Wednesday, October 27, 2021

चर्चा प्लस - हम क्यों दूर हैं कोयले और पेट्रोल के विकल्प से? - डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस
हम क्यों दूर हैं कोयले और पेट्रोल के विकल्प से?
- डाॅ. शरद सिंह
    पेट्रोल, कोयला जीवाश्म ईंधन हैं जिनका सदियों से निरंतर खनन किया जा रहा है। इस प्रकार के ईंधन के प्रयोग से कार्बन उत्सर्जन भी तेजी से होता है जो कि ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रहा है और पृथ्वी का तापमान बढ़ा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, भयानक बाढ़ें आ रही हैं और जंगल जल रहे हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों पर रोक लगाने पर जोर दे रहा है लेकिन भारत इसके लिए अभी तैयार नहीं है। क्या हमारा देश विकल्प ढूंढ रहा है या फिर कोई और बात है?


इसी वर्ष आगामी नवंबर में ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में जलवायु परिवर्तन पर होने वाले ‘‘सीओपी 26’’ नाम के शिखर सम्मेलन में आने वाले देशों से संयुक्तराष्ट्र संघ की ओर से कहा जाएगा कि वे वायुमंडल के तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने का कदम उठाएं। भारत दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद कार्बन उत्सर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है और वह उन कई देशों के साथ है जो संयुक्त राष्ट्र में कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों पर पूरी तरह से रोक लगाने का विरोध कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भारत को ‘‘कार्बन फुटप्रिंट’’ बढ़ने से चिंता नहीं है। मौसम में होते निरंतर बदलाव इसी कार्बन फुटप्रिंट का परिणाम हैं और भारत इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं को झेलने में भी पूरी तरह सक्षम नहीं है। दरअसल, भारत जीवाश्म ईंधन पर पूरी तरह रोक लगाए जाने के लिए कुछ समय चाहता है। भारत सन् 2030 तक अपनी बिजली आपूर्ति का 40 प्रतिशत भाग रीन्यूएबल इनर्जी और परमाणु ऊर्जा से हासिल करना चाहता है। किन्तु क्या यह इतना आसान होगा हमारे देश के लिए?
‘‘सीओपी 26’’ का अर्थ है ‘‘कान्फ्रेंस आॅफ पार्टीज़’’। इसमें वे देश भाग लेंगे जिन्होंने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्तराष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेन्शन में सन् 1994 को एक संधि पर हस्ताक्षर किए थे। चूंकि 31 अक्टूबर से 12 नवंबर में होने जा रही बैठक 26 वीं होगी इसलिए इसे ‘‘सीओपी 26’’ कहा जा रहा है। जब ग्लासगो में यह बैठक चल रही होगी, उस दौरान हमारा देश दीपावली पर कार्बन उत्सर्जन का एक और फुटप्रिंट बना चुका होगा। वायु प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड के अनुसार दीपावली पर पटाखों के कारण वायु प्रदूषण 20 गुना तक बढ़ जाता है। वहीं ध्वनि प्रदूषण 15 डेसीबल तक बढ़ जाता है। पिछले दिनों व्हाट्सएप्प पर एक फारवर्डेड मैसेज पढ़ने को मिला था कि जो लोग दीपावली पर पटाखे चलाने से प्रदूषण फैलने की बात करते हैं उन्हें पहले एसी का उपयोग बंद करने की बात करना चाहिए। यह गुमराह करने वाला संदेश या इस जैसे और भी अनेक संदेश होंगे जो लोगों को पर्यावरण की गंभीरता से परे धकेल कर उकसाते हैं। यदि कुछ लोग एसी चलाए जाने से होने वाले पर्यावरण के नुकसान को नहीं समझ पा रहे हैं तो क्या बाकी लोगों को भी नासमझी ओढ़ लेना चाहिए? यह तो कोई हल नहीं हुआ। यदि घर का हर सदस्य यह सोच ले कि मैं घर को क्यों साफ़ रखूं, जिसे रखना हो वो रखे, तो घर तो कूड़ादान बन जाएगा। इसीतरह प्रदूषित हवा सभी के लिए समान रूप से घातक होती है। बेशक, जिन्हें सांस संबंधी बीमारी है उनके लिए तो जानलेवा भी साबित हो जाती है। हवा को साफ़ रखना हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझना चाहिए। क्यों कि हर नागरिक को सांस लेने योग्य हवा की ज़रूरत होती है और हर नागरिक एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकता है। अभी अधिक दिन नहीं हुए हैं कि हमने खुशियां मनाई कि कोरोना लाॅकडाउन के दौरान वायुप्रदूषण घटा। लेकिन यह खुशी हमारे परिश्रम की उपलब्धि नहीं थी बल्कि हमने अपनों के जीवन का बलिदान दे कर वायुप्रदूषण में गिरावट को पाया था। कोरोना ने लाॅकडाउन के लिए विवश किया। गाड़ियां थम गईं। रोजगार छूट गए। संक्रमितों ने अपने प्राण गंवा दिए। इन सबकी कीमत पर वायुप्रदूषण में गिरावट कोई खुशी का विषय नहीं हो सकती थी। उस पर यह गिरावट वक़्तीतौर पर पर रही। जैसे ही फिर गाड़ियां दौड़ने लगीं, कारखाने चलने लगे। जनजीवन सामान्य होने लगा, वैसे ही वायु में कार्बन का स्तर ऊंचा उठने लगा।
सवाल उठता है कि क्या है कार्बन फुटप्रिंट? तो कार्बन फुटप्रिंट का अर्थ है वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन की वह बढ़ती मात्रा जिसकी जिम्मेदार विशाल जनसंख्या और कारखाने हैं। कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए उन कारणों पर रोक लगाने की बात बार-बार उठती रही है जिनसे कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है। इसमें सबसे प्रमुख भूमिका है जीवाश्म ईंधन की। जैसे पेट्रोल और कोयला। इनके विकल्प के रूप में सौर ऊर्जा को हमेशा देखा गया है। इलेक्ट्रिक से चलने वाली कारें और दूसरे वाहन इस दिशा में हल सुझाते हैं। लेकिन अभी अमेरिका की कुल कारों में से सिर्फ दो प्रतिशत कारें इलेक्ट्रिक हैं। दुनिया में फिलहाल जितने भी इलेक्ट्रिक वाहन हैं, उनमें से आधे अकेले चीन में हैं। चीन से इस विकल्प को तेजी से अपनाया है। भारत में भी पेट्रोल के बदले बिजली से चलने वाले वाहनों का बाज़ार तेजी से बढ़या जा रहा है ताकि जीवाश्म ईंधन का उपयोग घटे और प्रदूषण का स्तर भी कम हो। लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी समस्या है बिजली की हर जगह और हर समय उपलब्धता। एक शोध के अनुसार समूचे विश्व में लगभग 77 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है। जिनके पास बिजली है, उनसे से अधिकतर को जीवाश्म ईंधन के द्वारा पैदा होने वाली बिजली मिलती है। पारंपरिक तरीके से बिजली बनाने के लिए भी कोयले की जरूरत पड़ती है। इसीलिए ग्रीन इलेक्ट्रिक यानी हरी बिजली को एक बेहतरीन विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
ग्रीन बिजली बनाने के लिए विंड टर्बाइन, सोलर पैनल, जियोथर्मल और न्यूक्लियर पावर की तकनीक मौजूद हैं। इनके जरिए कोयले और तेल के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से हटाने और उत्सर्जन घटाने में मदद मिल रही है। लेकिन इसमें तकनीक के साथ भौगोलिक स्थितियों पर भी ध्यान देना होता है। शायद इतने पर भी पर्याप्त और सस्ती बिजली न मिल पाए इसलिए कुछ और विकल्प वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाले हैं- क्लीन हाइड्रोजन और बायो फ्यूल। भारत में बिजली की कीमतें पहले ही बहुत अधिक हैं तथा बिजली पर निर्भरता बढ़ने पर यह और अधिक मंहगी पड़ सकती है। अतः एक से अधिक विकल्पों को साथ ले कर चलना होगा। 
हमारे देश में वैकल्पिक ऊर्जा से जुड़ी योजनाओं की कोई कमी नहीं है लेकिन सबसे बड़ी कमी है वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के व्यवस्थापन, वितरण और जागरूकता की। एक छोटा-सा उदाहरण याद कीजिए कि सन् 2001-2 में खाना पकाने के लिए घरेलू सोलर कूकर का बड़ा जोरों से प्रचार-प्रसार था। लोगों ने उसमें दिलचस्पी भी दिखाई लेकिन सब्सिडी के खेल ने सोलर कूकर को आमआदमी की पहुंच से दूर कर दिया। विशेष कार्ड धारकों को तो वह न्यूनतम कीमत पर दिया गया लेकिन सामान्य नागरिकों को उच्चतम कीमत चुकानी पड़ी। जिससे सोलर कुकर के प्रति रुझान कम हो गया। जबकि सोलर कुकर में मात्र एक बार का खर्च था, सिर्फ़ खरीदने का खर्च। इसके बाद न कोई रीफिलिंग और कोई बिल। कमोवेश यही दशा घरेलू सोलर पैनल्स की भी हुई। सौर ऊर्जा से मिलने वाली बिजली के द्वारा बिजली के पारंपरिं सं्रोत के उपयोग को कम किया जा सकता था। लेकिन इस दिशा में भी कोई महत्वपूर्ण परिणाम नहीं मिले। इसके वही दो कारण थे- नौकरशाही और जनजागरूकता की कमी। आम नागरिक अभी भी इस बात से बेखबर है कि जलवायु परिवर्तित हो रहा है और मानव जीवन संकट की ओर बढ़ रहा है। इस पर समारोही चर्चाओं के अलावा कभी चर्चा नहीं होती है। पिछले दिनों किसान आंदोलन का समर्थ करने के विवाद से जिस विदेशी लड़की का नाम सामने आया वह थी ग्रेटा थनबर्ग। स्वीडेन में 3 जनवरी 2003 को जन्मी यह 18 साल की लड़की जलवायु परिवर्तन की गति रोकने के लिए संघर्ष कर रही है। उसे अपने आंतरिक मुद्दे से जोड़ने और अभद्रतापूर्वक विवादित बनाने में कोई कसर नहीं रखी गई जबकि चाहिए था कि उसके जलवायु परिवर्तन रोकने के अभियान को समर्थन दिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि हम जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से ले ही नहीं रहे हैं। हमारे परिवारों में नाती-पोतों के जन्म होने पर खुशियां मनाई जाती हैं। उनके जीवनयापन के लिए धन-संपत्ति की व्यवस्था की जाती है लेकिन वे भविष्य में कैसी हवा में सांस लेंगे, कैसा पानी उन्हें मिलेगा, पानी मिलेगा भी या नहीं, जलवायु बदलने से उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं से वे कैसे जूझेंगे आदि प्रश्नों पर विचार ही नहीं करते हैं। जबकि यह प्राथमिक ही नहीं वरन बुनियादी प्रश्न हैं। आखिर जीवन है तो सबकुछ है और बेहतर जीवन तभी संभव है जब हमारी धरती की दशा बेहतर रहे।
हमारी सरकार यदि आज जीवाश्म ईंधन पर पूरी रोक का विरोध करने वाले देशों की लाॅबिंग में खड़ी है तो इसका कारण यही है कि वह जानती है कि हमारे देश में कुछ भी अच्छा कर पाना आसान नहीं है। वह राते-रात नोटबंदी भले ही कर दे लेकिन तत्काल हर नागरिक को वैकल्पिक ऊर्जा उपलब्ध नहीं करा सकती है। इसीलिए उसके पास संयुक्तराष्ट्र संघ से समय मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं है। भले ही इसके लिए दुनिया के सामने लज्जित होना पड़े लेकिन विवशता है कि हमारे देश में योजनाओं को ईमानदारी से अमलीजामा नहीं पहनाया जा पाता है। इस कटु सत्य के साथ, तमाम लज्जा के साथ, धीरे-धीरे ही सही लेकिन हमें जीवाश्म ईंधन के विकल्पों की ओर बढ़ना ही होगा। साथ ही इस ज़रूरत को हर नागरिक को समझना भी होगा यदि वह अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ जलवायु देना चाहता है। 
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(सागर दिनकर, 27.10.2021)
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Tuesday, October 26, 2021

पुस्तक समीक्षा | कहानी का आकार लेती संवेदनाएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 26.10. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका अनीता श्रीवास्तव के कहानी संग्रह "तिड़क कर टूटना" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
कहानी का आकार लेती संवेदनाएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह  - तिड़क कर टूटना
लेखिका      - अनीता श्रीवास्तव
प्रकाशक     - सनातन प्रकाशन, 143 श्रीश्याम रेजीडेंसी, एस-2, गणेश नगर मेन, झोटवाड़ा, जयपुर-12
मूल्य         - 210/-
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‘‘तिड़क कर टूटना’’ टीकमगढ़ की लेखिका अनीता श्रीवास्तव का प्रथम कहानी संग्रह है। इससे पूर्व उनके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘‘तिड़क कर टूटना’’ शीर्षक कहानी में लेखिका ने जानकारी दी है कि जब बेल का फल पेड़ पर ही पक कर चटक जाता है और फिर पेड़ से नीचे गिरता है तो उसे ‘‘तिड़क कर टूटना’’ कहते हैं। कथानक का यह एक मौलिक बिम्ब है जो लेखिका की कल्पनाशीलता से पाठकों को जोड़ता है। यह कहानी कोरोनाकाल में उपजे एकाकीपन के बावजूद दो सहेलियों की आत्मीयता और संवाद की सोधी सुगंध बिखेरती है। वैसे इस कहानी संग्रह में कुल बीस कहानियां हैं। अधिकांश कहानियां कोरोना आपदा का प्रसंग लिए हुए हैं। यह स्वाभाविक है। कोरोना आपदा ने समूची दुनिया को बहुत गहरे प्रभावित किया है। इस दौर में सृजित साहित्य में आपदा की छाप तो रहेगी ही। लेकिन साहित्य के संदर्भ में एक विडम्बना यह भी रही इस आपदा को गहराई से महसूस किए बिना भी कोरोना आपदा पर साहित्य रचा गया, जो पूरा सच सामने लाने में कतई सक्षम नहीं है। 
एक समीक्षक के रूप में मेरी नवोदित रचनाकारों को हतोत्साहित करने अथवा निराश करने की कभी मंशा नहीं रहती है किन्तु कोरोना के संवेदनशील विषय पर जिस भी रचना में मैंने समग्रता नहीं पाई उस पर कठोरता से टिप्पणी किए बिना नहीं रह सकी हूं। क्यों कि यह ऐसा सामान्य विषय नहीं है जिस पर सतहीतौर पर कहानियां रची जाएं। अनीता श्रीवास्तव के इस प्रथम कहानी संग्रह की पहली कहानी है-‘‘कोरोना ने लौटाया उन्हें’’। यह एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसमें बेटा चीन में मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर रहा है। वहां सपत्नीक रह रहा है। मां उसे चीन नहीं भेजना चाहती थी लेकिन पिता को बेटे का सुखद भविष्य विदेश में दिख रहा था। चीन में कोरोना फैलने पर बेटा भारत लौटने की सूचना देते हुए कहता है-‘‘यहां वेज़ खाना नहीं मिल रहा है। हम बहुत परेशान हैं। शहर में लाॅकडाउन है। मैं आना चाहता हूं।’’ तथ्यात्मकता की कमी खटकती है। वापसी का कारण सतही प्रतीत होता है। फिर उन दिनों स्वदेश वापसी इतनी सुगम नहीं रह गई थी।
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘(को)रोना का रोना’’। इस कहानी में व्यंगात्मकता अधिक है। इस कहानी में भी कोरोना की भयावहता और आपदा को मानो पूरी गंभीरता से नहीं लिया गया है। जबकि यह मानव इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण एवं सामाजिक व्यवस्थाओं पर कुठाराघात करने वाला फेज़ रहा है। तीसरी कहानी है ‘‘दूर के मज़दूर’’। यह कहानी प्रथम कोरोनाकाल पर आधारित है जिसमें महानगरों से मज़दूरों की घर वापसी का विवरण है। इस कहानी में लेखिका ने प्रवासी मज़दूरों और सरकारी-गैर सरकारी प्रचारतंत्र के बीच की असंवदिया स्थिति को रेखांकित किया है। इसके संवादों में क्षेत्रीय बोलियों का भी प्रयोग किया गया है जिससे कहानी में स्वाभविकता बढ़ी है। फिर भी संकट की गंभीरता कहानी में पूरी तरह उतर नहीं सकी है। कोरोना पर ही एक और कहानी है ‘‘एक चींटे का फ्लर्ट’’। कोरोना आपदा से डर कर चींटा अपनी प्रेमिका चींटी के साथ चांद पर जा पहुंचता है। लेकिन वहां पहुंच कर उसे अहसास होता है कि पृथ्वी से बेहतर और कोई ग्रह-उपग्रह नहीं है।       
संग्रह की शेष कहानियों पर चर्चा करने से पहले लेखिका अनीता श्रीवास्तव का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहूंगी कि कथालेखन एक गंभीर कार्य है। यह कथानक में समग्रता की मांग करता है। कोरोना आपदा पर आधारित उनकी कहानियों में वह सब नहीं आ पाया है जो आना चाहिए था। सच कहानियों से अधिक भयावह था, जिसे मैंने एक लेखिका नहीं वरन् एक भुक्तभोगी के रूप में अपनी आंखों से देखा और आत्मा से महसूस किया था। मैंने कोरोना के दूसरे दौर में गरीब, लाचार संक्रमितों को गिरते-पड़ते, बदहवास हालत में मेडिकल काॅलेज़ की कोरोना-टेस्ट-विंडो तक पहुंचते और थक कर वहीं फर्श पर बैठते, लेटते देखा था। कोरोना पीड़ित अपनी वर्षा दीदी को भर्ती कराने के बाद मैं अपना टेस्ट कराने स्वयं उस विंडो की कतार में लगभग एक घंटे खड़ी रही थी। पंक्ति में मुझसे आगे तो कई लोग थे ही और मेरे बाद भी लोग आते जा रहे थे। भीड़ कम नहीं हो रही थीं। सभी के मन में एक झूठी आशा कि रिपोर्ट निगेटिव आएगी। शब्दातीत पीड़ा से भरा वह अनुभव। उस दोहरेबदन की स्त्री को भी मैंने देखा जो खांटी घरेलू स्त्री थी। अपने होश-हवास में उसने कभी सिर से पल्ला भी उतरने नहीं दिया होगा लेकिन उस समय उसे अपनी साड़ी और ब्लाऊज़ का भी होश नहीं था। उसे सांस लेने में कठिनाई हो रही थी। उसके साथ आया युवक जो शायद उसका बेटा या भाई  रहा होगा, उसे सहारा दे कर खड़ा रखने की कोशिश कर रहा था जबकि वह बार-बार भरभरा कर गिरी जा रही थी। दूसरी ओर कोविड वार्ड में मेरी वर्षा दीदी आॅक्सीजन के सहारे जीने का संघर्ष कर रही थीं। मेरी स्वयं की टेस्ट रिपोर्ट पाॅजिटिव आना सौ प्रतिशत संभावित थी। दूसरे दिन आई भी और चैदह दिनों के होमआईसोलेशन में रहते हुए मैंने अपनी वर्षा दीदी को खो दिया। भर्ती कराने के बाद मैं उन्हें देख ही नहीं सकी। यह सिर्फ़ मेरी त्रासदी नहीं थी। मेरे जैसे अनेक लोगों की त्रासदी थी। यह कोरोना के दूसरे दौर की भीषणता थी जिसे साहित्य में लिपिबद्ध करते समय हल्के से नहीं लिया जा सकता है।
एक सामाजिक कार्यकर्ता और स्तम्भ लेखिका के रूप में कोरोना के पहले दौर में प्रवासी मज़दूरों की पीड़ा को भी मैंने अपनी आंखों से देखा था और महसूस किया था। मैंने देखी थी सागर नगर के भैंसा नाका के पास मज़दूरों की वह लम्बी कतार जो भोजन पाने के लिए सोशल डस्टेंसिंग के साथ भूखी-प्यासी घंटों खड़ी रही।  गुरुद्वारा कमेटी का लंगर भरसक प्रयास में जुटा हुआ था कि कोई भी मजदूर और उसका परिवार वहां से भूखा न रह जाए। नगर की समाजसेवी संस्थाएं आगे आ गई थीं। काम कठिन था लेकिन सेवा की जीवट भावना हर दिल में थी। प्रतिदिन 10 से 12 हज़ार प्रवासी मज़दूर सागर से गुज़र रहे थे जो महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश की ओर जा रहे थे। सायकिल और पैदल के साथ ही सैंकड़ों आॅटोरिक्शा से भरी हुई थी हाईवे। जिस हाईवे पर लम्बी दूरी की आॅटोरिक्शा चलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, उस हाईवे पर महाराष्ट्र के रजिस्ट्रेशन वाली आॅटोरिक्शा की लम्बी कतार देख कर अपनी आंखों पर यक़ीन करना कठिन हो जाता था। सच तो यह है कि कोराना काल की त्रासदी के यथार्थ को लिखने के लिए ‘‘तिड़क कर टूटना’’ संग्रह की कहानियों के कथानकों में पर्याप्त विस्तार चाहिए था। ये कहानियां शीघ्रता में पूर्ण कर लेने के प्रयास जैसी प्रतीत होती हैं।
यद्यपि लेखिका में कथालेखन की क्षमता है जो कि उनकी इसी संग्रह की अन्य कहानियों में स्पष्ट उभर कर सामने आई है। संग्रह की एक कहानी है ‘‘रूठा बच्चा’’। बहुत सुंदर कहानी है। संवेदना से परिपूर्ण। इसमें आंचलिकता भी है और परिवेश का बदलाव भी। परिवर्तित परिवेश की सच्चाई को दर्शाने के लिए रोचक बिम्बों का सहारा लिया गया है। कहानी का एक अंश देखिए-‘‘हां, गांव में ही मारन-पिट्टो (खेल) कर धूल में लिथुरने, पेड़ों पर चढ़ कर अमरूद तोड़ने और शंकर जी के विवाह में रात-रात भर मंदिर में रहने वाले विशू को गांव कैसे भूल सकता था? टाउनशिप में रहने आए वी.पी. शुक्ल उर्फ़ विश्वम्भर प्रसाद शुक्ल का आज का वैल मेंटेन लाईफ स्टाईल एक इस्त्री किए कोट जैसा ही तो था जिसके भीतर विशू की...हाड़-मांस के विशू की...काया आत्मा सहित निवासरत थी।’’ एक सहज और सरल कथानक के माध्यम से धार्मिक समारोहों के आडम्बर और छल पर कटाक्ष किया है।
‘‘सुरक्षाबोध’’ एक ऐसी कहानी है जो युवा प्रेम पर ‘उन्नाव बलात्कार कांड’ के भय की काली छाया को सामने रखती है। एक युवा लड़की किसी लड़के को मित्र बनाते हुए डरने लगती है किन्तु फिर मित्र से सुरक्षा का आश्वासन पा कर सुरक्षाबोध से भर उठती है। निःसंदेह प्रेम या मित्रता के नाम पर युवतियों से होने वाले छल-कपट उन्हें डराते हैं और वे सशंकित जीवन जीने को विवश हो उठती हैं। यह एक अच्छी कहानी है। एक और बेहतरीन कहानी है ‘‘कविसम्मेलन’’। आजकल कविसम्मेलनों में कवयित्रियों की दशा-दिशा पर केन्द्रित यह कहानी काफी रोचक बन पड़ी है। कविसम्मेलनों पर कवयित्रियां प्रदर्शन और अदाकारी की वस्तु बन कर रह गई हैं। उदाहरण के लिए इस कहानी का एक अंश देखिए-‘‘बिना पर्चे के सुनाना। मोटे होंठों पर गाढ़े रंग की लिपस्टिक लगाए एक कवयित्री ने मशविरा दिया। उसे थोड़ा बहुत अनुभव था जिसे वह परोपकार की भावना से बांट रही थी। अग्रिम पंक्ति की कवयित्रियां अपनी गर्दन को समकोण तक पीछे घुमा ले गईं। पृथा की गर्दन ने भी अनुसरण किया। तरन्नुम में सुनाना। ये बहुत जरूरी है कवयित्रियों के लिए। मंडला से आई कवयित्री ने आंखों पर से बाल हटाते हुए कहा।’’
‘‘बेघर घरवालियां’’ भी संग्रह की एक सशक्त कहानी है। इस कहानी में उन स्त्रियों की स्थिति का विवरण है जो संयुक्त परिवार में रहती हैं लेकिन अपने ही घर-परिवार में उनके लिए कोई निजी कोना ऐसा नहीं रहता है जिसे वे अपनी इच्छानुसार सजा-संवार सकें। घर में बेघर होने जैसी स्थिति। यह एक परिवारविमर्श की कहानी है। कहानी के ये प्रभावी वाक्य देखिए-‘‘बिस्तर पर लेटी निधि सोच रही थी, उसने चादर नहीं ओढ़ी, बल्कि पूरी ज़िन्दगी अंधेरा ही ओढ़े रखा। उस घर को अपना घर समझती रही जिसमें उसका अपना कोई कमरा नहीं था। हां, वह घरवाली ज़रूर थी। ये जो घर-घर में घरवालियां हैं, क्या कोई कोना भी इनका होता है इनके घर में, या फिर बेघर होती हैं ये घरवालियां।’’
लेखिका अनीता श्रीवास्तव का संग्रह में परिचय दिया गया है कि वे कवयित्री, कथाकार, व्यंग्यकार, मंच संचालक, पूर्व रेडियो एवं टीवी उद्घोषिका तथा वर्तमान में जीव विज्ञान की उच्च माध्यमिक शिक्षिका हैं। परिवार के दायित्वों का भी कुशलता से निर्वाह कर रही हैं। उनके इस कहानी संग्रह का ब्लर्ब तुलसी साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. मोहन तिवारी ‘‘आनंद’’ ने लिखा है तथा भूमिका कवि, कथाकार गोकुल सोनी ने लिखी है। चूंकि यह अनीता श्रीवास्तव का पहला कहानी संग्रह है अतः इसकी कहानियों में कमियां भी हैं और विपुल संभावना भी है। उनकी कहानियों में संवेदनाएं हैं, रोचकता है और शिल्पकौशल भी है। भाषाई पकड़ मजबूत है और मुहावरों का प्रयोग करना भी उन्हें बखूबी आता है। बस, उन्हें ज़ल्दबाजी से बचना होगा। यदि वे कथालेखन को गंभीरता से लेते हुए कथानकों के ट्रीटमेंट पर समुचित ध्यान और समय देंगी तो उनके उज्ज्वल भविष्य पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता है। कुलमिला कर इस कहानी संग्रह का कथा क्षेत्र में उनके प्रथम पुष्प के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।
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Monday, October 25, 2021

साहित्यकार डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को प्राप्त सम्मान एवं पुरस्कार

श्रेष्ठ संपादन हेतु राज्यस्तरीय ‘‘पं. रामेश्वर गुरू पुरस्कार 2017’’ संप्रे संग्रहालय, भोपाल, मध्यप्रदेश - 2017
Dr (Ms) Sharad Singh Honored by Rameshwar Guru Best Editor Award 2017 at Madhav Rao Sapre News Paper Museum and Research Foundation Bhopal


साहित्यकार डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को प्राप्त सम्मान एवं पुरस्कार :


1-    गृह मंत्रालय, भारत सरकार का ‘गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार -2000’ ‘न्यायालयिक विज्ञान की नई चुनौतियां’, पुस्तक के लिए- 2000

2-    साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, म.प्र. शासन का ‘‘पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार’’ - 2015

3-    मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘‘वागीश्वरी सम्मान’’- 2012

4-    श्रेष्ठ संपादन हेतु राज्यस्तरीय ‘‘पं. रामेश्वर गुरू पुरस्कार 2017’’ संप्रे संग्रहालय, भोपाल, मध्यप्रदेश - 2017

5-    ‘नई धारा’ सम्मान, नई धारा रचना सम्मान समिति, पटना, बिहार - 2012    

6-    ‘विजय वर्मा कथा सम्मान’, हेमंत फाउंडेशन,  मुंबई - 2014

7-    ‘पं. रामानन्द तिवारी स्मृति प्रतिष्ठा सम्मान’, लेखिका संघ इन्दौर, मध्य प्रदेश - 2008    

8-    ‘जौहरी सम्मान’, अखिल भारतीय बुंदेलखंड साहित्य एवं संस्कृति परिषद भोपाल द्वारा राजभवन में आयोजित सम्मान समारोह में मध्य प्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री राम नरेश यादव द्वारा सम्मानित, भोपाल मध्यप्रदेश- 2012    

9-    ‘गुरदी देवी सम्मान’, बुंदेली लोक कला संगम संस्थान लखनऊ, उत्तर प्रदेश - 2012    

10-    ‘अंबिकाप्रसाद ‘दिव्य रजत अलंकरण-2004’, भोपाल, मध्य प्रदेश- 2004    

11-    ‘श्रीमंत सेठ भगवानदास जैन स्मृति सम्मान’, सागर,  मध्य प्रदेश - 2004

12-    ‘कस्तूरी देवी चतुर्वेदी लोकभाषा लेखिका सम्मान -2004’, मध्यप्रदेश लेखक संघ, भोपाल, मध्य प्रदेश- 2004

13-    ‘मां प्रभादेवी सम्मान’, जन परिषद भोपाल, मध्य प्रदेश - 2012    

14-    ‘शक्ति सम्मान 2013’, नगर विधायक सागर, मध्य प्रदेश - 2013

15-    ‘शक्ति सम्मान 2016’,  नगर विधायक सागर, मध्य प्रदेश  - 2016

16-    ‘एक्सीलेंस अवार्ड फॉर क्रिएटर्स 2018, सागर टी.वी. न्यूज, सागर, मध्य प्रदेश - 2018

17-    ‘शिवकुमार श्रीवास्तव सम्मान’, नेशनल बुक ट्रस्ट दिल्ली तथा पृथ्वी समाज उत्थान समिति सागर, मध्य प्रदेश का संयुक्त सम्मान समारोह- 2015    

18-    ‘निर्मल साहित्य सम्मान’’ आर्ष परिषद सागर, मध्यप्रदेश -    2017

19-    ‘विट्ठलभाई पटेल सम्मान’, मनवानी फिल्म्स सागर मध्यप्रदेश - 2018

20 -  " सार्थक साहित्य विमर्श सम्मान" मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति हिंदी भवन भोपाल की रजत जयंती के अवसर पर भोपाल में आयोजित सम्मान समारोह - 2018

21 -    ‘दादा डालचंद जैन स्मृति प्रतिभा सम्मान’, सागर, मध्य प्रदेश- 2018

22 - " गुलाब रानी सोनी स्मृति अलंकरण" मध्य प्रदेश की लेखिका संघ दमोह - 2018

23 -    ‘सुधा सावित्री तिवारी स्मृति लेखिका सम्मान’, सुधा सावित्री तिवारी स्मृति सम्मान समिति एवं संगीत श्रोता समाज, सागर, मध्य प्रदेश - 2019

24 -     क्षत्रिय समाज साहित्य सम्मान, सागर, मध्य प्रदेश - 2015 से 2020 तक प्रतिवर्ष


    - आदि अनेक राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के सम्मान।

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Wednesday, October 20, 2021

चर्चा प्लस | वाल्मीकि जयंती विशेष | महर्षि वाल्मीकि और रामकथा की वैश्विक महत्ता | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
20 अक्टूबर: वाल्मीकि जयंती विशेष
महर्षि वाल्मीकि और रामकथा की वैश्विक महत्ता
  - डाॅ. शरद सिंह
      रामकथा के लिए समूचा विश्व महर्षि वाल्मीकि का ऋणी है। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। रामकथा की अपनी एक वैश्विक सत्ता है, अपनी एक अलग पहचान है। लेकिन इसके मूल में वाल्मीकि की वही द्रवित अनुभूति है जो क्रौंच पक्षी के वध से उपजी थी। किसी पक्षी का बहेलिए द्वारा मारा जाना उस समय आम बात थी लेकिन पक्षी के वध को देख कर रामकथा लिख डालना अद्भुत घटना थी।


कौन जानता था कि एक पक्षी के मारे जाने से उपजी पीड़ा साहित्य और धर्म के लिए एक वरदान साबित होगी।  हुआ यह कि एक दिन दोपहर को वाल्मीकि तमसा नदी के किनारे प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले रहे थे। वाल्मीकि ने देखा कि क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा नदी तट पर कल्लोल कर रहा है। इतने में नर क्रौंच को बहेलिए का तीर आ लगा और वह गिरकर छटपटाने लगा। देखते ही देखते उसने प्राण त्याग दिए। अपने साथी की यह दशा देखकर मादा क्रौंच बड़े करुण स्वर में रोने लगी। यह दृश्य देखकर वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठा। उसी क्षण उनके हृदय की करुणा एक श्लोक के रूप में फूट पड़ी-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाष्वती समाः
यत् क्रौंच-मिथुनादेकमवधिः काम-मोहितम्
(हे निषाद ! तुझे नित्य निरंतर कभी भी शांति न मिले क्योंकि काम में मोहित हो रहे क्रौंच पक्षी के जोड़े में से तूने बिना अपराध ही एक ही हत्या कर डाली।)  इस घटना के बाद वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ की रचना की। सम्पूर्ण विश्व को रामकथा से परिचित कराने का प्रथम श्रेय महर्षि वाल्मीकि को ही जाता है। रामकथा को वैश्विक स्तर पर जो प्रतिष्ठा और लोकप्रियता मिली है वह इसकी मूल्यवत्ता को स्वतः सिद्ध करती है और महर्षि वाल्मीकि का ऋणी बनाती है। विश्व-इतिहास और विश्व-साहित्य में राम के समान अन्य कोई पात्र कभी नहीं रहा। रामकथा की अपनी एक वैश्विक सत्ता है, अपनी एक अलग पहचान है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि  रामकथा मात्र एक कथा नहीं वरन् जीवन जीने की सार्वभौमिक शैली है। इसमें मानवीय पारिवारिक संबंधों से ले कर जड़ एवं चेतन के पारस्परिक संबंधों की भी समुचित व्याख्या की गई है। रामकथा की यह भी विशेषता है कि इस पृथ्वी का कोई ऐसा तत्व नहीं है जो प्राणिरूप में इसमें समावेशित नहीं किया गया हो। प्राणहीन पाषाण अहिल्या के रूप में जीवन्त हो उठता है तो मृतकों की देह को खाने वाला गिद्ध पक्षी जटायु के रूप में श्रीराम और सीता की सहायता में दौड़ पड़ता है। समुद्र संवाद करता है तो जगत में उद्दण्ड प्राणी के रूप में पहचाने जाने वाले वानर रूपी बालि और सुग्रीव के रूप में न केवल शासनकत्र्ता के रूप में मिलते हैं वरन् समुद्र पर सेतु बांधने का अनुशासित कार्य भी करते दिखते हैं। स्त्री और पुरुष के इतने विविध रूप इस कथा में हैं जो किसी अन्य कथा में देखने को नहीं मिलते हैं।  यह एक ऐसी कथा है जिसमें श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श राजा, आज्ञाकारी पुत्र और आदर्श पति होने के साथ ही महान योद्धा भी हैं। वे धैर्यवान हैं तो भावुक भी हैं। राम एक ऐसे चरित्र हैं जिनकी दृष्टि में कोई छोटा या बड़ा नहीं है, कोई अस्पृश्य नहीं है और न ही कोई उपेक्षित है। रामकथा में श्रीराम के द्वारा अधर्म पर धर्म की और असत्य पर सत्य की विजय की जिस प्रकार स्थापना की गई है उससे समूचा विश्व प्रभावित होता आया है।
वाल्मीकि रचित रामायण अतिरिक्त भारत में जो अन्य रामायण लोकप्रिय हैं, उनमें ‘अध्यात्म रामायण’, ‘आनन्द रामायण’, ‘अद्भुत रामायण’, तथा तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। वाल्मीकिकृत रामायण के उपरान्त रामकथा में दूसरा प्राचीन ग्रन्थ है ‘अध्यात्म रामायण’। वाल्मीकिकृत रामायण में जहां हमें मानवीय तत्व अधिक दिखाई देता है, वहीं ‘अध्यात्म रामायण’ में राम का ईश्वरीय तत्व सामने आता है। इसीलिए ‘आध्यात्म रामायण’ को विद्वानों द्वारा ‘ब्रह्मांड-पुराण’ के उत्तर-खंड के रूप में भी स्वीकारा किया गया है। वहीं, ‘आनन्द रामायण’ में भक्ति की प्रधानता है। इसमें राम की विभिन्न लीलाओं तथा उपासना सम्बन्धी अनुष्ठानों की विशेष चर्चा है। ‘अद्भुत रामायण’ में रामकथा के कुछ नए कथा-प्रसंग मिलते हैं। इसमें सीता माता की महत्ता विशेष रूप में प्रस्तुत की गयी है। उन्हें ‘आदिशक्ति और आदिमाया’ बतलाया गया है, जिसकी स्तुति स्वयं राम भी सहस्रनाम स्तोत्र द्वारा करते हैं। लोकभाषा में होने के कारण तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ की लोकप्रियता आधुनिक समाज में सर्वाधिक है। इसने रामकथा को जनसाधारण में अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया। इसमें भक्ति-भाव की प्रधानता है तथा राम का ईश्वरीय रूप अपनी समग्रता के साथ सामने आया है। वस्तुतः ‘रामचरित मानस’ उत्तर भारत में रामलीलाओं के मंचन का आधार बनी।
रामकथा ने भारतीय मात्र भू-भाग पर ही राज नहीं किया अपितु भारत की सीमाओं को लांघती हुई उसने विदेशों में भी अपनी सत्ता स्थापित की। राजनीतिक सत्ता को परिवर्तन यानी तख़्तापलट का भय होता है किन्तु ज्ञान की सत्ता को चिरस्थायी होती है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता। इसीलिए जिन देशों में धार्मिक एवं राजनीतिक परिवर्तन हुए तथा भीषण रक्तपात हुए वहां भी रामकथा ने अपना प्रभाव सतत बनाए रखा। प्राचीन भारत और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में आर्य संस्कृति तथा उसके साथ रामकथा का जो प्रचार-प्रसार हुआ, वह आज भी यथावत स्थित है। युग, परिस्थिति और धर्म परिवर्तन के बावजूद विभिन्न क्षेत्रों में रामकथा के प्रभाव में कोई कमी नहीं आयी है। इसके विपरीत उसमें वृद्धि ही हुई है। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में तो रामायण को राष्ट्रीय पवित्र पुस्तक का गौरव प्राप्त है। भारत के न्यायालयों में जो स्थान ‘भगवद्गीता’ को प्राप्त है, इंडोनेशिया में वहीं स्थान ‘रामायण’ को मिला हुआ है। वहां ‘रामायण’ पर हाथ रखकर सत्यता की शपथ ली जाती है। इंडोनेशिया में प्रचलित रामकथा के ग्रन्थ का नाम है ‘काकाविन रामायण’। इसमें 26 सर्ग तथा 2778 पद हैं। ‘काकाविन रामायण’ के आधार पर इंडोनेशिया में राम की अनेक प्राचीन प्रतिमाएं मिलती हैं।
एशिया के अनेक देशों में रामकथा प्रचलित है जिसमें वहां की जीवन, धर्म, संस्कृति की दलग ही छाप है। जिसके कारण रामकथा को एक वैश्वि स्वरूप मिला है। जिन देशों में लगभग सौ वर्ष से भी पहले पहले राम-कथा पहुंची, उसमें चीन, तिब्बत, जापान, इण्डोनेशिया, थाईलैंड, लाओस, मलेशिया, कम्बोडिया, श्रीलंका, फिलीपिन्स, म्यानमार, रूस आदि देश प्रमुख हैं।
जापान में 12वीं शताब्दी में रचित ‘होबुत्सुशु’ नामक ग्रन्थ में रामायण की कथा जापानी में मिलती है। लेकिन ऐसे प्रकरण भी हैं, जिनसे कहा जा सकता है कि जापानी इससे पूर्व भी राम-कथा से परिचित थे। वैसे आधुनिक अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ कि विगत एक हजार वर्ष से प्रचलित ‘दोरागाकु’ नाट्य-नृत्य शैली में राम-कथा मिलती है। 10 वीं शताब्दी में रचे ग्रन्थ ‘साम्बो-ए-कोताबा’ में दशरथ और श्रवणकुमार का प्रसंग मिलता है। ‘होबुत्सुशु’ की राम-कथा और ‘रामायण’ की कथा में भिन्न है। जापानी कथा में शाक्य मुनि के वनगमन का कारण निरर्थक रक्तपात को रोकना है। वहां लक्ष्मण साथ नहीं है, केवल सीता ही उनके साथ जाती है। सीता-हरण में स्वर्ण-मृृग का प्रसंग नहीं है, अपितु रावण योगी के रूप में राम का विश्वास जीतकर उनकी अनुपस्थिति में सीता को उठाकर ले जाता है। रावण को ड्रैगन (सर्पराज)-के रूप में चित्रित किया गया है, जो चीनी प्रभाव है। यहां हनुमान के रूप में शक्र (इन्द्र) हैं और वही समुद्र पर सेतु-निर्माण करते हैं। कथा का अन्त भी मूल राम-कथा से भिन्न है।
इंडोनेशिया में बाली का हिंदू और जावा-सुमात्रा के मुस्लिम, दोनों ही राम को अपना नायक मानते हैं। जाकार्ता से लगभग 15 मील की दूरी पर स्थित प्राम्बनन का मंदिर इस बात का साक्षी है, जिसकी प्रस्तर भित्तियों पर संपूर्ण रामकथा उत्कीर्ण है।
थाईलैंड में रामकथा को इस तरह आत्मसात किया गया कि उन्हें धीरे-धीरे यह लगने लगा कि राम-कथा की सृजन उनके ही देश में हुआ था। वहां जब भी नया शासक राजसिंहासन पर आरूढ़ होता है, वह उन वाक्यों को दोहराता है, जो राम ने विभीषण के राजतिलक के अवसर पर कहे थे।  यह मान्यता है कि वहां राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज” राज्य कर रहे हैं, जिन्हें नौवां राम कहा जाता है। थाईलैंड में “अजुधिया” “लवपुरी” और “जनकपुर” जैसे नाम वाले शहर हैं। सन् 1340 ई. में राम खरांग नामक राजा के पौत्र थिवोड ने राजधानी सुखोथाई (सुखस्थली) को छोड़कर ‘अयुधिया’ अथवा ‘अयुत्थय’ (अयोध्या) की स्थापना की थी। उल्लेखनीय है कि राम खरांग के पश्चात् राम प्रथम, राम द्वितीय के क्रम में नौ शासकों के नाम राम-शब्द की उपाधि से विभूषित रहे। थाईलैंड में रामकथा पर आधारित ग्रंथ ‘रामकियेन’ है। ‘रामकियेन’ का अर्थ होता है राम की कीर्ति। भारतीय ‘रामलीला’ की भांति ‘रामकियेन’ नाट्यरूप में भी लोकप्रिय है।
यह बात अकाट्य रूप से कही जा सकती है कि रामकथा की वैश्विकसत्ता अद्वितीय है और वैश्विक जनमानस को जिस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है वह रामकथा ही है। यह भी उतना ही अकाट्य है कि यदि महर्षी वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ लिख कर रामकथा को महाकाव्य में निबद्ध नहीं किया होता तो शायद आज विश्व रामकथ से इतनी समग्रता से परिचित नहीं हो पाता क्यों कि दुनिया भर की रामकथाएं वाल्मीकिकृत ‘‘रामायण’’ पर ही आधारित हैं।
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(सागर दिनकर, 20.10.2021)
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Tuesday, October 19, 2021

पुस्तक समीक्षा | व्यंग्य की कड़ाही में विचारों की जलेबियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 19.10. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित के व्यंग्य संग्रह "कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
व्यंग्य की कड़ाही में विचारों की जलेबियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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व्यंग्य संग्रह  - कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां
लेखक      - रामस्वरूप दीक्षित
प्रकाशक     - इंडिया नेटबुक्स प्रा।लि, सी-122, सेक्टर-19, नोएडा-201301, गौतमबुद्ध नगर
मूल्य         - 250/-
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‘‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां’’ व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित का ताज़ा व्यंग्य संग्रह है। इसमें कुल 31 व्यंग्य हैं। किन्तु यदि भूमिका और अपनी बात को भी जोड़ लिया जाए तो 33 व्यंग्य कहे जा सकते हैं। ऐसा क्यों? इसकी चर्चा आगे की जाएगी। फिलहाल व्यंग्य की प्रकृति से जुड़ना ज़रूरी है। आज साहित्य में व्यंग्य विधा को स्वतंत्र विधा मान लिया गया है। समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, सामाजिक शोषण अथवा राजनीति के गिरते स्तर की घटनाओं पर अप्रत्यक्ष रूप से तंज या व्यंग्य किया जाता है। साधारण तथा लघु कथा की तरह संक्षेप में घटनाओं पर व्यंग्य होता है, जो हास्य नहीं कभी-कभी आक्रोश भी पैदा करता है। हास्य और व्यंग्य में अंतर है। साहित्य की शक्तियों अभिधा, लक्षणा, व्यंजना में हास्य अभिधा यानी सपाट शब्दों में हास्य की अभिव्यक्ति के द्वारा क्षणिक हंसी तो आ सकती है, लेकिन स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकती। व्यंजना के द्वारा प्रतीकों और शब्द-बिम्बों के द्वारा किसी घटना, नेता या विसंगितयों पर प्रतीकात्मक भाषा द्वारा जब व्यंग्य किया जाता है, तो वह चिरस्थायी प्रभाव डालता है। व्यंग्य पाठक के भीतर संवेदना, आक्रोश एवं संतुष्टि का संचार करता है। देश की स्वतंत्रता पूर्व भी व्यंग्य लेखन की सुदीर्घ परंपरा रही है। भारतेंदु हरिशचंद्र, महावीर प्रसाद चतुर्वेदी, बालकृष्ण भट्ट आदि नामचीन व्यंग्यकार हुए हैं। इनमें बाबू बालमुकुंद गुप्त का धारावाहिक ‘शिव शंभु के चिट्ठे’ समसामयिक परिवेश का विवेचन करता व्यंग्य था। देश आजादी के बाद हिन्दी साहित्य में व्यंग्यकारों ने अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की। इनमें हरिशंकर परसाई और शरद जोशी ने व्यंग्य को एक नई धार दी और व्यंग्य के प्रति जो उपेक्षा भाव था, उसे साहित्य की श्रेष्ठ विधा के रूप में अपनी रचनाओं के द्वारा प्रमाणित किया। लेखकों की कई पीढियों ने लेखन में योगदान दिया है- हरिशंकर परसाई, शंकर पुणतांबेकर, नरेंद्र कोहली, गोपाल चतुर्वेदी, विष्णुनागर, प्रेम जन्मेजय, ज्ञान चतुर्वेदी, विष्णुनागर, सूर्यकांत व्यास, आलोक पुराणिक आदि अनेक लेखक हैं, जिन्होंने व्यंग्य लेखन को नया स्वरूप दिया है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने व्यंग्य की परिभाषा देते हुए कहा र्है “व्यंग्य कथन की एक ऐसी शैली है जहाँ बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्करा रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठे।” यानी व्यंग्य तीखा व तेज-तर्रार कथन होता है जो हमेशा सोद्देश्य होता है और जिसका प्रभाव तिलमिला देने वाला होता है। प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान बाणभट्ट ने एक बार कुछ विद्वानों से ’आगे सूखा काठ पड़ा है’ का संस्कृत अनुवाद करने को कहा तो एक विद्वान ने कहा- ’शुष्कः काष्ठः तिष्ठति अग्रे’ और दूसरे ने बताया- ’नीरसः तरूरिहि विलसति पुरतः।‘ दोनों अनुवाद सही हैं। लेकिन दोनों की भाषिक संरचना में अन्तर है। यही अंतर अभिव्यक्ति को सरस या नीरस बनाता है। इसीलिए व्यंग्य शैली में कही गयी बात ज्यादा धारदार और प्रभावी होने के साथ ही सरस भी होती है। यूं भी जब तक समाज देश और राजनीति में भ्रष्टाचार विसंगतियॉं, मूल्यहीनता एवं विद्रूपताएं विद्यमान रहेगी इन पर चोट एवं इनका विरोध व्यंग्य द्वारा ही कारगर रूप से हो सकेगा। क्योंकि व्यंग्य ‘जो गलत है’ उस पर तल्ख चोट तो करता ही है ‘जो सही होना चाहिए’ इस सत्य की ओर इशारा भी करता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि व्यंग्य आज साहित्य की सशक्त विधा बन गया है और भविष्य में साहित्य की केन्द्रीय विधा बनने की सारी संभावना इसमें मौजूद है। 
यह व्यंग्य की धार का ही कमाल है कि एक बार पढ़ने के बाद भला कौन भुला सकता है हरिशंकर परसाई  के व्यंग्य - भूत के पांव पीछे, काग भगोड़ा, आवारा भीड़ के खतरे, सदाचार का ताबीज़ आदि या फिर शरद जोशी के व्यंग्य- जीप पर सवार इल्लियां, जादू की सरकार, राग भोपाली, नदी में खड़ा कवि, घाव करे गंभीर आदि। दिलचस्प बात यह है कि हिन्दी साहित्य के ख्यातिलब्ध ये दोनों व्यंग्यकार मध्य प्रदेश में जन्में। शरद जोशी का जन्म उज्जैन में 21 मई 1931 को हुआ और हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को जमानी, होशंगाबाद में हुआ। इसी क्रम में रामस्वरूप दीक्षित भी मध्यप्रदेश के ही हैं। 1 अगस्त 1957 को जन्में रामस्वरूप दीक्षित टीकमगढ़ के निवासी हैं तथा व्यंग्य के अलावा लघुकथा, कविता और समीक्षा भी लिखते हैं। अपने इस व्यंग्य संग्रह ‘‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां’’ में सबसे पहले भूमिका लेखन पर भी व्यंग्य करते हुए भूमिकात्मक लेख रखा है। वे लिखते हैं-“जिस किताब की भूमिका लिखते हैं, उसकी 4-6 बढ़िया सी समीक्षाएं भी ये तैयार करके रखते हैं और अपने पालतू लेखकों के नाम से अपने गिरोह के अखबारों में छपवा देते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं  कि यह सारे काम उचित और प्रायः रियायती दरों पर किए जाते हैं। आपकी किताब छपी नहीं  कि समीक्षाएं आनी शुरू हो जाएंगी। आजकल ये लोग भूमिका लेखन को साहित्य की स्वतंत्र विधा माने जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”
अपनी बात लिखते हुए भी रामस्वरूप दीक्षित व्यंग्य करने से चुके नहीं है।  वे लिखते हैं -” मुझे आज तक समझ नहीं आया कि हम अपनी सारी बातें तो अपनी रचनाओं में कह जाते हैं। फिर वह कौन सी बात है जो किताब छपने के समय कहीं जाने की प्रतीक्षा में रहती है? कुछ लोग दो शब्द शीर्षक के कर दो हजार शब्दों में अपनी बात मुश्किल से कह पाते हैं शायद पाठकों पर दया करते हुए।”
इस प्रकार भूमिका और अपनी बात से ही व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित के व्यंग्य की धार दिखाई देने लगती है। संग्रह का  पहला व्यंग्य है “कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां”।  यह शीर्षक ही अपने आप में बहुत रोचक है और जिज्ञासा जगाने वाला है क्योंकि इस जाहिर है की इस जंग में कम से कम जलेबी बनाने की पद्धति तो बताई नहीं गई होगी बल्कि किसी पर करारा कटाक्ष किया गया होगा अपने आप इसे पढ़ने की रुचि जागृत होती है। यह  व्याप्त पर कटाक्ष करता है।  इस व्यंग्य में एक सम्मान है कि जो जलेबियां कड़ाही में जाने को तैयार हैं बिकी हुई जलेबी उसे कह रही हैं- “ तुम बिकी हुई जलेबी हमें समझा रही हूं? तुम्हारी औकात ही क्या है?  तुम लोग तो हर किसी की कड़ाही में सिरप पीने पहुंच जाती हो तुम्हारा कोई दीन ईमान नहीं। हम ईमान वाले लोग हैं।  हम पूंजीवादी कड़ाही में नहीं  जाते।  यह कड़ाही काले धन से खरीदी गई है। सीरे में भ्रष्टाचार की  शक्कर मिली हुई है। हम ईमानदारी के पैसे से खरीदी कड़ाही में जाने वाली जलेबियां हैं। मेहनत के पैसे की शक्कर वाले सिरे में जाते हैं। हमारे उसूल हमें यहां जाने से रोक रहे हैं।”
“ऊपर उठा हुआ लेखक” व्यंग्य में उन लेखकों की खिंचाई की है जो प्रसिद्धि की दौड़ में अपने लेखन के स्तर को भूलते चले जाते हैं और वाहवाही की भीड़ में खुद को भूलने लगते हैं। यह बात उन्होंने विशेष रूप से हिंदी लेखकों पर व्यंग्य करते हुए लिखे हैं- “हिंदी का लेखक जब ऊपर उठता है तो सबसे पहले उसका लेखन गिरता है वैसे ऊपर उठने के बाद लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती। आप बिना लिखे ही लिखने वालों से ऊपर बने रह सकते हैं। फिर बोलने का काम बढ़ जाता है। आयोजनों में भागीदारी बढ़ जाती है। सभा-समितियों की बैठकों में भाग लेने की व्यस्तता रहती है। सम्मान, पुरस्कार समितियों में निर्णय का दायित्व आप पर आ जाता है देश विदेश की यात्राओं के दौर शुरू हो जाते हैं। आप अपने खुद के शहर में कम ही होते हैं बाकी सब जगह पाए जाने लगते हैं।
एक और व्यंग्य है “सवा सोलह आने आजादी”। इस व्यंग्य में स्वतंत्र भारत में आजादी के मायने बताए गए हैं जैसे स्वतंत्र भारत में भ्रष्टाचार किया जाती सर्व व्याप्त है इसी संदर्भ में व्यंग्यकार ने लिखा है-”आप अपने आर्थिक विकास के लिए सब तरह से आजाद हैं। आप नौकरी कर सकते हैं, तनख्वाह से पेट न भरे तो रिश्वत ले सकते हैं, कालाबाजारी करके मुनाफा कमा सकते हैं, चीजों को मनचाही दरों पर बेच सकते हैं और बिना किसी डर के एक चीज में दूसरी चीज मिला सकते हैं। केवल इतना प्रतिबंध है कि मिलाई गई चीज अशुद्ध। अस्वस्थकर और सस्ती हो। बेरोजगारी की दशा में आप जेब काटने,राहजनी करने से लेकर बैंक लूटने तक सब कुछ कर सकते हैं। सरकार कहीं भी आप की आजादी में आड़े नहीं आती।” 
रामस्वरूप दीक्षित कथित बुद्धिजीवियों पर भी  व्यंग करने से नहीं चूके हैं। वह बनावटी बुद्धिजीवियों पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं कि-” बुद्धिजीवी बात का बतंगड़ और बदनगढ़ को बात बनाने की कला में माहिर होते हैं। यह बड़े से बड़े मुद्दे को बातों में ऐसा उलझा ते हैं कि लोग उस मुद्दे पर बात करने से कतरा ने लगते हैं और जहां कोई बात नहीं होती वहां ऐसा बवाल मचा देते हैं कि देखते-देखते वह बड़ा मुद्दा बन जाता है।” 
“साहित्य में समर्पणवाद” शीर्षक व्यंग्य में साहित्य में जुझारूपन की जो कमी आती जा रही है, उस पर  ध्यान दिलाते हुए रामस्वरूप दीक्षित लिखते हैं-”इधर साहित्य में समर्पण वाद के प्रादुर्भाव के कारण विद्रोह के स्वर धीरे-धीरे मंद पढ़ते जा रहे हैं। जो कभी विद्रोहियों के जमात के अगुआ हुआ करते थे, वे भी आज अपना डंडा और झंडा किसी ना किसी के चरणों में समर्पित कर चुके हैं। कुछ लोग आत्मसमर्पण कर रहे हैं कुछ से करवाया जा रहा है। जो इसके बाद भी जो बचे हैं उनका साहित्य निकाला किया जा रहा है।”
संग्रह में “बड़े लेखक, छोटे लेखक” एक ऐसा व्यंग्य है जिसमें लेखकों की जमात के आपसी संबंध हो की चुटीली विवेचना की गई है। लेखक ने लिखा है-” हिंदी में दो तरह के लेखक होते हैं। एक बड़े लेखक, दूसरे छोटे लेखक। बड़े लेखक हर तरह से बड़े होते हैं और छोटे हर तरह से छोटे।  बड़े लेखकों में एक खास तरह का बड़प्पन होता है, जिसे वह हमेशा वही रहते हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वे अपने बड़प्पन पर आंच नहीं आने देते। वह उसे हर हाल में बचाए रखते हैं। वही तो एक चीज है जो उनके पास होती है और जो औरों से उन्हें अलग करती है।”
आजकल बड़े कवि साहित्यकार बनने के लिए ही जोड़ तोड़ नहीं होता है बल्कि कार्यक्रमों की अध्यक्षता हथियाने के लिए भी लोग संघर्षशील रहते हैं और हर तरह के हथकंडे को अपनाकर प्रयास में जुटे रहते हैं। यह लगभग हर शहर की कहानी है। व्यंग्यकार की पैनी नजर से ऐसे लोग बच नहीं पाए हैं। कार्यक्रमों में अध्यक्षता करने के यह जोड़-तोड़ लगाने वालों तथाकथित अध्यक्षों पर  व्यंग्यकार ने टिप्पणी करते हुए  एक ऐसे ही अध्यक्ष के जीवनपर्यंत अध्यक्ष बने रहने के प्रसंग को बड़ी रोचकता के साथ सामने रखा है-” हमारे यहां एक सज्जन थे जो लिखने के कारण नहीं विद्वान और बड़े पद पर आसीन होने के कारण पहले बड़े साहित्यकार कहलाते रहे और उम्र बढ़ने पर वयोवृद्ध व वरिष्ठ साहित्यकार कहलाने लगे थे। अपनी वेशभूषा और रंग रूप के कारण वे जीवन भर नगर में होने वाले सभी तरह के समारोह को वह आयोजनों की अध्यक्षता करते रहे। धीरे-धीरे वे स्थाई अध्यक्ष के रूप में परिवर्तित हो गए थे। कोई भी समारोह यहां तक कि छोटी-मोटी गोष्ठी भी उनकी अध्यक्षता में ही संपन्न होती थी। समारोह में गोष्ठियों के अलावा शेष समय भी अध्यक्ष बने रहने के लिए उन्होंने एक साहित्यिक संस्था की अध्यक्षता हथिया ली थी और मरते दम तक उसके अध्यक्ष बने रहे। जीवन भर अपने लिखने के कारण नहीं अपनी अध्यक्षता के कारण चर्चित रहे लोग यहां तक कहने लगे थे कि इनका तो जन्म ही अध्यक्षता करने के लिए हुआ है।”
संग्रह के अधिकांश व्यंग्य साहित्य एवं साहित्यकारों पर लक्षित हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि साहित्यसृजन एक गंभीर कार्य है और यदि इसकी गंभीरता को अनदेखा कर के सतही स्तर पर सृजन किया जाए तो इससे न केवल साहित्य अपितु उस समाज को भी हानि पहुंचती है, जहां से यह साहित्य उपजता है। कुछ लोग मात्र ‘‘कैम्पेनिंग’’ के दम पर साहित्यकार बनने के ज ुगाड़ में लगे रहते हैं। ऐसे ही कथित साहित्यकारों पर व्यंग्य लेख है ‘‘वह बड़े लेखक के रूप में उभर रहा है’’। व्यंग्यकार ने ऐसे लेखकों की लेखक बनने की प्रक्रिसा पर इन शब्दों में प्रकाश डाला है कि -‘‘वह  लेखकों की जगह  साहित्यिक कार्यकर्ता तैयार करने में लगा है, जो देश में जगह-जगह उसके लिए आयोजन करते हैं।  इन आयोजनों में भागीदारी के लिए वह लगातार यात्राओं पर रहता है। इन यात्राओं से उसके दिन हरे, शामें गुलाबी और राते हरी होने लगी हैं।  यह यात्राएं उसे सुखी व स्वस्थ बनाए रखती हैं। वह साहित्यिक फतवे जारी करने लगा है।  लोगों को उठाने गिराने लगा है और इस तरह उसने खुद को आम लेखकों से ऊपर उठा लिया है। केवल लिखने वालों को वह कूप मंडूक समझता है।’’
कुल मिला कर ‘‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियां’’ व्यंग्यकार रामस्वरूप दीक्षित का एक ऐसा व्यंग्य संग्रह है जो अपने हर व्यंग्य में पाठकों को चिकोटियां काटता अनुभूत होगा, साथ ही व्यंग्यविधा की चाशनी में पगे कटुसत्य से साक्षात्कार होगा। 
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Wednesday, October 13, 2021

चर्चा प्लस | स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा
  - डाॅ. शरद सिंह                            
नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।


या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।
दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुथति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं जो
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।
मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।
उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।
हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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(सागर दिनकर, 13.10.2021)
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Tuesday, October 12, 2021

छंदों में निबद्ध जीवन का उत्साह | समीक्षा | समीक्षक - डॉ शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 12.10. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि पूरन सिंह राजपूत के काव्य संग्रह "फगनौटे पूरण" की  समीक्षा...

आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
छंदों में निबद्ध जीवन का उत्साह
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह  - फगनौटे पूरण
कवि         - पूरन सिंह राजपूत
प्रकाशक  - एन.डी. पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य         - 100/-
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कवि पूरन सिंह राजपूत सागर नगर के लोकप्रिय कवि हैं। वे बुंदेली, उर्दू और हिन्दी में काव्य रचनाएं लिखते हैं। 07 नवंबर 1950 को जन्में पूरन सिंह ने दिव्यांग होते हुए भी जीवन में कभी हार नहीं मानी। वे अपने व्यक्तित्व में जितने उत्साह से परिपूर्ण रहते हैं, उतनी ही उत्साहपूर्ण रचनाएं उन्होंने लिखी हैं। ‘‘फगनौटे पूरण’’ उनकी प्रथम काव्यकृति है। इसमें उनकी छांदासिक रचनाएं संग्रहीत हैं। ‘‘फगनौटे’’ का अर्थ है फागुन के प्रभाव से युक्त। फागुन माह सभी बारह माहों में सर्वाधिक उत्साह और उमंग का माह माना गया है। इस माह में प्रकृति भी अपनी पूरी छटा बिखेर रही होती है। जाड़े के जाने और ग्रीष्म के आने के बीच का यह संधिकाल कवियों को सदा लुभाता रहा है। बुंदेलखंड के जनकवि ईसुरी ने जो छंदबंद्ध कविताएं लिखीं वे ‘‘फाग’’ ही कही जाती हैं। जब कि ईसुरी की कविताओं में जीवन श्रृंगार, सामाजिक परिवेश, राजनीति, भक्तियोग, संयोग, वियोग, लौकिकता, शिक्षा चेतावनी, काया, माया आदि सभी कुछ का वर्णन है। अतः जब फागमय काव्य रचनाएं सामने आती हैं तो ईसुरी का काव्य एक मानक अधार के रूप में सामने आ खड़ा होता है। ऐसे में रचनाकार के समक्ष एक बहुत बड़ी चुनौती होती है कि वह अपनी फाग रचनाओं को जीवन के सभी तत्वों से जोड़े और साथ ही उसमें उत्साह और रागात्मकता भी बनाए रखे। डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डाॅ. सुरेश आचार्य ने कवि पूरन सिंह को ईसुरी की परंपरा का कवि माना है। वे लिखते हैं कि-‘‘श्री पूरन सिंह को मैं इसीलिए ईसुरी की परंपरा में मानता हूं, उनकी कविताएं ऋतुराज की प्रशस्ति की कविताएं हैं। वे सरस रचनाकार हैं। वे बारहमास फागुन के उत्साह की तरह हैं इसलिए मैं उनकी विशिष्ट जिजीविषा का प्रशंसक हूं।’’
संग्रह की रचनाओं पर सागर के वरिष्ठ कवि निर्मल चन्द निर्मल, डाॅ. सुरेश आचार्य, मणिकांत चैबे बेलिहाज़, डाॅ लक्ष्मी पाण्डेय तथा डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया के विचार आरंभिक पृष्ठों पर दिए गए हैं। ‘‘फगनौटे पूरण’’ के संदर्भ में निर्मल चन्द निर्मल टिप्पणी की है कि ‘‘पूरन सिंह ने श्रृंगार के बगीचे में उतर कर वसंत को कलम का माध्यम बना कर मौसम को खंगाला है, इसकी धड़कनों में स्वयं को डुबाया है।’’
छंद के संबंध में कहा जाता है कि ‘छंदों को साधना सरल नहीं होता है’। ‘साधना’ शब्द अपने आप में ही सतत् प्रयास, श्रम और समर्पण का द्योतक है। जो कवि समर्पित भाव से छंदों की शर्तों को स्वीकार करता हुआ उनका पालन कर के काव्य रचता है, वही छंदसाधक कवि कहलाता है। कवि पूरन सिंह को निश्चित रूप से एक छंदसाधक कवि माना जा सकता है। इस संग्रह पर डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया जहां रचनाओं की प्रकृति पर प्रकाश डालती है, वहीं बहुत रोचक भी है जो संग्रह की रचनाओं को पढ़ने से पूर्व ही पाठक के ‘मूड’ को निर्धारित करने की अहम भूमिका निभाती है। डाॅ. सीरोठिया लिखते हैं कि -‘‘फगनौटे पूरण काव्य के विभिन्न रंगरूपों के पुष्पों के गुलदस्ते की तरह विविधवर्णी एवं आकर्षक है। इस काव्य संग्रह में कवित्त, कुंडलियां, सवैया, गीत, रसिया, मुक्तक, चैकड़ियां, दोहे, ग़ज़ल के मनमोहक रूपों की छटा पाठक मन को सम्मोहित करने में समर्थ है।’’
फागुन के चित्ताकर्षक प्रभाव के व्यतीत हो जाने से पूर्व उसका आनंद उठा लेने के आग्रह से भरी यह काव्य पंक्तियां कवि पूरन सिंह की भाव-क्षमता को बखूबी प्रतिबिम्बित करती है। पंक्तियों में ‘उकता रहा’ का प्रयोग अत्यंत प्रभावी ढंग से किया गया है -
प्रेम की कविता निरंतर गा रहा है फाल्गुन
भावना मन की विकट भड़का रहा है फाल्गुन
मिलन आमंत्रण पुनः भिजवा रहा है फाल्गुन
शीघ्रता कर लो प्रिये, उकता रहा है फाल्गुन

वस्तुतः मनुष्य अपनी अनुभूतियों को, संवेदनाओं को और विचारों को परस्पर बांटना चाहता है। वह उनके स्वास्फूर्त भावों और विचारों को दूसरों तक पहुंचाना चाहता है और दूसरों के भावों एवं विचारों को जानना चाहता है। उसने पारस्परिक विचार विनिमय के लिए जिस स्थाई अभिव्यक्ति माध्यम को अपनाया वह ही साहित्य कहलाता है। अभिव्यक्ति के अनेक सोपानों को तय करता हुआ साहित्य आज मुख्यतः गद्यात्मक एवं पद्यात्मक दो रूपों में सृजित हो रहा है। पद्य में छंद विधान की दृष्टि से छंदबद्ध और छंदमुक्त दोनों ही प्रकार की कविताएं सम्मिलित की गई है। हिंदी साहित्य में काल विभाजन की दृष्टि से छायावाद युग से पहले सभी प्रायः छंदबद्ध कविता ही लिखते रहे। लेकिन छायावाद के आते-आते साहित्य सृजकों ने शिल्प के स्थान पर भाव को महत्वपूर्ण मान लिया। परिणामतः हिंदी कविता छंदमुक्त होकर जनसामान्य तक पहुंचने लगी। लेकिन अपनी गेयता के गुण के कारण छंदबद्ध कविताएं कभी हाशिए पर नहीं गईं। छंद दो प्रकार के होते हैं- मात्रिक छंद और वर्णिक छंद। वे छंद जिनमें कविता के चरणों में प्रयुक्त मात्राओं को गणना को ही आधार मानकर छंद की रचना की जाती है। अर्थात शिल्प की दृष्टि से कविता में कितने चरण है। प्रत्येक चरण में कितनी मात्राओं का विधान है। कितनी मात्राओं के उपरांत यदि का विधान है। चरण दो प्रकार के होते हैं- समचरण, जहां प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या बराबर हो जैसे-चैपाई।  तथा, दूसरा विषमचरण।  विषमचरण छंद वे हैं जिनमें यति या विराम के आधार पर चरणों में मात्राओं की संख्या में भिन्नता होती है। जैसे - दोहा , सोरठा आदि।       
वर्णिक छंद वे छंद कहलाते हैं जहां निर्धारित गणों के अनुरूप वर्णों का प्रयोग किया जाता है। हालांकि गणों में भी वर्णों की मात्रा को ही आधार माना जाता है लेकिन छंद विधान की दृष्टि से वर्णों का क्रम निश्चित रहता है। छंद को साधने का पहला सोपान होता है, सही शब्दों का चयन। जिससे लयबद्धता, और प्रत्येक चरणों का वज़न बराबर बना रहे। शब्द चयन की दृष्टि से कवि पूरन सिंह ने अपनी पूरी सिद्धहस्तता प्रदर्शित की है। संग्रह में पूर्वकथन लिखते हुए मणिकांत चैबे बेलिहाज़ ने कवि के शब्द-कौशल पर सटीक टिप्पणी की है-‘‘बहुत सुंदर शब्द संयोजन तथा सतर्कतापूर्वक किया गया शब्द विन्यास इस संग्रह को विशेष बनाते हैं। पूरन सिंह जी की हर कविता उल्लेख तथा टिप्पणी में शामिल हो सकती है।’’
कवि पूरन सिंह ने फागुन के मानसिक प्रभाव को अपनी दृष्टि से आकलित करते हुए उसके प्रत्येक पक्ष को सामने रखा है। एक उदाहरण देखिए -
फागुनी शब्दावली से ही विवादित हो गए
वे प्रखर विद्वान हुरियारे प्रमाणित हो गए
हम मदन ऋतुराज मनसिज से कदाचित हो गए
अंग हैं उत्तुंग, मन के भाव कुत्सित हो गए

डाॅ. लक्ष्मी पाण्डेय ने भी कवि पूरन सिंह की भाषा और शब्द पर मज़बूत पकड़ को अपने मंतव्य में इन शब्दों में रेखांकित किया है-‘‘पूरन सिंह काव्य रचना के लिए खड़ी बोली हिन्दी के साथ ही बुंदेली, ब्रज भाषा का भी उपयोग करते हैं। हिन्दी में लिखते हुए तत्सम शब्दों का भी सहजता के साथ प्रयोग करते हैं, यह उनकी भाषाई सामाथ्र्य को दर्शाता है।’’ कवि की यह खूबी उनकी कुंडलियों में निखर कर उभरी है-
केशल, कुमकुम अलक्ता, हल्दी रोली रंग
वासंतिक  परिवेश  में  निष्ठुर हुए  अनंग
निष्ठुर हुए अनंग प्रफुल्लित भू नभ  अंचल
मदन झकोरे चलत, चित्त मद्यप अति चंचल
मदमानी सी देह, भाव अति कुत्सित ले कर
रंग, गुलाल, अबीर, महावर, कुमकुम, केशर

फगुनाहट में डूबने का अर्थ यह भी नहीं है कि कवि वर्तमान की स्थितियों से बेख़बर हो गया हो। पूरन सिंह ने जनजीवन की समसामयिकता को बड़ी सुंदरता से अपनी कुंडलिया में पिरोया है-
रंगों के  संबंध में  पूरन  रक्खो  ख़याल
चाईनीज़ गुलाल  में, हुई  खुरदरी खाल
हुई खुरदरी  खाल,  रग-रग  अकड़े हैं
भाभी जी भी कहें- आप  सही पकड़े हैं
उनका यह फरमान सुनो, अब ऐ हुरदंगों
खेलो होली खूब  मगर  प्राकृतिक  रंगों

कुंडलियां की भांति ही कवित्त में भी कवि पूरन सिंह ने अपने काव्य कौशल को साधा है। कवित्त में अनुप्रास अनंकार का बहुत महत्व होता है। अनुप्रास के प्रयोग से कवित्त का अंतः सौंदर्य बढ़ जाता है तथा उसके पठन-प्रवाह में स्वतः ताल उत्पन्न होने लगता है। पूरन सिंह के इस कवित्त को देखिए-
रग-रग पोर-पोर, हियरा की कोर-कोर
तन मन  मरोर  बौर  बसंत  भरने लगा
काम की कमंद फेंकि विंध लिए अंग-अंग
पंच-पुष्प  सरों  का  संधान करने लगा
तन में  मदन बोध,  मन में  मनोज बोध
पीत  परिधान  कुसुमाकर  उतरने लगा
पुष्प मकरंद  निखरो, नयन भए  रतनारे
मनमथ मनसिज  मदन  प्रान हरने लगा

छंदबद्धता में सवैया छंदों का भी अपना विशेष स्थान है। पूरन सिंह ने अपने कवित्त में फगुनाहट के साथ-साथ विविध पौराणिक प्रसंगों को भी पर्याप्त स्थान दिया है। जैसे वे अपने एक कवित्त में द्रोपदी के चीर-हरण और शबरी की व्यथा-कथा का समरण कराते हैं-
जो गजराज पुकार सुनी, तउं दौरत नाथ मकर संहारत।
टेर सुनी उपनय तुम भागत, ध्रुपद सुता तन चीर प्रसारत।।
गीध अजामिल तिय गौतम शबरी दशकंधर गनिका तारत।
पूरन नाथ सुनो विनती हम, राम रटत दिन रैन पुकारत।।

इसी प्रकार एक बहुत ही सुंदर सवैया इस संग्रह में है जिसमें कवि पूरन सिंह ने गोपियों की विरह पीड़ा को अपने समूचे काव्य-कौशल के साथ प्रस्तुत किया है-
कहते न बने, कहते न बने, मन की हम पीर  सहीं कितनी
मिलहौं कबलौं, न मिले अबलौं, हम जानत धीर धरीं कितनी
दिन रात बरस, महिने निकरे, यह सोचत शेष  धरीं कितनी
तुम जानत हो न पता तुमको, अंखियां हर रोज झरीं कितनी

यूं तो संग्रह में गीत, चैकड़ियां और ग़ज़लें भी हैं किन्तु सभी की बानगी यहां देना संभव नहीं है। जिसे छंदबद्ध काव्य में रुचि हो उसे कवि पूरन सिंह का काव्य संग्रह ‘‘फगनौटे पूरण’’ अवश्य पढ़ना चाहिए। यह संग्रह रसबोध जगाने और भावनाओं के प्रवाह में डुबाने में सक्षम है। इसके छंदों में जीवन का वह उत्साह निबद्ध है जिसकी आज के खुरदरे समय में बहुत जरूरत है।
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Wednesday, October 6, 2021

चर्चा प्लस | जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए स्मार्ट समाधान है शहरी वन
- डाॅ. शरद सिंह                            
शहर में मनुष्यों की आबादी कितनी है, यह जनसंख्या गणना से हमेशा पता चलता रहता है। लेकिन शहर में वृक्षों की संख्या कितनी है? इस बारे में न कोई पूछता है और न कोई जानना चाहता है। सड़कें चैड़ी करने के लिए वृक्ष कटते हैं, रिहायशी और व्यावसायिक भवन बनाने के लिए वृक्ष काटे जाते हैं। बदले में कितने वृक्ष शहर के अन्दर लगाए जाते हैं? आंकड़ा पता नहीं। जबकि बेतहाशा कार्बन उत्सर्जन और बढ़ते तापमान की हानि से कोई बचा सकता है तो सिर्फ़ वृक्ष। इसीलिए सरकार ने ‘शहरी वन’ की योजना बनाई। किन्तु कहां हैं वे शहरी वन?

‘शहरी वन’ की आवश्यकता पर चर्चा करने से पहले ज़रा याद करिए अक्टूबर 2019 की वह घटना जब उपनगरीय मुंबई की आरे मिल्क कॉलोनी, जिसे शहर के ‘ग्रीन लंग’ के रूप में जाना जाता रहा है, शहरी विकास का शिकार हुई। दरअसल मुंबई मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने ट्रेन डिपो के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए इस क्षेत्र में 3,000 पेड़ों को काट दिया। एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, यह जगह तितलियों की 86 प्रजातियों, मकड़ियों की 90 प्रजातियों, सरीसृपों की 46 प्रजातियों, जंगली फूलों की 34 प्रजातियों और नौ तेंदुओं का घर है। इसको लेकर सार्वजनिक आक्रोश सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से हस्तक्षेप करने के लिए कहा। लेकिन तब तक मुंबई मेट्रो ने आवश्यक भूमि को खाली करने के लिए पर्याप्त पेड़ काट दिए थे। हम सभी नागरिक विकास और हरियाली में तालमेल की बात करते हैं लेकिन सच तो ये है कि आज भी हम में हरित क्षेत्रों और प्राकृतिक बुनियादी ढांचे के रूप में जंगलों के मूल्य की बहुत कम समझ है जो शहर के निवासियों को स्वच्छ हवा, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण, वन्यजीव आवास और प्राकृतिक मनोरंजन क्षेत्रों जैसे पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करता है। विडंबना यह कि वन विभाग, जिनके पास यह समझ है, उसकी हैसियत राज्यों और शहरों के टाउन प्लानिंग वाले विभागों की तुलना में कम है। यूं भी शहरों के फैलाव से वनपरिक्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है।
आम नागरिकों को यह बात लगभग पता ही नहीं है कि भारत सरकार शहरों के विकास और बदलाव की प्रक्रिया को सतत और पर्यावरण हितैषी बनाने के लिये अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। पर्यावरणीय प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिये समाज के सभी वर्गों, संगठनों और सरकारी संस्थाओं के समन्वित प्रयासों की जरूरत को महसूस कर रही है। केन्द्र सरकार का पूरा ध्यान उन योजनाओं को बढ़ावा देने पर है जो पर्यावरण हितैषी हों। जिससे शहरों को जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के अनुकूल बनाया जा सके। इसके लिये सरकार अत्याधुनिक तकनीक आधारित ‘स्मार्ट समाधान’ को बढ़ावा दे रही है।
सन् 2016 में, भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मुंबई के बोरीवली में संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में एक समारोह में शहरी वन परियोजना योजना शुरू की थी। ऐसा कोई सरकारी आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है जिससे यह पता चल सके कि 2016 से 2020 के बीच 200 सिटी फॉरेस्ट वाली योजना ने कितना लक्ष्य प्राप्त किया। इसके बाद पिछले वर्ष, 5 जून 2020 को यानी विश्व पर्यावरण दिवस को एक वर्चुअल उत्सव के दौरान मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शहरी वन परियोजना की एक बार फिर शुरुआत की। इस योजना का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में देश भर के 200 शहरों में शहरी वन क्षेत्र विकसित करना है।
देखा जाए तो शहरी वन योजना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने और शहरी प्रदूषण को कम करने की दिशा में बहुत ही कारगर योजना है। शहरी वन शहरों के जलवायु को सुधार सकते हैं। शहरों में तापमान को कम करने में वृक्ष सबसे अधिक मदद करते हैं। शहरों में कंक्रीट से बनी इमारतों और सड़कों से निकलने वाली गर्मी उन्हें आसपास के देहात के इलाकों की तुलना में अधिक गर्म बना देती है। वे ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर के स्तर को भी कम कर देते हैं। इसके अलावा वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड को हटाकर ऑक्सीजन देते हैं। इस कार्बनडाई आॅक्साईड को सोख कर आॅक्सीजन बढ़ाने का काम करते हैं वृक्ष। ये वृक्ष शहरी वन के रूप में याहरों के जीवन की अभिन्न हिस्सा बन सकते हैं। वनपरिक्षेत्रों के घटने से जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई भी शहरी वन कर सकते हैं। दुनिया भर में बड़े शहरों में इस प्रकार के शहरी वन बहुत तेजी से विकसित किये जा रहे हैं। सियोल, सिंगापुर और बैंकॉक ने अपने शहर के निवासियों के जीवन में सुधार करते हुए प्रकृति और वन्य जीवन के लिए जगह प्रदान करने वाले ग्रीन कॉरिडोर्स बनाए हैं।
शहरी वन विकसित करने में प्राइवेट सेक्टर की सहभागिता महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसके लिए पुणे में वारजे शहरी वन के मॉडल को अपनाया जा सकता है। यह महाराष्ट्र की पहली शहरी वानिकी परियोजना है जिसे टेरी द्वारा विकसित किया गया था, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है। इसको टाटा मोटर्स के साथ एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत एक कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पहल के तहत इसे विकसित किया गया था। झुग्गियों और बिल्डरों द्वारा वन विभाग की 16 हेक्टेयर बंजर जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया था जिसे जैव विविधता के सम्पन्न रमणीय स्थल में तब्दील कर दिया गया। यह 10,000 से अधिक स्वदेशी पौधों की प्रजातियों, 29 स्थानीय पक्षी प्रजातियों, 15 तितली प्रजातियों, 10 सरीसृप प्रजातियों और तीन स्तनपायी प्रजातियों की मेजबानी करता है। कई अन्य अच्छे उदाहरण हैं। शिमला में लगभग 1,000 हेक्टेयर के एक अभ्यारण्य है जो 1890 के दशक में नगर निकाय द्वारा प्रबंधित शिमला पेयजल जलग्रहण वन के रूप में शुरू हुआ था। दक्षिण-पूर्व दिल्ली में, असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य को गांव की आम भूमि से आरक्षित वन क्षेत्र में ले जाया गया और फिर इसे एक अभयारण्य के रूप में तब्दील कर दिया गया। दिल्ली के अरावली और यमुना जैव विविधता पार्क ने भी शहर में इन क्षेत्रों के प्राकृतिक आवासों और पारिस्थितिकी प्रणालियों को सफलतापूर्वक दोबारा स्थापित किया है। इसी तरह, गुड़गांव के अरावली जैव विविधता पार्क को नगर निगम, नागरिक समाज, निगमों और निवासियों के बीच एक अनूठी साझेदारी द्वारा वनों को देशी प्रजातियों के लिए एक आश्रय के रूप में तब्दील गया था। अब इसमें लगभग 200 पक्षी प्रजातियों को आकर्षित करने वाले सैकड़ों फूल, पेड़ और झाड़ियां हैं।
शहरी वन परियोजना के लिए जापान की मियावाकी पद्धति को एक अच्छे मौडल के रूप में देखा जा रहा है। इसे जापानी वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा निर्देशित किया गया है। इसे स्थानीय परिस्थितियों के लिए स्वदेशी प्रजातियों के साथ अनुकूलित किया जा सकता है। मियावाकी वन एक उष्णकटिबंधीय वर्षावन की प्रतिकृति बनाते हैं। इसमें छोटे वृक्ष नीचे और ऊंची-ऊंची छतरियों वाली प्रजातियां ऊपर होती हैं। पारंपरिक वानिकी में, एक एकड़ में लगभग 1,000 पेड़ उगाए जाते हैं। हम मियावाकी के तहत इतने ही क्षेत्र में 12,000 पौधे लगाते हैं, जो 10 वर्षों में 100 साल पुराने जंगल का लाभ पैदा करता है।
अब बात मध्यप्रदेश के सागर जैसे मझोले कद के शहरों की की जाए तो यह शहर फिलहाल औद्योगिक प्रदूषण से दूर है लेकिन आर्थिक विकास के लिए हमेशा उद्योगों से दूर नहीं रहा जा सकता है। इस शहर ने भवन निर्माण, सड़कों के चैड़ीकरण  आदि में अपने अनेक वृक्षों को गंवाया है। सागर जैसे शहरों में आबादी और वाहनों की तुलना में वृक्षों की संख्या न्यूनतम है। जब से स्मार्टसिटी योजना लागू हुई है तब से कचरा प्रबंधन की ओर तत्परता से ध्यान दिया जाने लगा है। गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण पर भी जागरूकता आई है। लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। हम वैश्विक स्तर प्रदूषण के जिस प्रतिशत से जूझ रहे हैं, उसमें इतना पर्याप्त नहीं है। भविष्य के विकास को ध्यान में रखते हुए भी शहरी वन योजना को एक स्मार्ट समाधान के रूप में तेजी से अमल में लाने की जरूरत है। वृक्ष एक दिन में बढ़ कर इतने तैयार नहीं हो जाते हैं कि वे प्रदूषण से जूझ सकें। कुछ मनोरंजन पार्क बना देने या सड़क डिवाईडर पर फूलों के पौधे लगा देने से वायु प्रदूषण एवं तापमान के स्तर को हम नहीं काट सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि शहरी वन के लिए क्षेत्र चिन्हित कर के वे वृक्ष लगाएं जाएं जो सघन होते हैं और वायु एवं ग्लोबल वार्मिंग की मात्रा को कम करने में मदद कर सकते हैं। इस दिशा में जनजागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है जिससे नागरिक शहरी वन योजना को अज्ञानवश क्षति न पहुंचाएं। वस्तुतः शहरी वन छोटे-बड़े, मंझोले सभी तरह के शहरों के लिए जरूरी हैं। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि वृक्ष हैं तो ऑक्सीजन है और ऑक्सीजन है तो संासे हैं। शहर के इको सिस्टम को भी बनाए रखने में भी शहरी वन अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं।
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(सागर दिनकर, 06.10.2021)
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Tuesday, October 5, 2021

जीवन से संवाद का आग्रह करती कविताएं | समीक्षा | समीक्षक - डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 05.10. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि अजयश्री के काव्य संग्रह "चौका-बरतन" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
जीवन से संवाद का आग्रह करती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

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कविता संग्रह  - चौका-बरतन
कवि         - अजयश्री
प्रकाशक      - रश्मि प्रकाशन, महाराजापुरम, कृष्णा नगर, लखनऊ (उप्र)-226023
मूल्य         - 110/-
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अजयश्री एक प्रतिभावान कवि हैं। कविता के साथ ही कहानी, उपन्यास, नाटक, पटकथा आदि विविध विधाओं में उन्होंने अपनी कलम चलाई है तथा ख्याति अर्जित की है। उनका ताज़ा काव्य संग्रह ‘‘चौका-बरतन’’ जनजीवन से जुड़ी 35 कविताओं का संग्रह है। वे लखनऊ के परिवार कल्याण विभाग में गीत एवं नाट्य अधिकारी हैं तथा उनके द्वारा कुष्ठरोग पर बनाई गई शाॅर्ट फिल्म ‘‘काश’’ को नवादा फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट स्टोरी श्रेणी में तृतीय पुरस्कार भी मिल चुका है। जैसा कि संग्रह के नाम से ही अनुमान हो जाता है कि इन कविताओं में रोज़मर्रा के जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों को पिरोया गया है। अजयश्री की कविताएं नई कविता के मानकों को स्वीकार करती हुई भाव-प्रवणता से युक्त हैं। नई कविता की यह विशेषता रही है कि इसने तमाम खुरदुरेपन को आत्मसात करते हुए जीवन को जीवन के रूप में देखा, इसमें कोई सीमा निर्धारित नहीं की। इसलिए अपने कथ्य और दृष्टि में विस्तार पाती है। नई कविता का धरातल पूर्ववर्ती काव्य- धाराओं से व्यापक है, इसलिए इसमें विषयों की विविधता है। एक अर्थ में यह पुराने मूल्यों और प्रतिमानों के प्रति विद्रोही प्रतीत होती है और इनसे बाहर निकलने के लिए व्याकुल रहती है। नई कविता ने धर्म, दर्शन, नीति, आचार सभी प्रकार के मूल्यों को चुनौती दी। इसमें मानव को उसके समस्त सुख-दुखों, विसंगतियों और विडंबनाओं को उसके परिवेश सहित स्वीकार किया गया है। इसमें न तो छायावाद की तरह समाज से पलायन है और न ही प्रयोगवाद की तरह मनोग्रंथियों का नग्न वैयक्तिक चित्रण या घोर व्यक्तिनिष्ठ अहंभावना। ये कविताएं ईमानदारी के साथ व्यक्ति की क्षणिक अनुभूतियों को, उसकी समग्र पीड़ा को संवेदनापूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। ठीक इसी तरह अजयश्री की कविताएं गहरे सामाजिक अभिप्राय वाली हैं। उनमें मनुष्यता को बचाए रखने का एक निरंतर संघर्ष दिखाई है। इन कविताओं में जीवन के भरे-पूरे दृश्य, उसके अन्तर्विरोध, उसकी विडम्बनाएं, देशज रंग, स्मृतियां, घर, परिवेश अनेक रूपों में विद्यमान हैं।
अजयश्री अपनी कविता ‘‘दाल-रोटी’’ के बहाने पारिवारिक संबंधों की विवशताओं एवं दोहरेपन को सामने रखते हुए कहते हैं-
नमक चीनी 
में  उलझी
जिंदगी, 
सुलझती नहीं 
रिश्तांे सी ! 
एक चिंगारी है 
चूल्हे में 
जो उम्र की 
रोटियां सेक 
रही है। 
ज़रूरी नहीं 
रसोई में  
पकनेवाला 
हर भोजन 
स्वादिष्ट हो !
‘‘चौका बरतन’’ कविता में एक गृहणी की दिनचर्या का बहुत ही बारीकी से दृश्यांकन प्रस्तुत करती है। यह कविता अपने आप में एक सुंदर दृश्यचित्र रचती है। जिसमें सूरज उगने से पूर्व और सूरज डूबने के बाद के रात के पहरों तक की कार्यप्रणाली को व्यक्त की गई है -
सूरज के लाल होकर 
झांकने से पहले, 
जल जाती है 
उसके कर्मों की आग 
बाबूजी की चाय 
अम्मा का काढ़ा 
मुन्नी और बबलू का 
ककहरा-पहाड़ा
सब अपने-अपने 
बर्तनों में उबलने लगते हैं।
छोटी ननद की अंगड़ाई 
पियाजी की तन्हाई वाला 
बर्तन कोई नहीं देखता...
जैसे-जैसे सूरज की किरणें 
धरा पर पड़़ती जाती है। 
उसके कर्मों की परिधि 
भी बढ़ती जाती हैं।
नई कविता की अपनी अनेक चुनौतियां होती हैं। जिनमें सबसे बड़ी चुनौती इासे सपाटपन से बचाना और शब्दों का सही चयन है। इस सम्बन्ध में डॉ. नगेन्द्र के विचार बहुत सटीक है, उनके अनुसार- ‘‘जहां पूर्ववर्ती कवि बौद्धिकता की अभिव्यक्ति रागात्मकता के माध्यम से करते थे, वहां इन्होंने (नई कविता वालों ने) रागात्मक तत्त्व के लिए बौद्धिकता को अपनाकर क्रम-विपर्यय का उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है! दूसरे, इसमें भाषा का सर्वथा वैयक्तिक प्रयोग किया गया है।’’ प्रयोगवादी कवि शब्दों को प्रचलित अर्थ में ग्रहण करना उचित नहीं समझता! वह शब्द के साधारण अर्थ में बड़ा अर्थ भरना चाहता है और इसी प्रयास में वह साधारण अर्थ को भी खो देता है!’’ अजयश्री ने शब्दों के चयन में पर्याप्त सावधानी बरती है। उनके शब्द गुरुतर अर्थ के साथ वही भावबोध रखते हैं जो वे पाठकों के समक्ष रखना चाहते हैं। इस बिन्दु पर अजयश्री अपनी कविताओं को उस भय से मुक्त रखते हैं जिसे डॉ. नगेन्द्र ने प्रकट किया था। इसी तारतम्य में अजयश्री की ‘‘जी गया वो’’ महत्वपूर्ण है-
आज मर गया वो
हां, सचमुच मर गया...
पहली बार नहीं मरा 
काफी दिनों से ही मर रहा
सबसे पहले जन्म लेते ही मरा
कृश-काया झूलती छातियों में
श्वेत अमृत नहीं रक्त बहा
जब खेलना शुरू किया फिर मरा
अमीरी गरीबी ऊंच-नीच के बीच
पढ़ना चाहा तो बाल मजदूरी और
लाचारी ने मारा
विवाह हुआ तो रस्मो रिवाज
दुनियादारी ने मारा
उम्र ढली तो परिस्थितियों और
स्वार्थों ने मारा
सबकी जुबां पर बस ये ही
काश मर जाता..!
आज मर गया जिंदगी से हारा
पर जी गया मरते ही बेचारा...।
कवि ने रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी बातों को भी अपनी कविता में बड़े विस्तार से स्थान दिया है। जैसे ‘‘चप्पल’’ कविता को ही ले लीजिए। इसकी चार पंक्तियां देखिए-
अस्तित्व में आते ही
आ जाती हैं चप्पलें
उम्र भर रहता है
उनका साथ।
चाहे राजनेता  हो अथवा स्वर नाम धन्य बड़ा नाम कहलाने वाले साहित्यकार अक्सर यथार्थ को महसूस किए बिना यथार्थ के पक्ष में झूठी बातें करके तालियां बटोरने का काम करते हैं। जनजीवन से सरोकार रखने का  ढोंग करने  वाले ऐसे लोगों को  कवि ने ललकारा है। ‘‘आसमान पर’’ शीर्षक कविता में कवि ने लिखा है-
लकीर खींचने वालों
पहले धरती पर
पैर  तो टीका लो
कद बढ़ जाने से
सोच का विस्तार नहीं होता
बनना है अगर इंद्रधनुष
तो पहले रंगों की
भाषा को समझो।
वस्तुतः अजयश्री अभिव्यक्ति के अपने मौलिक मुहावरे गढ़ते हैं और उन्हें कविता में पिरो कर वर्तमान को रेखांकित करते हैं। जैसे ‘‘दिल सहम जाता है’’ कविता में वे लिखते हैं-चार लोग एक कमरे में/ और सन्नाटा छा जाता है/सब खो जाते हैं अपने-अपने सचल दूरभाष यंत्र में’’। वास्तविक संवाद को त्याग कर आभासीय संवाद में खोने का यह दृश्य देख कर कवि का सहमना स्वाभाविक है। इसी तरह के कई बिम्ब कवि ने अपनी कविताओं में सहेजे हैं जो उनके कवित्व की गंभीरता से परिचित कराते हैं। अजयश्री ने अपनी कविताओं के द्वारा संवाद का नया पाठ गढ़ा है जो जीवन की सच्चाइयों से पलरयन करने का नहीं अपितु उसका सामना करने का आह्वान करता है। काव्य संग्रह ‘‘चौका-बरतन’’ हर पाठक से संवाद करने में सक्षम है, पठनीय है और चिंतन की प्रचुरता से परिपूर्ण है।  
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Saturday, October 2, 2021

गांधी जयंती पर प्रगतिशील लेखक संघ की मकरोनिया इकाई द्वारा आयोजन में डॉ शरद सिंह

 02 अक्टूबर 21 को गांधी जयंती के अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ सागर की मकरोनिया इकाई की दो सत्रों में गोष्ठी संपन्न हुई, जिसमें पहले सत्र में महात्मा गांधी के विचारों व्यक्तित्व एवं गांधी दर्शन पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई इसके उपरांत काव्य पाठ का सत्र रहा। आज की गोष्ठी की अध्यक्षता की पूर्वकुलपति रीवा विश्वविद्यालय, डॉ उदय जैन नेभ तथा संचालन किया इकाई के अध्यक्ष डॉ सतीश पांडेय ने। मैं यानी डॉ शरद सिंह सहित सहभागी रहे सर्वश्री डॉ टीकाराम त्रिपाठी रुद्र, मलैया जी, वृंदावन राय सरल, वीरेंद्र प्रधान, प्रभात कटारे, ज.ल.राठौर आदि साहित्यकार। 
तस्वीर उसी अवसर की...