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Friday, June 28, 2024

शून्यकाल | राजनीति का एक बेहद रोचक किस्सा - “बॉबी” वर्सेस “बाबूजी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम "शून्यकाल"

   राजनीति का एक बेहद रोचक किस्सा - “बॉबी” वर्सेस “बाबूजी"

 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह         

       राजनीति हमेशा दिलचस्प होती है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए, जो राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं। जब राजनीतिक इतिहास के पन्ने पलटे जाते हैं तो अनेक रोचक किस्से सामने आते हैं। जो राजनेताओं पद, कद और प्रभाव के बारे में बताते ही हैं, तत्कालीन जनमानस का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत करते हैं। ऐसे किस्से सभी लोगों को बेहद पसंद आते हैं भले ही राजनीति में उनकी रुचि हो अथवा न हो । ऐसा ही एक रोचक किस्सा है “बॉबी” वर्सेस “बाबूजी”।
  निर्माता-निर्देशक राजकपूर की सुपरहिट फिल्म ‘‘बाॅबी’’ आज भी देखने वालों को रोमांचित कर देती है। सन् 1973 में रिलीज़ हुई इस फिल्म में अभिनेता ऋषि कपूर और अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया ने युवा प्रेमी जोड़े का रोल निभाया था। इस फिल्म का सबसे सुपरहिट गाने ‘‘झूठ बोले कौव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो’’ के गीतकार थे  विट्ठल भाई पटेल। वे गीतकार थे, समाजसेवी थे और एक राजनीतिज्ञ भी थे। विट्ठल भाई पटेल सुरखी विधान सभा से दो बार विधायक बने। पहली बार सन् 1980 में और दूसरी बार सन् 1985 में। वैसे सुरखी विधान सभा सीट अपने आरम्भ काल से ही महत्वपूर्ण रही है। सन् 1951 में प्रतिष्ठित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी कांग्रेस से चुनाव जीते थे। 
   उस समय विट्ठल भाई पटेल सुरखी से विधायक तो नहीं बने थे किन्तु राजनीति में सक्रिय थे और स्व. राजकपूर से भी उनके अच्छे संबंध थे। इसलिए जब राजकपूर ने ‘‘बाॅबी’’ फिल्म का निर्माण शुरू किया तो विट्ठल भाई पटेल से उन्होंने गीतों की मांग की। विट्ठल भाई पटेल  ने उन्हें गीत लिख कर दिए ओर जैसाकि सभी जानते हैं कि इस फिल्म का विट्ठल भाई पटेल द्वारा लिखा गया गीत ‘‘झूठ बोले कौव्वा काटे’’ सुपरहिट तो हुआ ही, साथ ही किसी मुहावरे की तरह लोगों की ज़बान पर चढ़ गया। यहां मैं जिस घटना की चर्चा करने जा रही हूं वह फिल्म ’’बाॅबी’’ के रिलीज़ के समय की है। उन दिनों हर शहर में या हर टाॅकीज़ में एक साथ फिल्म रिलीज नहीं होती थी, जैसे कि आजकल सैटेलाईट के कारण हो पाती है। ‘‘बाॅबी’’ जहां-जहां रिलीज़ हुई, वहां-वहां उसने रिकार्ड तोड़ दर्शकों की भीड़ हासिल की। कहां जाता है कि उन दिनों ‘‘बाॅबी’’ को देखने वाले ऐसे दर्शक भी थे जिन्होंने लगातार दस-दस दिन तक उस फिल्म को टाॅकीज़ में देखा। विट्ठल भाई पटेल का लिखा गाना ‘‘झूठ बोले कौव्वा काटे’’ बच्चे-बच्चे की जुबान पर था। 
     “बॉबी” की कहानी कोई नई नहीं थी। वही अमीरी और गरीबी के बीच का प्रेम। एक अमीर बाप अपने बेटे के लिए गरीब घर की लड़की को बहू के रूप में स्वीकार नहीं करता है और इस प्रेमी जोड़े को अलग करने में जुड़ जाता है। लेकिन शो में इंद्राज कपूर जानते थे की घिसी पिटी कहानी को भी किस तरह से गरमा गरम परोसा जा सकता है। उन्होंने डिंपल कपाड़िया को हीरोइन के रूप में चुनकर ऐसा धमाका किया कि यह फिल्म सुपर डुपर हिट साबित हुई । लेकिन इसके हिट होने से पहले एक मामला ऐसा भी था जहां शो में राज कपूर को भी झुकना पड़ा। इसका अंत राज कपूर ने पहले यह तय किया था की हीरो और हीरोइन फिल्म के अंत में समुद्र में कूद कर अपनी जान दे देते है।  जब फिल्म वितरकों को कहानी के अंत का पता चला तो उन्होंने राज कपूर से अनुरोध किया कि वे इस अंत को बदलकर सुखांत कर दें। दर्शक हीरो हीरोइन दोनों का इस तरह से मरना स्वीकार नहीं करेंगे फिल्म फ्लॉप हो जाएगी । इसके पहले राज कपूर की ‘‘मेरा नाम जोकर’’ फ्लॉप हो चुकी थी। वे एक और आर्थिक झटका बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे इसलिए उन्होंने फिल्म का क्लाइमेक्स बदलना स्वीकार कर लिया। यह सातवीं फिल्म थी जिसे ख्वाजा अहमद अब्बास ने राज कपूर के लिए लिखा था।
    अपने रिलीज़ के पांच साल बाद भी ‘‘बाॅबी’’ की लोकप्रियता सिरचढ़ कर बोल रही थी। बात जनवरी 1977 की है।  18 जनवरी 1977 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव करवाने की घोषणा कर दी। राजनीति के जानकारों के अनुसार आपातकाल समाप्त करने की यह घोषणा आपातकाल लागू होने की घोषणा की तरह चैंकाने वाली थी। जनवरी 1977 में चुनावों की घोषणा करते हुए इंदिरा गांधी का कहना था, ‘‘करीब 18 महीने पहले हमारा प्यारा देश बर्बादी के कगार पर पहुंच गया था। राष्ट्र में स्थितियां सामान्य नहीं थी। चूंकि अब हालात स्वस्थ हो चुके हैं, इसलिए अब चुनाव करवाए जा सकते हैं।’’
      देश में आपातकाल लागू हुए 19 महीने बीत चुके थे। उस समय तक इंदिरा गांधी और बाबू जगजीवन राम के बीच वैचारिक मतभेद आरम्भ हो चुका था। आपातकाल के समर्थन में लोकसभा में प्रस्ताव लाने वाले बाबू जगजीवन राम ने बाद में कांग्रेस से इस्तीफा देकर जनता पार्टी के साथ 1977 का चुनाव लड़ने का मन बना लिया था। क्यों कि आपातकाल के दौरान संविधान में इस हद तक संशोधन कर दिए गए कि उसे ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ की जगह ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था। उसमें ऐसे भी प्रावधान जोड़ दिए गए थे कि सरकार अपने पांच साल के कार्यकाल को कितना भी बढ़ा सकती थी। विपक्ष के सभी बड़े नेता जेलों में कैद थे और कोई नहीं जानता था कि देश इस आपातकाल से कब मुक्त होगा। किन्तु 18 जनवरी 1977 को आपातकाल के समापन की घोषणा कर दी गई। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कांग्रेस के कद्दावर जमीनी नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर जगजीवन राम ने अपनी नई पार्टी ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उनकी पार्टी जनता पार्टी के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ेगी ताकि बंटे हुए विपक्ष का लाभ कांग्रेस को न मिल सके। माना जाता है कि 1977 में उनके कांग्रेस से अलग होने के कारण जनता पार्टी को दोगुनी मजबूती मिल गई थी।
      5 अप्रैल, 1908 को बिहार के भोजपुर में जन्मे जगजीवन राम स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय रहे थे। 1946 में जब जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षता में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था, तो जगजीवन राम उसमें सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने थे। उनके नाम सबसे ज्यादा समय तक कैबिनेट मंत्री रहने का रिकॉर्ड भी दर्ज है। वे 30 साल से ज्यादा समय केंद्रीय कैबिनेट में मंत्री रहे। उनके कांग्रेस से अलग होने पर कांग्रेस को नुकसान तो पहुंचना ही था। वे बहुत अच्छे वक्ता थे। उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। उन दिनों लोकनायक जयप्रकाश नारायण कांग्रेस के खिलाफ रैलियों पर रैलियां कर रहे थे। पटना, कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास, चंडीगढ़, हैदराबाद, इंदौर, पूना और रतलाम में जनसभाएं करते हुए मार्च की शुरुआत में वे दिल्ली पहुंच गए। मार्च 1977 के ही तीसरे हफ्ते में चुनाव होने थे। बाबू जगजीवन राम ने घोषणा की कि छह मार्च को दिल्ली में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया जाएगा। कांग्रेस इस घोषणा से सतर्क हो गई। उसे पता था कि बाबू जगजीवन राम में वह क्षमता है कि वे अपने भाषण से हजारों लोगों की भीड़ जोड़ कसते हें और उन्हें प्रभावित कर सकते हैं।
        कांग्रेस ने बाबू जगजीवन राम के इस प्रभाव को तोड़ने के लिए एक दिलचस्प चाल चली। जिस समय दिल्ली में बाबू जगजीवन राम की सभा होनी थी ठीक उसी समय दूरदर्शन पर फिल्म ‘बॉबी’ का  प्रदर्शन करा दिया। उन दिनों छोटे शहरों में तो दूरदर्शन का नामोनिशान नहीं था लेकिन बड़े शहरों और महानगरों में दूरदर्शन तेजी से आमजनता के जीवन से जुड़ता जा रहा था। वह दौर था जब दूरदर्शन पर हर तरह के कार्यक्रम लोग बड़े चाव से देखते थे। ऐसे समय ‘‘बाॅबी’’ जैसी सुपरहिट फिल्म घर बैठे देखने को मिल रही हो तो उसे भला कौन छोड़ना चाहता। ‘‘बाॅबी’’ के इसी आकर्षण को सियासी हथियार के रूप में प्रयोग में लाया गया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में इस घटना का उल्लेख किया है। कांग्रेस तय मान कर बैठी थी कि ‘‘बाॅबी’’ का आकर्षण बाबूजी अर्थात् बाबू जगजीवनराम की सभा पर भारी पड़ेगा और उन्हें श्रोता नहीं मिलेंगे। लेकिन कांग्रेस का अनुमान गलत साबित हुआ। लगभग दस लाख लोगों की भीड़ सभा में जुड़ गई और सभी ने रुचिपूर्वक बाबू जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण का भाषण सुना। दूसरे दिन सुबह दिल्ली के अंग्रेजी अखबारों में हैडलाइन  थी-‘‘बाबूजी बीट्स बाॅबी’’ अर्थात् बाबूजी ने बाॅबी को हरा दिया। 
      आज भी राजनीतिक गलियारों में जब ‘‘बाॅबी’’ और ‘‘बाबूजी’’ की चर्चा होती है तो इस घटना का जिक्र जरूर होता है। फिल्म गीतकार और राजनीतिज्ञ स्व. विट्ठल भाई पटेल की फिल्मी पहचान बन गई ‘‘बाॅबी’’ उनके दो बार सुरखी क्षेत्र से विधायक बनने के बाद भी अमिट बनी रही। राजनीति और फिल्मी दुनिया के बीच ‘‘बाॅबी’’, ‘‘बाबूजी’’ और विट्ठल भाई पटेल का त्रिकोण कभी भुलाया नहीं जा सकता है, यह इतिहास के पन्ने पर एक दिलचस्प राजनीतिक दांव-पेंच के रूप में दर्ज़ हो चुका है। 
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Saturday, September 9, 2023

शून्यकाल | सुव्यवस्था की चौपाल की बजाए हैशटैग बनती राजनीति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

 "दैनिक नयादौर" में मेरा कॉलम ...

शून्यकाल
सुव्यवस्था की चौपाल की बजाए हैशटैग बनती राजनीति
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
      'राजनीति’ शब्द अब उतना विशिष्ट नहीं रहा जितना प्राचीनकाल में हुआ करता था। तब इस शब्द का अर्थ व्यापक था किन्तु अब संकुचित हो गया है। आज छल, कपट, झूठ और विवाद वर्तमान राजनीति के चैखंबे बन गए हैं। वर्तमान राजनीति को इन्हीं चारों खंबों पर टिकाए रखा जाता है। आज जब सरकारी रिक्त कोष पर आर्थिक राजनीति का ताना-बाना बुना जाता है तब चार्वाक का ‘‘कर्ज लेकर घी पियो’’ का सिद्धांत चरितार्थ होने लगता है। राजनीति का वह स्वरूप और वह अर्थ सभी लगभग भूल चुके हैं जो प्राचीन ग्रंथों में लिखा है। आज राजनीति की हर इकाई गोया वह राजदरबार हो गई है जिसमें चौसर की फड़ बिछी रहती है और जुए के पांसे फिंकते रहते हैं। आज राजनीति सुव्यवस्था की चौपाल की बजाए ‘‘हैशटैग’’ बनती जा रही है।
     पाश्चात्य विचारकों के आधार पर प्रायः यह मान लिया जाता है कि प्राचीन भारतीय इतिहास युद्धों का इतिहास है। जबकि पश्चिमी देशों में स्थिति इससे अलग नहीं थी। ‘‘मैग्नाकार्टा’’ संधियों के बावजूद भी युद्ध होते रहे। यह मानवीय प्रवृत्ति है कि वह अपने लिए नाना प्रकार के नियम बनाता है, नियमानुसार रहने का प्रण करता है और फिर जल्दी ही अपने बनाए नियमों की धज्जियां उड़ाने लग जाता है। प्राचीन काल में हमारे राजनीतिक विचारकों ने अनेक नियम बनाए और उन्हें दण्ड के आधीन रखा। अर्थात् राजनीति भी दण्ड के आधीन थी। बस, दोष यह था कि राजा का अपना राजधर्म था, वह राजनीति का मुखिया था, नियामक था। प्राचीन भारत में राजनीति को भिन्न नामों से व्याख्यायित किया गया। महाभारत के ‘‘शांतिपर्व’’ में इसे ‘‘राजधर्म’’ की संज्ञा दी गई तो अन्य ग्रंथों में यह दण्डनीति, नीतिशास्त्र या फिर अर्थशास्त्र आदि कहा गया। 
प्राचीन भारत में राज-शासन का ही अधिक महत्व था। राजाओं के अपने नियम-कानून और कर्तव्य थे, जो वे पुरोहितों एवं सलाहकारों से विचार-विनिमय कर के बनाते थे जिन्हें राजधर्म कहा जाता था। वर्तमान परिभाषाओं में भी देखें तो राजनीति शास्त्र का मतलब राज्य और शासन के अध्ययन से ही है। इस तरह राजधर्म ही राजशास्त्र अथवा राजनीतिशास्त्र है। राजधर्म के साथ ही ‘‘दण्डनीति’’ का उल्लेख मिलता है। इसका सम्बन्ध भी शासन के कार्यों अथवा शासन तन्त्र से ही रहा। कौटिल्य का कहना था कि मनु, वृहस्पति और शुक्राचार्य द्वारा वर्णित चार विद्याओं में से दण्डनीति एक है। प्राचीन भारतीय विचारकों का मानना था कि प्रभुसत्ता ही राज्य का आधार है। इसलिए भारतीय विचारक मानते थे कि बिना दण्ड के किसी प्रकार के राज्य का अस्तित्व सम्भव नहीं है। दण्डनीति का समर्थक मनु कहते हैं कि ‘‘जब सभी लोग सो रहे होते हैं तो दण्ड उनकी रक्षा करता है। उसी के भय से लोग न्याय का मार्ग अपनाते हैं।’’ 
पंचतंत्र में इसे नृपतंत्र कहा गया। नृपतंत्र अर्थात राजा का तंत्र, राजतंत्र। प्राचीन ग्रंथों अर्थात् वेद, पुराण धर्मशास्त्रों, उपनिषदों, महाकाव्यों, जैन ग्रन्थों तथा बौद्ध जातकों में भी राजधर्म के रूप में राजनीति के स्वरूप की व्याख्या मिलती है। इनके बाद अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, शकनीति में भी राजनीति के स्वरूप की विस्तृत चर्चा है। भारतीय चिन्तन में राज को आवश्यक माना जाता है। इसमें राज का कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें दण्ड की कठोर की व्यवस्था है। सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय चिन्तन का दृष्टिकोण व्यावहारिक है और राजा का कार्यक्षेत्र व्यापक है।
     .राजनीतिक को राजधर्म, राजशास्त्र, दण्ड नीति, नीतिशास्त्र अर्थशास्त्र आदि नामों से प्राचीन भारतीय ग्रंथों में उल्लेख किया गया। विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों में इसके विविध नाम दिखायी पड़ते हैं जैसे विभिन्न स्मृतियों में इसे राजधर्म, महाभारत में इसे राजशास्त्र, दण्डनीति तथा अर्थशास्त्र कहा गया। पंचतंत्र में इसे नृपतंत्र कहा गया। इसको दण्डनीति पुकारने का आधार भी बहुत स्पष्ट है। बहुत से विद्वान राजसत्ता का अंतिम आधार दण्ड को ही मानते है। वे मानते है कि राजनैतिक सत्ता यदि कानून तोड़ने वालों को दण्ड नहीं देगी तो अराजकता उत्पन्न हो जायेगी। अतः दण्ड द्वारा ही भय उत्पन्न कर व्यवस्था लायी जा सकती है। अतः राजनीतिक चिन्तन को दण्ड नीति का पुकारा गया।
      कौटिल्य राजनीति में भी दण्ड के प्रबल पक्षधर थे। कौटिल्य के अनुसार दण्ड से भय उत्पन्न होता है और भय नियमों का पालन कराता है। वे कहते हैं कि कानून तोड़ने वालों को दण्डित करने से जनता स्वतः कानूनों का पालन करने की ओर बढ़ती है। मनु ने दण्ड देने वाली मानवीय सत्ता को राजा नहीं माना वरन दण्ड को शासक माना। ऐसे में शासक को कर्तव्य तथा समाज को बताने वाले शास्त्र को दण्डनीति के नाम से जाना जाता है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र वास्तव में शासननीति का ही विवरण था। नीतिशास्त्र शब्द में नीति का अर्थ सही मार्ग दिखाने से लिया जाता है। उचित अनुचित में अंतर बताने वाला शास्त्र नीतिशास्त्र के नाम से जाना जाता है। भर्तृहरि का प्रसिद्ध ‘‘नीति शतक’’ उस विशाल अर्थ में नीति की चर्चा करता है। कामदंक एवं शुक्र के शासन संबंधी ग्रन्थ नीतिशास्त्र के नाम से जाना जाता है। वे इसे राज्य शास्त्र या दण्ड नीति के नाम से नहीं पुकारते हैं। कौटिल्य ने अपने शासन संबंधी ग्रन्थ को ‘अर्थशास्त्र’ कहा। कौटिल्य की मान्यता थी कि अर्थश् शब्द से व्यक्ति का व्यवसाय स्पष्ट होता है। साथ ही वह भूमि भी इंगित होती है जिस पर रहकर व्यवसाय किया जाता है। अतः उस भूमि को प्राप्त को भी स्थापित करना है। कामन्दक के समय में जो नीति शब्द राज्य की नीति के संबंध में प्रयुक्त किया जाता था वहीं जब सामान्य आचरण के लिये प्रयुक्त किया जाने लगा है। राजनीति तो इसका एक हिस्सा है। ऐसे में राज्य से संबंध रखने वाले नियमों तथा तथ्यों को आचरण के अन्य पहलूओं से अलग दिखाने के लिये नीति शब्द के साथ ‘‘राज’’ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। प्राचीन भारत में राजशास्त्र का व्यापक प्रभाव रहा है। 
      आधुनिक काल में राजनीति का पर्याय बदलता चला गया। लोकतंत्र यानी ‘‘डेमोक्रेसी’’ ने विस्तार किया। इस लोकतंत्र ने समय-समय पर राजनीति में बड़े उतार-चढ़ाव आते देखे हैं। एक व्यक्ति, किसी दल के कुछ सदस्य या फिर कभी-कभी पूरा का पूरा दल ही दूसरे दल के पक्ष में जाते देखा है। इसे हमने हमेशा अपने लोकतंत्र की विशेषता माना है। क्योंकि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है कि मतदाता यदि एक राजनीतिक दल की नीतियों से रुष्ट हो कर दूसरे राजनीतिक दल के उम्मीदवार को अपने अमूल्य मतदान से विजय दिलाता है, इस आशा के साथ कि वह उसकी आशाओं पर खरा उतरेगा और पराजित दल की खामियों को दूर करेगा। किन्तु अचानक मतदाता को यह पता चलता है कि उसके द्वारा जिताया गया उम्मीदवार न केवल अकेले अपितु अपने दल-बल सहित उसी राजनीतिक दल की शरण में चला गया जिसे मतदाता ने पराजय का मुंह दिखाया था। तब मतदाता स्वयं को ठगा हुआ अनुभव करता है और यह सोच कर स्वयं को दिलासा देने का प्रयास करता है कि यही तो लोकतंत्र है। 
यह मानना ही होगा कि वर्तमान दौर राजनीतिक अवमूल्यन का दौर है। आज राजनीति व्यापक से संकुचित पर आ पहुंची है। भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, झूठे वादे, आदि ‘‘ट्रेंड’’ बन चुका है। आज राजनीति सुव्यवस्था की चौपाल की बजाए ‘‘हैशटैग’’ बनती जा रही है। बेहतर है कि हम राजनीति के प्राचीन मानकों के दोषपूर्ण पक्ष को छोड़ कर अच्छे पक्ष को दोहराएं तभी राजनीति अपने मौलिक रूप को पा सकेगी।                                                   
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Wednesday, October 21, 2020

चर्चा प्लस | राजनीति की अभद्र भाषा के निशाने पर महिलाएं | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
राजनीति की अभद्र भाषा के निशाने पर महिलाएं
   - डाॅ शरद सिंह
      जब दो उजड्ड लोग आपस में लड़ते हैं तो वे जल्दी ही गाली-गलौज पर उतर आते हैं। ऐसे समय मां-बहन की गाली आम बात है। वे गाली के अर्थ को नहीं जानते क्योंकि वे उजड्ड हैं। लेकिन इन दिनों मध्यप्रदेश के उपचुनावी माहौल में जनप्रतिनिधियों द्वारा जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है वह सोचने पर मज़बूर करता है कि इन जनप्रतिनिधियों को किस खांचे में रखा जाए- सभ्रांत या उजड्ड? किसी महिला के सम्मान को निशाना बनाने के बाद कोई तर्क मायने नहीं रखता है कि वह किस निहितार्थ कहा गया। समाज में हर महिला को सम्मान पाने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी कार्य से जुड़ी हो। 
मां ने सुबह अख़बार उठाया और पहले पेज की एकाध ख़बर पढ़ कर अख़बार बंद कर के टेबल पर एक ओर सरका दिया। वे मानो अख़बार की ओर देखना भी नहीं चाह रही थीं। मैं और मेरी दीदी डाॅ. वर्षा सिंह भी वहीं दूसरी मेज पर दूसरा अख़बार ले कर बैठे थे। दीदी का ही ध्यान पहले गया मां की ओर। अख़बार लगभग बिना पढ़े ही एक ओर सरका देना हमें अज़ीब लगा। मेरी मां डाॅ विद्यावती ‘मालविका’ जो स्वयं एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं, बड़े चाव से अख़बार पढ़ती हैं। वे टीवी बहुत कम देखती हैं लेकिन सुबह अख़बार ज़रूर पढ़ती हैं। कोरोनाकाल की शुरुआत में यानी लाॅकडाउन 1.0 के दौरान उन्हीें के कहने पर हमें अख़बार लेना बंद करना पड़ा था लेकिन फिर उन्हीं ने कहा कि अख़बार पढ़े बिना पता ही नहीं चलता है कि दुनिया में क्या हो रहा है। यह बात मैं इसलिए बता रही हूं कि मेरी मां अख़बारों या यूं कहिए कि समाचारों में कितनी अधिक रुचि रखती हैं। उनकी आयु 90 से ऊपर हो चली है लेकिन अपनी क्षमता के अनुरुप पठन-पाठन करती रहती हैं। उन्हें देख कर मैंने हमेशा महसूस किया है कि जीवन का इतना लम्बा अनुभव व्यक्ति में धीरे-धीरे वैचारिक तटस्थता ला देता है। मेरी मां न तो कांग्रेस के पक्ष में रहती हैं और न भाजपा के पक्ष में। जो अच्छे काम करता है उसकी तारीफ़ करती हैं और महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ा देख कर खुश होती हैं।

हमने मां से पूछा कि वे अख़बार क्यों नहीं पढ़ रही हैं? तबीयत तो ठीक है न? इस पर उन्होंने यह उत्तर दिया-‘‘कितनी अभद्र हो गई है हमारे यहां की राजनीति। महिलाओं का सम्मान करना ही भूल गए हैं।’’ तब हमें मामला समझ में आया। उस समय तक हम लोग भी पूर्वमुख्यमंत्री कमलनाथ की टिप्पणी पढ़ चुके थे। एक ऐसी महिला जिसने गांधीयुग देखा हो उनका ऐसी टिप्पणी पढ़ कर आहत होना स्वाभाविक था। अख़बार कमलनाथ की टिप्पणी से गरमाए हुए माहौल से भरा हुआ था।

माहौल तो गर्म होना ही था। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमल नाथ ने वह कह दिया जो उन्हें नहीं कहना चाहिए था। भाजपा से उम्मीदवार इमरती देवी के लिए ‘आईटम’ शब्द का प्रयोग कर के कमलनाथ ने सुर्खियां भले ही बटोर ली हों लेकिन चुनाव के संवेदनशील वातावरण में अपनी ही पार्टी पर अप्रत्यक्ष चोट कर बैठे। इसके विरोध में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने दो घंटे का मौन रखा और कांग्रेस की महिलाओं के प्रति असम्मान की भावना पर विरोध जताया। बात यहीं तक थमी नहीं रही। कमलनाथ ने ‘आईटम’ शब्द को सही ठहराने के लिए जो तर्क दिए वह गैर राजनीतिक व्यक्तियों के गले भी नहीं उतरे। किसी महिला को ‘आईटम’ कहा जाना अभद्रता की श्रेणी में ही आएगा। भले ही वह महिला राजनीति से जुड़ी हो।

मंा इमरती देवी को सिर्फ़ समाचारों से ही जानती हैं। व्यक्तिगततौर उन्हें इमरती देवी से कोेई लेना-देना नहीं है लेकिन वे पहले भी इसी प्रकार व्यथित हो चुकी हैं जब जनप्रतिनिधयों ने राजनीति में मौजूद महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया। वे तब भी दुखी हुई थीं जब एक महिला राजनेता को ‘‘दारूवाली बाई’’ कहा गया था। वे हेमा मालिनी और जयाप्रदा के लिए भी दुखी हुई थीं जब उन्हें ‘‘नचनिया’’ कहा गया था और वे तब भी दुखी होती हैं जब सोनिया गांधी को अपशब्द कहे जाते हैं। कमलनाथ की टिप्पणी के बाद वे फिर क्षुब्ध हो उठीं जब उन्होंने बिसाहूलाल सिंह की टिप्पणी पढ ली। शिवराज सिंह चौहान सरकार के मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार की पत्नी को ‘रखैल’ कह दिया। मंा की यही प्रतिक्रिया थी कि ‘‘अब और कितना गिरेंगे ये लोग?’’

उनके इस प्रश्न का उत्तर हम दोनों बहनों के पास नहीं था। हम अनुत्तरित रह गए। वर्तमान राजनीतिक माहौल पर उनकी क्षुब्धता देख कर हमें एकबारगी लगा कि हम एक बार फिर अख़बार मंगाना बंद कर दें। फिर दूसरे ही पल विचार आया कि यह कटुसत्य उनसे छिपाने से क्या होगा? अख़बार में बहुत-सी, सकारात्मक बातें होती हैं, उनसे मां को वंचित करना ठीक नहीं है।   

वैसे मां का दुखी होना स्वाभाविक है। हर महिला ऐसी बातें पढ़-सुन कर दुखी होती है। राजनीति में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी। ऊपर से नीचे तक सड़कछाप भाषा ने अपनी बड़ी जगह बना ली है। चाहे मंच हो या टेलीविज़न पर डिबेट का कार्यक्रम हो, चुभती हुई निर्लज्ज भाषा का प्रयोग आम हो गया है। भारतीय राजनीति में आज किसी भी पार्टी के लिए यह नहीं कहा जा सकता है इस पार्टी ने भाषा की गरिमा को बनाए रखा है। समय-समय पर और चुनाव के समय देश की सभी पार्टियों ने भाषा की गिरावट के नए-नए कीर्तिमान रचे हैं। राजनीति में मौजूद महिलाएं सबसे पहले इसका शिकार बनती हैं। उन पर अभद्र बोल बोलने वाले प्रतिद्वंद्वी उस समय यह भूल जाते हैं कि वह महिला उस समाज का अभिन्न हिस्सा है जिसमें वह स्वयं रहता है। सवाल यह भी है कि क्या भारतीय राजनीति इतनी दूषित हो गई है कि वोट की खातिर नैतिक मूल्यों को भी ताक पर रख दिया जाए? देश की राजनीति अगर इतनी गंदी हो गई तो लोकतंत्र की बात करने वाले सफेदपोश नेताओं को व्यक्तिगत छींटाकशी करने की स्वतंत्रता किस ने दे दी? इसके लिए उत्तरदायी कौन है, आम जनता या फिर वे शीर्ष नेता जिन पर दायित्व है अपने दल के नेताओं को दल के सिद्धांतों पर चलाने का।

मध्य प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव के लिए चल रहे प्रचार अभियान के दौरान बयानों का स्तर गिरता ही जा रहा है। पहले पूर्वमुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक महिलानेत्री को ‘‘आईटम’’ कहा और अपने इस शब्द को शालीन ठहराने के लिए तर्क दे डाले। फिर मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार की पत्नी को ‘रखैल’ कहा जिसका वीडियो सोशल मीडिया में जारी हो गया। वीडियो में बिसाहूलाल सिंह अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार विश्वनाथ सिंह के नामांकन में दिए गए ब्यौरे पर टिप्पणी करते हुए कह रहे थे कि ‘‘विश्वनाथ ने अपनी पहली पत्नी का नहीं, बल्कि रखैल का ब्यौरा दिया है।’’ 

कमलनाथ द्वारा फैलाए गए रायते को समेटने में जुटी कांग्रेस को एक धमाकेदार मुद्दा हाथ लग गया। कांग्रेस प्रवक्ता सैयद जाफर ने ट्वीट कर इस पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि ‘‘इसे कहते हैं महिला का अपमान। भाजपा के मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी की पत्नी को कहा रखैल, क्या महिलाओं के लिए ऐसे ही शब्दों का इस्तेमाल करती है भाजपा? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान तत्काल इस पर संज्ञान लेते हुए मंत्री को पद से हटाएं और प्रदेश की महिलाओं से माफी मांगें।’’ उल्लेखनीय है कि बिसाहूलाल सिंह उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था और कमलनाथ की सरकार गिराई थी। बिसाहूलाल अनूपपुर से विधानसभा उपचुनाव लड़ रहे हैं। 

सच तो यह है कि न तो ‘‘आईटम’’ शब्द उचित है और न ‘‘रखैल’’। ये दोनों ही शब्द महिला के सम्मान को चोट पहुंचाने वाले हैं। क्या महिला कोई वस्तु है जिसे आईटम कहा जाए? याद आता है कि इसी तरह कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी की शालीन और प्रबुद्ध महिला सांसद को  ‘‘टंचमाल’’ कह दिया था। दिग्विजय सिंह ने मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त अपनी ही पार्टी की एक महिला सांसद को ‘‘100 टंच माल’’ कह दिया था। बयान पर बवाल हुआ तो, दिग्विजय ने मानहानि का केस करने की चेतावनी देते हुए कहा कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया। दिग्विजय सिंह ने यह बयान जुलाई 2013 में मंदसौर में दिया था। मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त वह इलाके की सांसद मीनाक्षी नटराजन पर ‘‘100 प्रतिशत टंच माल’’ की टिप्पणी कर डाली थी। सभा में दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ‘‘मैं अंत में आपसे इतना ही कहूंगा मीनाक्षी नटराजन आपकी लोकसभा की सदस्य हैं। गांधीवादी हैं, सरल हैं, ईमानदार हैं। सबके पास जाती हैं, गांव-गांव जाती हैं। मैं अभी कल से इनके इलाके में देख रहा हूं। मुझे भी 40-42 साल का अनुभव है। मैं भी पुराना जौहरी हूं। राजनीतिज्ञों को थोड़ी सी बात में पता चल जाता है कि कौन फर्जी है और कौन सही है। यह 100 प्रतिशत टंच माल हैं और गरीबों की लड़ाई लड़ती हैं। मंदसौर जैसे जिले की गुटबाजी में नहीं पड़तीं, सबको साथ लेकर चलती हैं। दिल्ली में भी इन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। लोकसभा के अंदर भी और पार्टी में भी। सोनिया और राहुल इनको बहुत मानते हैं। साथियो ये आपकी संसद सदस्य हैं, इनको पूरा सपोर्ट करिए, समर्थन करिए।’’

क्या महिलाएं ‘‘माल’’ हैं? क्या महिलाएं ‘‘आईटम’’ हैं? क्या विवाहित महिलाएं ‘‘रखैल’’ हैं? जिम्मेदार और प्रतिष्ठित राजनेताओं द्वारा जब इस तरह की महिला विरोधी टिप्पणी की जाती है तो आश्चर्य होता है राजनीतिक चरित्र की गिरावट पर। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर के लिए ‘‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’’ शब्द का इस्तेमाल किया था। बीजेपी के नेताओं ने सोनिया गांधी के लिए ‘‘जर्सी गाय’’ जैसे घोर आपत्तिजनक बयान तक दिए हैं। कांग्रेस, बीजेपी के अलावा भी तमाम पार्टियों के नेताओं ने समय-समय पर महिलाओं के खिलाफ विवादित बयान दिए हैं। गोया राजनीति को विकास के मूलमुद्दों से भटकाए रखने के लिए महिलाओं के सम्मान पर भी चोट पहुंचानी पड़े तो वह भी सही माना जाए। यही तो चाहते हैं हमारे आज के जनप्रतिनिधि। लिहाज़ा अब समय है इस पर विचार करने का कि हम मतदाता एवं आमनागरिक क्या चाहते हैं? शायद मतदाताओं के सामने दुविधा का पहाड़ खड़ा है। जब सभी पक्ष अभद्रता पर उतारू हों तो आमनागरिक नहीं बल्कि चुनाव आयोग और सुप्रीमकोर्ट की तत्काल लगाम कस सकती है। वरना राजनीति में भाषाई गिरावट का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। 

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(दैनिक सागर दिनकर में 21.10.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, September 30, 2020

चर्चा प्लस | घातक है राजनीति और अभद्र भाषा का गठबंधन | डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस

घातक है राजनीति और अभद्र भाषा का गठबंधन

- डाॅ शरद सिंह

 राजनीति में दलों का गठबंधन आम बात हो चली है लेकिन जब राजनीति और अभद्र भाषा का गठबंधन हो जाए तो अनदेखा नहीं किया जा सकता है। बिगड़े बोलों  ने मर्यादाओं की बोली लगा रखी है। छुटभैये नेता ही नहीं वरन देश की ऊंची कुर्सियों पर बैठे नेता भी अपना भाषाई स्तर गिराने से नहीं चूकते हैं। चुनावों के दौरान यह स्तर रसातल की ओर जाने लगता है। कम से कम राजभाषा मास के समापन के समय इस विषय पर चिंता करना जरूरी है कि हम जिन नेताओं से भाषा के उत्थान एवं विकास में सहयोग चाहते हैं, उनकी अपनी भाषा अर्थात् राजनीतिक अरोप-प्रत्यारोप वाली भाषा अभी और कितना गिरेगी और उसे कैसे रोका जा सकता है? 
Dr (Miss) Sharad Singh Column Charch Plus in Dainik Sagar Dinkar, 23. 09. 2020

चुनावों का समय आते ही अब यह सोच कर सिहरन होने लगती है कि न जाने कितने अभद्र बोल इन कानों को सुनने पड़ेंगे। चाहे आमचुनाव हों या उपचुनाव, नेताओं के बिगड़े बोल राजनीति की गरिमा को चकनाचूर करने से नहीं चूकते हैं। यह एक चलन बनता जा रहा है कि नेता चाहे किसी भी पार्टी के हों गाली देकर या अभद्र टिप्पणी करने के बाद माफी मांग लेते हैं। पार्टी के साथी नेता गाली देने वाले नेता की बात को उसका निजी बयान बताकर मामले से पल्ला झाड़ लेते हैं। भारत की राजनीति में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी। ऊपर से नीचे तक सड़कछाप भाषा ने अपनी बड़ी जगह बना ली है। चाहे मंच हो या टेलीविज़न पर डिबेट का कार्यक्रम हो चुभती हुई निर्लज्ज भाषा का प्रयोग आम हो गया है। भारतीय राजनीति में आज किसी भी पार्टी के लिए यह नहीं कहा जा सकता है इस पार्टी ने भाषा की गरिमा को बनाए रखा है। समय-समय पर और चुनाव के समय देश की सभी पार्टियों ने भाषा की गिरावट के नए-नए कीर्तिमान रचे हैं। राजनीति में मौजूद महिलाएं सबसे पहले इसका शिकार बनती हैं। उन पर अभद्र बोल बोलने वाले प्रतिद्वंद्वी उस समय यह भूल जाते हैं कि वह महिला उस समाज का अभिन्न हिस्सा है जिसमें वह स्वयं रहता है। राजनीतिक वर्चस्व की लालसा के साथ अब जुड़ गया है मीडिया में बने रहने का जुनून। ‘‘बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ’’ वाले सिद्धांत को अपनाते हुए कुछ नेता जानबूझ कर, इरादतन अपने विपक्षी के चरित्र पर ऐसे लांछन लगाने लगते हैं जिसके पलटवार की सौ प्रतिशत संभावना रहती है। जाहिर है कि कोई भी व्यक्ति अपने चरित्र पर कीचड़ उछाला जाना पसंद नहीं करता है। फिर यदि वह व्यक्ति एक नेता के रूप में सार्वजनिक जीवन से जुड़ा हो तो किसी भी प्रकार की चारित्रिक अवमानना उसे उकसाने का ही कार्य करेगी। इसी मनोविज्ञान का लाभ उठाते बिगड़े बोल बोलने वाले बिगड़े बोल बोलते रहते हैं। इससे उन्हे मनचाहा लाभ यह मिलता है कि वे मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं।

सन् 2019 में हुए चुनावों को ही लें, तो लोकसभा चुनाव 2019 के प्रचार के दौरान कुछ उम्मीदवार अपने बिगड़े बोल के चलते सुर्खियों में बने रहे। इन्होंने चुनावी रैलियों में या सोशल मीडिया पोस्टों या मीडिया के सवालों के जवाब में विवादास्पद टिप्पणियां कीं। इनमें हर दल के नेता शामिल रहे। पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक कई उम्मीदवारों ने अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया। राजनीतिक विश्लेषकों ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘‘सन् 2019 का चुनाव व्यक्तिगत हमलों, विषाक्त चुनाव प्रचार और दलों-नेताओं के हर तरह की मर्यादा को ताक पर रख देने के लिए जाना जाएगा।’’ जनता से जुड़े मुद्दे गायब रहे। सारी बहस आरोप-प्रत्यारोप पर टिकी रही और खुद को दूसरे से बेहतर बनाने पर खत्म हो गईं। इससे पहले के चुनावों में एक योगी या एक आजम खान होते थे जिन्हें हम ‘‘फ्रिंज एलीमेंट’’ कहके खारिज कर देते थे। इंतेहा इस बार रही कि मोर्चा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने संभाल लिया था। इससे चैतरफा गिरावट आई। बड़े राजनेताओं ने रास्ता दिखाया और छोटे व नए लोगों ने इसको सफलता का सूत्र मान लिया। अखबार, टीवी और सोशल मीडिया इस तरह की अभद्र भाषा का प्रचारक और विस्तारक बना।
अगर पन्ने पलटे जाएं तो यह देखने में आएगा कि पिछले कुछ वर्षों में चुनावी अभियानों के दौरान न पद का लिहाज किया गया और न ही उम्र का ख्याल रखा गया और न ही भाषा की मर्यादा रखी गई। राजनीति की गलियों में गालियांे और सड़कछाप शब्दों की धूम बढ़ती गई है। कुछ नेता तो बिगड़े बोल बोलने के लिए ही जाने जाते हैं। वहीं, कुछ नेता ऐसे हैं जिनसे अपशब्द की आशा नहीं थी लेकिन उन्होंने भी भाषाई नैतिकता को ताक में रखने में हिचक नहीं दिखाई। समाजवादी पार्टी के आजम खान और भाजपा के गिरिराज सिंह जैसे राजनेता अपने बड़ेबोलेपन तथा भाजपा की प्रज्ञा सिंह ठाकुर और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कन्हैया कुमार जैसे नेता अपने आपत्तिजनक बयानों से लोगों का ध्यान आकर्षित करते रहे। वर्ष 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में आरोपी प्रज्ञा ठाकुर भोपाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ीं। उन्होंने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बताकर सात चरण के लोकसभा चुनाव के अंतिम दौर में एक तीखी बहस छेड़ दी थी। ठाकुर के इस बयान पर कांग्रेस ने कहा था कि ‘‘शहीदों का अपमान करना भाजपा के डीएनए में है’’। 

सपा नेता आजम खान के कथित बोल ने तो मर्यादा की सारी हदें ही लांघ दीं थीं। उनके ‘अंडरवियर’ वाले विवादित बयान के बाद देश में खासा बवाल मच गया था। आजम खान के अलावा चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और बसपा सुप्रीमो व उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के विवादित बयानों को ले कर भी उन पर कुछ समय के लिए उन के चुनाव प्रचार करने पर प्रतिबंध की घोषणा की। इसके बाद जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि- ‘‘हम कह सकते हैं कि चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया। उस ने आचार संहिता तोड़ने वालों पर काररवाई की। लगता है आयोग हमारे आदेश के बाद जाग गया है।’’ लेकिन लगता है कि नेता फिर भी नहीं जागे हैं। सोशल मीडिया में राहुल गांधी को ले कर जितना मजाक उड़ाया जाता है उसमें मर्यादा की धज्जियां उड़ाने में कोई कोर-कसर नहीं रहती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ कांग्रेसी नेता ही अपशब्द का निशाना बनते हैं, पिछले चुनावों के दौरान कांग्रेसी नेताओं द्वारा भाजपा नेताओं को अपशब्द कहे गए। एक ओर जब यह अपेक्षा रखी जाती है कि राजनीति में अच्छे चाल, चरित्र के लोग आएं लेकिन दूसरी ओर भाषाई स्तर की गिरावट को देखते हुए ऐसा लगता है मानो यह आगाह किया जा रहा हो कि जिसमें अभद्रता झेलने की दम हो वही राजनीति में आए। पिछले चुनाव से पहले उर्मिला मातोंडकर पर ध्यान नहीं दिया गया था लेकिन इस बाॅलीवुड हीरोइन ने जैसे ही से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा की वैसे ही उन्हें निशाना बना कर अभद्र लैंगिक शब्दों वाले हमले किए गए।
  
चुनावी रणनीतिकार मानते हैं कि दो विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा नेताओं के बिगड़े बोल चुनाव प्रचार का ही एक हथकंडा हो सकता है जिस में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की हामी होती है। मगर सवाल यह भी है कि क्या भारतीय राजनीति इतनी दूषित हो गई है कि वोट की खातिर नैतिक मूल्यों को भी ताक पर रख दिया जाए? देश की राजनीति अगर इतनी गंदी हो गई तो लोकतंत्र की बात करने वाले सफेदपोश नेताओं को व्यक्तिगत छींटाकशी करने की स्वतंत्रता किस ने दे दी? इसके लिए उत्तरदायी कौन है, आम जनता या फिर वे शीर्ष नेता जिन पर दायित्व है अपने दल के नेताओं को दल के सिद्धांतों पर चलाने का। डॉ. राममनोहर लोहिया शायद इसीलिए कहते थे ‘‘लोकराज लोकलाज से चलता है।’’ इस संदर्भ में याद रखना होगा उस बात को जो पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘‘पोलिटिकल डायरी’’ नामक पुस्तक में लिखा है कि ‘‘कोई बुरा उम्मीदवार केवल इसलिए आपका मत पाने का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी अच्छी पार्टी की ओर से खड़ा है। पार्टी के हाईकमान ने ऐसे व्यक्ति को टिकट देते समय पक्षपात किया होगा या नेकनियती बरतते हुए भी वह निर्णय में भूल कर गया होगा। अतः ऐसी गलती सुधारना उत्तरदायी मतदाता का कर्तव्य है।’’ अर्थात् जो भाषाई स्तर को गिराए और अभद्रता की सारी सीमाएं लांघने लगे, उसे मतदाता राजनीति से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं ताकि राजनीति और अभद्र भाषा का अमार्यादित गठबंधन टूट सके।
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(दैनिक सागर दिनकर में 30.09.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, February 14, 2019

चर्चा प्लस ... राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ. शरद सिंह

यूं तो वेलेंटाइन के दिन तलाक की चर्चा अटपटी लगती है लेकिन बात स्त्री के अधिकारों की हो तो मुझे हर दिन उचित लगता है...
      चर्चा प्लस ...
      राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़
        - डॉ. शरद सिंह
Dr (Miss) Sharad Singh
                                 राजनीतिज्ञ महिलाओं का सचमुच हित चाहते हैं या फिर सिर्फ़ दिखावा करते हैं, इनदिनों यह यक्षप्रश्न मुंह बाए खड़ा है। एक दल ने ट्रिपल तलाक के विरोध में आवाज़ उठाई तो दूसरा दल कह रहा है कि वह सत्ता पर आया तो ट्रिपल तलाक से संबंधित कानून को रद्द कर देगा। न पहले मुस्लिम महिलाओं से बहुमत लिया गया और न अब महिलाओं से पूछा जा रहा है। ट्रिपल तलाक का मुद्दा सफलता की पींगें भरेगा या औंधेमुंह गिरेगा, यह कहना अभी कठिन है लेकिन यह तो तय है कि इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीति के झूले में जिस तरह झुलाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है।       
 चर्चा प्लस .. राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ शरद सिंह ... Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily
     23 अगस्त 2017 ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘आखिर मिल ही गया तीन तलाक से तलाक’’। जिसमें मैंने लिखा था कि -‘‘ 22 अगस्त 2017 का दिन भारतीय न्यायायिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यह तारीख गवाह रहेगी भारतीय मुस्लिम महिलाओं की उस जीत की जो उन्होंने अपने मानवीय अधिकारों पक्ष में हासिल की। यही वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया। यह निर्णय उस मार्ग को भी प्रशस्त करता है जो एक दिन सभी भारतीय मुस्लिम महिलाएं को दुनिया की सभी प्रगतिशील महिलाओं की पंक्ति में ला खड़ा करेगा। ‘तीन तलाक’ की प्रथा के विरोध ने भले ही कड़ा संघर्ष झेला लेकिन अनेक चौंकाने वाली सच्चाइयां भी सामने आईं जिनसे स्वयं अधिकांश भारतीय मुस्लिम महिलाएं अनभिज्ञ थीं।

इससे पहले 30 मार्च 2016 को ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘मुस्लिम महिलाओं का भविष्य’’। इस लेख में मैंने एक सर्वे के हवाले से आंकड़े देते हुए लिखा था कि -‘‘सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ।’’ इसी लेख में मैंने आगे जानकारी दी थी कि ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और विषेषरुप से मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है। यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है। यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और ‘कुरआन’ के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिलाएं सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी।’’

आज स्थितियां इतनी अधिक राजनीतिक हो गई हैं कि महिलाओं के हित के बजाएं ‘ट्रिपल तलाक कानून’ पुरुषों के विरुद्ध दिखाई देने लगा है। इस कानून में यदि कोई विसंगति है तो इसमें संशोधन किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बेहतर होगा कि संशोधन से पहले मुस्लिम महिलाओं से उस पर बहुमत लिया जाए। जिस राजनीतिक दल की पहचान सेक्यूलर के रूप में हमेशा रही हो, उसके तरफ से ऐसे बयान चौंकाने के लिए पर्याप्त हैं, वह भी लोक सभा चुनाव के ठीक पहले। जबकि एक साथ तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच में से तीन जजों ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक माना। कोर्ट ने सरकार को इस पर कानून बनाने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि सरकार संसद में इस पर कानून बनाए।
ट्रिपल तलाक कानून को लेकर कांग्रेस की तरफ से बड़ा बयान उस समय सामने आया जब कांग्रेस के अल्पसंख्यक महाधिवेशन में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने कहा, ’अगर हमारी सरकार आई, तो नरेंद्र मोदी सरकार के लाए ट्रिपल तलाक कानून को खत्म कर देंगे।“ उन्होंने यह भी कहा कि ये कानून मुस्लिम पुरुषों को जेल में भेजने की एक साजिश है। उस समय वे विगत 07 फरवरी 2019 को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। उल्लेखनीय है कि इस सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत अन्यम कार्यकर्ता भी मौजूद थे। जबकि 30 जनवरी 2019 की घटना है कि एटा की महिला को कथित तौर पर घर समय पर नहीं आने की वजह से उसके पति ने फोन पर ही तीन तलाक दे दिया। पीड़ित महिला ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि उसने अपने पति से वादा किया था कि वह तीस मिनट के भीतर लौट आएगी, मगर ऐसा नहीं करने पर उसे तुंरत तलाक दे दिया गया। महिला ने कहा कि ’मैं अपनी दादी मां को देखने अपने मायके गई थी. मेरे पति ने आधे घंटे के भीतर आने को कहा था। मैं दस मिनट लेट हो गई. उसके बाद उन्होंने मेरे भाई के मोबाइल पर फोन किया और तीन बार ’तलाक-तलाक-तलाक’ कहा. उनकी इस हरकत से मैं पूरी तरह से टूट गई।’

एक ओर महिला नेतृत्व प्रदान करती प्रियंका गांधी आपनी पूरी ताकत आगामी चुनाव में झोंक देने को दृढ़संकल्प हैं और इधर सुष्मिता देव अपने बयान पर अडिग हैं। कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव  ने कहा है कि वह तीन तलाक विधेयक पर दिए अपने बयान पर कायम हैं। देव ने कहा था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो पार्टी मुस्लिम समुदाय के भीतर चर्चा से निकले विकल्पों पर जाने के बजाए तीन तलाक विधेयक  को रद्द करेगी। सांसद देव ने बताया, “जो मैंने उस दिन (गुरुवार) बैठक में कहा था, वहीं मैंने संसद के अंदर भी कहा है। तीन तलाक को अपराध करार देने वाले सभी कानूनों को कांग्रेस बदार्श्त नहीं करेगी।” उन्होंने कहा, “और उसके बाद मैंने यह भी कहा था कि जो भी कानून महिला सशक्तिकरण के लिए हैं, हम उन कानून का समर्थन करेंगे। लेकिन हम (तलाक के) अपराधीकरण का समर्थन नहीं करेंगे।”
यह हठधर्मिता है या एक ऐसा तुष्टिकरण वाला कदम जो कम से कम मुस्लिम महिलाओं के हित में तो दिखाई नहीं दे रहा हैं। देखा जाए तो यह मुद्दा समान नागरिक संहिता से जुड़ा हुआ है। यदि इतिहास के पन्ने पलटे जाएं सन् 1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। देखा जाए तो संशोधन की शुरुआत सन् 1772 की हैस्टिंग्स योजना से हुई और अंत शरिअत कानून के लागू होने से हुआ। यद्यपि सन् 1929 में, जमियत-अल-उलेमा ने बाल विवाह रोकने के खिलाफ मुसलमानों को अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की। इस बड़े अवज्ञा आंदोलन का अंत उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गई थी।
सन् 1985 में मध्य प्रदेश की रहने वाली शाह बानो को पति द्वारा तलाक़ दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला किया कि उन्हें आजीवन गुजारा भत्ता दिया जाए। शाहबानो के मामले पर जमकर हंगामा हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने संसद में ’मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स आफ डाइवोर्स) एक्ट पास कराया जिसने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो के मामले में दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया और निर्वाह भत्ते को आजीवन न रखते हुए तलाक के बाद के 90 दिन तक सीमित रख दिया गया।
कुर्सी का लालच और मीडिया में बने रहने की चाह में डूबे कथित राजनीतिज्ञों को कम से कम एक बार उन तीन महिलाओं के संघर्ष को याद कर लेना चाहिए जो निरंतर जूझती रहीं तीन तलाक के विरुद्ध। पहली महिला - जयपुर की आफ़रीन रहमान जिन्हें एक चिट्ठी में तीन बार तलाक लिख कर तलाक दे दिया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया लेकिन स्वयं के लिए नहीं बल्कि इस बात को ध्यान में रख कर कि “अपने पति पर निर्भर अन्य औरतों को ऐसी नाइंसाफ़ी का सामना ना करना पड़े।’’ दूसरी महिला - सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की अतिया साबरी जिनके पति ने दस रुपए के स्टैम्पपे पर तीन तलाक लिख कर उनके मायके भेज कर उन्हें तलाक दे दिया था। निराश हो कर अतिया ने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रथा को असंवैधानिक क़रार देने की अपील की। इसके साथ मांग की कि ऐसा क़ानून बनाया जाए जो मुसलमान महिलाओं को तलाक़ से जुड़े फ़ैसले लेने के समान अधिकार दे। तीसरी महिला - काशीपुर, उत्तराखंड की शायरा बानो जो अपने पति के तीन तलाक के निर्णय से आहत् हो कर सुप्रीम कोर्ट की शरण में गईं। अक्तूबर 2015 में जब पति ने शायरा  के पास तलाक़ वाली चिट्ठी भेजी तब उनका बेटा और बेटी उनके पति के पास ही थे जिनसे वे दोबारा कभी नहीं मिल सकती थीं। एक मां की तड़प के साथ उन्होंने कोर्ट से अपील की कि “मैं तो इस प्रथा का शिकार हुई लेकिन ये नहीं चाहती कि आने वाली पुश्तें भी इसे झेलें, इसीलिए मैंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इसे असंवैधानिक क़रार दिया जाए।“
समान नागरिक अधिकार के मुद्दों को इस तरह राजनीतिक झूले पर झुलाते रहना जहां एक ओर लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर यह महिला अधिकारों का भी हनन करता है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 14.02.2019)
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Wednesday, January 30, 2019

चर्चा प्लस ... राजनीति में बिगड़े बोलों का बोलबाला - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
राजनीति में बिगड़े बोलों का बोलबाला
- डॉ. शरद सिंह
चुनाव आते-आते नेताओं की जबान कुछ अधिक ही फिसलने लगती है और वे देश और जनता की समस्याओं पर बोलने के बजाए प्रतिद्वंद्वी दलों की महिलाओं पर अपशब्द बोलने लगते हैं। यही गति रही तो कहीं जनता इन्हीं बोलों के आधार पर उन्हें खारिज़ करना न शुरू कर दें। जिन कर्णधारों को जनता चुन कर विधान सभा और संसद में भेजती है जब वे ही लोग बिगड़े बोल बोलने लगें को तो हो चुका देश का उद्धार। भारतीय राजनीति में ऐसी फिसलन पहले कभी नहीं रही जैसे विगत कुछ चुनावों के दौरान और चुनावों के बाद देखने-सुनने को मिल रही है। 
चर्चा प्लस ... राजनीति में बिगड़े बोलों का बोलबाला  - डॉ. शरद सिंह  Charcha Plus - Rajniti Me Bigare Bolon Ka Bolbala -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar

  चुनाव नजदीक आते ही वादों-विवादों का दौर चल पड़ता है। एक दूसरे की टांग खींचने का कार्यक्रम शुरू हो जाता है। यदि मामला एक-दूसरे के भ्रष्टाचार या कामों तक सीमित रहे तो फिर भी गनीमत है, कान तो तब गर्म होने लगते हैं जब अपनी भड़ास निकालने और दूसरे को नीचा दिखाने के लिए महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। उस समय सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या ये वही हमारे कर्णधार हैं जिनके हाथों में देश के विकास और सुरक्षा की बागडोर हमने सौंपी है।
आज राजनीतिक गलियारों में भाषा स्वयं शर्मिंदा हो रही है। जब बात हो जबान फिसलने की तो राजनीतिक दलों के भी भेद मिट जाते हैं। स्वयं को संस्कारी कहने वाले दल भी असंस्कारी भाषा बोलने लगते हैं। चाहे सत्ताधारी हो या विपक्षी दोनों एक-दूसरे से आगे बढ़ कर अशोभनीय टिप्पणियां करने लगते हैं। मकसद सिर्फ यही कि वे मीडिया में छाए रहें। कई नेता तो अपने विकास कार्यों नहीं बल्कि अपनी ओछी टिप्पणियों के लिए ही जाने जाते हैं। क्योंकि उन्होंने विकास कार्य किया ही नहीं होता है और इसे छिपाने के लिए अभद्र टिप्पणियों का सहारा लेने लगते हैं। जिससे सभी का ध्यान बंटा रहे। नेताओं के विवादित और फूहड़ बोल हमेशा मीडिया में छाए रहते हैं और आमतौर पर इन नेताओं के निशाने पर महिलाएं होती हैं, फिर चाहे वह महिला राजनीति से जुड़ी हो या नहीं। उनके लिए महिलाएं आसान निशाना होती हैं, क्योंकि इनके रंग, रूप, कद-काठी, मोटापे या बालों को लेकर कुछ भी बोलने पर अच्छा-खासा कव्हरेज मिल जाता है।
अभी विगत दिनों भारतीय जनता पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा था कि कांग्रेस चॉकलेटी चेहरों पर चुनाव लड़ना चाहती है। उन्होंने बाद में सफाई भी दी, यह बयान प्रियंका गांधी के लिए नहीं बल्कि बॉलिवुड ऐक्टर्स के लिए था। अब इसी पर मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने कहा है कि बीजेपी का दुर्भाग्य है कि उनकी पार्टी में खुरदुरे चेहरे हैं। सज्जन सिंह वर्मा ने बॉलिवुड अदाकारा और बीजेपी सांसद हेमा मालिनी पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ‘’बीजेपी का दुर्भाग्य है कि उनकी पार्टी में खुरदुरे चेहरे हैं, ऐसे चेहरे जिनको लोग नापसंद करते हैं। एक हेमा मालिनी है, उसके जगह-जगह शास्त्रीय नृत्य कराते रहते हैं, वोट कमाने की कोशिश करते हैं। चिकने चेहरे उनके पास नहीं हैं।’’
भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने उनके खिलाफ विवादित बयान देते हुए प्रियंका को मानसिक बीमारी का शिकार बताया और कहा कि प्रियंका को सार्वजनिक जीवन में काम नहीं करना चाहिए। स्वामी ने प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने के फैसले पर कहा कि ‘‘उसको एक बीमारी है जो सार्वजनिक जीवन में अनुकूल और उपयुक्त नहीं है। उस बीमारी को बायपॉलट्री कहते हैं, यानी उसका चरित्र हिंसक है। लोगों को पीटती है। पब्लिक को पता होना चाहिए कि वह कब संतुलन खो बैठेगी, किसी को पता नहीं है।’’ इस तरह की अशोभनीय टिप्पणी करने पर संबंधित महिला के चरित्र का हनन होता हो या नही,ं पर टिप्पणी करने वाले नेता का मानसिक चरित्र जरूर सामने आ जाता है।
कुछ दशक पूर्व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सड़कों की तुलना हेमा मालिनी के गालों से करते हुए कहा था कि ‘‘हम बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गालों की तरह चिकना बना देंगे।’’ तब हेमा मालिनी के गालों जैसी चिकनी सड़कों का उनका जुमला काफी चर्चित हुआ था। फिर इसी जुमले को अप्रैल 2013 में उत्तर प्रदेश के खादी और ग्रामोद्योग मंत्री राजा राम पांडेय ने दोहरा दिया था। पांडेय ने यह विवादित बयान यूपी के प्रतापगढ़ में दिया था। उन्होंने पत्रकारों से कहा था, ’बेला की सड़कें हेमा मालिनी के गालों जैसी चमकेंगी। अभी तो फेशल हो रहा है।’ बेहतर यह हुआ कि सड़कों की तुलना हेमा मालिनी के गालों से करना उन्हें भारी पड़ गया था। इस बयान ने उनकी कुर्सी छीन ली थी।
फूहड़ बयानबाजी का सिलसिला थमा नहीं है। वर्ष 2018 में भी इसी तरह के फूहड़ बयान सुनने को मिले। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में जिस अंदाज में कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी की हंसी की तुलना शूर्पणखा से की और इस पर जिस अंदाज में संसद में बैठे नेताओं ने ठहाके लगाए वह अशोभनीय था। लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव ने राजस्थान चुनाव के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर बहुत ही फूहड़ तंज कसते हुए कहा था, “वसुंधरा को आराम दो, बहुत थक गई हैं, बहुत मोटी हो गई हैं, पहले पतली थीं। हमारे मध्य प्रदेश की बेटी हैं।“ मध्य प्रदेश के गुना से भजापा विधायक पन्नालाल शाक्य ने बहुत ही घटिया बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘‘महिलाएं बांझ रहें, मगर ऐसे बच्चे को जन्म न दें, जो संस्कारी न हो और जो समाज में विकृति पैदा करते हों।’’ उत्तर प्रदेश से भाजपा विधायक विक्रम सैनी ने देश की बढ़ती आबादी के बावजूद हिंदुओं को बच्चे पैदा करते रहने की सलाह दी थी। उन्होंने बड़े शर्मनाक ढंग से अपनी पत्नी के साथ अपनी बातचीत का जिक्र सार्वजनिक तौर पर किया था- “मैंने तो अपनी पत्नी से कह दिया है कि जब तक जनसंख्या नियंत्रण पर कोई कानून नहीं आ जाता, बच्चे पैदा करती रहो।“
भारतीय राजनीति में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी। ऊपर से नीचे तक सड़कछाप भाषा ने अपनी बड़ी जगह बना ली है। राजनीति जिसे देश चलाना है और देश को रास्ता दिखाना है, वह खुद गहरे भटकाव की शिकार है। लोग निरंतर अपने ही बड़बोलेपन से ही मैदान जीतने की जुगत में हैं और उन्हें लगता है कि अभद्र टिप्पणी उन्हें रातों-रात सुर्खियों में बिठा देगी। होता भी यही है। टीवी चैनल्स उन्हें नकारते नहीं वरन् उनकी अभद्र टिप्पणी को ले कर बात पर डिबेट करने लगते हैं। ‘‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ’’ वाली कहावत चरितार्थ होने लगती है। यही तथ्य उकसाता है है ऐसी टिप्पणियां करने को।
डॉ. राममनोहर लोहिया शायद इसीलिए कहते थे “लोकराज लोकलाज से चलता है।” लेकिन ऐसा लगता है कि आज के कतिपय नेताओं की डिक्शनी में ‘‘लोकलाज’’ जैसा शब्द ही नहीं बचा हैं। वहीं पं. दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी पुस्तक ‘‘पॉलिटिकल डायरी’’ में लिखा ऐसे भटके हुए नेताओं के लिए बड़ा अच्छा सुझाव दिया है कि - “कोई बुरा उम्मीदवार केवल इसलिए आपका मत पाने का दावा नहीं कर सकता कि वह किसी अच्छी पार्टी की ओर से खड़ा है। बुरा-बुरा ही है और वह कहीं भी और किसी का भी हित नहीं कर सकता। पार्टी के हाईकमान ने ऐसे व्यक्ति को टिकट देते समय पक्षपात किया होगा या नेकनियती बरतते हुए भी वह निर्णय में भूल कर गया होगा। अतः ऐसी गलती सुधारना उत्तरदायी मतदाता का कर्तव्य है।”
दुर्भाग्य यह कि महिला नेताएं भी पुरुष नेताओं से पीछे नहीं हैं। अभद्र टिप्पणी करते समय वे गोया भूल जाती हैं कि वे भी एक स्त्री हैं। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बड़े गर्व से कहा था कि “क्या आप अपने किसी दोस्त के घर खून से सना हुआ नैपकिन लेकर जाएंगे, नहीं ना! तो भगवान के घर में कैसे जा सकते हैं?“ दरअसल महिला नेताएं भी इस संबंध में कहीं न कहीं दोषी हैं। यदि वे अपने ऊपर की गई अशोभनीय टिप्पणी को राजनीतिक, व्यक्तिगत अथवा किसी भी तरह के दबाव में आ कर टाल जाती हैं और प्रतिरोध नहीं करती हैं तो इससे गलत मानसिकता को बढ़ावा मिलता है। यदि लालू प्रसाद यादव की टिप्पणी पर हेमामालिनी ने कड़ी आपत्ति जताई होती तो उत्तर प्रदेश के मंत्री महोदय उसे दोहराने की जुर्रत नहीं करते। इसी तरह जुलाई 2013 में मंदसौर की एक आमसभा में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने आप को राजनीति का पुराना जौहरी बताते हुए कहा था, ‘’मुझे पता है कि कौन फर्जी है और कौन सही है. इस क्षेत्र की सांसद मीनाक्षी नटराजन सौ टंच माल है।’’ जब बयान को लेकर जब विवाद बढ़ता गया तो पढ़ी-लिखी और स्वयं एक लेखिका होते हुए भी मीनाक्षी नटराजन दिग्विजय सिंह के बचाव में उतर आई थीं। उन्होंने कहा था कि दिग्विजय सिंह ने उनकी तारीफ में ऐसा कहा था, इसलिए इस मामले को तूल दिए जाने की जरूरत नहीं है। भला कोई महिला स्वयं को ‘माल’ शब्द कहे जाने पर कैसे शांत रह सकती है? लेकिन राजनीति की इसी कमजोरी ने बोलों के बिगाड़ को निरंतर बढ़ावा दिया है। यदि नेताओं के बोलों के बिगड़ने की यही गति रही तो कहीं जनता इन्हीं बोलों के आधार पर उन्हें खारिज़ करना न शुरू कर दें।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 30.01.2019)
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Wednesday, December 12, 2018

चर्चा प्लस ...चुनाव-विजेता की याददाश्त और बुंदेलखंड की समस्याएं - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

 चुनाव-विजेता की याददाश्त और बुंदेलखंड की समस्याएं
    - डॉ. शरद सिंह                                      
मतदान हुआ, मतगणना हुई और चुनावों के नतीजे भी आ गए। एक बार फिर सरकार का गठन और मंत्रीमंडल में नए-पुराने चेहरों के गणित। इसके ठीक पहले रिजर्वबैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का इस्तीफा और अर्थशास्त्रियों के माथे पर चिन्ता की लकीरें। इन सबके बीच मध्यप्रदेश के पिछड़े हुए क्षेत्र बुंदेलखंड की समस्याओं का अंबार। कहावत हैं कि चुनावी विजेताओं की याददाश्त कमजोर होती है। चुनावों के दौरान किए गए वादे वे विजय के बाद भूलने लगते हैं। उम्मींद तो यही की जानी चाहिए कि इस बार के विजेताओं की यादाश्त तगड़ी निकले।    
चर्चा प्लस ...चुनाव-विजेता की याददाश्त और बुंदेलखंड की समस्याएं  - डॉ. शरद सिंह   Charcha Plus column of Dr (Miss) Sharad Singh
 बुंदेलखंड में राजनीति की फसल हमेशा लहलहाती रही है। यहां सूखे और भुखमरी पर हमेशा राजनीति गर्म रहती है। कभी सूखा राजनीति का मुद्दा बन जाता है तो कभी पीने का पानी, वाटर ट्रेन और घास की रोटियां। इस राजनीति में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ सभी पार्टियों के नेता कूद पड़ते हैं। यह बात अलग है कि बुंदेलखंड के लोगों को सूखे और भूखमरी से भले कोई राहत न मिली हो लेकिन इन मुद्दों पर राजनीति खूब होती है। चुनाव जीतने के लिए भले ही जातीय समीकरण फिट किए जा रहे हों, लेकिन जनसभाओं में सभी नेता इन मुद्दों को हवा देते रहते हैं। 
बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। यहां से खबरें आई कि लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे है। एनबीटी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। सरकार ने इसे नकारा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर अपनी टीम मौके पर जांच के लिए भेजी। उस टीम को लोगों ने घास की रोटियां दिखाईं और बताया कि इनको ही खाकर वे जिंदा रहते हैं। मध्य प्रदेश में वर्ष 2017 में 760 किसान और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की. विधानसभा में जुलाई, 2017 में मध्यप्रदेश सरकार ने बताया था कि राज्य में सात माह में खेती से जुड़े कुल 599 लोगों ने खुदकुशी की, जिनमें 46 बुंदेलखंड से थे।
बुंदेलखंड को सन् 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। यहां के किसान लगातार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। लगभग 80 प्रतिशत किसान साहूकारों और बैंको के कर्जे में डूबे हैं। ओलावृष्टि के दौरान तो सैकड़ों किसानों ने आत्महत्याएं तक कर लीं। इन आत्महत्याओं की वजह से ही बुंदेलखंड देश भर में सुर्खियों में रहा। अब भी हर साल यहां से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं। नदियों और प्राकृतिक वॉटरफॉल वाले इस क्षेत्र में मैनेजमेंट न होने के कारण लोग बूंद-बूद पानी के लिए तरसते रहते हैं। पिछले साल 2016 में यहां पीने के पानी की ऐसी समस्या हुई कि केंद्र सरकार को ‘‘वाटर ट्रेन’’ भेजनी पड़ी। यद्यपिइ स पर खूब राजनीति हुई। कई गांव ऐसे हैं जहां 10 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है।
अवैध खनन के कारण भी बुंदेलखंड हमेशा चर्चा में रहा है। हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये का अवैध खनन होता है। अवैध खनन के लिए खनन माफिया ने कुछ नदियों तक का रुख ही मोड़ दिया। प्रकृतिविद् मानते हैं कि बुंदेलखंड में अकाल जैसे हालात की असल कारण खनन है। जलपुरुष राजेंद्र सिंह कहते हैं- ‘‘नदियों की कोख चीरकर खनन हो रहा है। नदियां गड्ढों में तब्दील हो गई हैं। किसी भी नदी में मौरंग और बालू उसका जीवन होते हैं। जब इन्हें अंधाधुंध निकाला जाएगा तो नदियां कैसे रहेंगी? वह कहते हैं, नदियों का जीवन खत्म होने का मतलब भूजल समाप्त हो जाना है। आज यही सब हो रहा है, यही वजह है कि प्राकृतिक रूप से बने झील और तालाब भी सूख जाते हैं। बोरिंग करके पानी निकालना मुश्किल काम है क्योंकि यहां पानी बहुत नीचे चला गया है। कोई बोरिंग कराए भी तो वह साल-डेढ़ साल से ज्यादा नहीं टिकती। राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अंधाधुंध खनन पर रोक लगनी चाहिए।’’
 बुंदेलखंड में खनिज भरा पड़ा है, लेकिन उससे जुड़े उद्योग नहीं हैं। ग्रेनाइट, पाइरोफाइलाइट, सिल्का सेंट, फर्शी पत्थर, बॉक्साइट, लौह अयस्क सहित कई तरह के खनिज होते हैं लेकिन उद्योग न के बराबर हैं। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण लोग पलायन कर रहे हैं। पलायन इस क्षेत्र के लिए एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। जानकारों के मुताबिक 10 साल मे करीब 50 लाख लोग पलायन कर चुके हैं। किसानों ने खेती छोड़ दी है और बाहर मजदूरी कर रहे हैं। पर्यटन के लिहाज से बुंदेलखंड में चित्रकूट सहित कई जगहों का धार्मिक महत्व है। इसके अलावा जंगल, झीलें, नदियां, वाटर फॉल, किले सहित कई दर्शनीय स्थल हैं। लेकिन रखरखाव और आवागमन के साधन न होने की वजह से सभी बदहाल हैं।
बुंदेलखंड में भी पिछले दशकों में पुरुषां की अपेक्षा स्त्रियों का अनुपात तेजी से घटा और इसके लिए कम से कम सरकारें तो कदापि जिम्मेदार नहीं हैं। यदि कोई जिम्मेदार है तो वह परम्परागत सोच कि बेटे से वंश चलता है या फिर बेटी पैदा होगी तो उसके लिए दहेज जुटाना पड़ेगा। बुंदेलखंड में औरतों को आज भी पूरी तरह से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। गांव और शहरी क्षेत्र, दोनों स्थानों में जिन तबकों में शिक्षा का प्रसार न्यूनतम है, ऐसे लगभग प्रत्येक परिवार की एक ही कथा है कि आमदनी कम और खाने वाले अधिक। आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को शिक्षा के बदले काम में लगा देना इस प्रकार के अधिकांश व्यक्ति अकुशल श्रमिक के रूप में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। ठीक यही स्थिति इस प्रकार के समुदाय की औरतों की रहती है। ऐसे परिवारों की बालिकाएं अपने छोटे भाई-बहनों को सम्हालने और अर्थोपार्जन के छोटे-मोटे तरीकों में गुज़ार देती हैं। इन्हें शिक्षित किए जाने के संबंध में इनके माता-पिता में रुझान रहता ही नहीं है। ‘लड़की को पढ़ा कर क्या करना है?’ जैसा विचार इस निम्न आर्थिक वर्ग पर भी प्रभावी रहता है। इस वर्ग में बालिकाओं का जल्दी से जल्दी विवाह कर देना उचित माना जाता है। ‘आयु अधिक हो जाने पर अच्छे लड़के नहीं मिलेंगे’, जैसे विचार अवयस्क विवाह के कारण बनते हैं। छोटी आयु में घर-गृहस्थी में जुट जाने के बाद शिक्षित होने का अवसर ही नहीं रहता है। 
अन्य प्रदेशों की भांति बुंदेलखंड में भी ओडीसा तथा आदिवासी अंचलों से अनेक लड़कियां  को विवाह करके लाया जाता हैं। यह विवाह सामान्य विवाह नहीं है। ये अत्यंत ग़रीब घर की लड़कियां होती हैं जिनके घर में दो-दो, तीन-तीन दिन चूल्हा नहीं जलता है, ये उन घरों की लड़कियां हैं जिनके मां-बाप के पास इतनी सामर्थ नहीं है कि वे अपनी बेटी का विवाह कर सकें, ये उन परिवारों की लड़कियां हैं जहां उनके परिवारजन उनसे न केवल छुटकारा पाना चाहते हैं वरन् छुटकारा पाने के साथ ही आर्थिक लाभ कमाना चाहते हैं। ये ग़रीब लड़कियां कहीं संतान प्राप्ति के उद्देश्य से लाई जा रही हैं तो कहीं मुफ़्त की नौकरानी पाने की लालच में खरीदी जा रही हैं। इनके खरीददारों पर उंगली उठाना कठिन है क्योंकि वे इन लड़कियों को ब्याह कर ला रहे हैं। इस मसले पर चर्चा करने पर अकसर यही सुनने को मिलता है कि क्षेत्र में पुरुष और स्त्रियों का अनुपात बिगड़ गया है। लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों की कमी हो गई है। बुंदेलखंड में किए गए लगभग सभी आंदोलनों एवं विकास की तमाम मांगों के बीच स्त्रियों के लिए अलग से कभी कोई मुद्दा नहीं उठाया गया जिससे विकास की वास्तविक जमीन तैयार हो सके। यदि परिवार की स्त्री पढ़ी-लिखी होगी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होगी तो वह अपने बच्चों के उचित विकास के द्वारा आने वाली पीढ़ी को एक विकसित दृष्टिकोण दे सकेगी। इसी विचार के साथ ‘बेटी बचाओ’ और ‘बालिका शिक्षा’, ‘जननी सुरक्षा’ जैसे सरकारी अभियान चलाए जा रहे हैं। बस, आवश्यकता है इन अभियानों से ईमानदारी से जुड़ने की। 
बुंदेलखंड एक ऐसा भू-भाग है जिसका गौरवशाली इतिहास है। यहां के लोग आक्रमणकारियों के आगे कभी नहीं झुके। स्वतंत्रता आंदोलन में भी कंधे से कंधा मिला कर योगदान दिया और अपने प्राणों की बलि दी। यह कहा जाता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में सिर्फ़ इसीलिए बुंदेलखंड को विकास की सुविधाओं से वंचित रखा गया जिससे यहां के लोग ब्रिटिश हुकूमत का प्रतिरोध करने के लिए संसाधन न जुटा सकें। देश गुलामी से स्वतंत्र हुआ, अंग्रेज भारत छोड़ कर चले गए किन्तु दुर्भाग्यवश बुंदेलखंड में विकास की गति कछुआ चाल ही रही। आज भी यह इलाका रेल यातायात की समुचित जुड़ाव के लिए तरस रहा है। आज देश की आर्थिक दशा अनेक उतार-चढ़ाव से गुज़र रही है। ऐसे में बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र का ध्यान रखा जलाना और अधिक जरूरी है। क्यों कि कमजोर ही पहले टूटता है और जो टूटा हुआ ही हो उसे सम्हालना और अधिक चुनौती भरा काम है। आज के तकनीकी विकास के आगे यहां की भौगोलिक कठिनाइयों का बहान नहीं किया जा सकता है। यदि कहीं कोई कमी दिखाई देती है तो बुंदेलखंड के विकास की दृढ़ इच्छाशक्ति की। जिन चुनावी विजेताओं ने चुनाव के दौरान अपनी इच्छाशक्ति का दम भरा था, आशा की जानी चाहिए कि वे अपने वादों को भुलाएंगे नहीं और बुंदेलखंड के पक्ष में एक स्वर्णिम अध्याय लिखेंगे।    
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 12.12.2018)
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Thursday, November 22, 2018

चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं
- डॉ. शरद सिंह 

बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही ह
ैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
चुनावों की टिकट वितरण के पूर्व मैंने अपने इसी कॉलम में विगत 08 अगस्त 2018 को लिखा था -‘‘चुनावों के निकट आते ही सबसे पहले प्रश्न उठते हैं, किसको टिकट मिलेगी और किसको नहीं? कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? लेकिन क्या महिला उम्मीदवारों के आंकड़े बढ़ने से ही राजनीति में महिलाओं की पकड़ बढ़ जाएगी? सच तो यह है कि चुनाव निकट आते ही महिलाओं की तरफ़दारी करने वाले बयानों की बाढ़ आ जाती है किन्तु चुनाव होते ही किए गए वादे ठंडे बस्तों में बंधने लगते हैं, विशेषरूप से राजनीति में महिलाओं के प्रतिशत को ले कर। बुंदेलखंड के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत ही विचित्र स्थिति दिखाई देती है। बुंदेलखंड जो दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है, दोनों की एक साथ बात की जाए तो आंकड़ों के अनुसार राजनीति में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर दिखाई देती है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों के परिदृश्य से अलग ही तस्वीर दिखाती है। .... इस बार आमसभा चुनावों में कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? यह एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर सूची जारी होने पर ही मिलेगा।’’
जब टिकटों की घोषणा हुई तो यह देख कर अत्यंत निराशा हुई कि किसी भी राजनीतिक दल ने महिला उम्मींदवारों पर विश्वास नहीं किया। उनकी संख्या आश्चर्यजनक आंकड़ों तक सीमित है। अतीत में झांक कर देखें तो 1957 से लेकर 2012 तक हुए पन्द्रह विधान सभा चुनावों में बुंदेलखण्ड के उत्तरप्रदेश वाले भाग में से लगभग 15 महिलाएं विधायक रही हैं। इनमें भी 11 दलित वर्ग से, 3 पिछड़े वर्ग से और एक सामान्य वर्ग से। यह आंकड़ा उस प्रदेश के बुंदेली भू-भाग का है जहां की मायावती के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री के पद पर रह चुकी है और साबित कर चुकी है कि महिलाएं राजनीति में अपना सिकका जमा सकती हैं। सन् 1957 में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस की बेनीबाई झांसी जिले की मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित) सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में अपनी आमद दर्ज कराई थी। इसके बाद 1962 में इसी दल की सियादुलारी ने बांदा जिले की मऊ-मानिकपुर (अब चित्रकूट जिला) सीट से और बेनीबाई दोबारा मऊरानीपुर से विधायक बनी थीं। सन् 1967 में बेनीबाई तीसरी बार चुनी गईं और 1969 के चुनाव में कांग्रेस की ही सियादुलारी दोबारा अपनी सीट से विधायक चुनी गईं.। 1974 के चुनाव में जहां बेनीबाई चौथी बार चुनाव जीतीं। वहीं जेपी आंदोलन के चलते उन्हें 1977 में हार का सामना भी करना पड़ा। वर्ष 1980 के चुनाव में बेनीबाई झांसी की बबीना सीट से जीत दर्ज की और छठीं बार वह इसी सीट से 1985 के चुनाव में विधायक बनीं। इस प्रकार कांग्रेस के टिकट पर वह छह बार विधायक बनीं। वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सियादुलारी मऊ-मानिकपुर सीट से तीसरी बार विधायक चुनी गईं। साल 2002 के चुनाव में अंब्रेस कुमारी समाजवादी पार्टी के टिकट पर महोबा जिले की चरखारी सुरक्षित सीट से विधायक चुनी गईं थी और 2012 के चुनाव में झांसी के मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति सुरक्षित) सीट से सपा की डॉ. रश्मि आर्या चुनी गईं थी। वर्ष 1977 में जेएनपी के टिकट पर सूर्यमुखी शर्मा झांसी सीट से चुनाव जीता था और 2012 के चुनाव में भाजपा की उमा भारती चरखारी सीट और हमीरपुर सीट से भाजपा की ही साध्वी निरंजन ज्योति ने चुनाव जीता था। वर्ष 2015 में चरखारी सीट में हुए उप चुनाव में सपा की उर्मिला राजपूत ने जीत हासिल कर के अपने राजनीतिक दखल को साबित किया था। ये आंकड़े और इतिहास था बुंदेलखण्ड के उत्तर प्रदेश के भू-भाग का। मध्यप्रदेश के बुंदेली भू-भाग की दशा इससे अलग नहीं है।
बुंदेलखंड के संदर्भ में कहा जाता है कि मंच पर महिलाओं को लुभाने की बातें करना, योजनाएं बनाना अलग बात है और चुनाव जीतकर सत्ता पाना अलग। महिलाओं को पर्याप्त संख्या में चुनाव में उम्मीदवार न बनाया जाना अपने आप में राजनीतिक दलों के महिला हितों के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगता है। मध्यप्रदेश में भी टीकमगढ़ ऐसा क्षेत्र है जहां से उमा भारती के रूप में महिला मुख्यमंत्री प्रदेश को मिली। उनका अल्पकालिक कार्यकाल भी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनके कार्यकाल में ‘पंचज’ योजना (जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर) पर ध्यान दिया गया। इसके बावजूद किसी भी राजनीतिक दल ने राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विधानसभा चुनावों में महिला उम्मींदवार नहीं बढ़ाए। वर्तमान में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और चंबल संभाग में दतिया एवं शिवपुरी की 30 विधानसभा सीटों में से भाजपा के पास 22 और कांग्रेस के पास आठ सीटें हैं।
पिछले चुनाव में पन्ना से कुसुम सिंह मेहदेले चुनाव जीतीं और मंत्री पद भी उन्हें प्रदान किया गया। जहां तक बुंदेलखण्ड के मध्यप्रदेशीय सम्भागीय मुख्यालय सागर का प्रश्न है तो यहां का इतिहास महिलाओं की दृष्टि से गौरवपूर्ण रहा है। केंद्र में बनीं अंतरिम सरकार में सागर की विदुषी कलावती दीक्षित को सदस्य मनोनीत किया गया था। केंद्र की अंतरिम सरकार में सागर सपूत डा. हरीसिंह गौर सदस्य थे। 25 दिसंबर 1948 को उनके आकस्मिक निधन के बाद कलावती दीक्षित को संविद सरकार में सदस्य बनाया गया था। इस तरह सागर से सांसद बनने वाली वे पहली महिला थीं। इसके बाद गोवा क्रांति में गोली खाकर भी तिरंगा थामने वाली सहोद्राबाई राय सागर से 1957 में पहली बार सांसद बनीं। वे सागर से तीन बार सांसद चुनी गईं। बुंदेलखंड से उमा भारती ने 2003 में मुख्यमंत्री का पद संभाला। वे इस क्षेत्र से मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने वाली पहली महिला थीं। 1993 में सागर से सुधा जैन विधायक निर्वाचित हुईं। वे भी 1998 और 2003 में लगातार सागर से विधायक चुनी गईं।
विगत चुनाव में भाजपा टिकट से पारुल साहू ने सुरखी विधान सभा से चुनाव जीता था किन्तु इस बार उन्होंने स्वयं ही चुनाव न लड़ने का फैसला किया। सवाल इस बात का नहीं है वे किस पार्टी से संबंद्ध हैं, सवाल यह है कि एक तो महिलाओं को राजनीति में यूं भी कम स्थान दिया जाता है उस पर एक सुशिक्षित, कर्मठ महिला का चुनाव से पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। पिछले चुनाव में पृथ्वीपुर विधान सभा की अनितानायक चुनाव जीत कर विधायक बनीं। छतरपुर की ललिता यादव को इस बार उनका पिछला क्षेत्र बदल कर बड़ामलहरा क्षेत्र दे दिया गया। ज़मीनी तौर पर देखा जाए तो अकेले सागर में कई ऐसी महिलाएं हैं जो विभिन्न दलों में रहती हुई निरंतर सक्रिय रहती हैं फिर भी टिकट के समय उन्हें समीकरण से बाहर ही रखा गया। रेखा चौधरी, इन्दु चौधरी, लता वानखेड़े, शारदा खटीक, कुसुम सुरभि, रंजीता राणा आदि ऐसी कई महिलाएं हैं जिनकी राजनीतिक सक्रियता अख़बारों की सुर्खियों में रहती है और इनमें से कुछ तो राजनीतिक परिवारों से भी हैं। राजनीतिकदल चाहते तो इन महिलाओं को ले कर भी चुनावी समर लड़ सकते थे, क्यों कि जीत का शत प्रतिशत दावा तो कोई भी उम्मीदवार नहीं कर सकता है। यही तो लोकतंत्र की विशेषता है।
चुनाव आते ही स्टारप्रचारक और राष्ट्रीय स्तर के नेता बड़ी-बड़ी बातें ले कर हाजिर होने लगते हैं। फिर बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही हैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 21.11.2018)

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