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Monday, December 28, 2020

चिंतन की सीमाओं को मिला विस्तार | डॉ शरद सिंह | दैनिक जागरण | पुनर्नवा | सप्तरंग

प्रिय मित्रो, आज दैनिक जागरण एवं नई दुनिया में सप्तरंग के अंतर्गत 'पुनर्नवा' में (सभी संस्करणों में) प्रकाशित विशेष फीचर में पढ़िए मेरे विचार ...
https://epaper.jagran.com/mepaper/28-Dec-2020-64-Kanpur-edition-Kanpur-page-12.html
हार्दिक आभार #दैनिकजागरण #नईदुनिया #नवदुनिया🙏
दिनांक 28.12.2020

#dainikjagran
#naidunia
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Thursday, September 10, 2020

कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार? - डॉ. शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित



दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार?" 🚩


❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार? 
   - डॉ. शरद सिंह

    कोरोना संक्रमण के विस्फोटक आंकड़ों के लिए कौन है जिम्मेदार - सरकार, अनलाॅक या हम खुद? जो आंकड़े पहले विस्फोट तक पहुंचे थे, वे अनलाॅक 4.0 में महाविस्फोट में जा पहुंचे हैं। लाॅकडाउन और कर्फ्यू लगा कर सरकार सख़्ती करती रहती तो हम इसे उसका तानाशाही रवैया कहते। सरकार ने अपने नागरिकों के विवेक पर भरोसा किया और क्रमशः अनलाॅक करते हुए आज उस चरण में पहुंचा दिया जहां से व्यापार, शिक्षा, यात्रा आदि एक बार फिर गतिमान हो सकते हैं। लेकिन बदले में हम सरकार को नहीं बल्कि खुद अपने आपको दे रहे हैं संक्रमण के विस्फोटक आंकड़े। यह लिखने का मकसद सरकार के अनलाॅक की प्रक्रिया की समीक्षा करना या उसे क्लीनचिट देना नहीं है, बल्कि मकसद है इस बात की गंभीरता को महसूस कराने का कि हमारे अपने लोग जो लापरवाहियां कर रहे हैं, वह हम पर ही भारी पड़ेंगी। ‘‘हमें कछु न हुइये!’’ की ढिठाई का नतीज़ा हमारे सामने है।
सागर जिले को ही लीजिए, 8 सितम्बर को कोरोना संक्रमण ने रिकार्ड तोड़ दिया। अभी तक  एक दिन में एक साथ सर्वाधिक 51 मरीज पॉजिटिव निकले। जिले में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 1358 हो गई है। वहीं 72 लोगो की मौत हो चुकी है। बाजार का आलम यह है कि कोरोनाकाल के पहले जिस तरह फुटपाथ पर अतिक्रमण कर के दूकानें लगाई जाती थीं, ठीक उसी तरह लगाई जाने लगीं हैं। इन दूकानों को दोपहर में हटवाया जाता है तो शाम तक वे फिर यथास्थान पहुंच जाती हैं। इनके बीच खरीददारों की भीड़। न कोई सोशल डिस्टेंसिंग और न कोई सुरक्षा उपाय। एक ग़ज़ब की ढिठाई देखी जा सकती है। सागर शहर में ही जहां विगत 10 अप्रैल तक मात्र एक कोरोना पाॅजिटिव था, वहां आज संक्रमण के आंकड़े जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, वे चिंतित करने वाले हैं।

        यहां साझा करना जरूरी समझती हूं उस व्यक्ति की पीड़ा जो कोरोना संकट की ग़िरफ्त में है। शायद उसके अनुभवों से कुछ सबक लिए जा सकें। वह व्यक्ति हैं मेरे फेसबुक मित्र - देवेन्द्र कुमार पाण्डेय। वाराणसी में रहते हैं। प्रत्यक्ष भेंट कभी नहीं हुई। उनकी फेसबुक वाॅल से साभार उनकी 7 सितम्बर की पोस्ट यहां दे रही हूं- ‘‘पिछला एक सप्ताह कठिन मानसिक यातना वाला गुजरा है। पूरा घर कोरोना पॉजिटिव हो गया। घर से दूर रहने के कारण मैं बच गया। अभी सभी घर में ही आइसोलेशन में हैं। घर सील है। बनारस में रहकर भी मैं घर नहीं जा सकता। घर से थोड़ी दूर रहकर परिवार को दवा, भोजन की व्यवस्था कर रहा हूं। अब सभी के हालत में सुधार दिख रहा है। थोड़ी राहत मिली है तो पोस्ट साझा करने की हिम्मत कर रहा हूं। उम्मीद है कि अब सब ठीक होगा। 15 अगस्त को नाना बना था। सभी बारी-बारी से हॉस्पिटल आ-जा रहे थे। सिजेरियन ऑपरेशन था। अस्पताल में 9 दिन रुकना पड़ा। मेरा पुत्र जो होली से 15 अगस्त तक कभी घर से बाहर नहीं निकला, वर्क फ्रॉम होम ही करता रहा, वह भी अस्पताल गया था और 2,3 दिन जग गया। वहीं कहीं या आने-जाने में संक्रमित हो गया। पहले तो बुखार आया, दूसरे दिन सूंघने की क्षमता खतम हो गई। डॉक्टर ने तुरंत कोरोना टेस्ट की सलाह दी। 2 दिन बाद जब तक उसका रिपोर्ट आता सभी में वही लक्षण आने लगे। श्रीमतीजी भयंकर सावधानी रखती थीं। मैं दूसरे शहर से सप्ताह में एक या दो दिन के लिए घर आता तो मुझे अलग कमरे में कोरेन्टीन कर देतीं। बाकी सब आपस मे हिले मिले रहते थे। बीच मे एक दो सप्ताह तो घर भी नहीं जाता था कि जब वहां जाकर कैद ही होना है तो जाने से भी क्या फायदा! परिणाम यह हुआ कि मैं बच गया और सभी संक्रमित हो गए। मेरा बचना भी अच्छा रहा। मैं सबकी देखभाल कर पा रहा हूं। मैं भी संक्रमित हो जाता तो कौन मदद करता? सरकारी हॉस्पिटल के ऊपर इतना बोझ है कि वहां सब भगवान भरोसे हैं। प्राइवेट हॉस्पिटल  इतने मंहगे हैं कि फीस पूछ कर ही हिम्मत जवाब दे जाती है। कुछ ईश्वर की कृपा और कुछ आप लोगों की दुआएं कि अब लगता है मुसीबत टल जाएगी। सबसे कष्ट में 20 दिन के बच्चे को लेकर बड़ी बिटिया है। यह बीमारी जो है सो है, सबको पता ही है लेकिन मेरा अनुभव यह रहा कि इसमें मानसिक संतुलन भी डगमगाने लगता है। पड़ोसी दूरी बनाकर आपका हाल पूछते हैं। मुसीबत में साथ नहीं देते। कुछ तो हाल पूछते भी डरते हैं...कहीं मदद लेने घर में आ गया तो? आपके मित्रों, रिश्तेदारों में ही कोई आपके साथ खड़ा हो सकता है। यह बीमारी बड़ी घातक है। सब कुछ सही रहा, ईश्वर की कृपा रही, होम आइसोलेशन में ही आप स्वस्थ हो गए तो भी आपको एक कठिन मानसिक यातना से गुजरना पड़ता है।...कोरोना हो ही न इसी में सबकी भलाई है। ईश्वर से प्रार्थना है कि यह कष्ट किसी को न सहना पड़े।’’ 

        वाकई ऐसी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीड़ा से किसी को न गुज़रना पड़े। इसलिए सावधानी में ही सुरक्षा है। चुनाव और त्यौहार हमारे सामने हैं। संक्रमण के आंकड़ें घटाना या बढ़ाना हमारे अपने हाथ में है। हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि हम सावधानी रखेंगे तो संक्रमितों के आंकड़ों का विस्फोट थम जाएगा वरना कोरोना  के महाविस्फोट की ख़बरें आना शुरु हो ही गई हैं।
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(दैनिक जागरण में 10.09.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, September 3, 2020

अनलॉक 4.0 : सतर्क रहें जब ढाबा और होटल में खाने जाएं | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "अनलॉक 4.0 : सतर्क रहें जब ढाबा और होटल में खाने जाएं" 🚩
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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अनलॉक 4.0 : सतर्क रहें जब ढाबा और होटल में खाने जाएं
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    1 सितम्बर से अनलॉक 4.0 शुरू हो गया है जो 30 सितंबर तक जारी रहेगा। इसकी गाईड लाईन पहले ही जारी कर दी गई थी। मध्यप्रदेश में इसमें संशोधन भी किया जा चुका है। मसलन, पहले रविवार को लॉेडाउन से मुक्त कर दिया गया था किन्तु दूसरे आदेश में रविवार का लॉकडाउन जारी रखे जाने की सूचना दी गई। कोरोना वायरस महामारी के प्रसार को कम करने के लिए बीते मार्च महीने में लॉकडाउन की घोषणा की गई थी, जो लॉकडाउन 2.0, 3.0, 4.0 तक चला। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से अनलॉक के माध्यम से देश को एक बार फिर पुरानी ज़िन्दगी लौटाने की कोशिश की जा रही है। अनलॉक-4 की नई गाइडलाइंस के मुताबिक 1 सितम्बर से सामाजिक, शैक्षणिक, खेल, मनोरंजन, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक कार्यक्रम और अन्य सभाओं में 100 लोगों के शामिल होने की छूट दी गई है। इस दौरान, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, थर्मल स्क्रीनिंग और सैनेटाइजर का उपयोग करना जरूरी होगा।

       गृह मंत्रालय की तरफ से अनलॉक को लेकर जारी दिशा निर्देशों में कहा गया है कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश केंद्र सरकार के परामर्श के बिना कंटेनमेंट जोन को छोड़कर किसी भी स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन नहीं लगा पाएंगे। पहले इसके लिए केंद्र ने राज्यों को छूट दे रखी थी। अनलॉक 4.0 में लोगों की अंतर-राज्यीय और सामानों की अंतर-राज्यीय गतिविधि पर कोई पाबंदी नहीं होगी। इस तरह की गतिविधियों के लिए किसी तरह की अलग से अनुमति, मंजूरी या ई-परमिट की जरूरत नहीं होगी। मेट्रो रेल को 7 सितंबर से चरणबद्ध तरीके से शुरू करने की अनुमति दी गई है। आगामी 21 सितंबर से 100 व्यक्तियों की अधिकतम सीमा के साथ सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक कार्यक्रमों की अनुमति दी गई है। जबकि स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को 30 सितंबर तक बंद  रखे जाने के निर्देश दिए गए हैं। गाईड लाईन के अनुसार कन्टेन्मेंट जोन्स के बाहर स्थित स्कूलों में नौवीं कक्षा से 12वीं कक्षा तक के छात्रों को अपने शिक्षकों से मार्गदर्शन लेने के लिए स्वैच्छिक आधार पर स्कूल जाने की अनुमति दी जा सकती है। राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में 50 प्रतिशत तक शिक्षण, गैर-शिक्षण कर्मचारियों को ऑनलाइन शिक्षण, टेली-काउंसलिंग से संबंधित कार्य के लिए स्कूलों में बुलाया जा सकता है। ऑनलाइन, डिस्टेंस लर्निंग की इजाजत जारी रहेगी और उसे प्रोत्साहित किया जाएगा।

मनोरंजन के क्षेत्र में 21 सितंबर से ही ओपन एयर थिएटर्स को खोले जाने की अनुमति रहेगी। सिनेमा हॉल, स्वीमिंग पूल, एंटरटेनमेंट पार्क, थियेटर (ओपन एयर थियेटर को छोड़कर) और इस तरह की जगहों पर गतिविधियां प्रतिबंधित रहेंगी। सिनेमा हॉल, स्विमिंग पुल, अंतरराष्ट्रीय उड़ानें (कुछ विशेष मामलों को छोड़कर) अभी भी बंद रहेंगे। अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा, गृह मंत्रालय द्वारा मंजूर यात्रा को छोड़कर, स्थगित रहेगी।

होटल, ढाबे आदि को खोले जाने की अनुमति सशर्त पहले ही दी जा चुकी है। अर्थात् कोरोना गाईडलाईन का पालन करते हुए होटल, ढाबे आदि खुले रखे जा सकते हैं। जिसके चलते अनलॉक 3.0 में ही लोगों ने होटलों और ढाबों पर जाना आरम्भ कर दिया था। जहां कोरोना गाईड लाईन का सख़्ती से पालन किया जा रहा है, उन होटलों या ढाबों में उपभोक्ताओं को कोई ख़तरा नहीं है लेकिन अनेक ऐसे ढाबे या छोटे होटल हैं जहां गाईड लाईन का पालन पूरी तरह से नहीं किया जा रहा है। यूं भी दूषित और सड़ी गली सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के खिलाफ जुर्माना अधिरोपित करने के साथ दंड का प्रावधान है। दूषित पदार्थ का सैंपल लेकर उसकी जांच में दूषित अथवा मिलावट सिद्ध होने पर यह कार्रवाई खाद्य एवं औषधि विभाग द्वारा संबंधित दुकानदार के खिलाफ की जाती है। खाद्य सुरक्षा विभाग के नियमानुसार आदर्श खाद्य सामग्री के जो कानून किसी दुकान या रेस्टोरेंट पर लागू होते हैं, वही नियम किसी साधारण ठेलों पर सामान बेचने वाले विक्रेता पर भी लागू होते हैं। अगर किसी खाद्य सामग्री में कोई कमी या मिलावट पाई जाती है तो पांच हजार रुपये से लेकर पांच लाख तक का जुर्माना ठोंका जा सकता है। बरती गई लापरवाही व अन्य तथ्यों के आधार पर जुर्माने की राशि कोर्ट तय करता है। इसके अलावा दुकानों के साथ ही ठेले वाले को भी खाद्य सामग्री बेचने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) से लाइसेंस लेने का प्रावधान है। इस समय जरूरी है कि खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता के साथ ही कोरोना गाईड लाईन के पालन पर भी कड़ाई से ध्यान दिया जाए। अनलॉक 4.0 में घर से बाहर खाने का चलन और बढ़ेगा। इसके साथ ही संक्रमण के ख़तरे भी और बढ़ेंगे। ताजा आंकड़ें देखें तो देश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा तेजी से बढ़कर 36 लाख के पार पहुंच गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक बीते 24 घंटे में देश में कोरोना के 78 हजार 512 नए मामले सामने आए और इस दौरान 971 लोगों की जान चली गई। इसके साथ ही देश में अब कोरोना संक्रमितों की संख्या 36,21,246 हो गई है वहीं, अब तक 64,469 लोग इस जानलेवा वायरस के शिकार बन चुके हैं। देश में अभी 7,81,975 एक्टिव मामले हैं। कोरोना संक्रमण का ख़तरा टला नहीं है बल्कि बढ़ा ही है। ऐसी स्थिति में यह ध्यान रखा जाना जरूरी है कि होटलों या ढाबों पर उन थाली, प्लेटों और चम्मचों को कैसे सेनेटाईज़ किया जा रहा है जिनका वे बार-बार प्रयोग कर रहे हैं। नियमानुसार तो खाद्य परोसे जाने वाले बरतन यानी थाली, प्लेट, कटोरियां, चम्मच, कप, गिलास आदि डिस्पोज़ल होने चाहिए। इनमें से गिलास, कप, चम्मच तो सीधे मुंह के संपर्क में आते हैं अतः इनका डिस्पोज़ल होना बेहद जरूरी है। एक व्यक्ति के द्वारा इस्तेमाल किए जाने के बाद उसे में दूसरे व्यक्ति को इस्तेमान नहीं करना चाहिए। सरकारी तबके को यह ध्यान रखना होगा कि होटलों और ढाबों द्वारा गाईड लाईन का पालन किया जाए। इसके साथ ही ग्राहकों को भी होटल या ढाबे पर जा कर ऑर्डर देने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि वहां गाईड लाईन का पालन किया जा रहा है या नहीं। दरवाज़े पर थर्मल टेस्टिंग को ही समुचित सुरक्षा मान लेने की भूल भारी पड़ सकती है।
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(दैनिक जागरण में 03.09.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, August 27, 2020

साहस नहीं ये तो है दुस्साहस | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "साहस नहीं ये तो है दुस्साहस" 🚩
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साहस नहीं ये तो है दुस्साहस 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        प्रकृति के सौंदर्य को निहारना भला सभी को अच्छा लगता है। हर कोई भरी हुई नदियों, तालाबों और झर-झर झरते प्रपातों को देखना चाहता है। सागर संभाग में ऐसे अनेक स्थल हैं जो बारिश के दिनों में अपनी छटाएं बिखेरने लगते हैं और पर्यटकों तथा प्रकृतिप्रेमियों को अपने पास बुलाने लगते हैं। सागर के राहतगढ़ वाटर फॉल, राजघाट बांध, पन्ना के बृहस्पति कुण्ड, पांडव फॉल आदि अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं जहां प्रति वर्ष बारिश के मौसम में सैंकड़ों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। इस वर्ष भी ये प्राकृतिक स्थल सौंदर्य से लबालब भर गए क्योंकि प्रकृति को क्या पता कि इस वर्ष उसे देखने आने वालों के लिए जोखिम ही जोखिम है। लेकिन जिन्हें इस जोखिम का पता है वे कथित साहस का परिचय देते हुए ऐसे पर्यटन स्थलों पर जा धमके। अभी हाल ही की घटना है जब सागर के राजघाट बांध और राहतगढ़ वाटर फॉल पर दर्शनार्थियों का हुजूम उमड़ पड़ा। प्रकृति का आनंद लेने पहुंचे लोगों ने न तो सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा और न ही कोविड-19 गाईड लाईन का। मेरे एक परिचित भी उसी भीड़ में सपरिवार शामिल थे। फोन पर उन्हें मैंने उनके इस कृत्य पर उलाहना दिया तो वे बड़े आत्मविश्वास से बोले-‘‘अरे, कुछ नहीं होता। फिर हम अपनी गाड़ी से गए थे। वहां सभी ठीक-ठाक दिखाई दे रहे थे। आप चिंता मत करिए। हम सब ठीक रहेंगे।’’ मैंने भी दुआ की उनके लिए  कि उनके साथ सब ठीक ही रहे। क्योंकि उनका बेटा जो अभी अट्ठारह साल का भी नहीं हुआ है, इन्दौर में कोचिंग ले रहा था। लेकिन कोरोना संक्रमण के इस दौर में उसे अपनी कोचिंग छोड़ कर बीच में ही घर वापस आना पड़ा। उनकी बेटी अभी कक्षा दस में पढ़ रही थी। बोर्ड परीक्षा के लिए उसने बहुत मेहनत की थी लेकिन कोरोना के चलते पढ़ाई का सिलसिला गड़बड़ा गया। उसने साहस कर के परीक्षा तो दी लेकिन रिजल्ट उसके मन मुताबिक नहीं रहा। फिर भी वे दोनों बच्चे अपने भविष्य को ले कर सचेत हैं और ऑनलाईन पढ़ाई ज़ारी रखे हुए हैं। लेकिन माता-पिता अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य को ले कर कितने सजग हैं यह तो उनके राजघाट भ्रमण से ही पता चल गया। मैं इसे उनका साहस नहीं बल्कि दुस्साहस कहूंगी जो उन्होंने इतना बड़ा रिस्क लिया। यदि वे सोशल डिस्टेंसिंग और कोविड-19 गाईड लाईन का ध्यान नहीं रख सकते थे तो उन्हें ऐसे स्थान पर जाना ही नहीं था या फिर भीड़ देख कर गाड़ी से उतरे बिना उसी समय वापस लौट आना था। यह संक्रमण ऐसा नहीं है जिसके लक्षण तुरंत दिखने लगें। फिर जानते-बूझते स्वयं को, अपने परिवार को मुसीबत में क्यों डालना? इससे उन लोगों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है जो संपर्क में आते हैं। सभी जानते हैं कि जब तक संक्रमण का पता चलता है तब तक यह संक्रमण दो-चार लोगों को अपनी चपेट में ले चुका होता है।
मध्यप्रदेश में अब तक कुल 9 लाख 51 लाख 822 लोगों के टेस्ट हो चुके हैं। जिसमें से करीब 42 हजार मरीज कोरोना पॉजिटिव हुए हैं। अकेले सागर शहर में ही कोरोना मरीजों की निरंतर बढ़ती संख्या एक वार्निंग की तरह है जिसे लोग अनदेखा कर के स्वयं को मुसीबत की ओर धकेल रहे हैं। सागर शहर में जहां 10 अप्रैल को एक मरीज था वहां अब आंकड़ा रिकार्ड तोड़ता जा रहा है। बायरोलॉजी लैबों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार 25 अगस्त 2020 को सागर में कोरोना का विस्फोट हुआ। एक साथ 34 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव मिली। इस पर स्वास्थ्य विभाग का चिंतित होना स्वाभाविक है। बुंदेलखंड चिकित्सा महाविद्यालय में कोविड-19 महामारी के कारण हो रही मौतों की संख्या को कम करने तथा संक्रमण की रोकथाम के लिए संभाग कमिश्नर जेके जैन ने भी स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक अमलों तथा समाजसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों की एक बैठक ली। कमिशनर जैन ने बताया कि, कोविड-19 संक्रमण के संबंध में पॉजिटिव प्रकरणों का ’’अर्ली आइडेंटिफिकेशन’’ अर्थात प्रारंभिक अवस्था में ही संक्रमण का पता कर इलाज प्रारंभ करना बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि कोविड संक्रमण की रोकथाम एवं बचाव हेतु आइडेंटिफिकेशन, आइसोलेशन, टेस्टिंग तथा ट्रीटमेंट की प्रक्रिया अपनायी जा रही है। ऐसे प्रकरण जो संक्रमण की प्रारंभिक अवस्था में ही सामने आ जाते हैं उनका इलाज सही वक्त पर शुरू हो जाता है। जिससे व्यक्ति जल्द स्वस्थ होकर घर लौट पाता है। परंतु ऐसे प्रकरण जिनमें व्यक्ति गंभीर रूप से संक्रमित होने के बाद अस्पताल पहुंचता है, उसके बचने की संभावना कम होती है। शहर में दर्ज हो रही मृत्यु का सबसे बड़ा कारण ’’लेट प्रेजेंटेशन’’ है। लेट प्रेजेंटेशन से तात्पर्य व्यक्ति के गंभीर रूप से संक्रमित होने के बाद अस्पताल पहुंचना है। ऐसी स्थिति में संक्रमण बहुत अधिक बढ़ जाता है। उन्होंने जन सामान्य से अपील की कि, कोविड-19 के लक्षण दिखने पर तत्काल रूप से चिकित्सकीय परामर्श लिया जाए। कमिश्नर ने कोविड-19 की गाईड लाईन भी याद दिलाई कि कोविड संक्रमण से बचाव हेतु फेस कवरिंग अर्थात नाक एवं मुंह को ढकना अति-आवश्यक है। इसके लिए ना केवल मास्क बल्कि कोई अन्य कपड़ा जैसे गमछा, दुपट्टा आदि के द्वारा भी चेहरे का ढंका जा सकता है। वायरस से बचाव हेतु आवश्यक है कि, कपडे़ को थ्री-फोल्ड करके पहना जाए। संभागायुक्त ने सभी को संबोधित करते हुए इस आपदा के समय देशहित में सभी से सहयोग मांगा। उन्होंने बताया कि कोविड-19 संक्रमण को फैलने से रोकने हेतु जन भागीदारी भी अत्याधिक आवश्यक है। सभी के समन्वित प्रयासों से संक्रमण को फैलने से रोका जा सकेगा साथ ही इससे होने वाली मृत्युदर को भी कम किया जा सकेगा। उन्होंने शहर के बुद्धिजीवी, गणमान्य नागरिकों से अपील की कि, आज शहर को उनकी जरूरत है। वे अपने-अपने क्षेत्र में लोगों को कोरोना के संबंध में सजग एवं जागरूक बनाएं। जिससे ना केवल सही वक्त पर मरीज अस्पताल पहुंच सके बल्कि सावधानियां रखकर इस संक्रमण से बच भी सके। इस मुहिम में भागीदारी तथा जन जागरूकता हेतु शहर की मुहल्ला समितियों को शामिल करना भी तय किया गया।

एक कहावत है कि जगाया उसे जा सकता है जो सो रहा हो। जो जाग रहा हो और जानबूझ कर सोने का ढोंग कर रहा हो, उसे जगाया नहीं जा सकता है। यही हाल उन दुस्साहसियों का है जो अपने कथित प्रकृतिप्रेम और पर्यटन के नाम पर खुद की और अपने परिवारजन की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि कोविड कोरोना संक्रमण की संख्या जितनी तेजी से घटेगी, उतनी तेजी से हमें इस भयावह स्थिति से छुटकारा मिलेगा। जब संक्रमण फैलेगा नहीं तो वायरस बढ़ेगा कैसे? और जब वायरस बढ़ेगा नहीं तो इससे छुटकारा भी मिल ही जाएगा। राजघाट बांध में नियमों को ताक में रख कर उमड़ी भीड़ जल्दी वहां से नहीं टलती यदि किसी ने उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल नहीं किया होता। उस वीडियो को देख कर प्रशासन हरकत में आया और वहां पहुंच कर लोगों को समझाईश दी। 

बेशक पर्यटन और घूमने-फिरने में बुराई नहीं है लेकिन यदि कोरोना गाईड लाईन का ध्यान नहीं रखा जाए तो फिर इसमें जानलेवा बुराई है। प्रशासन सिर्फ़ समझा सकता है, दण्डित कर सकता है लेकिन जब बात जानलेवा संक्रमण की हो तो स्वविवेक से काम लेना भी जरूरी है। ऐसे मामले में किसी भी प्रकार का दुस्साहस सभी के लिए भारी पड़ सकता है। वो कहते हैं न कि सतर्क रहें, सुरक्षित रहें।  
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(दैनिक जागरण में 27.08.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, August 20, 2020

स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं" 🚩
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विशेष लेख :
स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 
        जब मैं सुबह-सुबह अपने शहर की एनएच-26-ए रोड पर घूमने निकलती हूं तो पहले जो इलाका पड़ता है वह बजरिया कहलाता है। बजरिया की सड़क जहां मेन रोड से मिलती है वहां एक सुविधायुक्त सुलभ शौचालय है। शौचालय के बाद रोड साईड पर ही कुछ दूकाने हैं जिनमें शराब की दूकान भी है। इससे ओर आगे बढ़ने पर कुछ दूर चल कर एक ऐसा स्पॉट है जहां सड़क की दूसरी ओर के लोग कचरा डालते हैं। वहीं सुबह-सवेरे ‘‘लोटा-परेड’’ का अप्रिय, शर्मनाक दृश्य देखने को मिल जाता है। वैसे आजकल लोग लोटे के बदले प्लास्टिक की बोतल में पानी ले कर जाते हैं जो अकसर कोल्डड्रिंक की बोतल होती है। ऐसे लोगों को देख कर यही सोचती हूं कि अब इसमें दोष किसका है? प्रशासन का या लोगों का? माना कि नगरपालिका प्रशासन में अनेक गड़बड़ियां हो सकती हैं जिनके लिए हम उन्हें कोसते ही रहते हैं लेकिन जो काम जनहित में किया गया है उसका उपयोग करने में कोताही क्यों बरतते हैं? चार कदम और चल कर सुलभ शौचालय तक पहुंचा जा सकता है लेकिन ऐसा करने के बजाए सड़क पार कर के गंदगी फैलानागरिक कर्त्तव्य का उल्लंघन नहीं है? खैर, नागरिक कर्त्तव्य एक भारी-भरकम शब्द लगता है लेकिन इसे इंसान होने का फ़र्ज़ भी तो माना जा सकता है। एक गाय-भैंस कहीं भी गोबर करती है तो हम यह सोच कर अनदेखा कर देते हैं कि वह तो एक जानवर है। तो फिर उन इंसानों को क्या कहा जाए जो इस तरह की गंदगी फैलाते हैं? यदि यह कहें कि वे अनपढ़ हैं तो यह तर्क हज़म नहीं होता है क्योंकि अपने घर के बाहर गंदगी फैलाने वाले भी अपने रसोईघर और भगवान के आले को साफ़-सुथरा रखते हैं। तो यही सफ़ाई की भावना अपने घर से बाहर या सड़क के प्रति क्यों नहीं होनी चाहिए?
     मुझे लगभग रोज ही वह घटना याद आती है जब मैं सागर शहर के प्रबुद्ध नागरिकों के के संगठन ‘‘प्रजामंडल’’ की सदस्य के नाते शहर की एक बस्ती में स्वच्छता-जागरूकता अभियान पर गई थी। बस्ती की महिलाएं पहले झिझकीं फिर आहिस्ते से खुल कर बोलने लगीं। एक महिला ने जिस सरलता से मुझे अपनी सच्चाई बताई, उस पर मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उसकी साफ़गोई के लिए उसे बधाई दूं या उसकी ‘लाईफ स्टाईल’ के लिए उसे फटकार लगाऊं। हुआ यूं कि जब मैंने उस महिला से पूछा कि क्या तुम्हारे घर में शौचालय है? उसने बड़े इतरा कर, मुस्कुरा कर उत्तर दिया -‘‘हऔ, है। हमाये इते शौचालय है।’’ लेकिन ग्रामीण इलाके के मेरे पूर्वअनुभवों ने मेरे भीतर घंटी बजा दी और मैंने दूसरे ही पल उससे पूछ लिया, ‘‘लेकिन तुम शौचालय में जाती हो या लोटा ले कर बाहर?’’ वह जरा झेंप कर, हंस कर बोली,‘‘हमें तो बाहर अच्छो लगत है। हम तो बाहरई जात आएं।’’ मेरी शंका सही निकली। दरअसल, यही बात बार-बार सामने आती है कि सुविधाएं उपलब्ध होने से भी कहीं बड़ी आवश्यकता है व्यवहार परिवर्तन की।

आजकल जगह-जगह सार्वजनिक शौचालय बने होते हैं, कोई भी व्यक्ति हो उसे उनका उपयोग करना चाहिए। घर का जो भी कचरा हो उसे कचरे के डिब्बे में रख कर कचरागाड़ी में ही डालना चाहिए। हमारे घर के छोटे बच्चों को भी सड़क स्वच्छता के बारे में जानकारी प्रदान करना चाहिए ताकि वह भी अपना टूटा-फूटा समान, कोल्डड्रिंक की बोतलें, प्लास्टिक की बोतल ,इधर उधर ना फेकें। साफ़ सफाई के लिए लोगो को सामने आना होगा और योगदान देना होगा।
      
“देश की सफाई एकमात्र सफाई कर्मियों की जिम्मेदारी नहीं है क्या इस में नागरिकों की कोई भूमिका नहीं है? हमें इस मानसिकता को बदलना होगा।“ यही तो कहा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ आरम्भ करते हुए। राजनैतिक स्तर पर राजनीतिक दलों में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन स्वच्छता एक ऐसा विषय है जिस पर सभी एकमत दिखाई देते है। क्योंकि स्वच्छता है तो स्वास्थ्य है। दुख की बात है कि देश को स्वतंत्र हुए 73 वर्ष हो चुके हैं लेकिन आज भी हमें साफ-सुथरा रहने के सबक परस्पर एक-दूसरे को सिखाने पड़ रहे हैं। स्वच्छता हमारे घर, सड़क तक के लिए ही जरूरी नहीं होती है, यह सभी के स्वास्थ्य की पहली आवश्यकता है। इसी को मद्देनजर रखते हुए भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और ‘गंदगी भारत छोड़ो अभियान’।

आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से शुरू, भारत सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन किया और पूर्ण स्वच्छता अभियान शुरू किया जिसको बाद में 01 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा निर्मल भारत अभियान नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था। इसके बाद स्वच्छ भारत अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई। स्वच्छ भारत अभियान 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया और 2019 तक खुले में शौच को समाप्त करना इसका उद्देश्य तय किया गया। यह एक राष्ट्रीय अभियान है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने महात्मा गांधी जी की जयंती 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की , स्वच्छ भारत अभियान को भारत मिशन और स्वच्छता अभियान भी कहा जाता है। महात्मा गांधी जी की जयंती के अवसर पर माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी महात्मा गांधी जी की 145 वी जयंती के अवसर पर इस अभियान की शुरुआत की 2 अक्टूबर 2014 थी। साफ-सफाई को लेकर भारत की छवि को बदलने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को एक मुहिम से जोड़ने के लिए जन आंदोलन बनाकर इसकी शुरुआत की। हाल ही में ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान भी आरम्भ किया गया है।

स्वच्छ भारत अभियान और गंदगी भारत छोड़ो अभियान के मूल उद्देश्य हैं- खुले में शौच बंद करवाना जिसके तहत हर साल हजारों बच्चों की मौत हो जाती है, सामूहिक शौचालयों का निर्माण करवाना, लोगों की मानसिकता को बदलना, शौचालय उपयोग को बढ़ावा देना और सार्वजनिक जागरूकता लाना। इसी अभियान के तहत सन् 2019 तक सभी घरों में पानी की पूर्ति सुनिश्चित कर के गांवों में पाइपलाइन लगवाना भी तय किया गया था जो अभी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है। इनके अतिरिक्त ग्राम पंचायत के माध्यम से ठोस और तरल अपशिष्ट की अच्छी प्रबंधन व्यवस्था सुनिश्चित करना, सड़के फुटपाथ ओर बस्तियां साफ रखना, साफ सफाई के जरिए सभी में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करना भी स्वच्छता अभियान का अभिन्न हिस्सा है। यह सब तभी संभव है जब सभी नागरिक स्वच्छता से रहने की आदत डाल लें। महात्मा गांधी ने सही कहा था -“जो परिवर्तन आप दुनिया में देखना चाहते हैं वह सबसे पहले अपने आप में लागू करें।“ 
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(दैनिक जागरण में 20.08.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, August 13, 2020

किसी चुनौती से कम नहीं ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण 13.08.2020 में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "किसी चुनौती से कम नहीं ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान" 🚩
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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विशेष लेख :
किसी चुनौती से कम नहीं ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान
     - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अगस्त को दिल्ली में ’स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत बनाए गए ’राष्ट्रीय स्वच्छता केंद्र’ का उद्घाटन किया था। उसी दौरान देशवासियों से स्वतंत्रता दिवस तक एक सप्ताह लंबा ‘‘गंदगी भारत छोड़ो’’ अभियान चलाने का आह्वान किया और कहा कि ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ ने हर देशवासी के आत्मविश्वास और आत्मबल को बढ़ाया है तथा इससे जो चेतना पैदा हुई है, उसका बहुत बड़ा लाभ कोरोना वायरस के विरुद्ध लड़ाई में मिल रहा है। जैसे महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई का आंदोलन शुरू करते हुए अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया था। उसी तर्ज पर प्रधानमंत्री मोदी ने भी ’गंदगी भारत छोड़ो’ का नया नारा दिया है। इस नारे के साथ जुड़े हुए अभियान की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि प्रधानमंत्री ने कहा कि महात्मा गांधी जी का अभियान था- अंग्रेजों भारत छोड़ो। अब हम लोग अभियान चला रहे हैं- गंदगी भारत छोड़ो। देश को कमजोर बनाने वाली बुराइयां भारत छोड़ें, इससे अच्छा और क्या होगा। इसी सोच के साथ पिछले छह वर्षों से देश में एक व्यापक ’भारत छोड़ो अभियान’ चल रहा है। 
     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंदगीमुक्त भारत अभियान की शुरुआत की। 8 अगस्त से शुरू हुआ अभियान 15 अगस्त तक चलना तय किया गया। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ‘‘भारत छोड़ो के यह सभी संकल्प स्वराज से सुराज की भावना के अनुरूप हैं। आइए, आज से 15 अगस्त तक यानि स्वतंत्रता दिवस तक देश में एक हफ्ते का लंबा अभियान चलाएं। स्वराज के सम्मान का सप्ताह यानी ’गंदगी भारत छोड़ो सप्ताह’... उन्होंने कहा कि स्वच्छता अभियान की सफलता के बाद अब देश को गंदगीमुक्त बनाने पर जोर देना होगा। कचरे से कंचन बनाना है।’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें कचरे से खाद बनाने, सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्ति पाने की दिशा में बढ़ना होगा। इसी दौरान पिछले छह वर्षों के स्वच्छ भारत अभियान की सफलता की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इससे कोरोना से युद्ध में भी लाभ मिला है। उन्होंने कहा, ’अगर 2014 के पहले कोरोना जैसी आपदा आती तो क्या हम इसे रोक पाते। लॉकडाउन कभी सफल होता? उस समय 60 करोड़ की बड़ी आबादी खुले में शौच करने को मजबूर थी। कोरोना के दौरान शौचालय न होता तो क्या हाल होता?’’ 

प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद मध्यप्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान को मध्यप्रदेश में जन-जन तक पहुंचाया जाएगा। उनके अनुसार यह अभियान प्रदेश में 16 अगस्त से 30 अगस्त तक चलाया जाएगा। अभियान में शहरों में व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक शौचालयों की साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन पर नागरिकों को संवेदित और जागरूक किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में अपने शहरों को गंदगी मुक्त करने की दिशा में जुट जाएं। इस अभियान में 16 और 17 अगस्त को स्वच्छता शपथ एवं व्यक्तिगत शौचालयों का रखरखाव और सफाई पर अशासकीय संगठनों के माध्यम से झुग्गीबस्तियों एवं अन्य मोहल्लों में नागरिकों से चर्चा की जाएगी। निकाय में आवासीय परिसरों, प्रमुख स्थानों और कार्यालयों में स्वच्छता की शपथ दिलाई जाएगी। 18 से 20 अगस्त तक नो प्लास्टिक और रिसाइकिल, रियूज, रिड्यूज और रिफ्यूज के संबंध में निकायों, युवाओं और विद्यार्थियों से ऑनलाइन संवाद और परिचर्चाओं का आयोजन किया जाएगा। नागरिक संगठनों एवं जन-प्रतिनिधियों के माध्यम से बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर प्लास्टिक प्रतिबंध के संबंध में जागरूकता गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। अभियान में 21 से 23 अगस्त तक कोविड-19 के संबंध में लोगों को नेपकिन और उपयोग किए गए मास्क आदि के सुरक्षित निपटान के संबंध में जागरूक किया जाएगा। नगरीय निकाय द्वारा क्वारेंटाइन केन्द्रों की स्वच्छता, मास्क पहनने की समझाइश और निकायों में सफाईकर्मियों को सम्मानित करने का कार्य किया जाएगा। अभियान में 24 से 26 अगस्त तक आवासीय परिसरों में स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्कीकरण, घरेलू हानिकारक कचरे का सुरक्षित निपटान करने के संबंध में जन-जागरूकता के साथ ही स्व-सहायता समूह के सदस्यों एवं आवासीय संघों से चर्चा की जाएगी। अंतिम चरण में 26 से 30 अगस्त तक निकायों एवं सहयोगी संगठनों के सहयोग से स्वच्छता श्रमदान तथा निकायों द्वारा सभी सार्वजनिक शौचालयों के अंदर और बाहर विशेष सफाई अभियान चलाया जाएगा। कार्यक्रमों में मास्क पहनने और सोशल डिस्टेसिंग प्रोटोकॉल का अनिवार्य रूप से पालन करने तथा कंटेनमेंट जोन में यह गतिविधियां नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं। गतिविधियों की नियमित रिपोर्टिंग की जाए। अभियान का व्यापक प्रचार-प्रसार कर नागरिकों को जागरूक एवं प्रोत्साहित किया जाए।

ध्यान रखने वाली बात यह होगी कि कहीं यह अभियान काग़ज़ी और समारोही हो कर न रह जाए। यहां याद दिलाना जरूरी है कि 2 अक्टूबर 2014 को ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ प्रधानमंत्री द्वारा आरम्भ किया गया था। नामचीन लोग इस अभियान के ब्रांड एम्बेस्डर बनाए गए। अभियान आरम्भ हुए लगभग छः साल होने को आ रहे हैं लेकिन परिणाम का आकलन हम अपने शहरों की गलियों और निचली बस्तियों को देख कर स्वयं ही कर सकते हैं। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री को एक इमोशनल नारे के रूप में अभियान को सामने रखने की आवश्यकता महसूस हुई। वे भी जानते हैं कि झाड़ू और तसले के साथ फोटो खिंचवा कर मीडिया में प्रचारित कर सफ़ाई नहीं की जा सकती है। यदि नारों और अभियानों की सूची मात्र बढ़ानी है तो बात और है अन्यथा प्रशासन को असली गंदगी तक पहुंचना होगा और उसके निपटारे पर ध्यान देना होगा। इसके लिए हर व्यक्ति के मन में भी स्वच्छता की भावना जगानी होगी, जो अपने आप में सबसे बड़ी चुनौती है। कम से मध्यप्रदेश में और उसमें भी बुंदेलखंड में यह चुनौती और अधिक व्यापक है। यदि ज़मीनी स्तर पर ’गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान भी ‘‘शो बिजनेस’’ की तरह चलाया गया तो शायद अगले छः साल में एक और अभियान की ज़रूरत पड़ेगी और तब तक आम नागरिक गंदगी के ढेर पर बैठा प्रदूषित सांसें लेता बीमारियों से जूझता रहेगा। यानी कुल मिला कर अवधि कम है और चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं। 
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(दैनिक जागरण में 13.08.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, August 6, 2020

अयोध्या सी दृढ़ता चाहिए सागर को स्मार्ट बनाने के लिए | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख:

अयोध्या-सी दृढ़ता चाहिए सागर को स्मार्ट बनाने के लिए
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 
        ‘‘जीवन में कुछ सपने पूरा होने में समय लेते हैं, ऐसा ही एक सपना जो मेरे हृदय के समीप है, अब पूरा हो रहा है।’’ श्री लालकृष्ण आडवानी के ये उद्गार थे अयोध्या में राममंदिर के शिलान्यास किए जाने पर। इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखे जाने के बाद कहा कि ‘‘यह आनंद का क्षण है क्योंकि जो संकल्प लिया गया था। वह आज पूरा हुआ है।’’ ठीक इसी प्रकार सागर नगर ने भी स्मार्ट सिटी बनने का सपना देखा है और इस सपने के पूरा होने के आनंद के क्षण को नगर का प्रत्येक नागरिक जीना चाहता है। लेकिन अभी यह सपना पूरा होने में अनेक कठिनाइयां हैं। इसके रास्तें में सबसे बड़ी बाधा है दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी। यदि सागर को स्मार्ट सिटी में बदलते देखना है तो नेताओं, अधिकारियों और नागरिकों को दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय देना होगा। मात्र सोचने, कल्पना करने अथवा चर्चा की चुगाली करने से यह सपना सच नहीं होगा।
जब 500 साल पुराना सपना पूरा हो सकता है तो चंद पंच वर्षीय योजनाओं पुराना सपना क्यों नहीं? जब स्मार्ट सिटी की चर्चा आती है तो पहला प्रश्न मन में कौंधता है कि यह ’स्मार्ट सिटी’ है क्या? किसी भी शहर की स्मार्टनेस उसकी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति पर निर्भर होती है। यदि शहर में सड़कें उखड़ी हुई हैं, ड्रेनेज की व्यवस्था चौपट है और हर साल बारिश में नागरिकों को सड़क पर बहती नालियों का समाना करना पड़ता है, यदि कचरा प्रबंधन का काम लचर है या फिर शासकीय स्तर पर चिकित्सकीय सुविधाएं गड़बड़ी से भरी पड़ी हैं तो मान कर चलना होगा कि आसान नहीं है डगर स्मार्टसिटी की। उदाहरण के लिए सागर को ही लीजिए। भौगोलिक दृष्टि से एक अत्यंत सुंदर शहर है। यहां का विश्वविद्यालय डाॅ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र दुनिया के कोने-कोने में जा कर नाम कमा रहे हैं। शहर की अपनी एक झील है। एक पुराना शहर है जो चारो ओर से नई काॅलोनियों के रूप में विस्तार पाता जा रहा है। इस शहर की अपनी एक बोली है, अपनी है संस्कृति है और अपनी एक पहचान है। इस तरह की खूबियां लगभग हर उस शहर की है जो स्मार्टसिटी की दौड़ में विजयी मुद्रा में खड़े हैं। इसलिए इन सभी चुनौतियां भी लगभग एक समान हैं। इसीलिए यहां मैं सागर शहर के संदर्भ में बात करूंगी। सबसे पहले तो सागर शहर के अभिन्न हिस्से मकरोनिया उपनगर को पुनः नगर निगम से जोड़ने की जरूरत है ताकि मकरोनिया उपनगर जो एक ऐजुकेशन हब और व्यावसायिक केन्द्र के यप में तेजी से उभरता जा रहा है उसे भी स्मार्ट सिटी योजनाओं के साथ विकास करने का अवसर मिल सके। 
 
निसंदेह सागर शहर के मध्य में एक पुराना शहर है। इस पुराने शहर के बसाने वालों ने शहर के लिए उत्तम कोटि की पेयजल व्यवस्था एवं जल निकासी व्यवस्था की थी। लेकिन धीरे-धीरे वे सारी व्यवस्थाएं सिकुड़ गईं। आज डेªनेज़ और सफाई की व्यवस्था चरमरा चुकी है। जब पुराना शहर बसाया गया था तब उसकी सड़कें चैड़ी हुआ करती थीं (जैसेकि साक्ष्य मिले हैं) लेकिन कई अब सड़कें आज भी अतिक्रमण की चपेट में हैं। नगरनिगम की सीमा में आने वाले शहर के अधिकांश हिस्से अतिक्रमण के शिकार हैं। बरसाती पानी की निकासी के लिए सभी सड़कों तक का बेहतरीन नेटवर्क तैयार करना होगा। शत-प्रतिशत रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर जोर देना होगा। जरा-सी बारिश हुई और निचली बस्तियों तथा काॅलोनियों में पानी भरने लगता है। शहर के पुराने नालों का रख-रखाव जरूरी है। सभी घरों तक डोर-टू-डोर कचरा उठाने की व्यवस्था की जा चुकी है लेकिन इस मुद्दे पर नागरिकों में अभी जागरुकता की कमी है। नतीजन कई मोहल्ले ऐसे हैं जहां कचरों का ढेर लग जाया करता है। ठोस कचरे की शत-प्रतिशत रिसाइक्लिंग करने की समस्या का स्थाई समाधान जरूरी है। मसवासीग्रंट में जहां शहर का सारा कचरा डम्प किया जाता है, गांव वाले परेशान होते रहते हैं।  सभी घरों में शौचालय, स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था की जानी आवश्यक होने पर भी आज भी लोग ‘लोटा परेड’ करते दिखाई दे जाते हैं। सीवरेज और गंदे पानी के प्रबंधन के लिए नेटवर्क का संपूर्ण विस्तार जरूरी है। पुरानी सीवरेज सिस्टम पूरी तहर से ध्वस्त हो चुका है। सभी घरों में कनेक्शन देकर 24 घंटे जलापूर्ति करना भी स्मार्ट सिटी का कंसेप्ट है। जिसके चलते प्रत्येक व्यक्ति पर लगभग 135 लीटर की आपूर्ति करनी होगी। जिससे लोगों को सहूलियत हो। वाटर ट्रीटमेंट पर ध्यान देना होगा। 

आईटीके मामले में दूसरे शहरों की अपेक्षा हम पीछे हैं। नेट कनेक्टिविटी के चुस्त-दुरूस्त संजाल की जरूरत है। पूरे शहर में 100 एमबीपीएस की स्पीड के साथ वाई-फाई की सुविधा मिलनी चाहिए, ताकि लोग कभी भी नेट इस्तेमाल कर सकें। यूं भी दैनिक जीवन में हर काम के लिए इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। अतः इंटरनेट व्यवस्था सुचारू होना जरूरी है।

सागर शहर को स्मार्ट बनाने के लिए नागरिकों के भी कुछ दायित्व हैं जैसे, शहर की स्वच्छता बनाए रखना, नागरिकों की सुरक्षा और संरक्षा, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा पेयजल को व्यर्थ बहने से रोकना, रेन वाटर हार्वेसिं्टग को अपनाना, सौदर्याीकरण के लिए लगाए जाने वाले पेड़-पौधों की रक्षा करना क्यों कि ये न केवल सुन्दरता बढ़ाते हैं बल्कि पर्यावरण में संतुलन भी बनाए रखते हैं। सच तो यह है कि हर नागरिक चाहता तो बहुत कुछ है लेकिन उसे पाने के लिए शासन अथवा राजनीतिक दलों का मुंह ताकता रहता है। बुनियादी जरूरतों को पूरा कराने में भी उसे हिचक होती है। इसलिए यह तय है कि यदि अपने शहर को सचमुच ‘स्मार्ट सिटी’ बनाना है तो नागरिक सहयोग एवं जागरूकता की अहम भूमिका को स्वीकार करना होगा। राह कठिन है, इस अर्थ में भी कि किसी स्कैम पर चर्चा करना आसान होता है लेकिन समय रहते उस स्कैम को होने से ही रोकना साहस का काम होता है। लेकिन यदि आमजनता अधिक टैक्स चुकाते हुए अधिक सुविधाएं पाने की चाहत रखती है तो उसे ‘‘व्हिसिल ब्लोअर्स’’ बन कर अपने टैक्स के पैसों की निगरानी भी करनी होगी। दरअसल नेताओं, अधिकारियों एवं नागरिकों में अयोध्या-सी दृढ़ता चाहिए सागर को स्मार्ट बनाने के लिए। 
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(दैनिक जागरण में 06.08.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, July 30, 2020

विशेष लेख : लापरवाहियां भारी पड़ सकती हैं अनलाॅक-3 में - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh





"लापरवाहियां भारी पड़ सकती हैं अनलाॅक-3 में " ... आज 30.07.20 #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ...


हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏

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विशेष लेख :

लापरवाहियां भारी पड़ सकती हैं अनलाॅक-3 में

- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

       अनलॉक-2 की अवधि 31 जुलाई को पूरी होने वाली है और उसके बाद अनलॉक-3 लागू किया जाएगा। अनलाॅक-3 के सामने एक और बड़ी चुनौती है आगामी त्यौहारों की। बकरीद और रक्षाबंधन जैसे त्योहार 31 जुलाई के बाद आने वाले हैं। ऐसे में त्योहार को लेकर बाजार में भीड़-भाड़ बढ़ने की पूरी संभावना है। अगर लरपरवाहियां नहीं छोड़ी गईं तो संक्रमण और ज्यादा तेजी से फैल सकता है। अभी की ताज़ा स्थिति पर गौर करें तो बाज़ारों में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियों उड़ती दिखाई देती हैं। राजनीतिक सभाओं एवं संपर्कों के दौरान कोरोना गाईडलाईन अनके स्तरों पर तोड़ी गईं। बड़े रसूखदार व्यक्ति भी जिनसे समझदारी की उम्मींद की जाती है, वे भी मास्क लगाने में लापरवाही बरतते हैं। या तो मास्क लगाते ही नहीं हैं और यदि लगा लिया तो उसे ठोढ़ी या गले में फंसाए रखते हैं। मानो कोरोना वायरस का संक्रमण नाक से नहीं गले या ठोढ़ी से प्रवेश करेगा। ऐसी ही चूक का परिणाम है कि आज प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। जाहिर है कि इस महामारी का संबंध किसी विशेष जाति, धर्म, संप्रदाय राजनीतिक दल या व्यक्ति से नहीं है। इसके लिए हर इंसान टारगेट है। एक कुली भी इसका शिकार बन सकता है और मुंबई के सबसे पाॅश इलाके में रहने वाले अमिताभ बच्चन भी इसकी ग़िरफ़्त में आ सकते हैं। अब जबकि अनलाॅेक-3 के बारे में कयास लगाया जा रहा है कि इसमें और अधिक छूटे मिलेंगी तो और अधिक सतर्कता जरूरी हो जाती है।
Dr (Miss) Sharad Singh article in Dainik Jagaran

        पिछले दिनों भावी उपचुनावों को लेकर हुई सभाओं में कोरोना गाईड लाईन को ताक में रख दिया गया था। बाज़ारों में फिजिकल डिस्टेंसिंग को तो लगभग भुला ही दिया गया। माॅर्निंगवाॅक और ईवनिंगवाॅक के दौरान बिना मास्क के घूमने वालों की कोई कमी नहीं है। ऐसे लोगों को भी डिस्टेंसिंग का ध्यान नहीं रहता है। बहरहाल, समाचारपत्रों एवं अन्य मीडिया द्वारा सभाओं में बरती गई लापरवाहियों पर कोई कड़ी कार्यवाही नहीं किए जाने का परिणाम यह हुआ है कि शैक्षणिक संस्थाओं में फिजिकल डिस्टेंसिंग को भुला कर कथित वेबिनार किए जा रहे हैं। जबकि वेबिनार का कंसेप्ट ही है कि वेब अथवा इंटरनेट द्वारा परस्पर चर्चा एवं संवाद। कुर्सी से कुर्सी जोड़ कर यदि पांच व्यक्ति बैठे हैं तो यह वेबिनार नहीं बल्कि संक्रमण को दावत देना ही कहलाएगा। अधिक उत्साह में आ कर व्याख्यान और सम्मान कार्यक्रम किया जाना भी ख़तरे को दावत देने के समान है। क्योंकि ऐसे आयोजन में शामिल होने वालों की कार्यक्रम-पूर्व कोरोना जांच की कोई चाक-चैबंद व्यवस्था तो होगी नहीं, लिहाज़ा इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती है कि आयोजन में उपस्थित सभी व्यक्ति ‘‘कोरोना मुक्त’’ हैं। सागर जिला प्रशासन एक बार ऐसी चूक कर चुका है जब प्रशासन ने एक मुनिश्री को अन्यत्र जाने की अनुमति दी और साथ ही भीड़ जुड़ने का अनुमान नहीं लगा सका। उस चूक से सीख लिया जाना चाहिए था। अनलाॅक-1 और अनलाॅक-2 में मिली छूटों में आमजन भी लापरवाही बरतने में पीछे नहीं रहे हैं, नतीज़ा यह कि हर शहर में कोरोना के नए संक्रमितों की संख्या आए दिन पंद्रह से बीस के बीच बरामद होती है। यदि आंकड़ों पर ध्यान दें तो केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 घंटे में 47,704 नए मामले सामने आए हैं और 654 लोगों की मौत हुई है। इसके बाद देशभर में कोरोना पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 14,83,157 हो गई है। जिनमें से 4,96,988 सक्रिय मामले हैं, 9,52,744 लोग ठीक हो चुके हैं या उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है और अब तक 33,425 लोगों की मौत हो चुकी है। दुनिया भर में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूची में भारत तीसरे स्थान पर आ गया है।
अनलॉक-3 के साथ जहां लोगों के लिए सुविधाओं में बढ़ोतरी होगी वहीं कोरोना के प्रसार को लेकर डर भी बना हुआ है। अनलॉक-3 के लिए जनता में भी उत्सुकता है। लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि सरकार किन-किन चीजों में ढील देने वाली है।  25 से 50 फीसदी दर्शकों के साथ खुल सकते हैं मल्टीप्लेक् अनलॉक-3 में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ सिनेमा हॉल को खोलने पर विचार किया जा रहा है। सिनेमा हॉल खोलने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर से गृह मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा जा चुका है। सिनेमाघर मालिकों और सूचना प्रसारण मंत्रालय की बैठक में मंत्रालय ने सिनेमाघरों के मालिकों के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह 25 से 50 फीसदी दर्शकों के साथ मल्टीप्लेक्स, सिंगल विंडो सिनेमाघर खोल सकते हैं। इस पर सवाल उठता है कि क्या सिनेमाघर संचालक इतने कम दर्शकों यानी इतने बड़े घाटे के साथ अपना सिनेमाघर चला सकेंगे? यदि किसी तरह चला भी लें तो क्या वे कोरोना गाईडलाईन के नियमों का पालन करा सकेंगे? एक ही हाॅल में बैठे दर्शकों की सांसों से फैल सकने वाले संक्रमण को वे कैसे नियंत्रित रख सकेंगे? क्या नियमों के पालन में वे निरंतर सख़्ती और सजगता बनाए रख सकेंगे? क्या यह वहीं सिगरेट या शराब वाला उदाहरण होगा कि ‘‘स्वास्थ्य के लिए हानिकारक’’ की सूचना छाप पर उपभोक्ताओं के विवेक पर छोड़ दिया जाएगा कि उन्हें मनोरंजन प्यारा है अथवा अपना जीवन? शराब की दूकाने खोलने की अनुमति के बाद उन दूकानों पर नियमों की धज्जियां उड़ाती भीड़ की अनके तस्वीरें आंखों के सामने से गुज़री हैं। ऐसे में बड़ी चुनौती होगी सिनेमाघरों को खोलना। हमारे देश में नियम और सूचनाओं का क्या हश्र होता है वह तो अनलाॅक-2 के दौरान खुले बाज़ारों और चुनावी सभाओं में देखा ही है। बस, ट्रेन, हवाई जहाज को सर्शत छूट दिए जाने पर भी स्कूलों को बंद रखा गया है जो कि एक उचित निर्णय है। अनलाॅक-3 में भी स्कूल्स बंद रखे जाने की संभावना है।
अनलॉक-2 के बाद मध्य प्रदेश में कोरोना बेकाबू हो गया। जो स्थिति लाॅकडाउन के समय थी, उसके विपरीत अनलाॅक में स्थिति बिगडती ही गई है। आगामी त्योहारों के सीज़न को ध्यान में रख कर यह गाईडलाईन दोहराई गई है कि धार्मिक स्थलों, उपासना स्थलों पर एक बार में 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं होंगे। घर पर ही आगामी त्यौहार मनाना होगा। देव प्रतिमा घर पर ही स्थापित कर पूजा-अर्चना करना होगा। सार्वजनिक स्थलों पर प्रतिमा स्थापित करने, त्योहार मनाने की अनुमति नहीं होग। जुर्माने के प्रावधान के साथ इन नियमों का पालन कराया जाएगा। अनलाॅक-3 में छूटे बढ़ाई जानी सामान्य जीवन को व्यवस्थित करने के लिए महत्वपूर्ण होंगी लेकिन उतनी भी ख़तरनाक भी। इसलिए एक अगस्त से संभावित अनलाॅक-3 में लापरवाहियां छोड़ कर सतर्कता को अपनाना होगा वरना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों को देखते हुए भारी पड़ेंगी लापरवाहियां।       
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(दैनिक जागरण में 30.07.2020 को प्रकाशित)

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Thursday, July 23, 2020

एकरूपता हो नियमों के पालन में - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
"संक्रमितों के नामों को प्रकाशित न किए जाने का नियम सेलीब्रटीज़ पर लागू क्यों नहीं किया जाता " ... आज #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ...
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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विशेष लेख:
एकरूपता हो नियमों के पालन में
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
          कोरोना गाईड लाईन के अनुसार कोरोना संक्रमित व्यक्ति का नाम मीडिया पर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। संक्रमित व्यक्तियों के सिर्फ क्षेत्र की सूचना दी जाती है। 'पी1', 'पी2' के छद्म नाम के साथ। ऐसे कई मामले प्रकाश में आते रहे हैं जिनमें अज्ञानतावश संक्रमितों के संपर्क में आ कर अन्य कई लोग संक्रमित हुए हैं। बेशक यह तर्क माना जा सकता है कि संक्रमितों को किसी भी तरह की अवहेलना से बचाने के लिए उनके नामों की गोपनीयता रखी जाती है। तो फिर संक्रमितों के नामों को प्रकाशित न किए जाने का नियम सेलीब्रटीज़ पर लागू क्यों नहीं किया जाता है? चाहे वे राजनीति के ख्यातिलब्ध नाम हों अथवा फिल्मी दुनिया के। आम जनता और सेलेब्स के लिए एक ही नियम का दो तरह से पालन?
Dr (Miss) Sharad Singh article in Dainik Jagaran
    यहां सवाल व्यक्ति के पद-प्रतिष्ठा का नहीं है, सवाल है नियमों के एक समान पालन का। कहा तो यही जाता है कि नियम सबके लिए बराबर होते हैं। तो फिर इस मुद्दे पर समानता दिखाई क्यों नहीं देती है? उल्लेखनीय है कि मई के अंतिम सप्ताह में भाजपा के कद्दावर नेता और बेबाक प्रवक्ता संबित महापात्रा को कोरोना के लक्षण दिखाई देने पर गुरुगांव के मेदांता अस्पताल में भर्ती करवाया गया थ। संबित महापात्रा के ट्विटर पर 4.4 मिलियन फालोअर्स हैं और न्यूज चैनल की डिबेट में वो भाजपा की ओर से विपक्षी दलों को करारा जबाव देने के लिए जाने जाते हैं। वे एक सेलेब्स की भांति हैं और उनके कोरोना संक्रमित होने का समाचार सुर्खियां बटोरता रहा। इसके बाद बाॅलीबुड के शाहनशाह एवं सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के संक्रमित होने की ख़बर ने तहलका मचा दिया। बच्चन परिवार के 54 कर्मचारी क्वारंटीन में रखे गए। पहले जहां अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने की खबर सामने आई तो उसके बाद अभिषेक भी पॉजिटिव निकले। वहीं बाद में ऐश्वर्या राय बच्चन और आराध्या के भी संक्रमित होने की खबर मिली। अमिताभ बच्चन के फैंस शहंशाह के साथ ही अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन और आराध्या के लिए भी प्रार्थना कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई ऐसे पोस्ट देखने को मिल रहे हैं, जहां पर फैंस बच्चन परिवार के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। स्वाभाविक है। कोई भी व्यक्ति अपने प्रिय लगने वाले व्यक्ति को कोरोना जैसे संकट में फंसा हुआ नहीं देखना चाहता है तथा उसके शीघ्र स्वस्थ होने के लिए दुआएं करने लगता है। लेकिन यदि अमिताभ बच्चन सदी के महानायक नहीं होते और एक आमजन होते तो क्या उनका अथवा उनके परिवार के सदस्यों का नाम प्रकाशित किया जाता? 

इसी तरह आगामी उपचुनावों के परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें तो अनलॉक 2 के बाद मध्य प्रदेश में कोरोना बेकाबू हो गया है। इसका संक्रमण लगातार बढ़ रहा है, प्रदेश स्तर पर 31 जुलाई तक हर रविवार लॉकडाउन करने के निर्णय के बाद अब स्थानीय प्रशासन भी शहरों और जिलों को फिर लॉकडाउन करने की तरफ बढ़ रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने कहा है कि प्रदेश में कोरोना संक्रमण रोकने के लिए उत्सवों पर सार्वजनिक झाकियां नहीं लगाई जाएंगी। धार्मिक स्थलों, उपासना स्थलों पर एक बार में 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं होंगे। शादी, सगाई आदि में दोनों पक्षों के 10-10 व्यक्ति से अधिक सम्मिलित नहीं होंगे। जन्मदिन आदि उत्सवों में 10 से अधिक व्यक्ति शामिल नहीं होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा है कि कोरोना संक्रमण रोकने के लिए घर पर ही आगामी त्यौहार मनाएं। देव प्रतिमा घर पर ही स्थापित कर पूजा-अर्चना करें। सार्वजनिक स्थलों पर प्रतिमा स्थापित करने, त्योहार मनाने की अनुमति नहीं होगी। ऐसी दशा में आगामी उपचुनाव की चुनावी सभाओं का क्या होगा?

एक ओर कोविड संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए मप्र फिर लॉकडाउन की तरफ बढ़ रहा है। राज्य में रविवार को पूरी तरह लॉकडाउन लागू करने के बाद अब एक दिन और गतिविधियां प्रतिबंधित की जा रही हैं। यह दिन रविवार के पहले शनिवार या बाद के सोमवार को होगा। भोपाल में शनिवार और रविवार को लॉकडाउन रहेगा। इस दौरान अत्यावश्यक सेवाओं को ही मंजूरी रहेगी। इसके अलावा सभी जिलों में कर्फ्यू रात 8 बजे से सुबह 5 बजे तक रहेगा। राज्य सरकार ने सख्ती दिखाते हुए यह भी साफ कर दिया है कि यदि किसी निजी दफ्तर या व्यापारिक संस्थान में कोई कोरोना पॉजिटिव मिला तो उसे सात दिन के लिए बंद कर दिया जाएगा। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि संक्रमण मुक्त जिलों को छोड़कर बाकी जिलों में राज्य और केंद्र सरकार के सभी दफ्तरों में अधिकारियों व कर्मचारियों की संख्या 30 से 50 फीसदी ही रहेगी। अधिकारी शत-प्रतिशत आएंगे। निजी कार्यालय एवं व्यापारिक प्रतिष्ठान भी 30 से 50 प्रतिशत क्षमता में संचालित होंगे। निजी दफ्तर तथा व्यापारिक संस्थानों में कोई कोरोना पॉजीटिव मिलने पर उसे 7 दिन के लिए बंद कर दिया जाएगा।  
फिलहाल इस बात के आसार नजर नहीं आ रहे हैं कि सितंबर अंत तक स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में आ जाएगी। चुनाव आयोग ने पोलिंग बूथ पर सोशल डिस्टेंसिंग के लिए खाका तैयार किया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव प्रचार में कोरोना गाइडलाइन के पालन की जिम्मेदारी कौन लेगा? सरकार ने सभी प्रकार के सामूहिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। तो क्या किसी भी प्रकार की चुनावी सभा इसी प्रतिबंध के दायरे में आएगी? पहले ही ऐसे मामले प्रकाश में आ चुके हैं जब संभावित उम्मींदवारों के समर्थक जनसभा में शामिल हुए और उन्होंने न तो सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा और न मास्क लगाने का। जब से चुनाव के निकट आने की संभावना बढ़ी तभी से कोरोना से बचाव के नियमों की धज्जियां उड़ाने वाली अनेक तस्वीरें समाचारपत्रों के मुखपृष्ठों पर अपनी जगह बना चुकी हैं। इस स्थिति में कोरोना गाइडलाइन का पालन सुचारु रूप से कैसे हो पाएगा, यह सबसे बड़ी चिंता का प्रश्न है। इसी परिप्रेक्ष्य में नियमों के समान रूप से पालन किया और कराया जाना प्राथमिक जरूरत है ताकि आमजन सजग और सतर्क रह कर कोरोना से अपनी रक्षा कर सके। 
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(दैनिक जागरण में 23.07.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, July 16, 2020

बुंदेलखण्ड में अभी भी उपेक्षित हैं महिला मुद्दे - . (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
बुंदेलखण्ड में अभी भी उपेक्षित हैं महिला मुद्दे - डॉ.(सुश्री) #शरद_सिंह
आज #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ...
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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विशेष लेख : बुंदेलखण्ड में अभी भी उपेक्षित हैं महिला मुद्दे 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      दशकों से लम्बित पड़े हैं बुंदेलखंड के अनेक महिला-मुद्दे। जब भी कोई चुनाव करीब आता है तो आशा बंधती है कि इस बार महिलाओं की समस्याओं पर समुचित ध्यान दिया जाएगा। इस बार के उपचुनाव में भी यह कयास लगाया जा रहा है कि क्षेत्र की महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, रोजगार एवं अन्य बुनियादी मुद्दों पर ध्यान दिया जाएगा। यह बात अलग है कि इन दिनों स्वयु राजनीति में महिलाएं लड़-झगड़ कर अपने अधिकार हासिल कर पा रही हैं। बुंदेलखंड की राजनीति में महिलाओं का प्रतिशत यूं भी पुरुषों की तुलना में कम ही रहा है लेकिन विभिन्न स्तरों पर पैदा होने वाले राजनीतिक समीकरण उन गिनती की राजनीतिक महिलाओं को भी दूसरी पंक्ति में धकेलने लगते हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्र में तथा निचली बस्तियों की महिलाएं खुले में शौच के लिए जाती हैं, आज भी बालविवाह की शिकार हैं, आज भी महिलाएं-बच्चिएं मानवतस्करी की गिरफ़्त में और महिलाओं के साथ घटित होने वाले अपराध भी कम नहीं हुए हैं खहे मामला दहेज का हो, बलात्कार का हो अथवा घरेलू हिंसा का हो।
  • Dr (Miss) Sharad Singh
इसमें कोई संदेह नहीं है कि बुंदेलखण्ड ने अपनी स्वतंत्रता एवं अस्मिता के लिए लम्बा संघर्ष किया है और इस संघर्ष के बदले बहुत कुछ खोया है। जब कोई क्षेत्र विकास की दृष्टि से पिछड़ा रह जाता है तो उसका सबसे बुरा असर पड़ता है वहां की स्त्रियों के जीवन पर। अतातायी आक्रमणकारी आए तो स्त्रियों को पर्दे और सती होने का रास्ता पकड़ा दिया गया। उसे घर की दीवारों के भीतर सुरक्षा के नाम पर कैद रखते हुए शिक्षा से वंचित कर दिया गया। यह बुंदेलखण्ड की स्त्रियों के जीवन का सच है। मानो अशिक्षा का अभिशाप पर्याप्त नहीं था जो उसके साथ दहेज की विपदा भी जोड़ दी गई। नतीजा यह हुआ कि बेटी के जन्म को ही पारिवारिक कष्ट का कारण माना जाने लगा। जब बेटियां ही नहीं होंगी तो बेटों के लिए बहुएं कहां से आएंगी? अन्य प्रदेशों की भांति बुंदेलखण्ड में भी ओडीसा तथा आदिवासी अंचलों से अनेक लड़कियां  को विवाह करके लाया जाता हैं। यह विवाह सामान्य विवाह नहीं है। ये अत्यंत गरीब घर की लड़कियां होती हैं जिनके घर में दो-दो, तीन-तीन दिन चूल्हा नहीं जलता है, ये उन घरों की लड़कियां हैं जिनके मां-बाप के पास इतनी सामर्थ नहीं है कि वे अपनी बेटी का विवाह कर सकें, ये उन परिवारों की लड़कियां हैं जहां उनके परिवारजन उनसे न केवल छुटकारा पाना चाहते हैं वरन् छुटकारा पाने के साथ ही आर्थिक लाभ कमाना चाहते हैं। ये गरीब लड़कियां कहीं संतान प्राप्ति के उद्देश्य से लाई जा रही हैं तो कहीं मुफ्त की नौकरानी पाने की लालच में खरीदी जा रही हैं। इनके खरीददारों पर उंगली उठाना कठिन है क्योंकि वे इन लड़कियों को ब्याह कर ला रहे हैं। इस मसले पर चर्चा करने पर अकसर यही सुनने को मिलता है कि क्षेत्र में पुरुष और स्त्रियों का अनुपात बिगड़ गया है। लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों की कमी हो गई है।  
बुंदेलखण्ड में  पिछले दशकों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का अनुपात तेजी से घटा और इसके लिए कम से कम सरकारें तो कदापि जिम्मेदार नहीं हैं। यदि कोई जिम्मेदार है तो वह परम्परागत सोच कि बेटे से वंश चलता है या फिर बेटी पैदा होगी तो उसके लिए दहेज जुटाना पड़ेगा। बुंदेलखण्ड में औरतों को आज भी पूरी तरह से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। गांव और शहरी क्षेत्र, दोनों स्थानों में आर्थिक रूप से निम्न तथा निम्न मध्यम वर्ग के अनेक परिवार ऐसे हैं जिनके घर की स्त्रियां आज भी तीज-त्यौहारों पर ही घर से बाहर निकलती हैं और वह भी घूंघट अथवा सिर पर साड़ी का पल्ला ओढ़ कर। जिन तबकों में शिक्षा का प्रसार न्यूनतम है, ऐसे लगभग प्रत्येक परिवार की एक ही कथा है कि आमदनी कम और खाने वाले अधिक। आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को शिक्षा के बदले काम में लगा देना इस प्रकार के अधिकांश व्यक्ति अकुशल श्रमिक के रूप में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। ठीक यही स्थिति इस प्रकार के समुदाय की औरतों की रहती है। ऐसे परिवारों की बालिकाएं अपने छोटे भाई-बहनों को सम्हालने और अर्थोपार्जन के छोटे-मोटे तरीकों में गुजार देती हैं। इन्हें शिक्षित किए जाने के संबंध में इनके माता-पिता में रुझान रहता ही नहीं है। ‘लड़की को पढ़ा कर क्या करना है?’ जैसा विचार इस निम्न आर्थिक वर्ग पर भी प्रभावी रहता है। हाल ही में अनेक ऐसे मामले पकड़े गए जिनमें नाबालिग लड़कियों का विवाह किया जा रहा था। समय रहते पुलिस और अधिकारियों द्वारा हस्तक्षेप कर इन विवाहों को रोका गया। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत में भी बालविवाह की घटनाएं सबूत है इस बात का कि बुंदेलखंड में महिलाओं की दशा अभी भी सुधरी नहीं है।

विगत वर्ष किए गए एक सर्वे के अनुसार प्रति हजार लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या पन्ना में 507, टीकमगढ़ में 901, छतरपुर में 584, दमोह में 913 तथा सागर में 896 पाया गया। यह आंकड़े न केवल चिंताजनक हैं अपितु इस बात का भी खुलासा करते हैं कि बुंदेलखंड अंचल में ओडीसा से लड़कियां ब्याह कर क्यों लाई जा रही हैं। दरअसल, जब परिवार की स्त्री पढ़ी-लिखी होगी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होगी तो वह अपने बच्चों के उचित विकास के द्वारा आने वाली पीढ़ी को एक विकसित दृष्टिकोण दे सकेगी। इसी विचार के साथ ‘बेटी बचाओ’ और ‘बालिका शिक्षा’, ‘जननी सुरक्षा’ जैसे सरकारी अभियान चलाए जा रहे हैं। फिर भी बुंदेलखंड में स्त्रियों के विकास की गति धीमी है। बुंदेलखण्ड का वास्तविक विकास तभी हो सकता है जब बेटियों के अस्तित्व को बचाया जाए और उन्हें एक गरिमापूर्ण सुरक्षित वातावरण प्रदान किया जाए। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को स्त्री-सुरक्षा एवं महिला रोजगार को अपने ऐजेंडा में प्रमुखता से जोड़ना होगा और चुनाव के बाद उन पर ईमानदारी से अमल भी करना होगा। तभी इस क्षेत्र की महिलाओं की समस्याएं दूर हो सकेंगी।
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(दैनिक जागरण में 16.07.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, July 9, 2020

अब तो विकास होना चाहिए जब सितारा बुलंदी पर हो - डॉ.(सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh

अब तो विकास होना चाहिए जब सितारा बुलंदी पर हो - डॉ.(सुश्री) #शरद_सिंह

आज #दैनिक_जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ...

हार्दिक आभार "दैनिक जागरण" 🙏
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विशेष लेख :

अब तो विकास होना चाहिए जब सितारा बुलंदी पर हो 
- डॉ.(सुश्री) शरद सिंह

बुंदेलखंड के सितारे इन दिनों बुंलंदी पर हैं। शिवराज सरकार के मंत्रिमण्डल के नए विस्तार में पहली बार तीन नेताओं को एक साथ मंत्रीमंडल में स्थान दिया गया है। बुन्देलखण्ड अंचल से अब कुल चार मंत्री हो गए जिनमे भूपेंद्र सिंह, गोविंद सिंह राजपूत, बृजेन्द्र प्रताप सिंह एवं पं. गोपाल भार्गव शामिल है। एक साथ तीन नेताओं को मंत्रीपद मिलना बुंदेलखंड के विकास के लिए शुभसंकेत माना जा सकता है। बशर्ते ये तीनों-चारों मंत्री अपने विधान सभा क्षेत्रों के अलावा समूचे बुंदेलखंड के विकास पर मिल कर महत्वपूर्ण कदम उठाएं।

Dainik Jagaran, Article of Dr (Miss) Sharad Singh, 09.07.2020

इनमें से विधायक गोपाल भार्गव बुंदेलखंड के ही नहीं वरन् एमपी विधानसभा के सबसे सीनियर नेता हैं और अब वरिष्ठ  मंत्री भी बन गए हैं। पंडित भार्गव को प्रदेश राजनीति का एक लम्बा अनुभव है। वे उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह के चैथे मंत्रिमण्डल तक में शामिल रहने वाले भार्गव सागर जिले की गढाकोटा विधानसभा क्षेत्र से लगातार आठवीं दफा चुनाव जीत चुके हैं जो कि अपने आप में एक रिकाॅर्ड है। पूर्व गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह को दूसरी दफा मंत्री बनने का मौका मिला है। सीएम शिवराज सिंह के सबसे करीबियों में से एक भूपेंद्र सिंह छह बार चुनाव लड़े है। चार बार जीते है। वे एक कद्दावर नेता के रूप में प्रदेश राजनीति में अपनी साख स्थापित कर चुके हैं। ब्रजेन्द्र प्रताप सिंह पन्ना से चुनाव से चुनाव जीत कर आए हैं और एक कर्मठ नेता के रूप में उनकी छवि है। कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल होने वाले सुरखी विधान सभा क्षेत्र के चिरपरिचित नेता गोविंद सिंह राजपूत को मंत्रीमंडल में शामिल किए जाने से उनका वह पक्ष मजबूत हो गया है जिसमें यह माना जा रहा था कि भाजपा खेमें के कुछ लोग उनसे नाखुश हैं। यद्यपि अभी गोविंद सिंह राजपूत को उपचुनाव का सामना करना है लेकिन मंत्रीपद मिल जाने से उनकी साख में जो वृद्धि हुई है वह चुनाव परिणाम उनकी झोली में आसानी से डाल सकती है। यूं भी गोविंद सिंह राजपूत की अपने सुरखी विधान सभा क्षेत्र में अच्छी पकड़ है और वे इलेक्ट्राॅनि माध्यमों द्वारा भी अपने क्षेत्र की जनता से संपर्क बनाए रखते हैं।
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई मंत्रीमंडल बनता है अथवा मंत्रीमंडल का विस्तार किया जाता है तो कहीं खुशी, कहीं ग़म का माहौल बन ही जाता है। मध्यप्रदेश विधान में बुंदेलखंड के तीन नेताओं को एक साथ मंत्रीपद मिलने से जहां खुशी की लहर दौड़ गई वहीं नाराज़गी भी उभर कर सामने आई। सागर नगर विधान सभा क्षेत्र के विधायक जो भाजपा को लगातार विजयी बनाते आ रहे हैं, मंत्रीमंडल के इस विस्तार में वंचित रह गए। जिससे उनके समर्थकों में निराशा की लहर दौड़ गई। निराश समर्थकों ने विधायक शेलेन्द्र जैन को मंत्री बनाने की मांग को ले कर ने जल सत्याग्रह करके विरोध जताया। मगर एक कुशल राजनीतिज्ञ की भांति विधायक शैलेन्द्र जैन ने अपने समर्थकों के विरोध को शांत करने के लिए बाकायदा एक सार्वजनिक अपील की। उल्लेखनीय है कि पिछली विधान सभा चुनावों के पूर्व टिकटों की घोषणा नहीं होने पर भी शैलेन्द्र जैन जनसंपर्क में जुटे रहे थे जबकि उस समय यह सुनिश्चित नहीं था कि टिकट उन्हें मिलेगा भी या नहीं। उनकी यही खूबी उन्हें एक लोकप्रिय नेता बनाती है और इसका दूसरा पक्ष यह भी कि ऐसे समर्पित नेता को मंत्रीमंडल में लिए जाने का कयास जोर पर था।
नरयावली विधान सभा के विधायक प्रदीप लारिया भी मंत्रीपद से वंचित रह गए। लेकिन उन्होंने भी अनुशासन का परिचय दिया। अर्थात् जब माहौल शांत हो और मिलजुल कर काम करने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही हो तो यह आशा की जा सकती है कि अब समूचे बुंदेलखंड नहीं तो कम से कम सागर संभाग के पांचों जिलों बुनियादी समस्याएं दूर हो सकेंगी। बुंदेलखंड के अनेक अंचल ऐसे हैं जो आज भी रेल सुविधा की बाट जोह रहे हैं। जिन्हें रेल मार्ग मिल गया है उन्हें गिनती की रेलें मिली हैं।

शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, परिवहन और स्वच्छता में पिछड़े हुए इन पांचों जिलों को विकास करने का समुचित अवसर मिल सकेगा। रोजगार के संदर्भ में युवाओं द्वारा कई बार मांग उठाई जा चुकी है कि बुंदेलखंड में आईटी सेक्टर की स्थापना की जाए ताकि युवाओं को अच्छे रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में न भटकना पड़े। किन्तु बात वहीं आवागमन के साधनों की कमी पर आ कर अटकती है। कोई भी मल्टीनेशनल कंपनी आईटी सेक्टर मंे तभी निवेश करने का मन बनाएगी जब विदेशों से आने वाले उनके प्रतिनिधियों को आवागमन की बेहतर सुविधाएं सुलभ होंगी। समूचे बुंदेलखंड में एकमात्र खजुराहो ही ऐसा हवाई अड्डा है जहां से यात्री उड़ाने भरी जाती हैं किन्तु वह भी गिनती की हैं और वहां से सभी महत्वपूर्ण शहरों के लिए उड़ानों की कमी है। इस स्थिति में जरूरी हो जाता है कि ऐसे हवाई अड्डे स्थापित किए जाएं जहां सस्ती उड़ान सेवाएं सुलभ हो सकें और बुंदेलखंड के निवासी देश के अन्य क्षेत्रों से हवाई मार्ग द्वारा जुड़ सकें। बुंदेलखंड में चिकित्सा साधनों की भी कमी यथावत बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्र एवं गरीब तबका आज भी नीम हकीमों के हाथों अपनी जान का खतरा उठाता रहता है। विकास की दर कछुआ चाल से ही चलती रही है। इस प्रकार की अनेक छोटी-बड़ी समस्याएं हैं जो क्षेत्र के विकास में बाधा बनती रहती हैं। इन बाधाओं को दूर करने का सुनहरा अवसर आ गया है जब क्षेत्र के चारों मंत्री मिल कर संभाग का नया उज्ज्वल भविष्य लिख सकते हैं।

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(दैनिक जागरण में 09.07.2020 को प्रकाशित)
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Thursday, July 2, 2020

कम क्यों हैं बुंदेलखंड में महिला पत्रकार- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह , दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh

कम क्यों हैं बुंदेलखंड में महिला पत्रकार - डॉ.(सुश्री) शरद सिंह
आज दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख 
हार्दिक आभार दैनिक जागरण🙏

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 कम क्यों हैं बुंदेलखंड में महिला पत्रकार
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
                     
बुंदेलखंड की महिलाओं से संबंधित पिछले दिनों प्रकाशित मेरे एक विशेष लेख को जब मैंने अपनी फेसबुक वाॅल पर शेयर किया तो उस पर सुरखी की पूर्व विधायक पारुल साहू की टिप्पणी मुझे झकझोर गई। उन्होंने लिखा था कि ‘‘रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी जीरो है एक भी महिला विधानसभा या लोकसभा में बुंदेलखंड से नहीं है।’’ यह पढ़ कर मुझे लगा कि सिर्फ़ राजनीति नहीं पत्रकारिता में भी लगभग यही दशा है। बुंदेलखंड के मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में फैले लम्बे-चौड़े भू-भाग में पुरुष पत्रकार तो अनेक हैं किन्तु महिला पत्रकारों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। इस तारतम्य में मुझे वह समय याद आता है जब स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद ही मैंने पन्ना जैसे छोटे से जिले में पत्रकारिता में कदम रखा था। उस समय पन्ना में ही एक और महिला पत्रकार हुआ करती थीं प्रभावती शर्मा उनके पति एक टेबलाईड अखबार प्रकाशित किया करते थे। उन दिनों प्रिंट मीडिया में एक उत्साहजनक वातावरण था। उस दौर में जबलपुर से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र दैनिक ‘नवीनदुनिया’ में ‘जोगलिखी’ काॅलम में पन्ना की समस्याओं पर मेरी रिपोर्ट्स प्रकाशित हुआ करती थीं। वहीं से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘ज्ञानयुग प्रभात’ में मैंने विशेष संवाददाता का कार्य किया। ‘जनसत्ता’ एवं ‘पांचजन्य’ के लिए रिपोर्टिंग की। उन दिनों पन्ना में बहुचर्चित ‘भदैंया कांड’ हुआ था जिसमें भदैंया नामक ग्रामीण की कुछ दबंगों ने आंखें छीन ली थीं। इस लोमहर्षक कांड पर मेरी कव्हरेज को ‘जनसत्ता’ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। पन्ना की खुली जेल में रह रहे दस्यु पूजा बब्बा से मैंने साक्षात्कार लिया था। डकैत चाली राजा के आत्मसमर्पण तथा कुछ डकैतों के इन्काउंटर पर भी मैंने रिपोर्टिंग की थी। आज मैं पीछे मुड़ कर देखती हूं तो तब से अब तक समूचे बुंदेलखंड में जमीनी पत्रकारिता से जुड़ी सक्रिय महिला पत्रकार गिनती की ही दिखाई देती हैं, उनमें भी अधिकांश स्थानीय समाचारपत्रों से ही संबद्ध हैं। 
Dainik Jagaran, Article of Dr (Miss) Sharad Singh, 02.07.2020
आज बुंदेलखंड  में ज़मीनी स्तर पर महिला पत्रकार औसतन उतनी संख्या में नहीं हैं जितनी कि महानगरों में हैं। जबकि उन महानगरीय पत्रकारों में अनेक महिलाओं ने बुंदेलखंड में ही पत्रकारिता की शिक्षा पाई है। सागर की प्रिंट पत्रकारिता जगत में यदि नाम लिया जाए तो दो महिला पत्रकार सक्रिय दिखाई देती हैं- वंदना तोमर और रेशू जैन। ये दोनों महिलाएं अपने-अपने दायित्वों में लगन से कार्य करती रहती हैं। दोनों का दायरा परस्पर अलग-अलग है किंतु कर्मठता लगभग एक-सी है। बात की जाए यदि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की तो वहां कुछ समय पूर्व एक धमाका हुआ था जब ‘खबर लहरिया’ नाम का अखबार प्रकाशित होना शुरू हुआ। आकलनकर्ताओं ने इसे ‘वैकल्पिक मीडिया’ कहा। ‘खबर लहरिया’ ग्रामीण मीडिया नेटवर्क में अपनी पहचान बनाने में सफल रहा क्योंकि कई जिलों में इसके लिए सिर्फ़ महिला रिपोटर्स रखी गईं।  
इस अख़बार से पत्रकार के रूप में महिलाओं का जुड़ाव होने पर भी जो पुरुष-मानसिकता सामने आई वह चौंकाने वाली थी क्योंकि इन महिला पत्रकारों को अनजान नंबरों से लगातार अश्लील संदेश और धमकियां मिलने लगीं। इस तथ्य का पता चलने पर मुझे लगा कि जिन दिनों मैं जमीनी पत्रकारिता से जुड़ी हुई थी, उन दिनों बुंदेलखंड के लिए महिला पत्रकारिता अपवाद का विषय होते हुए भी सकारात्मक माहौल लिए हुए था। प्रशासन से ले कर समस्याग्रस्त क्षेत्र तक सम्मान और सहयोग मिलता था। या फिर मध्यप्रदेशीय बुंदेलखंड में आज भी वह माहौल है जहां महिला पत्रकारों को इस प्रकार की ओछी बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता है। वैसे यहां प्रश्न क्षेत्र का नहीं मानसिकता का है क्योंकि उत्तरप्रदेशीय बुंदेलखंड में ही एक ऐसी महिला पत्रकार हुईं जिन्होंने अपने पति की बात को झुठलाते हुए दबंग पत्रकारिता की और जेल भी गईं। बांदा की पहली महिला पत्रकार के रूप में विख्यात मधुबाला श्रीवास्तव एक दबंग व्यक्तित्व की महिला रहीं। वे अपने संस्मरण सुनाती थीं कि एक बार जब वे मंदिर गईं तो वहां यह चर्चा आई कि शहर में कोई महिला पत्रकार नहीं है। यह बात उनके पति ने इस भाव से कही थी कि गोया महिलाएं पत्रकारिता कर ही नहीं सकती हैं। तब वे आगे आ कर बोलीं कि ‘‘हम हैं महिला पत्रकार।’’ इस तरह उन्होंने पत्रकारिता जगत में कदम रखा। एक बार उन्होंने अपने पत्रकार पति के विरुद्ध भी भाषण दिया था। मधुबाला श्रीवास्तव ने ‘अमर नवीन’, ‘क्रांति कृष्णा’ तथा ‘पायोनियर’ के लिए भी पत्रकारिता की। मीसा एक्ट के तहत उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। किंतु उन्हें भी अश्लील संदेशों अथवा ऊटपटांग धमकियों का सामना नहीं करना पड़ा था। 

इसका अर्थ यही है कि बुंदेलखंड को जहां आज समय के साथ चलते हुए जमीनी पत्रकारिता में महिलाओं की बहुसंख्या दिखनी चाहिए थी वहां अल्पसंख्यक स्थिति है। लिहाज़ा उन कारणों का आकलन करना होगा जो बुंदेलखंड की पत्रकारिता में महिलाओं की संख्या को अल्प बनाए हुए है। उम्मींद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में जमीनी पत्रकारिता की ओर सुशिक्षित, प्रशिक्षित और दबंग महिला पत्रकारों की नई खेप कदम रखेगी।   
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(दैनिक जागरण में 02.07.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, June 17, 2020

विशेष लेख - एक सबक है सुशांत का जाना - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, दैनिक जागरण में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh


दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा यह लेख ... आप भी पढ़िए...

❗हार्दिक आभार "दैनिक जागरण"🙏

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विशेष लेख
एक सबक है सुशांत का जाना
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

विशेषरूप से युवावर्ग सुशांत के इस तरह जाने से सबक ले और इस बात को गांठ में बांध ले कि अपनों से दूर रह कर पैसा और प्रसिद्धि अकेलापन और अवसाद देती है मन का सुकून नहीं। चांद पर प्लाट खरीदने की क्षमता भी कभी-कभी ज़िन्दगी जीने की इच्छा को मार देती है।


वह व्यक्ति मज़दूर या कामगार नहीं था जिसे लाॅकडाउन में अपने रोजगार और घर से विस्थापित हो कर सैंकड़ों किलोमीटर का पैदल सफ़र करना पड़ा हो। अपने अभिनय के दम पर उसने इतना धन कमा लिया था कि जिससे वह चांद पर भी प्लाट खरीद सका। जी हां, #बाॅलीवुड #अभिनेता #सुशांत_सिंह_राजपूत। एक करोड़पति अभिनेता। इंडियन #क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह #धोनी के जीवन पर बनी फिल्म में उन्होंने लीड रोल निभाया था। सुशांत सिंह राजपूत एक फिल्म के लिए 5 से 7 करोड़ रुपये लेते थे। वहीं, विज्ञापन के लिए 1 करोड़ रुपये तक लेते थे। उन्होंने कई रीयल एस्टेट प्रॉपर्टीज में भी निवेश किया हुआ था। बताया जाता है कि उनकी कुल संपत्ति 80 लाख डॉलर यानी 60 करोड़ रुपये से भी अधिक थी। उनकी फिल्म ‘एमएस धोनी’ ने कुल 220 करोड़ रुपये की कमाई की थी। सुशांत सिंह राजपूत ने 34 वर्ष की छोटी-सी आयु में फिल्मों, विज्ञापनों और निवेश के जरिए करोड़ों कमाए। बॉलीवुड के दूसरे सेलेब्रिटीज की तरह सुशांत भी मुंबई के पॉश इलाके बांद्रा में आलीशान घर में रहते थे। उन्हें कारों और बाइक्स का भी काफी शौक था। इसलिए उनके पास कारों की पूरी फ्लीट थी।


सफलता सुशांत सिंह राजपूत के कदम चूम रही थी। उनकी हर फिल्म कमाई का नया रिकॉर्ड बना रही थी। ऐसे में उनकी फीस भी लगातार बढ़ती जा रही थी। कहीं कोई आर्थिक तंगी का मसला नहीं। असफलता का मसला भी नहीं। फिर भी इस युवा अभिनेता ने आत्महत्या जैसा #पलायनवादी कदम उठाया। आखिर क्यों? इस ‘क्यों’ का उत्तर सब ढूंढ रहे हैं। इस ‘क्यों’ का उत्तर शायद ही कभी मिले। लेकिन इस घटना से एक सबक ज़रूर मिला है कि पैसा और प्रसिद्धि भी वह सुख और शांति नहीं दे सकते हैं जो ज़िन्दगी से प्रेम करना सिखा सके।

Ek Sabak Hai Sushant Ka Jana - Dr (Miss) Sharad Singh, Dainik Jagaran, 16.06.2020
कुछ समय पहले सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर #दिशा_सलियन ने भी मुंबई में 12वीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली थी। बताया जा रहा था कि वह अपने मंगेतर संग मुंबई के मलाड में रहती थीं। घटना की जानकारी मिलते ही उन्हें बोरिवली के हॉस्पिटल ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। आत्महत्या के पीछे अभी कोई भी वजह सामने नहीं आई। इससे पहले ‘क्राइम पेट्रोल’ एक्ट्रेस #प्रेक्षा_मेहता ने भी पंखे से लटककर खुदकुशी की थी। बॉलीवुड इस समय मुश्किल दौर से गुजर रहा है। कई #सेलेब्स ने काम न मिलने के चलते खुदकुशी की है। सोचने की बात है कि काम न मिलने की स्थिति में विस्थापित प्रवासी मज़दूरों ने आत्महत्या करने के बजाए डट कर संकट का सामना किया लेकिन ये सेलेब्स #हताशा और #अवसाद से घिर गए। आखिर इसकी वज़ह क्या हो सकती है?


आज के #बाजारवाद और #भौतिकतावाद के युग में हम जिस तरह पैसे और प्रसिद्धि के जाल में तेजी से जकड़़ते जा रहे हैं, वह हमें अपने आप से ही दूर करता जा रहा है। जिसके पास #पैसा या #प्रसिद्धि नहीं है, वह यही सोचता है कि इन दोनों से दुनिया की सारी खुशियां खरीदी जा सकती हैं, पाई जा सकती हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि यह दोनों सबसे पहले अपनों से दूर करना शुरू कर देते हैं। इसके बाद खुद पर से भी ध्यान हटता जाता है क्योंकि लक्ष्य ‘‘स्वांतः सुखाय’’ आए नहीं बल्कि ‘‘दुनिया दिखाय’’ हो जाता है। प्रदर्शन का मोह हमें भला और बुरा सोचने का अवसर नहीं देता है। वहीं दूसरी ओर जब व्यक्ति इस प्रदर्शन के #मायाजाल में लिपटकर गलत-सही कर्मों में भेद करना भी छोड़ देते हैं, तब वे अनचाही परिस्थितियों के संजाल में उलझते जाते हैं। जहां से अवसाद की यात्रा शुरू होती है। अपने ही हाथों कमाया गया एकाकीपन व्यक्ति को वह अवसाद की ओर धकेलता जाता है। एक स्थिति वह आती है जब व्यक्ति आत्महत्या की ओर अपने क़दम बढ़ा देता है। अपने ही हाथों अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। यही तो किया बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने। सुशांत ने पंखे में लटक कर आत्महत्या कर ली। वे पिछले छः माह से अधिक समय से अवसाद दूर करने की दवा खा रहे थे।



वह मानसिक स्थिति जब इंसान सही और गलत में भेद नहीं कर पाता है और अपने भ्रम पर ही अटूट विश्वास करने लगता है, उसी स्थिति में वह आत्मघात जैसे कदम उठाता है। #मनोवैज्ञानिक इस स्थिति को #सीजोफ्रेनिया कहते हैं। यह भ्रम को सच मान लेने की चरम स्थिति है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सीजोफ्रेनिया का मनोरोग आत्मीयता और प्रेम पा कर ठीक होने लगता है। लेकिन यह आत्मीयता भौतिकतावाद की दौड़ में तेजी से गुम होती जा रही है। अगर अवसाद (डिप्रेशन) की स्थिति घेरने लगे तो अपनी समस्याएं बेझिझक अपनो से साझा करें और अपनो के निकट रहें। आखिर सुशांत सिंह राजपूत ने जो आत्मघाती कदम उठाया उससे उनके करोड़ों फैन्स तो आहत हुए ही, वे अपनी बहनों और पिता के सीने पर दुखों का पहाड़ छोड़ जाने के अपराधी हैं। इसीलिए जरूरी है कि किसी भी प्रकार का आत्मघाती विचार आते ही पहले अपने परिवार और मित्रों के बारे में सोचना चाहिए कि वे इस दुख को कैसे झेलेंगे। यही समय है कि विशेष रूप से युवावर्ग सुशांत के इस तरह जाने से सबक ले और इस बात को गांठ में बांध ले कि अपनों से दूर रह कर पैसा और प्रसिद्धि अकेलापन और अवसाद देती है मन का सुकून नहीं।
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(दैनिक जागरण में 16.06.2020 को प्रकाशित)
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