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Friday, April 4, 2025

शून्यकाल | स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर


दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम -
शून्यकाल
स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

     ‘देवी’ का अर्थ है निर्भयता और शक्ति। नवरात्रि वह काल खण्ड है जिसमें देवी के प्रतीक को स्थापित कर के शक्ति की उपासना का अनुष्ठान किया जाता है और देवी के रूप में शक्तिसम्पन्न निर्भय स्त्री की कल्पना को साकार किया जाता है। नवरात्रि में देवी भगवती के नौ रूपों में नौ शक्तियों की पूजा की जाती हैं। यह नौ शक्तियां स्त्रीशक्तियां ही तो हैं। निर्भय स्त्री ही देवी है, जो असुरों का संहार करने, जो देवताओं और सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने की क्षमता रखती है। जो जगत् की जननी है, मां है, वही शक्ति है। इसीलिए इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।


सम्मान किया जाता है। उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिया जाता था। पौराणि ग्रंथों में ऋषितुल्य विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। किन्तु हमारे अतीत में वह काला समय आया जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। विदेशी हमलावरों ने भारतीय पुरुषों को भ्रमित कर के स्त्री सम्मान के मायने ही बदलवा दिए। उन्होंने यह मस्तिष्क में बिठा दिया कि यदि स्त्री को परपुरुष स्पर्श भी कर ले तो उसे आत्मदाह कर लेना चाहिए। इससे भी आगे बढ़ कर एक पाठ और पढ़ाया कि परपुरुष की कुदृष्टि मात्र से बचने के लिए स्त्रियों को तलवार नहीं उठानी चाहिए बल्कि जौहर कर लेना चाहिए। दुर्भाग्य यह कि मातृशक्ति को देवी के रूप् में पूजने वाला पुरुष समाज इस तरह के पाठों को आत्मसात करता चला गया और स्वयं स्त्री समाज आत्महत्या में अपने सम्मान का प्रतिबिम्ब देखने लगी। लेकिन कहा जाता है न कि बुराई के पैर भले ही मजबूत दिखाई दें लेकिन होते कमजोर ही हैं और जल्दी थक जाते हैं। इन बुराइयों के पैर कई दशक बाद थके लेकिन अंततः थक कर चूर-चूर हो गए। जौहर और सती प्रथा बंद हुई। लेकिन इन काले दशकों ने स्त्रियों को शिक्षा, निर्णय लेने के अधिकार, कोख पर अधिकार और यहां तक कि खुली हवा से भी वंचित कर दिया। विचित्रता यह कि जब स्त्रियां दलित बनाई जा रही थीं, उस दौरान भी देवियां पूज्य रहीं। काल्पनिक शक्ति के सामने समाज ने सिर झुकाया किन्तु प्रत्यक्ष शक्ति को लम्बे समय तक अनदेखा किया। इतना अधिक अनदेखा किया कि आज भी समाज स्त्रीशक्ति को पूरी तरह से नहीं देख पा रहा है। शायद इसीलिए नवरात्रि के रूप में देवी के नौ रूपों वाली नौ शक्तियां प्रति वर्ष दो बार समाज के सामने आती हैं ताकि समाज स्त्रीशक्ति को पहचाने और उसे अपना सहभागी बनाए। नवरात्रि तो यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। यह उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान व अपनी शक्ति का स्मरण दिलाता है, साथ ही सकल समाज को नारी शक्ति का सम्मान करन के लिए प्रेरित करता है।

मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है। मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
यह भी सच है कि आज स्त्रियों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। दरअसल, स्त्रियों के प्रति संवेदनाओं में विस्तार होना चाहिए। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का सम्मान किया जाना जरूरी है। घर में मौजूद स्त्रियां अर्थात् माता, पत्नी, बेटी, बहन में नौ दुर्गा के गुण होते हैं जिन्हें स्वीकार कर के सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
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Wednesday, April 2, 2025

चर्चा प्लस | पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस (सागर दिनकर में प्रकाशित)
    पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का
       - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह  
         नवरात्रि देवी स्तुति के रूप में स्त्री शक्ति के जागरण का त्योहार है। नवरात्रि के दौरान इस बात का स्मरण किया जाता है कि जिस प्रकार देवी दुर्गा ने असुरों का वध किया और जगत के पालन के लिए विविध रूपों में प्रकट हुईं, ठीक उसी प्रकार स्त्री को भी अपनी शक्ति एवं दायित्वों को पहचानना, परखा और अमल में लाना चाहिए। यदि स्त्री स्वयं को शक्ति स्वरूपा मान कर आत्मबल से काम ले तो वह कभी अबला हो ही नहीं सकती है। यही संदेश निहित है इस पूरे नौदिवसीय त्योहार में। इसीलिए कहा गया है- ‘‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!’’    
       जब व्यक्ति दुख से ग्रस्त होता है तो उसे आत्मबल की आवश्यकता होती है और जब प्रत्यक्ष आत्मबल नहीं मिल पाता है तो अप्रत्यक्ष अर्थात दैवीय शक्ति के प्रति उसकी आस्था उसे आत्मबल प्रदान करती है। व्यक्ति यही सोचता है कि उसकी सहायता कोई करे या न करे, पर ईश्वर उसकी मदद करेगा। यही विचार उसे आत्मबल से भर देता है। इसके बाद निराशा से उबरा हुआ व्यक्ति अपने लिए सुगमता से सही मार्ग ढूंढ लेता है। स्त्रियां स्वयं को अबला, असहाय, अशक्त मान कर स्वयं को तुच्छ प्राणी न समझती रहें, इसीलिए नवरात्रि का त्योहार उन्हें विशेष आत्मबल प्रदान करता है। एक स्त्री भी शक्ति स्वरूपा हो सकती है यदि वह असुरों का डट कर मुकाबला करे और उनका दमन करने की ठान ले। वर्तमान समाज में असुर आचरण करने वाले वे सभी हैं जो स्त्रियों का मा सम्मान नहीं करते हैं तथा उन्हें मात्र उपभोग की वस्तु समझते हैं। किन्तु इसके लिए आवश्यकता है देवी दुर्गा के स्वरूपों को समझने की। 

चैत्र नवरात्रि हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। ये नौ दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना के लिए समर्पित हैं। यह चैत्र मास में मनाया जाता है। वैसे दो नवरात्रियों का सर्वाधिक महत्व है- शारदीय नवरात्रि तथा चैत्र नवरात्रि। अन्यथा, वर्ष में अन्य नवरात्रियों भी मनाई जाती हैं। तिथियों के अनुरूप वर्ष में पांच नवरात्रि होती हैं- शरदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, आषाढ़ नवरात्रि, पौष नवरात्रि और माघ नवरात्रि। इनमें से प्रत्येक नवरात्रि का अपना विशिष्ट महत्त्व है।
नवरात्रि में देवी दुर्गा के अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। लेकिन इन नवरात्रि के पीछे की एक पौराणिक कथा भी है। दरअसल पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीनकाल में महिषासुर नाम का एक दानव हुआ करता था। उसने कठोर तपस्या से ब्रम्हा जी को प्रसन्न कर लिया। ब्रम्हा ने प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा। तब महिषासुर ने भगवान ब्रम्हा से अमर होने का वरदान मांगा। ब्रम्हा ने कहा कि अमर होने का वरदान नहीं दिया जा सकता। तब उसने ब्रम्हा से यह वरदान मांगा कि कोई पुरुष या देव अथवा दानव  उसे न मार सके। ब्रम्हा ने उसे वरदान दे दिया कि तीनों लोकों में कोई पुरुष, देव अथवा दानव उसे नहीं मार सकता है। यह वरदान पाने के बाद महिषासुर निद्र्वन्द्व हो गया। उसके अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ने लगे। उसे यह विश्वास हो चला था कि ब्रम्हा के वरदान के बाद अब वह अमर हो चला है। अब उसे कोई नहीं मार सकता है। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अपनी सत्ता स्थापित करने की योजना बनाई और देवलोक पर आक्रमण कर दिया। इस बात से घबराकर सभी देवता ब्रम्हा, विष्णु और महेश की शरण में गए। किन्तु त्रिदेव भी ब्रह्मा द्वारा दिए गए वरदान के समक्ष वे विवश थे। तब त्रिदेवों ने देवी दुर्गा से प्रार्थना की कि वे अपनी शक्ति का प्रयोग करें और महिषासुर का वध कर के ऋषियों एवं देवताओं की रक्षा करें। तब देवी दुर्गा आदिशक्ति के रूप में प्रकट हुई। नौ दिनों तक महिषासुर दानव और देवी दुर्गा के बीच में घमासान युद्ध चला। दसवें दिन मां दुर्गा ने दुष्ट दानव महिषासुर का अंत कर दिया। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। 

   इस त्यौहार की समाप्ति नौवें दिन होती है, ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम का जन्म हुआ था। अतः श्रीरामनवमी भी मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि के साथ ही हिन्दू नववर्ष का आरम्भ भी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि ग्राष्मकाल के आगमन का प्रतीक है। ऋतु परिवर्तन के साथ ही फसल के चक्र में भी परिवर्तन होता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। माता के भक्त सभी नौ दिनों ओर व्रत आदि रखते हैं। ये नौ दिन घरों में व्रत पूजा को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। नवरात्रि में साबूदाना खिचड़ी, कूटू के आटे की पूरी और सिंघाड़े की पूरी आदि बनाई जाती हैं।
प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग रूप की पूजा की जाती है। पहला दिन शैलपुत्री को समर्पित है, दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी को, तीसरा दिन चंद्रघंटा को, चैथा दिन कुष्मांडा को, पांचवां दिन स्कंदमाता को, छठा दिन कात्यायनी को, सातवां दिन कालरात्रि को, आठवां दिन महागौरी को और नौवां दिन सिद्धिदात्री को।

1. शैलपुत्री - देवी दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री या शैलजा के नाम से जाना जाता है। शैल का अर्थ है पर्वत और यह रूप पर्वत की पुत्री या देवी पार्वती को संदर्भित करता है जो राजा हिमवत अर्थात हिमालय पर्वत की पुत्री थीं। देवी पार्वती को देवी सती का पुनर्जन्म माना जाता है और उन्हें दो हाथों और माथे पर अर्धचंद्र के साथ एक स्त्री रूप में दर्शाया जाता है। वे अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं। उन्हें अपने वाहन या नंदी बैल की सवारी के साथ दर्शाया जाता है।
2. ब्रह्मचारिणी - ब्रह्मचारिणी या देवी दुर्गा के महिला तपस्वी रूप की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। उन्हें एक ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में दर्शाया जाता है जो अपने दाहिने हाथ में सूखे रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं।
3. चंद्रघंटा - तीसरे दिन पूजा जाने वाली दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा है। उनके माथे पर घंटी के आकार का एक अर्धचंद्र है जिसके कारण उनका नाम चंद्रघंटा भी पड़ा। देवी को उनकी तीसरी आंख खुली हुई अवस्था में दिखाई जाती हैं और वे सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार रहती हैं। उन्हें रणचंडी के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस योद्धा रूप में उनके 10 हाथ होते हैं जिनमें से दो में त्रिशूल, गदा, धनुष और बाण, खड्ग, कमल, घंटा और कमंडल हैं, उनका एक हाथ हमेशा आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा में रहता है जो भय को दूर करता है। 
4. कुष्मांडा - नवरात्रि के चैथे दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का चैथा रूप कुष्मांडा है। कुष्मांडा नाम को कु, ऊष्मा और अंड में विभाजित किया जा सकता है, जहां ‘‘कु’’ का अर्थ है थोड़ा, ऊष्मा का अर्थ है गर्मी या ऊर्जा और अंड का अर्थ है ब्रह्मांड। देवी दुर्गा के इस रूप को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें आदि शक्ति के नाम से भी जाना जाता है जिन्हें ब्रह्मांड के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। वे अपने वाहन के रूप में सिंह पर सवार दिखाई देती हैं।
5. स्कंदमाता - स्कंदमाता देवी दुर्गा का पांचवां रूप है और नवरात्रि के पांचवें दिन इनकी पूजा की जाती है, देवी के इस रूप को कार्तिकेय को गोद में लिए हुए एक मातृ देवी के रूप में दर्शाया गया है। उल्लेखनीय है कि कार्तिकेय को स्कंद के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं, तीन आँखों और शेर पर सवार एक महिला देवता के रूप में दर्शाया जाता है। देवी की चार भुजाओं में से दो में कमल है जबकि अन्य दो में से एक में कार्तिकेय और दूसरे हाथ में आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा है। 
6. कात्यायनी - कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है और नवरात्रि के छठे दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें देवी महादेवी या दुर्गा के योद्धा रूप के रूप में दर्शाया जाता है। दुर्गा के अन्य दो उग्र रूप भद्रकाली और चंडिका हैं। देवी दुर्गा के इस रूप को अठारह भुजाओं और देवताओं द्वारा उपहार में दिए गए विभिन्न हथियारों के साथ शेर पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उन्हें ऋषि कात्यायन के नाम पर कात्यायनी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने देवी दुर्गा की तपस्या की और उन्हें वरदान के रूप में अपनी बेटी के रूप में जन्म लेने के लिए कहा। अर्थात ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायिनी।
7. कालरात्रि - कालरात्रि सातवां रूप हैं। नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह देवी दुर्गा के सबसे रौद्र रूपों में से एक हैं। वे अंधकार और अज्ञान का नाश करने वाली हैं और उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है, उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो आशीर्वाद और सुरक्षा की मुद्रा में हैं जबकि अन्य दो में तलवार और वज्र रहता है। उन्हें काली के नाम से भी जाना जाता है।
8. महागौरी - महागौरी देवी दुर्गा का आठवां रूप हैं और नवरात्रि के आठवें दिन इस रूप की पूजा की जाती है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जिनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू रहता है। अन्य दो भुजाएँ आशीर्वाद और भय को दूर करने के लिए होते हैं जिन्हें क्रमशः वरद और अभय मुद्रा के रूप में भी जाना जाता है। वे एक बैल या सफेद हाथी पर सवार होती हैं।
9. सिद्धिदात्रि - देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप सिद्धिदात्रि है और नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें सभी सिद्धियों की प्रदाता माना जाता है। देवी के इस रूप को कमल पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने चार हाथों में कमल, शंख, गदा और चक्र धारण किए हुए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे महाशक्ति या सर्वोच्च देवी का अवतार हैं, जिन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया और शिव ने देवी सिद्धिदात्रि की पूजा करके सभी सिद्धियाँ प्राप्त कीं थीं।

  इस प्रकार देवी के नौ रूपों में मौजूद नौ शक्तियों के स्मरण कात्योहार नवरात्रि। देवी दुर्गा की प्रतिमा में चार अथवा आठ या फिर इससे भी अधिक हाथ बनाए जाते हैं। इन सभी हाथों में विविध आयुध होते हैं। यह मां दुर्गा का शक्तिपुंज स्वरूप होता है। इसकी यदि आज के आधुनिक प्रसंग के रूप में व्याख्या की जाए तो दुर्गा के इस श्ीक्ति पुंज रूप का अरशय है कि बुराई के विरुद्ध विभिन्न स्त्रियों एकजुट हो कर शंखनाद करें और बुराई के शमन का प्रयास करें तो वे अपनी शक्तियों से किसी भी अपराधी को पराजित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, एक स्त्री सड़क पर जा रही है। कोई उद्दण्ड व्यक्ति उसका दुपट्टा या साड़ी का पल्लू खींचता है तो उस स्त्री को डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे जोर से चिल्लाना चाहिए। उसकी पुकार को सुन कर अन्य स्त्रियों को उसकी मदद के लिए आगे बढ़ना चाहिए और फिर सब मिल कर उस मनचले को सबक सिखा दें तो फिर कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकेगा। लेकिन एक दृश्य यदाकदा ही दिखता है कि जब महिलाएं अपनी शक्ति को पहचान कर, एक जुट हो कर अपने विरुद्ध उठाए गए हर कदम का विरोध करती हों। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौरूपों का स्मरण करने मात्र से संकट दूर होने की आकांक्षा रखने की बजाए उन नौ रूपों से सीख ले कर अपना आत्मबल बढ़ाना ही इस त्योहार की सार्थकता है।  इस त्योहार को यदि आडंबर की दृष्टि से न देख कर इन शक्तियों को सहज भाव से आत्मसात करने की दृष्टि से देखा जाए तो अनुभव होगा कि ये शक्तियों मनुष्य के भीतर आत्मबल के रूप में उपस्थित रहती हैं। इसी सत्य का स्मरण कराता है यह त्योहार।  
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Wednesday, March 22, 2023

नवरात्रि, गुड़ी पड़वा एवं नववर्ष विक्रम संवत की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रों, माता के नौ रूप और नवसंवत्सर आप सभी को शुभफलदायी हों 🙏🚩💐🌷
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Wednesday, September 28, 2022

चर्चा प्लस | ज़रा सोचिए नवरात्रि के इन नौ दिनों में ! | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
ज़रा सोचिए नवरात्रि के इन नौ दिनों में !
            - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
   नवरात्रि आरम्भ अर्थात् देवी मां के नौ रूपों के नौ दिन। इन नौ दिनों में धर्मपरायण स्त्रियां अपनी भक्ति भावना के चर्मोत्कर्ष पर जा पहुंचती हैं। व्रत, उपवास और मनौतियों की पूर्ति में कोई कसर नहीं रहती है। देवी मां सभी हिन्दू स्त्रियों के लिए मानसिक संबल हैं। पूज्या हैं। किन्तु क्या इन नौ दिनों कोई भी स्त्री देवी मां के सम्मुख जाने से पहले या सामने पहुंच कर आत्ममंथन करती है कि उसने अपने स्त्री समुदाय के लिए क्या अच्छा कार्य  किया? यह प्रश्न मात्र स्त्रियों के लिए ही नहीं उन पुरुषों के लिए भी है जो सम्पूर्ण निष्ठा के साथ देवी मां की आराधना करते हैं। इसका उत्तर ढूंढे बिना क्या देवी मां से अपनी प्रार्थना स्वीकार किए जाने की उम्मीद हमें रखना चाहिए? ज़रा सोचिए!
नवशक्तिभिः संयुक्तं, नवरात्रं तदुच्यते ।
एकैवदेव देवेशि, नवधा परितिष्ठिता । ।
-अर्थात नवरात्रि नौ शक्तियों से संयुक्त है। ये आदिशक्ति के नौ रूपों की पूजा के नौ दिवस होते हैं। आदिशंकराचार्य ने यह श्लोक ’सौन्दर्य लहरी’ में लिखा है।
        नवरात्र का पहला दिन घटस्थापना से आरम्भ होता है और इस प्रथम दिवस में मां दुर्गा के प्रथम रूप शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। शैल अर्थात पर्वत। पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण देवी को शैलपुत्री कहा गया।
वन्दे वांछितलाभाय, चंद्रार्धकृतशेखरां।
वृषारूढां शूलधरां, शैलपुत्रीं यशस्विनीं।।
- अर्थात अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृष पर सवार रहने वाली, शूलधारिणी और यशस्विनी मां शैलपुत्री के प्रति मेरी वंदना है जो मुझे मनोवांछित लाभ प्रदान करे। क्या मनोवंाछित लाभ एक क्रूर ससुराली बन कर दहेज प्राप्त करना है? क्या मनोवांछित लाभ गलत तरीके से धन कमाने के लिए अपने परिजन को उकसाना करना है? क्या किसी योग्य व्यक्ति का अवसर छीन कर अयोग्य व्यक्ति को दे कर स्वार्थ पूरा करना मनोवांछित लाभ है? क्या ऐसे व्यक्तियों को देवी मां मनोवांछित लाभ दे सकती हैं?
       नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के देवी ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार शैलपुत्री ने महर्षि नारद के कहने पर जगकल्याण के लिए महादेव को पति के रूप में पाने हेतु कठोर तपस्या की थी। कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी पड़ा।
दधाना करपद्माभ्यां अक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि, ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
-अर्थात जिनके एक हाथ में अक्षमाला है और दूसरे हाथ में कमण्डल है, ऐसी उत्तम ब्रह्मचारिणी रूपा देवी मां मुझ पर कृपा करें। विचार करने की बात यह है कि कठोर तपस्या करने वाली ब्रह्मचारिणी उन पर कृपा कैसे करेंगी जिन्होंने समाज सुधार या बालिका सुरक्षा की सिर्फ बातें ही की हों और कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया हो। क्या समाज उस स्त्री या बालिका को सम्मान दे पाता है जो बलात्कार की शिकार हुई हो या जो किसी धोखेबाज के कारण अविवाहिता गर्भवती हो गई हो? क्या कोई स्त्री ऐसी पीड़िता का साथ देती है? या कोई पुरुष साहस के साथ तमाम विरोधों का सामना करते हुए बिना अहसान जताए सामान्य भाव से ऐसी स्त्री को जीवन संगिनी बनाता हैै? अविवाहित मां को अपने नवजात का त्याग करने को विवश करने वाली सामाजिक व्यवस्था में रमें हुए स्त्री-पुरुषों पर मां ब्रह्मचारिणी कैसे कृपा कर सकती हैं?  
       नवरात्रि के तीसरे दिन दुर्गाजी के तीसरे रूप चंद्रघंटा देवी की पूजा करने का विधान है। मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्ध चंद्र, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित दस हाथ। स्त्री शक्ति की प्रतीक-
पिंडजप्रवरारूढा, चंडकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं, चंद्रघंटेति विश्रुता।।
- अर्थात सिंह पर सवार और चंडकादि अस्त्र-शस्त्र से युक्त मां चंद्रघंटा मुझ पर अपनी कृपा करें। प्रार्थना आसान है किन्तु माता कैसे कृपा करें उन भीरुओं पर जो निःसक्तजन पर अत्याचार होते देखते रहते हैं और कई बार स्वयं भी अत्याचारी के पक्ष में जा खड़े होते हैं। समझना कठिन है कि जातिगत, धर्मगत, आॅनर किलिंग, घरेलू हिंसा करने वालों पर माता कैसे प्रसन्न हो सकती हैं?
    नवरात्रि के चौथे दिन दुर्गाजी के चतुर्थ रूप मां कूष्मांडा की पूजा और अर्चना की जाती है। माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व जब चारों ओर अंधकार था तो मां दुर्गा ने इस अंड यानी ब्रह्मांड की रचना की थी।  
सुरासंपूर्णकलशं, रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां, कूष्मांडा शुभदास्तु मे।।
-अर्थात अमृत से परिपूरित कलश को धारण करने वाली और कमलपुष्प से युक्त तेजोमय मां कूष्मांडा हमें सब कार्यों में शुभदायी सिद्ध हो। निश्चित रूप से मां कूष्माण्ड हम पर प्रसन्न होंगी यदि हम उनके बनाए ब्रह्मांड में मौजूद इस अपनी पृथ्वी के भविष्य को बचा लेंगे। हम अपने प्रयासों में तेजी ला कर, अपनी गलत आदतों को सुधार कर, जलवायु परिवर्तन की तेज गति को धीमा कर के, पृथ्वी सहित आने वाली पीढ़ियों को बचा लेंगे। यदि हम मां के सृजन की रक्षा नहीं करेंगे तो मां हम पर कैसे प्रसन्न होंगी?
      नवरात्र के पांचवे दिन दुर्गाजी के पांचवें रूप मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। स्कंद शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का एक नाम है। स्कंद की माता होने के कारण ही देवी का नाम स्कंदमाता पड़ा। चतुभुर्जी मां ने अपनी दाएं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद अर्थात कार्तिकेय को पकड़ा हुआ है और इसी तरफ वाली निचली भुजा के हाथ में कमल का फूल है। बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा में वरद मुद्रा है और नीचे दूसरा श्वेत कमल का फूल है। सिंह इनका वाहन है। क्योंकि यह सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं इसलिये इनके चारों ओर सूर्य सदृश अलौकिक तेजोमय मंडल सा दिखाई देता है।
सिंहासनगता नित्यं, पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी, स्कंदमाता यशस्विनी।।
- अर्थात सिंह पर सवार, कमल पुष्प धारण करने वाली मां स्कंदमाता हमारा शुभ करें। लेकिन जब हम बालअपराध नहीं रोक पा रहे हैं। जलसंरक्षण के लिए ईमानदार प्रयास नहीं कर रहे हैं, वन्य पशुओं के प्रति क्रूरता बरत रहे हैं, जंगल काट रहे हैं, तो स्कंदमाता कैसे हमें शुभफल दे सकती हैं?
      नवरात्र के छठे दिन दुर्गाजी के छठे रूप मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। चूंकि देवी ने महर्षि कात्यायन की पुत्री रूप में जन्म लिया था इसीलिये इनका नाम कात्यायनी पड़ा। इनकी चार भुजाएं हैं। दाईं ओर के ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में खड्ग अर्थात् तलवार है और नीचे वाले हाथ में कमल का फूल है। इनका वाहन भी सिंह है।
चंद्रहासोज्ज्वलकरा, शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यात, देवी दानवघातनी।।
- अर्थात् सिंह पर सवार देवी कात्यायनी असुर संहारिनी तथा कल्याण करने वाली हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार मां कात्यायनी का रूप धारण कर के देवी ने महिषासुर का वध किया था। ऐसी असुर संहारक माता उन व्यक्तियों पर कैसे कृपा कर सकती हैं जो हिंसा, बलात्कार, चोरी, ठगी, रिश्वतखोरी, परपीड़ा, अत्याचार, घरेलू हिंसा आदि आसुरी कर्म में संलग्न रहते हैं?  
       नवरात्र के सातवें दिन दुर्गाजी के सातवें रूप मां कालरात्रि की पूजा और अर्चना का विधान है। इन्हें तमाम आसुरी शक्तियों का विनाश करने वाला बताया गया है। इनके तीन नेत्र हैं और चार हाथ हैं जिनमें एक में खड्ग अर्थात् तलवार है तो दूसरे में लौह अस्त्र है, तीसरे हाथ में अभयमुद्रा है और चैथे हाथ में वरमुद्रा है। इनका वाहन गर्दभ अर्थात् गधा है।
एकवेणी जपाकर्ण, पूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी, तैलाभ्यक्तशरीरिणी।
वामपादोल्लसल्लोह, लताकंटकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा, कालरात्रिभयंकरी।।
- अर्थात एक वेणी ( बालों की चोटी ) वाली, जपाकुसुम ( अड़हुल ) के फूल की तरह लाल कर्ण वाली, उपासक की कामनाओं को पूर्ण करने वाली, गर्दभ पर सवारी करने वाली, अपने बांये पैर में चमकने वाली लौह लता धारण करने वाली, कांटों की तरह आभूषण पहनने वाली, बड़े ध्वज वाली और भयंकर लगने वाली कालरात्रि मां हमारी रक्षा करें। तो क्या मां कालरात्रि उन लोगों की रक्षा करेंगी जो दूसरों का जीवन अंधकारमय बनाते हैं, जो दूसरों के रास्ते में कांटे बिछाते हैं, जो जीवित व्यक्तियों को मृत घोषित कर के उनके हिस्से का सरकारी पैसा खा जाते हैं, जो नकली दवाएं और मिलावटी खाद्य बेच कर दूसरों के जीवन को खतरे में डालते हैं?
      नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें रूप देवी महागौरी की पूजा की जाती है।
श्वेते वृषे समारूढा, श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यात महादेवप्रमोददाद।।
- अर्थात सफेद वस्त्राभूषण पहनने वाली, वृषभ अर्थात् बैल पर सवारी करने वाली, त्रिशूल और डमरू धारण करने वाली, अभय और वर प्रदान करने वाली मां महागौरी शुभ करें। अशुभ कार्यों को करने वालों, अशुभ कार्यों का विरोध नहीं करने वालों तथा अशुभ कार्यों को बढ़ावा देने वालों का मां कैसे शुभ करें? जो गौवंश को सड़को पर लावारिस छोड़ दें उनका शुभ कैसे करें, यह मां के लिए भी असमंजस की बात है।
      नवरात्र के नौवें दिन मां दुर्गा के नौवें रूप मां सिद्धदात्री की पूजा की जाती है। सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली देवी मां सिद्धिदात्री।
सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैः, असुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात, सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
- अर्थात सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, असुर और अमरता प्राप्त देवों के द्वारा भी पूजित किए जाने वाली और सिद्धियों को प्रदान करने की शक्ति से युक्त मां सिद्धदात्री हमें भी आठों सिद्धियां प्रदान करें। शास्त्रों में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और वशित्व नामक आठ सिद्धियां बताई गई हैं। ये आठों सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की पूजा और कृपा से प्राप्त की जा सकती हैं। किन्तु मां उन लोगों पर कृपा क्यों करें जो स्वार्थवश दूसरों की महिमा और गरिमा को चोट पहुंचाते हैं, जो दूसरों की पीड़ा का मजाक उड़ाते हैं, जो किसी घायल या मरते हुए व्यक्ति की सहायता करने के बजाए उनका वीडियो बनाने में मशगूल रहते हैं, जो अपने माता-पिता को वृद्धाश्रमों में छोड़ आते हैं, जो अपने बच्चों को अपराध करने से नहीं रोक पाते हैं और जो स्वयं अपनी बुरी आदतों पर संयम नहीं रख पाते हैं? मां उन्हें सिद्धियां क्यों दें?
        इस बार की चर्चा का आशय यही है कि यदि हम मां के सभी रूपों सहित देवी मां को पूर्णता के साथ प्रसन्न करना चाहते हैं, उनकी कृपा पाना चाहते हैं तो यह हमें समझना होगा कि वर्ष के 365 दिन में 356 दिन मनुष्यत्व को भूल कर मात्र नौ दिन अपना पूर्ण समर्पण दिखा कर देवी मां को भ्रमित नहीं किया जा सकता है। जब हम उन्हें सर्वज्ञानी मानते हैं तो यह याद रखना जरूरी है कि उन्हें हमारे शेष 356 दिनों के कृत्यों का भी पता रहता है। अतः हम मां के नौ रूपों के सच्चे अर्थों को समझें और उनके प्रति अपने कत्र्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करें। यदि हम स्त्रियों, बच्चों, वृद्धों, निर्बलों पर होने वाले अत्याचारों को रोक सकें, यदि हम पर्यावरण और जलवायु की क्षति को रोक सकें, जल-थल-वायु के प्रत्येक जीव की रक्षा कर सकें, यदि जाति-धर्म-लिंग-रंग आदि के भेदभाव को समाप्त कर सकें और आपसी वैमनस्य को समाप्त कर सकें तो देवी मां हम पर सदा प्रसन्न रहेंगी, यह मुझे विश्वास है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।  
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Wednesday, October 10, 2018

चर्चा प्लस ... स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि
- डॉ. शरद सिंह
‘देवी’ का अर्थ है निर्भयता और शक्ति। नवरात्रि वह काल खण्ड है जिसमें देवी के प्रतीक को स्थापित कर के शक्ति की उपासना का अनुष्ठान किया जाता है और देवी के रूप में शक्तिसम्पन्न निर्भय स्त्री की कल्पना को साकार किया जाता है। नवरात्रि में देवी भगवती के नौ रूपों में नौ शक्तियों की पूजा की जाती हैं। यह नौ शक
्तियां स्त्रीशक्तियां ही तो हैं। निर्भय स्त्री ही देवी है, जो असुरों का संहार करने, जो देवताओं और सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने की क्षमता रखती है। जो जगत् की जननी है, मां है, वही शक्ति है। इसीलिए इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता
नावरात्रि में स्त्री शक्ति को स्थापित किया जाता है और स्मरण किया जाता है कि स्त्री अशक्त नहीं सशक्त है। विडम्बना यह कि सदियों से सबसे अधिक अपराध स्त्री के विरुद्ध ही होते आ रहे हैं। आज भी आंकड़े भयावह हैं। समाचारों में आए दिन किसी भी आयुवर्ग की स्त्री की अवमानना अथवा बलात्कार के समाचार स्त्रीशक्ति की स्थापना संबंधी विचार को झुठलाने की कोशिश करते रहते हैं। फिर भी स्त्रियां अपनी शक्ति को धीरे-धीरे पहचान रही हैं और अपने आत्मसम्मान की स्थापना कर रही हैं। संघर्ष कड़ा है पर विजय असंभव नहीं। सच तो यह है कि स्त्री स्वयंसिद्धा है। उसे किसी के सामने झुकने अथवा न्याय की भीख मांगने की जरूरत नहीं। देवी दुर्गा के नौ रूप स्त्री की उस शक्ति को दर्शाते हैं जिनसे वह मानव में मौजूद राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश कर सकती है। नवरात्रि की कथाएं यही तो बताती हैं कि जहां देवता स्वयं को अक्षम पाते हैं वहां देवी अपनी क्षमता का प्रयोग कर के सब कुछ सही कर देती है। आज की स्त्री भी तो यही कर रही है। स्त्री घर सम्हाल रही है, नौकरी कर रही है, राजनीति में आगे आ चुकी है और पुरुरूोचित माने जाने वाले सुरक्षा एवं यांत्रिकक्षेत्र में भी स्वयं को साबित कर रही है। आज दुनिया का कोई भी क्षेत्र स्त्री की पहुंच से दूर नहीं है। आज की स्त्री पुरुष-प्रधान समाज के मानको को बदल रही है। जिस स्त्री-अस्मत अथवा स्त्री की दैहिक शुचिता की दुहाई दे कर स्त्री को आत्महत्या करने तक मजबूर किया जाता था, उसी दुहाई को वह आज कठोरता से ठुकरा कर उन परिस्थितियों को बेनकाब कर रही है जिनके द्वारा उन्हें डराया, दबाया गया। ‘मी टू’ और ‘यू टू’ जैसे कैम्पेन आज स्त्री को सिर उठा कर जीने की ताकत दे रहे हैं। जिस यौनिक अपराध का शिकार होने के कारण उसे जीवन भर मुंह छिपा कर जीना पड़ता था, आज उस अपराध के विरुद्ध मुंह खोलने का साहस स्त्रियों में आता जा रहा है। भारत में भी इसकी शुरुवात सेलीब्रिटी महिलाओं ने कर दी है, जिससे आमस्त्री में भी साहस का संचार होगा। यह जरूरी भी है। आज जब नन्हीं अबोध बालिकाओं को भी बलात्कारी नहीं बख़्श रहे हैं तो ऐसे दूषित माहौल में स्त्रियों का यौनहिंसा के विरुद्ध उठ खड़ा होना जरूरी है। जब स्त्रियां साहस दिखाती हैं तो पुरुषवर्ग भी उनका साथ देता है। पुरुषों की सत्ता पुरुषों के वैचारिक भिन्नता ने बनाई। दुर्भाग्यवश स्त्री को दोयम दर्जे का मानने वाले पुरुष समाज में प्रभावी स्तर पर रहे। किन्तु प्रत्येक पुरुष अपराधी नहीं होता है। वह भी पिता, भाई, पति और पुत्र होता है। उसे भी स्त्री के साथ अपने गरिमापूर्ण संबंधों का भान होता है। यदि ऐसा नहीं होता तो आज जिस समर्थन के साथ स्त्रियां जीवन में बहुमुखी विकास कर रही हैं, वह नहीं कर पातीं और दीवारों के भीतर, हाथ भर लम्बे घूंघट में घुट रही होतीं। लेकिन यह समर्थन तभी मिला जब स्त्रियों ने साबित कर दिया कि वे हर तरह का काम करने में सक्षम हैं।
हमारी संस्कृति नारी के आदर की संस्कृति है। प्राचीन भारत में स्त्री का सम्मान किया जाता है। उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिया जाता था। पौराणि ग्रंथों में ऋषितुल्य विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। किन्तु हमारे अतीत में वह काला समय आया जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। विदेशी हमलावरों ने भारतीय पुरुषों को भ्रमित कर के स्त्री सम्मान के मायने ही बदलवा दिए। उन्होंने यह मस्तिष्क में बिठा दिया कि यदि स्त्री को परपुरुष स्पर्श भी कर ले तो उसे आत्मदाह कर लेना चाहिए। इससे भी आगे बढ़ कर एक पाठ और पढ़ाया कि परपुरुष की कुदृष्टि मात्र से बचने के लिए स्त्रियों को तलवार नहीं उठानी चाहिए बल्कि जौहर कर लेना चाहिए। दुर्भाग्य यह कि मातृशक्ति को देवी के रूप् में पूजने वाला पुरुष समाज इस तरह के पाठों को आत्मसात करता चला गया और स्वयं स्त्री समाज आत्महत्या में अपने सम्मान का प्रतिबिम्ब देखने लगी। लेकिन कहा जाता है न कि बुराई के पैर भले ही मजबूत दिखाई दें लेकिन होते कमजोर ही हैं और जल्दी थक जाते हैं। इन बुराइयों के पैर कई दशक बाद थके लेकिन अंततः थक कर चूर-चूर हो गए। जौहर और सती प्रथा बंद हुई। लेकिन इन काले दशकों ने स्त्रियों को शिक्षा, निर्णय लेने के अधिकार, कोख पर अधिकार और यहां तक कि खुली हवा से भी वंचित कर दिया। विचित्रता यह कि जब स्त्रियां दलित बनाई जा रही थीं, उस दौरान भी देवियां पूज्य रहीं। काल्पनिक शक्ति के सामने समाज ने सिर झुकाया किन्तु प्रत्यक्ष शक्ति को लम्बे समय तक अनदेखा किया। इतना अधिक अनदेखा किया कि आज भी समाज स्त्रीशक्ति को पूरी तरह से नहीं देख पा रहा है। शायद इसीलिए नवरात्रि के रूप में देवी के नौ रूपों वाली नौ शक्तियां प्रति वर्ष दो बार समाज के सामने आती हैं ताकि समाज स्त्रीशक्ति को पहचाने और उसे अपना सहभागी बनाए। नवरात्रि तो यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। यह उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान व अपनी शक्ति का स्मरण दिलाता है, साथ ही सकल समाज को नारी शक्ति का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है। मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
यह भी सच है कि आज स्त्रियों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। दरअसल, स्त्रियों के प्रति संवेदनाओं में विस्तार होना चाहिए। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का सम्मान किया जाना जरूरी है। घर में मौजूद स्त्रियां अर्थात् माता, पत्नी, बेटी, बहन में नौ दुर्गा के गुण होते हैं जिन्हें स्वीकार कर के सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
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( सागर दिनकर, 10.10.2018)


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