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Tuesday, August 6, 2024

पुस्तक समीक्षा | विश्वप्रसिद्ध भाई की विस्मृत विदुषी बहन की जीवनी है “स्वर्णा” | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 06.08.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई श्री राजगोपाल सिंह वर्मा जी की पुस्तक "स्वर्णा: टैगोर की अल्पचर्चित विदुषी बहन की जीवनी" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा 
विश्वप्रसिद्ध भाई की विस्मृत विदुषी बहन की जीवनी है “स्वर्णा” 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - स्वर्णा: टैगोर की अल्पचर्चित विदुषी बहन की जीवनी
लेखक   - राजगोपाल सिंह वर्मा
प्रकाशक - पेंगुइन स्वदेश, पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया प्रा.लि., चौथी मंज़िल कैपिटल टाॅवर-1, एमजी रोड गुरुग्राम, हरियाणा।
मूल्य    - 299/-
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जितना चुनौती भरा होता है इतिहास लेखन, उतनी ही चुनौती भरा होता है किसी व्यक्ति की जीवनी का लेखन। एक ऐसा सच जो एक व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं चरित्र से सघन परिचय कराता है किन्तु वहीं उससे जुड़े कई व्यक्तित्वों के प्रभामंडल के पीछे छिपे सच को भी सामने ले आता है। वस्तुतः यह एक व्यक्ति का ऐसा इतिहास होता है जो तत्कालीन समय, दशा और विचार को प्रदर्शित करता है। देश की स्वतंत्रता से पूर्व रहे किसी व्यक्ति की जीवनी परतंत्र भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की कथा भी कहता चलता है क्योंकि उस समय हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ था।  इसके साथ ही संघर्ष जारी था स्त्री समाज में जागरूकता लाने का और उन्हें उनके अधिकार दिलाने का। राजा राममोहन राय जैसे व्यक्ति निरंतर इस बात के लिए प्रयत्नशील रहे की महिलाओं को समाज में सम्मान मिले तथा सती प्रथा जैसी अमानवीय प्रथा से मुक्ति मिले। सती प्रथा के साथ ही एक बहुत बड़ी समस्या थी विधवाओं के साथ होने वाले अन्याय की। जो विधवाएं सती नहीं होती थीं उन्हें जीवनपर्यंत अपार उपेक्षा एवं कष्ट सहने पड़ते थे। उनका जीवन एक सज़ा पाए कैदी से भी बदतर होता था। समाज में एक विधुर को पुनर्विवाह करने का अधिकार था किंतु विधवा को नहीं। विधवाओं को समाज में सम्मान दिए जाने और उन्हें पुनर्विवाह का अधिकार मिल सके इस हेतु भी संघर्ष जारी था। इसी दौरान बंगाल में रवीन्द्रनाथ टैगोर एक ऐसे चर्चित साहित्यकार के रूप में स्थापित हुए जिन्हें आगे चलकर नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। रवींद्रनाथ टैगोर का परिवार साहित्यिक विचारों से सुसम्पन्न था। उनकी बड़ी बहन स्वर्ण कुमारी बहुत ही विदुषी लेखिका, विचारक एवं कुशल संपादक थीं। किंतु रवीन्द्रनाथ टैगोर की आभा के सम्मुख उनकी बहन की प्रतिभा को भुला दिया गया। एक बार फिर इस विदुषी महिला को उसकी संपूर्ण प्रतिभा के साथ सामने लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है इतिहासकार एवं जीवनी लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने। उनकी पुस्तक है ‘‘स्वर्णा: टैगोर की अल्पचर्चित विदुषी बहन की जीवनी’’।        
राजगोपाल सिंह वर्मा एक प्रबुद्ध रचनाकार  हैं  । उनके लेखन सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गहन शोध के बाद अपनी कृति को पूर्णता प्रदान करते हैं। वे प्रत्येक तथ्य को ढूंढते हैं, जांचते-परखते हैं और फिर उसे लेखबद्ध करते हैं। यह रचनाप्रक्रिया उनकी कृतियां स्वयं बताती हैं। राजगोपाल सिंह वर्मा की प्रमुख कृतियां हैं-जॉर्ज थॉमस: हांसी का राजा (जीवनी), 1857 का शंखनाद उत्तर दोआब लोक का संघर्ष (उपन्यास), चिनहट: 1857: संघर्ष की गौरव गाथा (इतिहास), किंगमेकर्स, औपनिवेशिक काल की जुनूनी महिलाएं (इतिहास), तारे में बसी जान (कहानी संग्रह), जाने वो कैसे लोग थे: 1857 के क्रान्तिकारी (उत्तर प्रदेश के अल्पचर्चित क्रान्तिवीरों की प्रेरणादायक कहानियाँ) तथा द लेडी ऑफ टू नेशन: लाइफ एंड टाइम्स ऑफ राना बेगम (अंग्रेजी जीवनी) तथा बेगम समरू का सच। इनमें से “बेगम समरू का सच” मैं पढ़ चुकी हूं और इसी काॅलम में उसकी समीक्षा भी कर चुकी हूं। दरअसल, “बेगम समरू का सच” लेखक की वह पहली कृति थी जिसे मैंने पढ़ा था। उसे पढ़ते समय मुझे लेखक की विषय के प्रति गहन दृष्टि और श्रम का बोध हुआ, जिसने मुझे आश्वस्त किया कि ऐसे लेखक अभी भी लेखन की प्रतिबद्धता को बखूबी निभा रहे हैं। राजगोपाल सिंह वर्मा इतिहास के पन्नों में दर्ज़ उपेक्षित किरदारों की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। स्वर्णा कुमारी के बारे में कलम चलाते हुए लेखक ने जिन पक्षों को उजागर किया है, वे जितने रोचक हैं उतने ही जोखिम भरे हैं।
महर्षि देवेन्द्रनाथ एवं सारदा देवी की पुत्री स्वर्णा के रवीन्द्रनाथ टैगोर सहित आठ बहन-भाई थे। बहनें थीं सौदामिनी, सुकुमारी एवं सरतकुमारी। भाई थे द्विजेन्द्रनाथ, हेमेन्द्रनाथ, सत्येद्रनाथ, ज्योतिरिन्द्रनाथ, रवीन्द्रनाथ। स्वर्णा कुमारी का विवाह जानकीनाथ घोषाल से 12 वर्ष की अवयस्क आयु में हुआ था, जबकि जानकीनाथ घोषाल की आयु उस समय 27 वर्ष थी। स्वर्णा कुमारी ने तीन बेटियों  हिरण्मयी देवी, उर्मिला, सरला देवी तथा एक बेटे ज्योत्सनानाथ को जन्म दिया। उनकी बेटी सरला देवी महात्मा गांधी के बहुत निकट रहीं। सरला के पति रामभुज दत्त चौधरी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहने के साथ ही उर्दू साप्ताहिक समाचार पत्र “हिन्दुस्थान” के संपादक भी थे। लेखक ने पृष्ठ 37 में लिखा है कि ‘‘गांधीजी सरला से बहुत प्रभावित हुए और उसकी तरफ आकर्षित हो गए। बाद में गांधी-सरला देवी की नजदीकियाँ लाहौर के साथ-साथ और जगह भी चर्चा का विषय बनने लगीं। गांधीजी ने सरला की कविताओं और लेखों को बहुत पसन्द किया और उनका अपने भाषणों में तो जिक्र किया ही, उन्हें अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया’ और अन्य पत्रिकाओं में भी स्थान दिया। सरला ने उनके साथ पूरे भारत की यात्राएं कीं। जब वे साथ नहीं होते थे तो वे दोनों आपस में पत्रों का आदान- प्रदान किया करते थे।’’
बाद में सरला देवी के इकलौते बेटे दीपक से महात्मा गांधी की पोती राधा का विवाह हुआ था। इस प्रकार की जानकरियों ने पुस्तक की तथ्यात्मक को बढ़ाया है और कई बंद पन्नों को खोला है।
पुस्तक की केंद्रबिंदु स्वर्णा कुमारी की जीवनी के उन सभी पक्षों को विविध शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है जिनसे उस महिला का जीवनसंघर्ष मुखर होता है जो कुलीन एवं आर्थिक सुसम्पन्न बंगाली परिवार की थी किन्तु स्त्री होने के नाते उसकी राह में बाधाएं औरों से कम नहीं थीं। स्वर्णा कुमारी जन्म से ही कुशाग्र बुद्धि की थी। उन्हें अपने पिता देवेन्द्रनाथ ए्वं बड़े भाई सत्येंद्र नाथ से सदा प्रोत्साहन मिला। उन्होंने उपन्यास, कविताएं, सामाजिक लेख, विज्ञान विषयक लेख आदि लिखने के साथ ही ‘‘भारती’’ नामक पत्रिका का संपादन भी किया।
लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने एक आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य यह भी उजागर किया है कि स्वर्णा कुमारी को लेखन, संपादन तथा अनुवाद के प्रसंग में सबसे अधिक विरोध अपने छोटे भाई रवीन्द्रनाथ का ही झेलना पड़ा। लेखक ने इस बात पर खेदसहित आश्चर्य व्यक्त किया है कि जहां स्वर्णा कुमारी ने अपने छोटे भाई रवींद्रनाथ टैगोर को अपना काव्य संग्रह समर्पित किया, वहीं टैगोर ने अपनी विदुषी बड़ी बहन के नाम एक भी कृति समर्पित नहीं की। वहीं, जब स्वर्णा कुमारी की पुस्तक अंग्रेजी में अनूदित हुई तो इसका रवीन्द्रनाथ ने आलोचनात्मक शब्दों में विरोध किया। लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने पृष्ठ 137 में लिखा है कि ‘‘रवीन्द्रनाथ टैगोर स्वर्णा कुमारी देवी के इस दूसरे उपन्यास ‘एन अनफिनिश्ड सान्ग’ का प्रकाशन किए जाने के अन्य कारणों से भी बहुत विरुद्ध थे। उनका कहना था कि ‘देवी की इस कृति में प्रमाणिकता की कमी है, क्योंकि उनको बाहरी दुनिया का बहुत मामूली अनुभव रहा था’। ऐसा कहना रवीन्द्रनाथ टैगोर को शोभा नहीं देता था, क्योंकि इस उपन्यास के लेखन में स्वर्णा कुमारी देवी ने बहुत परिश्रम किया था। इसीलिए अन्ततः प्रकाशन के बाद उसे पाठकों का बहुत स्नेह मिला। तत्कालीन समाज की स्थितियों के सन्दर्भ में यह उपन्यास आज भी प्रासंगिक माना जाता है।’’
 स्वर्णा कुमारी के प्रति रवीन्द्र नाथ टैगोर का दुराव संपादन के क्षेत्र में भी प्रकट हुआ जब उन्होंने स्वर्णा के संपादन में प्रकाशित होने वाली ‘‘भारती’’ पत्रिका के समकक्ष ‘‘बंगदर्शन’’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इस संदर्भ में लेखक ने पृष्ठ 64 में लिखा है कि “‘भारती’ को टक्कर देने वाला कोई बाहरी नहीं, घर का ही एक सदस्य था। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1908 में ‘बंगदर्शन’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था।’’
स्वर्णा कुमारी स्वयं एक अच्छी लेखिका थीं तथा वे चाहती थीं कि अन्य महिलाएं भी लेखन के क्षेत्र में स्वयं को अभिव्यक्त करें। इसलिए उन्होंने ‘‘भारती’’ पत्रिका में लेखिकाओं के लेख प्रकाशित करने का जो आधार तय किया था वह था कि लेख के विषय ऐसे हों जो पाठकों में नवीन चेतना का संचार कर सकें। स्वर्णा कुमारी ने स्वयं अपने एक लेख में लिखा था की जो विधवाएं पुनर्विवाह नहीं करना चाहती हों, उनके लिए शिक्षा की आवश्यक व्यवस्थाएं की जानी चाहिए। उन्होंने पंडिता रमाबाई के पुनर्जागरण से परिपूर्ण तथा चेतना को जगाने वाले लेख, भाषण और विचार भी प्रकाशित किए। इस मुद्दे पर भी रवीन्द्रनाथ का विरोधी स्वर मुखर हुआ और तब स्वर्ण कुमारी ने पंडिता रमाबाई का खुलकर पक्ष लिया। पृष्ठ 75-76 में इस विषय पर विस्तृत जानकारी दी गई है जिसका एक बहुत छोटा सा अंश इस प्रकार है - ‘‘यह चर्चा पंडिता रमाबाई के भाषण पर लिखे गए एक पत्र के सन्दर्भ में थी जो ‘भारती’ के सन 1889 के आषाढ़ अंक में प्रकाशित हुआ था। रमा बाई ने टिप्पणी की थी कि, ‘‘स्त्रियाँ हर मामले में पुरुषों के बराबर हैं, केवल शराबखोरी की आदत को छोड़कर !’’
पंडिता रमाबाई की इस टिप्पणी से रवीन्द्रनाथ टैगोर बहुत आक्रोशित हुए थे। उन्होंने पत्रिका के सम्पादक के नाम एक पत्र लिखकर इसका विरोध किया। परन्तु इस मामले में स्वर्णा कुमारी जो ‘‘भारती’’ की सम्पादक थीं, अपने भाई के विरोध में खड़ी हो गईं।’’
स्वर्णा कुमारी के अल्प चर्चित रह जाने का एक कारण यह भी रहा होगा कि वे रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रसिद्धि के वट वृक्ष के नीचे मौजूद थीं और रवीन्द्रनाथ उनके लेखन के प्रति सहयोग अथवा उदारता की भावना नहीं रखते थे। फिर भी स्वर्णा कुमारी ने जीवनपर्यंत लेखन कार्य किया। उनकी कई कृतियां अंग्रेजी, फ्रांसीसी और जर्मन में अनूदित हुईं। उन्हें अपने जीवनकाल में अपने तीन बड़े भाइयों के साथ ही पति जानकीनाथ तथा पुत्री हिरण्यमयी के निधन का भी असीम दुख सहना पड़ा। फिर भी वे अपने कर्तव्य पर डटी रहीं और महिला जागरण के पक्ष में निरंतर सक्रिय रहीं।
जीवनीकार राजगोपाल सिंह वर्मा ने एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है जो कि निश्चित रूप से विचारणीय है। पृष्ठ 160 में वे लिखते हैं कि ‘‘यह दुखद है कि राष्ट्रवादी इतिहास और स्त्रीवादी आन्दोलनों में स्वर्णकुमारी देवी का नाम बहुत उपेक्षित स्थिति में रहा है। यदि कहीं उनकी चर्चा की भी जाती है तो उसे भी उनकी ख़ुद की बेटी सरला देवी के कृतित्व के बाद में रखा जाता है जबकि ईमानदारी से देखा जाए तो उस चुनौतीपूर्ण समय में उनके लिखे गए उपन्यास और कहानियाँ उनके प्रगतिशील कथानकों के कारण पश्चिमी देशों तक में चर्चा में आए थे।’’
राजगोपाल सिंह वर्मा ‘‘स्वर्णा’’ के द्वारा अतीत के पन्ने खंगालते हुए वर्तमान की आंखें खोलने के लिए कटिबद्ध दिखाई देते हैं। उनकी लेखनी में रोचकता है, प्रवाह है और इतिहास का स्पष्ट प्रतिबिम्ब है। यह जीवनी विदुषी स्त्री की साहित्यातिहास द्वारा उपेक्षा किए जाने के सच को सामने रखती है उसके पक्ष में न्यायसंगत साक्ष्य प्रस्तुत करती है। न केवल रोचकता अपितु विगत की सच्चाई को जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।
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Wednesday, January 31, 2024

चर्चा प्लस | महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के विचार समाहित हैं नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के विचार समाहित हैं नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षा के जिस बहुआयामी स्वरूप को उद्देश्य बनाया गया है वह व्यक्ति में ज्ञान के साथ कौशल एवं सद्गुणों के विकास करने के लक्ष्य पर आधारित है। शिक्षा को ले कर ठीक यही विचार महात्मा गांधी एवं रवींद्रनाथ टैगोर के भी थे। इन दोनों महापुरुषों के शिक्षा संबंधी विचारों में मामूली अंतर होते हुए भी वे सारे तत्व मौजूद थे जो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हैं।      
   
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति समानता, गुणवत्ता, सामर्थ्य और उत्तरदायित्व के स्तंभों पर आधारित है। इस नीति का उद्देश्य एक ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करना है जो सभी नागरिकों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करके और भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति के रूप में विकसित करके देश के परिवर्तन में सीधे योगदान दे। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2020 को घोषित किया गया था। सन 1986 में जारी हुई नई शिक्षा नीति के बाद भारत की शिक्षा नीति में यह पहला नया परिवर्तन है। यह नीति अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। उल्लेखनीय है कि इस नई शिक्षा नीति में महात्मा गांधी एवं रवींद्रनाथ टैगोर के शिक्षा शिक्षा संबंधी विचारों का संतुलित समावेश है।
                   महात्मा गांधी जनवरी, 1915 में दक्षिण अफ्रीका सेे भारत लौटे। अब जनसेवा ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था। रवींद्रनाथ टैगौर ने महात्मा गांधी की भारत वापसी का स्वागत करते हुए शांति निकेतन में आने का निमंत्रण दिया। महात्मा गांधी को उस समय तक शांति निकेतन के सम्बन्ध में अधिक जानकारी नहीं थी किन्तु वे रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों से परिचित थे। गोपालकृष्ण गोखले चाहते थे कि महात्मा गांधी भारतीय राजनीति में सक्रिय योगदान दें। महात्मा गांधी ने गोखले को वचन दिया कि वे अगले एक वर्ष भारत में रहकर देश के हालात का अध्ययन करेंगे। इस दौरान महात्मा गांधी ने देश के लिए आवश्यक शिक्षा व्यवस्था पर गहन चिंतन किया। उनके विचार रवींद्र नाथ टैगोर के विचारों से कुछ भिन्न थे, तो कुछ मिलते-जुलते। ऐसा माना जाता है कि टैगोर ने ही गांधी जी को ‘‘महात्मा’’ की उपाधि दी थी। गांधीजी के आध्यात्मिक और नैतिक गुणों के प्रति अपनी प्रशंसा व्यक्त करने के लिए टैगोर ने उनके नाम के साथ ‘‘महात्मा’’ विशेषण का प्रयोग किया
शिक्षा पर गांधी के विचार
महात्मा गांधी के शिक्षा संबंधी विचार आदर्शवादी थे और वे एक ऐसे स्वतंत्र समाज की आकांक्षा रखते थे जहां सभी मनुष्यों के साथ सम्मान का व्यवहार किया जाए तथा सभी को शिक्षा के समान अवसर मिलें। वे शासन में राम राज्य अर्थात भगवान राम का शासन लाना चाहते थे। महात्मा गांधी के अनुसार, एक अच्छी राजनीतिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अच्छाई का तत्व मौजूद होना चाहिए। उनका यह भी मानना था कि केवल एक व्यापक शिक्षा प्रणाली ही शरीर, मन और आत्मा को समृद्ध करते हुए इस सर्वोत्तम तत्व को सामने ला सकती है। गांधी जाति भेद से घृणा करते थे और महसूस करते थे कि यह भारत की समस्याओं का मूल कारण है। उनका मानना था कि केवल शिक्षा ही हमारे समाज को त्रस्त करने वाले सामाजिक-आर्थिक विभाजन को मिटा सकती है और उनका पहला काम हाथ से मैला ढोने की प्रथा को खत्म करना था।
       
   गांधी सहयोग, सहिष्णुता, सार्वजनिक भावना और जिम्मेदारी की भावना को महत्व देते थे जो केवल अनुशासित शिक्षा ही प्रदान कर सकती है। ये गुण शिक्षा के व्यक्तिगत और सामाजिक उद्देश्य के बीच एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन बना सकते हैं। उन्होंने शिक्षा को व्यक्ति के दिमाग को रचनात्मक, स्वतंत्र और आलोचनात्मक रूप से सोचने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए देखा।
शिक्षा के माध्यम से चरित्र निर्माण
अनुशासन एक ऐसी चीज है जिसे गांधी शांतिपूर्ण समाज के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति का मुख्य घटक मानते थे। महात्मा के लिए अनुशासन और शिक्षा साथ-साथ चलते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यह एक ऐसा गुण है जो समाज में बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से उत्थानशील जीवन जीने के लिए एक इंसान के लिए आवश्यक है। उनका दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा का लक्ष्य उस व्यक्ति का चरित्र निर्माण है। गांधी जी के अनुसार शिक्षा किसी भी बिंदु पर समाप्त नहीं होती बल्कि यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने दृढ़ता से महसूस किया कि शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट से समाज में सच्चाई, दृढ़ता और सहिष्णुता का अभाव हो जाएगा।

शिक्षा के माध्यम से व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करना

महात्मा गांधी जानते थे कि देश में सदियों से चली आ रही गुलामी ने आमजनता का भरपूर आर्थिक शोषण किया है। वे यह भी देख रहे थे कि जाति प्रथा ने युवाओं को परंपरागत अथवा पुश्तैनी व्यवसाय में तो बंाधे रखा है किन्तु उन्हें कौशल विकास का एक भी अवसर नहीं दिया गया है। गांधी जी समझ गए थे कि बिना व्यवयसयिक प्रशिक्षण के कौशल का विकास नहीं हो सकता है और कौशल के विकास के बिना आमदनी में वृद्धि नहीं हो सकती है। यदि गरीबी दूर करना है तो आर्थिक स्थिति में सुधार लाना होगा और यह कौशल विकास एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण के बिना नहीं हो सकता था। इसीलिए जब भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात आई गांधी जी ने शिक्षा में व्यावसायिक प्रशिक्षण को जोड़े जाने की पैरवी की।

शिक्षा और साक्षरता के बीच अंतर
आमतौर पर यह मानलिया जाता था कि यदि व्यक्ति ने चार अक्षर पढ़ना सीख लिया तो इसका अर्थ है कि वह साक्षर हो गया। गांधीजी ने शिक्षा और साक्षरता के अंतर को स्पष्ट किया। गांधी जी ने कहा, “शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा में सर्वांगीण सर्वश्रेष्ठ को विकसित करना है। साक्षरता शिक्षा का अंत नहीं है, आरंभ भी नहीं। यह उन साधनों में से एक है जिससे पुरुषों और महिलाओं को शिक्षित किया जा सकता है। साक्षरता अपने आप में कोई शिक्षा नहीं है।”
नैतिकता और अनैतिकता का बोध
गांधीजी शिक्षा को नैतिक और अनैतिक के बीच भेद करने का ज्ञान मानते थे। जब व्यक्ति शिक्षत हो जाता है तो वह भले-बुरे में भेद करना सीख जाता है। एक शिक्षित व्यक्ति न्याय और अन्याय को भी बखूबी समझ सकता है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति में विवेक जाग्रत करें जिससे वह नैतिक एवं अनैक कार्यों में भेद कर सके तथा सद्मार्ग पर चल सके।

शिक्षा पर टैगोर के विचार

रवींद्रनाथ टैगोर मानते थे कि प्रकृति के निकट रह कर हम बहुत कुछ सीख और समझ सकते हैं।  इसीलिए उन्होंने शांति निकेतन में प्रकृति के बीच अर्थात ‘ओपेन क्लासरूम’ शिक्षा की व्यवस्था रखी थी। टैगोर का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार है। टैगोर के अनुसार, सार्वभौमिक आत्मा हमारी आत्मा का मूल है, और उस तक पहुंचना मनुष्य की नियति है और हम उसका एक हिस्सा हैं। अपनी मंजिल तक पहुंचने का सफर सिर्फ शिक्षा से ही तय किया जा सकता है। इस संदर्भ में टैगोर का कहना था कि प्रकृति का विकास हमें चेतन या अचेतन रूप से सार्वभौमिक आत्मा की ओर ले जा रहा है और इसमें केवल शिक्षा से ही सहायता मिल सकती है। अतिमानव की ओर प्रगति वैसे भी होगी चाहे उसे सहायता मिले या न मिले, लेकिन शिक्षित न होने पर व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार से वंचित रह जाएगा।

आत्म-शिक्षा के तीन सिद्धांत
टैगोर की शिक्षा की अवधारणा स्व-शिक्षा के तीन सिद्धांतों पर निर्भर थी-

स्वतंत्रता : एक बच्चे के रूप में, उन्हें एक कमरे में पढ़ाई करने का विचार पसंद नहीं था और उन्हें लगता था कि छात्रों को कक्षा के बाहर पढ़ाई करनी चाहिए। इससे उनका पहला सिद्धांत और स्वतंत्रता बनी। वे छात्रों के लिए हर तरह से पूर्ण स्वतंत्रता में विश्वास करते थे। छात्रों को समभाव, सद्भाव और संतुलन का अभ्यास करना चाहिए। स्वतंत्रता को नियंत्रण की कमी के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। आत्म-नियंत्रण स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है। स्वतंत्र होना मनुष्य की स्वाभाविक अवस्था है। मनुष्य को इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए और एक बार इसे प्राप्त करने के बाद इससे भटकना नहीं चाहिए और अन्य सभी शक्तियाँ उसके अहंकार से निर्देशित होती हैं।

पूर्णता : टैगोर का दूसरा सक्रिय सिद्धांत जो स्व-शिक्षा का आधार है, वे है पूर्णता। उन्होंने महसूस किया कि छात्रों को अपने व्यक्तित्व, शक्ति और क्षमताओं के हर पहलू को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जो प्रकृति द्वारा दिया गया है। टैगोर ने महसूस किया कि शिक्षा का मतलब केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना और डिग्री प्राप्त करना नहीं है, बल्कि प्रगति किसी पेशे को अपनाकर जीविकोपार्जन करने की होनी चाहिए। टैगोर के अनुसार, एक बच्चे का व्यक्तित्व तब विकसित होगा जब उनके व्यक्तित्व के हर पहलू को बिना किसी हिस्से को पूरा किए और दूसरों को अवांछित ध्यान दिए बिना समान महत्व दिया जाएगा।

सार्वभौमिकता : टैगोर की सार्वभौमिक आत्मा की अवधारणा और इसके प्रति हमारी प्रगति तीसरा सिद्धांत बनाती है जो सार्वभौमिकता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आत्मा को सार्वभौमिक आत्मा के साथ पहचानना चाहिए। इसलिए, शिक्षा केवल साधारण विकास पर आधारित नहीं है बल्कि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की सीमाओं से ऊपर उठता है। प्रकृति के प्रत्येक तत्व में विश्वात्मा का वास है। उनका कहना था कि शिक्षक को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें बच्चे का व्यक्तित्व स्वतंत्र, परिपूर्ण और अप्रतिबंधित विकास से गुजरे।

शिक्षा पर गांधी और टैगोर के दृष्टिकोण में तुलना

रवींद्रनाथ टैगोर एवं महात्मा गांधी के शिक्षा संबंधी विचारों में समानता भी थी और विरोधाभास भी। गांधी और टैगोर ईश्वर या सार्वभौमिक आत्मा में विश्वास करते थे, दोनों आध्यात्मिकता की ओर इशारा करते थे। उनके विचार बाल-केंद्रित थे, बच्चे के व्यक्तित्व का सम्मान करते थे। बच्चों को वही सीखना चाहिए जिसमें उनकी रुचि हो। दोनों ने मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया और वे अंग्रेजी भाषा थोपने के खिलाफ थे। वे दोनों आदर्शवादी और मानवतावादी थे। दोनों का लक्ष्य ऊंचे लक्ष्य थे फिर भी उनके उद्देश्य अलग-अलग थे। गांधीजी ने बच्चों के संपूर्ण विकास और जातिवाद को खत्म करने पर जोर दिया, जबकि टैगोर शिक्षा के माध्यम से आत्म-प्राप्ति पर जोर देते थे। गांधी आम आदमी को शिक्षित करने और उसे समाज के योग्य बनाने के पक्षधर थे जबकि टैगोर संतगुणों के विकास पर बल देते थे। यद्यपि गांधी और टैगोर के विचारों में विशेष अंतर नहीं था। बस, गांधी जी ने शिक्षा के बुनियादी मूल्यों में चारित्रिक श्रेष्ठता के विकास के साथ रोजगार को लक्ष्य किया जबकि रवींद्रनाथ टैगोर ने दार्शनिक एवं आध्यात्मिक श्रेष्ठता को शिक्षा का आधार माना।

वर्तमान में लागू नई शिक्षा नीति में रोजगारोन्मुखता, त्रिभाषा प्रणाली एवं चारित्रिक श्रेष्ठता पर बल दिया गया है वस्तुतः यह विशेषताएं महात्मा गांधी एवं रवींद्रनाथ टैगोर के शिक्षा संबंधी विचारों का ही व्यवहारिक रूप है जिसके द्वारा आधुनिक विज्ञान, तकनीक एवं परम्पराओं में संतुलन बनाए रखा जा सकता है।
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