Showing posts with label समीक्षक. Show all posts
Showing posts with label समीक्षक. Show all posts

Sunday, May 22, 2022

सतत संघर्ष की अनुपम गाथा है : शिखंडी स्त्री देह से परे - समीक्षक डॉ देवेंद्र सोनी


भोपाल से प्रकाशित "दैनिक चित्रकूट ज्योति" के रविवारीय परिशिष्ट में आज मेरे उपन्यास 'शिखण्डी' की समीक्षा समीक्षक देवेंद्र सोनी जी द्वारा की गई  है।



मूल टेक्स्ट साभार देवेंद्र सोनी जी की फेसबुक वॉल से.....

राजधानी भोपाल से प्रकाशित दैनिक चित्रकूट ज्योति के रविवारीय परिशिष्ट में पढ़िए -

डॉ.सुश्री शरद सिंह के उपन्यास 'शिखण्डी:स्त्री देह से परे' पर मेरी यह समीक्षा .

इस समीक्षा को आप हिन्दी प्रतिलिपि एप पर भी पढ़ सकते हैं।


https://hindi.pratilipi.com/story/o2isg9xjbtkd?utm_source=android&utm_campaign=content_share

मूल लेखन भी प्रस्तुत है - 

स्त्री-अस्तित्व,स्वाभिमान और गरिमा के सतत संघर्ष की अनुपम गाथा है उपन्यास - 'शिखण्डी : स्त्री देह से परे'


उपन्यास - शिखण्डी : स्त्री देह से परे

लेखिका - शरद सिंह

प्रकाशक - सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली

मूल्य - 300₹

समीक्षक - देवेन्द्र सोनी ,इटारसी


    अपने उपन्यासों के लिए चर्चित देश की ख्यातिप्राप्त साहित्यकार डॉ सुश्री शरद सिंह का उपन्यास "शिखण्डी - स्त्री देह से परे" पढ़ने का अवसर मिला। अब तक पचास से अधिक प्रकाशित पुस्तकों का लेखन करने वालीं लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ शरद सिंह का यह उपन्यास जनमानस में रचे - बसे महाकाव्य 'महाभारत' के एक शक्तिपुंज पात्र 'शिखंडी' पर आधारित है जिसमें लेखिका ने अपनी गहन विचार शक्ति से प्राण फूंक कर पाठकों के मन मस्तिष्क में हमेशा के लिए जीवंत कर दिया है।

       पौराणिक कथानक पर लिखा गया यह उपन्यास स्त्री-अस्तित्व,स्वाभिमान और गरिमा को संरक्षित करने के लिए सतत संघर्ष की अनुपम गाथा है जिसे लेखिका ने अपने संवाद कौशल से साहित्य की चिरकालिक स्मरणीय कृति बना दिया है। 

   यह उपन्यास ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखे जाने के बाबजूद भी युगों - युगों तक अन्याय के विरुद्ध नारी - प्रतिशोध का वह जीवंत दस्तावेज है जो वर्तमान और भविष्य में  स्त्री-विमर्श को नए आयाम देगा तथा उत्पीड़न/शोषण का प्रतिकार कर प्रतिशोध की प्रबलता को प्रवाहित करेगा।

        स्त्री विमर्श की विख्यात लेखिका शरद सिंह के इस उपन्यास-' शिखण्डी : स्त्री देह से परे ' में हमारी इसी ललक की पिपासा को संतुष्टि और समाधान मिलता है । यहां पाठकों को 'महाभारत' के बारे में सारगर्भित जानकारी तो मिलती ही है, साथ ही आदिकाल से चले आ रहे स्त्री - उत्पीड़न और उसके प्रतिकार स्वरूप सशक्त प्रतिशोध की संकल्पित ज्वाला भी धधकती हुई दिखाई देती है जो जन्म-जन्मान्तरों की कठिन तपस्या और शिवजी के वरदान से फलीभूत होती है।

    इस कथात्मक महाकाव्य 'महाभारत' के बारे में लेखिका 'अपनी बात' में लिखती हैं - "महाभारत' में इतिहास एवं युद्ध कथाएं तो हैं ही इसके अतिरिक्त मनोविज्ञान एवं विज्ञान का चमत्कृत कर देने वाला ज्ञान मौजूद है। प्रक्षेपास्त्र,परखनली शिशु तथा शल्य चिकित्सा द्वारा लिंग परिवर्तन का विवरण भी मिलता है। इस वैज्ञानिक ज्ञान ने 'महाभारत' की महत्ता को विश्वव्यापी बना दिया है।' महाभारत' के जितने भी प्राचीनतम लेखबद्ध - स्वरूप उपलब्ध हैं, उनका अध्ययन अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी 'नासा' द्वारा भी किया गया है तथा निरंतर किया जा रहा है। यहां तक कि दुनियाभर के एनशिएंट एलियन रिसर्चर भी 'महाभारत' काल में एलियंस की उपस्थिति की संभावना को जानने के लिए 'महाभारत' ग्रंथ का अध्ययन कर रहे हैं । यह माना जाता है कि 'महाभारत' के श्लोकों में अभी भी बहुत कुछ 'कोडीफाई' है और इसे 'डिकोड' करके प्राचीन काल के सुविकसित ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान के संदर्भ में 'महाभारत' में लौकिक, अलौकिक एवं पारलौकिक ज्ञान का प्रचुर भंडार है। 'श्रीमद्भागवतगीता' जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस आदि ग्रंथ के अभिन्न अंग 'श्रीमद्भागवतगीता' में जीवन मूल्यों को समझने के लिए अकाट्य सूत्र मौजूद हैं ।आधुनिक बाजार वादी युग के मैनेजमेंट गुरु भी अपने मैनेजमेंट की सफलता के लिए 'श्रीमद्भागवतगीता' के श्लोकों का सहारा लेते हैं।"

     उपन्यास  'शिखण्डी : स्त्री देह से परे' के सारांश पर आएं तो हस्तिनापुर राज्य के महाबली भीष्म द्वारा अपने राजा विचित्रवीर्य के परिणय हेतु काशी नरेश की राजकुमारी अम्बा और उसकी दो बहन अम्बिका तथा अम्बालिका को बल पूर्वक स्वयंवर स्थल से अपह्रत कर हस्तिनापुर ले जाया जाता है । यहां राजदरबार में महाराज शाल्वराज की प्रेयसी 'अम्बा'  राजा विचित्रवीर्य की रानी बनने से साफ इंकार कर देती है जबकि उसकी दोनों बहनें अम्बिका और अम्बालिका इस हेतु अपनी सहमति दे देती हैं। 

      राजकुमारी 'अम्बा' के प्रतिकार का कारण जानकर जब 'भीष्म' उसे शाल्वराज के पास वापस भेज देते हैं तो 'कापुरुष शाल्वराज' राजकुमारी 'अम्बा' को किसी और की 'जूठन' कह अस्वीकार कर देता है। अपने इस  अपमान से आहत राजकुमारी 'अम्बा'  बिफरकर पुनः हस्तिनापुर के दरबार में लौटती हैं और भीष्म को अपनी जिंदगी बर्बाद करने का दोषी करार देते हुए कहती है - ' धिक्कार है कुरुवंशियों पर! तुम सभी स्त्री को वस्तु समझते हो। धिक्कार है, तुम्हारी ऐसी सोच पर! ऐ भीष्म, तुमने मेरा जीवन नष्ट किया! तुमने मेरे सपनों को निर्ममता पूर्वक पददलित किया, तुमने मुझे सकल विश्व के समक्ष कलंकिनी घोषित करा दिया! ऐ भीष्म!  तुमने मात्र मेरा नहीं अपितु समस्त स्त्रीजाति का अनादर किया है।' अम्बा बोले जा रही थी और उसके स्वर की भीषणता से वहां उपस्थित सभी के हृदय किसी अनिष्ट की आशंका से कम्पित हो उठे।

  ' ऐ देवव्रत भीष्म! एक भीष्म प्रतिज्ञा करके तुम भीष्म कहलाए, तो सुनो, आज मैं भी एक भीष्म प्रतिज्ञा कर रही हूं कि तुम्हारी मृत्यु का कारण मैं ही बनूंगी ! मैं अम्बा! में भीष्मा ! आज इस कुरु राजसभा में प्रतिज्ञा लेती हुई घोषणा करती हूं कि जब तक मैं तुम्हें दण्डित नहीं कर दूंगी तब तक मेरी आत्मा को मोक्ष नहीं मिलेगा !' यह गर्जना करती हुई अम्बा जो भीष्म प्रतिज्ञा कर 'भीष्मा' बन चुकी थी, राज्यसभा से इस प्रकार चलती हुई चली गई, जैसे कोई सिंहनी हिरणों के झुंड को अपनी गर्जना से प्रकंपित कर प्रस्थानित होती है।

     राज दरबार से निकल कर दृढ़-प्रतिज्ञ अम्बा अपने पिता काशी नरेश के यहां न जाकर वन-प्रांतरों में अनेक मानसिक एवं शारीरिक यातनाओं को सहते हुए कठिन तपस्या करती है तथा अपने तपोबल से भगवान शिव से महाप्रतापी भीष्म की मृत्य का कारण बनने का वरदान प्राप्त करती है किन्तु अम्बा की यह प्रतिज्ञा पुरुष देह में ही पूर्ण हो सकती थी। अतः अम्बा अगले जन्म के लिए नदी में अपनी इहलीला समाप्त कर लेती है। यही नदी बाद में अम्बा नदी के रूप में जानी गई।

        दूसरे जन्म में वह अल्पकाल के लिए शिविका के रूप में जन्म लेती है और अपनी पूर्व जन्म की स्मृति को बरकरार रखते हुए भीष्म से प्रतिशोध की कामना लिए भगवान  शिव के कहने पर अपने शरीर को अग्नि में समर्पित कर देती है। 

...फिर अपने तीसरे जन्म में भी 'अम्बा ' पांचाल नरेश राजा द्रुपद के यहां कन्या रूप में ही जन्म लेती है जिसे राजप्रासाद में बालक के रूप में पाला-पोषा जाता है किन्तु विवाहोपरांत मधुयामिनी की रात्रि को 'शिखण्डी' का भेद खुल जाता है और अचेत अवस्था में उसे शिवजी का वरदान और अपना प्रतिशोध याद आता है। तब वह गुप्त मार्ग द्वारा महल छोड़कर पुनःअपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए निकल पड़ती है, मगर यह स्त्री देह में संभव कहाँ था ? 

     शिवजी के वरदान के बावजूद सशंकित मन से वह पुनः कठिन तपस्या करती है और क्षीण अवस्था में यक्ष चिकित्सक द्वारा शल्य क्रिया के माध्यम से पुरुष देह धारण कर वापस अपने राज्य में शिखण्डी के रूप में प्रवेश कर युद्धस्थल के लिए प्रस्थित होता है। 

     अम्बा के शिखण्डी बनने तक की तीन जन्मों की इस प्रतिशोध यात्रा को लेखिका ने अपनी कल्पनाशक्ति से मानो जीवंत कर दिया है । यहां संवाद-कौशल की जितनी तारीफ की जाए कम है। शिखण्डी के रूप में सहज जिज्ञासा को शांत करते हुए डॉ. शरद सिंह  कहती हैं -

"उसका अस्तित्व कैसा था ?

वह स्त्री था, पुरुष था अथवा तृतीय लिंगी? एक व्यक्ति से जुड़े अनेक प्रश्न... क्योंकि उसका अस्तित्व सामान्य नहीं था। वह शक्तिपुंज पात्र 'महाभारत' महाकाव्य का सबसे दृढ़ निश्चयी चरित्र है, जो अपने जीवन की प्रत्येक परत के साथ न केवल चौंकाता है वरन अपनी ओर चुम्बकीय ढंग से आकर्षित भी करता है । वह पात्र है शिखण्डी जिसका अस्तित्व भ्रान्तियों के संजाल में उलझा हुआ है। वहीं वह इतना प्रभावशाली पात्र है कि महर्षि वेदव्यास ने 'महाभारत' के सबसे इस्पाती पात्र भीष्म से 'अम्बोपख्यान' कहलाया है ,जो शिखण्डी की ही कथा है, जबकि भीष्म और शिखण्डी के मध्य वैमनस्यता का नाता रहा । इस अत्यंत रोचक पात्र की जीवन गाथा अंतस को झकझोरने में सक्षम है। अतः शिखण्डी के संपूर्ण जीवन को नवीन दृष्टिकोण से जांचने ,परखने और प्रस्तुत करने की आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता।  जब शिखण्डी के जीवन की परतें खुलती हैं तो हमारे प्राचीन भारत में सुविकसित ज्ञान के उस पक्ष की भी परतें खुलकर सामने आने लगती है जहाँ शल्य चिकित्सा द्वारा लिंग परिवर्तन किए जाने के तथ्य उजागर होते हैं । इन तथ्यों का ही प्रतिफलन है यह उपन्यास-'शिखण्डी : स्त्री देह से परे'।"

   लेखिका ने इस उपन्यास में समाहित अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों में कल्पना का रंग भरते हुए उन्हें अपनी विशिष्ट शैली में रोचक बना दिया है । संवाद कौशल ने इन प्रसंगों को यादगार बना दिया है जो पाठकों के मन मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ते हुए उन्हें प्रभावित करते हैं। 

'महाभारत' के 18 दिन चले युद्ध में शिखण्डी अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने हेतु भीष्म पितामह की मृत्यु का कारक बनने के लिए अधीर नजर आता है ।

    उसे यह अवसर मिलता है जब - शिखण्डी ने अर्जुन के आगे आकर भीष्म पर बाणों की वर्षा आरंभ कर दी। उसका एक भी बाण भीष्म को आहत नहीं कर पा रहा था क्योंकि शिखण्डी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर नहीं था। भीष्म को तो किसी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के बाण ही चोट पहुंचा सकते थे जबकि शिखण्डी के सामने आते ही भीष्म ने अपना धनुष झुका दिया था। वे अंबा की स्त्री - आत्माधारी स्त्री योनि -जन्मा शिखण्डी पर शर-संधान नहीं करने हेतु विवश थे। कृष्ण ने इस उचित अवसर को पहचाना और अर्जुन को संकेत किया।अर्जुन ने शिखण्डी की ओट से भीष्म पितामह पर बाणों की वर्षा आरंभ कर दी । बाणों का प्रहार इतना तीव्र था कि अर्जुन के बाण भीष्म के कवच को भेदते हुए उसके शरीर को छलनी करने लगे। देखते ही देखते पचासों बाण भीष्म की देह के आर- पार हो गए। दम्भी भीष्म शरशैय्या पर शिथिल पड़ा था,शिखण्डी के ठीक सामने।

      लेखिका ने यहां भीष्म और शिखण्डी की मनो-वार्ता का जो वृहद संवाद लेखन किया है वह अद्भुत है। संक्षिप्त में इसे आप भी देखिये  - "शिखण्डी के नेत्रों में विजय भाव थे तो भीष्म के नेत्रों में पश्चाताप के भाव।

' अब हम दोनों मुक्त हो जाएंगे, इस जन्म- जन्मांतर के बंधन से। मात्र उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा है ,मुझे भी, तुम्हें भी!' भीष्म ने अति मद्धम स्वर में शिखंडी से कहा, जिसे मात्र शिखण्डी ने ही सुना।

'मरणासन्न को क्षमा नहीं करोगी, अंबा?' 

यह भीष्म का शिखण्डी से मानसिक वार्तालाप था ।

'तुमने भी तो नहीं किया था देवव्रत!' शिखण्डी  ने भी उसी प्रकार मानस तरंगों से प्रत्युत्तर दिया।

' मैं प्रणबद्ध था।'

'मैं प्रणयबद्ध थी।'

'मैं अनभिज्ञ था।'

  ' कोई भी कर्म करने के पूर्व तत्सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना भी तो आवश्यक होता है, देवव्रत!' तुम्हें भी हम तीनों बहनों के बारे में ज्ञात करना था। नहीं कर सकते थे तो हम तीनों की इच्छा तो पूछते। क्या तुम्हारी दृष्टि में स्त्री की इच्छा का कोई मोल नहीं था?'

'था न ! महारानी सत्यवती और उनके पिता की इच्छा पर ही तो मैंने भीष्म प्रतिज्ञा ली थी।'

..स्वयं को दोष मुक्त कराने के लिए कुतर्क मत करो ! तुम सुविज्ञ हो और सुविज्ञ थे ! ...उत्तम यही होगा कि तुम अब अपने अंतिम समय में अपने अपराध स्वीकार कर लो! यदि तुम ऐसा करोगे तो सम्भवतः मैं सूर्य के उत्तरायण होने तक तुम्हें क्षमादान दे दूं!' शिखण्डी ने कहा ।

  ' मैं यही करूंगा!' मैं क्षमा मांगूंगा... अपनी स्वयं की आत्मा से भी, मैंने उसका कहना कभी नहीं सुना ...पर अब सुनूंगा... जो भी समय शेष है ,उसमें सुनूंगा!' भीष्म के कथन में पश्चाताप का भाव था।

   इस मानसिक संवाद के मध्य पितामह भीष्म के नेत्रों से अश्रुधाराएं बह निकलीं। इन अश्रुधाराओं को सभी ने देखा, किंतु उस मानसिक संवाद को कोई नहीं सुन सका। परिणामतः सभी को यही प्रतीत हुआ कि पितामह को शारीरिक पीड़ा हो रही है। इन अश्रुओं के मर्म को यदि कोई समझ रहा पा रहा था तो वह था शिखण्डी और कृष्ण ।

  इस तरह अपने तीसरे जन्म में राजकुमारी अम्बा का प्रतिशोध एवं प्रतिज्ञा स्त्री देह से परे शिखण्डी के रूप में पूर्ण होती है। 

   लेखिका कहती हैं - वह अपने पहले जन्म में कन्या के रूप में जन्मीं और स्त्री के रूप में अपने प्रेम सम्बन्धों को जीना चाहती थी मगर ऐसा हो न सका। अपने दूसरे जन्म में वह एक सामान्य कन्या के रूप में जन्मी,किन्तु उसने अद्भुत जीवन जिया। तीसरे जन्म में भी कन्या के रूप में वह जन्मीं और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुष बनी। यही पुरुष शिखण्डी था जिसने स्त्री देह से परे रहते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की।

   जब शिखण्डी का अंत हुआ तो वह अंत नहीं आरम्भ था जो युगों-युगों तक स्त्रियों के अपने स्वाभिमान,अपने अस्तित्व और अपनी गरिमा के संघर्ष के लिए मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। इस सत्य का स्वयं समय साक्षी बना कि अम्बा, शिखण्डी के रूप में जनम्बन्धन से मुक्त हुई और रच गई एक स्त्री की देह से परे एक अदभुत देहगाथा। 

      यह उपन्यास भाषाई संहिता और संवाद कौशल के साथ ही शिखण्डी से जुड़े एक नए दृष्टिकोण को सामने रखता है । सदियों से चली आ रही मान्यता की -' शिखण्डी' थर्ड जेंडर था ! इस उपन्यास को पढ़ने के बाद टूटती दिखाई पड़ती है और यह विदित होता है कि शिखण्डी तो कभी थर्ड जेंडर था ही नहीं। वह स्त्री के रूप में जन्मा और शल्य चिकित्सा द्वारा पुरुष के रूप में परिवर्तित होकर उसने अपना प्रतिशोध लिया। इस दृष्टि से यह उपन्यास बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पुरातन ग्रंथों एवं महाकाव्यों के चरित्रों को एक नए दृष्टिकोण से देखने का आह्वान करता है। स्त्री विमर्श का एक नया आयाम रचने के लिए लेखिका को साधुवाद।


  - देवेन्द्र सोनी

सम्पादक 

युवा प्रवर्तक

इटारसी।

मो.9111460478




#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #उपन्यास #शिखंडीस्त्रीदेहसेपरे #शिखंडी #उपन्याससमीक्षा #पुस्तकसमीक्षा

Tuesday, May 10, 2022

पुस्तक समीक्षा | पवित्र प्रेम का सुंदर आख्यान है उपन्यास ‘‘काबेरी के खंडहर’’ | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 10.05.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई आर. के. तिवारी के उपन्यास "काबेरी के खंडहर" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
---------------------------------------


पुस्तक समीक्षा
पवित्र प्रेम का सुंदर आख्यान है उपन्यास ‘‘काबेरी के खंडहर’’
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------------------
उपन्यास  - काबेरी के खंडहर
लेखक    - आर. के. तिवारी
प्रकाशक  - एन डी पब्लिकेशन 10 सिविल लाइन एलआईसी बिल्डिंग सागर
मूल्य     - 150 /-
-------------------------------------
प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप।
एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौं  सूरज  अरु धूप।।
- रसखान का यह दोहा प्रेम के स्वरूप की समुचित व्याख्या करता है। वस्तुतः प्रेम एक ऐसा समवेत है जो हर आयु वर्ग के व्यक्ति को प्रभावित करता है चाहे व्यक्ति स्वयं प्रेम में प्रवृत्त हो अथवा ना हो किंतु प्रेम की चर्चा उसे सदा सुहाती है। महात्मा गांधी कहते थे कि ‘‘जहां प्रेम है, वहां जीवन है।’’
सागर के संवेदनशील लेखक आर के तिवारी का नया उपन्यास ‘‘कावेरी के खंडहर’’ एक प्रेम कथा है। यह प्रेम कथा उस काल की है जब नवाब और तवायफ एक हुआ करती थीं। बेमेल संबंधों के बीच कभी-कभी पवित्र प्रेम कि कोंपलें भी फूट पड़ती थीं। ऐसे ही एक पवित्र प्रेम का सुंदर आख्यान है ‘‘काबेरी के खंडहर’’। शरतचन्द्र चटर्जी मानते थे कि ‘‘प्रेम की पवित्रता का इतिहास ही मनुष्य की सभ्यता का इतिहास है, उसका जीवन है।’’

हमारे देश का मुगलकालीन इतिहास नवाबों की विलासिता के किस्सों से भरा पड़ा है। नवाब वाजिद अली शाह क ही ले लीजिए, वाजिद अली शाह का नाम आते ही उनसे जुड़ी तीनों बातें दिमाग में कौन सी जाती हैं उनका नवाब होना, उनका संगीत प्रेम और उनकी मोहब्बतों की दास्तान। उनकी 300 बेगम थीं और अनेक तवायफें उनके संरक्षण में नृत्य संगीत की महफिलें सजाती रहीं। तवायफों के बारे में एक दिलचस्प बात यह भी है कि उस दौर में लोग अपने किशोरवय के बेटों को तवायफों के पास तहजीब सीखने के लिए भेजा करते थे। तब आए थे रेड लाइट एरिया में खड़ी होने वाली कॉल गर्ल के समान नहीं होती थीं बल्कि उनका अपना एक अलग मुकाम होता था। समाज में उनकी पूर्ण प्रतिष्ठा भले ही नहीं थी किंतु उन्हें पूरी तरह हिकारत से भी नहीं देखा जाता था। कई तवायफें महफिलें सजाती थीं, उसमें शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत का प्रदर्शन करती थीं। ठुमरी, दादरा के सुर छेड़ती थीं। कई तवायफें ऐसी थीं जिनके दैहिक संबंध सिर्फ अपने संरक्षक के साथ ही रहते थे, वेद जिस्मफरोशी नहीं करती थीं। ष् काबेरी के खंडहरष् ऐसी ही एक निष्ठावान तवायफ की मर्मस्पर्शी कथा है। वस्तुतः यह एक लघु उपन्यास है। उपन्यास के आरंभिक पन्नों में लेखक द्वारा लिखित गए ‘‘चंद शब्द’’ रूपी भूमिका के बाद आलोचक डॉ लक्ष्मी पांडे द्वारा इस उपन्यास की विस्तृत समीक्षा दी गई है जिसे पढ़कर उपन्यास पढ़ने के पूर्व ही काफी-कुछ खाका पाठक के सामने आ जाता है और  उपन्यास के प्रति जिज्ञासा बढ़ जाती है। जहां से उपन्यास का कथानक आरंभ होता है वहां उपन्यास का नाम लिखते हुए लेखक ने कोष्टक में ‘‘काल्पनिक’’ लिख दिया है। यह लेखक के द्वारा उपन्यास के कथानक के प्रति एक डिस्क्लेमर है।
        उपन्यास का कथानक उत्तर प्रदेश के हमीरपुर के निकट स्थित काबेरी के खंडहरों से आरंभ होता है यह स्थान सुल्तानगंज से महत्त्व 5-6 मील दूर है। एक खंडहर जो अपने अतीत की खूबसूरत कहानी समेटे हुए हैं जिसमें ढेरों चहल-पहल है, प्रेम है, वैमनस्य है, मातृत्व है और राग रंग है। लेखक ने काबेरी के खंडहरों का परिचय देते हुए लिखा है-‘‘यह हवेली जिसे आज कावेरी के खंडहरों के नाम से जाना जाता है कभी नवाब साहब की शिकारगाह हुआ करती थी जिसे नवाब साहब ने कावेरी नाम की एक नाचने वाली को दे दिया था और फिर इस महल में रौनक आ गई थी। वह शिकारगाह जहां महीनों कोई नहीं जाता था पर कावेरी के आते ही वह महल जैसा सज गया। कहते हैं कि इस महल को नवाब साहब ने दुल्हन की तरह सजाया था फिर तो इस महल में कावेरी के घुंघरू की खनक सुनाई देने लगी। उसकी सुरीली आवाज में गाए गाने पूरे क्षेत्र में गूंजने लगे। तबला, सारंगी के सुर सुनाई देने लगे। जिन्हें सुनने के लिए इस सुनसान जगह में लोग बाग आने लगे। क्योंकि अंदर तो कोई जा नहीं सकता था इसलिए महल के बाहर से ही महल के अंदर हो रहे जश्न का आनंद कानों से लेकर आनंदित होने लगे।’’
यह परिदृश्य उस समय का है जब उत्तर भारत में नवाबों की परंपरा कायम थी। नवाब तवायफों पर अपनी जागीरें लुटा दिया करते थे। इस उपन्यास में मुख्य पात्र नवाब साहब और नर्तकी काबेरी बाई हैं। इन्हीं के समानांतर कुछ और प्रमुख पात्र हैं जो कथानक को विस्तार देते हैं तथा अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति बनाए रखते हैं। इनमें लखनऊ की नर्तकी जीतन बाई जोकि काबेरी की मां है, नवाब साहब की पत्नी सुरैया बेगम और उनकी चचेरी बहन नूरी बेगम जो नवाब साहब के छोटे भाई छोटे मियां की पत्नी हैं, छोटे मियां जो नवाब साहब के छोटे भाई हैं। यह सभी पात्र इस उपन्यास के ताने-बाने को बड़ी कुशलता से थामें रखते हैं। सुरैया और नूरी में जेठानी देवरानी का रिश्ता होते हुए भी परस्पर गजब का बहनापा देखा जा सकता है जो नवाब साहब के खानदान की गरिमा को बचाए रखने में अपना पूरा योगदान देता है।
उपन्यास में दो प्रकार के चरित्र प्रभावित करते हैं। एक चरित्र तो वह जो नवाब से अगाध प्रेम करता है किंतु उसे नवाब के साथ जीवन बिताने की सामाजिक अनुमति नहीं है अर्थात कावेरी रूपी स्त्री चरित्र। दूसरा स्त्री चरित्र है सुरैया का जो नवाब की पत्नी जिसे नवाब के साथ जीवन बिताने की सामाजिक अनुभूति प्राप्त है किंतु उसे नवाब के साथ समय व्यतीत करने के लिए भी कई कई दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। तो विपरीत ध्रुवीय स्थितियों को जीने वाली दो स्त्रियां। नवाब के छोटे भाई छोटे मियां इन दोनों स्त्रियों के बीच अपनी पत्नी नूरी के माध्यम से सामंजस्य बैठाने का प्रयास करते हैं। नूरी सुरैया को समझाती है कि ‘‘यदि कावेरी चाहती तो नवाब साहब बस शादी के लिए दबाव बना सकती थी। पर नहीं उसे आपकी चिंता भी थी। वह आपका सम्मान करती थी। वह आपको दुखी नहीं करना चाहती थी। उसे आपकी सौत नहीं बनना था। बस उसे नवाब साहब से सच्ची और पाक मोहब्बत थी जिसमें खुदा की रजामंदी भी रही होगी वरना ऐसे मामले बीच में ही खत्म हो जाते हैं। ऐसे किस्से, किस्से बनकर रह जाते हैं।’’
  भले ही काबेरी सुरैया की सौत नहीं थी, लेकिन सौत के सामान थी। अपनी सोच की प्रशंसा सुनना और उसके पक्ष को स्वीकार करना एक स्त्री के लिए बहुत बड़ी दुविधा की स्थिति होती है। इस अंतर्द्वंद्व को लेखक ने बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। ऐसे स्थान पर लेखक का भाषाई कौशल बड़ी सुंदरता से उभर कर सामने आया है- ‘‘नूरी की बातें सुरैया के पूरे जिस्म में हजारों सुइयों की भांति चुभती रही और वह सुनती रही।’’
   सुरैया एक ऐसा पात्र है जो कावेरी के सापेक्ष द्वितीय स्थान पर है किंतु अत्यंत प्रभावी है। यह पात्र विषाक्त हो सकता था किंतु लेखक ने उसे अपने लेखक व कौशल से अमृतमय बना दिया। यह एक प्रेम कहानी के संदर्भ में बड़ा चुनौती भरा दायित्व था जिसे लेखक ने पूरी गंभीरता से निभाया है। कावेरी और नवाब साहब के मध्य वैवाहिक संबंध भले ही नहीं था किंतु उनके प्रेम संबंध के फलस्वरूप उन दोनों की नरगिस के रूप में एक बेटी इस दुनिया में जन्म लेती है। कावेरी और नवाब साहब के बाद नरगिस का जीवन अंधकार में हो जाता। हो सकता है कि नरगिस को भी अपनी मां कावेरी के समान किसी नवाब के संरक्षण में जीवन जीना पड़ता। समाज की दृष्टि में एक कलंकित जीवन। किंतु सुरैया नरगिस को अपनाकर एक विशिष्ट चरित्र स्थापित करती है तथा कथानक को एक सुखद मोड़ दे देती है।
     इस उपन्यास आद्योपांत रोचकता बनाए रखने वाला प्रवाह है। लेखक ने पात्रों और उनके चरित्र को करते हुए जहां एक और भावना प्रधान तत्वों को साधा है, वहीं दूसरी ओर कथानक में कसाव बनाए रखा है। लगभग 54 पृष्ठ का लघु उपन्यास होते हुए भी यह एक दीर्घ उपन्यास का आनंद देने में सक्षम है। किसी विशेष विमर्श के खांचे में न रखते हुए इसे एक विशुद्ध प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास कहां जा सकता है, जिसमें प्रेम के विविध रंग देखे जा सकते हैं। यह उपन्यास अपने आप में एक बैठक में ही पढ़ लिए जाने का आग्रह करता है। इसमें वे सारे तत्व हैं जो पाठक को कथानक से बांधे रखते हैं और उपन्यास पढ़े जाने के बाद देर तक इसके पात्र पाठक के मन मस्तिष्क पर छाए रहते हैं। उपन्यास के अंतिम पृष्ठों पर लेखक आरके तिवारी ने अपने कहानी संग्रह ‘‘कुमुद पंचरवाली’’ पर 6 समीक्षाएं प्रस्तुत की हैं। आर के तिवारी इसके पूर्व एक और लघु उपन्यास लिख चुके हैं। वह भी नारी प्रधान है और  जिसका नाम है ‘‘करमजली’’। उनका यह दूसरा लघु उपन्यास ‘‘काबेरी के खंडहर’’ रोचक है, पठनीय है और लगभग संवेदनहीन हो चले वर्तमान कठोर वातावरण  में प्रेम के कोमल संवेग का स्मरण कराता है।             
           ----------------------------              
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Wednesday, May 4, 2022

जो प्रायः गोपन रहता है कथा साहित्य के द्वारा हमारे सामने उभर कर आता है। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

‘‘जीवन विविध रंगों से बना होता है, वह चाहे स्त्री का हो या पुरुष का। किंतु हमारा सामाजिक ढांचा इस प्रकार है कि जिसमें स्त्री के हिस्से में फीके, धूसर रंग अधिक आते हैं। भले ही उसकी देह पर वस्त्र या साज-सज्जा के रूप में चटक रंग दिखाई देंगे लेकिन भीतर से उसके जीवन का त्रासद पक्ष, जो कि प्रायः गोपन रहता है कथा साहित्य के द्वारा हमारे सामने उभर कर आता है।" अपने ये विचार मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) अपने समीक्षा उद्बोधन में कहे। अवसर था होटल मैजेस्टिक प्लाज़ा के सभागार में म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई द्वारा लेखिका देवकी भट्ट नायक  के कहानी संग्रह " दूसरा मंगलसूत्र " और डॉ. दिव्या नायक की स्वास्थ संबंधी पुस्तक " Detoxifying Mind ,Body And Soul " का विमोचन समारोह।
      इस आयोजन में मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ कथाकार श्री मुकेश वर्मा (भोपाल) विशिष्ट अतिथि थे दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा) तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता की श्री शैलेंद्र शैली (भोपाल) ने। कहानी संग्रह पर समीक्षात्मक उद्बोधन दिया मैंने तथा डॉ आशुतोष मिश्र ने।
दिनांक 02.05.2022

पुस्तक समीक्षा | स्त्रीजीवन के धूसर रंगों को उद्घाटित करती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 03.05.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका देवकी भट्ट नायक ‘दीपा’ के कहानी  संग्रह "दूसरा मंगलसूत्र" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
---------------------------------------
पुस्तक समीक्षा
स्त्रीजीवन के धूसर रंगों को उद्घाटित करती कहानियां
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
----------------------
कहानी संग्रह - दूसरा मंगलसूत्र
लेखिका     - देवकी भट्ट नायक ‘दीपा’
प्रकाशक     - भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड नई दिल्ली-3
मूल्य       -  240 रुपए 
-------------------------------------
 सन् 1914, 6 अगस्त को, कथाकार फ्रेंज काफ्का ने अपनी डायरी में लिखा, ‘‘मेरे सपनों के आंतरिक जीवन को चित्रित करने की मेरी प्रतिभा ने अन्य सभी मामलों को पृष्ठभूमि में डाल दिया है। मेरे जीवन में बहुत कुछ घटित हो चुका है, और कुछ भी मुझे कभी संतुष्ट नहीं करेगा।’’ दरअसल यह असंतोष यह बेचैनी ही तो है जो एक कथाकार को जीवन को विश्लेषणात्मक ढंग से देखने, जांचने, परखने और संभावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रेरित करती है। यही कारण है कि हिंदी कथा के पुरोधा प्रेमचंद ‘‘सोजेवतन’’ लिखकर नहीं रुके बल्कि उनके भीतर विद्यमान असंतोष उनसे निरंतर उपन्यास और कहानियां लिखाता गया।
इी प्रकार एक सच यह भी है कि स्त्री के जीवन को केंद्र में रखकर जब एक स्त्री कथा साहित्य रचती है तो उसमें यथार्थ के ताने-बाने बहुत ही कुशलता और गहनता से बुने होते हैं। ‘‘दूसरा मंगलसूत्र’’ लेखिका देवकी भट्ट नायक ‘दीपा’ का प्रथम कहानी संग्रह है। इस कहानी संग्रह में उनकी कुल 21 कहानियां संग्रहीत हंै। ये 21 कहानियां स्त्रीजीवन के उन 21 रंगों का एक ऐसा कोलाज़ निर्मित करती है जिसमें कुछ रंग गहरे हैं तो कुछ फीके हैं इस प्रकार ये कहानियां धूसर रंगों को प्रमुखता से सामने रखती हैं। वस्तुतः जीवन विविध रंगों से बना होता है, वह चाहे स्त्री का हो या पुरुष का। किंतु हमारा सामाजिक ढांचा इस प्रकार है कि जिसमें स्त्री के हिस्से में फीके, धूसर रंग अधिक आते हैं। भले ही उसकी देह पर वस्त्र या साज-सज्जा के रूप में चटक रंग दिखाई दंे लेकिन भीतर से उसके जीवन का त्रासद पक्ष, जो कि प्रायः गोपन रहता है कथा साहित्य के द्वारा हमारे सामने उभर कर आता है। जब हम ऐसे कहानियां पढ़ते हैं तो सोचने पर विवश हो जाते हैं कि कोई स्त्री अपने जीवन में इतनी सारी ऋणात्मकता को कैसे झेल लेती है? एक स्त्री तो दूसरे स्त्री के दुख को प्रायः समझ लेती है किंतु पुरुष वर्ग पूरी तरह से उस पीड़ा को महसूस नहीं कर पाता है। उसके लिए दो दुनिया अलग-अलग होती है-एक घर के भीतर की दुनिया और एक घर के बाहर की दुनिया। अपनी स्त्री को वह घर के भीतर रखना चाहता है, अपने लाभ के लिए उपयोग में लाना चाहता है और अपने से दोयम दर्जे में रखना चाहता है। निस्संदेह यह हर स्त्री और हर पुरुष पर लागू नहीं होता है किंतु लगभग 70 प्रतिशत स्त्री-पुरुषों पर यह स्थिति लागू होती है। शिक्षित वर्ग भी इससे अछूता नहीं है। धनाढ्य वर्ग में भी जहां स्त्रियां आर्थिक रूप से सशक्त दिखाई देती है, वहां भी स्त्री दोयम स्थान ही रखती है। इस सच को चाहे जितना भी नकारा जाए उससे सच नहीं बदलता है और इसी सच को एक कथाकार कुशलता से अपनी कहानियों में पिरो कर एक ऐसा लिबास बुनता है जो स्त्री के अस्तित्व को तो प्रतिष्ठा का लिबास पहनाता है किंतु एक पारदर्शी वस्त्र की भांति समाज की मानसिक नग्नता को उजागर कर देता है।
देवकी भट्ट की कहानियां स्त्री जीवन के संघर्ष को रेखांकित करते हुए उनकी समस्याओं और भावनाओं को सामने रखती हैं। इन कहानियों में ग्रामीण स्त्री भी है और शहरी स्त्री भी। इनमें गरीबीरेखा से नीचे की स्त्री भी है और मध्यमवर्गीय कामकाजी स्त्री भी। यह कहानियां आग्रह करती हैं स्त्री जीवन को समझने की।
संग्रह की प्रथम कहानी ‘‘बाघिन’’। यह पहाड़ों की स्त्री की साहस कथा है जो वस्तुतः किसी भी अंचल की हो सकती है। बस, अंतर इतना ही रहेगा की पहाड़ों में कथा-नायिका को चार पैर के हिंसक पशु का सामना करना पड़ा जबकि अन्य इलाकों में दो पैर के हिंसक पशुओं से भी उसका सामना होता रहता है। पहाड़ों की स्त्री अन्य स्त्रियों की भांति श्रम करती है किंतु उसका श्रम अपने परिवार के लिए होता है अतः उसका न तो मूल्यांकन किया जाता है और न उसके श्रम को महत्व दिया जाता है। कमोवेश यही स्थिति लगभग दुनिया के हर स्थान पर है।
दूसरी कहानी है ‘‘आर्डर’’। संघर्ष का एक ऐसा तिलिस्म रचती है जिसमें अनेक उतार-चढ़ाव मौजूद हैं। स्त्री पर लांछन लगाना सबसे आसान काम होता है। अब यह उस स्त्री पर निर्भर करता है कि वह उस लांछन के आगे घुटने टेक देती है, हार मान लेती है अथवा डटकर मुकाबला करती है और उस लांछन की परवाह किए बिना अपने अस्तित्व को साबित करती है। यह कहानी इन्हीं संभावनाओं के साथ अपने क्लाइमेक्स पर पहुंचती है।

इस संग्रह में एक कहानी है ‘‘थप्पड़ की गूंज’’। इस कहानी को पढ़ते-पढ़ते सहसा उस फिल्म की याद आ जाती है जिसे 1973 में मनमोहन देसाई ने निर्देशित किया था। फिल्म का नाम था ‘‘आ गले लग जा’’। फिल्म एक ऐसे बच्चे के ट्रीटमेंट पर केंद्र थी जिसका इलाज नहीं हो पा रहा था। फिर डॉक्टर उस बच्चे के साथ कठोरता का व्यवहार करता है जिससे वह ठीक हो जाता है। इस फिल्म ने उस समय बॉक्स ऑफिस पर 1.5 करोड़ रुपए कमाए थे। यह एक सुपर-डुपर हिट फिल्म साबित हुई थी। इसमें शशि कुमार और शर्मिला टैगोर का लीड रोल था। कुछ ऐसी ही मूल कथा है ‘‘थप्पड़ की गूंज’’ की। बहुत कुछ ड्रामेटिक। भले ही कहानी में सकारात्मक पक्ष है किंतु  इसकी नायिका एक शिक्षिका है अतः विद्यार्थी पर कठोरता बरतना उसके लिए उचित नहीं है और यह बात उसे स्वयं भी महसूस होती है। यह कहानी संयोगों का सूत्र पकड़ कर अपने अंत तक पहुंचती है।
शादी-विवाह के बंधन मात्र दो व्यक्तियों को नहीं अपितु दो परिवारों को आपस में जोड़ने का कार्य करते हैं यदि गहराई से जांच-पड़ताल न की जाए तो परिणाम दुखद साबित होते हैं। हमारे भारतीय समाज में ऐसी स्थितियों में स्त्री को ही विषमताओं का सामना करना पड़ता है। ‘‘उनसे पूछ लो’’ कहानी इसी तथ्य की ओर इंगित करती है। जिसमें एक स्त्री अपने ससुरालियों से बिना पूछे अपने मायके भी नहीं जा सकती है, चाहे उसकी मां मरणासन्न ही क्यों न हो।
‘‘कौमुदी’’ माता-पिता की अनदेखी के चलते बाल यौन शोषण की एक ऐसी कथा है जो यह बताती है कि बच्चे तो ‘‘बैड टच’’ और ‘‘गुड टच’’ को ठीक से नहीं समझ पाते हैं किंतु यह माता-पिता का दायित्व बनता है कि वह अपने बच्चों का ध्यान रखें कि कहीं उनके साथ कुछ बुरा तो नहीं घटित हो रहा है क्योंकि इस तरह की घटनाओं का संबंध है भले ही आर्थिक आधार से हो किंतु माता-पिता की सजगता उसे रोक सकती है।
‘‘पूनम का चांद’’ कहानी एक लंपट पुरुष की लिप्सा की कहानी है। इस कहानी का अंत भी अत्यंत ड्रामेटिक है। एक कथाकार के लिए यह तय करना जरूरी है की वह अपनी कहानी का अंत अपनी अभिलाषा के अनुरूप तय करना चाहता है अथवा यथार्थ के अनुरूप रखता है। लेखिका देवकी भट्ट कि अधिकांश कहानियां ड्रामेटिक अंत पर जाकर ठहरती हैं। 

‘‘आधे घंटे की आजादी’’ जिसे लेखिका ने ‘संस्मरणात्मक कथा’ कहां है, एक स्त्री की मार्मिक कथा है। पुरुष लाचार अवस्था में होकर भी स्त्री को अपनी सेविका ही मानता है, वहीं दूसरी ओर स्त्री भी स्वयं को सेविका मानने का समझौता करके जिंदगी जीती रहती है। यह कहानी अपने पीछे बहुत से प्रश्न छोड़ जाती है कि क्या इस तरह की परिस्थितियां बदली जा सकती है? क्या स्त्री अपने लाचार अवस्था के पति की बराबरी सहयोगिनी बन सकती है? ये वे प्रश्न हैं जिनके उत्तर पाठकों के मन मस्तिष्क में देर तक विचरण करते रह सकते हैं। इसी तरह एक और संस्मरण कहानी है ‘‘मौनी बाबा’’। यह लोकमंगल का विमर्श रचती है। ‘‘नर्मदा में डुबकी’’, ‘‘पक्यात’’ कहानियां सामाजिक अंतर्विरोधों को रेखांकित करती हैं।  
संग्रह की शीर्षक कहानी ‘‘दूसरा मंगलसूत्र’’ वैवाहिक रिश्ते में मिले छल से स्वयं को निकालने की संघर्ष कथा है। इसमें एक स्त्री अपने पक्ष में उचित निर्णय लेती है और पूर्व अनुभव को याद रखते हुए स्वयं अपना दूसरा मंगलसूत्र बनने का प्रण करती है। इसमें ‘मंगलसूत्र’ नामक वैवाहिक आभूषण को संरक्षण के प्रतीक के रूप में लेते हुए स्वयं की संरक्षिका बनने काआह्वान किया गया है। यह संग्रह की एक सशक्त कहानी है।

लेखिका ने आम बोलचाल की हिन्दी भाषा के साथ ही गढ़वाली और बुंदेली बोली को भी अपने संवादों में अभिव्यक्ति दी है जो पात्रानुसार उचित है तथा कथा के वातावरण से पाठक को जोड़ने में सहायता करती है।
संग्रह के ब्लर्ब पर वरिष्ठ साहित्यकार टीकाराम त्रिपाठी तथा आलोचक एवं कवि महेंद्र सिंह द्वारा लिखित टिप्पणियां है। संग्रह की सभी कहानियां पाठक से संवाद करने को उत्सुक दिखाई देती हैं। यह इन कहानियों की अपनी मौलिक विशेषता है। ये सभी कहानियां स्त्री जीवन के धूसर रंगों को उद्घाटित करती कहानियां हैं। कहानियों का नरेशन प्रभावी है। कथाकार देवकी भट्ट नायक ‘दीपा’ का यह प्रथम कहानी संग्रह है जो इस बात की तस्दीक करता है कि लेखिका अपनी कथायात्रा पूरी गंभीरता से जारी रखना चाहती हैं। समय के साथ कुछ एक कमियों को साधने के बाद निश्चित रूप से वे एक परिपक्व कथाकार के रूप में हिंदी साहित्य जगत में अपना स्थान बनाएंगी, ऐसा मुझे विश्वास है। यह कथा संग्रह पठनीय है एवं रुचिकर है।                   
           ----------------------------               
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Tuesday, April 26, 2022

पुस्तक समीक्षा | हिन्दी कथासाहित्य के भविष्य को आश्वस्त करती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 26.04.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई काव्या कटारे के कहानी  संग्रह "काली लड़की" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
---------------------------------------
पुस्तक समीक्षा
हिन्दी कथासाहित्य के भविष्य को आश्वस्त करती कहानियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------------------
कहानी संग्रह - काली लड़की
लेखिका     - काव्या कटारे
प्रकाशक     - बुक्स क्लीनिक पब्लिशिंग, बी डी काॅम्प्लेक्स, तिफ्रा ओव्हर ब्रिज के निकट,बिलासपुर (छग)
मूल्य       -  130 रुपए 
-------------------------------------
हिन्दी साहित्य के समक्ष बार-बार एक यक्ष प्रश्न आ खड़ा होता है कि उसका भविष्य क्या है? किसी न किसी चिंतन गोष्ठी या डिबेट में यह आकुलता चिंता बनकर उछलती है कि हिन्दी साहित्य के पाठक कम होते जा रहे हैं। लम्बे-चैड़े मंथन के बाद यही निष्कर्ष निकाला जाता है कि हिन्दी साहित्य को पाठक कम मिलने का सबसे बड़ा कारण है कि नई पीढ़ी हिन्दी के बजाए अंग्रेजी के अधिक निकट है। हिन्दी का सारगर्भित गंभीर साहित्य पढ़ने के स्थान पर अंग्रेजी चिकलेट्स पढ़ना और समझना उनके लिए आसान होता है। इस विषय पर मैंने अपनी बात कई संगोष्ठियों में रखी है कि हम जैसा बोएंगे, वैसा ही काटेंगे। हमने अपनी नई पीढ़ी को अगर अंग्रेजी के खारे समुद्र में फेंक दिया है तो वे हिन्दी के मीठे पानी के प्राणी भला कैसे बन सकते हैं? यदि हम नई पीढ़ी को भाषा के रूप में अंग्रेजी दें किन्तु साहित्यिक संस्कार हिन्दी के दें तो कोई कारण नहीं है कि वे हिन्दी साहित्य से विमुख होंगे। मुझे अपनी बात सौ प्रतिशत खरी उतरती मिली जब मैंने युवा कथाकार काव्या कटारे की कहानियां पढ़ीं। काव्या कटारे का कथालेखन ही अपने आप में एक नया विमर्श रचता है। 
काव्या कटारे का कहानी संग्रह है ‘‘काली लड़की’’। इस संग्रह की कहानियों के कलेवर पर अथवा लेखिका पर मैं कोई विचार प्रकट करूं इसके पूर्व संग्रह की कहानियों में निहित भाषाई सौंदर्य की चर्चा करना आवश्यक समझती हूं। एक कहानी है ‘‘वृत्त’’। इस कहानी में एक संवाद है जिसे उाहरण के रूप में यहां दे रही हूं-‘‘बेटा, पूरा चांद तो महीने में एक बार आता है। और ईद का चांद वह तो पूरे साल में एक बार आता है। पर तारे रोज चादर बन कर पूरे आसमान को ढंक लेते हैं। ऐसा ही हमारी ज़िन्दगी में होता है। ये बड़ी-बड़ी खुशियां ईद के चांद की तरह होती हैं और छोटी-छोटी खुशियां इन तारों की तरह। बड़ी खुशियां हमारी ज़िन्दगी में चांद की तरह एक-दो बार ही आती हैं, पर छोटी-छोटी खुशियां रोज हमारी पूरी ज़िदगी ढंक लेती हैं। चांद तो महीने में बस एक बार दिखाई देता है। तारे रोज निकलते हैं। यही जीवन का वृत्त है।’’
एक वाक्य का एक उदाहरण और कहानी ‘‘चाय की प्याली’’ से-‘‘आसपास की सभी दूकानें आंखें बंद कर गहरी नींद में जा चुकी थीं।’’
इन दो उदाहरणों के बाद यह तथ्य सामने रखना चैंकाने से कम नहीं है इन्हें लिखने वाली लेखिका काव्या कटारे ने इन्हें मात्र 13-14 वर्ष की आयु में लिखा है। एक ऐसी किशोरी जिसकी सहेलियों का सरोकार खेल, मोबाईल और पढ़ाई के अलावा और किसी चीज से नहीं होगा, वह स्वयं हिन्दी में कथासाहित्य रच रही है। क्योंकि उसे अंग्रेजी मात्र एक भाषा के रूप में सौंपी गई है किन्तु संस्कार हिन्दी साहित्य के दिए गए है। संग्रह की भूमिका में काव्या ने इस बात को स्वयं स्वीकार किया है कि उसे साहित्य के संस्कार अपने दादा जी सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार महेश कटारे ‘सुगम’ से मिले हैं। किन्तु किसी साहित्यिक परिवार में जन्म लेना ही सबकुछ नहीं होता है, जब तक कि स्वयं के भीतर साहित्य के प्रति रुचि और समझ न हो। काव्या की कहानियां पढ़ कर यह दावे से कहा जा सकता है कि साहित्य सृजन की क्षमता काव्या के डीएनए में एक जिनोम की तरह है जिसमें सभी विधाओं के जींस विद्यमान हैं। फिलहाल काव्या ने अपनी प्रतिभा को एक कथाकार के रूप में प्रस्तुत करते हुए हिन्दी कथासाहित्य के भविष्य को भी चिंतामुक्त करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। काव्या के कथालेखन को देखते हुए इस बात से आश्वस्त हुआ जा सकता है कि हिन्दी कथासाहित्य का भविष्य उज्ज्वल है। यदि नौंवी कक्षा में पढ़ने वाली 14 वर्षीया छात्रा हिन्दी में इतनी परिपक्व कहानियां लिख सकती है तो हिन्दी कथासाहित्य को लेखन या पठन संबंधी किसी भी प्रकार का संकट नहीं है।
‘‘काली लड़की’’ कहानी संग्रह में कुल दस कहानियां हैं। संग्रह में कहानियों से पूर्व इन कहानियों एवं काव्या के कथालेखन पर हिन्दी साहित्य जगत के दिग्गजों की टिप्पणियां हैं। कथाकार आशुतोष लिखते हैं कि ‘‘मैं उस काव्या को जानता हूं जो कहानियां लिखती है’’। भालचंद्र जोशी टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि ‘‘काव्या की कहानियां लोकहित की संकल्पना और निर्णय में यथार्थ’’। राजनारायण बोहरे के अनुसार ‘‘काव्या एक प्रतिभाशाली कथा लेखिका’’ है। कथाकार मनीष वैद्य मानते हैं कि काव्या की कहानियां ‘‘साधारण से असाधारण खोजने की कहानियां’’ हैं। डाॅ. पद्मा शर्मा कहती हैं कि ‘‘काव्या की कहानियां हमें आश्वस्त करती हैं।’’ बात जिज्ञासा की है कि जब इतने सारे साहित्य मनीषी काव्या की कहानियों के प्रति विश्वास प्रकट कर रहे हैं तो ऐसा क्या है इन कहानियों में? यही रेखांकित करने योग्य मूल प्रश्न है जिसका उत्तर काव्य के कथालेखन को स्थापना दिलाता है। वस्तुतः लेखिका में अपनी आयु से आगे बढ़ कर समाज के मनोविज्ञान एवं व्यवस्था-अव्यवस्था को समझने की क्षमता है। न केवल समझने की अपितु उसे अपने दृष्टिकोण से विश्लेषित कर के सामने रखने की निपुणता भी है। जैसे कहानी ‘‘काली लड़की’’ में एक ऐसी लड़की की पीड़ा और झुंझलाहट को अभिव्यक्ति दी गई है जिसकी त्वचा की रंगत गहरी सांवली है। यह कहानी लड़की के रंग को ले कर भारतीय समाज की मानसिकता पर गहरी चोट करती है। इसका कथानक लीक से हट कर है किंतु पीड़ा परंपरागत है। विशेषता यह है कि इस कहानी में लेखिका काली लड़की की व्यथा को उस शिखर तक पहुंचा देती है जहां उसकी व्यथा उसका आत्मविश्वास बन कर उसके सामने आ खड़ी होती है। 
कोरोना काल के भयावह दौर ने सभी के अंतर्मन को छुआ है। उस ‘ब्लैक फेज़’ में हम में से बहुतों ने अपनों को खोया है। इस ब्लैेक फेज़ को ले कर अनेक कहानियां लिखी गईं। लेकिन कुछेक कहानियां ही ऐसी हैं जो उस समय की पीड़ा को समुचित अभिव्यक्ति दे सकी हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि काव्या की कहानी ‘‘चीखें’’ उनमें से एक है जो संज़ीदगी से लिखी गई है। दुर्भाग्यवश समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो कन्या के जन्म को अभिशाप मानते हैं। यदि वे गर्भ में कन्याभ्रूण को नहीं मरवा पाते हैं तो सद्यःजात कन्याशिशु को मार कर, कूड़े में फेंक कर अथवा नदी, नाले में बहा कर उस से पीछा छुड़ा लेते हैं। इसी अमानवीय कृत्य पर केन्द्रित है कहानी ‘‘कन्यादान’’। इस कहानी का ट्रीटमेंट नया है क्योंकि इसमें मां अथवा कन्याशिशु की ओर से नहीं बल्कि उस नदी की ओर से नरेशन है जिसमें सद्यःजात कन्याशिशु को जीते जी बहा दिया जाता है। 
सन् 2018 में दक्षिण कोरियाई लड़कों के एक म्यूजिक बैंड ‘‘बीटीएस’’ ने एक संगीतमय अभियान चलाया था जिसका मोटो का ‘‘लव माईसेल्फ’’। बैंड के सदस्य सूगा ने इस अभियान को स्पष्ट करते हुए कहा था कि ‘‘अपनी तुलना दूसरों से मत करो।’’ दूसरे सदस्य जे-होप ने कहा था कि ‘‘खुद को पहचानो कि तुम क्या चाहते हो और क्या कर सकते हो।’’ इसी बैंड के सदस्य आर एम का कहना था कि ‘‘खुद से कहो कि मैं अच्छा कर सकता हूं और खुद से प्यार करो।’’ सात सदस्यों का यह कोरियाई पाॅप बैंड उस समय किशोर आयु के युवकों का बैंड था जिसने अपने इस संदेश से पूरी दुनिया पर अपनी छाप छोड़ी और आज भी लोकप्रिय है। दरअसल जब युवा पीढ़ी निरंतर प्रतिस्पद्र्धाओं से जूझ रही हो तो उसमें हीन भावना और अवसाद जागना स्वाभाविक है। ऐसे दौर में युवाओं में आत्मविश्वास जगाना भी जरूरी है।  काव्या की कहानी ‘‘किस की तरह’’ इसी विषय पर एक सार्थक विमर्श खड़ा करती है। ‘‘तुम किसकी तरह बनना चाहती हो?’’ प्रश्न से कहानी आरम्भ होती है, फिर वहां से आगे बढ़ती हुई दिलचस्प मोड़ लेने लगती है और कहानी का अंत एक सुखद निर्णय पर पहुंचता है जिससे कहानी अत्यंत रोचक बन पड़ी है। 
‘‘गोद’’ एक मार्मिक कहानी है। यह कहानी इस बात की चर्चा करती है कि जब हमारे माता-पिता अथवा संबंधी हमारे साथ होते हैं तो हमें उनका महत्व समझ में नहीं आता है किन्तु उनके न होने पर हर पल उनकी कमी महसूस होती है। दोनों कहानियां- ‘‘वो’’ और ‘‘चाय की प्याली’’ यदि किसी बड़ी आयु के लेखक ने लिखी होती तो ये सामान्य कहानियां मानी जातीं क्योंकि इनमें कार्यालयीन जीवन में खटने, जूझने और असंतुष्ट होने का कथानक है। किन्तु ये दोनों कहानियां उस समय विशेष हो उठती हैं जब यह ध्यान रखा जाए कि इन्हें चैदह वर्षीया छात्रा ने लिखी है। कामकाजी व्यक्तियों के जीवन का लेखिका का आॅबजर्वेशन चकित कर देने वाला है। दोनों कहानियां प्रभावी हैं। विशेष रूप से ‘‘चाय की प्याली’’ तो बेहद सशक्त कहानी है। ‘‘वृत्त’’,‘‘अपना दुख-सुख’’ घटनाओं एवं मनःस्थितियों का बेहतरीन तानाबाना बुनती हैं। वहीं कहानी ‘‘हक़’’ लेखिका की संवेदनाओं के विस्तार को दर्शाती है जिसमें अचानक लाईट चले जाने पर कुछ ही देर में महसूस होने वाली असुविधा से कथानायिका बालिका के मन में यह विचार उठता है कि ‘‘जब थोड़ी देर के लिए लाईट जाने पर हम इतने बेचैन हो गए तो सोचिए, गांवों में लोग कैसे रहते होंगे। वहां तो लाईट होती ही नहीं। क्या सुख-सुविधाओं पर हमारा हक है, उन गांव वालों का कोई हक़ नहीं?’’ 
काव्या कटारे का एक बालकविता संग्रह ‘‘धमाचौकड़ी’’ प्रकाशित हो चुका है। ‘‘काली लड़की’’ उनकी दूसरी पुस्तक है। उनकी कहानियां देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। काव्या के कथालेखन में परिपक्वता दिखाई देती है। उनका यह प्रथम कहानी संग्रह स्वागतेय है, पठनीय है और उन कथालेखकों के लिए एक लाईटहाउस की तरह है जो आयु में भले ही बड़े हों किंतु लेखन में जिन्हें गहरी दृष्टि की जरूरत है। यदि एक वाक्य में इस संग्रह की समीक्षा की जाए तो बेझिझक कहा जा सकता है कि यह एक नन्हीं लेखिका का गहन-गंभीर कथासंग्रह है।
           ----------------------------               
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Tuesday, April 19, 2022

पुस्तक समीक्षा | प्रतिरोध को शब्द देती कविताएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 19.04.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई मणिकांत चौबे  ‘बेलिहाज़’ के कविता  संग्रह "बेलिहाज़ कलम" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
---------------------------------------


पुस्तक समीक्षा
प्रतिरोध को शब्द देती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------------------
काव्य संग्रह - बेलिहाज़ कलम
कवि       - मणिकांत चौबे  ‘बेलिहाज़’
प्रकाशक    - बुंदेलखंड हिंदी साहित्य-संस्कृति विकास समिति (मंच)
मूल्य       -  100 रुपए
-------------------------------------

मैं पूछता हूं आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक्त इसी का नाम है
कि घटनाएं कुचलती हुई चली जाएँ
मस्त हाथी की तरह
एक समूचे मनुष्य की चेतना को ?
   - ये पंक्तियां हैं अपने समय के जुझारू कवि अवतार सिंह पाश की।

दरअसल, जिस कवि में इस तरह के प्रश्न करने का साहस होता है वही अपनी अभिव्यक्ति के साथ न्याय कर पाता है। कवि भी एक इंसान होता है जो अपने अनुभव से सीखता है और अपने अनुभवों को अगर उसे सही शब्दों में पिरोना आ गया तो वह एक ऐसा कवि बनने में सक्षम हो जाता है जो आम आदमी की आवाज को अपने शब्द दे सके।
प्रतिरोध के ऐसे ही कवि हैं मणिकांत चौबे बेलिहाज जी। इनकी कविताएं समाज, राजनीति और अर्थतंत्र में व्याप्त विसंगतियों को अभिव्यक्त करती हैं। हमारे चारों ओर बिखरी हुई जटिलता और जीने की निर्मम शर्तों के प्रति हमारी चेतना को झकझोरती हैं। विरोधाभासों को खंगालना और उनके विरुद्ध आवाज उठाना हर किसी के बस की बात नहीं होती है।
यदि सच कहने में लिहाज आड़े आ रहा हो तो सच कहते नहीं बनता है और तब बेलिहाज होकर ही सच्चाई को प्रखरता से सामने रखा जा सकता है।
यह उस समय और भी संभव हो जाता है जब विचार एहसास बनकर कवि के मन में समाए रहते हैं उदाहरण के लिए बेलिहाज कि ‘एहसास‘ शीर्षक कि यह कविता देखें-
मैं तो हूं एहसास तुम्हारा
मुझे कब तक अनकहा रखोगे
जब भी अंतस को उकसाऊंगा
तुम मुझे सहसा ही कह दोगे
मैं सिहरन को भी कंपन दूंगा
सोते जगते की भी लाचारी दूंगा
रग-रग मुझ से प्रभावित होगी
मैं नया शक्तिपुंज गढ़ूंगा
सच क्या तुम यह सब
सह लोगे जब भी?

अपनी समय को प्रतिबिंबित करती कविताएं ही कालजयी होती हैं। यही वे कविताएं हैं जिनसे पाठक या श्रोता स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करता है और उसे इन कविताओं में आत्मकथात्मकता दिखाई देती है। ‘जिंदगी‘ शीर्षक कविता इसकी बानगी है-
हां सचमुच, बहुत जटिल
व्यवस्था है जिंदगी
अनजान राहों पर चलती
फुटपाथों पर पलती
कहीं अय्याशी में कटती
कहीं एड़िया रगड़ती
और कहीं यूं ही जाती जिंदगी
बारूद से मरती है
आत्मघात भी करती है
कहीं दीर्घायु बनती है
कहीं अल्पायु है जिंदगी
धर्मांधता में लुटाई जाती है
समर्पण कर जलाई जाती है
कभी जिद में मिटाई जाती है
अगर बच जाए जाते-जाते
कहते हैं हजार न्यामत है जिंदगी
गोलियां भी छीनती है
बोलियां भी छीनती है
माले मुफ्त हो जैसे बेलिहाज
सियासी बिसात है जिंदगी।

कवि मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज‘ की कविताएं  मानवता का आह्वान करती हुईं, शोषण और अन्याय के विरुद्ध डट कर खड़ी हैं। उनकी कविताएं वर्तमान की विसंगतियों और कटु सत्य को उजागर करने का नैतिक साहस रखती है। संग्रह की कुछ कविताएं अंतस को गहरे तक झकझोरती हैं। ‘अवसरवाद‘ ऐसी ही एक कविता है-
आज फिर रमिया के बर्तन सूखे हैं
आज फिर कलुआ के बच्चे भूखे हैं
आज फिर पिछड़ी बस्ती में हाहाकार है
इसका कौन जिम्मेदार है?
उत्तर में सब मौन
उत्तर दे भी कौन?
राजनीति अवसरवादिता की है
कभी आंख फाड़ फाड़ कर देखती है
और किसी को लक्ष्य करके घेरती है
और कभी आंख मूंद
सूरदास की तरह जीती है

धर्म अर्थ और समाज से जुड़ी जीवन की कठिनाइयां, विसंगतियां, भय, निराशा और तमाम अंतर्विरोध कवि के चिंतन को पैरालाइज्ड नहीं कर पाते हैं। वह इन सब से जूझता हुआ इन्हें ललकारता है। इस तेवर की सबसे प्रखर कविता है इस संग्रह में ‘- बात कहूं मैं खुल्लमखुल्ला‘। इस कविता का एक अंश देखें -
कहीं अड़े हैं पंडित पंडा
तो कहीं खड़े हैं काजी-मुल्ला
पर यह धर्म कर्म की बात नहीं
बात कहूं मैं खुल्लम खुल्ला
न घर के बाहर राम खड़े हैं
न बेघरबार मिले हैं अल्ला
अपनी-अपनी ढपली और अपना राग
सब राजनीति का गोरखधंधा

जमीनी सच्चाई से उनका जुड़ाव एवं अनुभव उनकी हर कविताओं में मुखर होकर सामने आया है जिससे उनकी कविताएं विश्वसनीयता की शर्त को पूरा करती हैं। बेलिहाज जी निश्चित रूप से एक समर्थ एवं सशक्त कवि हैं। संग्रह में अधिकांश  छंद मुक्त कविताएं हैं जो पूर्णतः सशक्त हैं। किंतु इन कविताओं के साथ ही कुछ दोहे और कुछ गजलें भी संग्रह में रखी गई हैं। इनमें कुछ कविताएं ऐसी भी है जो शेष कविताओं से साम्य  नहीं बिठा पाई हैं। जैसे- ‘प्यारे बच्चों‘ ‘वर्षारितु‘, ‘26 जनवरी‘ आदि। यदि कविताओं के चयन में कवि ने लोभ संवरण किया होता तो यह पूर्णतः एक निश्चित भावभूमि की कविताओं का और अधिक प्रभावी काव्य संग्रह होता। किंतु इसका आशय यह भी नहीं है कि ये सभी कविताएं पठनीय नहीं है। प्रत्येक कविता की अपनी अलग उपादेयता है तथा कुलमिलाकर उनका यह प्रथम काव्य संग्रह ‘बेलिहाज कलम‘ प्रतिरोध से भरपूर पठनीय कविताओं का संग्रह है।
           ---------------------------              
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Tuesday, December 14, 2021

पुस्तक समीक्षा | कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित एक अनूठी पुस्तक ‘‘सापेक्ष 60’’ | समीक्षक - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 14.12. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संपादक महावीर अग्रवाल द्वारा संपादित पुस्तक "सापेक्ष 60" की समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
---------------------------------------
पुस्तक समीक्षा
कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित एक अनूठी पुस्तक ‘‘सापेक्ष 60’’  
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------------------
पुस्तक       - सापेक्ष 60 (कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित)
संपादक      - महावीर अग्रवाल
प्रकाशक     - सापेक्ष, ए-14, आदर्श नगर, दुर्ग (छ.ग.)
मूल्य        - 200/-
----------------------------------------
‘‘सापेक्ष 60’’ एक पुस्तक के रूप में जब मुझे डाक से मिली तो मैं यह देख कर अवाक् रह गई कि हार्डबाउन्ड पुस्तक, सुंदर छपाई, पृष्ठ संख्या 472 और मूल्य मात्र 200 रुपये। क्या आज के समय में यह संभव है? मेरे हाथों में इसका प्रमाण था ‘‘सापेक्ष 60’’ के रूप में। वस्तुतः यह ‘‘सापेक्ष’’ पत्रिका का 59 और 60 संयुक्तांक है किन्तु एक हार्डबाउन्ड पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। इतनी मोटी पुस्तक का मूल्य 600 रुपये से अधिक ही होता। उस पर इस पुस्तक में संग्रहीत सामग्री की मूल्यवत्ता देखें तो इसकी कीमत हज़ारों में जाएगी। किन्तु यह संपादक महावीर अग्रवाल का ही साहस है जो उन्होंने पत्रिका के उस संयुक्तांक को जो हिन्दी की प्रतिष्ठित लेखिका कृष्णा सोबती पर केन्द्रित है, एक हार्डबाउन्ड पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। इस तरह के उदाहरण धार्मिक पत्रिकाओं के महत्वपूर्ण अंकों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के सिलसिले में ही मिलते हैं। कम से कम हिन्दी साहित्य जगत में यह अपने आप में एक अनूठी पुस्तक है। बेशक़ इसे प्रकाशित करने के लिए रज़ा फाउन्डेशन से आर्थिक अनुदान प्राप्त हुआ है किन्तु अनुदान ले कर भी कोई संपादक इस प्रकार का साहस नहीं कर पाता है। यह सचमुच प्रशंसनीय कार्य है।
रज़ा फाउन्डेशन के संबंध में यहां उल्लेखनीय है कि हिंदी के प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी कृष्णा सोबती के सबसे निकट एवं विश्वसनीय रहे हैं। इसी मित्रता के आधार पर कृष्णा सोबती ने अपने और अपने पति शिवनाथ के जीवन की सारी जमा पंूजी जो एक करोड़ रुपए थी और दिल्ली के मयूरविहार इलाके में स्थित उनका फ्लैट रजा फाउंडेशन के नाम करते हुए अशोक वाजपेयी को सौंप दिया था। कृष्णा सोबती की अभिलाषा थी कि रज़ा फाउंडेशन इस पैसे और संपत्ति का उपयोग भारतीय लेखकों और सृजनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए करे। अपने एक साक्षात्कार में अशोक वाजपेयी ने यह स्पष्ट शब्दों में कहा था कि- ‘‘ ऐसा कोई दूसरा भारतीय लेखक नहीं, जिसने इतनी दरियादिली से दूसरे लेखकों और उनके सृजन के लिए पैसे दिए हों।’’
महावीर अग्रवाल ने कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित ‘‘सापेक्ष 60’’ को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर कृष्णा सोबती की अभिलाषा को भी पूरा किया है क्योंकि इतने कम मूल्य में उन पर केन्द्रित समग्र सामग्री किसी भी शोधार्थी अथवा कृष्णा सोबती के कृतित्व के प्रति जिज्ञासा रखने वाले व्यक्ति की ज़ेब पर कतई भारी नहीं पड़ेगी।
कृष्णा सोबती हिन्दी की लेखिकाओं में वह क्रांतिकारी नाम है जिसने खुल कर, साहस के साथ कलम चलाई और वे कभी डरी या घबराई नहीं। वे अपने लेखन के साथ समाज के कट्टरपंथियों के सामने डट कर खड़ी रहीं। कृष्णा सोबती का जन्म पंजाब प्रांत के गुजरात नामक उस हिस्से में 18 फरवरी 1925 को हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने आरम्भ में लाहौर के फतेहचंद कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा की शुरुआत की थी, परंतु जब भारत का विभाजन हुआ तो उनका परिवार भारत लौट आया। कृष्णा सोबती की शिक्षा दिल्ली और शिमला में हुई।
कृष्णा सोबती को अपने कथापात्रों के मनोविज्ञान को अपने उपन्यासों और कहानियों में उतारने में महारत हासिल थी। उनके सभी पात्र प्रखर होते थे। विशेषरूप से उनकी कहानियों के स्त्री पात्र अपने अस्तित्व के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले होते थे, जिसके कारण वे कई बार विवादों में भी रहीं। उन्होंने जिंदगीनामा, डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, तिन पहाड़, समय सरगम, जैनी मेहरबान सिंह, गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान, ऐ लड़की, दिल-ओ-दानिश और चन्ना जैसे उपन्यास लिखें।
लेखन में निर्भीकता, खुलापन और भाषागत प्रयोगशीलता ये तीन विशेषताएं कृष्णा सोबती को अपने समकालीन लेखिकाओं से अलग करती हैं। सामाजिक बंदिशों के समय में अपने स्त्री समाज के प्रति मुखर होना उनके आंतरिक साहस को रेखांकित करता है। सन् 1950 में कहानी ‘‘लामा’’ से अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ करने वाली कृष्ण सोबती स्त्री की स्वतंत्रता और न्याय की पक्षधर थीं। उन्होंने समय और समाज को केंद्र में रखकर अपनी रचनाओं में एक युग को गढ़ा। अपने लेखन के बारे में उनका कहना है कि ‘‘मैं बहुत नहीं लिख पाती हूं। मैं तब तक कलम नहीं चला पाती हूं, जब तक अंदर की कुलबुलाहट और उसे अभिव्यक्त करने का दबाव इतना अधिक न बढ़ जाए कि मैं लिखे बिना न रह सकूं।’’
उन पर यह आक्षेप लगाया जाता रहा है कि एक स्त्री होने के बाबजूद ‘‘यारों के यार’’ और ‘‘मित्रों मरजानी’’ में उन्होंने उन्मुक्त भाषा (बोल्ड) का प्रयोग किया जबकि वे भली-भांति जानती थीं कि उन पर ‘‘अश्लील लेखन’’ के आरोप लगेंगे। अपने एक विदेशी रेडियो साक्षात्कार में उन्होंने ‘‘अश्लील लेखन’’ के आरोप पर खुल कर अपने विचार रखे थे। उन्होंने कहा था कि - ‘‘भाषिक रचनात्मकता को हम मात्र बोल्ड के दृष्टिकोण से देखेंगे तो लेखक और भाषा दोनों के साथ अन्याय करेंगे। भाषा लेखक के बाहर और अंदर को एकसम करती है। उसकी अंतरदृष्टि और समाज के शोर को एक लय में गूंथती है। उसका ताना-बाना मात्र शब्द कोशी भाषा के बल पर ही नहीं होता। जब लेखक अपने कथ्य के अनुरूप उसे रुपांतरित करता है तो कुछ ‘नया’ घटित होता है। मेरी हर कृति के साथ भाषा बदलती है। मैं नहीं, वह पात्र है जो रचना में अपना दबाव बनाए रहते हैं। ‘ज़िन्दगीनामा’ की भाषा खेतिहर समाज से उभरी है। ‘दिलोदानिश’ की भाषा राजधानी के पुराने शहर से है, नई दिल्ली से नहीं। उसमें उर्दू का शहरातीपन है। ‘ऐ लड़की’ में भाषा का मुखड़ा कुछ और ही है। उसकी गहराई की ओर संकेत कर रही हूं।’’
कृष्णा सोबती को सन 1980 में जिंदगीनामा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन 1981 में शिरोमणि पुरस्कार के अतिरिक्त मैथिली शरण गुप्त सम्मान से सम्मानित किया गया। सन 1982 में कृष्णा सोबती को हिंदी अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। सन 1996 में कृष्णा सोबती को साहित्य अकादमी फेलोशिप से पुरस्कृत किया गया। सन 1999 में, लाइफटाइम लिटरेरी अचीवमेंट अवार्ड के साथ कृष्णा सोबती प्रथम महिला बनीं जिन्हें कथा चूड़ामणि अवार्ड से नवाजा गया। सन 2008 में हिंदी अकादमी दिल्ली का ‘शलाका अवार्ड’ भी उनको मिला तथा सन 2017 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
एक दिलचस्प बात जिसके बारे में उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ सन् 1952 में लिख कर प्रकाशक के पास भेजा किन्तु प्रकाशक ने उसकी भाषा पर आपत्ति करते हुए उसमें परिवर्तन करने को कहा। कृष्णा सोबती को यह स्वीकार्य नहीं हुआ और उन्होंने उसे प्रकाशक से वापस ले लिया। अंततः वह उपन्यास सन् 1979 में प्रकाशित हुआ और उस पर उन्हें 1980 साहित्य अकादमी अवार्ड दिया गया। यद्यपि कुछ दशक बाद उन्होंने असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी अवार्ड सहित हिंदी अकादमी का ‘शलाका सम्मान’ और ‘व्यास सम्मान’ भी लौटा दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने ‘पद्मभूषण’ लेने से भी मना कर दिया था। ऐसी दृढ़ और जीवट लेखिका के बारे जानने की जिज्ञासा हर साहित्यकार के मन में होना स्वाभाविक है। इस दृष्टि से ‘‘सापेक्ष 60’’ को महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
‘‘सापेक्ष 60’’ में कृष्णा सोबती के कृतित्व पर आधारित समस्त सामग्री को कुल 17 अध्यायों में रखा गया है। इन अध्यायों के पूर्व कृष्णा सोबती के वे हस्तलिखित पत्र हैं जो उन्होंने महावीर अग्रवाल को लिखे थे। ‘‘सापेक्ष 60’’ के पहले अध्याय में ‘‘दांपत्य की जुगलबंदी’’ शीर्षक से चार साक्षात्कार है - पहला साक्षात्कार है ‘‘कृष्णा सोबती और शिवनाथ ढाई आखर का घरौंदा है दांपत्य’’।  कृष्णा सोबती के जीवन और साहित्य पर चर्चा है साधना जैन और कांति कुमार जैन की ‘‘किस्सागोई के अनूठे पन में लिपटी संवेदना’’। सुमन सेठी और अनूप सेठी ने चर्चा की है ‘‘चन्ना’’ पर- ‘‘पहला और अंतिम उपन्यास चन्ना’’। संतोष अग्रवाल और महावीर अग्रवाल ने चर्चा की है कृष्णा सोबती के व्यक्तित्व पर -‘‘आत्मीय बोध की गर्माहट से भरी कृष्णा जी’’।  दूसरा अध्याय है ‘‘बुद्ध का कमंडल’’।  इस अध्याय में राजन शर्मा, मैनेजर पांडे, निरंजन देव शर्मा के लेखों के साथ ही एक संपादकीय भी है, जिसका शीर्षक है- ‘‘खरगोश के दिल में शेरनी’’।  तीसरा अध्याय है-‘‘संस्कार से संवेदना’’। इस अध्याय में कृष्णा सोबती के कृतित्व एवं व्यक्तित्व का आकलन करते पांच लेख दिए गए हैं। इसके बाद ‘‘धरोहर’’ के अंतर्गत पांच महत्वपूर्ण साहित्य पुरोधाओं के लेख है। जो हैं त्रिलोचन शास्त्री, देवेंद्र सत्यार्थी, कमलेश्वर, सत्येन कुमार और नामवर सिंह।
‘‘मनीषियों की दृष्टि में कृष्णा सोबती’’ इस शीर्षक के अंतर्गत अशोक बाजपेयी, निर्मल वर्मा, प्रयाग शुक्ल, गिरधर राठी, सुधीश पचौरी, नंदकिशोर नवल, रघुवीर सहाय, बच्चन सिंह, विजय मोहन सिंह, विजयेंद्र स्नातक, गोपाल राय, बीबा सोबती, कुंवर नारायण, अनामिका तथा ओम थानवी के विचार है।
‘‘हम हशमत के सिलसिले में’’ इस शीर्षक के अंतर्गत ‘‘हम हशमत’’ पर केंद्रित उमाशंकर जोशी, बसंत त्रिपाठी, सर्वमित्रा सुरजन तथा साधना अग्रवाल के लेख हैं। ‘‘तूलिका और रंगमंच’’ अध्याय में नामवर सिंह का लेख ‘‘पुरुष प्रधान रूढ़ियों को तोड़ती मित्रो’’,  देवेंद्र राज अंकुर का लेख ‘‘यादगार प्रस्तुति में रची बसी पाशो’’ तथा ‘‘कृष्णा सोबती पुनर्सृजन का उत्सव’’ लेख रखे गए हैं।
‘‘कवित्त’’ अध्याय में कृष्णा सोबती पर केंद्रित कविताएं हैं। ‘‘स्मृतियों का अंतरिक्ष’’ इस अध्याय में अनिता सभरवाल, रचना यादव, निर्मला जैन और रवींद्र कालिया के कृष्णा सोबती से संबंधित संस्मरण रखे गए हैं।  ‘‘साहित्य संस्कृति’’ अध्याय में रमेश नैयर तथा ललित सुरजन के लेख हैं। कृष्णा सोबती के उपन्यासों को पढ़ते हुए जो विचार मन में आए उन पर आधारित कमल कुमार और मृदुला गर्ग के लेख हंै। ‘‘कहानी और कहानी’’ अध्याय में विनोद शाही, धनंजय वर्मा, मधुरेश के लेखों के जरिए कृष्णा सोबती की कहानी कला पर समुचित सामग्री उपलब्ध है। इसमें ‘‘आख्यान और गल्प की कहानी’’ तथा ‘‘आल्हादित करता है कहानी का शंखनाद’’ ये दो लेख भी मौजूद हैं। एक अध्याय है ‘‘अधूरी बातचीत’’ जो कृष्णा सोबती से महावीर अग्रवाल का साक्षात्कार है।
‘‘जिंदगीनामा’’ और ‘‘यारों के यार’’ इन दो कृतियों पर दो महत्वपूर्ण लेखकों के लेख हैं। जिनमें से एक लेख है प्रदीप कुमार का ‘‘जिंदगी के किस्सों का दस्तावेज कृष्णा सोबती’’ और दूसरा लेख है डॉ. विमल लोदवाल का ‘‘कृष्णा सोबती कृत यारों के यार उपन्यास में शासकीय कार्मिकों की मानसिकता’’।
 कृष्णा सोबती के उपन्यासों ‘‘समय सरगम’’, ‘‘जैनी मेहरबान सिंह’’ और ‘‘सूरजमुखी अंधेरे के’’ पर तीन महत्वपूर्ण लेख हैं। पहला लेख है रमेश दवे का ‘कृष्णा सोबती सूफियाना रागत्व की कथाकार’’। दूसरा लेख है डॉ शरद सिंह का (यानी मेरा) ‘‘समाज में वृद्धों की दशा को खंगालता समय सरगम’’।  तीसरा लेख है डॉ. संध्या प्रेम का ‘‘सूरजमुखी अंधेरे के एक पुनर्पाठ’’।
अध्याय ‘‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’’ के अंतर्गत देश के विभाजन के समय विस्थापन पर सियाराम शर्मा के लेख के साथ ही स्वयं कृष्णा सोबती के आत्मकथात्मक दो लेख शामिल किए गए हैं जिनमें पहला लेख है ‘‘मेरा सामाजिक व राजनैतिक वक्तव्य’’ तथा दूसरा  लेख है ‘‘इंद्रधनुषी रंगों-सा मोहक जीवन। पुस्तक के अंतिम अध्याय में ‘‘परिशिष्ट’’ के रूप में कृष्णा सोबती से तीन दशक की बातचीत दी गई है। साथ ही इस पुस्तक में संग्रहीत लेखों के लेखकों एवं चर्चाओं के चर्चाकारों के नाम और पते दिए गए हैं। साथ ही ‘‘सापेक्ष’’ एवं ‘‘कथायन’’ के उपलब्ध विशेष अंकों की जानकारी भी दी गई है।
 कुल मिलाकर ‘‘सापेक्ष 60’’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक बन गई है जो कृष्णा सोबती के रचना कर्म को समग्रता से प्रस्तुत करती है। यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
           ----------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण

Tuesday, July 20, 2021

पुस्तक समीक्षा | छोटी कहानियों का जीवन्त रोचक संग्रह | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 20.07. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका श्रीमती आशा मुखारया के कहानी संग्रह "ज़िंदगी के रंग अनेक" की  समीक्षा... 

आभार दैनिक "आचरण" 🙏


पुस्तक समीक्षा
छोटी कहानियों का जीवन्त रोचक संग्रह समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
---------------------------
काव्य संग्रह - ज़िंदगी के रंग अनेक
लेखिका     - आशा मुखारया
प्रकाशक    - पाथेय प्रकाशन, जबलपुर, मध्यप्रदेश
मूल्य       - 200/-
---------------------------

कहानी साहित्य की एक रोचक विधा है। कहानी में एक ऐसा कथानक होता है जो पात्र और संवाद के संयोग से आकार पाता है और अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच कर मनांरंजन के साथ ही विचारों को एक गुच्छा छोड़ जाता है, तालों की चाबी के गुच्छे की तरह। कहानी को पढ़ कर मन में उठने वाले सवालों के ताले की चाबी उस कहानी में घटित घटनाओं से ही चुन कर अलग करनी होती है जिससे कि वह कहानी के प्रति निजी निष्कर्ष पर पहुंच सके। जब कोई कहानी पाठक को अपने जीवन से जुड़ी हुई अनुभव होती है तो वह उसे तेजी से आत्मसात करता है। समीक्ष्य कहानी संग्रह ऐसी कहानियों का संग्रह है जिसमें मध्यमवर्गीय परिवारों से जुड़े कथानक हैं। ये कथानक अपने घर-परिवार तथा अपने आसपास के घरों की अंतर्कथा हैं। कहानी संग्रह का नाम है-‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’। इसकी कहानीकार हैं आशा मुखारया।
संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात करने से पहले लेखिका के भारतीय परिवेश और सामाजिक सरोकार को जान लेना आवश्यक है। लेखिका आशा मुखारया 5 जुलाई 1942 को जबलपुर (म.प्र.) में जन्मीं, वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई, किन्तु सागर (म.प्र.) से भी उनका गहरा नाता है। सागर में उनके अनेक परिवारजन निवासरत् हैं। उनके पति डाॅ. प्रताप सिंह मुखारया इतिहास के प्रोफेसर रहे। पति की सेवा निवृत्ति के बाद उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र विवेक मुखारया के पास अमेरिका के जैक्सनविल (फ्लोरिडा) में बसने का निर्णय लिया। वहीं आशा मुखारया को अपने पति का चिरविछोह सहना पड़ा किन्तु बेटे-बहू के अपनत्व से उन्हें सहारा दिया। अपनी इकलौती संतान अर्थात् पुत्र विवेक के साथ रहना उनका सही निर्णय था लेकिन भारत में मौज़ूद अपना गांव, घर, शहर हर प्रवासी भारतीय की तरह उनके दिल में भी बसा हुआ है। नागरिकता भले ही अमेरिका की हो लेकिन दिल है हिन्दुस्तानी। आशा मुखारया की प्रत्येक कहानी में इस तथ्य को शब्दशः अनुभव किया जा सकता है। समय-समय पर भारत में प्रवास के दौरान भारतीय समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन और स्मृतियों की तिजोरी में सुरक्षित पुराने अनुभव उनकी कहानियों में सजीव हो उठे हैं। सीधे-सरल शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के लिखी गई ये कहानियां सहसा ही मन को छू जाती हैं।
‘‘ज़िंदगी के रंग अनेक’’ संग्रह की कहानियों का आकार बड़ा नहीं हैं। ये सभी कहानियां छोटी-छोटी हैं। कुल अट्ठाईस कहानियां भारतीय परिवारों के अटठाईस रंग (शेड्स) दिखाती हैं। ‘‘निर्णय’’ शीर्षक कहानी पारिवारिक संबंधों में आती जा रही संवेदनहीनता को सामने रखती है। यह कहानी एक ऐसी स्त्री के बारे में है जो परिवार में बुआ का दर्ज़ा रखती है। अपने आरम्भिक जीवन में सारी सुख-सुविधाओं का आनन्द उठाती है। किन्तु जैसे-जैसे उसकी वृद्धावस्था आती है वह पारिवारिक उपेक्षा की शिकार बनने लगती है। इस कहानी का अंत लेखिका ने एक नाटकीय मोड़ के साथ रोचक बना दिया है। जो सुखद भी लगता है। ‘‘चंदा’’ शीर्षक कहानी को पढ़ते हुए यह अनुभव करना अच्छा लगता है कि लेखिका अपनी ज़मीन से यानी बुंदेलखण्ड से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहानी में बुंदेली गीतों को पिरोया है। एक बानगी देखिए-
धुतिया ले दो बलम कलकतिया
जा में हरी-हरी पतियां
कांसरे को लोटा, फुहारे को पानी
धुतिया ले दो बलम कलकतिया

‘‘वरदान’’ कहानी एक ऐसे स्त्री पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे परिस्थितिवश एक शक्की और क्रोधी व्यक्ति के साथ विवाह करना पड़ा और अनेक वर्ष घुटन भरा जीवन जीना पड़ा। किन्तु लंदन में बसे उसके बेटे ने उसका जीवन बदलने में मदद की और उसके हिस्से की खुशियां उसकी झोली में डाल दीं। यह एक ऐसी कहानी है जो स्त्री के पारिवारिक जीवन को एक नई पहचान देती है। इसे एक ज़रूरी-सी कहानी कहा जा सकता है। इस कहानी में स्त्री जीवन का वह पक्ष भी है जिसमें उसे निराधार लांछित किया जाता है। कहानी की नायिका दीपा का परिचय देते हुए लेखिका ने लिखा है-‘‘ये वही दीपा थी जो बचपन में मेरे यहां रोज़ ही आया करती थी। मेरी छोटी बहन की सहेली थी। ज़रूरत से ज़्यादा स्मार्ट और ख़ूबसूरत। महाराष्ट्रीयन परिवार से थी। पिता चीफ इंजीनियर थे। उसे किसी से भी बात करने में हिचक नहीं होती थी। उसकी इसी आदत को ले कर लोग तरह-तरह की बातें किया करते थे।जिन लोगों को लिफ्ट नहीं देती थी, वो उसके बारे में फ़ालतू बातें करते थे। पर वो एक बहुत अच्छे चरित्र वाली लड़की थी।’’
परिवारों में ज़ायदाद को ले कर होने वाले झगड़े और मनमुटाव आम बात है। मंा की मृत्यु पर बेटियों का उनके ज़ेवर को ले कर खींचातानी के सच्चे किस्से अकसर सुनने को मिल जाते हैं। यही मूल कथानक है, ‘‘मैं कहां हूं’’ कहानी का। इसी तरह ‘‘वापसी’’ कहानी उन माता-पिता की कहानी है जो विदेश में जा बसे अपने बच्चों के पास उत्साह से जाते हैं किन्तु वहां घोर उपेक्षा झेल कर अपने देश लौटने को विवश हो जाते हैं, जहां जीवन के नए अनुभव उनकी प्रतीक्षा में मुस्कुराते हुए खड़े हैं।
‘‘वी आर जस्ट फ्रेंड्स’’ एक दिलचस्प कहानी है। यह एक फ्र्लट करने वाले लड़के के प्रेम में पड़ जाने वाली लड़की की कहानी है। ‘‘ज़िन्दगी के रंग अनेक’’ संवेदनात्मक कहानी है। अपनों के होते हुए भी एकाकी जीवन जीने को विवश स्त्री की कहानी। इस कहानी में मन को भिगो देने वाला एक प्रसंग है-‘‘अपना बुढ़ापा उन्होंने अपनी किताबों के साहारे काट दिया। अपने कष्टों को छुपा कर वो अपना अकेलापन काटती रहीं। अपनी ज़िन्दगी से और अपनों से कभी शिकायत नहीं की और एक दिन चुपचाप मौत के आगोश में खो गईं।’’
संग्रह में एक कहानी है-‘‘ऐसी भी बहू’’। रोचक और सकारात्मक कहानी है जो ज़िदगी के एक ख़ास रंग को सामने रखती है। कहानी में एक ऐसी बहू का वर्णन है जो विखंडित होते आधुनिक परिवार की परिपाटी को अनदेखा कर के अपने परिवार के प्रति समर्पित रहने के लिए कृतसंकल्प है। ‘‘तीसरी पीढ़ी’’ उस पारिवारिक व्यवस्था को उजागर करती है जिसमें बेटियों को चाहे कितनी भी छूट दी जाए लेकिन जब विवाह की बात आती है तो माता-पिता पारम्परिक रुख अपना लेते हैं। लड़की चाहे विदेश में रह रही हो लेकिन उसके लिए विशुद्ध भारतीय दूल्हा और वह भी भारत में रह रहा हो तो और अच्छा है तथा दान-दहेज वाली शादी तय करने की मशक्कत शुरू हो जाती है। इस बात को अनदेखा कर दिया जाता है कि एक अलग परिवेश में रह रही लड़की ठेठ परंपरावादी परिवार या पति के साथ कैसे सुखी रह पाएगी? ऐसी लड़की की स्थिति ठीक उस पतंग की भांति होती है जिसे खुले आकाश में ऊचे- बहुत ऊंचे तक उडज्ञने दिया जाता है तथा अपनी खुशी प्रकट कर के उसका उत्साह बढ़ाया जाता है। जब वह लड़की समझने लगती है कि वह अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार पा चुकी है, ऐन उसी समय उसकी डोर तेजी से लपेटे जानी लगती है। उड़ान समाप्त, स्वतंत्रता समाप्त, बाहरी दुनिया समाप्त, उसके निर्णय लेने का अधिकार समाप्त। उस पर माता-पिता अपने निर्णय को थोपना शुरू कर देते हैं तथा बाध्य करते हैं कि वह लड़की उनके निर्णय को माने। इस ट्रेजडी को कहानी की इन पंक्तियों में देखिए-‘‘इस बीच रिया को भी अपने साथ काम करने वाले एक जर्मन लड़के से प्यार हो गया और फिर इतिहास अपने को दोहराने लगा। और तीसरी पीढ़ी की कहानी शुरू हो गई। भारत में रिया के मां-बाप उसके लिए लड़का ढूंढने लगे।’’
संग्रह की एक और कहानी है जो समाज के बदलते माहौल की ओर संकेत करती है। कहानी का शीर्षक है-‘‘यहां से वहां’’। मेहमानों के चरित्र पर बुनी गई यह कहानी एक अलग ही खाका रचती है। कहानी के आरम्भिक पैरा देखिए- ‘‘आज के जमाने में लोग मेहमान-नवाज़ी से घबराने लगे हैं। पहले कैसे लोग मेहमान को भगवान मानते थे। ‘अतिथि देवो भवः’। पअ अब तो रात को घंटी बजते ही लोग घबराने लगते हैं कि पता नहीं कौन आ गया।’’
इसी कहानी के अगले पैरा में मेहमानों के बारे में भी लेखिका ने दिलचस्प विवरण दिया है-‘‘पर मुझे लगता है कि आज के मेहमान भी आरामपरस्त होते जा रहे हैं। जिसके घर भी जाएंगे, पांव पसार कर बैठ जाएंगे। बच्चों पर हुकंम चलाएंगे-पानी ले आओ, पेपर ले आओ, सिगरेट ले आओ। ये नहीं सोचते कि जिसके घर जाते हैं तो उसके काम में हााि बंटाएं जिससे मेहमान का आना न अखरे।’’
अमेरिका में बसे भारतियों के परिवेश का लेखाजोखा है कहानी ‘‘सिद्धपुरुष’’ में। भारतीय संस्कृति और धर्म विदेश में भी भारतीयों को संबल प्रदान करता है। इस कहानी का एक अंश है-‘‘कई सालों से हम लोग अमेरिका के न्यूयार्क शहर में अपने बेटे के पास सेटिल हो गए थे। कई लोग हम लोगों से पहले वहां रहते थे। इसी से हमउम्र लोगों से काफी जान-पहचान हो गई थी। वहां पर बहुत बड़ा व सुंदर मंदिर है। हम सब सीनियर सिटीजन महीने में एक बार मिलते हैं और आपस में दुनिया-जहान की बातें करते हैं। उसमें धार्मिक बातों के अलावा जनरल, कुछ घरेलू समस्याओं पर भी बातें होती हैं।.... हम बुजुर्गों के पास समय काटने का बस यही एक तरीका था। सोमवार से शुक्रवार तक हमारे बच्चे अपनी नौकरी में काफी व्यस्त रहते हैं फिर भी उनकी कोशिश रहती है कि हम लोगों को भी समय दें। यहां पार्टियां बहुत होती हैं तो वो हम लोगों को पार्टियों में ले जाते हैं। वहां तरह-तरह के लोग मिलते हैं। बच्चों के सभी दोस्त बहुत अच्छे हैं।’’
विदेश में रहते हुए देश के अस्तित्व को अपने भीतर जगाए रखना और अपनत्व की तलाश में आपस में जुड़ते रहना हर प्रवासी भारतीय के जीवन का अभिन्न पक्ष होता है। अपने अतीत और अपने वर्तमान के बीच तुलना करना, अपने अतीत को याद रखना और पराए परिवेश में रच-बस जाना प्रवासी भारतीयों की खूबी होती है। यही विशेषता लेखिका आशा मुखारया की कहानियों देखा जा सकता है। उनकी कहानियां प्रत्येक पाठक से संवाद करने में सक्षम हैं। संग्रह का आमुख जबलपुर निवासी वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व संपादक डाॅ. राजकुमार ‘सुमित्र’ ने लिखा है। वे लिखते हैं कि ‘‘लेखिका ने मध्यमवर्गीय परिवारों की रचना, स्थिति और मनःस्थितियों का सटीक चित्रण किया है। बेटे से बेटी भली, परिवारों की टूटन, वृद्धों की उपेक्षा और परदेश में देश की याद को बड़ी मार्मिकता से उकेरा है।’’ अपने कहानी लेखन के बारे में लेखिका आशा मुखारया ने स्वयं लिखा है कि ‘‘कई बार कई घटनाएं और पात्र अपनी छाप छोड़ जाते हैं जो सालों तक मन को सालते रहते हैं और जो अंत में काग़ज़ पर उतर कर कहानियों का रूप ले लेते हैं। चाहते हुए भी और न चाहते हुए भी लिख जाते हैं। कई सालों से अपने मन के भावों को काग़ज़ पर उतारती रही और अंत में देखा कि इन कहानियों ने कहानी संग्रह का रूप धारण कर लिया है।’’
कुलमिला कर यह कहा जा सकता है कि यह छोटी कहानियों का जीवन्त रोचक संग्रह है जिसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।        
                  --------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण 

Tuesday, June 29, 2021

पुस्तक समीक्षा | खेल पत्रकारिता को समझने के लिए जरूरी है यह पुस्तक पढ़ना | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
खेल पत्रकारिता को समझने के लिए जरूरी है यह पुस्तक पढ़ना  

समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
-----------------------------
पुस्तक  - खेल पत्रकारिता के आयाम
लेखक  - डाॅ. आशीष द्विवेदी
प्रकाशक - हिन्दी बुक सेंटर, 4/5-बी, आसफअली रोड, नई दिल्ली
मूल्य    - 230/-
--------------------------

आज पत्रकारिता शब्द से ही समाचारों से सनसनी फैलाने वाली पत्रकारिता का विचार आता है। जबकि खेल पत्रकारिता से हमारा पुराना नाता है। लगभग हर समाचारपत्र का एक पन्ना खेलजगत की ख़बरों के लिए तय रहता है। एक समय वह भी था जब खेल कमेंट्री सुनने के लिए कानों से ट्रांजिस्टर चिपकाए लोग नज़र आते थे। मैच के ठीक दूसरे दिन अखबार में खेल का विश्लेषण पढ़ने की आतुरता रहती थी। यह आतुरता अभी भी पाई जाती है। यद्यपि आज अधिकांश लोग टेलीविजन या मोबाईल पर खेल देख लेते हैं और विशेषज्ञों की राय भी सुन लेते हैं लेकिन इससे खेल पत्रकारिता सिमटी नहीं है अपितु इसका विस्तार हुआ है क्योंकि मीडिया में खेल और खेल समाचारों की प्रस्तुति खेल  पत्रकारिता पर ही निर्भर रहती है। विगत दिनों खेल पत्रकारिता पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका नाम है-‘‘खेल पत्रकारिता के विविध आयाम’’। जैसा कि पुस्तक के नाम से ही अनुमान हो जाता है कि इस पुस्तक में खेल पत्रकारिता पर समग्रता से प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक के लेखक हैं डाॅ. आशीष द्विवेदी।
लेखक डाॅ. आशीष द्विवेदी लगभग बीस वर्ष से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने डाॅ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर से सन् 1999 में संचार एवं पत्रकारिता में प्रावीण्य सूची में मास्टर डिग्री हासिल की और सन् 2008 में ‘‘राष्ट्रीय दायित्व एवं हिन्दी पत्रकारिता’’ विषय में पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। विगत 12 वर्ष से वे सागर में इंक मीडिया इंस्टीट्यूट आॅफ माॅस कम्यूनिकेशन एंड आई टी के निदेशक हैं। पत्रकारिता का इस दीर्घ अनुभव ने डाॅ. आशीष द्विवेदी की इस पुस्तक को प्रमाणिकतौर पर उद्देश्यपूर्ण बना दिया है। हिन्दी में खेल पत्रकारिता पर कम ही पुस्तकें लिखी गई हैं। जो हैं भी उनमें समग्रता कम ही देखने को मिलती है। अपनी पुस्तक ‘‘खेल पत्रकारिता के विविध आयाम’’ में डाॅ. आशीष द्विवेदी ने खेल पत्रकारिता के विविध पक्षों को बारीकी से प्रस्तुत किया है।
 
पुस्तक की कुल सामग्री पांच खण्डों में विभक्त है। प्रत्येक खण्ड में विभिन्न अध्यायों में जानकारी सहेजी गई है। प्रथम खंड में प्रथम खंड में ‘‘भारत में खेलों की स्थिति का अवलोकन’’ विषय के अंतर्गत भारत में खेल, हॉकी में भारत, फुटबॉल में भारत, खेल अनुवांशिकी और भारत, भारतीय शिक्षा व्यवस्था में खेल, खेलो इंडिया कार्यक्रम और इसके उद्देश्य, खेलों में राजनीति, खेलों में लैंगिक भेदभाव, खेल में सामाजिक बदलाव, खेल में नस्लवाद, खेल मनोविज्ञान, खेल भावना का लोप, खेल से सन्यास और भारतीय खिलाड़ी, राष्ट्रीय खेल नीति और उसका यथार्थ, राष्ट्रीय खेल संहिता, अखिल भारतीय खेल परिषद, खेल संबंधी अवार्ड और उनसे जुड़े विवाद, खेलों के स्याह पहलू, भारत के खेल परिवार, भारत के ब्रांड खिलाड़ी, भारत की प्रमुख खेल अकादमी, खिलाड़ियों की आत्मकथा और जीवनियां, खेलों से व्यक्तित्व विकास, खेल अर्थव्यवस्था व कैरियर, भारत में खेल उत्पाद उद्योग, खेल केंद्रित सिनेमा, खेलों में लीग संस्कृति, कैसे सुधरेंगे खेलों के हालात, ऑनलाइन गेम्स का खेलों पर दुष्प्रभाव जैसे 29 अध्याय इस प्रथम खंड में विवेचन सहित सामने रखे गए हैं।

दूसरे खंड में ‘‘खेल पत्रकारिता: प्रायोगिक पहलू’’ इस विषय के अंतर्गत जो अध्याय रखे गए हैं वे हैं- खेल पत्रकारिता का विकासक्रम, खेल पत्रकारिता का अर्थ, खेल के लिए कैसे लिखें, मैगजीन के लिए  खेल लेखन, खेल फीचर लेखन, खेल साक्षात्कार का महत्व, खेल प्रेस वार्ता, खेल संपादकीय, खेल स्तंभ लेखन, रेडियो में खेल संबंधी लेखन, टेलीविजन में खेल संबंधी लेखन, खेल संबंधी अनुवाद, खेल फोटोग्राफी, खेल संबंधी कार्टून, खेल पेज और उसका लेआउट, खेल पत्रकार की योग्यताएं, प्रेरक खेल पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता दूसरा पहलू, खेल के रोचक समाचार, देश के प्रमुख खेल पत्रकार, खेल आधारित चैनल, खेल संबंधी मैगजीन और ब्लॉग खेल पत्रकारिता में कैरियर।

तीसरे खंड में ‘‘प्रमुख खेल संस्थाएं व उनका संक्षिप्त परिचय’’ शीर्षक के अंतर्गत जिन बिंदुओं पर चर्चाएं की गई हैं, वह हैं- प्रमुख खेल संबंधी आयोजन व संस्थाएं, भारतीय खेल प्राधिकरण, भारत के खेल आधारित विश्वविद्यालय/महाविद्यालय, भारत के प्रमुख खेल संघों का परिचय, भारत के प्रमुख खेल स्टेडियम।

चौथे खंड में खेल पत्रकारों से संवाद को संजोया गया है जिसके अंतर्गत जी. राजारमन, चंद्रशेखर लूथरा, प्रवीणचंद्र, विक्रांत गुप्ता, राजेश राय, राजेंद्र सजवान, विमल कुमार, माला तातरवे, हेमंत रस्तोगी, अभिषेक त्रिपाठी, उमेश राजपूत, राजकिशोर, रोशन झा, विजय कुमार, इंद्रजीत मौर्य, मुकेश विश्वकर्मा, ललित कटारिया, बी.पी. श्रीवास्तव, डॉ. प्रेम प्रकाश पंत और संजीव पंगोत्रा के संवाद हैं।

पांचवा और अंतिम खंड परिशिष्ट का है जिसमें कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य एवं सामग्रियां प्रस्तुत की गई हैं। जैसे प्रधानमंत्री के ‘‘खेलो इंडिया’’ और ‘‘खेल दिवस’’ पर दिए गए उद्बोधन प्रभाष जोशी का लेख शारदा उगरा का लेख, सानिया मिर्जा का इंटरव्यू, रानी रामपाल का साक्षात्कार तथा सचिन तेंदुलकर के विचार आदि शामिल किए गए हैं।

इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें ग्रामीण स्कूलों के हाल और ग्रामीण स्कूलों में खेल की स्थिति पर भी दृष्टि डाली गई है। जहां अफ्रीका महाद्वीप के देशों में गांव से खिलाड़ी ओलंपिक तक पहुंचते हैं, वहीं भारत में ग्रामीण क्षेत्रों से खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक बड़ी मुश्किल से पहुंच पाते हैं। इसके लिए कौन-सी दशा और दिशा जिम्मेदार है, इस पर भी इस पुस्तक में विचार किया है।

खेल से जुड़ी खबरें भी कभी-कभी सनसनी फैला देती हैं जब उनमें ड्रेसिंग रूम की खबरें भी शामिल हो। इस प्रसंग पर लेखक डॉ आशीष द्विवेदी ने रोचक ढंग से उदाहरण देते हुए लिखा है- ‘‘ड्रेसिंग रूम की खबरें भी कई बार चर्चा का विषय बनती है। हालांकि इनकी रिपोर्टिंग में सतर्कता की जरूरत होती है, कारण कई बार यह महज अफवाहें ही निकलती है। अब तो कवरेज का दायरा खिलाड़ियों की पत्नी, बच्चों उनकी फैशन और स्टाइल तक जा पहुंचा है। धोनी की बेटी जीवा का जन्मदिन हो या विराट अनुष्का का हनीमून यह सभी कवरेज का हिस्सा बनते हैं। मैच समाप्त होने के बाद खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों की प्रतिक्रिया, मैन ऑफ द मैच की घोषणा ट्रॉफी के साथ शैंपेन की बोतल खोलते हुए टीम का फोटो भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आप उस पल को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।’’

जब खेल पत्रकारिता की बात हो तो एक प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर खेल पत्रकारिता का उद्देश्य क्या है? क्या यह सिर्फ खेल संबंधी मनोरंजक तथ्य या आंकड़े प्रस्तुत करने का माध्यम है अथवा इसका कोई और भी उद्देश्य है? इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए लेखक ने खेल पत्रकारिता के उद्देश्य निरूपित किए हैं। इसमें जो प्रमुख बिंदु होने रखे हैं, वे हैं- खेलों के प्रति समाज की मानसिकता में बदलाव लाना, खेलों के लिए एक स्वस्थ माहौल का निर्माण करना, ग्रामीण वह आदिवासी अंचलों से प्रतिभाओं की तलाश करना, परंपरागत खेलों को प्रोत्साहित करना, खेलों में मौजूद राजनीति क्षेत्रवाद और जातिवाद पर प्रहार करना, लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाना, खेलों में एकाधिकार जमाने वाले खेल और खिलाड़ियों के प्रभाव से खेल को मुक्त करने की दिशा में पहल करना, खेल नीति और खेल बजट पर चर्चा करना, बौद्धिक स्तर पर खेलों में भारत की स्थिति और कारणों का पड़ताल करना जैसे अनेक उद्देश्य लेखक ने प्रस्तुत किए हैं।

खेलों में लैंगिक भेदभाव विषय पर लेखक ने बेबाकी से अपनी बात सामने रखी है वह लिखते हैं - ‘‘खेलों में आधी दुनिया को लगभग हाशिए पर रखा गया है दुनिया के कई देशों में महिलाओं को लेकर दोहरे मापदंड है भारत में भी स्थिति विकट है कई सारे खेल ऐसे हैं जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व ना के बराबर है जिन खेलों में महिलाएं हैं थी उनमें वे पुरुष या वर्चस्व के आगे कहीं नहीं ठहरती खेल के मैदान की पारंपरिक छवि मर्दानगी की रही है और भारतीय समाज पर काबिज सदियों की पितृसत्ता नहीं से दरकने नहीं दिया ।’’
लेखक को खेल पत्रकारिता पर पुस्तक लिखने का विचार क्यों आया इस बात को उनके इस विचार से भलीभांति समझा जा सकता है - ‘‘वस्तुतः खेल पत्रकारिता में हम उस की रिपोर्टिंग संपादन लेखन फोटोग्राफी और साक्षात्कार की बात करते-करते अपनी बात समाप्त कर देते हैं जबकि मैंने यह पाया कि इसके हाय हम इतने विविध पूर्ण हैं कि अगर उन पर संपूर्णता से बात हो तो एक ग्रंथ कम पड़ सकता है इन सब में भी मुझे जो हम बात नजर आती है वह खेलों के प्रति मानस बदलने की जो एक पुरानी कहावत है ‘खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब’ ‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब’ इस कहावत ने खेलों के प्रति लोगों के रुझान को घटाने में महती भूमिका निभाई है। खेल पत्रकार सिर्फ इसी कहावत के विरुद्ध अगर अपना मिशन चलाएं तो मुझे लगता है खेलों के प्रति एक स्वस्थ माहौल पैदा किया जा सकता है। इसके अलावा खेलों में हावी राजनीति क्षेत्रवाद, लैंगिक असमानता, खेल नीति, बजट, प्रोत्साहन ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिन पर भी खेल पत्रकार बहुत ज्यादा कलम चलाते नहीं दिखते।’’ वे आगे लिखते हैं- ‘‘मैं इस बात को लेकर भी चिंतित हूं कि खेलों के प्रति एक उदासीन और कमोवेश उपेक्षा पूर्ण माहौल होने के कारणों की पड़ताल करने में खेल पत्रकारों की ज्यादा दिलचस्पी क्यों नहीं है। गुमनाम खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने खेलों में व्याप्त आला दर्जे की पक्षपात पर खेल पत्रकारिता मौन क्यों है? राष्ट्रीय खेल के मायने बदलते जा रहे हैं। एक खेल विशेष की मोनोपोली ने बाकी खेलों को लगभग उपेक्षित जा कर रखा है तो ओलंपिक में हमें एक पदक के लाले पड़ जाते हैं। मीडिया के कवरेज में भी सौतेलापन है और सरकार के नजरिए में भी। हम आज तक फुटबॉल की एक विश्व कप लायव थीम नहीं दे पाए। इन सब वज़हों की खोजबीन करना कितना जरूरी है यह कौन समझाए।’’

पुस्तक की प्रस्तावना लिखते हुए प्रो. संजीव भानावत ने बहुत सही लिखा है कि ‘‘पत्रकारिता के विद्यार्थियों को यह पुस्तक खेल पत्रकारिता के अनेकानेक पक्षों को समझने की दिशा में सहायक साबित होगी डॉ द्विवेदी ने श्रम और निष्ठा के साथ काम करते हुए इस पुस्तक का लेखन किया है। इस अछूते विषय पर उनका यह ग्रंथ खेल पत्रकारिता को रोचक बनाने की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगा ऐसा विश्वास है।’’
 
डाॅ आशीष द्विवेदी ने यह पुस्तक लिख कर अपने पत्रकारिता के दायित्व को पूरी ईमानदारी से निभाया है। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यह पुस्तक खेल-प्रेमियों एवं खेल-पत्रकारों के साथ-साथ इस विषय के विद्यार्थियों का भरपूर ज्ञानवर्द्धन करेगी क्योंकि यदि कोई व्यक्ति खेल पत्रकारिता को सम्पूर्णता से समझना चाहता है तो उसके लिए ‘‘खेल पत्रकारिता के विविध आयाम’’ पुस्तक को पढ़ना ज़रूरी है।
         ---------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण #खेल_पत्रकरिता

Tuesday, June 8, 2021

पुस्तक समीक्षा | ‘गीत तुम्हारे स्वर मेरा है’: अनुभव से उपजा सृजन समीक्षक | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण में प्रकाशित

आज 08.06.2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई काव्य संग्रह "गीत तुम्हारे स्वर मेरा है" की  पुस्तक समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
----------------------------
पुस्तक समीक्षा
‘गीत तुम्हारे स्वर मेरा है’: अनुभव से उपजा सृजन
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
----------------------

पुस्तक  - गीत तुम्हारे स्वर मेरा है (गीत संग्रह)
कवि    - निर्मल चंद निर्मल
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन नई दिल्ली
मूल्य    - रुपए 250/-
--------------------------
दीर्घ जीवन का अनुभव और सृजन की निरंतरता कवि को शून्य से समग्र की ओर जाने के लिए प्रेरित करता है। ‘‘गीत तुम्हारे स्वर मेरा है’’ वरिष्ठ कवि निर्मल चंद निर्मल की काव्य कृति है इसमें संग्रहीत रचनाओं के बारे में स्वयं कवि निर्मल ने लिखा है-‘‘मेरी इन रचनाओं में सभी रसों और भाव-भंगिमाओं का समावेश है। मैं तो प्रकृति और सामाजिक संतुलन का पक्षधर हूं। जो अच्छा लगा रचनाओं के माध्यम से उसकी प्रशंसा की और जो न भाया उसकी ओर  असहमति का इशारा किया। समाज को कैसा चलना चाहिए सब के पास अपनी बुद्धि है। सब स्वतंत्र है। हां, दुराग्रह से मनुष्य को परहेज होना चाहिए अन्यथा सामाजिक तानाबाना बिखराव की ओर अग्रसर होने लगता है। जरा सोचिए हमें इस संसार में कितने दिन रहना है। शेष अवधि प्रकृति की गोद में विश्राम की है ।’’ जीवन के प्रति इस प्रकार का बोध कवि से वह सृजन करवा देता है जिसकी कालजयी महत्ता रहती है। कवि निर्मल चंद निर्मल के अभी तक 20 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इस 21वें काव्य संग्रह में उन्होंने जिन रचनाओं को भी पिरोया है वे विशेष महत्व रखती हैं। अनेक सम्मान से सम्मानित कवि निर्मल अपनी बातों को काव्य के माध्यम से बहुत ही सादगी के साथ प्रस्तुत करते हैं। वे अपनी जन्मभूमि के प्रति आगाध प्रेम रखते हैं। उनकी एक गीत हैं -‘‘शरीर यह मेरा सागर की मिट्टी’’। पंक्तियां देखिए-  
सागर की मिट्टी में जन्मा
है शरीर यह मेरा  
चकराघाट मनोरम स्थल
खेल कूद कर बड़ा हो गया
पता चला ना कब उठ करके
अपने पैरों खड़ा हो गया
बोध नहीं था अपनेपन का
मित्र मंडली सहज मिल गई
जहां हवाओं ने बहलाया
जीवन बगिया पूर्ण खिल गई
बढ़े कदम तक जाना मैंने
क्या है मेरा तेरा।

मनुष्य ने जब सभ्यता को अपनाया तो उसने अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में शब्दों का विकास किया इस प्रकार शब्द मानव मन की मानव के विचारों की और मानव के संविधान की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गए। ‘‘शब्द महत्ता’’ शीर्षक गीत में कभी निर्मल ने शब्दों के महत्व को बहुत ही सुंदर ढंग से व्याख्यायित किया है। यह पूरी रचना शब्दों को समर्पित है। इस गीत का एक अंश देखें-

शब्द हुआ करते हैं दर्पण अंतर्मन के।

शब्दों ने ही उद्गारों का भार संभाला
आपस के संबंधों को भी देखा भाला
कठिन धार होती इनकी प्रस्तर कट जाते
बुद्धि व विवेक से सुदृढ़ इनके नाते
होती है पहचान शब्द से गहराई की
मनुज-मनुज के संस्कार की चतुराई की
बहुरूपिया यदि शब्द ध्वनि कुछ और बोलती
एक शब्द के जाने कितने अर्थ खोलती
सधता है संसार चाहिए शब्द जतन के
शब्द हुआ करते हैं दर्पण अंतर्मन के।


संग्रह की गीतों से स्पष्ट है कि ये जीवन, समाज और आसपास घट रहे के प्रति गहरी दृष्टि रखते हैं और गहरा सरोकार भी। मीडिया, बाजारवाद आदि सब के प्रति कवि की निगाह है। इनकी शैली शोर मचाने वाली न होकर गम्भीर और चिंतन-प्रशस्त करने वाली है। वे अव्यवस्थाओं पर कटाक्ष करने के बदले व्यवस्थाओं में सुधार की गति को इंगित करते हैं-
भ्रष्टाचार  कहो  अथवा  कोई आचार कहो
मानव मन की  कमजोरी  हटते-हटते हटती है।
आदत को भी  लग  जाता है  समय भुलाने में
कुपथ पंथ से  हट कर  कुछ  अच्छाई लाने में
अभ्यासों का  चलन  बहुत  धीरे-धीरे रुकता है
नूतन राह स्वीकृति को, मन मुश्क़िल से झुकता है।
शुचिता का आधार हमें मिल जाता लेकिन
पूर्व चलन  की  परिपाटी  घटते-घटते घटती है।

कवि निर्मल चंद ‘निर्मल’ के गीत छीजती मनुष्यता और दरकती संवेदनशीलता की पड़ताल करती गीत है। जैसे ‘‘निकलें कैसे बाहर’’ शीर्षक गीत की पंक्तियां देखिए-
खांचों में ही फंसे हुए हम
निकलें कैसे बाहर।
जग ने जैसा समझा हमको
वैसे ही दिखते हैं
अंतर्मन को कौन समझता
बाह्य मूल्य बिकते हैं
छद्मवेश ही सारे जग में
होता रहा उजागर।

कवि कर्म होता है कि वह जीवन की परिस्थितियों को कोमलता से सामने रखे और चिंतन का मार्ग प्रशस्त करे। कवि ‘निर्मल’ इस कवि कर्म को बड़ी सुघड़ता से निभाते दिखाई देते हैं। वे अपनी गीत के माध्यम से समझाते हैं कि ‘साहस से लें काम’। इसी शीर्षक की यह गीत है-
हर मुश्क़िल विरक्ति पाएगी
साहस से लें काम।
साहस है जागीर हमारी
दिल ओछा क्यों करना
वीर बनो या कायर बन लो
होगा आखिर मरना
संकल्पों के आभूषण हों
दृढ़ता का हो नाम।

कवि के भावों में एक अनूठी ऊर्जा का संचार दिखाई देता है। यदि व्यक्ति में वैचारिक ऊर्जा हो तो आयु का बढ़ता हुआ प्रभाव भी उसे विचलित नहीं कर पाता है। इसलिए कवि ‘निर्मल’ उद्घोष करते हुए कहते हैं-‘मैं वृद्ध नहीं हूं’’।
उम्र बड़ी है
वृद्ध नहीं हूं।
भावों में अब भी तड़पन है
जगह-जगह दिखती अड़चन है
जिनको लोग बुद्धि से नापें
उनमें भी लक्षित बचपन है
जाप किया पर
सिद्ध नहीं हूं।

‘‘गीत तुम्हारे स्वर मेरा है’’ संग्रह की सभी गीतों में एक सुंदर प्रवाह है, जो काव्यपाठ-सा आनंद देता है। अपनी वरिष्ठता के अनुरूप कवि निर्मल चंद निर्मल का यह संग्रह परिपक्व गीतों से परिपूर्ण है, सतत पठनीय है।  
----------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #DrSharadSingh #miss_sharad #आचरण