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Wednesday, November 1, 2023

चर्चा प्लस | मध्यप्रदेश का स्थापना मास मनेगा चुनावी महोत्सव के संग | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
मध्यप्रदेश का स्थापना मास मनेगा चुनावी महोत्सव के संग
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                       
       1 नवंबर अर्थात मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस। एक ऐसी तिथि जो अविभाजित मध्यप्रदेश की भी याद दिलाती है। इस बार प्रदेश का स्थापना मास चुनाव का मास भी है। जिससे आचार संहिता लागू हो जाने पर कई समारोह एवं आयोजन स्थगित किए गए हैं किन्तु लोकतंत्र में चुनाव से बड़ा और कोई आयोजन एवं महोत्सव हो ही नहीं सकता है। वर्ष 2023 का नवंबर मास प्रदेश के स्थापना समारोह को प्रजातंत्र के सबसे बड़े चुनाव अनुष्ठान के साथ मना रहा है। यह चुनाव अनुष्ठान प्रदेश के भावी विकास की दिशा एवं गति को निर्धारित तथा सुनिश्चित करेगा। इसलिए इस बार का स्थापना मास और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। 

मध्य प्रदेश चूंकि देश के मध्य भाग में स्थित है इसलिये इसे भारत का हृदय प्रदेश भी कहा जाता है। जब देश स्वतंत्र हुआ उस समय मध्यप्रदेश अस्तित्व में नहीं था। यह क्षेत्र मध्य भारत के नाम से जाना जाता था। इसके साथ बरार क्षेत्र भी जुड़ा हुआ था। इसीलिए इसे सीपी एंड बरार यानी सेंट्रल प्राविंसेस एंड बरार के नाम से अभिलेखित किया जाता था।  1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तब मध्य भारत और विंध्य प्रदेश के नए राज्यों को पुरानी सेंट्रल इंडिया एजेंसी से अलग कर दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के तीन साल बाद राज्यों का पुनर्गठन किया गया। सन 1950 में मध्य प्रांत और बरार का नाम बदलकर मध्य प्रदेश कर दिया गया। यह पुर्नगठन भाषीय आधार पर किया गया था। इसके घटक राज्य मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश एवं भोपाल थे, जिनकी अपनी विधानसभाएं थीं। इस राज्य का निर्माण तत्कालीन सीपी एंड बरार, मध्य भारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल राज्य को मिलाकर किया गया था।
एक नवंबर 1956 को नए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को बनाया गया। पंडित रविशंकर शुक्ल मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने और डाॅ. बी पट्टाभिसीतारमैया पहले राज्यपाल। राजधानी के रूप में भोपाल का चयन आसान नहीं रहा। ग्वालियर, इन्दौर और जबलपुर की दावेदारी के बीच भोपाल को चुना गया। राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी मध्य प्रदेश की राजधानी के लिए जबलपुर के नाम भी सुझाव दिया था। भोपाल को अधिक उपयुक्त माना गया। कुछ इतिहासविद भोपाल को चुने जाने के पीछे दो कारण बताते हैं। पहला कारण कि भोपाल में कई ऐसी इमारते थीं जिनमें फौरी तौर पर अच्छी तरह कामकाज का संचालन किया जा सकता था। दूसरा कारण राजनीतिक तथा अधिक ठोस प्रतीत होता है। यह भोपाल की राजनीति को एक ऐसी गरिमा के साथ जोड़ देने का राजनीतिक कदम था जिससे वहां के नवाब भविष्य में कभी अलगाव की बात न सोचें। दरअसल, राज्यों के विलय के समय जब सरदार वल्लभ भाई पटेल साम, दाम, दण्ड का प्रयोग करते हुए राज्यों का का विलय कर के भारत को एक एकीकृत राष्ट्र का स्वरूप दे रहे थे, उस समय भोपाल के नवाब भारत से संबंध ही रखना नहीं चाहते थे। वे हैदराबाद के निजाम के पदचिन्हों पर चलते हुए अपनी स्वायत्ता बनाए रखना चाहते थे। उन्होंने निजाम से मिल कर भारत से न मिलने के गुपचुप उपाय किए किन्तु अंततः सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नवाब को भोपाल का विलय करने के लिए राजी कर लिया। किन्तु अलगाव की भावना वह कीड़ा था जो कभी कुलबुला सकता था। अतः यह तय किया गया कि भोपाल को प्रदेश की राजधानी बना दिए जाने से अलगाव का विचार कभी सिर नहीं उठा सकेगा। इन दो कारणों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कारण गिनाए जाते हैं किन्तु राजनीतिक कारण निर्विवाद रूप से सटीक बैठता है।

मध्यप्रदेश राज्य में आरंभ में 43 जिले थे। इसके बाद, वर्ष 1972 में दो बड़े जिलों का बंटवारा किया गया, सीहोर से भोपाल और दुर्ग से राजनांदगांव अलग किया गया। तब जिलों की कुल संख्या 45 हो गई। वर्ष 1998 में, बड़े जिलों से 16 और जिले बनाए गए और जिलों की संख्या 61 हो गई। नवंबर 2000 में राज्य का बंटवारा हो गया। भौगोलिक दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य दो टुकड़ों में विभक्त हो गया। राज्य का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा विभाजित कर छत्तीसगढ़ का नया राज्य बनाया गया। इस प्रकार, वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य अस्तित्व में आया, जो देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है और जो 308 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र पर फैला हुआ है।
अविभाजित मध्यप्रदेश का इतिहास अत्यंत सम्पन्न रहा है। इस भू-भाग को प्रागैतिहासिक काल से मानवों ने अपने निवास स्थान के रूप में चुना था। भीमबैठका, आबचंद की गुफाएं, खरबई के शैलचित्र, भीमकुण्ड का प्रचीनतम ज्वालामुखीय जलकुण्ड, रायगढ़ जिले के शैलाश्रय, लगभग 32 हजार साल पुराने सिंघनपुर के शैलाश्रय। कोटमसर अथवा कुटुम्बसर अथवा कोटसर की भूमि की सतह से 55 फीट नीचे 330 मीटर तक की लंबाई तक फैली गुफाएं संयुक्त मध्यप्रदेश की भौगोलिक प्राचीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। विभाजित मध्य प्रदेश में विंध्याचल पर्वत तथा सतपुड़ा की पर्वत-घाटियों पुराणों में में भी उल्लेख है। विपरीत दिशा में बहने वाली चिर कुंवारी नदी नर्मदा तथा सोन का नद मध्यप्रदेश की प्राकृतिक संपदा का गौरवशाली अभिन्न अंग है। बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, निमाड़ आदि की संस्कृतियों ने मध्यप्रदेश को अतुल्य सम्पन्नता दी है। प्रागैतिहासिक काल पाषाणकाल से शुरू होता है, जिसके गवाह भीमबेटका, भेड़ाघाट, जावरा, रायसेन, पचमढ़ी जैसे स्थान है। हालांकि राजवंशीय इतिहास, महान बौद्ध सम्राट अशोक के समय के साथ शुरू होता है, जिसका मौर्य साम्राज्य मालवा और अवंती तक विस्तृत था। कहा जाता है कि राजा अशोक की पत्नी विदिशा की थी, जिसके निकट बौद्ध तीर्थस्थल सांची मौजूद है। सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ और ई. पू. तीन से पहली सदी के दौरान मध्य भारत की सत्ता के लिए शुंग, कुशान, सातवाहन और स्थानीय राजवंशों के बीच संघर्ष हुआ। ई. पू. पहली शताब्दी में उज्जैन प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र था। गुप्ता साम्राज्य के दौरान चैथी से छठी शताब्दी में यह क्षेत्र उत्तरी भारत का हिस्सा बन गया, जो श्रेष्ठ युग के रूप में जाना जाता है। हूणों के हमले के बाद गुप्त साम्राज्य का पतन हुआ और उसका छोटे राज्यों में विघटन हो गया। हालांकि, मालवा के राजा यशोधर्मन ने ई. सन 528 में हूणों को पराभूत करते हुए उनका विस्तार समाप्त कर दिया। बाद में थानेश्वर के हर्षा ने अपनी मृत्यु से पहले ई.सन 647 तक उत्तरी भारत को फिर से एक कर दिया। मध्ययुगीन राजपूत काल में 950 से 1060 ई.सन के दौरान मालवा के परमरस और बुंदेलखंड के चंदेल जैसे कुलों का इस क्षेत्र पर प्रभुत्व रहा। भोपाल शहर को नाम देनेवाले परमार राजा भोज ने इंदौर और धार पर राज किया। गोंडवना और महाकौशल में गोंड राजसत्ता का उदय हुआ। 13 वीं सदी में, दिल्ली सल्तनत ने उत्तरी मध्यप्रदेश को हासील किया था, जो 14 वीं सदी में ग्वालियर की तोमर और मालवा की मुस्लिम सल्तनत (राजधानी मांडू) जैसे क्षेत्रीय राज्यों के उभरने के बाद ढह गई। 1156-1605 अवधि के दौरान, वर्तमान मध्यप्रदेश का संपूर्ण क्षेत्र मुगल साम्राज्य के तहत आया, जबकि गोंडवाना और महाकौशल, मुगल वर्चस्व वाले गोंड नियंत्रण के तहत बने रहे, लेकिन उन्होने आभासी स्वायत्तता का आनंद लिया। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल नियंत्रण कमजोर हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप मराठों ने विस्तार करना शुरू किया और 1720-1760 के बीच उन्होने मध्यप्रदेश के सबसे अधिक हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इंदौर में बसे अधिकतर मालवा पर होलकर ने शासन किया, ग्वालियर पर सिंधिया ने तथा नागपुर द्वारा नियंत्रित महाकौशल, गोंडवाना और महाराष्ट्र में विदर्भ पर भोसले ने शासन किया। इसी समय मुस्लिम राजवंश के अफगान के जनरल दोस्त मोहम्मद खान के वंशज भोपाल के शासक थे। कुछ ही समय में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल, बंबई और मद्रास जैसे अपने गढ़ों से शक्ति का विस्तार किया। उन्होने 1775-1818 में मराठों को पराजित किया और उनके राज्यों के साथ संधि कर उनपर सर्वोपरिता स्थापित की। मध्यप्रदेश के इंदौर, भोपाल, नागपुर, रीवा जैसे बड़े राज्यों सहित अधिकांश छोटे राज्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए। उत्तरी मध्यप्रदेश के राजसी राज्य सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा संचालित किए जाते थे। सीपी एंड बरार रूपी मध्यप्रदेश ने बहुत से राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे।

मध्यप्रदेश वनोपज का धनी है तथा वन्य जीवन से सुसम्पन्न है। इसके कुछ अंचल आर्थिक दृष्टि से पिछड़े रहे हैं क्योंकि ब्रिटिश काल में इनकी अवहेलना की गई। विशेष रूप से बुंदेलखंड में अंग्रेजों को सबसे अधिक विरोध का सामना करना पड़ा। ठग और पिण्डारियों से जूझना पड़ा अतः उन्होंने इस क्षेत्र को शिक्षा और विकास से दूर रखा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद प्रदेश के पिछड़े हिस्सों में प्रगति की लहर दौड़ी। गति धीमी ही सही किन्तु थमी नहीं।
आज मध्यप्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। खेलकूद निरंतर गौरव हासिल कर रहा है। बस, कमी है तो संसाधनों के उचित दोहन की और विकास के आधुनिक प्रयासों की। प्रदेश के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जो खनिज संपदा से सम्पन्न हैं किन्तु कोई बड़ा औद्योगिक केन्द्र न होने से पिछड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों में उद्योग-धंधे इसलिए भी नहीं लग पाते हैं क्योंकि हवाई संपर्क का अभाव है, रेलों की कमी है। पिछले कुछ दशक में सड़कों की स्थिति में सुधार हुआ है किन्तु आईटी क्षेत्र सीमित है जिससे रोजगार के अवसर कम हैं। युवाओं को अपना राज्य छोड़ कर दूसरे राज्य जाना पड़ता है। युवाशक्ति का यह पलायन प्रदेश के विकास के लिए उचित नहीं है। प्रदेश में पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं हैं। खजुराहो, ओरछा, मांडू, भेड़ाघाट, कान्हा, भेड़ाघाट आदि स्थलों के अतिरिक्त अनेक ऐसे स्थान हैं जिनका पर्यटन स्थलों के रूप में विकास किया जा सकता है।

प्रदेश में निरंतर प्रशासनिक इकाइयां बढ़ रही हैं। जैसे 15 अगस्त 2003 को तीन नए जिले अशोकनगर, बुरहानपुर तथा अनूपपुर का निर्माण किया गया। 17 मई 2008 को अलीराजपुर, 24 मई 2008 को सिंगरौली, 14 जून 2008 को शहडोल संभाग, 25 मार्च 2013 को नर्मदापुरम संभाग का गठन किया गया। 16 अगस्त 2013 को आगर मालवा का निर्माण हुआ। मध्य प्रदेश का 52 वां जिला निवाड़ी 01 अक्टूबर 2018 को अस्तित्व में आया। जो टीकमगढ़ जिले की 3 तहसील निवाड़ी, ओरछा, और पृथ्वीपुर को मिलकर बनाया गया। 5 अक्टूबर 2023 को दो नए जिले सतना से मैहर और छिंदवाड़ा से पांढुर्ना जिला अस्तित्व में आया। दो जिले नागदा व पिछोर प्रस्तावित हैं अगर इन 2 जिलों को मान्यता मिल गयी तो मध्य प्रदेश में 55 से बढकर 57 जिले हो जायेंगे। इसके पहले रीवा से अलग कर मऊगंज 53वां जिला बनाया गया था। प्रदेश का प्रशासनिक विकास निर्माणकार्य तथा शिक्षा आदि के विकास को सुनिश्चित करने में मदद करता है।
वर्ष 2023 में प्रदेश का स्थापना मास चुनाव का मास भी है। जिससे आचार संहिता लागू हो जाने पर कई समारोह एवं आयोजन स्थगित किए गए हैं किन्तु लोकतंत्र में चुनाव से बड़ा और कोई आयोजन एवं महोत्सव हो ही नहीं सकता है। वर्ष 2023 का नवंबर मास प्रदेश के स्थापना समारोह को प्रजातंत्र के सबसे बड़े चुनाव अनुष्ठान के साथ मना रहा है। यह चुनाव अनुष्ठान प्रदेश के भावी विकास की दिशा एवं गति को निर्धारित तथा सुनिश्चित करेगा। इसलिए इस बार का स्थापना मास और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। अंत में मेरी काव्यमय दो पंक्तियां भी अपने प्रदेश के लिए-
हृदय देश का, हरित, ललित है
मेरा मध्यप्रदेश।
उर्वर  धरती, नित्य श्रमित है 
मेरा  मध्यप्रदेश। 

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Thursday, October 19, 2023

बतकाव बिन्ना की | चुनाव मने परीक्षा के टेम पे बंजरंगबली याद आऊत आएं | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"चुनाव मने परीक्षा के टेम पे बंजरंगबली याद आऊत आएं" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की      
चुनाव मने परीक्षा के टेम पे बंजरंगबली याद आऊत आएं
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
            आजकाल भैयाजी औ भौजी दोई जने बिजी चल रए। काय से के चुनाव को टेम आए। आचार संहिता सोई लग चुकी आए। सो, अब तो घरे जा-जा के संपर्क करने पड़ रओ सबई पार्टी वारन खों। अब चुनाव के लाने टेम कम्म बचो आए, औ जोन को एरिया बड़ो ठैरो उनको ज्यादा मानुस की जरूरत पड़ रई। सो, अबई एक दिनां भैयाजी ने सोची के जेई टेम आए के कछू टेम पास कर लओ जाए औ कछू ब्योहार कमा लओ जाए। सो, उन्ने एक पार्टी वारन के लाने प्रचार करबे औ घरे-घरे जा के मिलबे को ठेका ले लओ। बे अपने संगे भौजी खों सोई लेवा जा रए हते। मनो भौजी ठैरीं औ सयानी। उन्ने कई के ‘‘हमें तुमाए संगे नई जाने।’’
‘‘काय? हमाए संगे जाबे से का हो जैहे?’’ भैयाजी ने तनक तिनकत भए पूछी हती।
‘‘होने खों तो कछू ने हुइए, मनो तनक अकल से काम लेओ करो!’’ भौजी सोई बोल परी हतीं।
‘‘काय? का हम अकल से काम नईं लेत का? तुम कैबो का चा रईं, के हम पे अकल नोईं?’’ भैयाजी खों भौजी की बात तनक बुरई लगी।
‘‘अकल तो तुम पे खूब आए, बाकी जे नई सोच रए के सगे भैया आमने-सामने ठाड़े होबे की कर रए, सगी बहुएं एक-दूसरे के खिलाफ लड़बे जा रईं, औ कऊं-कऊं तो बाप औ बेटा आमने-सामने रमतूला बजा रए, सो अपन ओरें काय खों एकई पार्टी के संगे जाएं?’’ भौजी ने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘देखों धना! उन ओरन की बात दूसरी कहानी। बो का कहाउत आए के चित बी अपनी औ पट बी अपनी। जे पार्टी जीती सो अपनो भैया जीतो औ बा पार्टी जीती सो अपनो भैया जीतो। दोई हाथन में लड़ुआ धर लओ, कोनऊं हाथ को तो खाबे के लाने मिलई जैहे।’’ भैयाजी ने सोई भौजी को समझाबे को प्रयास करो।
‘‘जेई सो हम कै रए आपके लाने। के अपन ओरें सोई अलग-अलग पार्टी के संगे हो के उनको प्रचार करबी। ईसे हुइए जे के कल को जोन पार्टी जीतहे बोई अपनो केंडीडेट कहलाहे।’’ भौजी चतुराई दिखात भई बोलीं।
‘‘कै तो तुम सांची रईं!’’ भैयाजी खों समझ में आ गई।
‘‘औ का!’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो चलो, तुम रामजी की पार्टी वारन के संगे जइयो औ हम वामजी की पार्टी के संगे।’’ भैयाजी खुस होत भए बोले।
‘‘सुनो, अब कोनऊं राम-वाम नई रओ! सबई बंजरंगबली के इते अपनो मत्था टेक रए।’’ भौजी बोली हतीं। भौजी भैयाजी से कऊं ज्यादा अपडेट निकरीं।
‘‘देखो धना! ऐसो आए के परीक्षा के टेम पे सबई बजरंगबली के इते मत्था टेकन लगत आएं। हम सोई जबे स्कूल में पढ़त्ते सो केबल मंगलवार औ शनीवार खों हनुमान जी की मढ़िया पे जात्ते। बाकी जोन टेम पे परीक्षा शुरू होबे वारी रैत्ती, सो संझा, संकारे मढ़िया पे मत्था टेकबो शुरू कर देत्ते। दो अगरबत्ती सोई उते जलात्ते। औ कभऊं-कभऊं चिरौंजी दाना औ चना सोई चढ़ा आउत्ते।  बो का आए के परीक्षा के टेम पे सबई खों बजरंगबली याद आऊत आएं।’’ भैयाजी ने भौजी खों बताई रई।
‘‘हऔ, सोई संगे बदत रए हुइए के जो अच्छे नंबरन से पास हो जेबी सो आपके लाने शुद्ध घी को पेड़ा औ नरियल चढ़ाबी। काए सई कई ने!’’ भौजी हंसत भईं बोली रईं।
‘‘‘‘औ का, अब बजरंगबली को खुस करबे के लाने उने पैलई से बताने तो परतई रओ के हम उनके लाने का करबी।’’ भैयाजी मनो सीरियसई मूड में बोले।
‘‘चलो, अब जे ओरें अपनी परीक्षा मने चुनाव के टेम पे बजरंगबली खों जप रए, सो अच्छो कर रए। जेई बहाने नांव सो ले रए।’’ भौजी ऊंसई हंस के बोलीं रईं।
फेर दोई जने अपनी-अपनी पार्टी पकर के चुनाव प्रचार के लाने निकर परे। जेई से आजकाल उनसे मोरी भेंट नईं हो रई आए। बे ओरें सुभे नौ-दस बजे से निकर परत आएं। औ तब लौं मोरो चैेका-बासन हो पात आए।
‘‘तुम काय नईं चल रईं? तुम सोई चलो संगे। मजो आहे।’’ भैयाजी ने मोय सोई आफर करो रओ।
‘‘मोय नईं जानें! आपई ओरें जाओ। मोय राजनीति में नईं परने।’’ मैंने साफ मना कर दई रई।
‘‘ईमें राजनीति में परबे की का? अपन ओरें कोन कोनऊं से कुर्सी मांग रए? पार्टी अपन ओरन खों खाबे-पीबे के लाने खर्चा दैहे औ संगे कओ धुतिया, हुन्ना सोई मिल जाएं।’’ भैयाजी ने तनक लालच दिखाओ रओ।
‘‘कऊं नईं! आजकाल चाुनाव आयोग वारे कछू नईं बाटन देत आएं।’’ मैंने भैयाजी खों याद दिलाई रई।
‘‘अरे, सो बे पार्टी वारे वोट देबे वारन खों थोड़ी, प्रचार करबे वारन खों दैहें। अब तुमई सोचो के मनो अपने घरे कोनऊं को ब्याओ हो रओ होय औ अपन कोनऊं चिनारी वारे से बोलें के भैया तनक हमाए कार्ड सो बांट आओ! सो का कार्ड बांटबे वारे की फटफटिया में पेट्रोल के लाने ऊंको पइसा ने देबी, के ऊंको चाय-पानी के चाले कछू ने देबी। इत्तो ब्यौहार तो साधेनई परत आए। सो, जेई ब्योहार जे ओरें साधहें। अपने प्रचार के लाने काम करबे वारन के खाबे-पीबे को खयाल राखहें के नईं? तुमई कओ?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आप सांची कै रए। ऐसई ब्योहार में तो पैले पेटियां चलत्तीं।’’ मैंने सोई ठिठोली करी रई।
‘‘चलो, तुमें नई जाने सो ने जाओ! हम दोई सो जा रए। कछू टेम सोई पास हो जाहे।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले रए।
सो, ऊं दिना से भैयाजी औ भौजी टेम पास माने प्रचार करत फिर रए। सो बोई दिनां से दिखा नईं पर रए। मोय तो लगत आए के बे दोई जने प्रचार के लाने घरे-घरे सो जाई रै हुइएं, बाकी उन ओरन के संगे बंजरंगबली के इते मत्था टेकबे सोई पौंच जात हुइएं।
खैर, जे तो अपनो-अपनो तरीका आए काम बनाबे को। जैसे लड़का हरें परीक्षा के टेम पे हनुमान जी की मढ़िया पे जात्ते, ऊंसईं लड़कियां हरें देबी मैया के लिंगे जल ढारबे खों भुनसारे से निकर परत्तीं। चाए ऊं टेम पे नवरातें होंए, चाए ने होंए। बे ओरें मातारानी के लाने बदत्तीं के जो आप हमें पास करा दैहो सो हम साजी सी चुनरिया चढ़ाहें। बाकी ऊं टेम पे, मने जब मैं स्कूल में पढ़त्ती, ऊं टेम पे अपने इते दुर्गा मैया खों मातारानी नई कओ जात्तो। जे तो जब से टीवी के सीरियल आन लगे सो ऊंमें देख-देख के दुर्गा मैया खों मातारानी कओ जान लगो। ने तो अपने बुंदेलखंड में चाए दुर्गा मैया होंए, चाए शारदा मैया होंए, चाए अनगढ़ माईं, चाए नरबदा जी, सबई खों सो मैया औ माई कओ जात्तो। बे असली वारे लोकगीतन में देख लेओ पतो पर जैहे। बाम्बुलिया में देख लेओ, ऊंमें नरबदा मैया खों मैया कओ गओ आए-
नरबदा मैया ऐसी मिली रें,
ऐसी तो मिली के जैसे मिले
मताई औ बाप रे, नरबदा मैया हो.....।
जेई टाईप को एक भजन औ आए जीमें ऊंची टेकरी पे रैबे वारी देवी मैया की बड़वार करी गई आए। ने मानो, सो देख लेओ जे लाईने-
सबई की बिपदा टार रई मैया
हमरी बी बिपदा टारियो मां...
ऊंची टेकरी मैया बसत हैं
मोसे चढ़ो ने जाए, हो मां
अंसुवा जो देख लए मैया ने मोरेे
नैचे खों खुद चली आई हो मां...
सबई के अंसुवां पोछ रई मैया
मोरे बी अंसुवां पोछियो मां....
बाकी ईसे कोनऊं फरक नई परत के देवी मैया खों मातारानी कओ जाए के मैया औ माई कओ जाए। मनो जोन अपने इते कओ जात रओ, बोई कओ जाए सो नोनो लगत आए। बाकी जैसी जोन की मरजी।    
तो, चुनाव लौं अपनई ओरें बतकाव करबी, काय से के भैयाजी औ भौजी सो बिजी चल रए। आप ओरे सोई देखत रओ के कोन-कोन कां-कां मत्था टेक रओ। काय से के उन ओरन की आस्था भगवान पे नोंई वोटन पे रैत आए। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, October 4, 2023

चर्चा प्लस | चुनाव बनाम चर्चा, परिचर्चा और खर्चा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

😄 एक चुटीला ..चर्चा प्लस  
चुनाव बनाम चर्चा, परिचर्चा और खर्चा
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
       चुनाव आने से काफी पहले घोषणाओं की बारिश शुरू हो जाती है। हर दल दावे करने लगता है कि विजयी होने के बाद वह आमजन के लिए आसमान से सितारे तोड़ लाएगा। छिपी हुई शर्त और कंडीशन्स की भांति उन दामों की चर्चा नहीं की जाती है जिस पर आसमान के तारे उपलब्ध कराए जाएंगे। वह भी यदि सचमुच उपलब्ध कराए गए तो। वैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के किसी भी चुनाव पर सारी दुनिया की नज़र टिकी रहती है। दुनिया जानने की कोशिश करती है, सीखने की कोशिश करती है कि ये चुनाव कैसे होते हैं और आम मतदाता किस आधार पर मतदान करता है? उनके लिए फुटबाॅल के विश्वकप या क्रिकेट के 20-20 से कम दिलचस्प नहीं होती हैं भारतीय चुनाव प्रक्रिया।
     चुनाव पूर्व आचार संहिता लागू होने के पूर्व की गहमागहमी बड़ी दिलचस्प रहती है। घोषणाओं की आपाधापी, शिलान्यासों की शीघ्रता और मीडिया के जरिए अपनी सुचिक्कन, साफ-सुथरी, मेहनती छवि रखने की कमरतोड़ मेहनत देखते ही बनती है। भला, मतदाता को कौन नहीं रिझाना चाहता है? चाहे आम पार्टी हो या नीम पार्टी, अमरूद पार्टी हो या खजूर पार्टी सभी चाहते हैं की मतदाता के दिल-दिमाग पर उनकी ऐसी तस्वीर चस्पा हो जाए कि जब मतदाता वोट डालने जाए तो उसे मात्र उसी के दल का चुनावचिन्ह दिखे।
      आमसभाओं की लहर चल पड़ती है। एकसी में बैठे रहने वाले नेतागण अपने पूरे परिवार सहित आग उगलती धूप, कड़ाके की सर्दी और तरबतर करती बारिश में भी निकल पड़ते हैं। आमतौर पर ऐसे समय अधिकांश नेताओं की कर्मठता, त्याग और बलिदान का जज़्बा बरसाती झरने की भांति फूट पड़ता है।
वो निकले थे घर से खिरामां-खिरामां
जो माहौल  देखा,  बने  आंधी-तूफां
जैसे-जैसे चुनाव निकट आते हैं बाक़ायदा युद्ध-कक्ष यानी ‘‘वाॅर रूम’’ सजने लगते हैं। गोया चुनाव न होने वाला हो अपितु कोई युद्ध छिड़ने वाला हो। वैसे माहौल युद्ध जैसा ही हो जाता है। बस, इतना ही अन्तर होता है कि लोहे की तलवारें नहीं खिंचती बल्कि जुबानी तलवारें मारकाट मचाने लगती हैं। यदि कवि भूषण आज होते तो वे युद्ध का कैसा वर्णन करते ? कवि भूषण से दण्डवत क्षमायाचना सहित -

साजि चतुरंग वीर रंग में तुरं चढ़ि
सरजा शिवराज जंग जीतन चलत हैं।
‘दूषण’ भनत नाद विहद डीजे के,
कानन में शोर के धारे रलत है।।

लेकिन लोकतंत्र का यह खेल देखने वाले तीसरी-चैथी पीढ़ी के मतदाता भी चतुर सयाने हो चले हैं। वे वादों के वायरस को पहचानने लगे हैं और एन्टी वायरस की छन्नी से छान-छान कर मन के भीतर छिपाए रखते हैं। अपने ही प्रचार के शोर में डूबा प्रत्येक उम्मीदवार अपनी साॅलिड जीत के सपने देखता खुश होता रहता है। शोर का आलम यह रहता है कि एक बार फिर कवि भूषण से क्षमायाचना सहित कहना होगा-

रोड शो की रेल पेल खलक में गैल गैल,
उम्मीदवारन की ठैल पैल सैल उसलत हैं।
तारा सो तरनि धूरि वादों में लगत जिमि,
मतदाता मगर ना हलाए से हलत हैं ।।

असल परिणाम तो चुनाव बाद ही पता लगते हैं। यही तो लोकतंत्र का असली आनन्द है कि मतदाता अपने सभी पत्ते छुपा कर चुनाव की रस्साकशी के मजे लेता रहता है। यूं भी आम मतदाताओं को सास-बहू का धारावाहिक देखने की अच्छी-खासी आदत डलवा दी गई है, जिसमें ढेर सारे षडयंत्र, कपड़ों और सज-धज की चकाचौंध, आदि सारे मसाले होते हैं। इसलिए चुनावी संग्राम को भी आम मतदाता सास-बहू के धारावाहिक की भांति ही देखता है। बहू अपना सिक्का जमाने की कोशिश करती है तो सास याद करती है कि मैं भी कभी बहू थी और मैंने कैसे गृहस्थी पर कब्जा जताया था। मगर आजकल एक परिपाटी और चल निकली है जिसके कारण इस बात की गारंटी नहीं है कि जीतने वाला दल कुर्सी पर टिका रह सकेगा। इस बात के उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश के पिछले चुनाव और उसके बाद के परिणामों को स्मरण किया जा सकता है।
      एक जमाना वह था जब मतदाता स्वयं को साफ-साफ ठगा हुआ अनुभव करता था। ऐसे ही दौर में कवि रघुपति सहाय ने कोई ‘‘एक और मतदाता’’ कविता लिखी थी-

इतना दुख मैं देख नहीं सकता।
कितना अच्छा था छायावादी
एक दुख लेकर वह एक गान देता था
कितना कुशल था प्रगतिवादी
हर दुख का कारण वह पहचान लेता था
कितना महान था गीतकार
जो दुख के मारे अपनी जान लेता था
कितना अकेला हूँ मैं इस समाज में
जहां सदा मरता है एक और मतदाता।

आज मतदाता जागरूक होता जा रहा है। उसे सच और झूठ की पकड़ होती जा रही है। यदि कोई रेवड़ियां बांट रहा है तो उसे लेने में मतदाता को कोई गुरेज़ नहीं है लेकिन जब बारी आती है मतदान की तो वह दूरंदेशी से काम लेता है। रिझाने, मनाने का खेल अब उसे समझ में आने लगा है। उसे आज पता है कि टेलीविजन के पर्दे पर होन वाले डिबेट्स कितने प्रायोजित होते हैं। प्रायोजक पक्ष को बोलने का, अपने विचार रखने का भरपूर अवसर दिया जाता है किन्तु जब दूसरा पक्ष बोलने को मुंह खोलता है तो उसे ‘‘बस, बस! ठीक है!’’ कह कर चुप करा दिया जाता है। इस मसले पर मेरी एक परिचिता ने एक दिन खीझ कर कहा था कि जब दूसरे पक्ष को बोलने का मौका ही नहीं दिया जाता है तो वह ऐसे डिबेट में शामिल होता ही क्यों है? इस प्रकार के कथित डिबेट में इस तरह शामिल होना भी दूसरे पक्ष की मजबूरी है। यदि वह शामिल नहीं होगा तो राष्ट्रीय पटल पर अपना चेहरा दिखाने का उसे उतना भी अवसर नहीं मिलेगा। गूंगा-बहरा ही सही लेकिन चेहरा तो दिखता है। लोग उसे पहचानने तो लगते हैं। कई बार सहानुभूति भी मिल जाती है कि बेचारे को बोलने नहीं दिया गया। जबकि बोलना हर नेता का बुनियादी आधार है। जो नेता जितना अच्छा और जितना ज़्यादा बोलता है, उसकी गहरी छाप पड़ती है आमजन के मानस पर। यूं भी आजादी के बाद से अब तक में बातों से पेट भरने की आदत आमजन को हो ही गई है।
सवाल पूछने की आदत आमजन में कम होती जा रही है। कहीं अगर कोई आवाज उठती भी है तो नक्कार खाने में तूती की आवाज बन कर दबी रह जाती है। इस बात पर जौन एलिया का यह शेर याद आ रहा है-

उम्र गुजरेगी इम्तिहान में क्या
दाग ही देंगे मुझ को दान में क्या।
मेरी हर बात बे-असर ही रही
नुक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या।

अब है सवाल खर्चे का तो विचारणीय है कि राजनीतिक दलों के पास प्रचार खर्च का पैसा कहां से आता है? चाहे होलोकास्ट हो या विकास यात्रा, चाहे हेलीकाफप्टर से उड़कर चुनावी सभाएं की जाएं या फिर सेलीब्रिटी को पैसे देकर चुनावी चेहरा बनाया जाए, धन की उगाही आमजन से ही होती है। वोट बैंक की योजनाएं के लिए पैसा कहां से आता है? स्पष्ट है कि यह भी आमजन का ही पैसा होता है जो उसी को रिझाने के लिए खर्च किया जाता है। राजनीति की बिगड़ती दशा पर पूर्व प्रधानमंत्री ‘भारतरत्न’ स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने व्यथित हो कर प्रश्न किया था कि -‘‘राजनीति काजल की कोठरी है. जो इसमें जाता है, काला होकर ही निकलता है. ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में ईमानदार होकर भी सक्रिय रहना, बेदाग छवि बनाए रखना, क्या कठिन नहीं हो गया है?’’ फिर उन्होंने एक कविता भी लिखी थी जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

कौन कौरव, कौन पांडव
बिना कृष्ण के आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है

जब एक अच्छी राजनीतिक समझ रखने वाला व्यक्ति राजनीति की गिरती दशा को देख कर छटपटाए तो स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। राहत इन्दौरी ने उम्मींदवारों की स्थिति पर गहरा कटाक्ष किया था-

नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है

और इससे अधिक तिमिलाहट शायर इरतिजा निशात के इस शेर में देखी जा सकती है-

कुर्सी है तुम्हारा ये जनाजा तो नहीं है
कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते ?

ये तिलमिलाहट, ये व्याकुलता, ये बेबसी आमजन को भीतर ही भीतर एक ज्वालामुखी में ढालती जाती है जिसका विस्फोट होता है चुनाव के परिणाम के रूप में। किन्तु सच यह भी है कि किसी को कुर्सी से उतार देना भर एक मात्र हल नहीं है। लगभग हर कुर्सीप्रेमी स्वार्थी परंपराओं का पोषक साबित होता है। फिर भी यदि कोई हल है तो वह अभी भी आम मतदाता की मुट्ठी में सुरक्षित है, मतदान के अधिकार के रूप में। एक जागरूक मतदाता सही उम्मीदवार को चुन कर पूरे परिदृश्य को बदलने की ताकत रखता है।
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Thursday, April 13, 2023

बतकाव बिन्ना की | चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"‘चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे                 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      जो मैं भैयाजी के इते पौंची सो वे हलके चच्चा से बतकाव कर रए हते।
‘‘राम-राम चच्चा!’’ मैंने हलके चच्चा खों राम-राम करी। कहबे को बे चच्चा कहाऊत आएं बाकी उनकी उम्मर चच्चा वारी नोंई।
मनो हल्के चच्चा के ‘‘चच्चा’’ कहाबे के पांछू सोई एक किसां आए। का भओ रओ के उने चायने रई नगरपालिका पार्षद के चुनाव की टिकट। उने कोनऊं पूछ ने रओ हतो। उन्ने अपने वारे विधायकजी से कई के हमें सोई पार्षद के लाने ढ़ाड़ो करा देओ। सो, विधायकजी ने ठक्का-ठाई कै दई के ‘‘एक तो तुमाओ नांव हल्के, ऊपे तुमाई पर्सनाल्टी सोई हल्की। सिंगल हड्डी के धरे हो। कोनऊं तुमसे इम्प्रेस नईं होत। पैले कछू दमदार बनों फेर आइयो! विधायकजी ने कै दई खरी-खरी। अब इत्ती खरी को सुन सकत आए? अपने हल्के महराज खों लग गई बुरई। उन्ने वोई दिनां से दंड पेलने चालू कर दओ औ अंडा-बदाम सबई कछु खान लगे। पंद्रा दिनां में उने समझ परी के जे सब में सो टेम लग जेहे सो उन्ने एक शार्टकट निकारो। बे अपने नांव के संगे चच्चा बोलन लगे। मने, बे कोनऊं से बात कर रए होंए सो खुदई कैते के ‘‘बे हमसे बोले काय हल्के चच्चा’’, मनो ई टाईप से बे सब के मन में अपने लाने चच्चा फिट करन लगे। औ उनको काम बन गओ। छोटे-बड़े सबई उने हल्के चच्चा कैन लगे। अब बे अकेले हल्के नोईं रए, बे बन गए हल्के चच्चा। बन गई पर्सनाल्टी। उनकी जे बुद्धिमानी देख के विधायक जी सोई ग्लेड हो गए। अखीर में उने पार्षदी हाथ लग गई।
‘‘काय, हल्के चच्चा औ का चल रओ?’’ मैंने हल्के चच्चा से पूछी।
‘‘अरे बिन्ना! आपको आशिर्वाद मिल जाए सो अपनों भाग खुल जाए!’’ हल्के चच्चा बोले।
‘‘का मतलब?’’ उनकी बात सुन के मोय झटका सो लगो। कऊं इने उधारी के पइसा-वइसा सो नई चाउंने?
‘‘मतलब जे के ई बेरा हम सोच रए के विधायक के लाने जोर लगाएं। अब भैंन हरों को आशीर्वाद हुइए, सो मिल जेहे विधायकी।’’ कैत भए हल्के चच्चा ने धड़ से मोरे पांव पर लए।
‘‘अरे-अरे, जो ने करो! मोरो आशीर्वाद सो हमेसई आपके लाने रिजर्व आए।’’ मैंने हल्के चच्चा से कई।
‘‘अब जे सो पूछ लेओ ई महराज से के कोन-सी पार्टी से ठाड़े होबे की सोच रए?’’ हम ओरन की बातें सुन के भैयाजी बोल परे।
‘‘जोन पार्टी ऊ समै लों जीतबे वारी समझ में आहे, बोई की टिकट के लाने जुगत करबी।’’ हल्के चच्चा दंतनिपोरी करत भए बोले।
‘‘सुनी इनकी!’’ भैयाजी मोसे बोले। फेर कैन लगे,‘‘अबे सो कछू नईं, तनक चुनाव को टेम सो आन देओ। चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां हुइए।’’
‘‘रोन-कुमरई? मने काय की किसां?’’ हल्के चच्चा पूछन लगे।
‘‘तुमे नई पता जे किसां?’’ भैयाजी ने हैरानी से पूछीं, ‘‘काय तुम बुंदेलखंड में रैत आओ के लंदन में, जो जे किसां नई सुनी तुमने?’’ भैयाजी खों मनो यकीन नई भओ।
‘‘हऔ, सो का भओ? नईं सुनी सो नई सुनी! जे बिन्ना ने सोई ने सुनी हुइए।’’ हलके चच्चा बोले।
‘‘बिन्ना की छोड़ो। बिन्ना ने जे किसां सुनी सो ठीक मनो लिखी औ छापाई सोई आए। वो बी साहित्य अकादमी दिल्ली से। इनकी किताब आए-‘बुंदेलखंड की लोककथाएं’। समझे कछू। पढ़त-लिखत सो हो नईयां। ने तो इत्तो तो पतो रैतो।’’ भैयाजी बोले।
मोय जे सुन के अच्छो लगो के भैयाजी ने मोरी बड़वारी करी। मनो कोन खों अपनी बड़वारी भली ने लगहे।
‘‘चलो हम सुना रए तुमाए लाने रोन-कुमरई की किसां।’’ भैयाजी बोले। फेर उन्ने किसां सुनानी शुरू करी - ‘‘एक हती कुतिया। बा बड़ी लालची हती। ऊको मनो जे पता पर जाए के फलां गांव में पंगत हो रई सो बा सौ मील लों भगत चली जात्ती। ऊके संगवारे कुत्ता-कुतिया ऊको समझात रैत्ते के इत्तो लालाच ने करो। इते-उते भगत फिरत आओ, जे ठीक नइयां। मनो बा काय को कोनऊं की सुनती। एक बेर का भओ के एक रओ गांव। जीको नांव हतो रोन। उते के लंबरदार ने रखी एक पंगत। रोन गांव बा कुतिया के गांव से दूर ने हतो, सो बा और ऊके संगवारन ने पंगत में पौंचबे को प्लान करो औ चल परे। बे ओरें कछू दूर पौंचे हते के उने खबर मिली के कुमरई गांव के लंबरदार ने सोई पंगत रखी आए। कछू कुत्ता-कुतिया हते सो बे रोन जाबे के लाने कैन लगे औ कछू बोले के हमें तो कुमरई जाने। बे ओरे दो फड़ में बंट गए कहाने। उन ओरन ने बा कुतिया से पूछी के तुम कोन तरफी जेहो? सो बा बोली के जोन के इते अच्छो खाना बन रओ हुइए, उतई जाबी औ खाबी। सो ईपे बाकी कुत्ता-कुतियन ने कई के जे सो उतई जा के पता परहे। सो बा कुतिया बोली के फिकर नाट, मैं पैले रोन जैहों, ईके बाद कुमरई। दोई जांगा पौंच के पता चल जेहे के कोन के इते अच्छो खानो बन रओ। जा सुन के सब ने कई के जे तुमाई मर्जी, जो ठीक लगे सो करो।
सो बा कुतिया पैले रोन पौंची। ऊने देखी के उते तो पुड़ी तली जाबे की तैयारी चल रई हती।  सो ऊने सोची के जो लौं पुड़ी बन रईं तब लौं कुमरई खों चक्कर लगा लओ जाए। पतो पर जेहै के उते का बन रओ। सो बा भगत-भगत कुमरई पौंची। उते ऊने देखी के हलवा बनाओ जा रओ आए। जा देख के ऊकी लार टपकन लगी। ऊने सोची के आज सो हलवा-पुड़ी दोई खाबे खों मिलहे। जेई संगे ऊके मन में खयाल आओ के जा के पैले पुड़ी खा लई जाए। उत्ती देर में इते हलवा बन जेहे। बा फेर के भगी और रोन पौंची। उते जा के देखी के पुड़ी को एक घना खतम हो गओ रओ और दूसरे घना की तैयारी चल रई हती। जे देख के ऊने सोची के जित्ते में इते पुड़ी को दूसरो घना उतरहे, उत्ते में कुमरई जा के हलवा खा लओ जाए। सो बा दौड़त-दौड़त कुमरई पौंची। उते ऊने देखी के जो लों बा रोन गई उत्ते में इते कुमरई में हलवा खतम हो गओ रओ। अब फेर के हलवा बनाबे को काम चल रओ हतो। सो बा जे सोच के घबरा गई के कऊं उते पुड़ी ने बढ़ा जाए। सो बा फेर रोन खों भागी। रोम और कुमरई में मनो सात कोस की दूरी हती। बा हांफत-हांफत रोन पौंची। जब लौं उते कछू बचोई नई हतो। ऊके संगवारे कुत्ता-कुतियन ने जूठा दोना-पत्तल लौं चाट-चूट के सफा कर दओ हतो। जा दसा देख के ऊको लगो के तुरतई कुमरई पौंचो जाए, ने तो उते बी कछू ने मिलहे। बाकी जे भागा-भागी में ऊकी दम कढ़ी जा रई हती। औ भूक बी जोर की लग आई हती। बा लालची कुतिया फेर के कुमरई की तरफी भागी। आधी रस्ता में पौंचत-पौंचत भूक, प्यास औ थकान से ऊकी दम कढ़ गई औ बा उतई टें बोल गई। इत्ते में रोन और कुमरई दोई तरफी से ऊके संगवारे कुत्ता-कुतिया लौटे। उन्ने बा कुतिया की दसा देखी सो उने कै आई के-‘‘जा लालच के फेर में ने परती औ कोनऊं एक पंगत में टिकी रैती तो कछू तो खाबे खों मिल जातो। जे जो जान से तो ने जाती।’’- सो, हल्के चच्चा! जे हती रोन-कुमरई की किसां। औ बोई दिनां से अपने इते लालच करबे वारन खों रोन-कुमरई की कुतिया कओ जान लगो।’’ भैयाजी किसां खतम करत भए बोले।
‘‘किसंा सो मनो नोनी हती, बाकी जा सुना के तुम हमसे का कैन चात आओ?’’ हल्के चच्चा ने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे हमें का कैने? तुम खुदई समझदार आओ। हम सो बस जे कै रै के चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे के ई पार्टी में चलो आए के ऊ पार्टी में?’’ कैत भए भैयाजी हंसन लगे।
अब हल्के चच्चा इत्ते बी हल्के ने हते के भैयाजी को टांट ने समझ पाउते। बे खिसिया के उते से खिसक लिए। मोए सोई कऊं जाने रओ सो मैंने भैयाजी से राम-राम करी। बाकी अब आप ओरें सोई सोचियो के जे जो भैयाजी ने कई बा सांची कई के झूठी? मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, May 1, 2019

चर्चा प्लस ... 1 मई - अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष : चुनावों के बीच मजदूरों के मुद्दे - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

1 मई - अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष :
चुनावों के बीच मजदूरों के मुद्दे
- डॉ. शरद सिंह


इस बार के लोकसभा चुनावों के दौरान जिस तरह जाति, धर्म और वंशावलियों पर जंग छिड़ी हुई है उसके बीच मजदूरों के मुद्दे कहीं खो से गए हैं। गोया मजदूरों के बारे में चिन्ता करने की कतई जरूरत नहीं है। जबकि देश में अब कृषकों से भी बड़ी मजदूरों की संख्या हो चली है। इनमें वे कृषक मजदूर भी शामिल हैं जो माईग्रेट कर के एक राज्य से दूसरे राज्य मजदूरी करने जाते हैं। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और अब बुंदेलखंड के मजदूरों की मांग सबसे अधिक होती है। वहीं इनका मेहनताना सबसे कम होता है।


सन् 2011 को मुझे कटनी से सागर आना था। नियत समय पर स्टेशन पहुंची तो वहां देखा कि छत्तीसगढ़ी मजदूर परिवारों से प्लेटफॉर्म अटा पड़ा था। बौखलाई सी स्त्रियां, झुंझलाए से पुरुष और कुपोषण के शिकार बच्चे। मैंने अपनी आंखों से उन बच्चों को मिट्टी के बरतन में सहेज कर रखे बासी भात पर झपटते देखा। उस पल मन में यही विचार आया कि क्या यही है मेरा भारत? मजदूरों का वह समूह अकेले नहीं था। उनके साथ उनका एक कथित ठेकेदार था। उसी ने उन्हें रेल में ले जाने की व्यवस्था की थी। वह बीच-बीच में आ कर समझा रहा था कि उनमें से कितने लोगों को किस डिब्बे में चढ़ना है। उन मजदूर परिवारों के चेहरों पर साफ-साफ दिखाई दे रहा था कि वे अपने अनिश्चित भविष्य को ले कर किस तरह भयभीत हैं। 
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper चर्चा प्लस ... 1 मई - अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष : चुनावों के बीच मजदूरों के मुद्दे - डॉ. शरद सिंह

लगभग यही दृश्य मुझे सन् 2017 में खजुराहो रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला। अंतर मात्र इतना था कि कटनी रेलवे स्टेशन में मैंने छत्तीसगढ़ी मजदूरों को देखा था जो पोटली में मिट्टी के बरतनों में बासी भात बांध कर पलायन कर रहे थे। जबकि खजुराहो रेलवेस्टेशन पर मैंने जिन मजदूरों को देखा वे बुंदेलखंड के थे और उनकी पोटलियों में बाजरे की मोटी रोटियां बंधी थीं। इन मजदूरों के साथ भी उनके बीवी-बच्चे थे। वे दिल्ली जा रहे थे। इस आशा से कि उस महानगर में उन्हें कोई न कोई काम मिल जाएगा। जिससे उनके बीवी-बच्चों का तो पेट भरेगा ही और बचा हुआ पैसा वे अपने बूढ़े मां-बाप के लिए अपने गांव भेज सकेंगें। एक छलावे भरा स्वप्न उन्हें ज़िन्दगी के रेगिस्तान की ओर ले जा रहा था।
मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैंने जिससे बातचीत की थी, उसका नाम था भगत पटेल। उसने मुझे बताया था कि लगातार सूखे की मार ने उसकी खेतीबाड़ी सुखा दी। सरकारी और गैर सरकारी कर्जा चुकाने में उसका ख्ेत और घर दोनों बिक गए। अब परिवार दाने-दाने को मोहताज हो चुका था। वह तो उसके एक दोस्त ने उसे बताया कि दिल्ली में वह उसे मजदूरी दिला सकता है, बस इसीलिए भगत पटेल अपने बीवी-बच्चों सहित दिल्ली के लिए निकल पड़ा। दिल्ली में कहां जाना है, उसे पता नहीं था। बस, एक विश्वास था अपने उस दोस्त के प्रति। यदि वह दोस्त सही निकला तो कुछ जुगाड़ हो जाएगा, अन्यथा भगवान मालिक है!
सूखे के प्रकोप, लचर जल प्रबंधन और जल की कमी से जूझ रहे बुंदेलखंड के सैकड़ों गांवों से प्रतिवर्ष अनेक ग्रामीण अपने-अपने गांव छोड़ कर दूसरे राज्यों तथा महानगरों की ओर पलायन करने को विवश हो जाते हैं। असंगठित, अप्रशिक्षित मजदूरों के रूप में काम करने वाले इन मजदूरों का जम कर आर्थिक शोषण होता हैं। यह स्थिति तब और अधिक भयावह हो जाती है जब उन्हें कर्जे के बदले अपना घरबार बेच कर अपने बीवी-बच्चों समेत गांवों से पलायन करना पड़ता है। गरमी का मौसम आते ही गांवों में पानी की कमी विकराल रूप धारण कर लेती है। कुंआ, तालाब, पोखर और हैंडपंप सब सूख जाते हैं। अंधाधुंध खनन से यहां की नदियां भी सूखती जा रही हैं। बिना पानी के कोई किसान खेती कैसे कर सकता है? बिना पानी के सब्जियों भी नहीं उगाई जा सकती हैं। खेत और बागीचों के काम बंद हो जाने पर पेट भरने के लिए एकमात्र रास्ता बचता है मजदूरी का। हल चलाने वाले हाथ गिट्टियां ढोने के लिए मजबूर हो जाते हैं। अभावग्रस्त बुंदेलखंड से हर साल रोजी रोटी की तलाश में हजारों परिवार परदेश जाते हैं। मगर रोटी की खातिर गरीबों का यह पलायन राजनीतिक दलों के एजेंडे में दिखाई नहीं देता है। बुंदेलखंड का क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विस्तृत है। इस क्षेत्र में कुल आठ संसदीय क्षेत्र आते हैं। टीकमगढ़, खजुराहो, दमोह और सागर जैसी लोकसभा सीटें मध्य प्रदेश में आती हैं, तो झांसी, जालौन, हमीरपुर और बांदा उत्तर प्रदेश के हिस्से में हैं। इस क्षेत्र में आय का एक मात्र साधन खेती है। यहां कोई बड़ा उद्योग-धंधा नहीं है। दरअसल, खेती भी कुछ खास वर्गो के पास ही है और बहुसंख्यक वे लोग हैं, जो मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। जब सूखा पड़ता है तो बहुसंख्यक वर्ग दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। इन्हीं स्थितियों में इस क्षेत्र से लोग पलायन करते हैं।
बुंदेलखंड के ही चित्रकूट जिले की मंदाकिनी, गुन्ता, बरदहा, बानगंगा सूखकर नाली की तरह कहने लगती है। बांदा की रंज, बागेन, केन जैसी बड़ी नदियों की धार जगह जगह से टूट गई है। महोबा की चंद्रावल, बिरमा, अर्जुन, उर्मिल जैसी नदियों में दूर-दूर तक पानी नहीं नजर आ रहा है। बुंदेलखंड की पहज, धसान, सौर, नारायणी जैसी कई नदियां वैसे ही मृतप्राय हो चुकी हैं। सागर की बेबस नदी अपनी बेबसी पर आंसू बहाती रहती है। अवैध रेत खनन के कारण अब यमुना और बेतवा जैसी नदियों के पाट भी सूखने लगे हैं। नदियों के तटवर्ती गांव पांच-पांच किमी की दूरी तय करके किसी तरह अपनी जान बचा रहे हैं। जिन गांवों के आस-पास कहीं भी पानी का इंतजाम नहीं है उन गांवों के लोग पानी और रोटी के लिए महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बुंदेलखंड के विभिन्न स्वयंसेवी संगठनो की सर्वे रिपोर्ट और सरकार के पल्स पोलियो अभियान के आंकड़ों पर गौर करें तो यूपी के हिस्से के बुंदेलखंड की करीब एक करोड़ की आबादी में पिछले एक दशक के दौरान करीब 45 लाख लोग यहां से पलायन कर चुके हैं। कुछ साल पहले तक लोग अपने भूखे बच्चों की भूख मिटाने के लिए रोजी-रोटी की तलाश मे परदेश कमाने जाते थे। अब भूख और प्यास दोनों से बचने के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मंबई, कोलकाता जैसे महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार बुंदेलखंड छोड़कर जाने वालों का प्रतिशत इसी जून माह में 50 फीसदी का आंकड़ा पार कर सकता है।
हमारे राजनीतिक दलों के अधिकांश बड़बोले नेताओं को जाति, धर्म और वंशावलियों से फुर्सत मिले तो वे इन मजदूरों की दीन दशा पर दृष्टिपात करें। बुनियादी मुद्दों से मुंहमोड़ कर लड़ा जाने वाला चुनाव कितना टिकाऊ होगा यह तो समय की बताएगा किन्तु तब तक पलयन के लिए विवश कृषक से श्रमिक बने दीन-हीन इंसानों की चिंता भी करनी जरूरी है।
बुंदेलखंड के बांदा जिले की जनसंख्या लगभग 17,99,541 है। पल्स पोलियो अभियान के तहत वर्ष 2017 में पाया गया कि जिले के 18,721 मकानों में ताले बंद है। लगभग 38,783 घरों में सिर्फ बुजुर्ग बचे हैं। बाकी सब परदेश कमाने चले गए हैं। बांदा में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार बुंदेलखंड के गांवों, कस्बों शहरों से करीब 5 लाख लोग परदेश में रोजी रोटी कमा रहे हैं। इसी तरह चित्रकूट जिले की जनसंख्या लगभग 9,90,626 है। जिसमें लगभग 4.5 लाख लोग कमाने के लिए दिल्ली, लखनऊ, सूरत, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में जा चुके हैं। महोबा जिले के 8,78,055 की आबादी में करीब 4 लाख लोग परदेश कमाने चले गए हैं। हमीरपुर के 11,04,021 में करीब 5 लाख लोग जिले से बाहर रहकर मजदूरी कर रहे हैं। जालौन जिले की 16,70,718 की आबादी में 7 लाख से ज्यादा लोग विभिन्न शहरों महानगरों मे रोजी रोटी कमा रहे हैं। ललितपुर के 12,18,002 और झांसी जिले के 20,00,755 लोगों की आबादी में करीब 14 लाख लोग जिले से बाहर रहकर अपने बच्चों का भरण पोषण कर रहे हैं। बुंदेलखंड विकास परिषद के अनुसार रोजगार और पानी की समस्या के कारण बुंदेलखंड के करीब 40 लाख लोग लखनऊ, दिल्ली, रायबरेली, मुंबई, सूरत, चंडीगढ़, भोपाल, हरियाणा और गोवा में मजदूरी कर रहे हैं। हर साल यह संख्या थमने के बजाय बढ़ती जा रही है।
ग्रामीण पलायन रोकने के लिए सरकार अनेक विकास योजनाएं उपेक्षित वर्गों के लिए चला रही है किन्तु जमीनी सच्चाई यही है कि यिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण उन्हें योजनाओं की सही जानकारी ही नहीं है। महिलाओं के लिए भी स्वयंसहायता समूहों के जरिए विभिन्न व्यवसाय चलाने, स्वरोजगार प्रशिक्षण, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजन आदि अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं किन्तु इनमें भी लगभग वही स्थिति है। जो रास्ता दिखाते हैं वहीं उन्हें लूटने लगते हैं। सरकार ने इस दिशा में यह कदम भी उठाया कि सहायता राशि सीधे बैंकों में जाए किन्तु बैंकों का डिजिटल हो जाना कम्प्यूटर का ज्ञान न रखने वालों के लिए मुसीबत बनता रहता है। एटीएम पर होने वाली धोखाधड़ी की घटनाएं आए दिन प्रकाश में आती रहती हैं। कृषकों का मजदूरों के रूप में पलायन करने की समस्या के आकलनकर्त्ताओं के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत कृषि के स्थान पर पूंजी आधारित व अधिक आय प्रदान करने वाली खेती को प्रोत्साहन दिया जाए जिससे किसानों के साथ-साथ सीमांत किसानों और मजदूरों को भी ज्यादा से ज्यादा लाभ हो सके। सिंचाई सुविधा, जल प्रबन्ध इत्यादि के माध्यम से कृषि भूमि क्षेत्र का विस्तार किया जाए जिससे न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी साथ ही आय में भी वृद्धि होगी और किसानों में आत्मविश्वास व स्वाभिमान जागृत होगा जिससे ग्रामीण पलायन रुकेगा।
असंगठित एवं अकुशल मजदूरों की भीड़ का दबाव अर्थव्यवस्था पर पड़ने और इन मजदूरों को शोषण से बचाने के लिए व्यापक दृष्टिकोण से सोचना होगा और मजबूत कदम उठाने होंगे। जिस प्रजा पर शासन करने के लिए चुनाव लड़े जा रहे हैं, उनकी भलाई के बारे में सोचना प्रत्येक उम्मीदवार की जिम्मेदारी है, चाहे वह चुनाव में जीते अथवा हारे।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 01.05.2018)
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Wednesday, April 3, 2019

चर्चा प्लस ... वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...                    
  वादों की लहरों पर चुनाव की नैया     
      - डॉ. शरद सिंह
       गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper  चर्चा प्लस ...वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह
        लोकतंत्र में असली चुनाव बाहुबल से नहीं बल्कि बुद्धिबल से लड़े जाते हैं। इसीलिए बुद्धिबल अपनी इच्छाओं को साधने के लिए पहले बाहुबल को अपना सेवक बनाता है और फिर उससे अपने अनुसार काम कराता है। ऊपर से देखने में भले ही बुद्धिबल और बाहुबल एक-दूसरे के पूरक दिखें किन्तु पलड़ा भारी रहता है बुद्धिबल का ही। तभी तो कई बार छोटा दिखने वाला राजनीतिक दल बड़े राजनीतिक दल को पटखनी दे देता है। यूं भी इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तमाम बंधनों के बावजूद आम नागरिक को जागरूक बना दिया है। वह राजनेताओं द्वारा किए जा रहे हर वादे को विश्लेषण के साथ अपने सामने पाती है और फिर उस पर स्वयं चिंतन-मनन करती है। यही कारण है कि अधिक हवा-हवाई वादों पर बवाल मचते देर नहीं लगती है। आज लगभग अस्सी प्रतिशत आम नागरिक वादों की तह तक जाने का प्रयास करता है। यह सच्चाई नेता भी समझते हैं, वे अब इस तरह के वादे करते हैं जो आम नागरिक के दिलों को छू सके तथा उन्हें विश्वास दिला सके।
लोक सभा चुनाव 2019 के मैदान में उतरे हुए छोटे राजनीतिक दलों की बात छोड़ दी जाए तो दो दल खुल्लमखुल्ला आमने-सामने खड़े नज़र आते हैं। एक कांग्रेस (आई) और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। यद्यपि दोनों टिके रहने को प्रादेशिक दलों का सहारा लेते जा रहे हैं। सवाल यह है कि ये दोनों दल स्थानीय समस्याओं को समझ पा रहे हैं या नहीं। सबसे बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है इन्हें अपने उम्मीवार चुनने में। किसको खड़ा करें, किसको नहीं? जिसे टिकट नहीं मिलती है, वह दूसरे दल का रास्ता पकड़ लेता है। कहीं टिकट न मिलने का गुस्सा तो कहीं पैराशूट उम्मीदवार के प्रति नाराज़गी। रूठों को मनाने का दौर और दूसरे दलों के लोगों को फोड़ कर अपनी ओर मिलाने का दौर। इन सबके बीच चुनावी वादों की बरसात। ऐसी बरसात कि आम नागरिक की सोचने-समझने की क्षमता ही उसमें बह जाए और वह बुद्धिहीन की तरह जा कर बटन दबा आए। मगर आज की चतुर पब्लिक सब जानती है, उसकी आंखें भी खुली हुई हैं और कान भी। वह अपने विवेक से किस तरह काम लेती है यह इतिहास के पन्नों को देख कर भली-भांति जाना और समझा जा सकता है। जिस परिवार नियोजन की नीति ने कांग्रेस आई की कुर्सी छीन ली थी, सन् 1977 में जनता पार्टी ने उसी परिवार नियोजन कार्यक्रम को त्यागने के संबंध में वादा कर चुनाव में जीत हासिल की थी। सन् 1980 में इंदिरा गांधी ने कार्य-कुशल सरकार के वादे के आधार पर विजय प्राप्त की थी और 1984 में राजीव गांधी ने जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती गांधी के आदर्शो पर निर्मित एक साफ छवि वाली सरकार देने के वायदे पर भारी मतों से विजयश्री प्राप्ति की थी। लेकिन सन् 1989 में बोफोर्स तोप सौदे की दलाली की हवा ने राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार के कुर्सी छुड़ा दी और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने । फिर, 1999 में कांग्रेस और तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने और गिराने के बाद स्थिर सरकार देने के वादे के साथ ‘‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन‘’ ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में आम चुनाव जीता। ये वादे ही थे जो राजनीति में हार-जीत सुनिश्चित करते रहे।
        सन् 2014 में भजपा द्वारा किए गए वादों के बारे में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का कहना है कि 2019 में नए वादों की बात करने से पहले नरेन्द्र मोदी जी देश को बताएं कि उन्होंने 5 साल में अपने 2014 के घोषणापत्र में किए गए किन-किन वादों को पूरा किया है? आज उन मुद्दों पर बात करने से क्यों कतरा रहे हैं? उन भारी-भरकम आसमानी वादों, योजनाओं और घोषणाओं का क्या हुआ? बहरहाल, आम नागरिक भी जानता है कि विश्व पटल पर भारत का नाम भले ही जगमगाया हो लेकिन विदेशों में जमा कालाधन वापस देश में लाने का वादा पूरा नहीं हुआ, उल्टे नोटबंदी ने घरेलू महिलाओं की रसोईघर के डब्बों में छिपा कर की गई बचत को भी बाहर निकलवा दिया। नोटबंदी के साल भर बाद भी घर के किसी बैग, किसी कपड़े, किसी किताब में दबे हुए पांच सौ के नोट ने अचानक बरामद हो कर जो सदमा पहुंचाया है, उसे भुला पाना आसान नहीं है। फिर भी भाजपा के नए वादों की ओर आम नागरिक उत्सुकता से देख रहा है।
         इन दिनों कांग्रेस अपने प्रभाव को फिर से जगाने के लिए प्रभावी वादे किए जा रही है। राहुल गांधी ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाने का वादा किया है। उन्होंने कहा है कि करीब 22 लाख सरकारी नौकरी की रिक्तियां हैं, जिन्हें उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर अगले साल 31 मार्च तक भरा जाएगा। पार्टी इस बार किसानों के लिए कर्जमाफी की घोषणा करने के साथ ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक, न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का वादा किया है। कांग्रेस के अन्य वादों में सबके लिए स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के बेघर लोगों को जमीन का अधिकार, पदोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन करना और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना आदि शामिल हैं। जीडीपी का 6 प्रतिशत पैसा शिक्षा पर लगाने का वादा है। साथ ही असली जीएसटी लाने का वादा है।
कांग्रेस का यह भी वादा किया है कि अगर कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापस आती है तो न्यूनतम आय योजना के तहत 20 प्रतिशत सबसे गरीब भारतीय परिवारों के खाते में हर साल 72,000 रुपये जमा किए जाएंगे। इस संबंध में कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहना है कि यह योजना महिला केंद्रित है। यह धनराशि सीधे घरों की महिलाओं के बैंक खाते में जमा की जाएगी। महिलाओं के पक्ष में एक और वादा कि लोकसभा-विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाएगा। साथ ही केंद्र सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा।
कांग्रेस ने जहां जमीनी मुद्दों को अपने वादों में पिरोया है वहीं भाजपा के हाथ से मंदिर का मुद्दा लगभग फिसल चुका है। उसे आमनागरिक की वेदना और संवेदना को जीतने वाले वादे ढूंढने में पसीना बहाना पड़ रहा है। वादे पूरे न कर पाने पर कांग्रेस से सत्ता छिनी थी अब वादे पूरे न कर पाने पर भाजपा को खाली हाथ न रह जाना पड़े।
भाजपा ने फरवरी 2019 को चुनावी वादे तय करने के लिए एक लोकतांत्रिक तरीके की घोषणा की थी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ‘भारत के मन की बात, मोदी के साथ’ अभियान शुरू किया था। एक महीने तक चलने वाले इस अभियान में विभिन्न माध्यमों से देश की जनता से दस करोड़ सुझाव मांगने का लक्ष्य रखा गया था। बीजेपी के राज्यसभा सदस्य और मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी ने तब कहा था कि अगले पांच साल में राष्ट्र निर्माण का एजेंडा तय करने लिए यह सहकारी प्रयास होगा। यह प्रत्येक भारतीय को भारत ढालने के अभियान में शामिल करने का प्रयास है। योजना प्रभावी थी लेकिन इसका संचालन प्रभावी ढंग से हो नहीं सका। फिर भी भाजपा अपने वादों के साथ डटी हुई है जिसमें सवर्णों को आरक्षण जैसे मुद्दे भी हैं।
     यह विडम्बना ही है कि प्रत्येक आमचुनाव के पहले किए गए वादे आजादी के बाद से अब तक लगभग जैसे के तैसे हैं। वही बेरोजगारी हटाने, गरीबी उन्मूलन, किसानों की स्थिति में सुधार आदि के वादे। यदि जीतने वाले राजनीतिक दलों ने सत्ता मिलने के बाद अपने वादों को पूरा किया होता तो आज भी वही बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से जुड़े वादे दोहराए नहीं जाते। अब यह आम नागरिक पर निर्भर है कि वह किसके वादों को आजमाना चाहेगी और किसे सत्ता-सुख दिलाएगी। गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है। इस दौर में स्व. दुष्यंत कुमार का यह शायरी याद आ रही है-
          ख़ुदा नहीं न सही, आदमी का ख़्वाब सही,
          कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये।
          वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
          मैं बेक़रार हूं  आवाज़ में असर के लिए।     
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Friday, March 15, 2019

बुंदेलखंड में सूखे और भुखमरी पर गर्म राजनीति के बीच जनता के अपने बुनियादी मुद्दे @ -डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

दिनांक 15.03.2019 को लोकप्रिय वेबपोर्टल "
Dr (Miss) Sharad Singh
#नवीनकदम " ने मेरे लेख " बुंदेलखंड में सूखे और भुखमरी पर गर्म राजनीति के बीच जनता के अपने बुनियादी मुद्दे @ -डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
" प्रकाशित किया है ....इसे आप भी पढ़िए !
🙏 हार्दिक धन्यवाद #नवीनकदम

http://navinkadam.com/?p=3958

बुंदेलखंड में सूखे और भुखमरी पर गर्म राजनीति के बीच जनता के अपने बुनियादी मुद्दे @ -डॉ. (सुश्री) शरद सिंह , Published in Naveen Kadam News Web Portal


Wednesday, December 12, 2018

चर्चा प्लस ...चुनाव-विजेता की याददाश्त और बुंदेलखंड की समस्याएं - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

 चुनाव-विजेता की याददाश्त और बुंदेलखंड की समस्याएं
    - डॉ. शरद सिंह                                      
मतदान हुआ, मतगणना हुई और चुनावों के नतीजे भी आ गए। एक बार फिर सरकार का गठन और मंत्रीमंडल में नए-पुराने चेहरों के गणित। इसके ठीक पहले रिजर्वबैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का इस्तीफा और अर्थशास्त्रियों के माथे पर चिन्ता की लकीरें। इन सबके बीच मध्यप्रदेश के पिछड़े हुए क्षेत्र बुंदेलखंड की समस्याओं का अंबार। कहावत हैं कि चुनावी विजेताओं की याददाश्त कमजोर होती है। चुनावों के दौरान किए गए वादे वे विजय के बाद भूलने लगते हैं। उम्मींद तो यही की जानी चाहिए कि इस बार के विजेताओं की यादाश्त तगड़ी निकले।    
चर्चा प्लस ...चुनाव-विजेता की याददाश्त और बुंदेलखंड की समस्याएं  - डॉ. शरद सिंह   Charcha Plus column of Dr (Miss) Sharad Singh
 बुंदेलखंड में राजनीति की फसल हमेशा लहलहाती रही है। यहां सूखे और भुखमरी पर हमेशा राजनीति गर्म रहती है। कभी सूखा राजनीति का मुद्दा बन जाता है तो कभी पीने का पानी, वाटर ट्रेन और घास की रोटियां। इस राजनीति में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ सभी पार्टियों के नेता कूद पड़ते हैं। यह बात अलग है कि बुंदेलखंड के लोगों को सूखे और भूखमरी से भले कोई राहत न मिली हो लेकिन इन मुद्दों पर राजनीति खूब होती है। चुनाव जीतने के लिए भले ही जातीय समीकरण फिट किए जा रहे हों, लेकिन जनसभाओं में सभी नेता इन मुद्दों को हवा देते रहते हैं। 
बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। यहां से खबरें आई कि लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे है। एनबीटी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। सरकार ने इसे नकारा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर अपनी टीम मौके पर जांच के लिए भेजी। उस टीम को लोगों ने घास की रोटियां दिखाईं और बताया कि इनको ही खाकर वे जिंदा रहते हैं। मध्य प्रदेश में वर्ष 2017 में 760 किसान और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की. विधानसभा में जुलाई, 2017 में मध्यप्रदेश सरकार ने बताया था कि राज्य में सात माह में खेती से जुड़े कुल 599 लोगों ने खुदकुशी की, जिनमें 46 बुंदेलखंड से थे।
बुंदेलखंड को सन् 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। यहां के किसान लगातार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। लगभग 80 प्रतिशत किसान साहूकारों और बैंको के कर्जे में डूबे हैं। ओलावृष्टि के दौरान तो सैकड़ों किसानों ने आत्महत्याएं तक कर लीं। इन आत्महत्याओं की वजह से ही बुंदेलखंड देश भर में सुर्खियों में रहा। अब भी हर साल यहां से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं। नदियों और प्राकृतिक वॉटरफॉल वाले इस क्षेत्र में मैनेजमेंट न होने के कारण लोग बूंद-बूद पानी के लिए तरसते रहते हैं। पिछले साल 2016 में यहां पीने के पानी की ऐसी समस्या हुई कि केंद्र सरकार को ‘‘वाटर ट्रेन’’ भेजनी पड़ी। यद्यपिइ स पर खूब राजनीति हुई। कई गांव ऐसे हैं जहां 10 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है।
अवैध खनन के कारण भी बुंदेलखंड हमेशा चर्चा में रहा है। हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये का अवैध खनन होता है। अवैध खनन के लिए खनन माफिया ने कुछ नदियों तक का रुख ही मोड़ दिया। प्रकृतिविद् मानते हैं कि बुंदेलखंड में अकाल जैसे हालात की असल कारण खनन है। जलपुरुष राजेंद्र सिंह कहते हैं- ‘‘नदियों की कोख चीरकर खनन हो रहा है। नदियां गड्ढों में तब्दील हो गई हैं। किसी भी नदी में मौरंग और बालू उसका जीवन होते हैं। जब इन्हें अंधाधुंध निकाला जाएगा तो नदियां कैसे रहेंगी? वह कहते हैं, नदियों का जीवन खत्म होने का मतलब भूजल समाप्त हो जाना है। आज यही सब हो रहा है, यही वजह है कि प्राकृतिक रूप से बने झील और तालाब भी सूख जाते हैं। बोरिंग करके पानी निकालना मुश्किल काम है क्योंकि यहां पानी बहुत नीचे चला गया है। कोई बोरिंग कराए भी तो वह साल-डेढ़ साल से ज्यादा नहीं टिकती। राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अंधाधुंध खनन पर रोक लगनी चाहिए।’’
 बुंदेलखंड में खनिज भरा पड़ा है, लेकिन उससे जुड़े उद्योग नहीं हैं। ग्रेनाइट, पाइरोफाइलाइट, सिल्का सेंट, फर्शी पत्थर, बॉक्साइट, लौह अयस्क सहित कई तरह के खनिज होते हैं लेकिन उद्योग न के बराबर हैं। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण लोग पलायन कर रहे हैं। पलायन इस क्षेत्र के लिए एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। जानकारों के मुताबिक 10 साल मे करीब 50 लाख लोग पलायन कर चुके हैं। किसानों ने खेती छोड़ दी है और बाहर मजदूरी कर रहे हैं। पर्यटन के लिहाज से बुंदेलखंड में चित्रकूट सहित कई जगहों का धार्मिक महत्व है। इसके अलावा जंगल, झीलें, नदियां, वाटर फॉल, किले सहित कई दर्शनीय स्थल हैं। लेकिन रखरखाव और आवागमन के साधन न होने की वजह से सभी बदहाल हैं।
बुंदेलखंड में भी पिछले दशकों में पुरुषां की अपेक्षा स्त्रियों का अनुपात तेजी से घटा और इसके लिए कम से कम सरकारें तो कदापि जिम्मेदार नहीं हैं। यदि कोई जिम्मेदार है तो वह परम्परागत सोच कि बेटे से वंश चलता है या फिर बेटी पैदा होगी तो उसके लिए दहेज जुटाना पड़ेगा। बुंदेलखंड में औरतों को आज भी पूरी तरह से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। गांव और शहरी क्षेत्र, दोनों स्थानों में जिन तबकों में शिक्षा का प्रसार न्यूनतम है, ऐसे लगभग प्रत्येक परिवार की एक ही कथा है कि आमदनी कम और खाने वाले अधिक। आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को शिक्षा के बदले काम में लगा देना इस प्रकार के अधिकांश व्यक्ति अकुशल श्रमिक के रूप में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। ठीक यही स्थिति इस प्रकार के समुदाय की औरतों की रहती है। ऐसे परिवारों की बालिकाएं अपने छोटे भाई-बहनों को सम्हालने और अर्थोपार्जन के छोटे-मोटे तरीकों में गुज़ार देती हैं। इन्हें शिक्षित किए जाने के संबंध में इनके माता-पिता में रुझान रहता ही नहीं है। ‘लड़की को पढ़ा कर क्या करना है?’ जैसा विचार इस निम्न आर्थिक वर्ग पर भी प्रभावी रहता है। इस वर्ग में बालिकाओं का जल्दी से जल्दी विवाह कर देना उचित माना जाता है। ‘आयु अधिक हो जाने पर अच्छे लड़के नहीं मिलेंगे’, जैसे विचार अवयस्क विवाह के कारण बनते हैं। छोटी आयु में घर-गृहस्थी में जुट जाने के बाद शिक्षित होने का अवसर ही नहीं रहता है। 
अन्य प्रदेशों की भांति बुंदेलखंड में भी ओडीसा तथा आदिवासी अंचलों से अनेक लड़कियां  को विवाह करके लाया जाता हैं। यह विवाह सामान्य विवाह नहीं है। ये अत्यंत ग़रीब घर की लड़कियां होती हैं जिनके घर में दो-दो, तीन-तीन दिन चूल्हा नहीं जलता है, ये उन घरों की लड़कियां हैं जिनके मां-बाप के पास इतनी सामर्थ नहीं है कि वे अपनी बेटी का विवाह कर सकें, ये उन परिवारों की लड़कियां हैं जहां उनके परिवारजन उनसे न केवल छुटकारा पाना चाहते हैं वरन् छुटकारा पाने के साथ ही आर्थिक लाभ कमाना चाहते हैं। ये ग़रीब लड़कियां कहीं संतान प्राप्ति के उद्देश्य से लाई जा रही हैं तो कहीं मुफ़्त की नौकरानी पाने की लालच में खरीदी जा रही हैं। इनके खरीददारों पर उंगली उठाना कठिन है क्योंकि वे इन लड़कियों को ब्याह कर ला रहे हैं। इस मसले पर चर्चा करने पर अकसर यही सुनने को मिलता है कि क्षेत्र में पुरुष और स्त्रियों का अनुपात बिगड़ गया है। लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों की कमी हो गई है। बुंदेलखंड में किए गए लगभग सभी आंदोलनों एवं विकास की तमाम मांगों के बीच स्त्रियों के लिए अलग से कभी कोई मुद्दा नहीं उठाया गया जिससे विकास की वास्तविक जमीन तैयार हो सके। यदि परिवार की स्त्री पढ़ी-लिखी होगी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होगी तो वह अपने बच्चों के उचित विकास के द्वारा आने वाली पीढ़ी को एक विकसित दृष्टिकोण दे सकेगी। इसी विचार के साथ ‘बेटी बचाओ’ और ‘बालिका शिक्षा’, ‘जननी सुरक्षा’ जैसे सरकारी अभियान चलाए जा रहे हैं। बस, आवश्यकता है इन अभियानों से ईमानदारी से जुड़ने की। 
बुंदेलखंड एक ऐसा भू-भाग है जिसका गौरवशाली इतिहास है। यहां के लोग आक्रमणकारियों के आगे कभी नहीं झुके। स्वतंत्रता आंदोलन में भी कंधे से कंधा मिला कर योगदान दिया और अपने प्राणों की बलि दी। यह कहा जाता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में सिर्फ़ इसीलिए बुंदेलखंड को विकास की सुविधाओं से वंचित रखा गया जिससे यहां के लोग ब्रिटिश हुकूमत का प्रतिरोध करने के लिए संसाधन न जुटा सकें। देश गुलामी से स्वतंत्र हुआ, अंग्रेज भारत छोड़ कर चले गए किन्तु दुर्भाग्यवश बुंदेलखंड में विकास की गति कछुआ चाल ही रही। आज भी यह इलाका रेल यातायात की समुचित जुड़ाव के लिए तरस रहा है। आज देश की आर्थिक दशा अनेक उतार-चढ़ाव से गुज़र रही है। ऐसे में बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र का ध्यान रखा जलाना और अधिक जरूरी है। क्यों कि कमजोर ही पहले टूटता है और जो टूटा हुआ ही हो उसे सम्हालना और अधिक चुनौती भरा काम है। आज के तकनीकी विकास के आगे यहां की भौगोलिक कठिनाइयों का बहान नहीं किया जा सकता है। यदि कहीं कोई कमी दिखाई देती है तो बुंदेलखंड के विकास की दृढ़ इच्छाशक्ति की। जिन चुनावी विजेताओं ने चुनाव के दौरान अपनी इच्छाशक्ति का दम भरा था, आशा की जानी चाहिए कि वे अपने वादों को भुलाएंगे नहीं और बुंदेलखंड के पक्ष में एक स्वर्णिम अध्याय लिखेंगे।    
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 12.12.2018)
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Thursday, November 22, 2018

चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं
- डॉ. शरद सिंह 

बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही ह
ैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
चर्चा प्लस .. बुंदेलखण्ड में राजनीति, चुनाव और महिलाएं - डॉ. शरद सिंह Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
चुनावों की टिकट वितरण के पूर्व मैंने अपने इसी कॉलम में विगत 08 अगस्त 2018 को लिखा था -‘‘चुनावों के निकट आते ही सबसे पहले प्रश्न उठते हैं, किसको टिकट मिलेगी और किसको नहीं? कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? लेकिन क्या महिला उम्मीदवारों के आंकड़े बढ़ने से ही राजनीति में महिलाओं की पकड़ बढ़ जाएगी? सच तो यह है कि चुनाव निकट आते ही महिलाओं की तरफ़दारी करने वाले बयानों की बाढ़ आ जाती है किन्तु चुनाव होते ही किए गए वादे ठंडे बस्तों में बंधने लगते हैं, विशेषरूप से राजनीति में महिलाओं के प्रतिशत को ले कर। बुंदेलखंड के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत ही विचित्र स्थिति दिखाई देती है। बुंदेलखंड जो दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है, दोनों की एक साथ बात की जाए तो आंकड़ों के अनुसार राजनीति में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर दिखाई देती है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों के परिदृश्य से अलग ही तस्वीर दिखाती है। .... इस बार आमसभा चुनावों में कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? यह एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर सूची जारी होने पर ही मिलेगा।’’
जब टिकटों की घोषणा हुई तो यह देख कर अत्यंत निराशा हुई कि किसी भी राजनीतिक दल ने महिला उम्मींदवारों पर विश्वास नहीं किया। उनकी संख्या आश्चर्यजनक आंकड़ों तक सीमित है। अतीत में झांक कर देखें तो 1957 से लेकर 2012 तक हुए पन्द्रह विधान सभा चुनावों में बुंदेलखण्ड के उत्तरप्रदेश वाले भाग में से लगभग 15 महिलाएं विधायक रही हैं। इनमें भी 11 दलित वर्ग से, 3 पिछड़े वर्ग से और एक सामान्य वर्ग से। यह आंकड़ा उस प्रदेश के बुंदेली भू-भाग का है जहां की मायावती के रूप में एक महिला मुख्यमंत्री के पद पर रह चुकी है और साबित कर चुकी है कि महिलाएं राजनीति में अपना सिकका जमा सकती हैं। सन् 1957 में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस की बेनीबाई झांसी जिले की मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित) सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में अपनी आमद दर्ज कराई थी। इसके बाद 1962 में इसी दल की सियादुलारी ने बांदा जिले की मऊ-मानिकपुर (अब चित्रकूट जिला) सीट से और बेनीबाई दोबारा मऊरानीपुर से विधायक बनी थीं। सन् 1967 में बेनीबाई तीसरी बार चुनी गईं और 1969 के चुनाव में कांग्रेस की ही सियादुलारी दोबारा अपनी सीट से विधायक चुनी गईं.। 1974 के चुनाव में जहां बेनीबाई चौथी बार चुनाव जीतीं। वहीं जेपी आंदोलन के चलते उन्हें 1977 में हार का सामना भी करना पड़ा। वर्ष 1980 के चुनाव में बेनीबाई झांसी की बबीना सीट से जीत दर्ज की और छठीं बार वह इसी सीट से 1985 के चुनाव में विधायक बनीं। इस प्रकार कांग्रेस के टिकट पर वह छह बार विधायक बनीं। वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सियादुलारी मऊ-मानिकपुर सीट से तीसरी बार विधायक चुनी गईं। साल 2002 के चुनाव में अंब्रेस कुमारी समाजवादी पार्टी के टिकट पर महोबा जिले की चरखारी सुरक्षित सीट से विधायक चुनी गईं थी और 2012 के चुनाव में झांसी के मऊरानीपुर (अनुसूचित जाति सुरक्षित) सीट से सपा की डॉ. रश्मि आर्या चुनी गईं थी। वर्ष 1977 में जेएनपी के टिकट पर सूर्यमुखी शर्मा झांसी सीट से चुनाव जीता था और 2012 के चुनाव में भाजपा की उमा भारती चरखारी सीट और हमीरपुर सीट से भाजपा की ही साध्वी निरंजन ज्योति ने चुनाव जीता था। वर्ष 2015 में चरखारी सीट में हुए उप चुनाव में सपा की उर्मिला राजपूत ने जीत हासिल कर के अपने राजनीतिक दखल को साबित किया था। ये आंकड़े और इतिहास था बुंदेलखण्ड के उत्तर प्रदेश के भू-भाग का। मध्यप्रदेश के बुंदेली भू-भाग की दशा इससे अलग नहीं है।
बुंदेलखंड के संदर्भ में कहा जाता है कि मंच पर महिलाओं को लुभाने की बातें करना, योजनाएं बनाना अलग बात है और चुनाव जीतकर सत्ता पाना अलग। महिलाओं को पर्याप्त संख्या में चुनाव में उम्मीदवार न बनाया जाना अपने आप में राजनीतिक दलों के महिला हितों के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगता है। मध्यप्रदेश में भी टीकमगढ़ ऐसा क्षेत्र है जहां से उमा भारती के रूप में महिला मुख्यमंत्री प्रदेश को मिली। उनका अल्पकालिक कार्यकाल भी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनके कार्यकाल में ‘पंचज’ योजना (जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर) पर ध्यान दिया गया। इसके बावजूद किसी भी राजनीतिक दल ने राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विधानसभा चुनावों में महिला उम्मींदवार नहीं बढ़ाए। वर्तमान में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और चंबल संभाग में दतिया एवं शिवपुरी की 30 विधानसभा सीटों में से भाजपा के पास 22 और कांग्रेस के पास आठ सीटें हैं।
पिछले चुनाव में पन्ना से कुसुम सिंह मेहदेले चुनाव जीतीं और मंत्री पद भी उन्हें प्रदान किया गया। जहां तक बुंदेलखण्ड के मध्यप्रदेशीय सम्भागीय मुख्यालय सागर का प्रश्न है तो यहां का इतिहास महिलाओं की दृष्टि से गौरवपूर्ण रहा है। केंद्र में बनीं अंतरिम सरकार में सागर की विदुषी कलावती दीक्षित को सदस्य मनोनीत किया गया था। केंद्र की अंतरिम सरकार में सागर सपूत डा. हरीसिंह गौर सदस्य थे। 25 दिसंबर 1948 को उनके आकस्मिक निधन के बाद कलावती दीक्षित को संविद सरकार में सदस्य बनाया गया था। इस तरह सागर से सांसद बनने वाली वे पहली महिला थीं। इसके बाद गोवा क्रांति में गोली खाकर भी तिरंगा थामने वाली सहोद्राबाई राय सागर से 1957 में पहली बार सांसद बनीं। वे सागर से तीन बार सांसद चुनी गईं। बुंदेलखंड से उमा भारती ने 2003 में मुख्यमंत्री का पद संभाला। वे इस क्षेत्र से मुख्यमंत्री पद पर पहुंचने वाली पहली महिला थीं। 1993 में सागर से सुधा जैन विधायक निर्वाचित हुईं। वे भी 1998 और 2003 में लगातार सागर से विधायक चुनी गईं।
विगत चुनाव में भाजपा टिकट से पारुल साहू ने सुरखी विधान सभा से चुनाव जीता था किन्तु इस बार उन्होंने स्वयं ही चुनाव न लड़ने का फैसला किया। सवाल इस बात का नहीं है वे किस पार्टी से संबंद्ध हैं, सवाल यह है कि एक तो महिलाओं को राजनीति में यूं भी कम स्थान दिया जाता है उस पर एक सुशिक्षित, कर्मठ महिला का चुनाव से पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। पिछले चुनाव में पृथ्वीपुर विधान सभा की अनितानायक चुनाव जीत कर विधायक बनीं। छतरपुर की ललिता यादव को इस बार उनका पिछला क्षेत्र बदल कर बड़ामलहरा क्षेत्र दे दिया गया। ज़मीनी तौर पर देखा जाए तो अकेले सागर में कई ऐसी महिलाएं हैं जो विभिन्न दलों में रहती हुई निरंतर सक्रिय रहती हैं फिर भी टिकट के समय उन्हें समीकरण से बाहर ही रखा गया। रेखा चौधरी, इन्दु चौधरी, लता वानखेड़े, शारदा खटीक, कुसुम सुरभि, रंजीता राणा आदि ऐसी कई महिलाएं हैं जिनकी राजनीतिक सक्रियता अख़बारों की सुर्खियों में रहती है और इनमें से कुछ तो राजनीतिक परिवारों से भी हैं। राजनीतिकदल चाहते तो इन महिलाओं को ले कर भी चुनावी समर लड़ सकते थे, क्यों कि जीत का शत प्रतिशत दावा तो कोई भी उम्मीदवार नहीं कर सकता है। यही तो लोकतंत्र की विशेषता है।
चुनाव आते ही स्टारप्रचारक और राष्ट्रीय स्तर के नेता बड़ी-बड़ी बातें ले कर हाजिर होने लगते हैं। फिर बात आती है महिला वोट उगाहने की तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होने लगती हैं और बड़ी तत्परता से अलग महिला बूथ भी बनाए जाने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीति में महिला आरक्षण को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी दशा में बुंदेलखण्ड जैसा क्षेत्र जहां महिलाएं अपने बहुमुखी विकास के लिए अभी भी अनुकूल वातावरण की बाट जोह रही हैं, राजनीतिक दलों द्वारा अविश्वास की शिकार हो रही हैं। बड़ी विचित्र स्थिति है। इस स्थिति से उबरने के लिए स्वयं महिलाओं को अभी लम्बा संघर्ष करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वे इस बार के चुनाव में बिना किसी प्रलोभन में आए सही उम्मीवार को चुन कर अपने भविष्य की रूपरेखा तय करें। यह आशा कठिन है लेकिन असंभव नहीं।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 21.11.2018)

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Wednesday, November 14, 2018

चर्चा प्लस ... बाल दिवस विशेष : क्या उपहार दे रहे हैं हम अपने बच्चों को ? - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 
बाल दिवस विशेष :
क्या उपहार दे रहे हैं हम अपने बच्चों को ?
- डॉ. शरद सिंह 
 
हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन हैं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? हमारे ये उपहार बच्चों को न तो अच्छा वर्तमान दे सकते हैं और न अच्छा भविष्य।
Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
पीठ पर लदा भारी-भरकम स्कूल बैग, कोचिंग क्लासेस के लिए भागमभाग कुल मिला कर बेइंतहा तनाव में जीते बच्चे। यदि बच्चा खेलना चाहता है तो उससे उस खेल को खेलने के लिए बाध्य किया जाता है जिसमें आगे चल कर वह कैरियर बना सके और लाखों कमा सके। यदि बच्चे को नाचने या गाने में रुचि है तो उसकी इस रुचि में भी टेलेण्ट-हण्ट वाले टी.वी. शोज़ में सहभागिता की चमक-दमक दिखाई देने लगती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बच्चे की रुचि में कमाई का जरिया देखने की हमारी आदत बनती जा रही है। जब यह तस्वीर है वर्तमान की तो भविष्य कैसा होगा? जब कि हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए न तो स्वच्छ वातावरण छोड़े रहे हैं और न र्प्याप्त प्राकृतिक संसाधन। जैसे एक जुआरी पिता जुआ खेलने के लिए कर्ज लेता चला जाता है और इस बात का कतई ध्यान नहीं रखता है कि उसके बच्चे उस कर्ज को कैसे चुकाएंगे, कुछ ऐसी ही दशा की ओर बढ़ रहे हैं हम और हमारे बच्चे।
दिल्ली जैसे महानगरों में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है कि अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों से ग्रस्त बच्चों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। नाक पर नक़ाब लगा कर सांस लेने को मज़बूर बच्चे और बाज़ारवाद के शिकार होते उनके माता-पिता सब कुछ देख कर भी मानो कुछ नहीं देख पा रहे हैं। जो नक़ाब ऑपरेशन थियेटर में पहने जाते थे, वे नक़ाब अब घर से निकलते ही लगाने की नौबत है। गोया समूचा शहर ही ऑपरेशन थियेटर में बदल गया हो। बस, अंतर यही है कि ऑपरेशन थियेटर के अन्दर का वातावरण स्वच्छ रहता है और उस स्वच्छता को बनाए रखने के लिए दस्ताने और नक़ाब पहने जाते हैं लेकिन शहर में गंदगी से बचने के लिए नक़ाब पहनने की जरूरत पड़ने लगी है।
जो गंदगी भरा वातावरण हम अपने बच्चों को दे रहे हैं उसी का परिणाम है कि आज पालने में झूलने वाले नन्हें बच्चे जीका वायरस से जूझ रहे हैं। यह वायरस देश के लगभग हर राज्य में फैलता जा रहा है। मध्यप्रदेश में यहां तक कि सागर जैसे कम विकसित शहर में भी इसके मरीज़ मिलने लगे हैं। ज़ीका वायरस दिन में एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। इस बीमारी में बुखार के साथ जोड़ों में दर्द और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसका कोई टीका नहीं है, न ही कोई ख़ास उपचार है। ये मच्छरों से ही फैलता है। ये वायरस दिन में ज्यादा सक्रिय रहता है। पाया गया है कि विशेष रूप से गर्भावस्था में महिलाएं इससे ज्यादा संक्रमित होती हैं। इससे प्रभावित बच्चे का जन्म आकार में छोटे और अविकसित दिमाग के साथ होता है। ये गर्भावस्था के दौरान वायरस के संक्रमण से होता है। इसमें शिशु दोष के साथ पैदा हो सकता है। नवजात का सिर छोटा हो सकता है। उसके ब्रेन डैमेज की ज्यादा आशंका होती है। साथ ही जन्मजात तौर पर अंधापन, बहरापन, दौरे और अन्य तरह के दोष दे सकता है। इसका सिंड्रोम शरीर के तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और इसके चलते लोग लकवा का शिकार हो जाते हैं। ये न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं भी दे सकता है। जीका वायरस कोई नया नहीं है। इसकी पहचान पहली बार सन् 1947 में हुई थी। जिसके बाद ये कई बार अफ्रीका व साउथ ईस्ट एशिया के देशों के कुछ हिस्सों में फैला था। अभी तक कैरेबियाई ,उत्तर व दक्षिणी अमेरिका के 21 देशों में ये वायरस फैल चुका है। भारत में इसके फैलने का सबसे बड़ा कारण है ऐसी गंदगी जहां मच्छर पलते रहते हैं। किसी भी स्वच्छता मिशन का सरकारी स्वरूप आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वातावरण नहीं दे सकता है। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को स्वच्छता को जीवनचर्या बनाना होगा। भले ही वह नागरिक करोड़ों के भवनों में रह रहा हो या झोपड़पट्टी में रहता हो। खुद के लिए नही ंतो अपने बच्चों के लिए यह जरूरी है। आज जीका वायरस है तो कल कुछ और इससे भी भयावह वायरस आ जाएगा, यदि आज हम नहीं सम्हले तो।
आपराधिक स्तर पर भी बच्चे अपराध से घिरे हुए दिखाई देने लगे हैं। जब अवयस्क युवा बलात्कार जैसा घिनौना अपराध करने लगें या फिर तीन-चार साल की नन्हीं बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जाने लगे तो इसे अच्छी सामाजिक दशा तो हरगिज नहीं कहा जा सकता है। अपराध और अपराधियों से आज बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। विकास के दावों के बीच यह एक कड़वा सच है कि हमने अपराधों में कहीं अधिक विकास कर लिया है। हमारे बच्चे न तो घर-परिवार में सुरक्षित हैं, न मोहल्ले में और न स्कूलों में। कोई दुश्मनी भी नहीं, मात्र व्यक्तिगत आनन्द के लिए बच्चों को शिकार बनाया जा रहा है। भारत सरकार द्वारा बच्चों से बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा दिए जाने का प्रावधान किए जाने के बाद भी घटनाएं थम नहीं रही हैं।
देश के विकास की दिशा में यूं तो लक्ष्य रखा गया है बच्चों के प्रति दुराचार, उनका शोषण, तस्करी, हिंसा और उत्पीड़न समाप्त करना। किन्तु सच तो यह है कि हमारी व्यवस्थाएं नहीं बचा पा रही हैं अपने बच्चों को। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन ‘चाइल्ड एब्यूज़ इन इंडिया’ के अनुसार भारत में 53.22 प्रतिशत बच्चों के साथ एक या एक से ज़्यादा तरह का यौन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न हुआ होता है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, सन् 2016 में अगवा बच्चों के 40.4 प्रतिशत मामलों में ही आरोप पत्र दाखिल हुआ। वहीं, 2016 में देश में बच्चों के विरुद्ध अपराध के 1,06,958 मामले दर्ज हुए, जबकि सन् 2015 में इनकी संख्या 94,172 थी। बच्चों की तस्करी, बंधुआ मज़दूरी, बेगारी, यौनशोषण और विवाह के लिए बच्चों के अपहरण के मामलों में बहुत वृद्धि हुई है। भारत में सन् 2016 में बच्चों के अपहरण के 54,723 मामले दर्ज हुए, जबकि सन् 2001 में ऐसे दर्ज मामलों की संख्या 2,845 थी। अर्थात् सोलह सालों में बच्चों के अपहरण के मामलों में 1,823 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सन् 2016 में बच्चों के अपहरण के 54,723 मामलों में से 39,842 लड़कियां थीं। इन आंकड़ों को देख कर चिंता होने लगती है कि जब हम बचचों को उनका सुरक्षित वर्तमान नहीं दे पा रहे हैं तो एक सुरक्षित भविष्य कहां से देंगे?
दिनों-दिन बढ़ते हुए बाल-अपराध हमारे सामाजिक जीवन के लिए एक चुनौती हैं। छोटे-छोटे बच्चों में अपराधी प्रवृत्तियां एक गंभीर समस्या बन गई है। बाल जीवन में बढ़ती जा रही हिंसा, क्रूरता, गुण्डागर्दी, नशेबाजी, आवारापन मानव-समाज के लिए एक गंभीर समस्या है। बाल अपराध इस तरह बढ़ रहे हैं कि उनका अनुमान कर सकना मुश्किल है। यूं तो बाल अपराधों के लिए सर्वेक्षण होता रहता है किन्तु कहीं की भी पूरे आंकड़े सामने नहीं आ पाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के अपराधों पर पर्दा डालते रहते हैं। अपने बच्चों के आपराधिक कारनामों को छिपाने के लिए माता-पिता जितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, यदि उससे आधी ऊर्जा भी बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देने में लगाएं तो बच्चों के अच्छे संस्कार खोने नहीं पाएंगे। बच्चों का दिमाग़ तो कोरी स्लेट के समान होता है, उसमें यदि आपराधिक प्रवृत्तियां लिख दी जाएं तो वहीं जीवन भर लिखी रहेंगी। आज बच्चे अगर अपने माता-पिता या मेहमानों को पलट कर जवाब देते हैं या बेअदबी से पेश आते हैं तो इसमें दोष बच्चों का नहीं, उन माता-पिता का है जिन्होंने हंस कर बढ़ावा दिया और अपराधी बनने की पहली सीढ़ी यानी ढिठाई पर चढ़ा दिया। आज 80 प्रतिशत बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी करते ही कैरियर वाली पढ़ाई के चक्कर में अपने घर से दूर पराये शहरों में चले जाते हैं। इसके बाद उनकी हमेशा के लिए अपनी घर वापसी बहुत कम हो पाती है। जो लौटते भी हैं वे फ्रस्टेशन से ग्रस्त रहते हैं। यह फ्रस्टेशन भी उन्हें उसी वातावरण से मिलता है जो हमने आर्थिक दबाव के रूप में रच दिया है। कमाऊ युवाओं के उदाहरणों से घिरे बेरोजगार युवा पारिवारिक दबाव में आ कर गलत कदम उठाने लगते हैं। या तो वे आत्मघाती हो उठते हैं या फिर अपराधी बन जाते हैं।
हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन है,ं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? हमारे ये उपहार बच्चों को न तो अच्छा वर्तमान दे सकते हैं और न अच्छा भविष्य।
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( सागर दिनकर, 14.11.2018)
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