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Yuva Pravartak, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Swadesh Jyoti, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
       
Dr (Miss) Sharad Singh as Speaker of Indore Literature Festival 2019

Monday, December 16, 2019

"शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" - मेरा नया उपन्यास .. मेरे उपन्यास को पढ़कर अपने मन के मिथक को तोड़ें - डॉ शरद सिंह

शिखंडी कौन था ... 
एक तीसरा लिंग या एक महिला?
Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
 
कृपया, शिखंडी के जीवन संघर्ष पर आधारित मेरे उपन्यास को पढ़कर अपने मन के मिथक को तोड़ें ...
- डॉ शरद सिंह

विश्व पुस्तक मेला 2020 में मेरा नया उपन्यास "शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" महाकाव्य चरित्र शिखंडी पर एक नए पहलू के साथ ... 
Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh

Novel - Shikhandi ... Stri Deh Se Pare
Novelist - Sharad Singh


हार्ड बाउंड और पेपरबैक एक साथ...
Publisher - Samayik Prakashan, New Delhi
3320-21 Jatwara,Netaji Subhash marg
Near Sablok Clinic, Daryaganj New Delhi 110002
E-mail: samayikprakashan@gmail.com
Website: www.samayikprakashan.com
Telephone: 011-23282733, 23270715
Telefax: 011-23270715


Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
 

"शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" - विश्व पुस्तक मेला 2020 में मेरा नया उपन्यास - डॉ शरद सिंह


Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
विश्व पुस्तक मेला 2020 में मेरा नया उपन्यास "शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" महाकाव्य चरित्र शिखंडी पर एक नए पहलू के साथ ... - डॉ शरद सिंह 
 
Novel - Shikhandi ... Stri Deh Se Pare
Novelist - Sharad Singh

Publisher - Samayik Prakashan, New Delhi
3320-21 Jatwara,Netaji Subhash marg
Near Sablok Clinic, Daryaganj New Delhi 110002
E-mail: samayikprakashan@gmail.com
Website: www.samayikprakashan.com
Telephone: 011-23282733, 23270715
Telefax: 011-23270715

Friday, December 13, 2019

डॉ शरद सिंह इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में...

बतौर स्पीकर इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में...
Dr (Miss) Sharad Singh as Speaker in Indore Literature Festival 2019
Dr (Miss) Sharad Singh as Speaker in Indore Literature Festival 2019
http://indorelitfest.com/speakers.phphttp://indorelitfest.com/speakers.php

Wednesday, October 23, 2019

"दैनिक हिन्दुस्तान" में पुस्तक "थर्ड जेंडर विमर्श" पर समीक्षात्मक टिप्पणी - डॉ. शरद सिंह

Dainik Hindustan, 20.10.2019 on Third Gender Vimarsh - Book - Dr Sharad Singh

आज "दैनिक हिन्दुस्तान" के सभी संस्करणों में मेरी पुस्तक "थर्ड जेंडर विमर्श" (सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित) पर समीक्षात्मक टिप्पणी प्रकाशित हुई है...आप भी पढ़ें... इसे भी, पुस्तक भी...
हार्दिक आभार #दैनिक_हिन्दुस्तान 🙏
हार्दिक धन्यवाद #सामयिक_प्रकाशन 🙏

Thursday, April 18, 2019

बुंदेलखंड के काव्य में समाज, राजनीति और चुनाव - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
नवभारत में मेरा लेख "बुंदेलखंड के काव्य में समाज, राजनीति और चुनाव" प्रकशित हुआ है। इसे आप भी पढ़िए ....  
हार्दिक धन्यवाद  "नवभारत " !!!


बुंदेलखंड एक ऐसा क्षेत्र है जहां देश की स्वतंत्रता के दशकों बाद भी विकास की गति कछुआचाल से चल रही है। सड़क, जल और बिजली की दृष्टि से ही नहीं अपितु शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र अभी भी आस लगाए बैठा है। अब तक जितना विकास हुआ है वह भी जनसंख्या के मुकाबले सीमित ही कहा जाएगा। विसंगतियों का नमूना तो यह है कि जहां युवा है वहां शिक्षा के केन्द्र कम हैं, जहां शिक्षा के केन्द्र हें वहां अध्यापकों की कमी है। जहां जल स्रोत नहीं हैं वहां तो सूखे का बोलबाला है ही और जहां जलस्रोत हैं वहां उचित प्रबंधन की कमी के कारण गर्मियां आते-आते सूखे का संकट गहराने लगता है। शिक्षा के अभाव के कारण अत्याधुनिक युग में भी यहां के लोग अंधविश्वास, कुरीति, परम्परागत बुराइयों के के साथ जी रहे हैं। सदियों से चली आ रही अवहेलना ने बुंदेली जनता को मानो अभाव को अपना भाग्य मानकर परिस्थितियों से समझौता करना सिखा दिया है। अभाव का यह दौर कोई आज ही नहीं उपजा है बल्कि महाकवि जगनिक काल से चला आ रहा है। 

Dr (Miss) Sharad Singh's article on Politics, Voting and Social condition in Bundelkhand published in Navbharat , बुंदेलखंड के काव्य में समाज, राजनीति और चुनाव - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित
 पृथ्वीराज चौहान एवं महोबा के राजा परमाद्रिदेव के युद्ध में बुन्देलखण्ड के किसानों की खड़ी फसल बर्बाद होती रही फिर भी युद्ध जारी रहे। जिसके बारे में महाकवि जगनिक ने गोया असंतुष्ट हो कर लिखा है कि -
ऐसो समय परौ महुबे पै, विपदा कछू कहीं न जाये।
रोबे रैयत चन्देलों की, हा, हम कौन देश भग जाये।।
कवि ईसुरी के समय भी सिथतियां बदली नहीं थीं। युद्ध भले ही कम हो गए थे परन्तु प्राकृतिक विपदा से छुटकारा नहीं मिला था क्योंकि राजकीय तौर पर जल प्रबंधन और कृषि प्रबंधन में पहले जैसी तत्परता नहीं रह गई थी-
पर गये एई साल में ओरे कऊं भौत कऊं थोरे,
कैसे जिये गरीब गुसइयां छिके अन्न के दौरे।
प्रकृतिक विपदाएं भी रूप बदल-बदल कर आतीं। कभी फसल को ‘गिरुआ रोग’ लग जाता तो कभी ओले से पकी पकाई फसल नष्ट हो जाती। ईसुरी ने अपनी फाग कविताओं में जहां प्रेम को रीतिकालीन शैली में वर्णित किया है वहीं उस अकाल की पीड़ा का भी वर्णन किया है जिसने बुन्देलखण्ड के जनजीवन को विकट रूप में प्रभावित किया था।
आसौं दे गओ काल करौटा, करौ-खाव सब खौंटा।
गोऊं पिसी खों गिरुआ लग गऔ, मऊअन लग गऔ लौंका।।
आज भी बुंदेली कृषक अज्ञान और प्राकृतिक विपदा के बीच झूलता रहता है। रही-सही कसर पूरी कर देता है जलप्रबंधन का अभाव। इस दुर्दशा का कवि संतोष सिंह बुंदेला ने मार्मिक उललेख किया है-
स्यारी में सूखा पर गऔ तो, ऊ में कछू न पाओ।
बीज साव को धरौ चुकावे, दानों लैन आओ।
बुन्देलखण्ड का विकास जितना और जिस तेजी से होना चाहिए था, भ्रष्टाचार के कारण हो नहीं सका। इस दशा पर कटाक्ष करती हुई कवि रामेश्वर प्रसाद गुप्ता की ये पंक्तियां देखें -
भूखी सब जनता मरै, नेता गोल मटोल।
चींथ चींथ के देश खों, करतई पोलम पोल।
जब समाज पर राजनीति का दबाव हो और राजनीति में स्वार्थ का बोलबाला हो तो जो दृश्य उपस्थित होता है वह कवयित्री डॉ. वर्षा सिंह  के इन दोहों में देखा जा सकता है-
कोनउ को परवा नईं, सूखी नदिया- ताल।
हो रयी कैसी दुरदसा, फैलो स्वारथ जाल।।
अपनो घर भरबे मगन, जो सक्छम कहलायं।
औरन पे लातें धरें, अपनो पेट भरायं।।
बुंदेली माटी कहे- “जो का कर रये, लाल !
उल्टे- सूधे काज कर, काय करत बेहाल ।।
वर्षा" का को से कहें, सबई इते मक्कार।
पेड़ काट, धूरा उड़ा, मिटा रये संसार ।।

राजनीति में आती जा रही गिरावट को देखते हुए कवि महेश कटारे की ये पंक्तियां सहसा याद आने लगती हैं-
अपनी तौ पांचई घी में हैं
खूब मचै कुहराम हमें का
मौका मिलौ काय खौं छोडौ
मरै आदमी आम हमें का

इन दिनों जब लोकसभा चुनाव का समय आ गया है और मतदान की तिथि करीब आती जा रही है तो ऐसे में यह बुंदेली लोकगीत बहुत मायने रखता है जिसमें उम्मींदावारों पर कटाक्ष भी है और मतदाताओं को झकझोर कर जगाने का प्रयास भी है-
वोट मांगबे आये दुआारे, फेर ने ऐहें
कभऊं ने मिलहें सांझ-सकारे, फेर ने ऐहें
जिनने मतलब राखो नईयां आगूं-पीछूं
ने चुनियो झिन ऐसे कारे, फेर ने ऐहें
बुंदेलखंड की जनता अगर लोकतंत्र की शक्ति को याद रखे और इन कविताओं में कही गई सच्चाई को ध्यान में रखे तो मतदान के द्वारा सही उम्मींदवार चुन कर अपने क्षेत्र के लिए तीव्र विकास का अधिकार पा सकती है।
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( नवभारत, 18.04.2019 )
#नवभारत #शरदसिंह #बुंदेलखंड #समस्याएं #problems #Navbharat #SharadSingh #Bundelkhand #समाज #राजनीति #चुनाव #बुंदेलखंड

Thursday, April 11, 2019

बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
आज "नवभारत" में राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस (11 अप्रैल) पर विशेष लेख "बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की " प्रकशित हुआ है। इसे आप भी पढ़िए 🙏

❤️ हार्दिक धन्यवाद #नवभारत ❤️

राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस (11 अप्रैल) पर विशेष :
   बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                     
       मातृत्व स्त्री-जीवन को ही नहीं वरन् समूचे समाज को पूर्णता प्रदान करता है। मातृत्व संतति को सुनिश्चित करता है और संतति से ही समाज की संरचना पीढ़ी-दर-पीढ़ी अगे बढ़ती है। किन्तु विडम्बना यह है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में जहां एक ओर मातृत्व का भरपूर स्वागत किया जाता है, खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं गर्भवती के उचित आहार-पोषण के प्रति लापरवाही बरती जाती है। प्रत्येक गर्भवती के आहार-पोषण की आवश्यकता अलग-अलग होती है और यह चिकित्सकीय जांच द्वारा ही पता लगाया जा सकता है। जहां तक गर्भवती की जांच का प्रश्न है तो आज भी बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचल में शिक्षा की कमी, पारम्परिक अंधविश्वासों एवं मान्यताओं के चलते गर्भवती की जांच कराने में कोताही बरती जाती है। ऐसी ही समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित मातृत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने प्रति वर्ष कस्तूरबा गांधी की जयंती पर अर्थात् 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाने की घोषणा सन् 2003 में की थी। तब से हर साल देश में राष्ट्रीय राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मातृत्व दिवस मनाया जाता है।
Dr (Miss) Sharad Singh's article on Condition of Safe Motherhood in Bundelkhand published in Navbharat , बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित
        बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी शिक्षा की कमी और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता के प्रति लापरवाही को बोलबाला है। यद्यपि प्रदेश यारकार की ओर से समय-समय पर जननी सुरक्षा योजना जैसी योजनाएं लागू की गईं और इन योजनाओं के बारे में ग्रामीणजन को जानकारी देने का अभियान भी चलाया गया। फिर भी अनेक परिवार ऐसे हैं जिनकी रूचि इस बात पर टिकी रहती है कि गर्भस्थ शिशु लड़का है या लड़की? सरकारी पाबंदी के कारण अतः ऐसे लोगों की रुचि जननी को सरकार की ओर से मिलने वाली राशि में सिमट कर रह जाती है। भले ही उचित पोषण के अभाव में मां और शिशु दोनों की जान ख़तरे में रहती है। इसी मसले का दूसरा पक्ष यह भी है कि स्वयं गर्भवती महिलाओं को पता नहीं होता है कि अपने पोषण जरूरतों की पूर्ति तथा भ्रूण के विकास के लिए उनके शरीर को अतिरिक्त आयरन और फोलिक एसिड की आवश्यकता होती है। प्राप्त सरकारी आंकड़ों के अनुसार सन् 2018 में किए गए एक सर्वे में बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में लगभग 46.8 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी पाई गई थी। इन हालातों के चलते बुंदेलखंड के जिलों में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का प्रतिशत सबसे अधिक पाया गया है। प्रसवपूर्व चिकित्सकीय जांच को लेकर इन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जागरूकता की कमी है।
स्वास्थ्य विभाग ने सन् 2012 में मातृत्व एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए मदर एंड चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम नामक एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की थी। इसके तहत गर्भवती माताओं व उनके नवजात शिशु का पंजीकरण किया जाता है, ताकि उन्हें लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवाएं दी जा सकें । आशा या एएनएम द्वारा जमीनी स्तर पर गर्भवती महिला एवं उनके शिशु की हेल्थ हिस्ट्री दर्ज की जाती है, जो स्वास्थ्य सुविधाओं को न सिर्फ बेहतर बनाने में बल्कि, लाभार्थी को भी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रति जागरूक करने में मदद करती है। मार्च 2013 से फरवरी 2014 माह तक प्रदेश स्तर पर एकत्रित एमसीटीएस की रिपोर्ट के आधार पर रैंक तैयार की गई। इसमें बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेशीय अंचल की स्थिति काफी खराब पाई गई थी। प्रदेश के 75 जनपद के परफार्मेंस में प्रसूता पंजीकरण में झांसी जनपद का स्थान 50 वां एवं नवजात शिशु पंजीकरण में 35 वां स्थान था।

    प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु के सबसे प्रमुख कारण हैं-अशिक्षा और गरीबी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार आर्थिक रूप से कमजोर तबके की हर पांच मिनट में एक गर्भवती महिला प्रसवकाल के दौरान मौत के मुंह में चली जाती है। स्त्री के गर्भवती होने पर हर घर में बधाईयां गाई जाती हैं चाहे वह अमीर हो या गरीब। सरकार ने श्रमिक गर्भवतियों के लिए अनेक नियम-कानून बनाए हैं लेकिन उसका लाभ उन्हें कितना मिल पाता है इसमें कागजी और ज़मीनी आंकड़ों में बहुत अन्तर है। लगभग 52 प्रतिशत महिलाएं अपने स्वास्थ्य की चिन्ता किए बिना गर्भधारण करती हैं क्योंकि उन्हें गर्भधारण का निर्णय करने का अधिकार नहीं होता है। परिवार के अभिलाषाएं और पति की इच्छा उन्हें इस बात का अधिकार ही नहीं देती हैं कि उन्हें गर्भ धारण करना चाहिए या नहीं? अथवा उन्हें कब और कितने अंतराल में गर्भधारण करना चाहिए? ग्रामीण क्षेत्रों में और शहरी क्षेत्रों की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं घरों में अप्रशिक्षित दाइयों से प्रसव कराती हैं। यह भी उनकी इच्छा और अनिच्छा की सीमा से परे होता है। उन्हें यह तय करने का अधिकार नहीं होता है कि वे कहां और किससे प्रसव कराएं? अर्थात् एक गर्भवती का गर्भधारण से ले कर प्रसव तक की यात्रा उसकी इच्छा की सहभागिता से परे तय होती है। इसी दुर्भाग्य के चलते प्रतिवर्ष लगभग एक लाख महिलाएं प्रसवकाल में अथवा इससे पूर्व प्रसव संबंधी परेशानियों के कारण अपने प्राण गवां देती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रसव के दौरान गर्भवती की मृत्यु का 24.8 प्रतिशत कारण हैमरेज, 14.9 प्रतिशत कारण संक्रमण और 12.9 प्रतिशत कारण एक्लैंपसिया है। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में ‘जननी एक्सप्रेस’ के द्वारा गर्भवती को अस्पताल पहुंचाए जाने की मुफ़्त सुविधा राज्य सरकार की ओर से मुहैया कराई जा रही है किन्तु जागरूकता की कमी के कारण परिवार यह तय नहीं कर पाता है कि गर्भवती को अस्पताल कब पहुंचाया जाए? ‘जननी एक्सप्रेस’ बुलाने में भी इतनी देर कर दी जाती है कि या तो वाहन में ही प्रसव की स्थिति निर्मित हो जाती है या फिर गर्भवती की हालत गंभीर होने लगती है। ऐसी दशा में सुरक्षित मातृत्व अभियान को पूरी ईमानदारी से और पूरी गंभीरता से चलाया जाना जरूरी है। 

 परिवार खुश होता है कि उनकी बहू उनके परिवार को संतान देने वाली है, पति प्रसन्न होता है कि उसकी पत्नी उसे पिता का दर्जा दिलाने वाली है किन्तु इन खुशियों के बीच गर्भवती की सही देखभाल, स्वास्थ्य-सुरक्षा तथा उसकी इच्छा-अनिच्छा की इस तरह अनदेखी कर दी जाती है कि दुष्परिणाम गर्भवती की मृत्यु के रूप में सामने आता है। जबकि एक गर्भवती का दायित्व सरकार या कानून से कहीं अधिक परिवार पर होता है, इस बात को परिवार और समाज को समझना ही होगा।     
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( नवभारत, 11.04.2019 )
#नवभारत #शरदसिंह #बुंदेलखंड #समस्याएं #problems #Navbharat #SharadSingh #Bundelkhand #राष्ट्रीय_सुरक्षित_मातृत्व_दिवस

Wednesday, April 10, 2019

चर्चा प्लस ... अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां
- डॉ. शरद सिंह
नवरात्रि... वे नौ दिन जब देवी दुर्गा के नौ रूपों की अनुष्ठानपूर्वक स्तुति की जाती है... देवी दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... स्त्रियों द्वारा पूरे अनुष्ठान के साथ मनया जाता है यह नौ दिवसीय पर्व। फिर भी आज स्त्री प्रताड़ित है। क्योंकि उसे अपने भीतर की दुर्गाशक्ति का पता ही नहीं है। देवी दुर्गा जिस स्त्री-साहस का प्रतीक हैं उस साहस को अपने भीतर जगाना होगा प्रत्येक स्त्री को, तभी सही अर्थ में सार्थक होगा नवरात्रि का अनुष्ठान।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मनाः।।
 
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper चर्चा प्लस ... अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह
 नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह अपने आप में प्रेरणादायक है। विडम्बना यह कि इन रूपों में निहित शक्तियों को सिर्फ़ धार्मिक दृष्टि से देखा और ग्रहण किया जाता है। इसलिए तो स्त्रियां शक्ति की पूजा तो करती हैं मगर अपने भीतर की शक्ति को पहचान नहीं पाती हैं। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी दहेज हत्या तो कभी। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर सभी को दुख होता है। लेकिन सिर्फ़ शोक करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। दुर्गा के नौ रूपों की नौ कथाओं की यदि व्यवहारिक व्याख्या की जाए तो प्रत्येक कथा का सार यही मिलता है कि स्त्री में वह क्षमता है कि वह अपनी रक्षा तो कर ही सकती है बल्कि पूरे समाज की रक्षा कर सकती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दुर्गा के नौ रूपों की नौ कथाएं इस प्रकार हैं-
महाकाली - कथा के अनुसार विष्णु जी के कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो राक्षसों की उत्पत्ति हुई। मधु और कैटभ, ब्रह्मा को देख उन्हें अपना भोजन बनाने के लिए दौड़े। ब्रह्मा जी ने भयग्रस्त हो कर विष्णु जी स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी की स्तुति से विष्णु भगवान की आंख खुल गई और उनके नेत्रों में वास करने वाली महामाया वहां से लोप हो गई। विष्णु जी के जागते ही मधु-कैटभ उनसे युद्ध करने लगे। यह युद्ध पांच हजार वर्षों तक चला था। अंत में महामाया ने महाकाली का रुप धारण किया और दोनों राक्षसों की बुद्धि को बदल दिया। ऐसा होने पर दोनों असुर भगवान विष्णु से कहने लगे कि हम तुम्हारे युद्ध कौशल से बहुत प्रसन्न है। तुम जो चाहो वह वर मांग सकते हो। भगवान विष्णु बोले कि यदि तुम कुछ देना ही चाहते हो तो यह वर दो कि असुरों का नाश हो जाए। उन दोनों ने तथास्तु कहा और उन महाबली दैत्यों का नाश हो गया।
महालक्ष्मी - दैत्य महिषासुर ने अपने बल से सभी राजाओं को परास्त कर पृथ्वी और पाताल लोक पर अपना अधिकार कर लिया था। अब वह स्वर्ग पर अधिकार चाहता था। उसने देवताओं पर आक्रमण कर दी। देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए भगवान विष्णु तथा शिवजी से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर दोनों के शरीर से एक तेज पुंज निकला और उसने महालक्ष्मी का रुप धारण किया। इन महालक्ष्मी ने महिषासुर का अंत किया और देवताओं को दैत्यों के कष्ट से मुक्ति दिलाई।
चामुण्डा देवी - शुम्भ व निशुम्भ नामक दो असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवताओं ने भगवान विष्णु को याद किया और उनसे प्रार्थना की। उनकी इस प्रार्थना और अनुनय से विष्णु भगवान के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो चामुण्डा के नाम से प्रसिद्ध हुई। देखने में वह बहुत सुंदर थी और उनकी सुंदरता देख कर शुम्भ-निशुम्भ ने सुग्रीव नाम के अपने एक दूत को देवी के पास भेजा कि वह उन दोनों में से किसी एक को अपने वर के रुप में स्वीकार कर ले। देवी ने उस दूत को कहा कि उन दोनों में से जो उन्हें युद्ध में परास्त करेगा उसी से वह विवाह करेगी। दूत के मुंह से यह समाचार सुनकर उन दोनो दैत्यों ने पहले युद्ध के लिए अपने सेनापति धूम्राक्ष को भेजा जो अपनी सेना समेत मारा गया। उसके बाद चण्ड-मुण्ड को भेजा गया जो देवी के हाथों मारे गए। उसके बाद रक्तबीज लड़ने आया। रक्तबीज की एक विशेषता यह थी कि उसके शरीर से खून की जो भी बूंद धरती पर गिरती उससे एक वीर पैदा हो जाता था। देवी ने उसके खून को खप्पर में भरकर पी लिया। इस तरह से रक्तबीज का भी अंत हो गया। अब अंत में शुम्भ-निशुम्भ लड़ने आ गए और वह भी देवी के हाथों मारे गए।
योगमाया - जब कंस ने देवकी और वासुदेव के छः पुत्रों को मार दिया तब सातवें गर्भ के रुप में शेषनाग के अवतार बलराम जी आए और रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित होकर प्रकट हुए। उसके बाद आठवें गर्भ में श्रीकृष्ण भगवान प्रकट हुए। उसी समय गोकुल में यशोदा जी के गर्भ से योगमाया का जन्म हुआ। वासुदेव जी कृष्ण को वहां छोड़कर योगमाया को वहां से ले आए। कंस को जब आठवें बच्चे के जन्म का पता चला तो वह योगमाया को पटककर मारने लगा लेकिन योगमाया उसके हाथों से छिटकर आकाश में चली गई और उसने देवी का रुप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने कृष्ण के हाथों योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस का संहार किया।
रक्तदंतिका - बहुत समय पहले की बात है वैप्रचिति नाम के असुर ने पृथ्वी व देवलोक में अपने कुकर्मों से आतंक मचा के रखा था। उसने सभी का जीना दूभर कर दिया था। देवताओं और पृथ्वीवासियों की पुकार से देवी दुर्गा ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया। देवी ने वैप्रचिति और अन्य असुरों का रक्तपान कर के मानमर्दन कर दिया। देवी के रक्तपान करने उनका नाम रक्तदन्तिका पड़ गया।
शाकुम्भरी देवी - प्राचीन समय में एक बार पृथ्वी पर सौ वर्षों तक बारिश ना होने से भयंकर सूखा पड़ गया। चारों ओर सूखा ही सूखा था और वनस्पति भी सूख गई थी जिससे सभी ओर हाहाकार मच गया। सूखे से निपटने के लिए ऋषि-मुनियों ने वर्षा के लिए भगवती देवी की उपासना की। उनकी स्तुति से मां जगदम्बा ने शाकुम्भरी के नाम से पृथ्वी पर स्त्री रुप में अवतार लिया। उनकी कृपा हुई और पृथ्वी पर बारिश पड़ी। मां की कृपा से सभी वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को जीवन दान मिला।
श्रीदुर्गा देवी - प्राचीन समय में दुर्गम नाम का एक राक्षस हुआ जिसके प्रकोप से पृथ्वी, पाताल और देवलोक में हड़कम्प मच गया। इस विपत्ति से निपटने के लिए भगवान की शक्ति दुर्गा ने अवतार लिया। देवी दुर्गा ने दुर्गम राक्षस का संहार किया और पृथ्वी लोक के साथ देवलोक व पाताललोक को विपत्ति से मुक्ति दिलाई। दुर्गम राक्षस का वध करने के कारण ही तीनों लोकों में इनका नाम देवी दुर्गा पड़ा।
भ्रामरी - प्राचीन समय में अरुण नाम के राक्षस की इतनी हिम्मत बढ़ गई कि वह देवलोक में रहने वाली देव-पत्नियों के सतीत्व को नष्ट करने का कुप्रयास करने लगा। अपने सतीत्व को बचाने के लिए देव पत्नियों ने भौरों का रुप धारण कर लिया। वह सब देवी दुर्गा से अपने सतीत्व को बचाने के लिए प्रार्थना करने लगी। देव-पत्नियों को दुखी देख मां दुर्गा ने भ्रामरी का रुप धारण किया और अरुण राक्षस के संहार के साथ उसकी सेना को भी नष्ट कर दिया।
चण्डिका - एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए। इन दोनों राक्षसों ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया। इससे दुखी होकर देवताओं ने मातृ शक्ति देवी का स्मरण किया। देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने चण्ड-मुण्ड राक्षसों का विनाश करने के लिए चण्डिका के रुप में अवतार लिया।
जब हम देवी के इन साहसी चरित्रों की कथा का पाठ करते हैं, इन्हें सुनते हैं, इन पर आस्था रखते हैं तो फिर इनसे साहस की शिक्षा क्यों नहीं ले पाते हैं? महिलाओं के प्रति अपराधों की बढ़ती दर को देखते हुए यदि इन चरित्रों के साहस को महिलाएं अपने जीवन में उतार लें तो वे अपने भीतर की याक्ति रूपी दुर्गा को पहचान सकेंगी। यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 10.04.2018)
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Wednesday, April 3, 2019

चर्चा प्लस ... वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...                    
  वादों की लहरों पर चुनाव की नैया     
      - डॉ. शरद सिंह
       गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper  चर्चा प्लस ...वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह
        लोकतंत्र में असली चुनाव बाहुबल से नहीं बल्कि बुद्धिबल से लड़े जाते हैं। इसीलिए बुद्धिबल अपनी इच्छाओं को साधने के लिए पहले बाहुबल को अपना सेवक बनाता है और फिर उससे अपने अनुसार काम कराता है। ऊपर से देखने में भले ही बुद्धिबल और बाहुबल एक-दूसरे के पूरक दिखें किन्तु पलड़ा भारी रहता है बुद्धिबल का ही। तभी तो कई बार छोटा दिखने वाला राजनीतिक दल बड़े राजनीतिक दल को पटखनी दे देता है। यूं भी इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तमाम बंधनों के बावजूद आम नागरिक को जागरूक बना दिया है। वह राजनेताओं द्वारा किए जा रहे हर वादे को विश्लेषण के साथ अपने सामने पाती है और फिर उस पर स्वयं चिंतन-मनन करती है। यही कारण है कि अधिक हवा-हवाई वादों पर बवाल मचते देर नहीं लगती है। आज लगभग अस्सी प्रतिशत आम नागरिक वादों की तह तक जाने का प्रयास करता है। यह सच्चाई नेता भी समझते हैं, वे अब इस तरह के वादे करते हैं जो आम नागरिक के दिलों को छू सके तथा उन्हें विश्वास दिला सके।
लोक सभा चुनाव 2019 के मैदान में उतरे हुए छोटे राजनीतिक दलों की बात छोड़ दी जाए तो दो दल खुल्लमखुल्ला आमने-सामने खड़े नज़र आते हैं। एक कांग्रेस (आई) और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। यद्यपि दोनों टिके रहने को प्रादेशिक दलों का सहारा लेते जा रहे हैं। सवाल यह है कि ये दोनों दल स्थानीय समस्याओं को समझ पा रहे हैं या नहीं। सबसे बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है इन्हें अपने उम्मीवार चुनने में। किसको खड़ा करें, किसको नहीं? जिसे टिकट नहीं मिलती है, वह दूसरे दल का रास्ता पकड़ लेता है। कहीं टिकट न मिलने का गुस्सा तो कहीं पैराशूट उम्मीदवार के प्रति नाराज़गी। रूठों को मनाने का दौर और दूसरे दलों के लोगों को फोड़ कर अपनी ओर मिलाने का दौर। इन सबके बीच चुनावी वादों की बरसात। ऐसी बरसात कि आम नागरिक की सोचने-समझने की क्षमता ही उसमें बह जाए और वह बुद्धिहीन की तरह जा कर बटन दबा आए। मगर आज की चतुर पब्लिक सब जानती है, उसकी आंखें भी खुली हुई हैं और कान भी। वह अपने विवेक से किस तरह काम लेती है यह इतिहास के पन्नों को देख कर भली-भांति जाना और समझा जा सकता है। जिस परिवार नियोजन की नीति ने कांग्रेस आई की कुर्सी छीन ली थी, सन् 1977 में जनता पार्टी ने उसी परिवार नियोजन कार्यक्रम को त्यागने के संबंध में वादा कर चुनाव में जीत हासिल की थी। सन् 1980 में इंदिरा गांधी ने कार्य-कुशल सरकार के वादे के आधार पर विजय प्राप्त की थी और 1984 में राजीव गांधी ने जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती गांधी के आदर्शो पर निर्मित एक साफ छवि वाली सरकार देने के वायदे पर भारी मतों से विजयश्री प्राप्ति की थी। लेकिन सन् 1989 में बोफोर्स तोप सौदे की दलाली की हवा ने राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार के कुर्सी छुड़ा दी और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने । फिर, 1999 में कांग्रेस और तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने और गिराने के बाद स्थिर सरकार देने के वादे के साथ ‘‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन‘’ ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में आम चुनाव जीता। ये वादे ही थे जो राजनीति में हार-जीत सुनिश्चित करते रहे।
        सन् 2014 में भजपा द्वारा किए गए वादों के बारे में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का कहना है कि 2019 में नए वादों की बात करने से पहले नरेन्द्र मोदी जी देश को बताएं कि उन्होंने 5 साल में अपने 2014 के घोषणापत्र में किए गए किन-किन वादों को पूरा किया है? आज उन मुद्दों पर बात करने से क्यों कतरा रहे हैं? उन भारी-भरकम आसमानी वादों, योजनाओं और घोषणाओं का क्या हुआ? बहरहाल, आम नागरिक भी जानता है कि विश्व पटल पर भारत का नाम भले ही जगमगाया हो लेकिन विदेशों में जमा कालाधन वापस देश में लाने का वादा पूरा नहीं हुआ, उल्टे नोटबंदी ने घरेलू महिलाओं की रसोईघर के डब्बों में छिपा कर की गई बचत को भी बाहर निकलवा दिया। नोटबंदी के साल भर बाद भी घर के किसी बैग, किसी कपड़े, किसी किताब में दबे हुए पांच सौ के नोट ने अचानक बरामद हो कर जो सदमा पहुंचाया है, उसे भुला पाना आसान नहीं है। फिर भी भाजपा के नए वादों की ओर आम नागरिक उत्सुकता से देख रहा है।
         इन दिनों कांग्रेस अपने प्रभाव को फिर से जगाने के लिए प्रभावी वादे किए जा रही है। राहुल गांधी ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाने का वादा किया है। उन्होंने कहा है कि करीब 22 लाख सरकारी नौकरी की रिक्तियां हैं, जिन्हें उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर अगले साल 31 मार्च तक भरा जाएगा। पार्टी इस बार किसानों के लिए कर्जमाफी की घोषणा करने के साथ ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक, न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का वादा किया है। कांग्रेस के अन्य वादों में सबके लिए स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के बेघर लोगों को जमीन का अधिकार, पदोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन करना और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना आदि शामिल हैं। जीडीपी का 6 प्रतिशत पैसा शिक्षा पर लगाने का वादा है। साथ ही असली जीएसटी लाने का वादा है।
कांग्रेस का यह भी वादा किया है कि अगर कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापस आती है तो न्यूनतम आय योजना के तहत 20 प्रतिशत सबसे गरीब भारतीय परिवारों के खाते में हर साल 72,000 रुपये जमा किए जाएंगे। इस संबंध में कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहना है कि यह योजना महिला केंद्रित है। यह धनराशि सीधे घरों की महिलाओं के बैंक खाते में जमा की जाएगी। महिलाओं के पक्ष में एक और वादा कि लोकसभा-विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाएगा। साथ ही केंद्र सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा।
कांग्रेस ने जहां जमीनी मुद्दों को अपने वादों में पिरोया है वहीं भाजपा के हाथ से मंदिर का मुद्दा लगभग फिसल चुका है। उसे आमनागरिक की वेदना और संवेदना को जीतने वाले वादे ढूंढने में पसीना बहाना पड़ रहा है। वादे पूरे न कर पाने पर कांग्रेस से सत्ता छिनी थी अब वादे पूरे न कर पाने पर भाजपा को खाली हाथ न रह जाना पड़े।
भाजपा ने फरवरी 2019 को चुनावी वादे तय करने के लिए एक लोकतांत्रिक तरीके की घोषणा की थी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ‘भारत के मन की बात, मोदी के साथ’ अभियान शुरू किया था। एक महीने तक चलने वाले इस अभियान में विभिन्न माध्यमों से देश की जनता से दस करोड़ सुझाव मांगने का लक्ष्य रखा गया था। बीजेपी के राज्यसभा सदस्य और मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी ने तब कहा था कि अगले पांच साल में राष्ट्र निर्माण का एजेंडा तय करने लिए यह सहकारी प्रयास होगा। यह प्रत्येक भारतीय को भारत ढालने के अभियान में शामिल करने का प्रयास है। योजना प्रभावी थी लेकिन इसका संचालन प्रभावी ढंग से हो नहीं सका। फिर भी भाजपा अपने वादों के साथ डटी हुई है जिसमें सवर्णों को आरक्षण जैसे मुद्दे भी हैं।
     यह विडम्बना ही है कि प्रत्येक आमचुनाव के पहले किए गए वादे आजादी के बाद से अब तक लगभग जैसे के तैसे हैं। वही बेरोजगारी हटाने, गरीबी उन्मूलन, किसानों की स्थिति में सुधार आदि के वादे। यदि जीतने वाले राजनीतिक दलों ने सत्ता मिलने के बाद अपने वादों को पूरा किया होता तो आज भी वही बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से जुड़े वादे दोहराए नहीं जाते। अब यह आम नागरिक पर निर्भर है कि वह किसके वादों को आजमाना चाहेगी और किसे सत्ता-सुख दिलाएगी। गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है। इस दौर में स्व. दुष्यंत कुमार का यह शायरी याद आ रही है-
          ख़ुदा नहीं न सही, आदमी का ख़्वाब सही,
          कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये।
          वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
          मैं बेक़रार हूं  आवाज़ में असर के लिए।     
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Thursday, March 14, 2019

डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी " बस एक क़दम..." सागर आकाशवाणी से प्रसारित ...


Dr (Miss) Sharad Singh , Author and Social Activist
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर AIR Sagar से 08 March 2019 को मेरी कहानी "बस एक क़दम..." का प्रसारण किया गया...
इसे आप भी सुनें ....




Friday, March 1, 2019

बुंदेलखंड में अपराध का बढ़ता ग्राफ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ... ' नवभारत ' में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
आज ( 01.03.2019 )को #नवभारत " में प्रकाशित #बुंदेलखंड में बढ़ते अपराधों पर केंद्रित मेरा लेख....इसे आप भी पढ़िए !
🙏 हार्दिक धन्यवाद #नवभारत

बुंदेलखंड में अपराध का बढ़ता ग्राफ
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                    
         सतना के दो जुड़वा बच्चों की नृशंस हत्या ने हर व्यक्ति के मानस को झकझोर दिया है। यूं तो सतना बघेलखंड में है लेकिन बुंदेलखंड से लगा हुआ है। उस पर जिन अपराधियों ने इस घटना को अंजाम दिया उनमें से मुख्य आरोपी बुंदेलखंड के हैं और जिस स्थान यानी चित्रकूट में घटना घटित हुई वह भी बुंदेलखंड में है। इस हृदयविदारक घटना के लिए कोई पुलिस व्यवस्था को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई उस सीमारेखा को जिससे बुंदेलखंड बंटा हुआ है और दशकों से वही चूहा-बिल्ली का खेल खेला जा रहा है जो प्रत्येक दो राज्यों की सीमा पर स्थित इलाकों में खेला जाता रहा है। अपराधी एक राज्य में अपराध कर के दूसरे राज्य में जा छिपते हैं और पुलिस कानूनी मसलों में उलझी रह जाती है। इस नृशंस घटना में कहां चूक हुई यह तो जांच पूरी होने पर ही पता चलेगा लेकिन इतना तो स्पष्ट दिख रहा है कि बुंदेलखंड में अपराधों का ग्राफ बढ़ता जा रही है। बहरहाल, मध्य प्रदेश के चित्रकूट में पांच वर्षीय दो जुड़वा भाइयों की हत्या से हर कोई सदमे में है। 20 लाख रुपये फिरौती लेकर भी बच्चों की निर्मम हत्या ने हर किसी को हिलाकर रख दिया है। इस वारदात पर बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं के बीच सियासी जंग भी तेज हो गई है।
बुंदेलखंड में अपराध का बढ़ता ग्राफ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ... ' नवभारत ' में प्रकाशित  An article of Dr (Miss) Sharad Singh in ' Navbharat ' on Crime in Bundelkhand
                  जुड़वां बच्चों की हत्या का घाव अभी आंखों के सामने आया ही था कि छतरपुर जिले में एक किशोरी पर एक युवक ने सिर्फ़ इसलिए जानलेवा हमला कर दिया कि उसने उस युवक का प्रेम प्रस्ताव ठुकरा दिया था। लगता यही है कि शासन किसी भी दल का रहे, अपराधियों कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अपराधों के बहीखातों के पिछले कुछ पन्ने पलटें तो देख सकते हैं कि सन् 2010 की 04 मार्च को 18 वर्षीया संध्या रिछारिया को उनके पड़ोस में रहने वाले चार लड़कों ने बलात्कार के प्रयास के बाद मिट्टी का तेल डालकर जला दिया था। सागर जिले के छिरारी गांव में विजय रैकवार ने साढ़े सात साल की बच्ची की सात दिसम्बर 2012 को बलात्कार के बाद हत्या कर दी। छतरपुर के महाराजपुर थानांतर्गत ग्राम पुर के भागचंद पटेल ने 11 अक्टूबर 2015 को अपने सगे भाई ठाकुरदास और देवकी प्रसाद के साथ भतीजे अखिलेश की हत्या कर दी। 07 दिसम्बर 2017 को सागर के भानगढ़ थाने की 14 वर्षीय नाबालिग को देवल गांव में रब्बू उर्फ सर्वेश सेन ने अपनी हवस का शिकार बनाया । लड़की पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। नाबालिग की अस्पताल में सात दिन बाद मौत हो गई। बुंदेलखंड में अपराध इतना बढ़ता जा रहा है की चोरी और हत्या आम बात हो गयी है

छतरपुर-दमोह में जहां देशी कट्टे और पिस्टल से जानलेवा हमले का चलन बढ़ा है तो सागर पिछले एक साल में चाकू-कटरबाजी की दर्जनों वारदातें हुईं। विगत वर्ष किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार शस्त्र संबंधी अपराधों में सबसे ज्यादा 236 प्रतिशत अपराध छतरपुर और दूसरे क्रम पर 203 प्रतिशत अपराध दमोह जिले के पुलिस थानों में दर्ज किए गए। सागर संभाग के पांच जिलों में 75 प्रतिशत वृद्धि के साथ शस्त्र संबंधी प्रकरणों में तीसरे नंबर पर और पन्ना जिले में पिछले तीन सालों 17 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। उत्तरप्रदेश के हिस्से में फैले बुंदेलखंड के बांदा, कर्वी जैसे जिलों में मामूली बात में हथियारों का प्रयोग किया जाना आम बात है।  लड़कियों, महिलाओं और बच्चों की तस्करी के भी आंकड़े बुंदेलखंड के माथे पर जब तब दाग लगाते रहते हैं। देह व्यापार का बोलबाला भी कम नहीं है। बुंदेलखंड से तो लड़कियां महानगरों में भेजी ही जा रही हैं, वहीं महानगरों से लड़कियां देहव्यापार के लिए बुलाई भी जाती हैं।
बुंदेलखंड का ग्रामीण अंचल आज भी अशिक्षा और असुरक्षा के जाल में इस तरह जकड़ा हुआ हैकि वह अपने विरुद्ध होने वाले अपराधों के लिए आवाज़ भी बुलंद नहीं कर पाता है। उस पर अवैध हथियारों का दबाव उन्हें मुंह बंद रखने को विवश करता रहता है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ़ राजनीतिक हल्ला बोल कर दशा नहीं सुधारी जा सकती है।  बुंदेलखंड में अपराधों के आंकड़े हमेशा स्थिति की गंभीरता की ओर संकेत करते रहे हैं, लेकिन उन लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, जो इस दशा के लिए जिम्मेदार हैं। राजनीतिक शोर और चुनावी मुद्दों के बीच रह जाने वाली अपराधों की बढ़त की  समस्या आज भी जस के तस है। अब आशा यही की जानी चाहिए कि मासूम जुड़वा बच्चे प्रियांश और श्रेयांश का दुखद अंत वह जागरुकता ला सके जिससे इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और अपराधों पर अंकुश लगे।             
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( नवभारत, 01.03.2019 )
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Wednesday, February 27, 2019

चर्चा प्लस ... सेना पर गर्व... अपराधों पर शर्म... - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
आज वह समय है जब हम गर्व महसूस कर रहे हैं... वहीं शर्म भी आ रही है ...क्यों?
यह मेरा आज का 'चर्चा प्लस' पढ़ने पर आप स्वयं समझ जाएंगे...
       चर्चा प्लस ...
      सेना पर गर्व... अपराधों पर शर्म...
      - डॉ. शरद सिंह
       एक ओर हमारी सेना हमें गर्व करने का अवसर दे रही है, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर बैठे अपराधी मानवता को शर्मसार करने पर तुले हुए हैं। हमारी एक आंख में उस गर्व की चमक है जो पुलवामा का बदला लेने से मिली है, वहीं दूसरी आंख से आंसू छलक रहे हैं उन दो मासूम जुड़वा बच्चों को याद कर के जो नृशंसतापूर्वक मौत के घाट उतार दिए गए। पिछले कुछ वर्षो से देश में जिस तरह अपराधों की बाढ़ आई हुई है वह चिन्तित करने वाली है। विशेष रूप से बुंदेलखंड जैसे पिछले इलाके, जहां आर्थिक और शैक्षिक कमी है, अपराध के लिए उर्वर जमीन का काम कर रहे हैं।
 चर्चा प्लस ... सेना पर गर्व... अपराधों पर शर्म... - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar
       सारा देश क्रोध से उबल रहा था। आतंकवाद को प्रश्रय देने वालों के विरुद्ध कड़ा कदम उठाने की मांग कर रहा था। आतंकवाद के विरुद्ध सारी जनता एकजुट खड़ी दिखाई देने लगी। ऐसे माहौल में भारतीय सेना की ओर से एयर स्ट्राईक किया जाने का स्वागत हर भारतीय कर रहा है और गर्व हर रहा है अपने वीर सैनिकों पर। भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सीआरपीएफ़ के एक काफ़िले पर हमले और 40 से ज़्यादा जवानों के मारे जाने के बाद से भारत और पाकिस्तान में तनाव की स्थिति बनी हुई है. भारतीय वायुसेना ने पीओके समेत पाकिस्तान के बालाकोट में हवाई हमले किए हैं। जिस बालाकोट को भारतीय वायुसेना ने निशाना बनाया है, वह पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत के मानसेहरा जिले में है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, मानसेहरा 1990 से आतंकी संगठनों का गढ़ बना है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से यह इलाका काफी सटा हुआ है। इस्लामाबाद से वहां जाने में मुश्किल से चार घंटे लगते हैं। मानसेहरा इलाके में आतंक के पनपने में सरकारी मशीनरी का हाथ रहा है। यह इलाका पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) और हमारे कश्मीर से सटा हुआ है। पीओके से इसकी दूरी करीब 25 मील और कश्मीर से 45 किलोमीटर है। कश्मीर से नजदीकी को देखते हुए इसे आतंकियों के लिए ट्रेनिंग कैंप बनाया गया है। एपी के संवाददाता ने यहां के आतंकियों से बातचीत की थी। कुछ आतंकियों ने बताया था कि मानसेहरा में जितने भी ट्रेनिंग कैंप हैं, वहां कश्मीर में आतंक फैलाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। शहरी इलाके में मस्जिद और मदरसे हैं। मस्जिद और मदरसों का इस्तेमाल जवानों का ब्रेनवॉश करने के लिए किया जाता है। उनको इस्लाम के लिए मरने-मारने को तैयार किया जाता है। जंगल के काफी अंदर हथियारों की ट्रेनिंग का बेस है। वहां भर्ती होने वाले युवाओं को ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग लेने वाले रंगरूट जंगलों में टेंट में रहते हैं। मानसेहरा में आतंकियों के लिए चार हफ्ते का कोर्स चलाया जाता है। इस दौरान उनको बुनियादी सैन्य कौशल सिखाए जाते हैं और गोरिल्ला युद्ध को लेकर प्रशिक्षण दिया जाता है। फिर उनको विस्फोटक आदि के बारे में प्रशिक्षण लेने के लिए पीओके भेज दिया जाता है।
एक ओर हमारी सेना हमें गर्व करने का अवसर दे रही है, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर बैठे अपराधी मानवता को शर्मसार करने पर तुले हुए हैं। हमारी एक आंख में उस गर्व की चमक है जो पुलवामा का बदला लेने से मिली है, वहीं दूसरी आंख से आंसू छलक रहे हैं उन दो मासूम जुड़वा बच्चों को याद कर के जो नृशंसतापूर्वक मौत के घाट उतार दिए गए। पिछले कुछ वर्षो से देश में जिस तरह अपराधों की बाढ़ आई हुई है वह चिन्तित करने वाली है। विशेष रूप से बुंदेलखंड जैसे पिछले इलाके, जहां आर्थिक और शैक्षिक कमी है, अपराध के लिए उर्वर जमीन का काम कर रहे हैं। बारिश की कमी, सूखे के मार, उचित जलप्रबंधन का अभाव, प्राशासनिक कमियां, भुखमरी, ग़रीबी, किसानों द्वारा आत्महत्याएं आदि ये सभी वे कारक हैं जो अपराधों को खाद-पानी मुहैया कराते हैं। वहीं पीड़ित जनता को मिलते हैं सिर्फ़ आश्वासन।
मध्य प्रदेश के चित्रकूट में पांच वर्षीय दो जुड़वा भाइयों की हत्या से हर कोई सदमे में है। 20 लाख रुपये फिरौती लेकर भी बच्चों की निर्मम हत्या ने हर किसी को हिलाकर रख दिया है। बच्चों के पिता ने हत्यारों के लिए फांसी की मांग की है। 12 फरवरी को स्कूल बस से बच्चों का अपहरण हुआ था जिसके बाद शनिवार को दोनों के जंजीरों से बंधे हुए शव यूपी के बांदा में मिले। दोनों अगवा किए गए बच्चों के शवों की जो तस्वीरें आई हैं, वह विचिलित कर देने वाली है। बच्चों के हाथों में लोहे की जंजीर पड़ी है, जो बता रही है कि, बच्चों को बांधकर नदी में फेंका गया। सतना के इन दो जुड़वा बच्चों की नृशंस हत्या ने हर व्यक्ति के मानस को झकझोर दिया है। यूं तो सतना बघेलखंड में है लेकिन बुंदेलखंड से लगा हुआ है। उस पर जिन अपराधियों ने इस घटना को अंजाम दिया उनमें से मुख्य आरोपी बुंदेलखंड के हैं और जिस स्थान यानी चित्रकूट में घटना घटित हुई वह भी बुंदेलखंड में है। इस हृदयविदारक घटना के लिए कोई पुलिस व्यवस्था को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई उस सीमारेखा को जिससे बुंदेलखंड बंटा हुआ है और दशकों से वही चूहा-बिल्ली का खेल खेला जा रहा है जो प्रत्येक दो राज्यों की सीमा पर स्थित इलाकों में खेला जाता रहा है। अपराधी एक राज्य में अपराध कर के दूसरे राज्य में जा छिपते हैं और पुलिस कानूनी मसलों में उलझी रह जाती है। इस नृशंस घटना में कहां चूक हुई यह तो जांच पूरी होने पर ही पता चलेगा लेकिन इतना तो स्पष्ट दिख रहा है कि बुंदेलखंड में अपराधों का ग्राफ बढ़ता जा रही है।
जुड़वां बच्चों की हत्या का घाव अभी आंखों के सामने आया ही था कि छतरपुर जिले में एक किशोरी पर एक युवक ने सिर्फ़ इसलिए जानलेवा हमला कर दिया कि उसने उस युवक का प्रेम प्रस्ताव ठुकरा दिया था। लगता यही है कि शासन किसी भी दल का रहे, अपराधियों कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अपराधों के बहीखातों के पिछले कुछ पन्ने पलटें तो देख सकते हैं कि सन् 2010 की 04 मार्च को 18 वर्षीया संध्या रिछारिया को उनके पड़ोस में रहने वाले चार लड़कों ने बलात्कार के प्रयास के बाद मिट्टी का तेल डालकर जला दिया था। सागर जिले के छिरारी गांव में विजय रैकवार ने साढ़े सात साल की बच्ची की सात दिसम्बर 2012 को बलात्कार के बाद हत्या कर दी। 07 दिसम्बर 2017 को सागर के भानगढ़ थाने की 14 वर्षीय नाबालिग को देवल गांव में रब्बू उर्फ सर्वेश सेन ने अपनी हवस का शिकार बनाया । लड़की पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। नाबालिग की अस्पताल में सात दिन बाद मौत हो गई। बुंदेलखंड में अपराध इतना बढ़ता जा रहा है की चोरी और हत्या आम बात हो गयी है।
छतरपुर-दमोह में जहां देशी कट्टे और पिस्टल से जानलेवा हमले का चलन बढ़ा है तो सागर पिछले एक साल में चाकू-कटरबाजी की दर्जनों वारदातें हुईं। विगत वर्ष किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार शस्त्र संबंधी अपराधों में टीकमगढ़ और पन्ना संभाग में सबसे निचले पायदान पर रहे हैं। सबसे ज्यादा 236 प्रतिशत शस्त्र संबंधी अपराध छतरपुर और दूसरे क्रम पर 203 प्रतिशत अपराध दमोह जिले के पुलिस थानों में दर्ज किए गए। सागर संभाग के पांच जिलों में 75 प्रतिशत वृद्धि के साथ शस्त्र संबंधी प्रकरणों में तीसरे नंबर पर और पन्ना जिले में पिछले तीन सालों में सबसे कम केवल 17 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। उत्तरप्रदेश के हिस्से में फैले बुंदेलखंड के बांदा, कर्वी जैसे जिलों में मामूली बात में हथियारों का प्रयोग किया जाना आम बात है।  लड़कियों, महिलाओं और बच्चों की तस्करी के भी आंकड़े बुंदेलखंड के माथे पर जब तब दाग लगाते रहते हैं। देह व्यापार का बोलबाला भी कम नहीं है। बुंदेलखंड से तो लड़कियां महानगरों में भेजी ही जा रही हैं, वहीं महानगरों से लड़कियां देहव्यापार के लिए बुलाई भी जाती हैं। बुंदेलखंड में विवाह के नाम पर भी महिलाओं को खरीदा और बेचा जाता है। बुंदेलखण्ड के झांसी, ललितपुर, जालोन, टीकमगढ़, छतरपुर, और पन्ना की बात करें, तो यहां 1 हजार पुरुषों पर 825 महिलाएं हैं। ऐसे में अपने वंश को चलाने के लिये बुंदेलखण्ड के युवा उड़ीसा जैसा गरीब राज्य की लड़कियों की खरीद फ़रोख्त करते हैं। दलालों के माध्यम से उड़ीसा से बुन्देलखण्ड पहुंची इन महिलाओं की शादी 100 रुपयें के स्टाम्प पर करा दी जाती है। यह इकरारनामा कानूनी रूप से वैध नहीं होता है।
बुंदेलखंड का ग्रामीण अंचल आज भी अशिक्षा और असुरक्षा के जाल में इस तरह जकड़ा हुआ हैकि वह अपने विरुद्ध होने वाले अपराधों के लिए आवाज़ भी बुलंद नहीं कर पाता है। उस पर अवैध हथियारों का दबाव उन्हें मुंह बंद रखने को विवश करता रहता है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ़ राजनीतिक हल्ला बोल कर दशा नहीं सुधारी जा सकती है। बुंदेलखंड में अपराधों के आंकड़े हमेशा स्थिति की गंभीरता की ओर संकेत करते रहे हैं, लेकिन उन लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, जो इस दशा के लिए जिम्मेदार हैं। राजनीतिक शोर और चुनावी मुद्दों के बीच रह जाने वाली अपराधों की बढ़त की  समस्या आज भी जस के तस है। यदि बढ़ते अपराधों पर प्रशासन अब भी अंकुश न लगा सका तो कल सीमा पर बैठे सिपाही कहीं ये न पूछने लगें कि क्या इन्हीं अपराधियों के लिए हम अपनी जान दे रहे हैं? देश की सीमा पर पहरा दे रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए भी जरूरी है कि आंतरिक शांति और सुरक्षा बरकरार रहे।   
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( सागर दिनकर, 27.02.2019)
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