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Tuesday, June 2, 2026

पुस्तक समीक्षा | क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
क्यों आई हो ! अब यहाँ? : मानवीय आदर्श रचती संदेशप्रद कहानियां 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - क्यों आई हो! अब यहाँ?
लेखक - आर. के. तिवारी
प्रकाशक-एन.डी.पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य - 150/-
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कहानी समाज का सच बयान करती है, चाहे प्रेमचंद की ‘कफन‘ कहानी हो या चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था‘ या फिर उर्मिला शिरीष की ‘हरा पत्ता‘। हर कहानी का अपना एक सच होता है, भले ही उसे कहानी की शैली में कल्पना का मिश्रण हो, फैंटेसी हो लेकिन सच उसके मूल में समाया रहता है। कथाकार समाज से ही कथानक चुनता है और एक ऐसा मनोविज्ञान रचता है जो कहानी के पात्रों की मनोदशा से पाठकों को सीधे जोड़ा जा सके। मां की लोरी के बाद कहानियां ही वह साहित्यिक चेष्टाएं होती हैं जो बाल मन को दुनिया का पाठ पढ़ती हैं और भले-बुरे की समझ पैदा करती हैं। इसलिए कथा साहित्य के महत्व को नकारा नहीं जा सकता चाहे कहानी अपने आकार में छोटी हो या बड़ी, कठिन भाषा में लिखी गई हो या सरल भाषा में, उसमें मौजूद संदेश ही उन कहानियों की आत्मा होती है।

बैंक से सेवानिवृत्ति के बाद  अपने जीवन की दूसरी पारी में ‘‘हल्ला कन्हैया का‘‘  भजन संग्रह लिखने के बाद कथा साहित्य के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते गए और आज सागर साहित्य जगत में एक परिचित नाम हैं कहानीकार आर. के.  तिवारी। 74 वर्ष की आयु में उनकी दसवीं पुस्तक कहानी संग्रह के रूप में ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ प्रकाशित हुई है। यह उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक उपलब्धि है जो अपने जीवन की दूसरी पारी में हताश, निराश हो जाते हैं उनके लिए आर.के. तिवारी का लेखन एवं सक्रियता एक अनुपम उदाहरण है कि जीवन को साहित्यिक उल्लास के साथ भी जिया जा सकता है। इसके पूर्व उनका एक काव्य संग्रह, तीन लघु उपन्यास, चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह में कुल 21 कहानी है जो अलग-अलग शेड्स की हैं। कथन को में विषय की विविधता किसी भी कहानी संग्रह को रोचक बना देता है। यह कहानियां हैं - नसीब, कर्नल रंजीत और सिया, कोरबा थाने का सिपाही, रामरति एक आन्दोलन का नाम, मेरी बड़ी भाभी, दीपा की सहेली, कुल का बुझा हुआ दीया, गहरा जख्म, सुगना की बहू और एक शिकारी, कुरवाई वाली भाभी, चूहा पचरंगी, बेटा में तेरी माँ हूँ डायन नहीं, छोटी बहन, ट्रक ड्राइवर एवं फूलझड़ी, मेरी दादी माँ, पापी, क्यों आई हो! अब यहाँ , खोटा सिक्का, कुंवर बाई रतनगढ़, सलवार सूट वाली, पिता जी का चश्मा।
हर कहानी के पात्रों का अपना एक संघर्ष है, अपना एक मनोविज्ञान है। जैसे संग्रह की पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘‘नसीब‘‘ एक ऐसे युवा की कहानी है जो परिस्थितिवश अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोप के प्रतिकार में अपराध कर बैठता है। यह कहा भी जाता है कि कोई भी अपराधी जन्म से अपराधी पैदा नहीं होता है परिस्थितियां उसे अपराध में लिप्त कर देती हैं। किसी भी युवा लड़के पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाना और फिर उसे उसके सहपाठियों द्वारा निरंतर ताने मारा जाना उसकी उस मनोदशा को स्पष्ट करता है जहां एक ईमानदार सच्चरित्र युवा मानसिक रूप से हताहत होकर अपना आप खो बैठता है। उस समय उसे अच्छे या बुरे परिणाम का ख्याल भी नहीं आता है। यह कहानी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचती है जहां समाज का वह पक्ष उभर कर सामने आता है जिसमें सिर्फ सुनी सुनाई बात को स्वीकार करके किसी भी व्यक्ति को प्रताड़ित किया जाने लगता है। 
‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ के आरंभिक  पृष्ठों  में ‘‘समीक्षा‘‘  शीर्षक के अंतर्गत समाजसेवी एवं लेखिका डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे ने संग्रह की कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘‘आर. के. तिवारी जी की लेखनी न केवल भावनाओं को छूती है, बल्कि सामाजिक अन्याय, गरीबी, पारिवारिक रिश्तों के सम्बन्धों जैसे गम्भीर विषयों पर सम्पूर्ण एवं वास्तविक सच्चाई को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार तिवारी जी की हर कहानी सरल, सहज और संवेदनशील है। प्रत्येक कहानी एक रोचक ढंग से लिखी है। जो पाठक को बाँधकर रखती है। कहानियाँ सैद्धान्तिक और समाज के नैतिक मूल्यों पर आधारित उनका संदेश बताती है।‘‘
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘कर्नल रंजीत और सिया‘‘। यह कहानी पाठकों को एक अलग धरातल पर ले जाती है जहां जीवन का आदर्श अपने सुंदर रूप में प्रकट होता है तथा प्रेरणास्पद आचरण की पैरवी करता है। अति गरीब परिवार की बालिका जो मिलिट्री हेलीकॉप्टर छलांग लगाते समय पैराशूट न खुलने से हताहत हो जाता है उस कर्नल की जान बचाती है। सिया नाम की उस बालिका का गरीब पिता जो बकरियां चरा कर और महुआ बेचकर अपने परिवार का पेट पालता था, कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि उसकी बेटी एक दिन पायलट बनेगी। सिया के द्वारा जान बचाने पर जख्मी कर्नल रंजीत एक दिन वापस आता है और सिया को उसके उसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां पायलट सिया के रूप में एक दिन उसे देश सेवा करनी थी। आज जब लोग स्वार्थ में डूबे हुए हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मदद तभी करता है जब उसे बदले में कुछ पाने की उम्मीद होती है। ऐसे शुष्क समय में यह कहानी आशा का एक नया रंग भरती है। ‘‘कोरबा थाने का सिपाही‘‘ भी इसी शेड की कहानी है जो एक मानवीय आदर्श रचती है। 
‘‘रामरति एक आन्दोलन का नाम‘‘ उस स्त्री की कहानी है जो न केवल जंगली जानवरों से अपने गांव के लोगों को बचाने का रास्ता सुझाती है बल्कि आगे चलकर वह अपने गांव में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करवाने में भी सफल रहती है। इस प्रकार वह अपने गांव वालों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है। कहानी ‘‘मेरी बड़ी भाभी‘‘ की बड़ी भाभी परिवार की जड़ों को बचाए रखने और संस्कारों को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहती है, भले ही इसके लिए उसे अपने परिजनों से भी वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। ‘‘दीपा की सहेली‘‘ कहानी वैवाहिक ठगी की घटना पर आधारित है। जिससे निकलने का रास्ता भी कहानी में सुझाया गया है। 
“कुल का बुझा हुआ दीया” एक मर्म स्पर्शी कहानी है जो मन को द्रवित  करने में सक्षम है। “गहरा जख्म”, “सुगना की बहू”, “और एक शिकारी”, “कुरवाई वाली भाभी”, “चूहा पचरंगी” आदि शेष कहानी कथानक के विविध संवाद रचती हैं। यह सभी कहानियां छोटी है किंतु रोचक एवं संदेशवाहक हैं।
संग्रह की शीर्षक कहानी “क्यों आई हो! अब यहाँ?” उस वर्तमान परिदृश्य की कहानी है जिसमें बहू-बेटे अपनी मां को बोझ समझकर अपने साथ नहीं रखना चाहते और गांव में छोड़ आते हैं। बाजारवाद की आंधी दौड़ ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी और सुविधा भोगी बना दिया है कि उसे अपने खून के रिश्ते भी दिखाई नहीं देते हैं। मां और बेटे का अटूट संबंध भी टूटता, चटकता नजर आता है। न बेटे को अपनी बीमार बूढी मां की परवाह है और न बहू को। बस, एक पोता है जो अपनी दादी की दशा देखकर विचलित हो जाता है। वह दादी की हर संभव सहायता करना चाहता है। परंतु उसे छोटे बालक के वश में सब कुछ तो नहीं है, अपने माता-पिता के प्रति सिर्फ एक आक्रोश है जो उसके भीतर पलता, बढ़ता है और दादी की मृत्यु पर यही आक्रोश लावा बनाकर फट पड़ता है। यह कहानी इस बात के लिए प्रेरणा देती है कि अपने बुजुर्गों की अवहेलना नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में चाह कर भी कोई गलती सुधारी नहीं जा सकती है, कोई पश्चाताप नहीं किया जा सकता है। इस कहानी के शीर्षक पर इस कहानी संग्रह का नाम है जो कि जिज्ञासा जगाने वाला है और पाठक को अपनी और सहज ही आकर्षित करता है।
आर.के. तिवारी की कहानियों में गहरी संवेदनात्मक पकड़ है। यह कहानियां बिगड़ी हुई सामाजिक पारिवारिक स्थितियों को सुधारने का आग्रह करती हैं और मार्ग भी दिखती हैं। इप कहानियों में कथाशिल्प से उपजी व्यंजना और अलंकारिकता भले ही कम है किंतु चेतन-अवचेतन से संवाद की भरपूर क्षमता है। कथाकार आर.के. तिवारी की लेखक की सक्रियता को रेखांकित करते हुए लेखक और वक्ता डॉ. आशीष द्विवेदी  ने संग्रह की भूमिका में लिखा है कि - ‘‘करीब आधे दशक से श्रीमान राजकुमार तिवारी जी सतत लिख रहे हैं, अब तक अर्जित अपनी संपूर्ण मेधा शक्तिको उन्होंने लेखन में झोंक दिया है। जो अंगुलियां ताजिंदगी बैंक में करेंसी गिनती रहीं सेवानिवृत्त होने के उपरांत उन्होंने कलम उठा ली, सरस्वती के साधक बन गए। एक अनोखा रूपांतरण! उनकी सृजन सक्रियता अलबेली है, जिसमें कहानी, कविता के साथ तनिक व्यंग्य भी हैं।‘‘
आर. के. तिवारी की भाषा सीधी सरल और आम बोलचाल की भाषा है। ‘‘क्यों आई हो! अब यहां?‘‘ कहानी संग्रह की कहानियां रोचक एवं पठनीय होने के साथ ही मानवीय आदर्श रचती हुई संदेशप्रद हैं। वस्तुतः इन कहानियों से हो कर गुजरना आज के समाज के हर व्यक्ति के लिए स्वयं की अंर्तआत्मा का आकलन करने की भांति है। 
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