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Sunday, September 18, 2022

संस्मरण | भजियों-पकौड़ों का जादुई संसार | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 18.09. 2022
भजियों-पकौड़ों का जादुई संसार
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         अभी इसी वर्ष (2022 में) हिन्दी दिवस की बात है, मैं एक भावुकतापूर्ण समारोह से लौटी थी. उस समारोह को भावुकतापूर्ण इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसमें मैंने अपने दीदी डाॅ. वर्षा सिंह की स्मृति में युवा रचनाकारों के लिए एक सम्मान आरम्भ किया. लगभग सवा साल पहले कोरोना की दूसरी लहर में मैंने वर्षा दीदी को हमेशा के लिए खो दिया था. अब मैं युवा रचनाकारों में उनकी आकांक्षाओं एवं सपनों को फलता-फूलता और पूर्णता को प्राप्त होते हुए देखना चाहती हूं. अतः वह सम्मान समारोह मेरे लिए भावाकुल कर देने वाला साबित हुआ.


 बहरहाल, मैं बता रही थी कि मैं उस समारोह से लौट कर अपने घर के बाहरी दरवाजे का ताला खोलने ही जा रही थी कि काॅलोनी की ही एक भाभीजी ने मुझे आवाज दी. मैं ताला खोलती-खोलती रुक गई. भाभीजी मेरे पास आ कर कहने लगीं कि ‘‘कुछ मेहमान आ गए थे इसलिए मैं कार्यक्रम में नहीं आ सकी. प्लीज बुरा मत मानना!’’
‘‘नहीं, इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है. अब मेहमानों को क्या पता कि आपको कहीं जाना है.’’ मैंने उन्हें तसल्ली दी. मेरी बात सुन कर वे उत्साहित हो उठीं और बोलीं,‘‘मेरे घर चलो, मैंने भजिए-पकौड़े बनाए हैं.’’ मैंने उन्हें छेड़ने के लिए चुटकी ली,‘‘मेहमानों के बचे हुए भजिए हैं क्या?’’ मेरी बात सुन कर वे चिंहुक पड़ीं,‘‘मारूंगी! फालतू बात मत करो! मैंने भी कहां खाया है? उस समय तो तल-तल कर मेहमानों को खिलाती रही. फिर और तल कर कैसरोल में रख लिए कि जब तुम आओगी तो हम दोनों बैठ कर चाय-पकौड़ों का आनन्द लेंगे. और एक तुम हो!’’ कहती हुईं वे हंसने लगीं और मैं भी हंस पड़ी.

मैं उनके साथ उनके घर गई. मैंने सोचा था कि एकाध कैसरोल में भजिए होंगे लेकिन जब उन्होंने चार कैसरोल मेरे सामने ला कर रखे और उनके ढक्कन खोले तो मैं देख कर दंग रह गई। हर कैसरोल में दो-दो प्रकार के भजिए-पकौड़े थे. अकेले आलू और आलू-प्याज मिक्स के पकौड़े तो बहुप्रचलित हैं. पालक, बैंगन और फूल गोभी के पकौड़े भी बहुतायत बनाए जाते हैं. उन्होंने जो स्पेशल पकौड़े बनाए थे, वे थे करेले के पकौड़े. जरा भी कड़वे नहीं. बेहद कुरकुरे. इसी तरह चुकंदर (बीटरूट) के पकौड़े और सेब के पकौड़े तो अद्भुत थे. मैंने तो उनसे कहा कि उन्हें पकौड़ों की रेसिपी बुक लिखनी चाहिए. मगर उन्हें लिखने में कतई रुचि नहीं हैं. खैर, उनकी भजिए-पकौड़े बनाने में इसी तरह रुचि बनी रहे, यही मेरी दुआ है. 

भाभीजी के घर से लौट कर मुझे अपने बचपन के दिन याद आने लगे. उन दिनों मेरे घर भी तरह-तरह के भजिए बनाए जाते थे. यद्यपि उन दिनों पन्ना जैसी छोटी जगह में सीजनल सब्जियां ही मिला करती थीं. इसलिए फूल गोभी या चुकंदर के भजिए हर मौसम में नहीं बन सकते थे. लेकिन उन दिनों उन सब्जियों के भजिए बनते थे जो अब बाजार से तो गायब हो ही चुके हैं बल्कि कुछ तो वनस्पति के रूप में भी लुप्त होते जा रहे हैं. जैसे केनी के पत्तों के भजिए. केनी का पौधा अपने-आप बगीचे में किनारे-किनारे उग आता था. इसकी हल्की सफेद धारियों वाली मध्यम लम्बाई की पत्तियां होती थीं. इसे और क्या कहा जाता है मुझे पता नहीं है. मेरे घर में इसे केनी ही कहा जाता था. केनी के पकौड़ों के लिए मेरी और वर्षा दीदी की ड्यूटी होती थी कि हम पत्तियां तोड़ कर इकट्ठी करें. अब तो केनी के पौधे भूले-भटके ही दिखते हैं, वह भी खेतों के आस-पास. इसी तरह मुनगे (कोसें, ड्रमस्टिक) के फूलों के भजिए बनते थे, जिसके लिए हम दोनों बहनें लम्बा बांस ले कर फूल तोड़ने में जुट जाती थीं. हमारे घर के बगीचे में ही मुनगे था एक अदद पेड़ लगा था. अतः हमें कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता था. कुम्हड़े के फूलों के पकौड़े भी बड़े स्वादिष्ट लगते थे. पोई के पत्तों के पकौड़े भी बनाए जाते थे. पोई की बेल उत्तरप्रदेश में आज भी घरों में उगाई जाती है लेकिन मध्यप्रदेश में इसे लगाने और खाने का चलन नहीं के बराबर है. हमारे घर के बगीचे की बाड़ में पोई और कुंदुरू की बेलें फैली रहती थीं. कुंदरू तो इतनी अधिक तादाद में हो जाते थे कि हम उसे पड़ोसियों में भी बांट देते थे. लेकिन पोई में किसी की दिलचस्पी नहीं रहती थी. हमारे घर में केले के पेड़ भी लगे थे. मां बताती थीं कि वे भुसावली केले के पेड़ थे. उन पेड़ों की ऊंचाई अधिक नहीं होती थी लेकिन उनमें केले के बड़े-बड़े घेर फलते थे. घेर में से केले खत्म होते-होते उसमें से फूल काट लिया जाता था और उसकी ऊपरी पंखुरियां अलग कर के भीतरी अपेक्षाकृत कोमल पंखुरियों की कभी सब्जी तो कभी पकौड़े बनाए जाते थे. कच्चे केले के पकौड़े भी बड़े स्वादिष्ट बनते थे। मुझे कुम्हड़े, नेनुआ (रेरुआ, फत्कुली) के पकौड़े बहुत प्रिय थे. मां जब भी पकौड़े बनातीं तो मेरे लिए इन दोनों में से जो भी घर में पाया जाता या फिर दोनों के पकौड़े बनातीं. बैंगन में विशेष रूप से काले बैंगन के पकौड़े बनाए जाते थे.

मुझे लगता है कि हर सब्जी के भजिए-पकौड़े बनाए जा सकते हैं. मैंने बचपन में फूलगोभी के पकौड़े नहीं खाए थे. क्योंकि मां ने कभी बनाए ही नहीं. वह तो बाद में मैंने ही फूलगोभी के पकौड़े अपने घर में बनाना शुरू किया. इसे बनाना सीखने का भी अपना एक मजेदार किस्सा है. हमारे सगेसंबंधी समान भाई साहब गणेश सिंह जी की पत्नीं यानी मेरी भाभीजी को पकौड़े बनाने में महारत हासिल रही है। वे लोग उन दिनों पन्ना के एमपीईबी के क्वार्टर्स में रहा करते थे, पन्ना-सतना मार्ग पर। हम लोग अकसर उनके घर जाया करते थे. उस समय तक वर्षा दीदी की भी एमपीईबी में नियुक्ति हो चुकी थी. इस तरह हमारा दोहरा रिश्ता हो गया था. एक बार जब हम लोग उनके घर गए तो भाभीजी ने फूलगोभी के पकौड़े बनाए. इससे पहले मैंने फूलगोभी के पकौड़े कभी नहीं खाए थे. मुझे उनका आकार-प्रकार देख कर लगा कि ये अवश्य अंदर से कच्चे होंगे. लेकिन जब मैंने खाया तो बस, खाती ही चली गई. हर पकौड़ा चाय की प्लेट के आकार जितना बड़ा था और अच्छी तरह से तला हुआ था. मुझे नए-नए व्यंजन बनाने का शौक तो बचपन से ही था, सो मैं सम्मोहित-सी उनके रसोईघर में जा पहुंचीं. वहां मैंने उन्हें फूलगोभी के पकौड़े बनाते देखा और उसे अपने दिल-दिमाग में नोट कर लिया. दूसरे दिन जब तक मैंने उसी पद्धति से फूलगोभी के पकौड़े बना कर आजमा नहीं लिए तब तक मुझे चैन नहीं पड़ा. सच्चाई तो ये है कि भाभीजी को भी पता नहीं था कि मैंने उनसे फूलगोभी के पकौड़े बनाना सीख लिया था. इसी तरह जिला अस्पताल में एक नर्स थीं. जिनका नाम था फ्लोरा सिल्वा. वे केरल की थीं. वे सांवली रंगत की थीं लेकिन उनका स्वभाव बहुत ही मधुर और आत्मीयता से परिपूर्ण था. मां से उनकी अच्छी मित्रता थी. हम दोनों बहनें उन्हीं से इंजेक्शन लगवाना पसंद करती थीं. क्योंकि उनका हाथ इतना सधा हुआ था कि हमें तनिक भी दर्द नहीं होता था. बचपन में हामिद बेग कम्पाउण्डर अंकल के बाद इंजेक्शन के मामले में फ्लोरा आंटी हमारी पहली पसंद थीं. फ्लोरा आंटी ने ही सबसे पहले हमें कटहल के पकौड़े खिलाए थे. इससे पहले हमने कटहल के पकौड़े कभी नहीं खाए थे. मां ने फ्लोरा आंटी से कटहल के पकौड़े बनाना सीखा और उसके बाद हमारे घर भी कटहल के पकौड़े बनने लगे. यद्यपि उसे बनाने में कुछ अधिक समय लगता था. यूं भी मुझे कटहल पसंद नहीं है इसलिए मुझे उसे सीखने में भी कभी रुचि नहीं रही. बदले में मां ने उन्हें कुंदुरू के पकौड़े बनाना सिखाया था. इस तरह देखा जाए तो भजियों-पकौड़ों ने अंतर्राज्यीय मित्रता कायम की और परस्पर एक-दूसरे के रसोईघर में अपनी जगह बना ली.

पहले महानगरों के जीवन पर आधारित कहानियों में ही ब्रेड-पकौड़ों के बारे में अधिकतर पढ़ने को मिलता था. मेरे बचपन में मेरे घर में कभी ब्रेड-पकौड़ा नहीं बना. जब मैंने काॅलेज में दाखिला लिया, तब भी पन्ना शहर में कोई ऐसा होटल नहीं था जिसमें ब्रेड-पकौड़ा मिलता. पहली बार मैंने सतना के बसस्टेंड पर ब्रेड-पकौड़ा खाया था. दरअसल मैं और वर्षा दीदी सुबह की बस से रीवा जा रहे थे. वह बस सुबह साढ़े पांच या छः बजे पन्ना से रीवा के लिए रवाना होती थी. लगभग आठ बजे बस सतना बसस्टेंड पहुंची. हमें भूख-सी लगने लगी थी. मगर बसस्टेंड के धूल-धूसरित वातावरण में खुला रखा खाद्यपदार्थ खाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. तभी वर्षा दीदी की दृष्टि पकौड़ों के ठेले पर पड़ी। कैरोसिन-स्टोव पर ब्रेड-पकौड़े तले जा रहे थे. दीदी बस से उतर कर झटपट दो पकौड़े खरीद लाईं. खौलते तेल से निकले ताजे पकौड़े हर तरह के प्रदूषण से मुक्त थे. वह ब्रेड-पकौड़ा इतना स्वादिष्ट लगा कि दीदी ने खिड़की से ही आवाज दे कर दो पकौड़े और मंगा लिए. वाकई बेहद नरम और खटमिट्ठी चटनी से भरे हुए ब्रेड-पकौड़े. शायद उनमें पनीर की छीलन भी डाली गई थी. उस दिन के बाद से तो मैं ब्रेड-पकौड़ों पर फिदा हो गई. 

पहले चाय-पकौड़े का मुहावरा चलन में नहीं था. भजियों और पकौड़ों के साथ टमाटर, आंवला, धनिया-मिर्च, अमचूर, इमली आदि की चटनी या अचार या फिर दही की चटनी अथवा मठा दिया जाता था. भजिया-पकौड़ों के बाद चाय के बदले कप भर मठा पीने का चलन अधिक था. लेकिन अब चाय के बिना पकौड़ों का मजा अधूरा लगता है. साथ में चटनी भले ही न हो लेकिन पकौड़ों के बाद में चाय जरूरी है. यही तो है कि समय के साथ चलन बदले हैं, मुहावरे बदले हैं लेकिन भजियों-पकौड़ों का बुनियादी स्वाद आज भी वही है. उनका जादुई संसार भी वही है पहले जैसा. बस, बदली हुई जीवनशैली में अब इन्हें खाने का चलन कम होता जा रहा है.                         
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Sunday, September 11, 2022

संस्मरण | जानवरों के बाड़े-सी आमसभा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 11.09. 2022
जानवरों के बाड़े-सी आमसभा
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       चुनाव और आमसभा का चोली- दामन का साथ होता है. चुनाव का समय निकट आते ही प्रत्येक राजनीतिक दल भीड़ जोड़ने की जुगत में लग जाता है. यह कोई आज की बात ही नहीं है, मेरे विचार से देश की स्वतंत्रता के बाद से प्रत्येक आमसभा चुनावों के समय यही परिदृश्य रहता रहा होगा. मैंने अपने अब तक के जीवन में कुल तीन आमसभाएं ही देखी, सुनी हैं, वह भी छोटे शहर या ग्रामीण अंचल में. सबसे पहली आमसभा में मुझे जाने का अवसर मिला था अपनी मां डॉ. विद्यावती ‘‘मालविका जी के साथ. वे कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं थीं. मेरी मां तो ईमानदार एवं समर्पित शिक्षिका थीं. लेकिन उन दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भारी क्रेज था. उनकी साड़ियों, उनकी हेयर स्टाईल सभी कुछ महिलाओं के बीच चर्चा का विषय बना रहता था. मेरी मां और उनके साथ की शिक्षिकाएं अकसर इस विषय पर बातचीत किया करती थीं. निश्चित रूप से उस दिनों छोटे शहरों की महिलाएं भी इंदिरा जी जैसी हेयरस्टाईल रखने के स्वप्न देखा करती रही होंगी, जो वास्तविक में उनके लिए संभव नहीं था.  मैं उस समय छोटी थी. स्कूल में पढ़ती थी. मुझे याद है कि जब यह पता चला कि इंदिरा गंाधी पन्ना में एक आमसभा में आने वाली हैं तो हमारे घर में ही मां की पांच-छः महिला सहकर्मियों की एक छोटी-मोटी टी-पार्टी हो गई. पार्टी में इस पर विचार-विमर्श किया गया कि उस आमसभा में कैसे पहुंचा जाए. उन दिनों पन्ना में मात्र पैडल रिक्शा चला करते थे और एक रिक्शे पर अगर तन्दुरुस्त सवारी हुई तो दो, यदि दुबली-पतली सवारी हुई तो तीन ही बैठ पाती थीं. सो, तय हुआ कि चार रिक्शे कर लिए जाएंगे क्यों कि मां ने स्पष्ट बता दिया कि मैं अपने साथ अपनी दोनों बेटियों को भी ले जाऊंगी. यानी एक रिक्शे पर दो महिलाओं के साथ मुझे और वर्षा दीदी को भी सवारी करनी थी अतः तीसरी महिला के लिए उसमें गुंजाइश नहीं थी. उसमें भी हम दोनों को सीट के सामने लगी लकड़ी की पट्टी पर बैठना था. मां चाहती थीं कि हम दोनों बहनें उस ‘‘लौह महिला’’ को देखें. यह बात और है कि ‘‘आयरन लेडी’’ की उपाधि बाद में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थ्रेचर को दी गई लेकिन वास्तविक ‘लौह महिला’ निःसंदेह इंदिरा गांधी ही थीं. क्योंकि भारतीय राजनीति पर दीर्घकाल तक अपना प्रभाव जमाए रखने का काम एक लौह महिला ही कर सकती थी. बहरहाल, नीयत तिथि पर पर हम लोग सभा-स्थल पर पहुंचे. अपार जनसमूह था. ऐसा लग रहा था कि मानो पूरा पन्ना शहर ही नहीं वरन पूरा पन्ना जिला सभा स्थल में उमड़ पड़ा हो. हमें बहुत पीछे जगह मिली थी. उतनी दूर से इंदिरा जी की बहुत स्पष्ट झलक नहीं मिल पा रही थी. फिर भी सभी महिलाएं प्रसन्न थीं कि उन्होंने एक झलक तो पा ली. हम लोग पूरे समय सभा में नहीं रुके. भाषण सुनना हमारा उद्देश्य नहीं था, मात्र देखना उद्देश्य था और वह उद्देश्य पूरा हो गया था. शीघ्र ही हम अपने घर लौट आए. तब मुझे पता नहीं था कि यह भी मेरी मां और उनकी सखियों की योजना का एक हिस्सा था. हमारे घर में चाय-भजियों का दौर चलता रहा. लगभग एक-डेढ़ घंटे बाद हम दोनों बहनों को घर के बाहर खड़े होने को कहा. बल्कि हमारे लिए मां ने दो कुर्सियां भी रख दी थीं और उन पर खड़ी करते हुए कहा था कि,‘‘देखना गिरना नहीं, सम्हल कर खड़ी रहना. अभी इंदिरा जी सर्किटहाउस जाएंगी और फिर कुछ ही देर में वहां से लौटेंगी भी, तब हम उन्हें फिर से देख सकेंगे.’’ तो सभास्थल से जल्दी लौट आने के पीछे यह थी योजना.
चूंकि जहां हमारा घर था हिरणबाग में, वह ठीक उस जगह पर था जहां से सर्किटहाउस के लिए रास्ता पहाड़ी की ओर चढ़ता था. उन दिनों उस रास्ते के किनारे कोई घर नहीं बने थे अतः दूर तक हम लोग उस रास्ते पर आने-जाने वालों को देख पाते थे. सचमुच कुछ देर बाद इंदिरा जी की कार उस रास्ते से गुजरी. उनके सर्किट हाउस जाते समय हमें निराशा हाथ लगी क्योंकि वे विपरीत दिशा में बैठी थीं किन्तु उनकी वापसी पर वे हमारी दिशा में ही थीं. तब हमने उन्हें देखा भी और हाथ हिला-हिला कर उनका अभिवादन भी किया.


दूसरी आम सभा बहुत बाद देखने को मिली. उन दिनों मैं दमोह में बीए फाईनल में पढ़ रही थी. उस दौरान हम स्टूडेंट्स को पता चला कि देश के दिग्गज नेता चंद्रशेखर वहां आमसभा करने आने वाले हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उनके भाषणों की भी बहुत प्रशंसा की जाती थी. उस समय चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री नहीं बने थे और कई लोग उनके भाषणों के मुरीद थे. मेरे सहपाठियों में दो-तीन को छोड़ कर राजनीतिक विषयों अथवा समसामयिक विषयों में किसी की तनिक भी रुचि नहीं थी. जब मैंने उनसे आमसभा में चलने को कहा तो सबने मना कर दिया. बस, सखी धर्म निभाती हुई मेरी मात्र एक सहेली मेरे साथ चलने को सहमत हुई. सो, मैंने और मेरी सहेली रीता धगट ने आमसभा में जाने का निर्णय किया. सभा दोपहर को थी और हमारा काॅलेज सुबह के समय का रहता था. काॅलेज के बाद हम दोनों वहां पहुंचीं. चंद्रशेखर जी का कुछ देर भाषण सुना. किन्तु पता नहीं क्यों मुझे उनका भाषण उतना प्रभावी नहीं लगा जितना कि मैंने सुन रखा था और सोच रखा था. संभवतः मैंने कुछ अधिक उम्मींद लगा ली थी. रीता को यूं भी भाषणबाजी में रुचि नहीं थी, वह तो मेरा साथ देने वहां पहुंच गई थी. उस दिन की आमसभा की उपलब्धि यह रही कि हमने सभास्थल के बाहरी हिस्से में खड़े चाट के ठेले पर जी भर कर चाट खाई. रीता ने तीखे गोलगप्पे भी खाए थे पर मैंने नहीं. क्योंकि मुझे गोलगप्पों के उस पानी से समस्या हो जाती है जिसमें बार-बार नंगे हाथों को डुबाया जाता है. मुझे तो लगता था कि मैं बाजार के गोलगप्पे कभी खा ही नहीं सकती हूं. फिर एक बार एक बड़े माॅल में गोलगप्पे खाने पड़ गए. डरते-डरते मैंने गोलगप्पे खाए कि अब तो पक्का बीमार पडूंगी. लेकिन आश्चर्य की बात थी कि मुझे कुछ नहीं हुआ. तब मेरा ध्यान गया कि वहां के कर्मचारी दस्ताने पहने हुए थे, उस पर भी गोलगप्पे के पानी में बार-बार हाथ डुबाने के बजाए एक डिस्पोजल गिलास में पानी भर कर गोलगप्पों के साथ दे रहे थे. उस दिन मुझे समझ में आ गया कि गड़बड़ी कहां थी. नंगे हाथों को गोलगप्पे के पानी में बार-बार डुबाने से पानी में जो प्रदूषण पनपता होगा उससे मुझे फूडप्वाइजन होने लगता था. हां, तो हम लोगों ने उस दिन जम कर चाट खाई और इस तरह आमसभा के आनन्द की भरपाई की.

तीसरी आमसभा एक बार फिर पन्ना में देखने को मिली जिसने आमसभाओं में नेताओं और आम जनता के बीच की बढ़ती दूरियों को दिखा दिया. उस समय मैं पत्रकारिता की दुनिया में प्रवेश कर चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आने की सूचना मिली. वे पन्ना के एक ग्रामीण क्षेत्र में आने वाले थे. हमारे प्रवेश-पत्र जारी कर दिए गए. सूचना प्रकाशन विभाग की एक तयशुदा गाड़ी में हम कुछ पत्रकारों को सभा स्थल में पहुंचना था. यद्यपि देश की बड़ी-बड़ी समाचार ऐजेंसियों से भी बड़े-बड़े पत्रकार वहां पहुंचने वाले थे. सभास्थल पर राजीव गांधी के पहुंचने के लगभग तीन घंटे पहले हमें सभास्थल पर पहुंचा दिया गया. तरह-तरह के डिटेक्टर्स से कड़ी जांच-पड़ताल. वहां पहुंच कर मैं अवाक रह गई. वहां लकड़ी के मोटे-मोटे लट्ठों को आपस में बांध कर अनेक खंड बनाए गए थे. लट्ठे भी ऐसे कि उनके लिए समूचे हरे-भरे खड़े पेड़ों को काटा गया था. एक खंड पत्रकारों के लिए था तो दूसरा वीआईपी व्यक्तियों के लिए के लिए. एक खंड स्थानीय, छोटे नेताओं के लिए और इन सब के पीछे एक बड़ा खंड आम जनता के लिए. आमजनता में भी उतने ही व्यक्यिों को उसमें प्रवेश की अनुमति थी जितने उस खंड में समा सकें. शेष को बहुत दूर खड़े रहने की छूट थी. राजीव गांधी के सभास्थल पर पहुंचने के ठीक एक घंटे पहले सभी खंड लकड़ी के लट्ठों से ‘‘लाॅक’’ कर दिए गए. पुलिस बलों के अतिरिक्त पैरा मिलिट्री फोर्स भी वहां थी. विचित्र माहौल था. मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम सभी को जानवरों के बाड़े में जानवरों की भांति कैद कर दिया गया है. इससे पहले जिन दो आम सभाओं का मुझे अनुभव था उसमें इस तरह की व्यवस्था नहीं थी. मंच से लगभग दस मीटर की दूरी के बाद से ही आमजन के लिए पूरा मैदान समान रूप से खुला रहता था. किन्तु राजीव गांधी की सभा में ऐसा नहीं था. उस समय इस बाड़ाबंदी ने मेरे मन को भारी ठेस पहुंचाई थी. मुझे प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिल गया था कि किस प्रकार आमजन से बड़े नेताओं की दूरियां बढ़ने लगी हैं. हो सकता है कि इसे पहले इंदिरा जी के मारे जाने और तत्कालीन आतंकी गतिविधियों के भय के कारण इस प्रकार की व्यवस्था की गई हो. फिर भी जन के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि के सामने जन को बाड़े में बंद रखा जाए, यह लोकतांत्रिक स्वरूप उस समय मेरे लिए हजम करना कठिन था. इसके बाद मैं और किसी आमसभा में नहीं गई. मेरा मन भी नहीं हुआ. अब तो टीवी के पर्दे पर ही आमसभाओं की बारीकियां देखने को मिल जाती हैं, ‘‘विथ स्पेशलिस्ट्स स्पेशल कमेंट’’. जिसमें ढेर सारे कामर्शियल ब्रेक्स के साथ आग उगलती बहसों की कांव-कांव भी शामिल रहती है.             
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Sunday, September 4, 2022

संस्मरण | कॉमरेड का आकर्षण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 04.09. 2022

कॉमरेड का आकर्षण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह  
        उस दिन सुबह जब समाचारपत्र में 30 अगस्‍त 2022 को मिखाइल गोर्बाचोव के निधन होने का समाचार पढ़ा तो स्मृति के कई पन्ने अपने आप खुलने लगे। वे सोवियत संघ के अंतिम नेता थे।

          जिन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ रही थी उन दिनों लगभग हर दस में से एक विद्यार्थी साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित रहता था। उन दिनों "कामरेड" शब्द किसी बहुप्रचलित मुहावरे से कम नहीं था। उन दिनों भारत और सोवियत संघ के बीच बहुत गहरी मित्रता थी। अनेक सोवियत पत्र-पत्रिकाएं देश के छोटे-छोटे शहरों, गांवों और कस्बों तक उपलब्ध रहती थीं। बहुत बड़ी मात्रा में रूसी साहित्य बहुत ही कम कीमत में और बहुत सुंदर छपाई में उपलब्ध हो जाता था, वह भी हिंदी में। जब मैं बीए प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी उन दिनों मैंने टॉल्सटाय का उपन्यास "अन्ना करेनिना" पहली बार पढ़ा था। इसके बाद तो उसे कई बार पढ़ा। दोस्तोएव्स्की का "अपराध और दंड",  गोर्की का उपन्यास "मां" तथा गोर्की की आत्मकथा पढ़ी। लेव टॉल्सटाय, फ्योदोर दोस्तोएव्स्की और गोर्की के अतिरिक्त अलेक्सांद्र पुश्किन, मिख़ाइल लेर्मोन्तोव, इवान तुर्गनेव, एंटोन चेखव, बोरिस पास्तरनाक,अन्ना अख़्मातोवा, मरीना त्सवेताएवा, मिखाईल शोलोखोव आदि का साहित्य मैंने पढ़ा। उस दौरान व्लादीमीर इल्यिच लेनिन की जीवनी और उनकी लिखी किताबें "क्या किया जाना चाहिए?", "लोकतांत्रिक क्रांति में सामाजिक लोकतंत्र की दो रणनीतियां" तथा "राज्य और क्रांति" पढ़ी थीं। कार्ल मार्क्स की "पूंजी" और "कम्युनिस्ट घोषणा पत्र" भी उसी दौर में पढ़ी थी। ये सारी किताबें मैंने खरीद कर पढ़ीं थीं और इन्हें खरीदना इसीलिए संभव हो सका था क्योंकि इनकी कीमत बहुत कम रहती थी और  इन्हें खरीदने से मां कभी रोकती नहीं थीं। मैं दो पत्रिकाएं भी डाक से मंगाया करती थी। एक "सोवियत संघ" और दूसरी "सोवियत नारी"। दोनों का चिकना ग्लेज़्ड कागज और सुंदर फोटोग्राफी मन मोह लेती थी। मैं पूरे ध्यान से दोनों पत्रिकाएं पढ़ती थी और उन्हें सहेज कर भी रखती थी। मेरे पास बहुत सारे अंक इकट्ठे हो गए थे। वह तो जब पन्ना से सागर स्थान परिवर्तन करना पड़ा तो उस समय बचपन से सहेज कर रखी गईं ढेर सारी कॉमिक्स और यह दोनों सोवियत पत्रिकाएं छोड़नी पड़ीं। फिर भी किताबें में अपने साथ सागर ले आई थी। काफी अरसे तक रूसी लेखकों की वे किताबें मेरे पास रहीं। लेकिन एक बार एक चूहे ने उन्हें कुतर दिया और उसके बाद वह किताबें रद्दी में बेचनी पड़ीं। जिसका आज भी मुझे बहुत दुख है। उन किताबों की गंध और छुअन आज भी मैं भूली नहीं हूं। एक बार मेरी भी एक कहानी "सोवियत नारी" में प्रकाशित हुई थी और जाहिर है कि वह मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी का दिन था। मैंने अपने सारे परिचितों को वह अंक दिखाया था। एक विदेशी पत्रिका में कहानी छपना और वह भी सोवियत पत्रिका में, उस समय बड़ी शाबाशी की बात थी। पारिश्रमिक की रकम भी उससे बहुत बड़ी थी, जो भारतीय अखबार उन दिनों रचनाओं के पारिश्रमिक के रूप में दिया करते थे। दोनों पत्रिकाओं की ओर से 15 दिसंबर तक नए साल का बेहद खूबसूरत कैलेंडर आ जाया करता था। उन कलैंडर्स के लिए पोस्टमैन को अलग से निवेदन करना पड़ता था ताकि वह किसी और को न दे दे।

        उन दिनों मैं और मेरे कुछ मित्र जिनमें पन्ना से बाहर के अधिक थे और साम्यवादी विचारधारा के थे, आपस में पूंजीवादी विरोधी तर्क और बहस किया करते थे। उन दिनों फोन तो हर किसी की पहुंच में था नहीं अतः हम लोग एक दूसरे को लंबे-लंबे पत्र लिखकर साम्यवाद और पूंजीवाद पर अपने-अपने विचार प्रकट करते थे। हमारी चिट्टियां "कॉमरेड" संबोधन से शुरू होती थीं और "लाल सलाम" पर खत्म होती थीं। जब कभी मां के साथ भोपाल जाने का अवसर मिलता तो मैं न्यू-मार्केट के उस सब-वे पर अवश्य जाती जहां हिंदी में अनूदित सोवियत किताबें मिलती थीं। अधिकांश किताबों का अनुवाद अमृत राय और मदनलाल "मधु" द्वारा किया गया होता था।

              जब मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष में थी, तब डॉ कमला प्रसाद जी से  मुझे साम्यवाद के भारतीय स्वरूप को समझने में मदद मिली। कमला प्रसाद जी के छोटे भाई और उनके भाई की पत्नी वे दोनों भी साम्यवादी विचारधारा के थे। उनके छोटे भाई उन दिनों छतरपुर के महाराजा कॉलेज में कार्यरत थे। पन्ना में प्रगतिशील लेखक संघ के द्वारा एक संगोष्ठी आयोजित की गई थी जिसमें कमला प्रसाद जी तथा उनके भाई और भाई बहू तीनों आए थे। यद्यपि कुछ समय बाद यह दुखद खबर मिली थी कि उनके भाई ने सपत्नीक आत्महत्या कर ली थी। कारण पता नहीं चला था। इस घटना ने काफी दिन तक मेरे मन को विचलित रखा था क्योंकि दोनों से मैं मिल चुकी थी, दोनों प्रबुद्ध थे और बहुत सरल, सहज स्वभाव के थे।

   उसी दौरान बांदा (उप्र) के एक पत्रकार (दुख है कि मुझे उनका नाम याद नहीं है) वर्षा दीदी से मिलने आए और उन्होंने दीदी को निकोलाई आस्त्रोवस्की की "अग्निदीक्षा" पुस्तक भेंट की। दीदी ने तो उसे सरसरी तौर पर पढ़ा लेकिन मेरे लिए वह जीवनदर्शन बन गई। "अग्निदीक्षा" एक ऐसे सैनिक की जीवन कथा थी जो द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन सेना के विरुद्ध लड़ते हुए अपने दोनों पैर गंवा बैठा था। उड़ान भरने के अलावा उसके जीवन का और कोई सपना नहीं था, लेकिन दोनों पैर गंवाने के बाद यह संभव भी नहीं था। लंबे समय तक सेना के अस्पताल में रहने के दौरान उसने स्वयं को मानसिक रूप से तैयार किया और अपनी शारीरिक क्षमताओं को उस सीमा तक बढ़ाया जो उसके दर्द की सहन करने की सीमा से भी आगे था। एक दिन वह अपने नकली पैरों के सहारे फिर से पायलट बनने के सपने को पूरा कर सका। उसका संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ युद्ध समाप्त होते-होते उसकी आंखें कमजोर होने लगीं। फिर भी उसने हार नहीं मानी और न केवल एक लड़की को सहारा दिया बल्कि स्वयं भी उसने एक किताब लिखी। जबकि बेहद कमजोर आंखों के साथ लिखना उसके लिए सबसे दुष्कर कार्य था। इस पुस्तक ने उस समय मुझे संघर्ष करने का जो पाठ पढ़ाया वह आज तक मेरे काम आ रहा है। मैंने इस कथानक से यही सीखा था कि स्थिति कितनी भी विपरीत क्यों न हो कभी हार नहीं माननी चाहिए।
            उस दौर के प्रसिद्ध साम्यवादी नेता होमीदाजी से मिलने का भी मुझे अवसर मिला था। बहुत ही सादगी से रहने वाले व्यक्ति थे। उस समय मैं एक विद्यार्थी ही थी अतः होमीदाजी ने मुझसे पूछा था कि "तुम जनता के बारे में क्या समझती हो, कौन है जनता?" सुनने में यह प्रश्न सरल था लेकिन उत्तर उतना ही कठिन था। मैं हड़बड़ा गई कि क्या उत्तर दूं। तब उन्होंने मुझसे कहा था कि "जब तक तुम आम लोगों के नजदीक नहीं जाओगी, उनके जीवन के दुख दर्द नहीं समझोगी, तब तक यह नहीं समझ पाओगी कि जनता क्या है?" उनका यह वाक्य मुझे उस दौरान कई बार याद आया था जब मैं बीड़ी श्रमिक महिलाओं पर अपनी किताब "पत्तों में कैद औरतें" लिख रही थी। सचमुच मैं उन महिला श्रमिकों के पास पहुंच कर ही उनकी कठिनाइयों को महसूस कर सकी थी।
              बुंदेलखंड के साम्यवादी विधायक कपूरचंद घुवारा से कई बार मिलने का अवसर मिला। उन दिनों जब मैं ऐसे लोगों से मिलती थी तो अपना परिचय देते हुए शान से कहती थी कि "मैं कॉमरेड शरद सिंह"। अपना यह परिचय देते हुए मुझे बहुत अच्छा लगता था। उस समय स्वयं को बहुत जिम्मेदार और गंभीर महसूस करती थी। लेकिन वास्तविक जिम्मेदारियों और मुश्किलों की बढ़त के साथ जिंदगी की बहुत सारी सच्चाइयां सामने आती गईं, जिससे धीरे-धीरे हर तरह के "वाद" के प्रति मेरा आकर्षण कम होता गया।

         मुझे अच्छी तरह याद है कि सन 1986 में सोवियत संघ के राष्‍ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव पहली बार भारत आए थे। रेडियो पर आकाशवाणी से उनके आगमन का आंखों देखा हाल सुनाया जा रहा था। जबकि पिछले दो दिन से हमारे घर में नल में पानी नहीं आया था और संयोग यह कि जब आंखों देखा हाल सुनाया जा रहा था ठीक उसी दौरान तब नल में पानी सप्लाई किया जा रहा था। चूंकि उस पूरे क्षेत्र में एक साथ कई नल खुले हुए थे और उनमें भी कुछ नलों में मोटर का इस्तेमाल किया जा रहा था इसलिए पानी की बहुत पतली धार आ रही थी। अतः जितनी देर में मिखाईल गोर्बाचोव की आगवानी की गई, उतनी देर में एक टंकी पानी भी नहीं भर पाया था। देखा जाए तो यह व्यवस्था का वह चेहरा था जिसे किसी "वाद" के खांचे में नहीं रखा जा सकता था। धीरे-धीरे में कामरेड शरद सिंह से एक बार फिर सिर्फ शरद सिंह बन गई। जो जीवन मेरे सामने था उसके खुरदरी सच्चाइयां मुझे बिना किसी वाद के सहारे स्वीकार करनी थी और उनका सामना करना था। उस समय मेरा मन भी "पेरेस्त्रोइका" की ओर चल पड़ा था। विचारधाराओं की कट्टरता की कड़ियां खुलने लगी थीं। इन कड़ियों को खोलने में जॉर्ज ऑरवेल की "1984" का भी बड़ा योगदान रहा। इसके बाद ऑरवेल की "एनिमल फार्म" भी पढ़ी। लेकिन "1984" पुस्तक ने दिल-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी।

         वस्तुतः दबाव चाहे किसी भी विचारधारा का हो आम जनता के लिए उचित नहीं होता है। जब आम जनता अपने मौलिक अधिकारों के साथ रहती है तभी वह सही तरीके से जी पाती है। साम्यवाद और पूंजीवाद का संतुलित स्वरूप ही उसके लिए उत्तम होता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है। आज "कामरेड" या "लाल सलाम" जैसे शब्द मेरे जीवन में महाविद्यालयीन जीवन के साथ ही बहुत पीछे छूट गए हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि उस दौर में मैंने साम्यवाद और पूंजीवाद को भलीभांति न समझा होता अर्थात उन दोनों राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाओं की बारीकियों को नहीं समझा होता, तो आज शायद लोकतंत्र के बारे में मैं इतने अच्छे से नहीं समझ पाती।
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Sunday, August 28, 2022

संस्मरण | कविता का वशीकरण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 28.08. 2022
कविता का वशीकरण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        वह दिन मैं कभी भूल नहीं सकती, जब मां ने स्कूल से लौट कर बताया कि आज एक पुराने परिचित घर आने वाले हैं। वर्षा दीदी ने पूछा कि कौन हैं वे? उन दिनों मैं शायद आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। मुझे भी जिज्ञासा हुई।

‘‘बहुत बड़े कवि हैं। तुम लोग उनकी कविताएं अपनी पाठ्यपुस्तक में पढ़ती हो।’’ मां तो इतना कह कर नाश्ता-पानी के जुगाड़ में लग गईं। उन दिनों हमारे घर में चाय का चलन नहीं था। मां बुंदेली संस्कृति में रच-बस चुकी थीं। यद्यपि मालवा उनके मन और जीवन से गया नहीं था। घर में साड़ी के बजाए मालवी स्टाईल की लहंगा-चुन्नी पहनना पसंद करती थीं। आखिर अपनी जन्मभूमि को कोई कैसे भुला सकता है? वे मालव कन्या थीं। ‘‘मालविका’’ थीं। उनको यह उपनाम डाॅ. श्याम परमार ने उनकी लेखकीय प्रतिभा को देखते हुए दिया था। मजे की बात यह कि वर्षा दीदी का जन्म रीवा में हुआ था इसलिए वे स्वयं को ‘‘बघेली कन्या’’ कहा करती थीं। जबकि मेरा जन्म विशुद्ध बुंदेलखंड में पन्ना में हुआ सो मैं जन्मजात ‘‘बुंदेली कन्या’’ बन गई। तो, मैं बता रही थी नाश्ते के बारे में। तब बुंदेलखंड में अतिथि के लिए नाश्ते में पोहा नहीं बनाया जाता था। आमतौर पर घरों में सलोनी, पपड़िया, सेव आदि बना कर रख लिए जाते थे, यानी ये नाश्ते हमेशा मौजूद रहते थे। मां भी रविवार की छुट्टी में खाना बनाने वाली बऊ के साथ मिल कर इस तरह के आईटेम बना कर रख लिया करती थीं। लेकिन यदि किसी को नाश्ता ताज़ा बना कर कराना होता था तो भजिए और गुलगुले तले जाते। साथ में चिप्स और पापड़ भी रहते। पोहा हमारे घर उन दिनों कभी-कभार ही बनता था। लेकिन उस दिन मां पोहा बनाने में जुट गईं। घर में आलू, प्याज और धनिया पत्ती के अलावा और कोई ऐसी चीज नहीं थी जिसे पोहे में डाला जा सकता था। उन दिनों पन्ना में हरी मटर सिर्फ़ सीजन में ही मिलती थी और हमारे फ्रिज होने का सवाल ही नहीं था। उस समय फ्रिज घोर विलासिता की वस्तु थी, अतः हम तो उसे ‘अफोर्ड’ करने की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। सो, डिब्बाबंद मटर भी घर में नहीं रख सकते थे। खैर उस समय मैंने ये सब नहीं सोचा होगा लेकिन अब उन दिनों को याद करती हूं तो उन दिनों के अभाव और उपलब्धता सभी कुछ याद आते हैं।

लगभग आधे घंटे बाद कुंडी खटखटाने की आवाज़ आई। सबसे पहले भाग कर मैं ही दरवाज़े पर गई। सामने देखा तो चकाचक सफेद धोती-कुर्ता पहने एक सज्जन खड़े थे। कुर्ते के ऊपर जैकेट और एक कंधे पर खादी का एक झोला।
‘‘ये मालविका जी का घर है न?’’ उन्होंने मुझसे प्रश्न किया। मैंने अपनी मुंडी हिला कर हामी भरी ही थी कि मां और वर्षा दीदी आ गईं।

‘‘आइए-आइए! बेटा इन्हें प्रणाम करो! ये श्रीकृष्ण सरल जी हैं, जिनकी कविताएं तुम लोगों ने याद कर रखी हैं।’’ मां ने परिचय कराया। ‘‘श्रीकृष्ण सरल’’ यह नाम सुन कर तो मैं अवाक हो कर उनकी ओर देखती रह गई। वे मुझे बिलकुल अपने नानाजी की तरह लगे। नानाजी भी सफेद धोती-कुर्ता पहनते थे। वे काफी देर हमारे घर पर रुके। उन्होंने नाश्ता किया और अपनी दो-तीन लम्बी-लम्बी कविताएं सुनाईं। जितना ओज उनकी कविताओं में था उतना ही ओज उनके काव्य-पाठ में था। उन्होंने हम दोनों बहनों को अपनी एक-एक गीत-पुस्तक भी भेंट की। यद्यपि उनकी वे पुस्तकें तो हमने चार दिन बाद पढ़ीं। साक्षात उनके मुख से देशभक्ति में डूबा गौरवगान सुनने के बाद ओजपूर्ण गीतों का जो असर हम दोनों बहनों पर हुआ, उसके कारण हम दोनों बहनें चार दिन तक ‘सरल’ जी जैसी कविता लिखने के प्रयास में जुटी रहीं। देखा जाए तो यह बचपना ही था क्योंकि देशभक्ति पूर्ण कविताएं तभी लिखी जा सकती हैं जब देश प्रेम की भावनाएं मन में हिलोरें ले रही हो। ऐसी कविताएं अंतःकरण से उपजती हैं, सुने-सुनाए आधार पर नहीं। बहरहाल, हमने जो कविताएं लिखीं, उन्हें मां ने देखा-पढ़ा। वर्षा दीदी की कविताओं में मां ने आवश्यक सुधार भी किए। मगर मैं बचपन से ही अड़ियल किस्म की रही हूं। मुझे अपनी रचनाएं जंचवाना पसंद नहीं था। मैंने मां को पढ़ने तो दी लेकिन सुधारने नहीं दी। मां ने भी सुधारने पर जोर नहीं दिया क्योंकि वे जानती थीं कि यदि वे जोर देंगी तो मैं अपनी कविताएं फाड़ कर फेंक दूंगी। वह तो मेरी आदत में तब थोड़ा परिवर्तन आया जब मैंने सन् 2004 में अपना पहना उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ लिखा। यह 2005 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास की पांडुलिपि वर्षा दीदी को इस वार्निंग के साथ पढ़ने को सौंपी थी कि इसमें जो भी गड़बड़ी आपको लगे उसे आप अलग नोट करिएगा। पांडुलिपि में काटा-पीटी की जरूरत नहीं है। दीदी तो बचपन से ही देखती आई थीं कि गलती निकाले जाने पर मैं किस तरह अपनी रचना का अंतिम संस्कार कर देती हूं अतः उन्होंने मेरी वार्निंग का पूरा ध्यान रखा। कहने का आशय यह कि श्रीेकृष्ण ‘‘सरल’’ जी की कविताएं सुन कर जुनून में आ कर मैंने जो कविता लिखी थी उसे मैंने उस वर्ष 26 जनवरी के समारोह में सुना कर दम लिया। मैंने भरसक प्रयास भी यही किया था कि मैं ‘‘सरल’’ जी की भांति अपनी कविता का पाठ करूं। स्कूल में मां के अलावा किसी को कविताकला का विशेष ज्ञान नहीं था इसलिए सभी से मुझे प्रशंसा मिली। यह तय है कि मां ने जरूर अपना सिर पीटा होगा मेरी कविता सुन कर।

इसी तरह का कविताई का एक बार और जूनून हम दोनों बहनों पर सवार हुआ था। तब मैं बीए फस्र्टईयर में पढ़ रही थी। एक रचनाकार के रूप में मेरी पहचान बनती जा रही थी। उन दिनों पन्ना में जबलपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार आया करते थे, जिनमें मेरी और दीदी की रचनाएं प्रकाशित होती रहती थींे। दीदी ने उन दिनों कुछ मंचों पर भी काव्यपाठ करना शुरू कर दिया था। यद्यपि मंचों का गिरता स्तर देख कर यह सिलसिला बहुत लम्बा नहीं चला। दीदी का कंठ बहुत मधुर था। उनमें अपनी आवाज से श्रोताओं को बांध लेने की क्षमता थी लेकिन मंचीय लटके-झटके उन्हें नहीं आते थे और मां को भी वह सब पसंद नहीं था। कुछ श्रेष्ठ मंचों पर श्रेष्ठ कवियों से भी भेंट हुई और आत्मीयता के तार जुड़े। जिनमें से एक थे बुंदेलखंड के ख्यातनाम कवि डाॅ. अवधकिशोर जड़िया जी। उन दिनों उनके घनाक्षरी छंदों की बड़ी धूम थी। बहुत ही सहज और सरल स्वभाव के हंसमुख व्यक्ति। अब तो उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है। जिस समय की मैंने घटना बता रही हूं, उन दिनों बारिश के बाद और ठंड के आगमन से पहले का मौसम था। इसीलिए हम लोग घर के आगे वाले बरामदे में सो रहे थे। यही कोई सुबह के चार बजे का समय था। ऐसा लगा कि कोई दीदी का नाम ले कर जोर-जोर से पुकार रहा है। मां, दीदी और मैं तीनों हड़बड़ा कर उठ बैठे। सुबह की नींद यूं भी गहरी होती है अतः एकदम से कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हुआ है? मां ने लपक कर लाईट जलाई। तब हमने देखा कि सामने डाॅ.अवधकिशोर जड़िया जी खड़े हुए थे।

‘‘सुप्रभात! देखो मैंने जगा दिया न सबको।’’ वे हंसते हुए बोले। फिर कहने लगे,‘‘अभी कवि सम्मेलन खत्म हुआ है। मैं सीधा वहीं से चला आ रहा हूं। मेरी बस छः बजे की है। अगर मैं आप लोगों से बिना मिले चला जाता तो आप लोग नाराज हो जाते।’’
‘‘हां-हां, बैठो न भैया!’’ मां ने तत्काल एक खाट का बिस्तर ठीक-ठाक किया और कहा। वे इत्मिनान से बिस्तर पर आलथी-पालथी मार कर बैठ गए। फिर दीदी से साधिकार बोले,‘‘जाओ वर्षा बेटा झटपट चाय तो बना लाओ!’’

चाय पीने के बाद वे हम लोगों को बताने लगे कि उन्होंने कविसम्मेलन में कौन-कौन सी कविताएं सुनाईं हैं। हम लोग भी उत्सुकता से उनकी कविताएं सुनने लगे। उन्होंने अपने बेहतरीन अंदाज में अपनी घनाक्षरियां सुनाईं। लगभग साढ़े पांच बजे वे छतरपुर की बस पकड़ने के लिए रवाना हो गए। लेकिन सुबह-सवेरे के कोरे-ताजे दिमाग में घनाक्षरी छंदों की गूंज ऐसी बैठी कि दो दिन तक हम दोनों बहनें घनाक्षरी लिखने में जुटी रहीं। जब हम लोगों ने जी भर की घनाक्षरियां लिख लीं और यह समझ में आ गया कि अब इससे अधिक नहीं लिखा जा सकता है, तब कहीं जा कर वह जुनून हम दोनों के सिर से उतरा।

सच तो यह है कि श्रीकृष्ण ‘‘सरल’’ और डाॅ. अवधकिशोर जड़िया जी के काव्य में जो पूर्णता (परफेक्शन) थी, उसने हमें वशीभूत कर लिया था। इतना गहरा असर और किसी के काव्यपाठ ने मुझ पर नहीं डाला। आज मैं इन दोनों घटनाओं के महत्व को समझ पाती हूं कि जिस रचना में पूर्णता होती है और जिस रचनाकार में सृजन के प्रति समर्पण (डिवोशन) होता है, उसी की प्रस्तुति सुनने वाले को सम्मोहित कर पाती है। यद्यपि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इन दोनों रचनाकारों के पहले या बाद में जिन कवि या कवयित्रियों की रचनाएं मैंने सुनीं वे प्रभावी नहीं थीं लेकिन इन दोनों कवियों के काव्य और प्रस्तुति में कुछ तो विशेष था जिसने मन को गहरे तक आंदोलित किया और दो-चार दिन तक हमारे मन मस्तिष्क को वशीभूत रखा।      
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Sunday, August 21, 2022

संस्मरण | मैचमेकिंग का असफल प्रयास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण 
मैचमेकिंग का असफल प्रयास
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

    जब मैं पन्ना में स्कूल में पढ़ती थी तब मेरी सहपाठियों में सभी उत्तर भारतीय छात्र-छात्राएं थीं। फिर जब मैं अपने मामा जी के पास बिजुरी पढ़ने के लिए गई तो वहां पहली बार मुझे एक ऐसी सहेली मिली जो दक्षिण भारतीय थी। वह आयु में मेरे बराबर थी लेकिन उसकी शिक्षा में बीच में व्यवधान आ जाने के कारण मुझसे छोटी कक्षा में थी। यानी मैं 11वीं कक्षा में थी तो वह नवी कक्षा में पढ़ रही थी। लेकिन हम दोनों के बीच बहुत जल्दी घनिष्ट मित्रता हो गई। उसका नाम था सरोजिनी। उसका वास्तविक नाम लेने में मुझे कोई संकोच नहीं है क्योंकि मैं जानती हूं कि यदि उसे यह पता चले कि मैंने कहीं उसका उल्लेख किया है तो उसे कभी बुरा नहीं मानेगी। सरोजिनी के मामा जी पहले आर्मी में थे शार्ट सर्विस कमीशन में थे । फिर वहां से सेवानिवृत्त होकर रेलवे में काम करने लगे। किंतु किसी कारण से उन्हें रेलवे की नौकरी छोड़नी पड़ी और वह बिजुरी में आकर बस गए उनके साथ उनकी पत्नी और  दो बेटियां तथा एक बेटा था। सरोजिनी की मां का उसके पिता से  अलगाव हो चुका था। तभी से सरोजनी की मां अपने भाई के साथ रह रही थीं। इस तरह सरोजिनी भी अपने मामा जी के साथ रहती थी और मैं भी अपने मामा जी के पास रहती थी। बस अंतर यही था कि उसकी मां उसके साथ थीं, जबकि मेरी मां और मेरी दीदी मुझसे दूर थीं।
       यूं तो सरोजिनी सांवले रंगत की थी लेकिन उस के नाकनक्श गजब के सुंदर थे। वह देखने में किसी दक्षिण भारतीय सिने अभिनेत्री से कम दिखाई नहीं देती थी। जब वह अपने दक्षिण भारतीय शैली में लहंगा, ब्लाउज़, दुपट्टा पहनती और उस पर अपने घने लंबे काले बालों में सफेद मोंगरे  की वेणी लगाती, तो ऐसा लगता जैसे रेखा या वैजयंती माला साक्षात सामने आ गई हो। बेहद हंसमुख थी वह। किसी भी समस्या को बहुत गंभीरता से नहीं लेती थी। जबकि उसका जीवन आसान नहीं था। मैं जब भी मां और दीदी की याद में उदास होने लगती तो वह जबरदस्ती पकड़कर मुझे अपने घर ले जाती और अपनी मां के सामने खड़ा करके कहती, "लो, ये हैं मां। अब इनकी गोद में सिर रखकर रो लो, जितना रोना है।" उसकी बात सुनकर, मुझे झेंप भी लगती और हंसी भी आ जाती। 
       मैं शुरू में उसे मद्रासी मानती थी। क्योंकि उन दिनों दक्षिण भारतीय लोगों के लिए या तो "साउथ इंडियन" या फिर "मद्रासी" शब्द का प्रयोग किया जाता था। चाहे वह तमिलनाडु का हो, केरल का हो या कर्नाटक का, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उत्तर भारतीयों की दृष्टि में सब के सब मद्रासी थे। यह धारणा क्यों चली यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं भी शुरू में सरोजिनी को मद्रासी ही समझती थी। 
     वहां मेरे साथ एक सिंधी लड़की भी पढ़ती थी। बहुत ही अलग थी और मासूम सी। उसका घरेलू नाम मोना था और हम लोग भी उसे मोना के नाम से ही पुकारते थे। उसका बहुत बड़ा परिवार था। जहां तक मुझे याद है, उसके नौ भाई-बहन थे। इसलिए वह परिवार में उतना प्रेम नहीं पा सकी थी जितना प्रेम उसे हम दोनों से मिलता था। वह भी हम लोगों की सहेली बन गई थी। यद्यपि वह इतनी घनिष्ट सहेली नहीं थी जितनी कि मैं और सरोजनी। हम दोनों बहनों की तरह थे। सरोजिनी को मोना के कारण कई बार अपने घर में डांट खानी पड़ती थी। मोना मैं बहुत चंचलता थी। वह सोचती कम थी और करती ज़्यादा थी। इसीलिए सरोजिनी के घर में धूप में रखे गए अचार के मर्तबान को छू देने पर न केवल उसको डांट पड़ती बल्कि सरोजनी को भी डांट खानी पड़ती।  सरोजिनी ने मोना के संदर्भ में ही मुझे बताया था  कि हम लोग तमिल हैं और हमारे यहां खानपान की शुद्धता और पूजा-पाठ का विशेष ध्यान रखा जाता है। हम तीनों सहेलियों में सरोजिनी को उन बातों का ज्ञान अधिक था जो लड़कियों को होना चाहिए। लेकिन मित्रता के बावजूद वह कभी भी किसी विषय पर सीमा का उल्लंघन नहीं करती थी। हंसी-मज़ाक में भी हम लोग शालीनता का पालन करते थे।
     सरोजिनी के परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। उसके मामा को जितनी पेंशन मिलती थी, उससे उनके परिवार का गुज़ारा नहीं हो पाता था। मामी तनिक तेज स्वभाव की थीं। इसलिए जब-तब सरोजिनी की मां को उलाहना भी देती रहती थीं। यद्यपि कोई बड़ा मनमुटाव उनके बीच नहीं था। सरोजिनी की मां और मामा अतिरिक्त कमाई के लिए कपड़ा सिलने का काम करते थे। तुरपाई करना, बटन टांकना जैसे छोटे-मोटे काम सरोजिनी भी करती थी। उसके इस कामों ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने सिलाई की पैर मशीन चलाना उसी से सीखा था। 
       सरोजिनी के मामा और मेरे मामा जी के बीच मित्रता थी इसीलिए हम लोगों का एक दूसरे के घर आना-जाना होता रहता था। एक दिन सरोजिनी ने बताया कि उस की शादी के लिए उसके मामा लड़का ढूंढ रहे हैं। मुझे यह सुनकर बड़ा अजीब लगा। वह मेरे ही उम्र की थी और शादी की कल्पना तो मेरे मस्तिष्क से भी कोसों दूर थी। मैंने यह बात अपने मामा जी को बताई। तब मेरे मामा जी ने सरोजिनी के मामा को समझाया कि कम से कम 11वीं क्लास तक तो सरोजिनी को पढ़ लेने दो, उसके बाद उसके विवाह के बारे में सोचना। तात्कालिक रूप से सरोजनी के मामा मान गए और मेरे वहां रहते तक फिर कभी सरोजिनी के विवाह की चर्चा नहीं हुई।
      11 वीं बोर्ड परीक्षा देने के बाद मैं वापस मां के पास पन्ना आ गई। वहां मैंने छत्रसाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आर्ट फैकल्टी में दाखिला लिया। पन्ना आने के बाद मुझे बिजुरी की बहुत याद आती थी। मैंने वहां पढ़ाई के साथ और भी बहुत कुछ सीखा और जाना था। विशेष रुप से मुझे सरोजिनी की याद आती थी। उन दिनों फोन सुविधा इतनी आसान नहीं थी कि मैं सरोजिनी से बात कर पाती। हम लोग एक-दूसरे को अंतर्देशीय पत्र लिखते थे, जिन्हें आने-जाने में ही काफी समय लग जाता था। मैंने मां से कहा कि मैं एक बार बिजुरी घूमने जाना चाहती हूं ताकि सरोजिनी से मिल सकूं। मां ने सहर्ष स्वीकृति दे दी और तय हुआ कि फर्स्ट ईयर की परीक्षा देने के बाद मैं  बिजुरी जाऊंगी। 
       फर्स्ट ईयर में मेरा एक लड़के से परिचय हुआ। वह भी दक्षिण भारतीय था। यद्यपि वह मुझसे सीनियर था। मैं फर्स्ट ईयर में थी, तो वह थर्ड ईयर में था। मैं खिलंदड़ी स्वभाव की थी इसलिए उसकी मंशा भांप नहीं सकी। वह तो मुझे तब आश्चर्य हुआ जब उसने प्रेम-पत्र लिखकर एक किताब में रख कर मुझे पकड़ा दिया। खै़र इसकी चर्चा में बाद में अलग से करूंगी क्योंकि यह भी एक दिलचस्प घटना है। इस घटना से पूर्व मैंने उसे बताया कि मैं बिजुरी जाने वाली हूं। उसके भी कोई रिश्तेदार रेलवे में पोस्टेड थे और चिरमिरी में रहते थे। उसने मुझसे कहा कि मैं बिजुरी में मिलने आऊंगा। मैंने भी सहज भाव से कह दिया कि आ जाना। जब मैं बिजुरी पहुंची तो सरोजनी से मिलने के बाद मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि सरोजिनी और उस लड़के में दोस्ती हो जाए तो कितना अच्छा है। दोनों दक्षिण भारतीय हैं। यदि एक-दूसरे को पसंद कर लेंगे तो बहुत अच्छा रहेगा। यूं भी सरोजनी के मामा जी उसकी शादी के लिए एक बार फिर सक्रिय हो उठे थे। मैंने पहले सरोजिनी को कुछ नहीं बताया, लेकिन जब वह लड़का आया तो मैंने सरोजिनी के हाथों  उसके पास चाय भिजवाई और मैंने सरोजनी से कहा कि तुम दोनों तो दक्षिण भारतीय हो, अपनी भाषा में एक दूसरे से खूब सारी बातें करना, तब तक मैं नाश्ता बनाती हूं। लेकिन 5 मिनट में ही सरोजिनी वापस आ गई और बोली तुम जाकर बातें करो नाश्ता में बना देती हूं। मैंने पूछा क्या हुआ? तुम दोनों अपनी भाषा में बात क्यों नहीं कर रहे हो? तो वह हंसने लगी और बोली कि हम दोनों की भाषा एक नहीं है। मैं तमिल हूं और वह कन्नड़ है। अब यह सोचने की बात थी कि मैं कितनी बड़ी बेवकूफ थी कि फर्स्ट ईयर की परीक्षा दे चुकी थी लेकिन फिर भी मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि तमिल और कन्नड़ अलग-अलग होते हैं या दक्षिण भारत में जो भाषाएं बोली जाती हैं वे सभी परस्पर एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। सरोजिनी इस मामले में बहुत चतुर थी। वह भांप गई कि मैं उस लड़के से क्यों बात करवाना चाह रही थी। उसने मुझसे कहा कि उसके मामा कभी किसी कन्नड़ लड़के से मेरा विवाह करना स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए इस बारे में कोई चर्चा मत करना। यानी कुल मिलाकर मैचमेकिंग का मेरा पहला और अंतिम प्रयास ही ध्वस्त हो गया। इसके बाद मैंने तौबा कर ली कि मैं ऐसी बेवकूफ़ी फिर कभी नहीं करूंगी। यद्यपि इससे यह जरूर लाभ हुआ कि मुझे दक्षिण भारत की संस्कृति और भाषा की विविधता के बारे में "प्रैक्टिकल तौर पर" पता चला जिसे बाद में किताबों में पढ़ कर मैंने और गहराई से जाना। तब मुझे यह महसूस हुआ कि हम दक्षिण भारतीयों को सिर्फ "मद्रासी" का संबोधन देकर कितना कम आंकते हैं। दक्षिण भारत में भी सांस्कृतिक विविधता और भाषाई विविधता पाई जाती है जो वहां की सांस्कृतिक समृद्धि की द्योतक है। वस्तुतः इस मैचमेकिंग प्रकरण ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए थे।        
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नवभारत | 21.08. 2022 
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Sunday, August 14, 2022

संस्मरण | तिरंगे पर मेरा वह भाषण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण | नवभारत | 14.08. 2022 
तिरंगे पर मेरा वह भाषण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
          जब मैं बिजुरी (तत्कालीन जिला शहडोल) में अपने मामाजी के पास रह कर ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी तब पता नहीं क्यों स्कूल के शिक्षक मुझे उतनी संज़ीदगी से नहीं लेते थे जितना कि वे ले सकते थे। कारण क्या था पता नहीं। शायद कोएजुकेशन हो कर भी छात्र प्रधान स्कूल में छात्राओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता था। कुछ शिक्षक तो उस ग्रामीण परिवेश से थे जहां लड़कियों की शिक्षा व्यर्थ की चीज मानी जाती थी। दो-चार शिक्षक ऐसे थे जो यह मानते थे कि छात्रों को आटाचक्की और सौदा आदि लाने के लिए भेजा जा सकता है, किन्तु छात्राएं किसी काम की नहीं होती हैं। ऐसे वातावरण में मेरा उसी स्कूल के एक वरिष्ठ शिक्षक की भांजी होना भी कोई मायने नहीं रखता था। वह स्कूल उस गांव का उच्चशिक्षा केन्द्र था और ग्यारहवीं कक्षा सबसे ऊंची कक्षा। स्कूल में एक्स्ट्रा कैरीकुलर नहीं के बराबर था। वहां सिर्फ़ वही दिवस मनाए जाते थे जिनके लिए जिला शिक्षा केन्द्र से कड़क आदेश आते थे। हां, राष्ट्रीय दिवस मनाना तो आवश्यक था ही और वह पूरे जोर-शोर से मनाया जाने वाला था, इस बात का अहसास मुझे तब हुआ जब कक्षा में यह नोटिस पढ़ी गई कि देश के स्वतंत्रता दिवस अर्थात् 15 अगस्त को गीत गायन, कवितापाठ और भाषण इत्यादि होगा।
जहां से मैं बिजुरी पहुंची थी यानी पन्ना के मनहर शासकीय उच्चतर माध्यमिक कन्या विद्यालय से, वहां इससे अधिक कार्यक्रम होते थे। वहां कुर्सी रेस से ले कर सुई-धागा और जलेबी रेस भी होती थी। मगर बिजुरी के उस हायर सेकेन्ड्री स्कूल में समारोही मानसिकता के शिक्षकों की कमी थी। मेरे कमल सिंह मामाजी जैसे एक-दो शिक्षक थे जो समारोह के पक्ष में रहते थे, मगर प्राचार्य उन्हें भी यह कह कर शांत करा दिया करते थे कि ‘‘बच्चों में बूंदी बंटवा दो। एक के बजाए दो-दो पैकेट दे देना। इतना पर्याप्त है। उछलना-कूदना कराना जरूरी नहीं है।’’ वैसे, प्राचार्य खेल-कूद को बुरा नहीं समझते थे किन्तु अनुपयोगी जरूर समझते थे। यदि फिल्मी भाषा में कहा जाए तो यह उनके ‘‘संस्कार में कमी रह गई थी’’।

एक जुलाई को मेरा वहां दाखिला हुआ था और ठीक डेढ़ माह बाद 15 अगस्त आ गया। मैं उस समय तक पन्ना में रहती हुई कविता-कहानी लिखने लगी थी और अख़बारों के साहित्यिक परिशिष्टों में मेरी रचनाएं छपने भी लगी थीं। मगर ट्रेजडी यह थी कि मेरी जो भी रचनाएं छपीं वे रीवा, सतना और जबलपुर से प्रकाशित होने वाले अख़बारों में। अखबारों के वे संस्करण बिजुरी पहुंचते नहीं थे। यदि भूले-भटके उनमें से एकाध संस्करण वहां पहुंच जाता तय था कि मेरे स्कूल के शिक्षक उसे नहीं पढ़ते। क्यों कि अखबार पढ़ने में उनकी कोई रुचि नहीं रहती थी। सारांशतः यह कि वे नहीं जानते थे कि मैं थोड़ा-बहुत लिख लेती हूं और माईक पर अच्छा-खासा बोल लेती हूं। मैं उन दिनों बातूनी नहीं थी लेकिन दर्शक-दीर्घा से मुझे कभी डर नहीं लगा। 
जब 15 अगस्त के कार्यक्रम संबंधी नोटिस कक्षा में घुमाई गई और उसमें प्रस्तुति देने के लिए अपना नाम लिखाने के लिए कहा गया तो मैंने भी चट से अपना दायंा हाथ उठा दिया।

‘‘तुम किसमें भाग लोगी?’’ बाॅटनी वाले सर का पीरियड चल रहा था, सो उन्होंने आश्चर्य भरे स्वर में मुझसे पूछा।
‘‘मैं भाषण दूंगी!’’ मैंने फौरन उत्तर दिया। 
‘‘तुम दे लोगी भाषण? उस दिन दोनों शिफ्ट के टीचर और स्टूडेंट रहेंगे। बहुत भीड़ रहेगी।’’ अविश्वास भरे स्वर में मुझे डराने का प्रयास करते हुए बाॅटनी वाले सर ने मुझसे कहा।
‘‘जी, सर! मुझे अपना नाम लिखाना है।’’ मैं भी अपनी बात पर अड़ी रही। अतः नाम लिखाने की अनुमति सर को देनी ही पड़ी। भाषण के लिए दो विषय दिए गए थे- पहला विषय था ‘स्वतंत्रता दिवस’ और दूसरा विषय था ‘हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा’। मैं समझ गई थी कि स्वतंत्रता दिवस आसान विषय है इसलिए अधिकांश प्रतिभागी उसी पर बोलेंगे। इसलिए मैंने ‘ हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा’ के विषय को चुना। उन दिनों न तो इंटरनेट था और न फोन सुविधा कि मैं फोन पर बात कर के मां या वर्षा दीदी से सहायता ले लेती या नेट पर जानकारी सर्च कर लेती। नाम लिखाने की घटना 12 अगस्त की थी। मेरे पास मात्र दो दिन थे तैयारी करने के लिए। शाम को मामाजी जब स्कूल से घर लौटे तो मैंने उन्हें बताया। मेरी बात सुन कर वे चिंतित हो उठे,‘‘वो पहला वाला विषय ठीक था। अब इसकी विस्तृत जानकारी कहां जुटाओगी?’’
‘‘कल स्कूल के बाद पुस्तकालय में रुक जाऊंगी। आप भी तब तक आ ही जाएंगे, तो कल मुझे एक-दो किताबें दो दिन के लिए दिला दीजिएगा।’’ मैंने मामाजी से कहा। मामाजी राजी हो गए। इसमें कोई संदेह नहीं कि बिजुरी के उस हायरसेकेंड्री स्कूल का वह पुस्तकालय बहुत सम्पन्न था। वहीं मैंने मीगुएल डी सर्वेंटीज़ की ‘डाॅन क्विकजोट’, चाल्र्स डिकेंस की ‘डेविड काॅपर फील्ड’, विलियम शेक्सपियर का नाटक ‘मर्चेंट आॅफ वेनिस’, जाॅन आफॅ आर्क की जीवनी, जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘चंद्रगुप्त’ और समुद्रगुप्त’ आदि पढ़े थे। तो, दूसरे दिन मैं पुस्तकालय पहुंची। एक मध्यम आकार के कमरे में दस-बारह लोहे की आलमारियों वाला वह पुस्तकालय। उस दिन मामाजी ज़रा जल्दी स्कूल आ गए थे और उन्होंने मुझे किताब ढूंढने में मदद की। मैं किताबें ले कर घर आ गई और मामाजी अपनी दोपहर वाली शिफ्ट में वहीं रुक गए। इसके बाद दो दिन में मैंने अपने राष्ट्रीय ध्वज के बारे में सब कुछ कंठस्थ कर लिया। केमिस्ट्री और अल्जेबरा के कुछ फार्मूलों को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो मेरी यादाश्त अच्छी थी।

स्वतंत्रता दिवस का समारोह शुरू हुआ। ध्वजारोहण और प्राचार्य सहित शिक्षकों के भाषणों के उपरांत छात्र-छात्राओं की बारी आई। मैं अपना नाम पुकारे जाने की प्रतीक्षा करती रही। लम्बी प्रतीक्षा के बाद सबसे अंत में मेरा नाम पुकारा गया। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था अतः मैंने और अधिक जोश में भर कर एक सांस में तिरंगे का पूरा इतिहास सुना डाला। वहां उपस्थित सभी लोग चकित रह गए। विशेष रूप से वे शिक्षक महोदय जिन्हें मुझ पर विश्वास नहीं था। उन्हें डर था कि मैं भाषण नहीं दे सकूंगी। भीड़ देख कर डर जाऊंगी। इसीलिए उन्होंने मेरा नाम सबसे अंत में रखा था ताकि कार्यक्रम न बिगड़े, और शायद तब तक मैं मैदान छोड़ कर भाग जाऊं। उन्हें पता नहीं था कि मैं मैदान छोड़ने वालों में से नहीं हूं। इससे पहले वाले स्कूल में मैं तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में ईनाम भी जीत चुकी थी। ‘हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा’ के उस भाषण ने स्कूल में मेरी धाक जमा दी। इसके बाद पूरे साल किसी ने मेरी भाषण देने की क्षमता पर संदेह नहीं किया। 

आज ‘‘हर घर तिरंगा’’ अभियान में सहभागी होते हुए बार-बार मुझे यह घटना याद आ जाती है कि तिरंगे के साथ मेरा मात्र नागरिक संबंध नहीं, वरन् बचपन का निजी संबंध भी है।     
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Sunday, August 7, 2022

संस्मरण | भय की पहली लहर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

आज नवभारत मेंं 07.08. 2022 को प्रकाशित ....
संस्मरण 
भय की पहली लहर
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        उन दिनों तत्कालीन जिला शहडोल के बिजुरी ग्राम में अपने मामा कमल सिंह चौहान जी के साथ रह कर ग्यारहवीं कक्षा की पढाई कर रही थी। वह काॅलरी एरिया था। बिजुरी ग्राम से कहीं अधिक बड़ी, सुव्यवस्थित काॅलोनी थी काॅलरी की। कोयला खदान में विभिन्न पदों पर काम करने वाले कर्मचारी मामाजी के मित्र थे। बिजुरी गांव और बिजुरी काॅलरी के बीच छोटे-छोटे कुछ खेत थे और खेतों के बीच एक लगभग चैकोर तालाब था। उस तालाब और खेत के बीच मेंड़नुमा पतला रास्ता था। उस रास्ते से हो कर ही मैं और मामाजी काॅलरी काॅलोनी जाया करते थे। शाम को तालाब में मेंढकों के टर्राने की आवाज़ें सुनाई देती थीं। पन्ना में तो ऐसे कच्चे तालाब थे नहीं। वहां तो बेहतरीन घाटों वाले तालाब थे। इसलिए वहां इस तरह मेंढकों की आवाज़ें कभी नहीं सुनी थीं। यह मेरे लिए नया अनुभव था। यद्यपि अभी कई नए अनुभव भविष्य की ओट में छिप कर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ अच्छे, कुछ बुरे। 
एक नया अनुभव यह भी था कि गांव के अधिकांश घरों की तरह मामाजी के घर में भी बिजली का कनेक्शन नहीं था। जीवन में पहली बार पूरे साल भर मैंने लालटेन में पढ़ाई की। किराए का घर था वह। एक बखरी जैसी जगह में। बखरी यानी जिसके चारों ओर घर बने हुए थे और बीच में बागीचा, कुंआ और बड़ा-सा आंगन था। बखरी के किसी भी घर में स्नानघर नहीं था यद्यपि देसी टाॅयलेट था। सुबह भोजन बनाने से पहले महिलाएं कुए पर जा कर नहा लेतीं और उनके बाद पुरुषवर्ग कुए पर जा कर नहाता। मगर मैंने अपने जीवन में कभी खुले में नहीं नहाया था। मामाजी जानते थे कि मैं कुए पर नहीं नहाऊंगी, इसलिए उन्होंने मेरे वहां पहुंचने से पहले ही पीछे के आंगन में बांस की टटियो और चादर से ढंका हुआ एक कच्चा बाथरूम बनवा दिया था। यद्यपि उस पर छत नहीं थी लेकिन वहां पास में कोई दुमंज़िला मकान भी नहीं था। कच्चे बाथरूम में नहाने का भी मेरा पहला अनुभव था। 
मेरे घर से सटा हुआ जो घर था उसमें एक सिंधी परिवार रहता था। काॅलरी क्षेत्र में उनका छोटा-सा जरनल स्टोर था। शायद पंजवानी सरनेम था। मामाजी ने बताया था कि उन पंजवानी अंकल का मन काम में नहीं लगता था, उन्हें जुआ खेलने की लत लग गई थी। लेकिन उनकी पत्नी जिन्हें मैं आंटी कह कर पुकारती थी। खाना पकाने में निपुण थीं। सिंधी स्टाईल की कमल-ककड़ी की सब्ज़ी उन्हीं के यहां पहली बार मैंने खाई थी और मैं उनकी बनाई उस सब्ज़ी की दीवानी हो गई थी। वे जब भी कमल-ककड़ी की सब्ज़ी बनती, मुझे जरूर खिलातीं। उन्हें मुझसे बहुत स्नेह था। जल्दी ही उन्हें दूकान बेच कर बिजुरी से जाना पड़ा। उनका जाना मुझे बहुत अखरा था। लेकिन उनके बाद जो किराएदार आए उनसे मेरी बहुत जल्दी पटरी बैठ गई। 
नए किराएदार मामाजी के परिचित थे। काॅलरी में रहते थे। उनकी पत्नी का मन काॅलोनी में नहीं लगा। इसलिए उन्हें जैसे ही मामाजी से हमारे पड़ोस वाले घर का पता चला। उन्होंने उसे किराए पर ले लिया। उनकी आयु अधिक नहीं थी। फिर भी विवाह हुए चार-पांच साल हो गए थे और उनके कोई बच्चे नहीं थे। मैं उन्हें भी अंकल-आंटी कहती थी। वे लोग रीवा के पास के किसी गांव के रहने वाले थे। परिहार सरनेम था उनका। आंटी से मेरी बहुत जल्दी दोस्ती हो गई। वे भी मुझे बहुत चाहती थीं। जब-तब दुनियादारी भी समझाती रहती थीं। जिनमें वे बातें भी होती थीं जिनकी मां ने मुझसे कभी चर्चा नहीं की थी। शायद मेरे थोड़ी और बड़ी होने पर चर्चा करतीं, लेकिन आंटी के ग्रामीण नज़रिए से तो मैं बड़ी हो चुकी थी और मुझे चैकन्ना रहना सीख लेना चाहिए था। यद्यपि उनकी इस तरह की बातें मेरे सिर के ऊपर से गुज़र जातीं। सिर्फ़ तीन साल छोड़ कर मैं बचपन से कोएजुकेशन में पढ़ी थी। बिजुरी में भी को-एजुकेशन था। इसलिए लड़कों को ले कर मेरे मन में एक मित्रवत खिलंदड़ापन ही रहा और कभी कोई ऊटपटांग भावना नहीं जगी। 
लगभग आधा साल गुज़र गया था। बोर्ड की परीक्षाओं का सेंटर बिजुरी के बजाए कोतमा में रहता था। मामाजी सीनियर टीचर थे अतः बोर्ड के काम के लिए प्रिंसिपल उन्हें ही कोतमा और शहडोल भेजा करते थे। उन्हीं दिनों एक नए टीचर मामाजी वाली शिफ्ट में कहीं से ट्रांसफर हो कर आए। उन्होंने गंाव में एक कमरा किराए पर ले लिया था। एक दिन मामाजी ने उन्हें खाने पर घर बुलाया। वे आए हम तीनों ने साथ खाना खाया। वे मुझसे मेरी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। मामाजी से बोले कि ‘‘यदि शरद को जरूरत हो तो मैं फ्री में ट्यूशन पढ़ा दूंगा।’’ मामाजी ने उन्हें बता दिया कि इसे ट्यूशन पढ़ना पसंद ही नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि उन्हें रात को खाना खाने के बाद दूध पीने की आदत है और घर में दूध ले कर रखने, गरम करने की सुविधा नहीं है। इस पर मामाजी ने कहा कि ‘‘कोई बात नहीं, दूधवाले से कह देना कि हमारे घर दे जाया करे। दोपहर में शरद आ जाती है। गरम कर के रख दिया करेगी। शाम को मेरे आने के बाद तुम ले जाया करना।’’ वे मान गए।
कुछ दिन बाद मामाजी को स्कूल के किसी काम से शहडोल जाना पड़ा। उन्होंने मुझे समझाया कि जब वे सर आएं तो दरवाजे से ही उन्हें दूध का डिब्बा पकड़ा देना और दरवाज़ा बंद कर के रखना। बस, एक ही दिन की बात थी। परिहार अंकल जरूर बारह घंटे की ड्यूटी पर चले जाया करते थे। वे आठ घंटे की ड्यूटी और चार घंटे ओवरटाईम करते थे। मगर आंटी पूरे समय घर पर रहती थीं। इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं थी। जब शाम हुई तो वे सरजी घर आए। मैंने दरवाजा खोला और दूध का डिब्बा लेने अंदर वाले कमरे में आई और जब पलट कर देखा तो वे पहले कमरे में कुर्सी पर आलथी-पालथी मार कर बैठे दिखाई दिए। दो कमरे का छोटा-सा घर था। एक दरवाज़ा बाहर सड़क पर खुलता था जिससे सरजी कमरे में पधार गए थे और दूसरा दरवाज़ा पीछे वाले आंगन की तरफ था जहां परिहार आंटी के घर का भी पिछला दरवाज़ा था। मैंने सरजी को दूध का डिब्बा दिया तो वे अजीब दृष्टि से मुझे देखने लगे। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन कहते है न, कि लड़कियों और महिलाओं में सिक्स्थ सेंस होती है। मुझे अचानक डर-सा लगने लगा। फिर भी मैंने हिम्मत करके कहा कि ‘‘सर! मामाजी ने कहा है कि दरवाज़ा बंद कर के रहना, तो आप जाइए, मुझे दरवाज़ा बंद करना है।’’
‘‘ठीक है पानी पिला दो।’’ सरजी ने कहा। मेरे मन में अज्ञात भय बढ़ गया। अब मुझे रहा नहीं गया और मैं पानी लाने के बहाने भीतर दूसरे कमरे से होती हुई सीधे परिहार आंटी के पास पहुंची और उन्हें सारा हाल बताया। ‘‘ठीक है, चलो! मैं देखती हूं।’’ उन्होंने कहा और वे मेरे साथ मेरे घर पहुंची और ऊंची आवाज में बोलीं,‘‘बिटिया, चलो अपने सरजी को पानी दे दो। फिर मेरे घर चलो। तुम्हारे अंकल आने वाले हैं। उनकी छुटटी का टाईम हो गया है।’’ आंटी ने चतुराई से काम लिया था क्योंकि अंकल रात दस बजे के पहले आने वाले नहीं थे, पर सरजी यह थोड़े ही पता था। आंटी की बात सुन कर सरजी ने दूध का डिब्बा उठाया और बिना पानी पिए ही वहां से दफ़ा हो गए। 
आज जब मैं ‘‘गुड टच और बेड टच’’ की शिक्षा के बारे में सुनती हूं तो मुझे लगता है कि हर बच्चे में सिक्स्थ सेंस होती है। बस, जरूरत होती है किसी ऐसे बड़े की जिससे समय रहते वह खुल कर बात कर सके और मदद ले सके। मुझे परिहार आंटी के रूप में एक ऐसी ही अघोषित अभिभावक मिल गई थीं जिन्होंने जीवन का पहला पाठ पढ़ने और भय की पहली लहर को समझने में मदद की। मेरे सिक्स्थ सेंस को जाने-अनजाने उन्हीं ने जगाया था जिससे मैं उन सरजी की कुभावना को एक अनजाने भय के रूप में ताड़ गई। वे आंटी अब कहां हैं, मैं नहीं जानती। लेकिन मेरे जीवन और मेरी आत्मरक्षा की दृढ़ता में उनका योगदान मैं कभी भुला नहीं सकती हूं।                
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Monday, August 1, 2022

संस्मरण | वह मेंढक राजकुमार नहीं था | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण : 
वह मेंढक राजकुमार नहीं था
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
           बचपन में मेंढकों की अनेक कहानियां सुनी थीं। कुएं के मेंढक से ले कर मेंढक राजकुमार और मेंढकी राजकुमारी तक की कहानियां। मुझे भी अपने जीवन में एक ऐसा मेंढक मिला जिसने मेरा हृदय परिवर्तन कर दिया और मेरे जीवन की दिशा ही मोड़ दी। वह मेंढक ही था, ख़ालिस मेंढक, कोई राजकुमार-वाजकुमार नहीं। लेकिन उसने यह बता दिया कि मैं क्या कर सकती हूं और क्या नहीं। यह भी कि मेरी सहन शक्ति कितनी है। घबराइए नहीं, मेंढक कोई काटने वाला प्राणी नहीं होता है। उसने मुझे कष्ट दे कर मेरी सहन शक्ति की पैमाइश नहीं की, वह तो खुद ही कष्ट में था। 
बात उस समय की है जब मैं शहडोल जिले के बिजुरी गांव में अपने मामाजी कमल सिंह चौहान के पास एक साल के लिए रहने गई थी। दरअसल, उन दिनों मामा जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। वैसे कोई गंभीर बात नहीं थी लेकिन मेरी मां का बहनापा यह मानने को तैयार नहीं था कि उनके छोटा भाई पीलिया से ठीक होने के बाद की कमजोरी की अवस्था में अकेला रहे। मेरी वर्षा दीदी उस समय काॅलेज में पढ़ रही थीं और बिजुरी में काॅलेज नहीं था। इसलिए उनका मामाजी के पास रहना संभव नहीं था। मां स्वयं व्याख्याता थीं अतः उन्हें लम्बी छुट्टी नहीं मिल सकती थी। उन दिनों मेरे नानाजी संत श्यामचरण सिंह जीवित थे और हम लोगों के साथ ही रहते थे मगर वे  मोतियाबिंद ग्रस्त थे अतः उन्हें खुद सहारे की ज़रूरत पड़ती थी। यानी कुल मिला कर मैं ही थी जिसका 11वीं कक्षा में दाखिला होना था और बिजुरी में आदिमजाति विभाग द्वारा संचालित एकमात्र उच्चतर माध्यमिक विद्यालय था, जिसमें साईंस और आर्ट दोनों के विषय पढाए जाते थे। वर्षा दीदी ने बायोलाॅजी ग्रुप चुना था ताकि वे आगे चल कर डाॅक्टरी की पढ़ाई कर सकें। किन्तु एमबीबीएस डाॅक्टर बनना उनके भाग्य में नहीं था। जैसा कि मैंने घर में बड़ों को चर्चा करते सुन रखा था कि उन दिनों मेडिकल काॅलेज में दाखिले के लिए बहुत मोटी रकम देनी पड़ती थी, मां के लिए उतनी रकम दे पाना संभव नहीं हुआ और दीदी ने एमबीबीएस के बजाए बाॅटनी में एमएससी की ओर कदम बढ़ा दिए। लेकिन दीदी की किताबें, प्रैक्टिकल फाईल्स, उनका सोबर एटीट्यूड देख कर मुझे भी साईंस स्टूडेंट बनने का भूत सवार हो गया था। उन दिनों 9 वीं कक्षा से ही फैकल्टी और ग्रुप तय हो जाते थे। मैंने भी नौवीं से साईंस में बायो ग्रुप ले रखा था। वैसे भी मैथ्स तो मेरी आज भी बेहद कमजोर है। मैथ्स में मुझे रेखागणित ही सबसे अच्छी लगती थी, वरना मैं अंक गणित के बारे में सोचा करती थी कि यह भी कोई सवाल हुआ कि सौ लीटर वाली एक टंकी को एक नल एक घंटे में भर रहा है और दूसरा नल सवा घंटे में खाली कर रहा है तो एक घंटे बाद टंकी में कितना पानी बचेगा? कुल मिला कर यह बकवास सवाल था मेरी दृष्टि में। 
मुझे बायोग्रुप में बाॅटनी, जूलाॅजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री चारो अच्छे लगते थे। ड्राईंग में मुझे बचपन से रुचि थी इसलिए मेरी प्रैक्टिकल फाईल में सबसे बेहतरीन ड्राइंग रहती थी। बस, अपनी ख़राब रायटिंग के कारण लेबलिंग में मुझे अधिक समय खपाना पड़ता था। उन दिनों आमतौर पर 11 वीं कक्षा से ही जूलाॅजी के प्रैक्टिकल की शुरूआत होती थी। लगभग आधा सिलेबस हो जाने पर एक दिन जूलाॅजी वाले सर ने कक्षा में घोषणा की कि अगले दिन डिसेक्शन कराया जाएगा। सभी लोग मेंढक की एनाॅटामी के बारे में अच्छी तरह से पढ़ कर आएं। यह सुन कर मुझे बड़ा मजा आया क्यों कि मुझे मेंढक की एनाॅटामी लगभग कंठस्थ थी। मैंने मेंढक की रक्तवाहिनियों, स्नायुतंत्र और अस्थियों के अनेक चित्र अपनी प्रैक्टिकल फाईल में सजा-सजा कर बनाए थे। उन दिनों मोबाईल तो दूर, फोन की सुविधा भी नगरसेठ के घर या थाने में ही थी, वरना मैं उसी समय वर्षा दीदी को फोन कर के बताती कि कल मैं भी डिसेक्शन करने वाली हूं। मैं भी डिसेक्शन करूंगी, यह सोच-सोच कर खुद को किसी बड़े साईंटिस्ट से कम नहीं समझ रही थी। मेरी कक्षाएं सुबह की शिफ्ट में लगती थीं औैर मामाजी की ड्यूटी दोपहर की शिफ्ट में रहती थी। हम लोग रास्ते में ही आपस में मिलते थे, जहां बता पाना उचित नहीं था। इसलिए उन्हें यह खुशख़बरी देने के लिए मुझे शाम पांच बजे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 
जैसे-तैसे दूसरा दिन आया। मुझे जूलाॅजी के पीरियड का बेसब्री से इंतज़ार था। अंततः वह पीरियड भी आ गया। सर हम सभी छात्र-छात्राओं को, यानी साईंस पढ़ने वाले कुल जमा सात स्टूडेंट्स में छः छात्र और अकेली मैं छात्रा थी, हम सभी को लेकर प्रयोगशाला पहुचें। वह स्कूल की एकमात्र प्रयोगशाला थी जिसमें बाॅटनी, जूलाॅजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री चारो की एक-एक आलमारियां थीं और चारो विषयों के प्रैक्टिकल उसी कक्ष में हुआ करते थे।
प्रयोगशाला में टेबल पर अलग-अलग सात डिसेक्शन ट्रे रखी गई थीं। हम सर के निर्देशानुसार अपनी-अपनी ट्रे के सामने खड़े हो गए। ट्रे के बाजू में डिसेक्शन की कैंची, छुरी, कांटें, पिन्स आदि रखे हुए थे। सर एक बड़ी-सी बाल्टी ले कर आए जिसमें अर्द्धबेहोश मेंढक थे। सर ने कहा कि हम उनमें से एक-एक मेंढक उठाएं और अपनी-अपनी ट्रे में उसकी चारों टांगें पिन से टांक दें। मेंढक को नंगे हाथों से पकड़ना? उफ! ईईई! मेरी हिम्मत नहीं हुई। सर ने आंखें तरेरते हुए आदेश दिया कि ‘‘चलो उठाओ मेंढक! डिसेक्शन करना है या नहीं?’’
‘‘करना है!’’ मैंने मरे हुए स्वर में उत्तर दिया। उस समय के अनुभव को बयान कर पाना कठिन है कि मैंने कैसे मेंढक को अपने नंगे हाथों से उठा कर ट्रे में पिन किया। मुझे लगा कि इस तरह पिन करने से उसे दर्द होगा। मैंने यह बात सर से कह दी। तो उन्होंने उत्तर दिया कि अभी तो उसे चीरा लगा कर काटना है और उसके अंदर के अवयव देखना है। यह सब मेरे लिए भयानक अनुभव था। लेकिन असली टेज़ड्री तो अभी होनी बाकी थी। 
सर ने मेंढक को चीरा लगाने का तरीका बताया। यह इतनी सावधानी से करना था कि उसकी स्किन भर कटे, कोई नस न कटे। मगर मैं तो पहले से ही नर्वस थी। मेंढक की नस क्या मैं अपनी नस पर भी चाकू चला सकती थी। कांपते हाथों से मैंने चीरा लगाया। फिर वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। पूरी ट्रे मेंढक के रक्त से भर गई। मैंने उसकी कोई नस काट दी थी। इसके बाद तो मेरा सिर चकराने लगा। सर, ने मुझे डांटा या समझाया मुझे याद नहीं। इतना याद है कि उन्होंने मुझे जा कर कक्षा में बैठने को कहा और साथ ही यह भी कि ‘‘कोई बात नहीं, कल फिर से ट्राई करना।’’
पता नहीं कितनी देर बाद मैं स्थिरचित्त हो पाई। घर लौटने पर मैंने अपने दोनों हाथ साबुन घिस-घिस कर, रगड़-रगड़ कर धोए। मगर मेंढक की वह छुवन तो मानो मेरी उंगलियों और हथेलियों में चिपक गई थी। दो-तीन दिन तक मुझसे ढंग से खाना नहीं खाया गया। रह-रह कर रक्त भरी ट्रे और उसमें मौजूद चीरा लगा मेंढक मुझे दिखाई देता था। इस घटना के बाद मैंने जान लिया कि जूलाॅजी की थ्योरी तो मैं पढ़ सकती हूं लेकिन प्रैक्टिल करने का कलेजा मेरे पास नहीं है। मैंने तय कर लिया कि 11वीं उत्तीर्ण होते ही जूलाॅजी छोड़ दूंगी। इस तरह उस मेंढक ने अपनी जान देकर मुझे मेरी हक़ीकत से परिचित करा दिया कि मैं चीरा-फाड़ी, रक्तपात देख ही नहीं सकती हूं। यह मेरे वश का नहीं है। इधर केमिस्ट्री वाले सर के जबरिया ट्यूशन फंडे के कारण केमिस्ट्री से अरुचि हो ही चली थी और अब जूलाॅजी से सन्यास की भावना जाग उठी। अतः काॅलेज में पहुंच कर साईंस से अलगाव होना तय था। काॅलेज पहुंचते ही मैं एक उम्दा आर्ट स्टूडेंट बन गई। शरारती, खिलंदड़ी और मनमौजी। अब इतिहास की किताबों में रक्तपात था, मेरी आंखों के सामने नहीं और न मेरे हाथों से। वह मेंढक राजकुमार नहीं था लेकिन मेरा हृदय परिवर्तन और विषय परिवर्तन दोनों करा गया।           
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धन्यवाद #नवभारत 🙏
31.07.2022
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Sunday, July 24, 2022

संस्मरण | पढ़ाई का भंवरजाल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण
पढ़ाई का भंवरजाल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
       बचपन से ही मैं पढ़ाई में अच्छी रही। फिर भी समूचे स्कूली जीवनकाल में  पांच बार मुझे सज़ा मिली, वह भी मात्र दो विषयों में। उस जमाने में जब मुझे सज़ा मिली थी, तब भी मुझे लगा था कि मुझे ग़लत सज़ा दी जा रही है और आज मैं जब उन घटनाओं के बारे में सोचती हूं तो मुझे और अधिक विश्वास हो जाता है कि मुझे ग़लत सज़ा दी गई थी।  उन सज़ाओं के पीछे दोष मेरा नहीं बल्कि एक मामले में शिक्षक की शिक्षण शैली का दोष था तो दूसरे मामले में शिक्षक की धन-लिप्सा का दोष था। 
चलिए विस्तार से बताती हूं। बात उन दिनों की है, जब मैं आठवीं कक्षा की छात्रा थी। उन दिनों आठवीं कक्षा तक संस्कृत एक अनिवार्य विषय के रूप में था। संस्कृत की मेरी जो शिक्षिका थीं वे महाराष्ट्रीयन थीं। संस्कृत पर उनकी बड़ी अच्छी पकड़ थी। मां उनकी बहुत तारीफ करती थीं। लेकिन उनकी शिक्षण शैली बहुत भयानक थी। किसी भी भाषा को कभी रट कर नहीं सीखा जा सकता है। लेकिन वे संस्कृत के श्लोक रट कर आने को कहती थीं, साथ ही रूप, धातु आदि भी रटने का होमवर्क दिया करती थी। यानी रामौ, रामा, रामाभ्याम.. हमें रट कर स्कूल पहुंचना पड़ता था। फिर जब मेडम कक्षा में आतीं तो एक-एक छात्रा को खड़ी कर के उनसे रूप, धातु आदि सुनाने को कहतीं। जिन छात्राओं की स्मरण शक्ति तेज थी, वे धाराप्रवाह सब कुछ सुना दिया करती थीं लेकिन मेरी जैसी छात्राएं जो किसी भी विषय को बिना समझे याद रख पाने में कच्ची थीं, गड़बड़ा जातीं। जो भी रूप और धातु सुनाने में अटक जाता उसको  खड़े रहने की सज़ा मिलती। मैं भी सुनाते-सुनाते भूल जाती थी लिहाज़ा मुझे भी कुल 4 बार सज़ा भुगतनी पड़ी। यह मेरे लिए दुखद था। क्योंकि मेरी समस्या सज़ा पाकर ख़त्म हो जाने वाली नहीं थी। मैं उसी स्कूल में पढ़ रही थी, जहां मां व्याख्याता थीं। संस्कृत वाली टीचर मुझे तो सज़ा देतीं ही और कक्षा के बाद जाकर मां से शिक़ायत कर देती थीं कि - आपकी लड़की का मन नहीं लगता है पढ़ने में। आज भी वह धातु याद करके नहीं आई, आदि-आदि। सो, मुझे कक्षा में तो सज़ा मिलती ही, साथ ही घर में भी डांट खाने की नौबत आ जाती।
      इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मुझे संस्कृत भाषा से चिढ़ होने लगी और मैं इस बात की प्रतीक्षा करने लगी कि कब आठवीं कक्षा पास कर लूं और इस संस्कृत भाषा से मेरा पीछा छूट जाए। नौवीं कक्षा से संस्कृत और अंग्रेजी दो  ऐच्छिक (ऑप्शनल) विषय थे, इनमें से कोई भी एक चुना जा सकता था। ज़ाहिर है कि नौवीं कक्षा में पहुंचते ही मैंने संस्कृत को अलविदा कह दिया। इसके कई वर्षों बाद जब मैं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व  विषय में एम.ए. कर रही थी तब मुझे पालि और संस्कृत भाषाओं के प्राचीन लेखों को पढ़ने की आवश्यकता पड़ी। तब मैंने संस्कृत के व्याकरण को समझने का प्रयास किया। मुझे महसूस हुआ कि यह भाषा न तो बहुत कठिन है और न भयानक है जैसी कि मुझे स्कूल के जमाने में लगी थी। यदि इसके  व्याकरण को उस जमाने में समझा-समझा कर पढ़ाया गया होता तो मुझे संस्कृत से पहले ही प्रेम हो गया होता। यद्यपि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मैं आज संस्कृत में पारंगत हो गई हूं लेकिन आज मेरे मन में संस्कृत के प्रति चिढ़ नहीं बल्कि बहुत सम्मान है।
      स्कूल में सज़ा पाने की दूसरी घटना है उस समय की, जब मैं अपने मामा जी कमल सिंह चौहान के पास तत्कालीन शहडोल जिले के कोल माइंस एरिया बिजुरी के सरकारी स्कूल में 11वीं कक्षा के छात्रा थी। मेरी त्रासदी यह थी कि इस स्कूल में मामा जी व्याख्याता थे। यानी जो शिक़ायत के ख़तरे पन्ना में मेरे लिए थे वही ख़तरे बिजुरी में भी थे। अतः मैं मन लगाकर पढ़ाई करती और ऐसा अवसर नहीं आने देती कि मेरे टीचर को मेरी शिक़ायत करने का मौका मिले। चूंकि मेरी वर्षा दीदी बायो ग्रुप से पढ़ रही थीं इसलिए मैंने भी जोश में आकर बायो ग्रुप ले रखा था, जिसमें बॉटनी, जूलॉजी, केमिस्ट्री, फिजिक्स के साथ अंग्रेजी और हिंदी भाषाएं हुआ करती थीं। हम लोगों के केमिस्ट्री वाले टीचर  केमिस्ट्री के बहुत अच्छे जानकार थे लेकिन अफ़सोस कि वे धनलिप्सा से पीड़ित थे। उन दिनों कोचिंग सेंटर्स नहीं होते थे बल्कि शिक्षक घर पर ट्यूशन पढ़ाते थे। देखा जाए तो यह कोचिंग सेंटर का आरंभिक संस्करण था। केमिस्ट्री वाले सर चाहते थे कि मैं भी उनके घर ट्यूशन के लिए पहुंचा करूं, जबकि मुझे ट्यूशन पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। मुझे स्वाध्याय अच्छा लगता था। विषय को समझने और याद रखने का मैंने अपना मौलिक तरीका ढूंढ निकाला था। मैं केमिस्ट्री के फार्मूले भी लिख-लिख कर याद करती थी। इससे होता है यह था कि जब मुझे कोई फार्मूला भूलने लगता था तो मैं उस लिखे हुए कागज का ध्यान करती थी और मुझे वह लिखावट याद आ जाती, जिससे पूरा फार्मूला याद आ जाता था। मेरा यह तरीक़ा सिर्फ केमिस्ट्री के लिए नहीं बल्कि सभी विषयों पर कारगर था। मैंने इसी तरह से इतिहास की तारीखों को भी क्रमबद्ध तरीके से याद रखा और वे तारीखें आज भी मुझे अच्छी तरह याद है। जबकि इतिहास के लिए यह माना जाता है कि- रात भर पढ़ा और सवेरे सफा।
       तो मैं बता रही थी कि उन केमिस्ट्री वाले टीचर ने  पहले तो कक्षा में मुझे डांटना शुरू किया और फिर बात-बात में इस बात का सुझाव देने लगे कि तुम्हें ट्यूशन की जरूरत है। तुम अगर ट्यूशन नहीं पढ़ोगी तो फेल हो जाओगी। उस पर प्रैक्टिकल में भी बहुत बुरे नंबर आएंगे ।जब उन्होंने देखा कि उनकी बातों का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ रहा है तो एक दिन उन्होंने मुझसे एक फार्मूला पूछा। चूंकि उसके पिछले दिन में स्कूल नहीं गई थी इसलिए मुझे पता नहीं था कि उस दिन वह फार्मूला याद करके कक्षा में सुनाना है। यदि मुझे पता होता तो मैं निश्चित रूप से याद करके पहुंचती। दुर्भाग्य से उस कक्षा में साइंस के कुल 7 विद्यार्थी थे जिसमें 6 लड़के थे और मैं अकेली छात्रा थी अतः मेरे कोई सहेली भी नहीं थी जो मुझे इस होमवर्क के बारे में बताती। सर तो मानो बहाना ही ढूंढ रहे थे। उन्होंने मुझसे फर्मूला पूछा। मैं नहीं बता सकी। यद्यपि मैंने उनसे कहा कि मुझे नहीं मालूम था क्योंकि मैं कल स्कूल नहीं आई थी। मेरी बात सुनकर सर बिगड़ उठे और अपना गुस्सा प्रकट करते हुए मुझसे कहने लगे कि- अगर तुम ट्यूशन में आती होतीं तो तुम्हें पता रहता कि क्या होमवर्क दिया गया है? अब चलो, अपना हाथ आगे करो! मैंने डरते- डरते अपना दायां हाथ आगे कर दिया। सर ने स्केल से मेरी हथेली पर प्रहार किया। चोट लगने का दर्द इतना अधिक नहीं था जितना कि गलत सज़ा मिलने का दर्द था। मेरी आंखों में आंसू आ गए। यद्यपि मैं रोई नहीं। क्योंकि मैं लड़कों के सामने रोना नहीं चाहती थी। लेकिन मैं इस बात से डर गई कि यदि केमिस्ट्री वाले सर इसी तरह नाराज़ रहे तो निश्चित रूप से प्रैक्टिकल में मेरे नंबर काट लेंगे या शायद मुझे फेल ही कर दें। अतः घर लौटने पर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने मामा जी को सारी बात बताई। तब मामा जी ने केमिस्ट्री वाले सर से चर्चा की और उन्हें स्पष्ट शब्दों में समझा दिया कि मेरी भांजी आपके पास ट्यूशन पढ़ने अगर नहीं आना चाहती है तो वह नहीं आएगी और इसके बदले आप उसे किसी प्रकार की सज़ा देने के बारे में सोचिएगा भी नहीं। हां, यदि वह पढ़ने में गड़बड़ी करें तो भले दंडित करिए लेकिन ट्यूशन के नाम पर दंड देने का विचार मन में मत लाइएगा।
     केमिस्ट्री वाले सर मामा जी की बात समझ गए और इसके बाद उनका मेरे प्रति रवैया सुधर गया। लेकिन इस घटना से हुआ यह कि मुझे साइंस के शिक्षकों से ही नफ़रत होने लगी। मुझे लगा कि ये लोग ट्यूशन और प्रैक्टिकल के नंबरों के नाम पर छात्रों पर अनावश्यक दबाव डालते हैं अतः 11वीं बोर्ड की कक्षा के बाद कॉलेज में दाखिला लेने के समय मैंने अपनी फैकल्टी ही बदल ली। मैं साइंस स्टूडेंट से आर्ट स्टूडेंट बन गई। यद्यपि इसके पीछे एक कारण और भी था जो ज़रा हास्यास्पद था, जिसकी चर्चा फिर कभी करूंगी लेकिन यदि साइंस के शिक्षकों का ट्यूशन और प्रैक्टिकल वाला दबाव न होता तो शायद मैं साइंस छोड़ने पर विचार न करती।
       यह कहा जाता है कि गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है लेकिन गुरु विद्वान होते हुए भी यदि उचित शिक्षण पद्धति काम में न लाएं तब भी ज्ञान प्राप्त करना मुश्क़िल होता है और इसका जीता-जागता अनुभव मेरा स्वयं का रहा है। काश! उस संस्कृत टीचर ने सही ढंग से संस्कृत पढ़ाई होती, काश! उस केमिस्ट्री टीचर ने लालच किए बिना केमिस्ट्री पढ़ाई होती है तो मैं इन दोनों विषयों से मुंह न मोड़ती। यह शिक्षक ही होता है जो शिक्षा को रोचक और उपयोगी बना सकता है अथवा उसे भंवर जाल में तब्दील कर सकता है।             
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नवभारत | 24.07.2022  
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Sunday, July 17, 2022

संस्मरण | चवन्नी चर्चा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण
चवन्नी चर्चा
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
             बिटकाईन करेंसी के जमाने में चवन्नी-अठन्नी की चर्चा किसी परिकथा से कम नहीं लगती। जब इन सिक्कों को याद करो तो ऐसा अनुभव होता है मानो इन सिक्कों का चलन में पाया जाना कई सदी पहले की बात हो। जबकि यही चवन्नी हमारा चमकीला जेब खर्च थी। चार आने का एक सिक्का चवन्नी कहलाता था। चवन्नी का सिक्का उपलब्ध न होने पर दस पैसे के दो सिक्के और पांच पैसे का एक सिक्का भी चवन्नी की श्रेणी में आता था। लगभग दो-ढाई फुट की ऊंचाई वाली छोटी बच्ची के लिए यह पर्याप्त रकम हुआ करती थी। वह बच्ची यानी मैं।
       उस समय ‘‘चवन्नियां फिंकती’’ थीं। आज तो ‘‘चवन्नी फिंकना’’ लुप्त हो चले मुहावरों की श्रेणी में शामिल हो गया है। यह चवन्नी भी हर जगह नहीं फेंकी जाती थी। चवन्नियां फेंकने या उछालने का चलन सिनेमाघरों में था। जब हीरो खलनायक की जम कर ठुकाई करता तो दर्शक खुश हो कर तालियां और सीटियां बजाते किन्तु जब कोई मुज़रा टाईप का गाना पर्दे पर आता तो मनचले किस्म के लोग स्वयं को कोठे पर नृत्य देखने वाले सेठ-साहूकार जैसा महसूस करते हुए सिनेमा के पर्दे की तरफ चवन्नियां उछालते। पन्ना शहर में उस जमाने की इकलौती टाॅकीज जिसका नाम था कुमकुम टाॅकीज़ वस्तुतः शानदार टाॅकीज़ थी। पन्ना के महाराजा ने महारानी कुमकुम के नाम पर उस टाॅकीज़ को बनवाया था। टाॅकीज़ में थर्ड क्लास से ले कर बाॅक्स तक की श्रेणियां थीं। ज़ाहिर है कि बाॅक्स की टिकट सबसे मंहगी और थर्ड क्लास की सबसे सस्ती होती थी। टाॅकीज में लेडीज़ क्लाॅस अलग थी। महिलाओं के लिए टिकट विडों अलग थी। टिकट बेचने वाला पुरुष होता था किन्तु दरवाज़े पर महिला गेटकीपर होती थी ताकि किसी भी महिला से कोई किसी तरह की अभद्रता न कर सके। बाॅक्स के दो खंड थे। एक आम जनता के लिए और दूसरा सिर्फ़ राजपरिवार के सदस्यों के लिए। दूसरे वाले बाॅक्स का दरवाज़ा लेडीज़ क्लाॅस की गैलरी की ओर था। वह इसलिए कि जब राजपरिवार की महिलाएं सिनेमा देखने आएं तो उनके कार से उतर कर गेट से अंदर जाने के दौरान उन्हें महिलाएं ही देख सकें, पुरुष नहीं। वे पर्देदार बंद कार में आती थीं। खैर, इसके आगे की चर्चा फिर कभी, अभी मैं चर्चा कर रही थी चवन्नी की। जब टाॅकीज में थर्ड क्लास में बैठे दर्शक चवन्नियां फेंकते तो इस बात का ध्यान रखा जाता कि उनका निशाना सिनेमा के पर्दे की ओर ही रहे, महिलाओं की ओर नहीं। यदि कभी कोई भूल से ऐसी हरकत कर देता तो टाॅकीज के सजग कर्मचारी उसे तत्काल काॅलर पकड़ कर बाहर ले जाते। फिर बाहर उसके साथ जो होता, वह आप समझ सकते हैं। शायद ऐसी ओछी हरकत करने वालों से ही ‘‘चवन्नी छाप’’ मुहावरा बना होगा। बहरहाल, चवन्नी का यह सिनेमाई महत्व मुझे बड़े होने पर पता चला।


उस जमाने में चवन्नी भले ही मनचलों के लिए फेंकने या उछालने की चीज थी लेकिन हम बच्चों के लिए एक बेहतरीन जेब खर्च था। मुझे याद है कि शायद पहली कक्षा में थी। तीन-चार पीरियड के बाद छुट्टी हो जाया करती थी। मैं घर आ जाती। घर पर मेरे नानाजी मुझे होमवर्क कराते और आगे के गिनती-पहाड़े याद कराते। मेरे घर की हिरणबाग काॅलोनी के परिसर में ही शासकीय मनहर उच्चतर माध्यामिक कन्या विद्यालय की प्रायमरी कक्षाएं लगती थीं। छठवी, सातवीं और आठवीं। जब स्कूल का लंच टाईम होता था तो मेनगेट पर स्नेक्स बेचने वाले आ जाते थे। उस समय आजकल जैसा स्नेक्स नहीं होता था। एक ‘चना जोर गरम’ वाला आता था। एक अधेड़ आयु की महिला उबले और सूखे बेर बेचती थी। तीसरा विक्रेता वह था और जिसकी मैं प्रतीक्षा करती थी, उसका नाम चतुभुर्ज था। हम बच्चे उन्हें ‘चतुर्भुज मामा’’ कह कर पुकारते थे। उन दिनो ‘अंकल’ कहने का चलन कम था। उनके पास एक हाथठेला था जिसमें उन्होंने सायकिल के पहिए और पैडल लगवा लिए थे। जिससे उन्हें ठेले को अपने हाथों से धकेलना नहीं पड़ता था। वे पैडल चला कर अपने ठेले को हर जगह ले जाते थे। उनके ठेले पर तरह-तरह के नमकीन रहते थे। कुछ मिठाइयां भी रहती थीं, जैसे पेड़ा और बेसन के लड्डू जिन्हें वे ‘मगज के लड्डू’ कहा करते थे। शेष ठेला नमकीन की वैरायटी से भरा होता था, जैसे- मूंग की दान, मसूर की दाल, चूड़ा, तली मूंगफली, भुनी मूंगफली, गाठिया, मोटे-पतले सेव आदि। वे इन्हें अलग-अलग भी बेचते थे और ग्राहक के कहने पर मिक्स कर के भी बेचते थे। उनमें से मेरी पसंद थी चूड़ा जो दरअसल डीपफ्राई पोहा होता था। वे उस चूड़े के लिए दो-तीन तरह के नमक और मिर्च-मसाले रखते थे। ग्राहक को देते समय उनकी पसंद के अनुसार वे उस पर नमक और मिर्च-मसाले डालते। वे अखबार के छोटे-बड़े चैकोर टुकड़े काट कर रखते थे और उसी में पुड़िया बना कर नमकीन-मिठाई बेचते थे।
स्कूल के लंच टाईम पर मैं भी दौड़ कर उनके ठेले के पास जा पहुंचती। उन दिनों मां जेबखर्च नहीं देती थीं, उन्होंने तब मुझे जेबखर्च देना शुरू किया जब मैं नौवीं कक्षा में पहुंच गई। लेकिन नानाजी एक डिब्बी में अठन्नियां और चवन्नियां रखते थे और वे मुझसे कहते कि इसमें से एक चवन्नी निकाल लो और जा के अपने लिए चूड़ा ले लो। किसी और खोमचेवाले से कुछ भी खरीदना हम लोगों के लिए मना था। लेकिन चतुर्भज मामा के ठेले से खरीदने की परमीशन थी। उसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने अपने ठेले पर कांच के पार्टीशन वाले बाॅक्स बनवा रखे थे और इसी के साथ लगभग पूरा ठेला मच्छरजाली से ढंका हुआ था। इसलिए उनकी हर चीज बहुत साफ- सुथरी रहती थी।
मां जानती थीं कि नानाजी मुझे रोज एक चवन्नी दिया करते हैं, लेकिन उन्होंने कभी नानाजी को टोंका नहीं। लेकिन मैं भी कम नहीं थी। मैं एक साथ पूरी चवन्नी खर्च नहीं करती थी। मैं दस या पंद्रह पैसे का चूड़ा लेती थी और बाकी पैसे बचा कर अपने पास रख लेती थी। मुझे नहीं मालूम कि नानाजी इस बात को जानते थे या नहीं। हां, एक और आदत थी मेरी कि मैं उसमें से थोड़ा-सा चूड़ा वर्षा दीदी के लिए बचा कर रख लेती थी जो उनके स्कूल से लौटने पर उन्हें देती थी। वे चूड़ा पा कर बहुत खुश होती थीं। उन्हें खुश देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता था। इस तरह कक्षा एक से ले कर तीन तक मेरी चवन्नी की बादशाहत चलती रही। फिर स्कूल के पीरियड्स बढ़ गए। लंच टाईम के लिए लंच बाॅक्स ले कर स्कूल जाने लगी। लेकिन चतुभुर्ज मामा के ठेले से चूड़ा खरीदने का क्रम टूटा नहीं, बस, समय बदल गया। शाम को छुट्टी के समय अथवा रविवार को जब वे हाट-बाज़ार में ठेला लगाते तब वहां से मैं चूड़ा खरीदती। तब मां स्वयं मुझे पैसे और अनुमति देती थीं।
वह प्यारी-सी चवन्नी समय के साथ चलन से बाहर हो गई। लेकिन उसका जो महत्व मेरे लिए मेरे बचपन में था, उसकी जगह आज सौ, हज़ार के नोट भी नहीं ले सके हैं। बचपन की मासूम चाहतों-सी चवन्नी को मेरी तरह वह व्यक्ति कभी नहीं भुला सकता है जिसने उसे अपने बचपन में जेबखर्च के रूप में पाया होगा। अब तो ‘करेंसी म्यूजियम’ में ही चवन्नी, अठन्नी देखने को मिल सकती है, लेकिन वे कोमल अनुभव किसी म्यूजियम में नहीं मिलेंगे जो उन चवन्नियों के रूप में उन दिनों मिलते रहे।                 
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नवभारत मेंं 17.07.2022 को प्रकाशित /हार्दिक आभार #नवभारत 🙏
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Sunday, July 10, 2022

संस्मरण | भय का भूत बनाम भूत का भय | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

नवभारत मेंं 10.07.2022 को प्रकाशित /हार्दिक आभार #नवभारत 🙏
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संस्मरण | भय का भूत बनाम भूत का भय
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     बचपन और भय का चोली दामन का साथ रहता है। उस समय भय का भूत हावी रहता है और भूत का भय है, डराता रहता है। अगर मैं यह कहूं कि मैं बचपन में किसी से नहीं डरती थी तो भी सरासर झूठ होगा। मुझे कई चीजों से डर लगता था। जिसमें सबसे अधिक अंधेरे से डर लगता था। वह डर भी इस कारण क्योंकि मुझे लगता था कि अंधेरे में कोई जानवर छुपा बैठा है। जैसे ही मैं अंधेरे में जाऊंगी और वह मुझ पर अटैक कर देगा। मेरा यह भय अकारण नहीं था। दरअसल, हमारे घर की रसोई घर वाले हिस्से में एडबेस्टस शीट की छत थी और पड़ोस में जो सटा हुआ घर था उसके और हमारे घर के बीच लगभग आठ फुट ऊंची दीवार थी। एक पार्टीशन वाॅल। उस दीवार पर कोई छत नहीं थी। बल्कि पडोसी के घर के पीछे के उस आंगन में एक अमरूद का पेड़ लगा था। दिन में तो वह पेड़ बड़ा सुंदर लगता लेकिन रात होते ही वह डरावना लगने लगता। वह पार्टीशन वाॅल लगभग 8 इंच चौड़ी थी। रात को उस दीवार के ऊपरी हिस्से पर अंधेरा हो जाता था। जिससे दीवार के ऊपरी भाग पर कौन-सा प्राणी बैठा है यह दिखाई नहीं देता था। कभी-कभी दो चमकती हुई आंखें भर दिखाई देती जिन्हें देखकर मुझे बहुत डर लगता। कभी-कभार चमकती हुई चार आंखें भी दिख जातीं। मैं लंबे समय तक रात को उस दीवार से डरती रही। मैं सूने रसोईघर में जाने से हिचकती थी। एक बार रात दस बजे के करीब मां ने किसी काम से मुझे रसोईघर भेजा। मैं जाना नहीं चाहती थी लेकिन मां का मूड ठीक नहीं था इसलिए उनका कहना मानना पड़ा। मैं रसोईघर गई लेकिन मेरी नजरें उस दीवार पर ही टिकी थीं। मुझे लग रहा था कि उस दीवार पर अवश्य कोई बैठा हुआ है और तभी मुझे दो आंखें चमकती दिखाई दीं। उसी समय कुछ अजीब-सी आवाजें भी सुनाई दीं। डर के मारे मेरी चींख निकल गई और मैंने जोर-जोर से रोना शुरू कर दी है। मां ने मेरी चींख और रोना सुना, तो वे भागी-भागी रसोईघर में आईं। उन्हें लगा कि मैं शायद गिर पड़ी हूं मुझे चोट लग गई है और इसीलिए मैं रो रही हूं। उन्होंने आते ही मुझसे पूछा ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘कहां चोट लगी?’’
मैं डर के मारे बोल ही नहीं पा रही थी। मां मुझे अंदर के कमरे में ले गई और वहां बिठाकर समझाया-बुझाया, लाड़-दुलार किया, तब कहीं जाकर मेरा डर कुछ दूर हुआ। मां के फिर पूछने पर मैंने उन्हें बताया कि मुझे चोट नहीं लगी है बल्कि दीवार पर कोई है और उसकी आंखें चमक रही है अंधेरे में बहुत डरावना जानवर है। या फिर कोई भूत है। मां ने कहा कि ‘‘डरावना जानवर यहां कहां आएगा? और भूत-वूत कुछ नहीं होता है। चलो, मैं चल कर देखती हूं।’’ 
मैंने मां का हाथ पकड़ लिया और उन्हें रोकने की भरपूर कोशिश की। मैं नहीं चाहती थी कि वे वहां जाएं। मुझे डर था कि मां वहां जाएंगी और व जंगली जानवर या भूत, जो भी है वह मां के ऊपर अटैक कर देगा। मगर मां मेरा हाथ छुड़ाकर वहां गई उन्होंने टॉर्च से दीवार के ऊपर देखा। फिर वे मेरे पास आईं और मुझे पकड़कर जबरदस्ती उस दीवार के पास ले गईं। मैं बहुत डर रही थी। 
‘‘दीवार के ऊपर देखो, कहीं कुछ दिख रहा है?’’
‘‘नहीं!’’ मैंने कहा। उस समय वहां सचमुच कुछ नहीं दिख रहा था। 
तब मां ने वर्षा दीदी से एक कुर्सी मंगाई और उस पर मुझे खड़ा होने को कहा। मरता क्या न करता। मां का कहना टाल नहीं सकती थी। झक मार कर मैं कुर्सी पर खड़ी हो गई। डर के मारे हालत पतली हुई जा रही थी क्योंकि अब मैं दीवार के और करीब थी। तब मां ने मेरे हाथ में टॉर्च पकड़ा दी और कहा कि ‘‘अब दीवार के ऊपर देखो।’’ 
मैंने दीवार पर देखा तो दीवार के कोने में एक बिल्ली बैठी हुई दिखाई दी। वह काली बिल्ली थी इसलिए टाॅर्च की रोशनी के बिना दिखाई नहीं दे सकती थी। मेरे मुंह से निकला है, ‘‘ये तो बिल्ली है।’’ तब मां ने मुझे समझाया कि ‘‘हां यही बिल्ली यहां दीवार पर बैठी हुई रही होगी जिसकी आंखें अंधेरे में तुम्हें चमकती हुई दिखाई दीं।’’
‘‘लेकिन मैंने तो डरावनी आवाजें सुनी थीं।’’ मैंने मां से कहा। इा पर उन्होंने कहा कि ‘‘हो सकता है कि कोई और बिल्ली भी उस दौरान आ गई हो और दोनों आपस में लड़ने लगी हों। इसलिए डरने की कोई जरूरत नहीं है। यहां कोई शेर, भालू नहीं आएगा और भूत तो बिलकुल नहीं होता है। ये सब काल्पनिक बातें हैं। ये बिल्लियां ही हैं जो यहां घूमती रहती हैं और इन से डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। ये किसी को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं। ये तो सिर्फ दूध पीने की ताक में घूमती रहती हैं।‘‘ 
उस दिन के बाद से मेरा डर दूर हुआ। लेकिन अवचेतन में बैठा हुआ डर मुझे चैकन्ना जरूर बनाए रखता था। मैं रात-बिरात रसोई घर में जाती लेकिन तब भी मेरी निगाह दीवार पर जरूर चली जाती। अगर उस पर आंखें चमकती हुई दिखाई देतीं तो मैं समझ जाती बिल्ली बैठी है। फिर मैं उसे ‘‘मिनी-मिनी’’ या ‘‘किटी- किटी’’ कहकर पुकारती। वास्तव में मेरा यह पुकारना खुद को तसल्ली देने के लिए होता था कि वह बिल्ली ही है, और कुछ नहीं। लेकिन यह भय तब पूरी तरह से दूर हो गया जब हम लोगों ने स्वयं एक बिलौटा पाला। दरअसल सच तो यह है कि उसे हमने पाला नहीं था बल्कि वह जब छोटा-सा बच्चा था, तब खुद ही कहीं से घूमते-फिरते आ गया था और हमने उसे खिलाया पिलाया और वह अपने आप हमारे घर का सदस्य बन गया। यानी हमने उसे नहीं बल्कि उसने हमें चुना था। उसकी गतिविधियां देख-देख कर मुझे बिल्लियों के जीवन के बारे में बहुत सारी जानकारी मिली और फिर धीरे-धीरे उस दीवार पर बैठने वाली बिल्लियों का डर भी पूरी तरह मन से निकल गया।
दूसरी घटना भी दीवार से जुड़ी हुई है लेकिन वह मेरे डर की कहानी नहीं बल्कि वर्षा दीदी के डर की कहानी है। हमारी कॉलोनी जो हिरणबाग कहलाती थी, लगभग 10 फीट ऊंचीं दीवार से घिरी थी। वह दीवार ईटों के आकार के पत्थरों की थी। रात के समय बाहर के आंगन में लाइट जलती रहती थी जिससे हमें उस दीवार के पास जाने में डर नहीं लगता था लेकिन धीरे-धीरे वर्षा दीदी को उस दीवार के पास जाने से डर लगने लगा। मुझे इस बारे में पता नहीं था। मां को पता नहीं कैसे इस बारे में अंदेशा हुआ कि वर्षा दीदी उस दीवार के पास जाने से घबराती हैं। तब उन्होंने एक दिन दीदी से पूछा कि ‘‘दीवार के पास जाने से क्यों डरती हो?’’ तब दीदी ने उन्हें बताया कि दीवार में कोई चीज छिपी रहती है। जिसकी आंख अंधेरे में चमकती है लेकिन वह जानवर नहीं हो सकता है क्योंकि उसकी एक ही आंख है। वह भूत टाईप की कोई चीज है। मां को दीदी की बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है? उन्होंने दीदी को समझाया भी कि ‘‘किसी भी जानवर की सिर्फ एक आंख नहीं होती है और भूत-प्रेत होने का तो सवाल ही नहीं उठता है। जरूर तुम्हें भ्रम हुआ होगा।’’
दीदी मां की बात मानने को तैयार नहीं थीं। उनके मन में डर बैठ चुका था। तब मां ने दीवार के पास उस जगह जाकर देखा, जहां जाने से दीदी डरती थीं। मां ने जब ध्यान से दीवार को देखा तो उन्हें समझ में आया कि अंधेरे में जिस चमकती हुई चीज से दीदी डरती थीं, वह दरअसल दो पत्थरों के बीच दरार खुल गई थी जिसमें से सड़क की रोशनी दिखाई पड़ती थी। वह रोशनी थी जो वाहनों के आने-जाने पर कभी बाधित हो जाती थी और कभी चमकने लगती थी। वह दरार भी इतनी बारीक थी कि एक खास एंगल पर ही उससे लाइट चमकती दिखती थी। यह बात समझ में आने के बाद मां ने एक अखबार से उस छेद को ढंका और फिर दीदी से पूछा कि क्या उन्हें लाईट दिख रही है? दीदी ने कहा कि नहीं। इसके बाद उन्होंने अखबार हटा कर पूछा तो दीदी ने कहा कि हां अब फिर दिख रही है। तब मां दीदी को भी दीवार के पास ले गईं और उन्हें वह दरार दिखाई। उसे देखकर दीदी समझ गई कि वह कोई डरावना जंतु नहीं बल्कि सड़क की लाइट है जो उस दरार से दिखाई देने लगती है।
आज इन दोनों घटनाओं के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि मां एक बेहतरीन मां थीं। बहादुर भी और समझदार भी। एक ऐसी मां जो अपनी बेटियों को निडर बनाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने मन से भय को दूर करने का सही तरीका अपनाया था। उन्होंने हमें भय की तह तक पहुंचना सिखाया। वो कहते हैं न कि ‘‘डर के आगे जीत है’’। एक बार मन से भय मिट जाए तो जीना आसान हो जाता है। लेकिन आज बच्चों की मनोदशा समझने के लिए अनेक मांओं के पास समय ही नहीं रहता है। अब तो चलन यहां तक आ पहुंचा है कि छोटे बच्चों को भी अलग कमरे में सुला दिया जाता है। वे अपने मन का भय अपनी मां से नहीं बल्कि टेडी बियर या अपने काल्पनिक मित्र (इमेजनरी फ्रेंड) से कह कर काम चलाते हैं। वे भय को अपने मन में समेटे हुए बड़े होते हैं। यदि हमारी मां ने मेरे मन से भय को नहीं मिटाया होता तो शायद आज भी मैं अंधेरे से डरती रहती और बिल्लियों को भी अंधेरे का भूत समझती रहती।
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Sunday, July 3, 2022

संस्मरण | कहानियों की कहानी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

नवभारत मेंं 03.07.2022 को प्रकाशित/हार्दिक आभार #नवभारत 🙏
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संस्मरण
कहानियों की कहानी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        मुझे एक कथा लेखिका बनना ही था। अच्छी, बुरी, छोटी, बड़ी कैसी भी, लेकिन कहानियां तो मुझे लिखनी ही थीं। मेरे बचपन से ही कहानियां मेरे जीवन में रच-बस गई थीं। मुझे सबसे अधिक कहानियां सुनने को मिलीं अपने नाना संत श्यामचरण सिंह जी से। उनके पास कहानियों का अगाध भंडार था। लगभग रोज रात को मैं और मेरी वर्षा दीदी नाना जी के बिस्तर पर जा बैठते और उनसे कहानी सुनाने का आग्रह करते। उन्होंने जो कहानियां सुनाईं उनमें से अधिकांश वे प्रसिद्ध कथाएं थीं जो स्कूली जीवन में मैंने कथा-पुस्तक के रूप में पढ़ीं। जैसे- अरेबियन नाईट्स की कहानियां, सिंहासन बत्तीसी, सिंदबाद के साहसिक कारनामे, हातिमताई के किस्से आदि। इसके अलावा महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक, राजाराम मोहन राय आदि की जीवनियां भी नाना जी हमें सुनाया करते थे। उन्हें अनेक लोककथाएं भी मालूम थीं। लेकिन वे अधिकतर छत्तीसगढ़ी लोककथाएं सुनाया करते थे। शायद इसलिए कि छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही और वहां के लोक जीवन से उन्हें अगाध लगाव था।
मेरे कमल मामा भी कहानियां सुनाने में माहिर थे। उनकी कहानियों के पात्र प्रायः शेर, भालू, सियार आदि वन्यपशु होते थे। ‘‘रंगा सियार’’ की प्रसिद्ध कथा सबसे पहले कमल मामा ने ही मुझे सुनाई थी। इनमें से कई ‘‘पंचतंत्र’’ की कहानियां होती थीं। नानाजी और मामाजी से हम दोनों बहनों ने खूब कहानियां सुनीं। मेरी तो यह दशा थी कि मुझे कहानी सुने बिना नींद नहीं आती थी और कई बार कहानी सुनते-सुनते सो जाने कि कारण कहानी का अंत का पता नहीं चल पाता था जिससे दूसरे दिन मैं फिर उसी कहानी को सुनाने की जिद करती। इन कहानियों ने मुझे कल्पनालोक में विचरण करने का भरपूर अवसर दिया। न जाने कितनी बार मैं सिंदबाद के साथ साहसिक यात्राओं पर गई। मुझे आज भी याद है कि सिंदबाद की एक कहानी में कुछ इस प्रकार की घटना थी कि सिंदबाद अपने जहाजियों सहित समुद्र की यात्रा कर रहा था। महीनों बीत गए थे लेकिन उन्हें कोई टापू दिखाई नहीं दिया था। अंततः उन्हें एक छोटा-सा टापू दिखाई दिया और जहाजी खुशी से उछल पड़े। सिंदबाद को उस टापू पर शंका हुई कि यह समुद्र के बीचोबीच कहां से आ गया? लेकिन उसके साथियों ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और वे टापू पर उतर गए। वह टापू चटियल और चिकना था। फिर भी जहाजियों ने उस पर टहलना और खाना पकाना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद अचानक वह टापू हिल उठा। सभी जहाजी इधर-उधर गिरने लगे। कुछ तो समुद्र में ही जा गिरे। वे सम्हल पाते इससे पहले ही वह टापू जोर से गोल घूमा और बड़ा-सा भंवर बनाता हुआ समुद्र में समा गया। उस भंवर से सिंदबाद का जहाज डगमगा गया और पलट गया। सिंदबाद का एक और एडवेंचर। सिंदबाद समझ गया कि वह टापू नहीं एक बड़ी व्हेल मछली थी जो पानी की सतह पर आराम कर रही थी और उसकी पीठ पर जहाजियों के द्वारा खाना पकाने से उसे आंच लगी जिससे वह विचलित हो गई और गहरे पानी में चली गई। उन दिनों व्हेल मछली को हमने मात्र चित्रों में देखा था। उन दिनों डिस्कवरी, नेशनल जियोग्राफी या बीबीसी अर्थ जैसे टीवी चैनल तो हुआ नहीं करते थे कि हम व्हेल को देख पाते। उस समय तक बस छोटी-छोटी मछलियां देखी थीं वह भी मेरे पन्ना शहर के छत्रसाल ग्राउंड में लगने वाले वार्षिक मेले में। उन्हीं नन्हीं मछलियों के आधार पर बड़ी-सी व्हेल की कल्पना करना मुझे बहुत अच्छा लगता था। एक इतनी बड़ी मछली कि जिसकी पीठ पर जहाजी टहल सकें और खाना पका सकें। मेरे लिए भी सिंदबाद की तरह रोमांचकारी रहता था। आज भी जब टीवी चैनल्स में व्हेल को पानी की सतह पर छपाके मारते और गहरे भंवर बनाते देखती हूं तो यह कहानी मेरे मानस में ताज़ा हो जाती है। 

मामाजी के नौकरी पर बाहर चले जाने के बाद उनके बदले कहानी सुनाने का जिम्मा वर्षा दीदी ने उठा लिया। वे ग़ज़ब की स्टोरी-टेलर थीं। उनकी विशेषता यह थी कि वे कहानियां मन से बना-बना कर सुनाती थीं। न जाने कितनी कहानियां उन्होंने मुझे सुनाईं। इस लिहाज़ से उन्हें कथालेखिका बनना चाहिए था। लेकिन शायद भीतर से वे मेरी अपेक्षा अधिक भावुक थीं, इसीलिए उन्होंने आगे चल कर ग़ज़ल ओर अपनी प्रतिभा मोड़ दी। जबकि मैं कथा संसार में रमी रही। 
मुझे कहानियां सुनाने का श्रेय सिर्फ नानाजी, मामाजी और वर्षा दीदी को ही नहीं है, मेरे घर खाना पकाने वाली महाराजिन जिन्हें हम ‘‘बऊ’’ कह कर पुकारते थे, उन्हें भी हैं। जब हम रात्रि का भोजन करने रसोईघर में चूल्हे के पास जा बैठते, तब उनसे कहानी सुनाने का आग्रह करते और वे थोड़ी व्यस्तता का बहाना करने के बाद कहानी सुनाना शुरू कर देतीं। यह नखरे दिखाना उनकी स्टाईल में शामिल था ताकि उनकी महत्ता बनी रहे। जबकि उनकी कहानियां हमारे लिए तो महत्वपूर्ण रहती ही थीं। उनकी कहानियों में भूत-प्रेत, भगवान के चमत्कार आदि भी शामिल रहते थे। लेकिन वे डरावनी नहीं होती थीं। उनकी एक कहानी का पात्र मैं कभी भूल नहीं सकती हूं, वह पात्र था ‘‘मजरसेठ’’। इस पात्र की कई कहानियां उन्होंने हमें सुनाई और यह भी बताया कि वे मजरसेठ के घर पर भी खाना पकाने का काम कर चुकी हैं। उनकी इस बात ने हमें बहुत प्रभावित किया। एक दिन किसी चर्चा के दौरान मैंने मां से पूछ लिया कि ये मजरसेठ कहां रहते हैं? उनकी दूकान कहां पर है जहां बैठ कर वे न्याय करते हैं। मां को पहले तो कुछ पल मेरा प्रश्न समझ में नहीं आया लेकिन जब समझ में आया तो वे खूब हंसी। उन्होंने बताया कि वह मजरसेठ नहीं ‘‘मजिस्ट्रेट’’ है। उसकी कोई दूकान नहीं है, वे तो अपनी अदालत में बैठ का फैसला सुनाते हैं। यह जानने के बाद भला मैं कैसे भूल सकती थी इस पात्र को? आज भी मजिस्ट्रेट शब्द सुनते ही मजरसेठ याद आ जाता है।

लिखना-पढ़ना सीख जाने पर मैंने अखबारों में पहले मां की रचनाएं पढ़नी शुरू कीं। फिर दीदी की रचनाएं पढ़ने को मिलने लगीं। जाहिर है कि मेरे मन में भी लिखने और छपने का कीड़ा कुलबुलाने लगा। मैंने पहली कहानी जो कि बच्चों के काॅलम के लिए लिखी थी, मां और दीदी से छिपा कर चुपचाप पोस्ट कर दी। कहानी को लिखने से कहीं अधिक मुझे यह पता लगाने की मेहनत करना पड़ी कि मां और दीदी अपनी रचनाएं कैसे भेजती हैं। उन दिनों डाक से ही रचनाएं भेजी जाती थीं। एक लिफाफे में अपनी रचना, संपादक के नाम एक पत्र और अपना पता लिखा, टिकट लगा लिफाफा रख कर। लिफाफे पर वजन के अनुसार टिकट लगा कर पोस्ट करना पड़ता था। मैंने एक-दो बार ध्यान से देखा कि वे लोग किस तरह पत्र लिखती हैं, कैसे लिफाफा बंद करती हैं और फिर कहानी लिखने के बाद मैंने भी वहीं सब किया। धन्य हैं उस जमाने के साहित्य संपादक जो छोटे बच्चों को प्रोत्साहित करने में विश्वास रखते थे। वरना मेरी गंदी लिखावट के आधार पर मेरी कहानी रिजेक्ट हो सकती थी। लेकिन निश्चित रूप से उन्होंने कहानी को पढ़ा होगा और उन्हें लिखावट के बजाए कहानी अच्छी लगी होगी। असली मजा तो तब आया जब कहानी छप गई और अखबार हमारे घर आया। हमेशा की तरह सबसे पहले मां ने अखबार पढ़ने को उठाया। बच्चों के काॅलम में मेरी कहानी देख कर वे चकित रह गईं। उन्होंने मुझसे पहला प्रश्न यही किया कि -‘‘यह कब भेजी?’’ फिर दूसरा प्रश्न था कि ‘‘भेजने से पहले मुझे बताया क्यों नहीं?’’ मैंने भी बड़ी ईमानदारी से उन्हें उत्तर दिया कि यदि मैं आप लोगों को बता कर भेजती और यदि कहानी नहीं छपती तो आप लोग मेरी हंसी उडातीं। मेरा उत्तर सुन कर मां को कैसा लगा मुझे ठीक-ठीक अंदाज़ नहीं है लेकिन यह जरूर याद है कि उन्हें लाड़ से मेरे सिर पर हाथ फेरा था।                   

आज स्थितियां बहुत भिन्न हैं। आधुनिक जीवन शैली ने हमें बहुत कुछ दिया है। आज ऐसे इलेक्ट्राॅनिक डिवाईस हमारे पास हैं जो बच्चों को लोरी और कहानियां (बेड टाईम स्टोरीज़) सुनाने का काम करते हैं। लेकिन क्या उसमें मां, पिता, दादा-दादी या नाना-नानी का ममत्व भरा स्वर शामिल रहता है? नहीं। ये डिवाईस मात्र यंत्र हैं जो भावना से नहीं यांत्रिकता से चलते हैं। इन्हें सुनते हुए ‘हुंकारू’ भरने की ज़रूरत नहीं होती है क्योंकि मशीन को परवाह नहीं है कि सुनने वाला सो गया या सुन रहा है। जबकि इंसान को परवाह होती थी कि वह जो कुछ सुना रहा है, सुनने वाला उसे ध्यान से सुन रहा है या नहीं। अपनी सजगता दिखाने के लिए ‘हुंकारू’ भरना जरूरी होता था। वह आत्मीयता, ममत्व और कल्पनाशीलता बच्चों से छिनती जा रही है। आज उनके सामने सब कुछ दृश्यरूप में है। दरअसल, उनके लिए बाजार सोच रहा है और मशीनों की भावहीनता के रूप में परोस रहा है।               
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